चुप्पी का षड्यंत्र: पश्चिम में हिंदूद्वेष की बढ़ती लहर का पर्दाफाश
- पश्चिमी देशों में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में आई तेज़ बढ़त का सीधा संबंध मीडिया, शिक्षा और जन सांस्कृतिक धारा में हिंदू धर्म की लगातार नकारात्मक छवि से है।
- कई पश्चिमी देशों में हिंदू विरोधी हिंसा को या तो नजरअंदाज कर दिया जाता है या इसे मामूली बताकर नजरअंदाज किया जाता है, जिससे हालात और बिगड़ते हैं।
- बड़े मीडिया संस्थान अक्सर हिंदुओं पर हमलों की खबरों को दबा देते हैं, और “हिंदुत्व” या “हिंदू राष्ट्रवाद” जैसे शब्दों से हिंदुओं को ही हमलावर दिखाने की कोशिश करते हैं।
- जहां पश्चिम में इस्लामोफोबिया के खिलाफ सक्रिय कदम उठाए जाते हैं, वहीं हिंदूफोबिया के अस्तित्व को अनदेखा कर दिया जाता है।
हिंदूद्वेष या हिंदू विरोधी घृणा समाज में गहरी पैठ बना चुका है और इसकी विषाक्त जड़ें निरंतर मज़बूत होती जा रही है। हिंदू विरोधी भावना के व्यापक प्रचार प्रसार के दो मुख्य माध्यम हैं: यह या तो मीडिया, शिक्षा और संस्कृति में हिंदुओं के खिलाफ ज़हर उगलते एजेंडा के ज़रिए फैलता है, या फिर हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव की शर्मनाक हकीकत के रूप में सामने आता है।[1]
हिंदूद्वेष को लेकर एक चूक यह होती है कि हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा, हमले और अपराधों को बड़े सांस्कृतिक और वैचारिक माहौल से काटकर अलग-थलग घटनाओं की तरह दिखाया जाता है। यह विकृत सोच असली घृणा अपराधों को इस तरह पेश करती है जैसे वे अचानक घटने वाली छोटी-मोटी घटनाएं हों, न कि घृणा से जन्मी हुई। इस चालाकी से बनाया गया झूठा संवाद न केवल हिंदू विरोधी हमलों की असली जड़ों को छुपाता है, बल्कि इनके पीछे छिपी नफरत को भी छुपा देता है। ऐसा भ्रामक प्रस्तुतीकरण सच्चाई को दबाने के साथ-साथ हिंदुओं के खिलाफ फैलती नफरत के खिलाफ उठने वाली हर गंभीर आवाज़ को भी कमज़ोर कर देता है।
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी देशों सहित पूरे विश्व में हिंदू विरोधी हिंसा में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है।[2] [3] इसका एक स्पष्ट उदाहरण कनाडा के रॉकलैंड में 27 वर्षीय भारतीय नागरिक धर्मेश कथीरिया की हत्या है, जिसे 83 वर्षीय श्वेत पड़ोसी ने बेरहमी से चाकू घोंप कर मार दिया था। मीडिया ने इस बात की भी पुष्टि की हैं कि हमलावर इससे पहले पीड़ित और उसकी पत्नी को लेकर नस्लवादी और भारत विरोधी टिप्पणियां कर चुका था।[4] घृणा अपराध के स्पष्ट संकेतों के बावजूद, प्रमुख कनाडाई मीडिया ने इस पहलू का उल्लेख करना ज़रूरी नहीं समझा, बल्कि इसे हिंसा का एक सामान्य कृत्य माना।[5]
मीडिया की यह चुप्पी अपने आप में बहुत कुछ कहती है। भारत में हर दिन तथाकथित हिंदू बहुसंख्यकवाद की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थान विदेशों में पीड़ित हिंदू समुदाय की बात आते ही अचानक चुप हो जाते हैं। इसके साथ ही, पश्चिमी देशों में हिंदुओं को अक्सर ऐसा सफल समुदाय दिखाया जाता है जो स्थानीय संस्कृति में पूरी तरह घुल मिल चुका है। इस तरह की सतही छवि, हिंदू विरोधी घटनाओं पर जागरूकता बढ़ाने की कोशिशों को नाकाम कर देती है।
कथिरेया का मामला कोई अपवाद नहीं है — यह उस बड़े रुझान का हिस्सा है जिसे मीडिया ने उतनी गंभीरता से नहीं उठाया जितना उसे उठाना चाहिए था।
हिंदूफोबिया की बढ़ती लहर
कैलिफोर्निया सिविल राइट्स डिपार्टमेंट की मई 2023 की एक रिपोर्ट, जो California vs. Hate नामक अभियान पर आधारित थी, ने अमेरिका में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में तेज़ बढ़ोतरी को दिखाया। रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, धार्मिक टारगेटिंग से जुड़े दर्ज मामलों में यहूदी विरोधी घटनाएं 36.9 प्रतिशत, हिंदू विरोधी घटनाएं 23.3 प्रतिशत और मुस्लिम विरोधी घटनाएं 14.6 प्रतिशत थे। यानि कि हिंदू विरोधी हमले दूसरे स्थान पर थे; पहले स्थान पर यहूदी विरोधी घटनाएं रहीं, जबकि इस्लामोफोबिया से जुड़ी घटनाएं तीसरे स्थान पर रहीं।[6][7][8]
इस रिपोर्ट के निष्कर्ष अमेरिकी हिंदू समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका के हिंदू समूहों का कहना है कि हिंदू विरोधी घृणा और हिंसा को अक्सर अनदेखा किया जाता है, या कम करके आंका जाता है।[9] जब भी कभी हिंदूफोबिया बढ़ने की चिंता जताई जाती है, तो हिंदुओं का विरोध करने वाले लोग अक्सर इसे “हिंदुत्व षड्यंत्र सिद्धांत” के रूप में खारिज कर देते हैं। इनमें से कुछ समूह ऐसे कानून और नीतियां भी लाने कि कोशिश करते हैं जो जाति को आधार बनाकर हिंदू अमेरिकियों को गलत तरीके से निशाना बनाते हैं।
इससे हिंदू विरोधी झूठे आख्यानों का एक अंतहीन चक्र बन जाता है, जहाँ पीड़ितों को न केवल अपनी आवाज़ उठाने से रोका जाता है, बल्कि उन्हें खुद ही खतरा बताकर दोषी ठहरा दिया जाता है। यानि कि हिंदू समुदाय की असली सुरक्षा चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है; बल्कि उन्हें बेबुनियाद साजिशी कहानियों के ज़रिए समस्या के रूप में पेश किया जाता है।
2024 में अमेरिका में भारतीय मूल के छात्रों की अचानक और रहस्यमय मौतों का सिलसिला इसका एक ताजा उदाहरण है। सिर्फ 2024 में ही कम से कम 11 भारतीय छात्रों की संदिग्ध या अस्पष्ट परिस्थितियों में मौत हुई। 15 जनवरी से 5 फरवरी के बीच, केवल तीन हफ्तों में सात छात्रों की मौत हो गई। कुल मिलाकर, अक्टूबर 2022 से मार्च 2024 तक, अमेरिका में कम से कम 15 भारतीय मूल के छात्रों ने अपनी जान गंवाई।[10]
इनमें से कई मौतें ऐसी रहस्यमय परिस्थितियों में हुईं जिनके सही कारण आज तक साफ़ नहीं हो पाए हैं। हालांकि यह कहना कठिन है ये मौतें हिंदू विरोधी सोच के कारण ही हुई हैं, लेकिन इन्हें अमेरिका में बढ़ती हुई हिंदू विरोधी भावना के बड़े संदर्भ में जरूर देखा जाना चाहिए, जो नागरिक जीवन, शिक्षा और राजनीति जैसे क्षेत्रों में दिखाई देती है।
कुछ मामलों में अधिकारियों का रूखा और लापरवाह रवैया भी सामने आया — जैसा कि जाह्नवी कंडुला की दुखद घटना में दिखा। हिट-एंड-रन की उस घटना के बॉडीकैम फुटेज में अधिकारी डैनियल ऑडरर को हँसते हुए और यह कहते हुए सुना गया कि कंडुला के जीवन का “कुछ विशेष मूल्य” नहीं है। उनकी इन नस्लवादी टिप्पणियों पर भारी जन आक्रोश तो उठा, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया। हालाँकि जुलाई 2024 में, ऑडरर को ‘पेशेवरता की कमी’ के आधार पर पुलिस से निकाल दिया गया।[11]
ब्रिटेन में हाल ही में लंदन विधानसभा के सदस्य कृपेश हिरानी ने एक कार्यक्रम में लंदन में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों को लेकर गहरी चिंता जताई। हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती नफरत को लेकर जागरूकता फैलाने और अपने कड़वे अनुभव साझा करने के लिए पूरा हिंदू समुदाय एकजुट होकर सामने आया। हिरानी ने साफ शब्दों में कहा कि हिंदूफोबिया एक सच्ची और गंभीर समस्या है, लेकिन सिस्टम इसे जानबूझकर नज़रअंदाज़ करता है। उन्होंने कहा, “मामला सिर्फ घटनाओं की रिपोर्टिंग का नहीं है; पुलिस की ओर से आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना और गलत वर्गीकरण करना भी उतना ही बड़ा संकट है। हम चाहते हैं कि अब सभी पक्ष इस मुद्दे पर गंभीर हों, क्योंकि लोग अब थक चुके हैं और चाहते हैं कि इस समस्या का असली समाधान निकले।”[12]
हिरानी ने अपने प्रस्ताव में मेट्रोपॉलिटन पुलिस से मांग की कि वह हिंदू विरोधी नफरत के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेते हुए धर्म के आधार पर घृणा अपराधों की सही रिपोर्टिंग करे। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ और पुलिस से कहा गया कि वह स्थानीय हिंदू समुदायों के साथ मिलकर काम करे, ताकि आपसी भरोसा बढ़े और पीड़ित आगे आकर घटनाओं की रिपोर्ट कर सकें।
हिरानी ने एक सर्वेक्षण का हवाला भी दिया, जिसका निष्कर्ष था कि हिंदू, घृणा अपराधों का सामना करने वाले दूसरे सबसे बड़े धार्मिक समुदाय हैं — लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह सच्चाई पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देती।[13]
30 मार्च को, INSIGHT UK ने हिंदू विरोधी घृणा सर्वेक्षण शुरू किया, ताकि अपने धर्म के कारण पक्षपात, भेदभाव या घृणा का सामना करने वाले ब्रिटिश हिंदुओं के वास्तविक जीवन के अनुभवों को एकत्र किया जा सके। यह सर्वेक्षण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिटेन में हिंदू विरोधी घटनाओं के बारे में चुप्पी बनी हुई है, जबकि इस्लामोफोबिया और यहूदी विरोधी भावना से निपटने के लिए मज़बूत प्रणालियाँ मौजूद हैं।[14]
अप्रैल 2023 में, हेनरी जैक्सन सोसाइटी ने एक अध्ययन की रिपोर्ट जारी की, जिसमें पूरे U.K. के स्कूलों में हिंदू छात्रों के खिलाफ फैले पूर्वाग्रह और भेदभाव की गहराई से जांच की गई। अध्ययन में पाया गया कि कक्षा में हिंदू धर्म की शिक्षा की गुणवत्ता और हिंदू छात्रों के साथ होने वाली प्रताड़ना के बीच सीधा संबंध है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि स्कूलों में हिंदू छात्रों को जिन दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ता है, उसका बड़ा कारण यह है कि हिंदू धर्म की शिक्षाओं और उसकी मूल अवधारणाओं को अब्राहमिक नजरिए से तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है, जिससे गलतफहमियाँ और भ्रामक धारणाएँ पैदा होती हैं।[15]
कनाडा में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में वृद्धि देखी गई है, जिसमें मंदिरों पर लगातार हमले और खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा हिंदू समुदाय को नियमित रूप से प्रताड़ित करना शामिल है। वीएचपी कनाडा की एक रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2022 और अक्टूबर 2023 के बीच, कनाडा में मंदिरों में तोड़फोड़, विखंडन, या घुसपैठ की 20 से अधिक घटनाएं सामने आईं, जिनमें अक्सर नफरत से भरी ग्राफिटी शामिल थी।[16]
कनाडा में हालात कई वजहों से और भी ज़्यादा गंभीर हैं। इसमें कनाडाई अधिकारियों का भारत विरोधी रवैया, हिंदू विरोधी घृणा अपराधों के दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने में सांसदों की अनिच्छा, हिंदू विरोधी हिंसा को घृणा अपराध के तौर पर कानूनी मान्यता देने में हिचकिचाहट, हिंदू संगठनों की लगातार बदनाम करने की कोशिशें, और हिंदू संस्कृति व परंपराओं का विकृत और गलत चित्रण शामिल है।
2022 में नेटवर्क कॉन्टैगियन रिसर्च इंस्टीट्यूट (NCRI) की एक रिपोर्ट ने हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में खतरनाक वृद्धि के कई परेशान करने वाले संकेत सामने रखे। रिपोर्ट ने कहा, “हमने देखा कि 1,000 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है, और हिंदू विरोधी गालियाँ यहूदी विरोधी मीम्स, श्वेत वर्चस्ववादियों, इस्लामवादियों और दूसरे कट्टरपंथी समूहों द्वारा फैलाई गई घृणा के साथ मिलकर नफरत का ज़हरीला माहौल तैयार कर रही हैं।”[17]
मीडिया की चुप्पी और भ्रामक सूचनाओं का दौर
अगर आप “पश्चिम में हिंदू विरोधी घृणा अपराध” गूगल पर खोजें, तो जो नतीजे सामने आते हैं, वे वैश्विक मीडिया की पक्षपातपूर्ण मानसिकता को बेनकाब कर देते हैं। इस विषय पर ज़्यादातर लेख गैर-पश्चिमी स्रोतों से आते हैं। पश्चिमी मीडिया में भले ही कहीं-कहीं इन अपराधों का नाम भर लिया गया हो, लेकिन किसी भी घटना की गंभीर, विस्तृत रिपोर्टिंग ढूंढना लगभग असंभव है। स्थानीय मीडिया का रवैया और भी शर्मनाक है — या तो कवरेज नाम मात्र की है या फिर जानबूझकर दबी हुई। नतीजतन, इन घटनाओं के बारे में असली जानकारी ज़्यादातर हिंदू संगठनों की वेबसाइट्स और उनके एक्स (ट्विटर) हैंडल्स से ही मिलती है। यह रुझान साफ़ दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा का मीडिया हिंदुओं के खिलाफ हो रही घृणा को जानबूझकर नजरअंदाज करता है और इसे तुच्छ साबित करने में लगा है।
भारतीय मीडिया भी इस मामले में पूरी तरह ईमानदार नहीं है। भले ही वह पश्चिमी मीडिया से ज़्यादा कवरेज देता हो, फिर भी “हिंदू विरोधी घृणा अपराध” जैसे शब्दों से बचते हुए, अस्पष्ट और लचर भाषा में खबरें पेश करता है — ताकि किसी को असहज न लगे। उधर पश्चिमी मीडिया संस्थान न सिर्फ इन घृणा अपराधों पर चुप्पी साधे हुए हैं, बल्कि हिंदुओं के वास्तविक दर्द और संघर्ष को सिरे से नकारते हैं। हमला झेलने वाले हिंदुओं की आवाज़ उठाने के बजाय, वही घिसे-पिटे आरोप — “हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद”, “हिंदू राष्ट्रवाद” — रटते हैं, ताकि पीड़ितों को ही अपराधी बना दिया जाए।
न्यूयॉर्क टाइम्स इसका जीता-जागता उदाहरण है। भारत में अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर उपदेश झाड़ने में तो इसे कोई कसर नहीं रहती, लेकिन जैसे ही बात पश्चिमी देशों में हिंदुओं पर हो रहे हमलों की आती है, इसकी कलम एकदम खामोश हो जाती है। उलटे यह ऐसे लेख छापता है जिनका मकसद हिंदू-अमेरिकियों की चिंताओं को नीचा दिखाना और उनका मज़ाक उड़ाना होता है।
सितंबर 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक हेडलाइन छापी: “मोदी का हिंदू राष्ट्रवाद भारतीय प्रवासियों में तनाव को बढ़ाता है।” यह लेख पीड़ित को ही दोषी ठहराने का एक अच्छा खासा उदाहरण है। इसमें यह बेहूदा तर्क दिया गया कि “मोदी का हिंदू राष्ट्रवाद” ही पश्चिम में हिंदूफोबिया के बढ़ने का कारण है — यहाँ तक कि खालिस्तानी चरमपंथियों की हिंदू विरोधी हिंसा का ठीकरा भी इसी पर फोड़ा गया। लेख की शुरुआत नाटकीय जुमलों से होती है — जिनमें lecture halls युद्धक्षेत्र बनते दिखते हैं, धमकियों का जिक्र है, और कनाडा व ऑस्ट्रेलिया में मंदिरों पर लगे विभाजनकारी नारों का हवाला दिया गया है। लेकिन फिर लेख बड़ी चालाकी से असली मुद्दे से भटकता है और सारा दोष भारत की “हिंदू-प्रथम” नीतियों पर मढ़ने लगता है, मानो सारी समस्या वहीं से निकली हो।
लेख का असली एजेंडा आखिरकार तब खुलकर सामने आता है जब यह दावा किया जाता है कि मोदी सरकार ने दुनिया भर में हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और जातीय समूहों के बीच दरारें पैदा कर दी हैं — और अब इसका असर स्कूल बोर्डों, नगर परिषदों, त्योहारों और विश्वविद्यालयों तक में दिख रहा है।
हिंदुओं के खिलाफ हो रहे घृणा अपराधों की चर्चा करने के बजाय, लेख पीड़ित हिंदू समुदाय को ही समस्या के तौर पर पेश करता है — और इस तरह एक बेहद विकृत और पक्षपाती विमर्श को आगे बढ़ाता है।[18]
पश्चिम में हिंदू विरोधी हिंसा की असली सच्चाई को तोड़-मरोड़कर “हिंदुत्व” शब्द के विकृत और वोक संस्करण से जोड़ने का षड्यंत्र अब खुलकर सामने आ रहा है। इस विकृति का एक साफ़ उदाहरण 2022 में यूके के लेस्टर में हुई हिंसा है। हेनरी जैक्सन सोसाइटी द्वारा प्रकाशित चार्लोट लिटिलवुड की जांच रिपोर्ट ने इस झूठे नैरेटिव का पर्दाफाश किया, जिसमें लेस्टर की घटनाओं को संगठित हिंदुत्व चरमपंथ के रूप में पेश करने का सुनियोजित प्रयास किया गया था।
यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे फर्जी आरोप गढ़े गए और मीडिया तथा कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों ने मिलकर तथाकथित “हिंदुत्व षड्यंत्र सिद्धांत” को फैलाया — एक ऐसा अभियान जो सच को छुपाने और हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए चलाया गया।
रिपोर्ट साफ कहती है, “झूठी खबरों और दुष्प्रचार के तहत हिंदू समुदाय के एक वर्ग पर और कई हिंदू मंदिरों पर भारत के आरएसएस से संबंध रखने के निराधार आरोप लगाए गए। इससे जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव भड़काया गया, जिसके चलते लेस्टर और बर्मिंघम में हिंसा फैली और हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया गया। सबसे गंभीर बात यह रही कि इन अफवाह फैलाने वालों को न सिर्फ मीडिया ने भरोसेमंद माना, बल्कि इन्हें लेस्टर के मेयर से मिलने के लिए भेजा गया ताकि हिंसा की ‘स्वतंत्र समीक्षा’ को भी अपने पक्ष में मोड़ा जा सके।”
यह प्रकरण केवल कुछ पत्रकारों या संगठनों की भूल नहीं था — यह एक गहरी, सुनियोजित साजिश थी जिसमें इस्लामवादी नेटवर्क और उनका समर्थन कर रहा मीडिया गठजोड़, दोनों ने मिलकर हिंदुओं के खिलाफ ज़हर फैलाने और उन्हें अपराधी ठहराने की कोशिश की।[19]
हिंदूफोबिया पर पश्चिम की चुप्पी
पश्चिमी देश इस्लामोफोबिया के खिलाफ लड़ने के लिए तो पूरा शासन तंत्र और नैतिकता का पहाड़ खड़ा कर देते हैं, लेकिन हिंदूफोबिया को स्वीकार करना भी उनकी शान के खिलाफ है। गंभीरता से लेना तो छोड़िए, हिंदू विरोधी घृणा को तो या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर बड़ी चालाकी से “एशियाई” या “दक्षिण एशियाई” जैसे शब्दों में लपेट दिया जाता है, ताकि असली समस्या पर चर्चा करने से बचा जा सके।
ब्रिटेन में इस्लामोफोबिया परिषद बनाने की योजना इस दोहरे चरित्र का ताज़ा उदाहरण है। इस पर ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने सवाल उठाए हैं — कि जब नफरत के खिलाफ लड़ाई की बात होती है तो आखिर क्यों सिर्फ एक धर्म का एकाधिकार हो जाता है? परिषद को मुस्लिम विरोधी भेदभाव पर परिभाषाएं गढ़नी हैं, सरकार को दिशा दिखानी है — लेकिन हिंदूफोबिया पर बिल्कुल चुप्पी! जैसे हिंदुओं के खिलाफ कोई घृणा अपराध हो ही नहीं रहे। दरअसल, पश्चिम में न्याय और समानता का सारा भाषण वहीं तक चलता है जहाँ तक उनकी सुविधा हो — हिंदू पीड़ा उसमें फिट नहीं बैठती।[20]
ब्रिटिश हिंदू संगठनों ने साफ़ चेताया है कि जब भेदभाव, धमकियों और अतीत के अन्यायों को conveniently अनदेखा कर दिया जाता है और पूरी सहानुभूति सिर्फ एक धर्म को ही दी जाती है, तो यह न्याय और समानता जैसे बड़े-बड़े आदर्शों की खुली तौहीन होती है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि ऐसी एकतरफा परिषदें कहीं “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के गले पर छुरी चलाने का नया औज़ार न बन जाएँ — यानी जो कुछ भी उनके ‘पसंद के नैरेटिव’ में फिट न बैठे, उसे घृणा करार देकर चुप करा दिया जाए।
हिंदू समुदाय ने दो टूक कहा कि इस परिषद की “इस्लामोफोबिया” की परिभाषा इतनी लचीली न हो जाए कि धार्मिक विचारों की सम्मानजनक आलोचना को भी जबरन घृणा का तमगा पहनाया जाने लगे। लेकिन भला वहाँ निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है जहाँ पहले से ही न्याय का तराजू एक तरफ झुका बैठा हो? [21] [22]
मुख्यधारा का मीडिया इस्लामोफोबिया को तो पूरे जोश-खरोश से राष्ट्रीय संकट घोषित कर देता है, लेकिन जब बात हिंदू विरोधी घृणा अपराधों की आती है, तो अचानक उसे या तो “अतिरेक” नजर आने लगता है या फिर वह इसे बड़ी सफाई से नज़रअंदाज कर देता है। अगर कहीं मजबूरी में ऐसे अपराधों का जिक्र करना भी पड़े, तो तुरन्त उसे “धार्मिक प्रेरणा से रहित” बताकर धुला-पुँछा दिया जाता है — और अगर थोड़ा और तिकड़मी मूड में हों तो “हिंदुत्व षड्यंत्र” के झूठे हवाले देकर अपराध को वैध ठहराने की कोशिश भी कर ली जाती है।
लेस्टर हिंसा इसका ताज़ा उदाहरण है, जहाँ वैश्विक मीडिया ने पूरी ताकत से यह नैरेटिव गढ़ा कि अशांति की जड़ में आरएसएस और “हिंदुत्ववादी ताकतें” हैं। लेकिन जैसे ही पुलिस जांच की परतें खुलीं, सच्चाई सामने आ गई — कि हिंसा में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की अहम भूमिका थी। लेकिन जब तक सच्चाई बाहर आई, मीडिया अपना ‘काम’ कर चुका था, यानि कि झूठ बो कर दिमाग़ों में ज़हर बो चुका था।[23]
मूल बात यह है कि पश्चिम में इस्लामी तुष्टीकरण एक गंभीर समस्या है, और हिंदू समुदाय को अक्सर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। “इस्लामोफोबिया” शब्द का अक्सर हिंदुओं की आवाज़ को दबाने के लिए दुरुपयोग किया जाता है – खासकर जब वे कट्टरपंथी इस्लामिस्ट नेटवर्क के ख़िलाफ़ बोलते हैं या हिंदू विरोधी नफ़रत फैलाने में उनकी भूमिका को उजागर करते हैं।
हिंदू विरोधी अपराधों के विरुद्ध संघर्ष
पश्चिम में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों में आई तेज़ बढ़ोतरी को अब हिंदू समुदाय चुनौती देने लगा है। हिंदू वकालत समूह और कुछ साहसी, ईमानदार कानून निर्माता — जो अभी भी न्याय और सच्चाई के प्रति थोड़ी संवेदनशीलता रखते हैं — इस मुद्दे को लेकर कानूनी और संवैधानिक लड़ाई छेड़े हुए हैं।
अमेरिका में जॉर्जिया पहला राज्य बन गया जिसने हिंदूफोबिया के खिलाफ एक विधेयक पेश किया — एक ऐसा कदम जो बाकी राज्यों की गहरी चुप्पी और सुविधा-जनित अंधेपन पर सीधा तमाचा है। अगर यह विधेयक पास होता है, तो राज्य के दंड संहिता में हिंदू विरोधी भेदभाव को बाकायदा जोड़ा जाएगा, जिससे हिंदुओं के खिलाफ होने वाले घृणा अपराधों पर आखिरकार मुकदमा चलाना संभव होगा। यह विधेयक हिंदूफोबिया को “हिंदू धर्म के प्रति विरोधी, विनाशकारी और अपमानजनक दृष्टिकोणों और व्यवहारों का समूह” के रूप में परिभाषित करता है — यानी जो बात दुनिया को बहुत पहले समझनी चाहिए थी, उसे अब शब्दों में दर्ज किया जा रहा है। जॉर्जिया क यह ऐतिहासिक कदम पश्चिमी ढोंग के बीच उम्मीद की एक छोटी, लेकिन चमकती हुई किरण है जहाँ बाकियों ने अब तक आंखें मूंद रखी हैं।[24] [25]
दिसंबर 2024 में, गविष्टी फाउंडेशन ने पहला हिंदू विरोधी घृणा ट्रैकर लॉन्च किया। यह टूल हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों का दस्तावेज़ीकरण करने, हिंदू उत्पीड़न के बारे में जागरूकता बढ़ाने, मानवाधिकारों को बढ़ावा देने, और हिंदू-संबंधित मुद्दों पर शोध प्रकाशित करने के लिए बनाया गया है।[26]
निष्कर्ष
हिंदूफोबिया आज एक गंभीर वैश्विक संकट बन चुका है, और पश्चिम में तो इसने बेहद जटिल और छद्म रूप धारण कर लिया है। हिंदू धर्म और इसकी परंपराओं पर सुनियोजित तरीके से हमले किए जाते हैं, जो हिंदू धर्म को विकृत करके पेश करते हैं और उसके प्रति नकारात्मक धारणाएँ फैला कर ज़हर बोते हैं।
पश्चिमी देशों में हिंदू विरोधी घृणा अपराधों की न तो ढंग से जांच होती है और न ही मीडिया को इस पर बात करने में कोई खास दिलचस्पी है। हिंदू समुदाय को अक्सर “धनी” और “प्रतिष्ठित” बताकर उनके दर्द और असुरक्षा को बड़े ठाठ से खारिज कर दिया जाता है — जैसे पीड़ा का कोई दर्जा सिर्फ उनपर लागू होता है जो मीडिया के प्रिय पीड़ित वर्गों में फिट बैठते हों।
अगर कोई हिंदू खुलकर अपने अधिकारों और सम्मान की बात कर भी दे, तो तुरन्त उस पर “भारत की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार का समर्थक” या “हिंदुत्व चरमपंथी” जैसे ठप्पे जड़ दिए जाते हैं। यह एक सोची-समझी रणनीति है — ताकि असली पीड़ित को अपराधी साबित किया जा सके और हर सच्ची आवाज़ को शर्मिंदा कर चुप कराया जा सके।
अगर वाकई हिंदू विरोधी घृणा अपराधों के बढ़ते संकट का सामना करना है, तो सिर्फ खोखली बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा। इसके लिए मजबूत क़ानूनी सुरक्षा, गहरी सामुदायिक जागरूकता, अकादमिक ज़िम्मेदारी तय करने की हिम्मत और सबसे बढ़कर — इस समस्या को गंभीरता से लेने की असली राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। लेकिन दुख की बात यही है कि पश्चिमी लोकतंत्रों में इन सबकी सबसे ज़्यादा कमी दिखाई देती है।
संदर्भ सूची
[1] Hindudvesha and UN’s Double Standard; https://stophindudvesha.org/hindudvesha-and-uns-double-standard/
[2] Rising Hinduphobia: Global Surge in Anti-Hindu Violence Raises Alarms; https://ddnews.gov.in/en/rising-hinduphobia-global-surge-in-anti-hindu-violence-raises-alarms/
[3] Dangerous hybridization of hate against Hindus globally, says U.S.- based research organization – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/international/dangerous-hybridisation-of-hate-against-hindus-globally-says-us-based-research-organisation/article65921343.ece
[4] Canada: 27-yr-old Dharmesh Katheeriya, victim of a hate crime, the neighbor had made racial slurs against him before fatally stabbing him; https://www.opindia.com/news-updates/canada-27-yr-old-dharmesh-katheeriya-victim-of-a-hate-crime-neighbour-had-made-racial-slurs-against-him-before-fatally-stabbing-him/
[5] CoHNA Canada on X; https://x.com/CoHNACanada/status/1909320172655329734
[6] Anti-Hindu hate crimes beat Islamophobia cases in California: Report – India Today; https://www.indiatoday.in/world/us-news/story/anti-hindu-hate-crime-us-california-religious-bias-civil-rights-department-anti-muslim-2544296-2024-05-27
[7] Hinduphobia in California: U.S. State witnesses rapid surge in Anti-Hindu violence, hate crimes against Indias; https://organiser.org/2024/05/28/239758/international/america/usa-america/hinduphobia-in-california-us-state-witnesses-rapid-surge-in-anti-hindu-violence-hate-crimes-against-indians/
[8] Ibid.
[9] New Report from California Civil Rights Highlights Growing Hinduphobia in the State – Coalition of Hindus of North America; https://cohna.org/new-report-from-california-civil-rights-highlights-growing-hinduphobia-in-the-state/
[10] The sudden spate of deaths of Indian-origin students and rise of anti-India sentiments in the U.S.; https://www.firstpost.com/opinion/sudden-spate-of-deaths-of-indian-origin-students-and-rise-of-anti-india-sentiments-in-the-us-13764485.html
[11] Cruel mockery’: Seattle police officer recorded on body camera laughing about Northeastern student’s death fired by department (The Huntington News); https://huntnewsnu.com/78988/campus/cruel-mockery-seattle-police-officer-recorded-on-body-camera-laughing-about-northeastern-students-death-fired-by-department/?utm_source=chatgpt.com
[12] Concerns over Hinduphobia in London discussed at City Hall event | The Standard; https://www.standard.co.uk/news/crime/hinduphobia-faith-hate-crime-met-police-krupesh-hirani-hindu-b1218185.html
[13] British-Indian Lawmaker Tables Motion Against Anti-Hindu Hate Crimes in UK; https://www.ndtv.com/world-news/british-indian-lawmaker-tables-motion-against-anti-hindu-hate-crimes-in-uk-4545268
[14] Shedding Light on Silence – The significance and impact of the anti-Hindu hate survey – INSIGHT UK; https://insightuk.org/shedding-light-on-silence-the-significance-and-impact-of-the-anti-hindu-hate-survey
[15] Anti-Hindu Hate in Schools – Henry Jackson Society; https://henryjacksonsociety.org/publications/anti-hindu-hate-in-schools/
[16] ADDRESSING HINDUPHOBIA IN CANADA – VHP CANADA; https://vhpcanada.ca/addressing-hinduphobia-in-canada/
[17] 7/11/22 – Anti-Hindu Disinformation: A Case Study of Hinduphobia on Social Media; https://networkcontagion.us/reports/7-11-22-anti-hindu-disinformation-a-case-study-of-hinduphobia-on-social-media/
[18] Modi’s Hindu Nationalism Stokes Tension in Indian Diaspora – The New York Times; https://www.nytimes.com/2023/09/30/world/canada/modi-canada-hindu-nationalism.html
[19] Henry Jackson Society Report on Hindu-Muslim civil unrest in Leicester; https://henryjacksonsociety.org/wp-content/uploads/2022/11/CRTLeicesterFinalReport-FINAL-VERSION.pdf
[20] British Hindus object to islamophobia council in the UK, call for hatred against all religions to be recognized – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/nri/british-hindus-object-to-islamophobia-council-in-uk-call-for-hatred-against-all-religions-to-be-recognised/articleshow/118337929.cms
[21] Ibid.
[22] Statement on the UK Government’s initiative to establish an islamophobia council – INSIGHT UK; https://insightuk.org/statement-on-the-uk-governments-initiative-to-establish-an-islamophobia-council
[23] Is the SOAS inquiry into Leicester violence biased and rigged against Hindus?; https://hindupost.in/world/is-the-soas-inquiry-into-leicester-violence-biased-and-rigged-against-hindus/
[24] Georgia becomes first US state to introduce bill against ‘Hinduphobia’ – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/world-news/us-news/georgia-becomes-first-us-state-to-introduce-bill-against-hinduphobia-101744457848406.html
[25] Georgia introduces Bill to recognise Hinduphobia, a first for US – India Today; https://www.indiatoday.in/world/us-news/story/georgia-introduces-bill-recognise-hinduphobia-in-a-first-us-hindu-population-discrimination-hate-2707627-2025-04-11
[26] Hinduphobia Tracker – A database of Anti-Hindu hate crimes; https://www.opindia.com/2024/12/hinduphobia-tracker-a-database-of-anti-hindu-hate-crimes/
Donate to HINDUDVESHA
Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.
SUPPORT US