एकतरफ़ा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: उदारवादी कहलनेवालों का दोगलापन

यह लेख उन उदारवादी कहलाने वालों का पर्दाफ़ाश करता है जो अपने नज़रिए से मेल खाती बातों पर ही अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा उठाते हैं, और बाक़ी को चुप करा देते हैं। व्यंग्य से लेकर विद्वत्ता तक, असहमति को सराहा नहीं जाता, बल्कि सावधानी से छाँटा जाता है। यही है उस उदारवादी विमर्श की साख का संकट।
  • उदारवादी लोग अक्सर सिर्फ़ उन्हीं बातों की आज़ादी का समर्थन करते हैं, जो उनके अपने विचारों से मेल खाती हैं। जो लोग उनसे अलग सोचते हैं, उन्हें वे ग़लत ठहराकर चुप कराने की कोशिश करते हैं।
  • अगर मज़ाक या व्यंग्य परंपरा या धर्म पर हो, तो उसे “हिम्मत भरी कला” कहा जाता है। लेकिन वही मज़ाक अगर उनके अपने आदर्शों या ‘पसंदीदा मुद्दों’ पर हो, तो वे उसे अपमान कहकर निंदा करने लगते हैं।
  • जहाँ वामपंथी सोच का दबदबा है—जैसे कुछ मीडिया चैनल और यूनिवर्सिटियाँ—वहाँ दूसरी सोच रखने वालों को बोलने का मौका ही नहीं दिया जाता, या फिर उन्हें बदनाम करके चुप कराया जाता है।
  • ये जो खुद को “खुले दिमाग वाले बुद्धिजीवी” कहते हैं, वे तब तक ही खुले होते हैं जब तक कोई उनसे सवाल न पूछे। जैसे ही कोई उनके विचारों को चुनौती देता है, वे बर्दाश्त नहीं कर पाते।
  • जो लोग खुद को नैतिक रूप से ऊँचा दिखाते हैं, वे असल में बहस से डरते हैं। जब जवाब नहीं होता, तो वे सामने वाले को ‘कैंसल’ कर देते हैं — तर्क से नहीं, चुप करवाकर।

लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी को सबसे ज़रूरी आज़ादी माना जाता है। लेकिन हकीकत में, जो लोग इसका समर्थन करते हैं, वे खुद ही इसके नियम तोड़ते हैं। भारत और दुनिया में कई लोग जो खुद को ‘उदारवादी’ कहते हैं—वे अक्सर सिर्फ़ उन्हीं बातों का समर्थन करते हैं जो उनके सोच से मिलती हैं। जब कोई बात उनकी सोच के अनुकूल होती है, तो वे सेंसरशिप का विरोध करते हैं। लेकिन अगर कोई बात उनकी सोच को चुनौती दे, तो वे चुप हो जाते हैं या खुद उसे रोकने की कोशिश करने लगते हैं।

भारत और दुनिया में कुछ प्रभावशाली लोग—जैसे शिक्षक, पत्रकार, कॉमेडियन और एक्टिविस्ट—खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थक बताते हैं। लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि वे इसे सबके लिए नहीं, सिर्फ़ अपने जैसे लोगों के लिए चाहते हैं। जो बातें उनकी सोच को सही ठहराती हैं, उन्हें वे “विरोध” या “कला” कहकर सराहते हैं। लेकिन जैसे ही कोई अलग बात सामने आती है—चाहे वह राजनीतिक विरोध हो, धर्म पर सवाल हो या अलग सोच—वे तुरंत उसकी आलोचना करने लगते हैं या उसे चुप कराने की कोशिश करते हैं। उनका यह दोहरा रवैया लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है।

कुणाल कामरा और सही व्यंग्यकी परिभाषा

जब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात होती है, कुणाल कामरा का नाम अक्सर सबसे पहले लिया जाता है। उनकी सरकार-विरोधी कॉमेडी—तेज, सीधी और बिना किसी माफ़ी के सत्ताधारी दल को निशाना बनाने वाली—ने उन्हें वामपंथी हलकों में काफी लोकप्रियता दिलाई है। 2025 में जब उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर एक व्यंग्यात्मक गीत जारी किया, तो सरकार की तीखी प्रतिक्रिया आई। लेकिन साथ ही, तथाकथित ‘लिबरल’ जमात ने तुरंत कहा, “कला को रोका नहीं जा सकता”, “हास्य भी विरोध है”, और “व्यंग्य सत्ता को असहज करता है”।[1][2][3][4][5]

और वास्तव में यह बात सही भी है। कामरा को राजनीतिक आलोचना करने का पूरा अधिकार है। कला की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है, और राजनीतिक व्यंग्य हमेशा सत्ता का आईना रहा है। लेकिन समस्या कामरा की बातों में नहीं, बल्कि उन लोगों की सोच में है जो इसी स्वतंत्रता को दूसरों के लिए नकार देते हैं।

इनका व्यंग्य का समर्थन सिर्फ़ तब तक ही होता है जब तक वह वाम-उदारवादी एजेंडे के बाहर न जाए; जैसे ही वह उनके ‘रक्षित वर्गों’ की ओर मुड़ता है, वह समर्थन पाखंड में बदल जाता है।

कॉमेडियन और लेखक वरुण ग्रोवर का नाम भी इसी सिलसिले में आता है। 2019 के CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान, उनकी कविताओं और स्टैंड-अप में हिंदू प्रतीकों का बार-बार उपहास किया गया। एक प्रस्तुति में उन्होंने भारत के राजनीतिक भविष्य की तुलना हिंदू ग्रंथों से की, जिसे कई आस्थावान हिंदुओं ने अपमानजनक माना। लेकिन इस पर न कोई विरोध हुआ, न कोई खुला सवाल। इसके बजाय उन्हें “विद्रोही” और “आज का कबीर” कहा गया। सोशल मीडिया पर उनकी ‘साहसी कला’ की खूब तारीफ़ की गई—मानो वे फासीवाद (Fascism) के खिलाफ़ मोर्चा लिए खड़े हों।[6][7][8]

लेकिन जब बात सुरलीन कौर के मामले की आती है तो ये उदारता कहीं नजर नहीं आती। 2021 में उन्होंने एक स्टैंड-अप शो में, ऐसे कट्टर धार्मिक प्रचारकों पर  जो हर धर्म में होते हैं, थोड़ा सा मज़ाक किया था। उन्होंने किसी एक धर्म को निशाना नहीं बनाया था, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड की ओर इशारा किया था। लेकिन इसकी प्रतिक्रिया बेहद तेज़ और आक्रोश से भरी थी। कुछ हिंदू और मुस्लिम संगठनों ने सुरलीन का विरोध किया, उन्हें ऑनलाइन ट्रोल किया गया, उन्हें वो वीडियो हटाना पड़ा और एक हेल्थ ब्रांड ने उनका कॉन्ट्रैक्ट भी रद्द कर दिया।[9]

ऐसे में होना ये चाहिए था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्षधर लोग उनके साथ खड़े होते, क्योंकि यही तो वही ‘संस्कृति-सेंसरशिप’ थी, जिसका वे हमेशा विरोध करते आए हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ: न कोई ओपन लेटर, न कोई लेख, न कोई टीवी बहस। बस गहरी और जानबूझकर की गई चुप्पी।

इसी चुप्पी में छिपा है उदारवादी कहलाने वालों का असली पाखंड!

सुरलीन कौर उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाती थीं। उनके चुटकुलों से न उनकी कोई राजनीति को फ़ायदा हो रहा था, न किसी प्रगतिशील नैरेटिव को। और फिर उसने तो उन समुदायों पर तंज किया था जिन्हें ये लोग आलोचना से परे मानते हैं। तो फिर उसे उदारवादियों का समर्थन मिलता भी तो क्यों?

असल में अभिव्यक्ति की आज़ादी का नाम लेकर हमें एक ऐसा मंच दिया जा रहा है, जहाँ बोलने से पहले पूछा जाता है—“तुम किस तरफ़ हो?” जब व्यंग्य हिंदू परंपराओं पर होता है, तो उसे ‘सोचने की आज़ादी’ कहा जाता है। लेकिन वही व्यंग्य अगर अल्पसंख्यक धर्मों या वामपंथी सोच की आलोचना करे, तो उसे तुरंत ‘घृणा’ या ‘सांप्रदायिकता’ कहा जाने लगता है। और तब कलाकार को कोई साथ नहीं देता।

यह दोगली सोच सिर्फ इन लोगों की विश्वसनीयता को नहीं गिराती, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की नींव को ही कमजोर करती है। अगर किसी को आहत होने से यह तय हो कि कोई बात कही जा सकती है या नहीं, तो वह आज़ादी नहीं, सुविधा बन जाती है। अगर दक्षिणपंथी ग़ुस्से को ‘तानाशाही’ माना जाए, तो वामपंथियों की चुप्पी को भी ‘नैतिक मिलीभगत’ कहना होगा।

सच्चे अभिव्यक्ति समर्थक वही होते हैं जो तब भी साथ खड़े रहते हैं जब विचार असहज हों—जो सिर्फ अपने पसंदीदा कलाकारों का नहीं, बल्कि उन लोगों का भी समर्थन करते हैं जिनकी बातों से वे सहमत नहीं होते—लेकिन जो बोलने का हक रखते हैं।

नूपुर शर्मा प्रकरण: आक्रोश का दोहरा मापदंड

अब बात करते हैं नूपुर शर्मा के मामले की। उनका बयान एक तेज़ बहस के दौरान दिया गया था, न कि किसी सोची-समझी नफ़रत फैलाने की कोशिश में। लेकिन उस पर प्रतिक्रिया बेहद उग्र हुई: दुनियाभर में विरोध, हिंसक प्रदर्शन, जान से मारने की धमकियाँ और यहाँ तक कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी भी सामने आई।[10][11]

इतना होने पर भी किसी ने उनके बोलने के अधिकार की बात नहीं की; यहाँ तक कि असहमति जताने वालों ने भी चुप्पी साध ली। वही उदारवादी वर्ग, जो कुणाल कामरा जैसे लोगों के लिए खुलकर खड़ा होता है, नूपुर शर्मा की सार्वजनिक बेइज्जती पर न सिर्फ़ चुप रहा, बल्कि उसे सही ठहराता दिखा। इस बार “आहत करने का अधिकार” किसी को याद नहीं आया। नूपुर शर्मा की बात को एक विचार न मानकर सीधा अपराध बना दिया गया।

यह दोहरा रवैया दिखाता है कि आज के लिबरल विचारधारा के पीछे कितना पाखंड छिपा है। जब हिंदू मान्यताओं का मज़ाक उड़ाया जाता है—जैसे सीता की अग्नि परीक्षा की तुलना आधुनिक पितृसत्ता से करना, गणेश जी की छवि के साथ छेड़छाड़ करना, या मनुस्मृति को पूरे हिंदू धर्म का चेहरा बताना—तो उसे “साहसी”, “प्रगतिशील” और “ज़रूरी बहस” बताया जाता है। प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर गीता को ‘युद्ध ग्रंथ’ कह सकते हैं, और कलाकार देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाकर ‘बौद्धिक आज़ादी’ के नाम पर उन्हें सही ठहरा सकते हैं।

लेकिन जैसे ही यही रवैया किसी अन्य धर्म की ओर मुड़ता है, नियम अचानक बदल जाते हैं। इस्लामी मान्यताओं की आलोचना— चाहे वह उनके ग्रंथों और तथ्यों पर आधारित हो—’इस्लामोफोबिया’ कहलाती है। ईसाई सिद्धांतों पर सवाल उठाना ‘सांस्कृतिक असंवेदनशीलता’ बन जाता है। ऐसे दोहरे मापदंडों वाले सिस्टम में ये तथाकथित उदारवादी न सिर्फ़ सेंसरशिप की मांग करते हैं, बल्कि कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक अपमान में भी पीछे नहीं रहते।

यहीं से वामपंथी-उदारवादी सोच का असली चेहरा सामने आता है। वे सच में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास नहीं रखते। वे केवल उस अभिव्यक्ति को सही मानते हैं जो उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाए और उन्हीं शक्तियों को चुनौती दे जिन्हें वे ‘दमनकारी’ मानते हैं।

शिक्षा संस्थानों में गहराता पाखंड

विश्वविद्यालयों में यह दोहरापन और भी गहराई से फैला हुआ है। जब वामपंथी विचारक प्रो. कांचा इलैया ने पोस्ट-हिंदू इंडिया लिखी, तो उन्हें कुछ दक्षिणपंथी संगठनों से धमकियाँ मिलीं।[12] उस समय लिबरल बुद्धिजीवियों ने उनका समर्थन किया, और ऐसा करना सही भी था। लेकिन जब वैज्ञानिक और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आनंद रंगनाथन इस्लामी कट्टरता की आलोचना करते हैं या यह दिखाते हैं कि कुछ लोग हिंदू त्योहारों को लेकर दोहरा मापदंड अपनाते हैं, तो उन्हें ट्रोल किया जाता है, पब्लिक मंचों से हटाया जाता है, और सोशल मीडिया पर उनकी पहुँच सीमित कर दी जाती है।

इसी तरह, वकील और लेखक जे. साई दीपक, जो भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण और उपनिवेश-मुक्त सोच की वकालत करते हैं, को भी लगातार मज़ाक और विरोध का सामना करना पड़ता है। उनकी किताबों के विमोचन में बाधाएँ खड़ी की जाती हैं, और छात्रों को उनसे दूर रहने की सलाह दी जाती है।

दूसरी ओर अमेरिकी प्रोफेसर ऑड्री ट्रस्के, जिन्होंने यह विवादास्पद दावा किया कि सीता ने भगवान राम को “महिला विरोधी सुअर” कहा, उन्हें ‘शैक्षणिक स्वतंत्रता’ का पूरा संरक्षण मिलता है—जबकि संस्कृत ग्रंथों में ऐसा कोई शब्द है ही नहीं। लेकिन यह तथ्य लिबरल हलकों में कभी चर्चा का विषय नहीं बनता।[13][14]

कलाकारों की आज़ादी, लेकिन सिर्फ़ कुछ के लिए

प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन ने हिंदू देवियों को नग्न रूप में चित्रित किया, जिससे करोड़ों हिंदुओं की भावनाएँ आहत हुईं। लेकिन लिबरल कला जगत ने इसे ‘मॉडर्न आर्ट’ का एक निर्भीक नमूना बताया, और कहा गया कि “सच्ची कला वही होती है जो झकझोर दे।” जो लोग इससे आहत थे, उन्हें ‘रूढ़िवादी’ या ‘कला की समझ न रखने वाला’ कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया। जब विरोध हुए और मुकदमे दर्ज हुए, तो यही बुद्धिजीवी एकजुट होकर बोले: “हिंदू दक्षिणपंथ असहिष्णु है।” नतीजा यह हुआ कि हुसैन देश छोड़कर चले गए, लेकिन लिबरल वर्ग ने उन्हें ‘रचनात्मक आज़ादी के शहीद’ का दर्जा दे दिया।[15]

तीन तलाक़ के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई लड़ने वाली शायरा बानो का मामला और भी सोचने वाला है। 2017 में उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया—एक पुरानी प्रथा जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन करती थी। शायरा बानो ने इसके बाद भी महिलाओं के हक़ में आवाज़ उठाई और समान नागरिक संहिता जैसे जरूरी सुधारों का समर्थन किया। लेकिन फिर भी उन्हें लिबरल समाज से वो पहचान और सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हक़दार थीं। उनकी कहानी पर न कोई साहित्यिक चर्चा हुई, न कोई नाटक या फिल्म बनी, और न ही किसी बड़े मंच से उन्हें सराहा गया। क्योंकि उनकी बात लिबरल तबके के लिए ‘राजनीतिक रूप से असहज’ थी—इसलिए उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया।[16][17]

इन सभी उदाहरणों से एक बात साफ़ होती है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थन तब ही किया जाता है जब वह वामपंथी-उदारवादी एजेंडे से मेल खाती हो। अगर कोई हिंदू परंपराओं पर सवाल उठाए, तो उसे ‘क्रांतिकारी’ कहा जाता है। लेकिन जैसे ही कोई अल्पसंख्यक समुदाय की बुराइयों पर बात करता है या प्रगतिशील राजनीति के ‘पवित्र प्रतीकों’ पर सवाल उठाता है, तो उसकी आवाज़ दबा दी जाती है।

यह दोहरापन इस वर्ग के उन मूल्यों के खोखलापन का पर्दाफाश कर देता है जिनकी वो अक्सर सार्वजनिक मंचों पर बात करता है। इनके लिए आज़ादी का मतलब है: सिर्फ़ उन्हीं विचारों को मंच देना जो ‘अनुमोदित’ यानी पहले से स्वीकृत हों—और जो असहमति जताएं, उन्हें दबा देना।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स: एल्गोरिदम का छुपा पक्षपात

अब बात करें True Indology’ की। यह एक ऐसा सोशल मीडिया अकाउंट था जो इतिहास की गलतियों को शास्त्रों, खुदाई से मिले साक्ष्यों और पुराने दस्तावेज़ों के आधार पर तर्कपूर्वक चुनौती देता था। यह पेज उन लोगों के लिए भरोसे का स्रोत बन चुका था जो वामपंथी इतिहास लेखन पर सवाल उठाना चाहते थे। लेकिन अचानक और बिना किसी स्पष्टीकरण के यह अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया। न किसी पोस्ट का हवाला दिया गया, न अपील की सुविधा—सिर्फ़ एक सामान्य जवाब: “कम्युनिटी गाइडलाइन्स का उल्लंघन।”[18][19]

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है—और शायद आख़िरी बार भी नहीं होगा। जो लोग पारंपरिक सोच रखते हैं या मुख्यधारा से अलग नज़रिया रखते हैं, उनकी पोस्ट पर ‘हेट स्पीच’ या ‘गलत जानकारी’ जैसे अस्पष्ट टैग लगा दिए जाते हैं। उनके पोस्ट डिलीट कर दिए जाते हैं, या उन्हें शैडोबैन कर दिया जाता है—यानी उनकी बात लोगों तक पहुँची ही नहीं पाती। विडंबना ये है कि इनमें से अधिकतर पोस्ट सिर्फ़ धार्मिक या ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं। फिर भी उन्हें ‘भड़काऊ’ कहकर दबा दिया जाता है।

अब ज़रा दूसरी तरफ़ देखिए—उन्हीं डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर हिंदू प्रतीकों और परंपराओं का खुला मज़ाक उड़ाया जाता है। कॉमेडियन भगवान राम के वनवास पर चुटकुले बनाते हैं, आरती जैसे धार्मिक कार्यों को मज़ाक में बदल देते हैं। हर साल दिवाली और होली को ‘जातिवादी’ या ‘प्रदूषणकारी’ बताकर वीडियो वायरल किए जाते हैं। लेकिन जब बात बकरीद के खुले पशुबलि या न्यू ईयर की आतिशबाज़ी की आती है, तो वही आवाज़ें चुप हो जाती हैं। और ये टेक कंपनियाँ ऐसे कंटेंट को सेंसर नहीं करतीं—बल्कि उन्हें “व्यंग्य” या “प्रगतिशील आलोचना” कहकर सही ठहराती हैं।

यदि संक्रांत सानु के उदाहरण को देखा जाए, तो यह दोहरा मापदंड और भी ज़्यादा साफ़ नज़र आता है। उन्होंने बस इतना कहा था कि अगर दिवाली पर प्रदूषण के नाम पर पटाखे रोके जा सकते हैं, तो बकरीद पर खुले में जानवरों की बलि पर सवाल क्यों नहीं उठाए जाते।[20] उनका बयान न तो अपमानजनक था, न ही भड़काने वाला—बल्कि एक सामान्य सामाजिक सवाल था। लेकिन इसके बावजूद उन्हें ‘इस्लामोफोबिक’ करार दे दिया गया। उनकी पोस्ट को फ़्लैग किया गया, व्यू कम कर दिए गए, और मीडिया में उनके इरादों पर सवाल उठाए गए। उन्हें बदनाम करने की मुहिम सी चल पड़ी।

तो सवाल उठता है: अगर ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और उनके एल्गोरिदम खुद को निष्पक्ष बताते हैं, तो फिर यह पक्षपात क्यों होता है? उत्तर सीधा सा है — कंटेंट को कैसे नियंत्रित किया जाए, यह तय करने वाली परिभाषाएँ ही एक खास विचारधारा से प्रेरित हैं। ‘हेट स्पीच’, ‘कम्युनिटी गाइडलाइन्स’, ‘मिसइन्फॉर्मेशन’ जैसे शब्दों का मतलब इस पर निर्भर करता है कि बात कौन कह रहा है और किसके बारे में कह रहा है। अगर कोई वामपंथी कार्यकर्ता किसी धार्मिक परंपरा की आलोचना करता है, तो उसे ‘सुधार’ कहा जाता है। लेकिन वही बात अगर कोई पारंपरिक सोच वाला कहे, तो उसे ‘घृणा’ या ‘कट्टरता’ बता दिया जाता है।

इसके अलावा, इन प्लेटफॉर्म्स की निगरानी और सलाह देने वाली समितियाँ भी उन्हीं विचारधारा से जुड़ी होती हैं जो पहले से मीडिया और अकादमिक जगत में हावी हैं। उनके ‘फैक्ट-चेकर्स’ और ‘सेफ्टी काउंसिल’ भी वही तय करते हैं कि किसकी बात दिखनी चाहिए और किसकी नहीं।

उदारवाद का पाखंड वैश्विक है

यह पाखंड सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक समस्या है। पश्चिमी देशों में भी कई लोग जो खुद को ‘फ्री स्पीच’ और ‘लिबरलिज़्म’ का ठेकेदार बताते हैं, वे भी अक्सर अपने ही एजेंडे से बंधे होते हैं। उनका आक्रोश एक पूर्वनियोजित नाटक होता है, और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा शर्तों पर टिकी होती है।

सलमान रुश्दी का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। 1988 में उनकी किताब The Satanic Verses के खिलाफ़ कट्टर इस्लामी संगठनों ने दुनिया भर में विरोध शुरू कर दिया। ईरान के अयातुल्ला खोमैनी ने उनके खिलाफ़ मौत का फतवा जारी किया, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने अपनी कल्पना में एक धार्मिक विषय को छुआ था। उम्मीद कि जाती थी कि लिबरल दुनिया उनके पक्ष में खड़ी होगी,लेकिन हुआ इसका उल्टा। कई लिबरल चुप रहे और कुछ ने तो उल्टा रुश्दी को ही दोषी ठहरा दिया कि उन्होंने भावनाएँ भड़काईं। बार-बार यही कहा गया, “यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है।” यानी “बोलने का अधिकार” वहीं तक सीमित रह गया, जहाँ तक वह ‘मल्टीकल्चरल पॉलिटिक्स’ से टकराता नहीं।[21]

अब तुलना कीजिए Charlie Hebdo – फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका से जो बार-बार धार्मिक प्रतीकों का मज़ाक उड़ाती रही है, खासकर ईसाई धर्म का। जब उन्होंने पोप और यीशु मसीह के आपत्तिजनक कार्टून बनाए, तो उन्हें ‘फ्री स्पीच’ का उदाहरण बताया गया। पश्चिमी विश्लेषकों ने कहा: “व्यंग्य को बेखौफ़ होना चाहिए।” 2015 में जब इस्लामी आतंकियों ने Charlie Hebdo के दफ़्तर पर हमला किया और 12 लोगों की हत्या कर दी, तब भी कुछ लिबरल आवाज़ें यह कहती सुनी गईं: “हाँ, लेकिन चार्ली हेब्दो ने एक ‘संवेदनशील विषय पर व्यंग’ किया।” मानो किसी की हत्या को भी यह कहकर हल्का किया जा सकता है कि उसकी बात संवेदनशील थी।[22]

2023 में यह दोहरापन और भी साफ़ नज़र आया, जब स्वीडन-इराक़ी कार्यकर्ता सलवान मोमीका ने इस्लामी कट्टरता के विरोध में सार्वजनिक रूप से कुरान की एक प्रति जलाई। यह कदम भड़काऊ ज़रूर था, लेकिन लिबरल तबके की प्रतिक्रिया बेहद सख़्त थी। उन्हें ‘हेट स्पीच’ के आरोप में गिरफ़्तार किया गया और कई लोगों ने उनके खिलाफ़ सज़ा की मांग की। यही लोग, जो अब तक ईशनिंदा को ‘साहसी कला’ और ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहकर बचाते थे, अब सेंसरशिप और दंड की बात करने लगे।[23]

यानि कि मुद्दा नहीं बदला था, बस निशाना बदल गया था।

अब याद करें 1987 की वो कुख्यात तस्वीर Piss Christ, जिसमें कलाकार एंड्रेस सेरानो ने ईसा मसीह के क्रॉस को अपने मूत्र से भरे जार में डुबोकर उसकी फ़ोटो खींची थी। यह चित्र अमेरिका समेत पूरी ईसाई दुनिया में ग़ुस्से का कारण बना। लेकिन पश्चिमी लिबरल समाज ने इसे “प्रेरक”, “महत्वपूर्ण” और “कला की आज़ादी” का उदाहरण बताया। इस पर पुरस्कार भी मिले और इसे बड़ी आर्ट गैलरीज़ में दिखाया गया। जो लोग इससे आहत हुए, उन्हें यह कहकर नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि वे ‘आधुनिक कला’ को समझ नहीं पाते। यानि जब मज़ाक ईसाई धर्म का होता है तो उसे ‘कला’ माना जाता है। लेकिन जैसे ही यही दृष्टिकोण इस्लाम या किसी अल्पसंख्यक समुदाय की ओर मुड़ता है, तो उसे “रेड लाइन” कहकर उसका विरोध किया जाता है।

यह दोहरापन एक बड़ी सच्चाई को उजागर करता है कि बहुत से पश्चिमी लिबरल लोगों के लिए “अभिव्यक्ति की आज़ादी” कोई नैतिक मूल्य नहीं है, बल्कि ताक़त और सुविधा का एक औज़ार है। अगर कोई कलाकार या लेखक ईसाई धर्म, पश्चिमी संस्कृति या पारंपरिक सोच की आलोचना करता है, तो उसे ‘साहसी विद्रोही’ कहा जाता है। लेकिन अगर वही आलोचना इस्लामी कट्टरता या किसी अल्पसंख्यक समूह की रूढ़ियों को निशाना बनाए, तो वह तुरंत ‘हेट स्पीच’, ‘इस्लामोफोबिया’ या ‘रेसिज़्म’ बन जाती है।

और विडंबना देखिए—जो लिबरल तबका खुद को धार्मिक कठमुल्लों और सेंसरशिप का विरोधी बताता है, वही इस ‘संवेदनशीलता’ की आड़ में उन्हीं ताक़तों के साथ खड़ा हो जाता है। सहिष्णुता दिखाने की होड़ में वे खुद अपनी बौद्धिक ईमानदारी को छोड़ देते हैं।

इससे ये साफ़ हो जाता है कि वैश्विक उदारवादी व्यवस्था दरअसल विचारों की स्वतंत्रता की प्रहरी नहीं, बल्कि असहमति को सीमित और स्वीकृत दायरे में रखने वाली संस्था है। वे सभी के लिए आज़ादी नहीं चाहते, बल्कि कुछ चुने हुए लोगों को विशेष अधिकार देना चाहते हैं। इनकी निष्ठा अभिव्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उस नैरेटिव के लिए है जो असहमति को दबा सके, पाखंड को सही ठहरा सके, और ग़ुस्से को हथियार बना सके—बस शर्त यह है कि वह उनकी विचारधारा से मेल खाता हो।

विडंबना यह है कि यह पक्षपातपूर्ण आक्रोश असली नुक़सान सच्चे उदारवाद को पहुँचाता है। जब लिबरल सोच रखने वाले लोग विरोधी विचारों को दबाते हैं तो वे उसी असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहे होते हैं जिसका वे स्वयं विरोध करने का दावा करते हैं। इससे लोगों को लगने लगता है कि ‘उदारवाद’ बस एक खोखला नारा है।

जब बोलने की आज़ादी सिर्फ़ ‘अपने लोगों’ के लिए हो, तो वह किसी भी तरह से सार्वभौमिक नहीं रह जाती। फिर वह बन जाती है: “मेरे लिए आज़ादी, तुम्हारे लिए चुप्पी।”

एक अपील: समान सोच नहीं, समान अधिकार

जब कोई समाज यह तय करने लगे कि कौन बोले और कौन चुप रहे, तो वह समाज सच में ‘उदारवादी’ नहीं हो सकता, वह एक छिपी हुई तानाशाही का नुमाइंदा होता है।

सच्ची अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब है कि हर विचार, वो भी जो लोकप्रिय न हो या जिससे असहजता हो, का उतनी ही मजबूती से बचाव किया जाए। चाहे वह कोई राष्ट्रवादी हो, कोई धार्मिक आलोचक हो या कोई परंपरागत सोच रखने वाला—अगर वह हिंसा के लिए नहीं उकसा रहा, तो उसके बोलने का अधिकार उतना ही ज़रूरी है जितना किसी वामपंथी कवि या कॉमेडियन का। इस तथाकथित ‘लिबरल’ वर्ग ने बार-बार साबित किया है कि उनकी बोलने की आज़ादी सिर्फ़ उनके अपने विचारों तक सीमित है। जो कोई उनसे असहमत हो, उसकी आवाज़ को ये पूरी ताक़त से दबा देते हैं। ये लोग लोकतंत्र के रक्षक नहीं हैं—बल्कि सबसे खतरनाक दुश्मन हैं, क्योंकि ये उसी आज़ादी को अन्दर से खोखला कर रहे हैं जिसका वे दिखावे में बचाव करते हैं।

सच्ची बोलने की आज़ादी सबके लिए होनी चाहिए—कॉमेडियन से लेकर धर्मगुरु तक, बहुसंख्यकवाद के आलोचकों से लेकर अल्पसंख्यक कट्टरता के आलोचकों तक। जब तक इस पाखंड को उजागर और ख़त्म नहीं किया जाएगा, तब तक लोकतंत्र का सबसे बड़ा ख़तरा सिर्फ़ सेंसरशिप नहीं होगा, बल्कि वे लोग होंगे जो सेंसरशिप को ही अपना हथियार बनाकर दूसरों को चुप कराते हैं, और खुद को ‘विरोधकर्ता’ कहकर बचा ले जाते हैं।

संदर्भ सूची 

[1] The selective outrage factory: Mumbai vandalism over Kunal Kamra’s show condemned, Nagpur violence by Muslim mobs rationalized as a reaction to Aurangzeb protests; https://www.opindia.com/2025/03/the-selective-outrage-factory-mumbai-vandalism-over-kunal-kamra-condemned-nagpur-violence-by-muslim-mobs-rationalised/

[2] Kunal Kamra row: People shouldn’t misuse their rights in a democracy, says Eknath Shinde; https://www.thehindu.com/news/national/kunal-kamra-row-people-shouldnt-misuse-their-rights-in-a-democracy-says-shinde/article69416943.ece

[3] ‘Waste of time’: Kunal Kamra on cops visit to his Mumbai home; https://timesofindia.indiatimes.com/india/waste-of-time-kunal-kamra-on-cops-visit-to-his-mumbai-home/articleshow/119811100.cms

[4] Kunal Kamra’s latest post targets government amid ‘gaddar’ joke row: ‘How to kill an artist democratically’; https://www.hindustantimes.com/india-news/kunal-kamras-latest-post-targets-government-amid-gaddar-joke-row-how-to-kill-an-artist-democratically-101743498879754.html

[5] Kunal Kamra appears before Madras High Court, alleges cops trying to arrest him; https://www.indiatoday.in/india/law-news/story/kunal-kamra-bail-madras-high-court-2702366-2025-04-01

[6] ‘Hum Kaagaz Nahi Dikhayenge’: Varun Grover’s anti-NRC poem wins support online; https://indianexpress.com/article/trending/trending-in-india/hum-kaagaz-nahi-dikhayenge-varun-grovers-anti-nrc-poem-6179815/

[7] Poetry and songs have become the soul of the nation-wide protests against the new citizenship law; https://indianexpress.com/article/express-sunday-eye/singing-about-the-dark-times-protest-poetry-songs-citizenship-law-jamia-jnu-6208245/

[8] ‘Kaagaz nahi dikhayenge’ fame comedian all set to give fingerprints and all documents to Trump government in U.S.; https://www.opindia.com/2020/01/varun-grover-us-tour-kaagaz-nahin-dikhayenge/

[9] ISKCON USA supports complaint against Surleen Kaur, says Sanatana Dharma followers hurt by comedian’s remarks; https://www.timesnownews.com/india/article/iskcon-usa-supports-complaint-against-surleen-kaur-says-sanatana-dharma-followers-hurt-by-comedians-remarks/600138?fbclid=IwY2xjawJe7hhleHRuA2FlbQIxMQABHhFOnAY6WgeeltuF_y6dV8QwI86OBZCI330jnF7vP8NGLCGMYNAdc3tRmYmJ_aem_ipd0PN8j-YBiP5vUVZ603A

[10] Free Speech Under Siege: The Deadly Price of Criticizing Islam; https://stophindudvesha.org/free-speech-under-siege-the-deadly-price-of-criticizing-islam/#bookmark=id.dpjnvkpohpfe

[11]Explained: Evolution of the Nupur Sharma controversy; https://www.deccanherald.com/india/explained-evolution-of-the-nupur-sharma-controversy-1115742.html

[12] Proposed Ban on Kancha Ilaiah Shepherd’s Books in DU Raises Questions about the Future of Critical Thought; https://www.epw.in/engage/article/proposed-ban-kancha-ilaiah-shepherd-book-delhi-university-questions-future-critical-thought

[13] The Scholar Whom Audrey Truschke Cites Finds Her Tweet ‘Shocking’; https://swarajyamag.com/culture/the-scholar-whom-audrey-truschke-cites-finds-her-tweet-shocking?fbclid=IwY2xjawJe-ypleHRuA2FlbQIxMQABHqnoiU7q4H_nrxCr_WWIZlGQPeBwMYdCiS-Z_7LQCS8IaRh3ymZKw-eppb6i_aem_pZN_CCmf9hXTZLB_sIMvWg

[14] The Unscholarly Dishonesty of Audrey Truschke; https://www.newslaundry.com/2018/04/30/the-unscholarly-dishonesty-of-audrey-truschke

[15] How MF Husain’s paintings are courting controversy again; https://www.firstpost.com/explainers/mf-husain-paintings-controversy-delhi-court-13855604.html

[16] Triple Talaq: Supreme Court to hear petitions challenging Muslim Women Act in March 2024; https://indialegallive.com/cause-list/triple-talaq-supreme-court-petitions-march-2024/?utm_source=chatgpt.com

[17] Anti-triple talaq crusader Shayara Bano gets minister rank in Uttarakhand; https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/anti-triple-talaq-crusader-shayara-bano-gets-minister-rank-in-uttarakhand/articleshow/78783186.cms?utm_source=chatgpt.com&from=mdr

[18] Twitter locks account of True Indology as it exposed NDTV’s distorted claims of communal harmony in Jammu and Kashmir; https://www.opindia.com/2019/01/twitter-locks-account-of-true-indology-as-it-exposed-ndtvs-distorted-claims-of-communal-harmony-in-jammu-and-kashmir/?utm_source=chatgpt.com

[19] Repeated suspension of True Indology from Twitter is symptomatic of a deeper malaise; https://hindupost.in/dharma-religion/true-indology-twitter-suspension-deeper-issues/?utm_source=chatgpt.com

[20] PETA India chooses ‘peace’ this Bakri Eid, stays away from festival shaming unlike during Hindu festivals !; https://sanatanprabhat.org/english/60496.html?utm_source=chatgpt.com

[21] Salman Rushdie’s The Satanic Verses available in India; https://www.thehindu.com/books/salman-rushdies-the-satanic-verses-returns-to-india-after-a-36-year-ban/article69026653.ece#:~:text=It%20was%20banned%20by%20the,following%20furore%20over%20its%20content&text=British%2DIndian%20novelist%20Salman%20Rushdie,by%20the%20Rajiv%20Gandhi%20government.

[22] Charlie Hebdo shooting; https://www.britannica.com/event/Charlie-Hebdo-shooting

[23] Salwan Momika, Iraqi man who burned Quran in Sweden, killed in shooting; https://www.aljazeera.com/news/2025/1/30/iraqi-man-who-burned-quran-in-swedish-protests-shot-dead

Aditi Joshi
Aditi Joshi
Aditi Joshi is a Delhi-based history graduate, researcher, writer, content strategist, and cultural commentator focused on reclaiming Indic civilizational perspectives and historical accuracy. She is the Founder of Itihasdhir (इतिहासधीर), launched in 2023, a platform for thoughtful discussions on Indian history, historians’ influence, book reviews, scholar interviews, and forgotten aspects of Bharat’s past. Currently, she serves as Content Manager at Upword Foundation, contributing to content strategy and creation on cultural, historical, and societal topics aligned with Indic values. An aligned effort of the Upword Foundation and Itihasdhir is a bookclub namely, Bookmarkers. A passionate folklore enthusiast, she is also an artist and translator, blending creativity with scholarship to highlight India’s cultural depth and challenge misrepresentations. Her work addresses colonial distortions of Hindu Dharma, erasure of symbols, caste narratives, and Sanātana traditions’ survival.
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