भगवा आतंक” का झूठ: एक खतरनाक कहानी कैसे गढ़ी गई

इस लेख में इस बात पर गहनता से चर्चा की गई है कि किस प्रकार राजनीतिक अवसरवाद, मीडिया पूर्वाग्रह और वैचारिक युद्ध ने हिंदू आवाजों को दबाने और भारत के सामने मौजूद वास्तविक खतरों से ध्यान हटाने के लिए “भगवा आतंक” की झूठी कहानी गढ़ी।
  • भारतीय संदर्भ में भगवा आतंकषड्यंत्र सिद्धांत एक जटिल घटनाक्रम है, जो विभिन्न आयामों का मिश्रण है राजनीतिक सत्ता का खेल, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति, हिंदू विरोधी भावना, आदि।
  • भगवा आतंक की कहानी वैश्विक वाम-उदारवादी शिक्षाविदों, बुद्धिजीवी संस्थानों और मीडिया तंत्र द्वारा लगातार फैलाई जाती है, जिसका अंतिम उद्देश्य हिंदू आवाज़ों को दबाना और हिंदू मुद्दों को हाशिये पर रखना है।
  • 26/11 आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण के साथ, हमलों को हिंदू आतंकके कृत्य के रूप में पेश करने की तत्कालीन साज़िश एक बार फिर सामने आई है।
  • मानविकी और सामाजिक विज्ञान शिक्षाविदों में भगवा आतंकषड्यंत्र सिद्धांत एक पूर्ण विकसित शैक्षणिक उद्योग है। हिंदू आतंकवाद षड्यंत्र सिद्धांत को भुनाने वाले वाले ऐसे साहित्य की भरमार है, और वह भी प्रतिष्ठित वैश्विक प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित।

वाम-उदारवादी तंत्र नियमित रूप से घातक मिथकों को गढ़ता और फैलाता है – नैतिक मूल्यों के प्रचार प्रसार हेतु नहीं, बल्कि वैचारिक युद्ध के लिए गढ़े गए विकृत आख्यानों के रूप में। इस तंत्र ने अपने विषैले विमर्श के माध्यम से मिथकों का पारंपरिक स्वरूप पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। वाम-उदारवादी तंत्र के ये आधुनिक मिथक प्रोपेगैंडा के साधन हैं, जिन्हें स्वदेशी संस्कृतियों को नष्ट करने के उद्देश्य से रचा गया है, विशेष रूप से हिंदू सभ्यता के पुनरुत्थान को लक्षित करते हुए। “हिंदुत्व फासीवाद”, “हिंदू बहुसंख्यकवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” और “जाति विशेषाधिकार” जैसे शब्दों के माध्यम से, वोक मशीनरी ने  हिंदू पहचान का दानवीकरण कर उसका बेहद नकारात्मक और वीभत्स चित्रण किया है। दुखद रूप से, कई हिंदुओं ने खुद इन झूठों को आत्मसात कर लिया है, जिससे वास्तविक सच्चाईपूर्ण आवाज़ें चुप्पी का शिकार बन गयी हैं और एक प्राचीन सभ्यता का सांस्कृतिक आत्मविश्वास लुप्त होता प्रतीत हो रहा है।

हाल के दिनों में प्रचारित सबसे कपटी मिथकों में से एक है “भगवा आतंक” या “हिंदू आतंक” का षड्यंत्र सिद्धांत। इस शब्द की ऑनलाइन सर्च से पता चलता है कि कैसे तथाकथित प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी संस्थान और मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इस निराधार विमर्श को गढ़ने हेतु अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है, और   लगातार भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल कर एक ऐसी चीज़ की निंदा करने में महारत हासिल की है, जिसकी मौजूदगी के कोई ठोस प्रमाण ही मौजूद नहीं हैं। आप खुद से ही यह सवाल पूछ कर देखें: आपने निर्दोष नागरिकों पर हमला करने वाले सशस्त्र हिंदू आतंकवादियों के बारे में कितनी रिपोर्ट्स देखी हैं? शायद कोई भी नहीं। फिर भी यह मिथक कायम है, जो अलग थलग घटनाओं को जबरन जोड़कर  “हिंदू आतंक”  के भ्रामक विमर्श को हवा देता है।

भारत में, यह शब्द 2000 के दशक की शुरुआत में उभरा, जो मुख्य रूप से राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित था। इसे हिंदुओं और उनकी धार्मिक पहचान को हिंसक के रूप में गलत तरीके से पेश करके इस्लामिक आतंकवाद के बढ़ते खतरे से ध्यान हटाने के उद्देश्य हेतु एक ध्यान भटकाने वाली रणनीति के रूप में तैयार किया गया था। साथ ही, वैश्विक मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और बुद्धिजीवी संस्थानों ने इस विमर्श को हवा देनी शुरू की, जिससे पक्षपातपूर्ण कंटेंट की एक बाढ़ सी आ गयी। यह तंत्र प्रभावी रूप से हिंदूद्वेष फैलाने का एक उद्योग बन गया है, जो चरमपंथ का मुकाबला करने के बहाने हिंदू धर्म को ही कटघरे में खड़ा करता है।

लेकिन “भगवा आतंक” की इस झूठी कहानी के पीछे जो सबसे खतरनाक बात छुपी है, वह है इन सबका असली एजेंडा — हिंदू आवाज़ों को दबाना और हिंदू मुद्दों को उभरने से रोकना। इसी बात पर हम लेख के अगले हिस्से में विस्तार से चर्चा करेंगे।

26/11 और भगवा आतंकवाद के झूठे विमर्श का भंडाफोड़

 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड तहव्वुर राणा को अमेरिका से भारत लाए जाने की प्रक्रिया ने एक बार फिर “भगवा आतंकवाद” की झूठी कहानी को चर्चा में ला दिया है।[1] कई रिपोर्टों और मीडिया जांचों ने यह दिखाया है कि उस समय 26/11 हमलों को “हिंदू आतंक” के रूप में पेश करने की एक गंभीर साज़िश रची गई थी। लेकिन यह झूठ तब पूरी तरह उजागर हो गया जब कांस्टेबल तुकाराम ओंबाले ने अजमल कसाब को जिंदा पकड़ लिया। कसाब की गिरफ्तारी ने यह साफ़ कर दिया कि हमले में पाकिस्तान के इस्लामिक आतंकवादियों का हाथ था। इससे “हिंदू आतंकवाद” की झूठी साज़िश को एक बड़ा झटका लगा।[2]

मुंबई आतंकी हमलों के योजनाकारों में से एक अबू जुंदाल ने कथित तौर पर जांचकर्ताओं को बताया कि “हिंदुओं पर हमले का आरोप लगाना उसका विचार था”। कथित तौर पर लश्कर ने मालेगांव विस्फोट मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी के बाद इसे हिंदू तंत्र द्वारा सुनियोजित जवाबी हमले का रूप देने की साज़िश रची थी। 26/11 के मुंबई हमलों को अंजाम देने वाले आतंकवादियों ने हिंदुओं द्वारा धार्मिक रूप से धारण किया जाने वाला भगवा रंग का कलावा पहना था और हिंदू नामों वाले जाली पहचान पत्र बनवाये थे। उन्हें हिंदी बोलना सिखाया गया था ताकि उर्दू की जगह वे हिंदी में संवाद कर सकें और किसी को शक न हो। योजना इस आधार पर बनाई गयी थी कि हमले में शामिल सभी आतंकवादी मारे जाएं और इस तरह असली साज़िश का किसी को पता न चले। लेकिन जब कांस्टेबल तुकाराम आंबले के बलिदान के परिणामस्वरूप अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा गया, तो “हिंदू आतंक” की पूरी कहानी झूठ साबित हो गई।[3] [4]

भारतीय गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आरवीएस मणि, जिन्होंने 2006 से 2010 तक आंतरिक सुरक्षा विभाग में काम किया था, ने अपनी पुस्तक Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs 2006–2010  में लिखा है कि उस समय की सरकार ने सक्रिय रूप से “भगवा आतंकवाद” या “हिंदू आतंक” के विचार को बढ़ावा दिया था। उनके अनुसार, भले ही शुरुआती जांच में कई बड़े आतंकी हमलों के पीछे कट्टरपंथी इस्लामिस्ट समूहों का हाथ होने और हमलों के पाकिस्तान कनेक्शन की और इशारा करते सबूत पाए गए थे, लेकिन बाद में सत्ता में बैठे कुछ लोगों ने हिंदू आतंकवाद की झूठी कहानी गढ़कर हिंदुओं पर दोष मढ़ने की कोशिश की। 26/11 हमलों के बाद, देशभर में बहस ज़्यादातर सुरक्षा व्यवस्था की विफलताओं पर हुई, लेकिन “भगवा आतंकवाद” की साज़िश का मुद्दा चर्चा से बाहर ही रहा। जबकि कई सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थे, फिर भी आज भी ज़्यादातर हिंदू समाज को इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि 26/11 के हमले के साथ “हिंदू आतंक” की झूठी कहानी कैसे जोड़ी गई। यह जानकारी की कमी चिंता का विषय है।

हालांकि, 26/11 के मास्टरमाइंड तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण और एनआईए द्वारा उससे अपेक्षित पूछताछ के साथ, कई मीडिया रिपोर्टों और विशेषज्ञों का मानना ​​है कि हमलों को “भगवा आतंकवाद” से जोड़ने के प्रयास के पीछे का पूरा सच जल्द ही सामने आ सकता है।[5][6]

कंवर खटाना की किताब The Game Behind Saffron Terror 26/11 से पहले की घटनाओं पर रोशनी डालती है। यह किताब इस बात की ओर इशारा करती है कि एक भारतीय राजनीतिक पार्टी ने पाकिस्तान की ISI के साथ मिलकर “भगवा आतंक” की झूठी कहानी गढ़ने में भूमिका निभाई थी। हालांकि इस किताब को एक काल्पनिक कहानी के रूप में पेश किया गया है, लेकिन कई जानकार मानते हैं कि इसमें जो बातें लिखी हैं, वे असली घटनाओं के काफी करीब हैं। उनका कहना है कि अगर कोई व्यक्ति खुले स्रोतों में उपलब्ध जानकारी को ध्यान से देखे, तो वह आसानी से समझ सकता है कि सेवानिवृत्त खुफिया अधिकारी कर्नल खटाना ने जिन घटनाओं और पैटर्न्स को दिखाया है, वे आपस में जुड़े हुए हैं और सच को सामने लाते हैं।[7] [8]

“भगवा आतंक” मिथक का जन्म

हालाँकि भारत में “भगवा आतंकवाद” के षड्यंत्र सिद्धांत के विकास की एक स्पष्ट समयरेखा बताना मुश्किल है, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि “हिंदू आतंकवाद” की यह झूठी कहानी 2002 के गुजरात दंगों के बाद जोर पकड़ने लगी।

वामपंथी-उदारवादी सोच रखने वाले समूहों ने 2002 के गोधरा कांड और उसके बाद हुए दंगों को लेकर एक झूठा नैरेटिव रचा। उन्होंने इन घटनाओं को “हिंदू आतंकवाद” के उदाहरण के तौर पर पेश किया, जबकि दंगों की शुरुआत जिस भयानक घटना से हुई थी, उसे जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया। 27 फरवरी 2002 को, इस्लामिक दंगाइयों की भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस को आग के हवाले कर दिया था, जिसमें अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदू कारसेवक — जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे — जिंदा जलकर मर गए। इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस वीभत्स हत्याकांड को लगभग पूरी तरह अनदेखा कर दिया और कहानी को ऐसे दिखाया जैसे केवल हिंदू कट्टरपंथी ही हिंसा के लिए ज़िम्मेदार थे। दुनिया भर के लोग, खासकर भारत के बाहर रहने वाले, आज भी इस सच्चाई से अनजान हैं। सब कुछ ऐसे पेश किया गया जैसे “हिंदुत्व आतंक” ही असली वजह थी, जबकि गोधरा की पहली घटना को पूरी तरह हाशिए पर डाल दिया गया — यह मीडिया और विचारधारात्मक पूर्वाग्रह का एक बड़ा उदाहरण है।[9]

पाकिस्तान के थिंक टैंक Centre for Strategic and Contemporary Research के एक लेख “Understanding Saffron Terrorism” में बताया गया है कि “भगवा आतंकवाद” शब्द का पहली बार इस्तेमाल भारतीय पत्रकार प्रवीण स्वामी ने 2002 में Frontline पत्रिका में लिखे एक लेख में किया था।[10]

अगर आप Frontline के पुराने लेखों को, खासकर 2002 से 2004 के बीच प्रवीण स्वामी के लेखों को देखें, तो यह साफ नज़र आता है कि “हिंदू आतंक” की धारणा को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया गया। मार्च 2002 की कवर स्टोरी का शीर्षक ही “भगवा आतंक” था। पूरा लेख तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन जो अंश मौजूद हैं, वे यह दिखाते हैं कि 2002 के दंगों को एक सुनियोजित “हिंदू चरमपंथी अभियान” के रूप में पेश किया गया। शुरुआत में ही यह दावा किया गया कि “राजनीतिक निर्देश और पुलिस का समर्थन हिंदू दक्षिणपंथियों के मौत के दस्तों को गुजरात के मुस्लिम इलाकों में दंगा फैलाने में सक्षम बनाता है।”[11]

अगस्त 2010 में, भारत के तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कथित तौर पर नई दिल्ली में राज्य पुलिस प्रमुखों की एक बैठक में “भगवा आतंकवाद” का मुद्दा उठाया था। “भारत में युवा पुरुषों और महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आई है। भगवा आतंकवाद की एक हालिया घटना सामने आई है, जिसका अतीत में कई बम विस्फोटों में हाथ रहा है। मेरी आपको सलाह है कि हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए और आतंकवाद का मुकाबला करने में केंद्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर अपनी क्षमताओं का निर्माण जारी रखना चाहिए, “उन्होंने कथित तौर पर कहा।[12]

2010 में “हिंदू आतंकवाद” के विमर्श को उस समय की सरकार से जोड़ते हुए एक और घटनाक्रम में, विकीलीक्स ने खुलासा किया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तत्कालीन अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर को बताया था कि “कट्टरपंथी हिंदू समूह, लश्कर-ए-तैयबा जैसे चरमपंथी संगठनों को कुछ भारतीय मुसलमानों द्वारा दिये जाने वाले समर्थन से भी बड़ा खतरा हैं।”[13]

जनवरी 2013 में तत्कालीन गृह मंत्री सुशील शिंदे ने भाजपा और आरएसएस पर आतंकवाद फैलाने के लिए प्रशिक्षण शिविर चलाने का आरोप लगाया था, और उनकी कथित गतिविधियों को “भगवा आतंकवाद” की घटना से जोड़ा था। “जांच के दौरान रिपोर्ट आई है कि भाजपा और आरएसएस आतंकवाद फैलाने के लिए आतंकी प्रशिक्षण शिविर चलाते हैं… समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद में बम रखे गए और मालेगांव में भी विस्फोट किया गया… यह भगवा आतंकवाद है जिसके बारे में मैंने बात की है। यह वही बात है और कुछ नया नहीं है। यह कई बार मीडिया में आ चुका है,” उन्होंने कथित तौर पर कहा।[14] [15]

भारतीय राजनेता दिग्विजय सिंह “हिंदू आतंक” षड्यंत्र सिद्धांत को बढ़ावा देने वाले प्रमुख लोगों में से एक रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2010 में, उन्होंने सुझाव दिया कि 26/11 मुंबई हमलों के दौरान महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे की मौत कथित तौर पर हिंदू चरमपंथियों से मिली धमकियों से जुड़ी थी। सिंह ने इस कथन को बहुत व्यक्तिगत रुचि के साथ आगे बढ़ाना जारी रखा, यहाँ तक कि उन्होंने पत्रकार अज़ीज़ बर्नी द्वारा लिखित 26/11 आरएसएस की साज़िश? (26/11, एक आरएसएस षड्यंत्र) नामक एक पुस्तक भी का विमोचन भी किया। उनके कार्यों ने इस विवादास्पद और व्यापक रूप से विवादित सिद्धांत को सार्वजनिक वैधता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।[16]

आरवीएस मणि ने अपनी किताब The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs में 2006 से 2010 के बीच हुए कई बम धमाकों और आतंकी घटनाओं की गहराई से जानकारी दी है। सरकारी दस्तावेज़ों और अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने बताया कि कैसे “हिंदू आतंकवाद” का नैरेटिव गढ़ा गया और फैलाया गया। पुस्तक में लिखा है कि इस झूठी कहानी की शुरुआत 2006 के नांदेड़ धमाकों से हुई थी। इस मामले में शामिल नौ लोगों को जनवरी में एक स्थानीय अदालत ने बरी कर दिया[17], जिससे यह साबित होता है कि “हिंदू आतंक” का आरोप टिकाऊ नहीं था।

इसी तरह, 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के बारे में मणि कहते हैं कि शुरू में राज्य पुलिस को मिले सुरागों ने बताया था कि हमला अहल-ए-हदीस नामक एक इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन ने किया था। लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव में जांच की दिशा मोड़ दी गई और “हिंदू आतंकवाद” की कहानी बनाई गई।[18]

भारत में “भगवा आतंक” के झूठे सिद्धांत का बनना और फैलना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कई कारण शामिल हैं — राजनीतिक स्वार्थ, अल्पसंख्यकों को खुश करने की कोशिश और हिंदुओं के खिलाफ एक गहरा पूर्वाग्रह। यह सिर्फ भारत की राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय वामपंथी-उदारवादी नेटवर्क का हिस्सा था, जो लगातार हिंदू पहचान को गलत रूप में पेश करता रहा है। हिंदुओं को संभावित आतंकवादी के रूप में पेश करने का यह सोचा-समझा प्रयास एक गहरी विचारधारात्मक लड़ाई का हिस्सा है।

वाम-उदारवादी तंत्र की भूमिका

“हिंदू बहुसंख्यकवाद”, “हिंदुत्व फासीवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्द आज पश्चिमी मीडिया में हिंदुओं और भारत से जुड़े मुद्दों पर सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं। स्टॉप हिंदूद्वेष नामक एक मंच ने अपने पहले के लेखों में बताया है कि किस तरह भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को इन शब्दों के ज़रिए पश्चिमी मीडिया और बुद्धिजीवी संस्थानों द्वारा जानबूझकर नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है। और ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि ये मीडिया संस्थान हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को खुलकर उठाते हैं।[19]

“भगवा आतंक”, “हिंदू आतंक”, और “हिंदुत्व आतंक” भी वामपंथी-उदारवादी तंत्र द्वारा लगातार उपयोग किए जाने वाले शब्द हैं। ये तंत्र इस झूठे नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ इस तरह फैलाता है:

  1. हिंदू समाज पर अन्य समुदायों के खिलाफ हिंसा फैलाने का आरोप लगाना एक आम रणनीति है। ऐसी घटनाओं को जानबूझकर चुनकर दिखाया जाता है जो किसी न किसी हिंदू व्यक्ति से जुड़ी हों, और फिर उन्हें “हिंदू आतंक” की व्यापक कहानी में जोड़ दिया जाता है। जटिल धार्मिक-सामाजिक हालात को इस तरह पेश किया जाता है कि सिर्फ हिंदू ही दोषी लगें।
  2. पश्चिम में हिंदू वकालत समूहों को अक्सर भारत सरकार के तथाकथित “हिंदुत्व नेटवर्क” से जोड़कर अनेक झूठे षड्यंत्रों की कहानी बनाई जाती है। इसका उद्देश्य यह है कि जो हिंदू दुनिया भर में अपने समुदाय के मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाते हैं, उन्हें “आतंकी नेटवर्क” से जोड़कर बदनाम किया जा सके।
  3. विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे ज़मीनी स्तर के हिन्दू संगठनों का नियमित रूप से दानवीकरण किया जाता है, जिसका मुख्य लक्ष्य हिंदू समुदाय की ओर से किसी भी राजनीतिक या सांस्कृतिक वकालत को चुप कराना और उसे अवैध ठहराना है।

“भगवा आतंक” को लेकर इस अंतरराष्ट्रीय वामपंथी-उदारवादी नैरेटिव में भारत के आंतरिक मुद्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है ताकि यह दिखाया जा सके कि भारत में अल्पसंख्यक एक हिंदू “आतंकी मशीन” के शिकार हैं। यह झूठा नैरेटिव अब्राहमिक संस्थानों की उस मानसिकता से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें हिंदू धर्म के खिलाफ काम करने वाली ताक़तें, हिंदू समाज के आत्म-संरक्षण को भी “आतंक” कहकर बदनाम करती हैं। चाहे वो इस्लामी चरमपंथ हो या ईसाई धर्मांतरण का जाल — उनके खिलाफ अगर हिंदू कोई भी वैचारिक या सामाजिक विरोध करता है, तो उसे “भगवा आतंक” कह दिया जाता है।

ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स की 2021 की एक रिपोर्ट जिसका नाम है “Saffron Terror and Hindutva Ideology” — पूरी तरह झूठ और प्रोपेगैंडा से भरी हुई है। यह लेख भारत सरकार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार करने का आरोप लगाता है और कई राज्यों का नाम लेते हुए यह दावा करता है कि वहाँ के अल्पसंख्यक डर और दहशत में जी रहे हैं। इस लेख में “राजनीतिक हिंसा” और “भगवा आतंक” को एक ही बात मानकर जबरन जोड़ा गया है, और इसी बहाने मोदी सरकार पर निशाना साधा गया है। लेखक आरएसएस पर राज्य के संरक्षण में भगवा आतंक को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए, पूर्वानुमानित लाइनों के साथ हमला भी करता है। लेख में कहा गया है, “जब अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों पर भगवा आतंकवादियों द्वारा हमला किया जाता है, तो उन्हें अक्सर “जय श्री राम” का नारा लगाने के लिए मजबूर किया जाता है, जो हिंदू भगवान राम के महिमामंडन के लिए लगाया गया नारा है, या फिर उन्हें जीवन-मृत्यु का विकल्प दिया जाता है: हिंदू धर्म को अपना धर्म मान लें या मारे जाएँ। इस तरह की स्थितियाँ पूरे भारत में होती हैं, चाहे असम का बारपेटा जिला हो या मुंबई की भीड़-भाड़ वाली सड़कें।”, लेख आगे कहता है।[20]

पक्षपातपूर्ण स्रोतों के चुनिंदा दो उदाहरणों का हवाला देने के अलावा, लेख में “भगवा आतंकवाद” को लेकर किए जाने वाले सनसनीख़ेज़ दावों का समर्थन करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया है। यह एक गंभीर विश्लेषण की तरह कम और बौद्धिकता की आड़ में हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी भावना फैलाने के एक ज़हरीले प्रयास की तरह ज़्यादा लगता है।

पश्चिमी मीडिया और बुद्धिजीवी संस्थान संदिग्ध “विश्लेषणों” से भरे पड़े हैं जो एक ऐसी घटना की कड़ी निंदा करते हैं – “भगवा आतंकवाद” – जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं है। आइए अंतरराष्ट्रीय मीडिया और बुद्धिजीवी संस्थानों की कुछ सुर्खियों पर नज़र डालें जो इस प्रवृत्ति को दर्शाती हैं:

  1. ‘भगवा आतंक’ के लिए दोषी ठहराए गए भारतीय मुसलमान न्याय चाहते हैं – बीबीसी, जनवरी 2011। [21]
  2. हिंदू धर्म और आतंक – हडसन इंस्टीट्यूट; जून 2004। [22]
  3. क्लीन चिट, मौतें, बरी: भगवा आतंक मामलों में अंतहीन ‘भाग्य की चाल’ -इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, अप्रैल 2018।[23]
  4. जैसे-जैसे भगवा आतंक भारत को जकड़ रहा है, देश के अल्पसंख्यक मुसलमान अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं – वोमेन’एस इंटरनेशनल लीग फॉर पीस एंड फ्रीडम, जून 2022।[24]
  5. समझौता बरी: भारत में हिंदू आतंक को कोई सजा नहीं – अलजजीरा, मार्च 2019। [25]
  6. भगवा आतंक: splinter या लक्षण – इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, सितंबर 2011।[26]

आज “भगवा आतंकवाद” की यह कहानी मानविकी और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में एक पूरा उद्योग बन गई है। बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों द्वारा छपी किताबों की भरमार है जो “हिंदुत्व”, “भगवा आतंक”, और “हिंदू राष्ट्रवाद” जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इनमें से ज़्यादातर किताबों और लेखों का उद्देश्य हिंदू राष्ट्रवाद और आतंकवाद के बीच एक संबंध स्थापित करना है।

इन लेखों का ढांचा लगभग एक जैसा होता है: वे भारत द्वारा अपनी प्राचीन पहचान को दोबारा अपनाने के किसी भी प्रयास की आलोचना से शुरू होते हैं — जैसे पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखना, संस्कृति को पुनर्जीवित करना, या इतिहास को सही रूप में प्रस्तुत करना। फिर धीरे-धीरे यह सब “हिंदुत्व फासीवाद” और “हिंदू आतंकवाद” से जोड़ दिया जाता है।

इन विषयों पर लिखा गया तथाकथित शोध अक्सर अमूर्त विचारों और सैद्धांतिक ढांचों पर आधारित होता है। और चूंकि तथ्यों की जगह राय को ही प्रमाण बना दिया जाता है, इसलिए यह सब एक “बौद्धिक सत्य” की तरह पेश किया जाता है — जबकि यह महज़ एक पक्षपातपूर्ण और हिंदू विरोधी प्रोपेगैंडा होता है।

निष्कर्ष

“भगवा आतंक” षड्यंत्र सिद्धांत का असली मकसद यह है कि हिंदू समाज अपनी बात कहने से पहले ही बदनाम कर दिया जाए और हिंदुओं की अभिव्यक्ति को सार्वजनिक मंच से हटा दिया जाए। वामपंथी-उदारवादी तंत्र इसमें एक खास रणनीति अपनाता है, जिसे गैसलाइटिंग कहा जाता है — यानी जब भी कोई हिंदू हिंसा या हिंदू-विरोधी घृणा के खिलाफ बोलता है, तो उसी को “उग्रवाद” बताकर उस पर “भगवा आतंक” का ठप्पा लगा दिया जाता है।

सबसे चिंता की बात यह है कि इस कहानी को वामपंथी प्रोफेसर, लेखक और बुद्धिजीवी संस्थाएं बहुत चालाक और असरदार तरीक़े से आगे बढ़ा रही हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि इन झूठे नैरेटिव्स को सोच-समझकर, तथ्यों के साथ चुनौती दी जाए।

हिंदू समाज को चाहिए कि वह हिंदू समर्थक शोध संस्थाओं और बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर ऐसे मंच तैयार करे जहाँ गंभीर और प्रमाण आधारित विचार रखे जाएँ — ताकि “भगवा आतंक” जैसे झूठे मिथकों का सच सबके सामने लाया जा सके और इस झूठे प्रचार को पूरी तरह नष्ट किया जा सके।

संदर्भ सूची 

[1] The saffron terror plot was conceived by both Pakistan and Congress’: Colonel Kanwar Khatana; https://organiser.org/2025/04/19/288213/bharat/the-saffron-terror-plot-was-conceived-by-both-pakistan-and-congress-colonel-kanwar-khatana/

[2] 26/11: How Tukaram Omble’s Capture Of Ajmal Kasab Foiled Plans To Blame Mumbai Terror Attack On Hindus;  https://swarajyamag.com/commentary/it-wouldve-been-sameer-chaudhary-not-ajmal-kasab-heres-how-brave-tukaram-omble-foiled-plans-to-blame-2611-on-hindus

[3] Ibid.

[4] With sacred threads, Abu Jundal tried to colour 26/11 saffron | India News – Times of India;   https://timesofindia.indiatimes.com/india/with-sacred-threads-abu-jundal-tried-to-colour-26/11-saffron/articleshow/14446622.cms

[5] The saffron terror plot was conceived by both Pakistan and Congress’: Colonel Kanwar Khatana;  https://organiser.org/2025/04/19/288213/bharat/the-saffron-terror-plot-was-conceived-by-both-pakistan-and-congress-colonel-kanwar-khatana/

[6] (237) मुंबई हमले के साथ ही क्या भगवा आ**क़वाद के विमर्श से पर्दा उठेगा #EP2472 #aapkaakhbar – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=93Zq4Bf0fiQ&t=3s

[7]  Fact or fiction? The book that exposes the game behind ‘saffron terror’ – The Sunday Guardian Live;  https://sundayguardianlive.com/news/fact-fiction-book-exposes-game-behind-saffron-terror#google_vignette

[8] Book Review: The Game Behind Saffron Terror – Chintan;  https://chintan.indiafoundation.in/articles/book-review/book-review-the-game-behind-saffron-terror/

[9] Left-liberals whitewash crimes of Muslim mob that burnt Hindus alive at Godhra;  https://www.opindia.com/2022/02/twenty-years-godhra-killings-left-liberals-still-try-to-blame-hindus-whitewash-muslim-crimes/

[10]  Understanding Saffron Terrorism – Centre for Strategic and Contemporary Research; https://cscr.pk/explore/themes/defense-security/understanding-saffron-terrorism/

[11] SAFFRON TERROR – Frontline;  https://frontline.thehindu.com/cover-story/article30244258.ece

[12] Saffron Terrorism – a new phenomenon, says Home Minister Chidambaram;   https://www.ndtv.com/india-news/saffron-terrorism-a-new-phenomenon-says-home-minister-chidambaram-428832

[13] Rahul Gandhi in WikiLeaks terror row – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/north/story/rahul-gandhi-in-wikileaks-terror-row-87286-2010-12-17

[14] ‘Saffron terror’ and five more fairytales for Hinduphobes;  https://www.opindia.com/2018/04/saffron-terror-and-five-more-fairytales-for-hinduphobes/#google_vignette

[15] ‘Saffron terror’ remark: BJP wants Shinde sacked, RSS calls him ‘darling of terrorists’ | Latest News Delhi – Hindustan Times;  https://www.hindustantimes.com/delhi/saffron-terror-remark-bjp-wants-shinde-sacked-rss-calls-him-darling-of-terrorists/story-U7iuTpYRWCkLpI2xQFI8kO.html

[16] RSS & 26/11: Digvijaya flags it off again, this time in Mumbai | News Archive News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/news-archive/web/rss-2611-digvijaya-flags-it-off-again-t/

[17] 12 years after trial began, court acquits 9 accused in 2006 Nanded bomb blast case | India News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/12-years-after-trial-began-court-acquits-9-accused-in-2006-nanded-bomb-blast-case/articleshow/116955074.cms

[18] The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs by RVS Mani, p. 30.

[19] Woke Agenda Targets Indian Nationalist Media”; https://stophindudvesha.org/label-demonize-erase-the-woke-ecosystems-coordinated-assault-on-indian-nationalistic-media/

[20] Saffron Terror and Hindutva Ideology – Australian Institute of International Affairs;   https://www.internationalaffairs.org.au/australianoutlook/saffron-terror-and-hindutva-ideology/

[21] Indian Muslims blamed for ‘saffron terror’ want justice – BBC News; https://www.bbc.com/news/world-south-asia-12224230

[22] Hinduism and Terror | Hudson Institute; https://www.hudson.org/national-security-defense/hinduism-and-terror

[23] Clean Chits, Deaths, Acquittals: The Unending ‘Tricks of Fate’ in Saffron Terror Cases | Economic and Political Weekly;  https://www.epw.in/engage/article/saffron-terror-tricks-fate

[24] As Saffron Terror Grips India, the Country’s Miniority Muslims Worry about Their Future – WILPF; https://www.wilpf.org/as-saffron-terror-grips-india-the-countrys-minority-muslims-worry-about-their-future/

[25] The Samjhauta acquittals: Hindu terror goes unpunished in India | The Far Right | Al Jazeera;  https://www.aljazeera.com/opinions/2019/3/28/the-samjhauta-acquittals-hindu-terror-goes-unpunished-in-india

[26] Saffron Terror: Splinter or Symptom? | Economic and Political Weekly; https://www.epw.in/journal/2011/37/commentary/saffron-terror-splinter-or-symptom.html

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US