भारतीय युवा, पहचान की राजनीति और वोकिज़्म का उदय
- वोकिज़्म युवा वर्ग का मतदान जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास खत्म कर देता है, और उन्हें अराजक और विघटनकारी आंदोलनों की ओर खींचता है।
- वोकिज़्म से प्रभावित कई युवा भारतीय मुद्दों को पूरी तरह समझे बिना विरोध प्रदर्शनों में भाग लेते हैं, जैसा कि भारत में सीएए विरोधी और किसानों के विरोध प्रदर्शनों में देखा गया है।
- भारत के शहरी युवा कम्युनिस्ट तंत्र के प्रभुत्व वाले सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के माध्यम से वोक संस्कृति से परिचित होते हैं।
- भारत की शिक्षा प्रणाली, जो पश्चिमी शिक्षाविदों से काफी प्रभावित है, पश्चिम से वोकिज़्म का आयात करती है, जिससे देश के युवा इसकी ज़हरीली संस्कृति के प्रति और भी अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- हिंदू धर्म और संस्कृति का विध्वंस “वोक” तंत्र का अंतिम लक्ष्य है।
- भारत को अपने युवाओं को वोक संस्कृति के हानिकारक प्रभाव से बचाने के लिए अपने ख़ुद के सांस्कृतिक विमर्श का निर्माण करना चाहिए।
भारत में युवाओं की एक बड़ी और गतिशील आबादी है; लगभग 65 प्रतिशत भारतीय 35 वर्ष से कम आयु के हैं। ऐसे समय में जब यूरोप के देश और यहाँ तक कि अमेरिका और चीन जैसे देश भी घटती युवा जनसांख्यिकी और बढ़ती उम्र की आबादी से जूझ रहे हैं, भारत के युवा एक अनिश्चित चौराहे पर खड़े हैं। देश के युवा भारत के लिए बहुमूल्य मानव संसाधन संपदा और चिंता का विषय दोनों हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई उनके साथ कैसे संवाद करता है और उनकी रचनात्मकता और उत्पादकता की असीम क्षमता को किस प्रकार से उपयोग में लाता है।
हालाँकि, मतदान के रुझान बताते हैं कि भारत के युवा राजनीति में रुचि नहीं रखते हैं, कम से कम ऊपरी तौर पर तो नहीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पहली बार मतदान करने वाले भारतीयों में से केवल 38 प्रतिशत – 49 मिलियन में से 18 मिलियन – ने 2024 के राष्ट्रीय चुनावों के लिए पंजीकरण कराया था।[1] यह आश्चर्यजनक है, यह देखते हुए कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों ने युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। फिर भी, यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि युवा भारतीय राजनीति में रुचि नहीं रखते हैं। कई युवा वोक आंदोलन के माध्यम से राजनीति से जुड़ते हैं। वोकिज़्म का सिद्धांत मतदान जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अप्रभावी बताता है और युवाओं को आक्रामक पहचान की राजनीति के माध्यम से बदलाव लाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस मानसिकता ने भारत के युवाओं को अत्यधिक प्रभावित किया है, कई लोग मतदान के बजाय विरोध प्रदर्शन करना पसंद करते हैं।
विरोध प्रदर्शन में शामिल होना स्वाभाविक रूप से गलत नहीं है, लेकिन यह तब समस्याजनक हो जाता है जब इसका कारण गलत हो और इसमें भाग लेने वाले लोग मुद्दे से अनभिज्ञ हों। उदाहरण के लिए, किसानों के विरोध प्रदर्शन और सीएए विरोधी आंदोलनों में युवाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया, लेकिन मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि कई लोगों को मुद्दों की बहुत कम समझ थी।[2]
युवा भारतीय बड़ी संख्या में इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए क्योंकि ऐसा करने से उन्हें ख़ुद को कूल, प्रगतिशील और “वोक” दिखाने का मौक़ा मिला। अगर सीधे शब्दों में समझें तो इस प्रकार के आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर भारत की युवा पीढ़ी दुनिया के सामने अपनी एक ख़ास छवि प्रस्तुत करना चाहती है, और इस छवि के सिद्धांत वोकिज़्म की विचारधारा ने गढ़े हैं।
वोकिज़्म युवाओं को अपनी पहचान को मौलिक रूप से एक नया आयाम देने का एक तरीका प्रदान करता है, साथ ही उन्हें सामाजिक रूप से उपयोगी होने का भ्रम भी देता है। युवा वर्ग स्वाभाविक रूप से आदर्शवादी होता है और कुछ अलग करने के लिए सदा उत्सुकता से ओत प्रोत रहता है। लेकिन वोक तंत्र अक्सर इस आदर्शवाद का फ़ायदा उठा उन्हें एक बड़े नैरेटिव के खेल में मोहरा बना इस्तेमाल करता है। भारत में इस समय बिलकुल यही परिस्थिति है।
सीएए विरोधी प्रदर्शनों (दिसंबर 2019 से फरवरी 2020) के दौरान, जिन्हें अक्सर शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन के रूप में जाना जाता है, वामपंथी-उदारवादी भारतीय मीडिया और पश्चिमी आउटलेट्स ने इन घटनाओं को भारतीय युवाओं के लिए एक निर्णायक क्षण के रूप में बढ़ा चढ़ाकर एक बेहद रागात्मक लहजे में प्रस्तुत किया। विरोध प्रदर्शनों को भारत के “लोकतंत्र” और “धर्मनिरपेक्षता” को बचाने के उद्देश्य से युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों के रूप में चित्रित किया गया। यह विरोध प्रदर्शन भारत में वोक टेम्पलेट को लागू करने की दिशा में पहला बड़ा प्रयोग थे। इसकी सापेक्ष “सफलता” के बाद, अन्य वोक आंदोलन जल्दी ही शुरू हो गए। इन आंदोलनों ने युवाओं की विद्रोही प्रकृति का फायदा उठाकर वैश्विक स्तर पर भारत के बारे में कुछ खास आख्यानों को आगे बढ़ाया, जिससे अंततः सामाजिक अशांति, अराजकता और यहां तक कि भारत के विखंडन की संभावना पैदा हुई।
वोक संस्कृति ने पहले ही भारतीय समाज में गहरी पैठ बना ली है। युवाओं को विभाजनकारी पहचान की राजनीति के अंतहीन भंवर में फेंका जा रहा है, जहां चीजों को आर या पार के बेहद सरलीकृत लहजे से आंका जाता है, और सामाजिक समस्याओं को कुछ इस प्रकार से चित्रित किया जाता है की हिंसा और आक्रामक बयानबाज़ी के माध्यम से ही इनका समाधान संभव है। अगले भाग में, हम “वोक” शब्द की उत्पत्ति और उसके बाद वाम-उदारवादी गुट द्वारा इसके विरूपण और विनियोग की संक्षेप में जांच करेंगे।
“वोक” की उत्पत्ति और विकृति
“वोक” एक ऐसे शब्द का आदर्श उदाहरण है जिसे विकृत किया गया है और उसके मूल संदर्भ से इस हद तक हटा दिया गया है कि, अपने वर्तमान उपयोग में, यह शायद उसी उद्देश्य का गहरा अहित करता है जिसके समर्थन हेतु इस शब्द को ईजाद किया गया था।
“वोक” शब्द मूल रूप से नस्लवाद से लड़ने वाले अश्वेत अमेरिकियों से जुड़ा था।[3] लेकिन अंततः इसे वाम-उदारवादी तंत्र ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया। धीरे-धीरे, यह एक व्यापक छत्र बन गया जिसके तहत कथित अन्याय के सभी रूप और प्रकार एक साथ समाहित हो गए। सबसे पहले, कार्यकर्ता-अकादमिक तंत्र ने इस शब्द को विकृत किया। फिर, कॉर्पोरेट जगत भी इस होड़ में शामिल हो गया। ख़ुद को सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और प्रगतिशील दिखाने के लिए, उन्होंने “वोकनेस” के अपने संस्करण का निर्माण करने हेतु वाम-उदारवादी तंत्र के साथ भागीदारी की, और अक्सर इसे अपनी ब्रांड छवि के हिस्से के रूप में प्रचारित किया।
9 अगस्त, 2014 को मिसौरी के फर्ग्यूसन में 18 वर्षीय अश्वेत व्यक्ति माइकल ब्राउन की पुलिस द्वारा हत्या के बाद 2014 के ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा जिसके फलस्वरूप “वोक” शब्द प्रमुखता से उभरा। ब्राउन, जिसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, निहत्था था, “हालांकि स्थानीय पुलिस ने उस पर गोलीबारी से कुछ क्षण पहले एक सुविधा स्टोर को लूटने का आरोप लगाया था।” “ब्लैक लाइव्स मैटर” आंदोलन ने वोक शब्द का इस्तेमाल एक विशिष्ट संदर्भ में किया, जिसमें नस्लवाद और उससे जुड़ी पुलिस क्रूरता की कड़ी आलोचना की गई। लेकिन ब्राउन की मृत्यु के बाद की अवधि में, “वोक” धीरे-धीरे वामपंथी राजनीतिक विचारधारा के एक प्रकार के प्रचलित शब्द में बदल गया, और पश्चिमी शिक्षाविदों से निकलने वाले सभी प्रकार के सामाजिक विज्ञान सिद्धांत, जैसे कि क्रिटिकल रेस थ्योरी ( आलोचनात्मातक नस्लीय सिद्धांत), इस शब्द पर जबरन थोपे जाने लगे। इस प्रकार, वोक सामाजिक न्याय की राजनीति के संदर्भ में एक स्पष्ट आह्वान बन गया।[4]
“वोक” और “स्टे वोक” वाक्यांश ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के शुरू होने से कई पहले से अश्वेत समुदायों का हिस्सा थे। वोकिज़्म एक अवधारणा के रूप में, 20वीं शताब्दी की शुरुआत से ही सक्रिय था, एक ऐसी अवधारणा जो अश्वेत चेतना के विचार के इर्द-गिर्द घूमती है और वस्तुतः एक अधिक समतावादी समाज के निर्माण हेतु लिए “जागृत” होती है। 1923 में, जमैका के दार्शनिक और सामाजिक कार्यकर्ता मार्कस गार्वे ने वैश्विक अश्वेत नागरिकों को अधिक राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक बनने के लिए एक स्पष्ट आह्वान के रूप में “जागृत” के रूपक का आह्वान किया। इसके अलावा, 20वीं सदी की अश्वेत लोकप्रिय संस्कृति ऐसे उदाहरणों से भरी हुई है, जिसमें “जागृत रहें” शब्द का इस्तेमाल प्रणालीगत नस्लवाद के खिलाफ अश्वेतों के प्रतिरोध का वर्णन करने के लिए किया गया था।[5]
वोक शब्द का इतिहास इससे भी पीछे जाता है। इसका प्रयोग उस परिपेक्ष्य में भी देखने को मिलता है जब 1860 में अब्राहम लिंकन का समर्थन करने वाले गुलामी विरोधी आंदोलन के दौरान उत्तरी अमेरिकी शहरों में “वाइड अवेक” नामक एक युवा उन्मूलनवादी नेटवर्क उभरा। इसके अतिरिक्त, “वोक” शब्द का प्रयोग 1962 के न्यूयॉर्क टाइम्स के शीर्षक, “If You Are Woke You Dig It” में भी दिखाई दिया, जो उपन्यासकार विलियम केली द्वारा अफ्रीकी अमेरिकी मुहावरों पर लिखा गया एक लेख में था।[6]
“वोक” शब्द के संपूर्ण इतिहास की विवेचना इस लेख के दायरे से बाहर है, लेकिन यह पृष्ठभूमि यह समझने में मदद करती है कि कैसे वामपंथी उदारवादी तंत्र ने ब्लैक अमेरिकन नस्लवाद विरोधी सक्रियता में निहित एक शब्द का अपने मतलब के लिये तोड़ मरोड़ कर प्रयोग किया, बल्कि इसे एक प्रकार से हथिया लिया ताकि विभिन्न हानिकारक आख्यानों को आगे बढ़ाया जा सके, यहाँ तक कि भारत जैसे दूर के देशों को भी निशाना बनाया जा सके। भारत में, जाति, लिंग और अल्पसंख्यकों जैसे मुद्दों को शामिल करने के लिए “वोक” को फिर से परिभाषित किया गया है। यह पुनर्व्याख्या लगातार नए “पीड़ित समूह” बनाती है और “गौ रक्षकवाद”, “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” और “उग्र शाकाहार” जैसे शब्दों को पेश करती है। हालाँकि ये श्रेणियाँ आम लोगों को हास्यास्पद लग सकती हैं, लेकिन ये कोई मज़ाक नहीं हैं। भारत में वोकिज्म के खतरनाक रूप से फिर से आकार लेने से इसके युवाओं के गुमराह होने और अंततः राष्ट्र को ही भारी क्षति पहुँचने का खतरा है।
वोकिज्म और भारतीय युवाओं का सांस्कृतिक क्षेत्र
वोकिज़्म, जिसका वामपंथी उदारवादी तंत्र द्वारा नये स्वरूप में विस्तार किया गया, शहरी भारतीय युवाओं के जीवन में गहराई से घुसपैठ कर चुका है, खास तौर पर सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में। दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर जैसे शहरों में 20 की उम्र के छात्रों और युवा पेशेवरों के लिए विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्लबों में शामिल होना आम बात है। कई युवा जो भारतीय शिक्षा या काम के लिए इन बड़े शहरों में आते हैं, स्वाभाविक रूप से कविता समूहों, संगीत क्लबों और थिएटर सोसाइटियों जैसे सांस्कृतिक समूहों की ओर आकर्षित होते हैं। हालाँकि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि ये सांस्कृतिक समूह युवाओं की रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए एक सस्कत माध्यम बनते हैं, सच्चाई यह भी है कि इनमें से कई ग्रुप राजनीतिक प्रचार के लिए सूक्ष्म वाहन बन गए हैं, जिन्हें अक्सर छिपे हुए एजेंडे वाले समूहों द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
जो लोग इस वामपंथी उदारवादी सांस्कृतिक तंत्र से अनभिज्ञ हैं, उन्हें यह बात एक साज़िश की तरह लग सकती है, लेकिन यह सच है। भारत के युवा तेज़ी से वामपंथी और राष्ट्र-विरोधी विचारों के संपर्क में आ रहे हैं, अपने परिवार या दोस्तों के माध्यम से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक स्थानों के माध्यम से। उदाहरण के लिए, दिल्ली जैसे शहरों में, सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा आयोजित अधिकांश सार्वजनिक वार्ता, सेमिनार और चर्चाएँ अक्सर विभाजनकारी और राष्ट्र-विरोधी विचारधाराओं को बढ़ावा देने वाले लोगों के एक ही समूह को बार बार भिन्न भिन्न रूपों में शामिल करती हैं। दिल्ली में कई वर्षों तक पत्रकार के रूप में काम करने के बाद, मैं अपने अनुभव से यह कह सकती हूँ। वामपंथी तंत्र द्वारा नियंत्रित ये सांस्कृतिक स्थान, युवाओं के दिमाग को प्रभावित करते हुए, वोक विचारों का अड्डा बन गये हैं। जो लोग इन समूहों में खुद को शामिल करते हैं, उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे इन ग्रुप्स की राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़ को जोड़ें- हिंदुत्व विरोधी, मोदी विरोधी, इत्यादि। ये स्थान युवाओं को “विरोध” संस्कृति में भी शामिल करते हैं और परिणामस्वरूप, सक्रियता को एक सामाजिक संस्कार में बदल दिया जाता है।
मैंने दिल्ली में कुछ वर्षों तक एक कविता समूह चलाया और प्रत्यक्ष रूप से देखा कि कैसे विभिन्न हित समूहों ने इसमें घुसपैठ कर इस पर अपना वैचारिक आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया। और यही वोक तंत्र की कार्य प्रणाली है। इस वातावरण में प्रवेश करने वाले युवा भारतीयों के लिए, यह अनुभव भारी पड़ सकता है। घर से दूर, वे विचारों की एक इंक़लाबी दिखने वाली दुनिया के संपर्क में आते हैं और इसे गहराई से जाने समझे बिना, इससे अत्यधिक रूप से प्रभावित को वोकिज़्म को अपना लेते हैं। ऐसा करने में, वे अनजाने में अपनी ख़ुद की पहचान, संस्कृति और सभ्यता से नाता तोड़ लेते हैं, यह मानते हुए कि वे किसी बहुत बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन का हिस्सा हैं।
अक्टूबर 2023 में, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने “सांस्कृतिक मार्क्सवादियों और वोक लोगों” की आलोचना की, उन्हें धोखेबाज, भेदभावपूर्ण और स्वार्थी ताकतें कहा जो भारत की संस्कृति और शिक्षा को कमजोर करने, सामाजिक सामंजस्य को बाधित करने और संघर्ष को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा और मीडिया में अपने प्रभाव का उपयोग करते हैं।[7] उन्होंने आगे कहा, “वे मीडिया और शिक्षा जगत पर नियंत्रण कर लेते हैं और शिक्षा, संस्कृति, राजनीति और सामाजिक वातावरण को भ्रम, अराजकता और भ्रष्टाचार में डुबो देते हैं।” [8]
मोहन भागवत ने जो बताया वह वास्तव में भारत के वोक सांस्कृतिक क्षेत्र का सच्चा प्रतिबिंब है। वोक तंत्र व्यवस्थित रूप से हिंदू विरोधी और भारत विरोधी कलाकारों, लेखकों आदि को भारत के “सांस्कृतिक ब्रांड एंबेसडर” के रूप में तैयार करता है, और ऐसे भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी व्यक्ति भारतीय युवाओं के लिए रोल मॉडल बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदू-विरोधी कवि मीना कंदासामी को भारत के शिक्षित युवाओं के बीच बहुत बड़ी संख्या में प्रशंसक प्राप्त हैं। एक भारतीय अंग्रेजी कवि, कंदासामी की प्रसिद्धि का दावा है कि वे अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करती हैं, और इस अपमान को “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” के ख़िलाफ़ विद्रोह के रूप में चित्रित करती हैं। 2022 में, मीना कंदासामी को उनके “समर्पित, मुखर और रोचक ” काम के लिए PEN जर्मनी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[9]
कंदासामी ने वोकिज़्म को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आरोप नहीं लगाने की बात स्वीकार की जिसने उनके साथ छेड़छाड़ की थी, क्योंकि वह एक गैर-ब्राह्मण था, और उसके ख़िलाफ़ आरोप दायर कर वह “ब्राह्मण-पिट्ठू” के रूप में ब्रांडेड नहीं होना चाहती थीं।[10]
वोक तंत्र ने भारतीय संदर्भ में अपने विषैले विमर्श का जाल फैलाने के लिए विशेष रूप से कविता को चुना है। इसने कुछ पक्षपातपूर्ण आख्यानों को बढ़ावा देने और भारत के युवाओं के बीच एक समान दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए कविता की विधा को अपनाया है, कि किन मुद्दों को विरोध के लिए वैध माना जाये और किन मुद्दों को नहीं।
2020 में Livemint द्वारा प्रकाशित एक लेख “भारत के सहस्राब्दी राजनीतिक कवियों” के बारे में बात करता है। देखने वाली दिलचस्प बात यह है कि लेख में शामिल सभी “राजनीतिक” कवियों का वामपंथी, भाजपा-विरोधी राजनीतिक झुकाव है। क्या यह एक संयोग है, या शहरी भारत का वोक कविता क्षेत्र जानबूझकर युवाओं को “वामपंथी” परंपरा में ढाल रहा है? लेख की शुरुआत “हिंदुस्तानी मुसलमान” की कविता पंक्तियों से होती है, कथित तौर पर ये पंक्तियाँ 2019 में सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान वायरल हुई एक कविता से ली गई हैं। लेख आगे “सत्ता-विरोधी काव्य आवाज़ों” के उदाहरण देता है, जिनमें से कुछ को “गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत जेल में डाला गया है या उन पर आरोप लगाए गए हैं।” इस लेख पर एक पूर्ण चर्चा इस लेख के दायरे में नहीं है, लेकिन यह लेख भारत में वामपंथी तंत्र की कार्यप्रणाली का एक आदर्श चित्रण है जो संस्कृति और साहित्य के प्रचार के बहाने युवा भारतीयों को वोक पहचान की राजनीति के भंवर में खींचता है।[11]
शिक्षा जगत में वोकिज्म और भारतीय युवाओं को निशाना बनाना
हमारे पिछले लेखों में से एक में विस्तार से बताया गया था कि कैसे भारत की शिक्षा प्रणाली युवाओं को उनकी अपनी विरासत से व्यवस्थित रूप से अलग-थलग कर देती है। हमने लेख में इस बात पर ज़ोर दिया था कि कैसे भारत के प्रतिष्ठित उदार कला विश्वविद्यालय हार्वर्ड जैसे जाने माने पश्चिमी विश्वविद्यालयों से वोकिज़्म के सिद्धांत का आयात कर रहे हैं। हमने इस बात पर भी चर्चा की कि कैसे भारत में सामाजिक विज्ञान और मानविकी शिक्षा पश्चिमी ढाँचों पर अत्यधिक निर्भर हैं, जो भारतीय संदर्भ पर पश्चिमी सिद्धांतों के सरलीकृत मानचित्रण के माध्यम से भारतीय संस्कृति और समाज की समस्याग्रस्त और पक्षपाती आलोचना प्रस्तुत करती है।[12]
भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में हम जो वोकिज़्म देखते हैं, वह अकादमिक वोकिज्म की ही एक शाखा है। सबसे पहले, यह भारत के प्रतिष्ठित उदार कला विश्वविद्यालय थे, जैसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जो युवाओं के बीच वोक प्रवचन का प्रचार करते हुए वाम-उदारवादी विचारधारा के गढ़ के रूप में कार्य करते थे। धीरे-धीरे, इस पैटर्न में बदलाव देखने को मिला, और भारत में मानविकी और सामाजिक विज्ञान शिक्षा के संदर्भ में वोकिज़्म के प्रचार के संबंध में नए हॉटस्पॉट उभरे।
राजीव मल्होत्रा और विजया विस्वनाथन ने अपनी अभूतपूर्व कृति Snakes in the Ganga में भारत में अशोका विश्वविद्यालय के पारिस्थितिकी तंत्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उनका तर्क है कि अशोका हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित पश्चिमी संस्थानों से वोकिज़्म का आयात करके “हार्वर्ड विश्वविद्यालय के जूनियर पार्टनर” के रूप में कार्य करता है। पुस्तक में एक समर्पित अध्याय अशोका विश्वविद्यालय के फंडिंग नेटवर्क और वैचारिक नींव की खोज करता है, जिसमें बताया गया है कि यह पश्चिमी एजेंडा से प्रेरित सामाजिक विज्ञान सिद्धांतों को कैसे पेश करता है। मल्होत्रा और विस्वनाथन विभिन्न संकाय सदस्यों की पृष्ठभूमि पर भी व्यापक नज़र डालते हैं, उनकी वामपंथी और राष्ट्र-विरोधी विचारधाराओं को उजागर करते हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालय के भीतर वोकिज्म की घुसपैठ में योगदान दिया है।
लेखक आगे तर्क देते हैं कि विविधता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा देने के नाम पर, युवाओं के संवेदनशील दिमागों को बहुत कम उम्र से ही लिंग और कामुकता से संबंधित वोक सिद्धांतों से अवगत कराया जाता है.[13]
वोकिज़्म भारत की स्कूली पाठ्यपुस्तकों में भी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के रूप में प्रवेश कर चुका है, जिसमें लोकतंत्र, मानवाधिकार, समानता, लैंगिक न्याय, सामाजिक सक्रियता, LGBTQ+ के अधिकार, आदि जैसी अवधारणाओं को समझाया गया है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसी अवधारणाओं को छात्रों को समझाने की आवश्यकता है, लेकिन 10-12 साल के बच्चों के संवेदनशील दिमाग को ऐसी संवेदनशील और जटिल श्रेणियों से परिचित कराना निश्चित रूप से समस्याग्रस्त है।
सैन फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय में मीडिया अध्ययन के प्रोफेसर वामसी जुलुरी ने अप्रैल 2024 में एक एक्स थ्रेड चलाया, जिसमें स्कूलों, नागरिक पाठ्यपुस्तकों और बच्चों की किताबों पर ध्यान केंद्रित किया गया ताकि बच्चों को असमानता, सामाजिक न्याय और राजनीतिक सक्रियता के बारे में पढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया जा सके। उन्होंने भारत में कक्षा 7वीं और 8वीं की स्कूली पाठ्यपुस्तकों से उदाहरण लिए, यह स्पष्ट करने के लिए कि कैसे पाठ्यपुस्तकें सामाजिक न्याय, असमानता आदि अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए भारतीय समाज के बारे में भद्दे, सरलीकृत और बिना जानकारी के सामान्यीकरण करके “वोकिज्म” का प्रचार करती हैं।[14]
जब 12-13 साल के बच्चों पर इस तरह की मूल्य-आधारित अवधारणाओं की बौछार की जाती है, तो वे अपने ही समाज और संस्कृति के खिलाफ पक्षपाती हो जाते हैं। समानता और सामाजिक न्याय जैसे विषयों के बारे में पढ़ाने के लिए वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण का उपयोग करने के बजाय, वोकिज्म एक जोड़-तोड़, भावनात्मक रूप से आवेशित और आक्रामक पद्धति का उपयोग करता है, जिसमें तर्कसंगतता का अभाव होता है और अक्सर प्रोपोगंडा तंत्र के हथकंडे अपनाये जाते हैं। जब तक ये बच्चे कॉलेज में प्रवेश करते हैं, तब तक वे प्रगतिशील सामाजिक विज्ञान सिद्धांत के रूप में प्रच्छन्न पहचान की राजनीति और विभाजनकारी वोक प्रवचन के विषाक्त वातावरण के संपर्क में आ जाते हैं। यह वोकिज़्म की गहरी और विनाशकारी दुनिया में भारतीय युवाओं की औपचारिक दीक्षा का मार्ग प्रशस्त करता है।
आज वोकिज़्म के साथ समस्या यह है कि यह युवाओं को अपनी लड़ाई चुनने और स्वतंत्र राय बनाने के लिए आवश्यक आलोचनात्मक सोच कौशल से वंचित करता है। इसके बजाय, यह एक तानाशाह की तरह, समर्थन के लिए कुछ कारणों का एक सेट तय करता है, जबकि कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को अनदेखा करता है। वोक लॉबी एक तरह के प्रवर्तक के रूप में कार्य करती है, जो उन लोगों को शर्मिंदा और लेबल करती है जो इसके पूर्व निर्धारित आख्यान के साथ संरेखित नहीं होते हैं। युवा लोग प्रगतिशील और सामाजिक रूप से जागरूक दिखने के लिए कुछ खास कारणों का समर्थन करने के लिए दबाव महसूस करते हैं।
यह घटना हाल ही में अमेरिका और यूरोप के विश्वविद्यालय परिसरों में फिलिस्तीन के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कई छात्रों में उस मुद्दे की गहरी समझ का अभाव था जिसका वे कथित तौर पर समर्थन कर रहे थे। कुछ ने तो आतंकवादी संगठन हमास का महिमामंडन भी किया, जो संभवतः जानबूझकर समर्थन करने के बजाय अज्ञानता के कारण था।
भारतीय विश्वविद्यालयों के मामले में, फिलिस्तीन के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों के विपरीत, ज़्यादातर सरकार की सख्त निगरानी के कारण सुर्खियों में नहीं आए। हालाँकि, कई प्रसिद्ध भारतीय विश्वविद्यालयों ने वोक टेम्पलेट का पालन किया, जैसे कि चुपचाप प्रतिरोध का समर्थन किया गया हो।
मई 2024 में The Diplomat द्वारा प्रकाशित एक लेख “फिलिस्तीन के साथ नई दिल्ली की शांत छात्र एकजुटता” पर विस्तार से बताता है। लेख में दावा किया गया है कि चूंकि भारत में फिलिस्तीन समर्थक छात्र विरोधों को “तेजी से दबा दिया गया”, इसलिए भारतीय राजधानी दिल्ली में छात्रों ने अपनी असहमति दर्ज करने के लिए अपरंपरागत तरीके अपनाए- भित्तिचित्र, पोस्टर अभियान, बहिष्कार आंदोलन, आदि। लेख में दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे विश्वविद्यालयों में असंतोष के इन कृत्यों के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह भारत में छात्र विरोध पारिस्थितिकी तंत्र के शैक्षणिक गठजोड़ को काफी हद तक सारांशित करता है। छात्र अक्सर “राजनीतिक रूप से इच्छुक” संकाय सदस्यों के प्रभाव में विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो जाते हैं। सामाजिक विज्ञान, मानविकी और उदार कला के छात्रों के लिए, ऐसे “विरोध” और “सामाजिक आंदोलन” को सामाजिक विज्ञान सिद्धांतों के वास्तविक जीवन के अनुप्रयोगों के रूप में देखा जाता है, जिनका वे कक्षा में अध्ययन करते हैं। इस तरह से वोकिज्म शिक्षा जगत को घेर लेता है, और अपने व्यापक कथात्मक खेल में भारतीय युवाओं का महज़ मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करता है।[15]
अंततः हिंदू धर्म और संस्कृति पर निशाना साधता वोकिज़्म
अंततः, हिंदू धर्म और संस्कृति वोकिज़्म के मुख्य लक्ष्य हैं। अपने वर्तमान स्वरूप में, वोकिज्म द्वारा अक्सर हिंदू धर्म का बेहद नकारात्मक और वीभत्स चित्रण किया जाता है, जो एक गहरी चिंता का विषय है। अमेरिकी शिक्षा जगत से उभरने वाली क्रिटिकल रेस थ्योरी जैसी सैद्धांतिक अवधारणाएँ “नस्ल” और “जाति” का परस्पर उपयोग करती हैं। इससे भी बदतर, वे सुझाव देते हैं कि “जाति” सभी प्रकार के उत्पीड़न और भेदभाव का मूल कारण है, जिसका अर्थ है कि तथाकथित “उच्च जाति के हिंदू” वैश्विक अन्याय के लिए जिम्मेदार हैं।
यह जाति विमर्श हर मुद्दे पर जबरदस्ती लागू किया जा रहा है, चाहे वह समानता का मुद्दा हो, सामाजिक न्याय का , लैंगिक समानता का मुद्दा हो या मानवाधिकार। वोकिज़्म हिंदू विरोधी चश्मे के माध्यम से कई सामाजिक मुद्दों को नये सिरे से परिभाषित कर रहा है। नतीजतन, भारत में युवा लोग जो हिंदू मुद्दों के लिए बोलते हैं या हिंदू संस्कृति पर गर्व व्यक्त करते हैं, उन्हें वोक तर्क सिद्धांत द्वारा स्वचालित रूप से इस्लामोफोबिक यानाई इस्लाम विरोधी, पितृसत्तात्मक, समलैंगिकता-विरोधी और सामाजिक रूप से प्रतिगामी के रूप में लेबल किया जाता है।
यही समस्या का मूल है। भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में वोकिज़्म की घुसपैठ के कारण युवा वर्ग इन लेबलों को स्वीकार करने के लिए दबाव महसूस कर रहा है। यह उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता की जड़ों से दूर कर रहा है, जिससे वे अपनी विरासत से और दूर हो रहे हैं।
भारत का हिन्दू युवा वर्ग अपनी सांस्कृतिक और सभ्यतागत जड़ों के प्रति अति-क्षमाशील “अपराधबोध की राजनीति” की ओर तेज़ी से अग्रसर हो रहा है। पश्चिमी शिक्षाविदों, मीडिया और बौद्धिक संस्थान तंत्र ने “हिंदू धर्म” और हिंदुत्व के बीच एक मनमाना द्वंद्व पैदा कर दिया है, जिसमें यह संकेत दिया गया है कि अच्छे हिंदू निजी क्षेत्र में अपने धर्म का पालन करते हैं और शांतिपूर्ण प्राणी हैं, जबकि “हिंदुत्व” मानने वाले लोग असहिष्णु हैं और राजनीतिक परेशानी पैदा करते हैं। इस शातिर विमर्श को भारत के प्रतिष्ठित उदार कला विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक तंत्र के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है। उदार मीडिया भी इसी विमर्श का अनुसरण करता है, और इस प्रकार, इससे पहले कि वे यह समझें कि क्या हो रहा है, शिक्षित भारतीय युवा पहले से ही अपने धर्म और संस्कृति के प्रति एक बारहमासी अपराध बोध में डूब जाते हैं।
इस अराजकता का समाधान क्या है? इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं है, लेकिन यही सही समय है कि भारत अपने समाज और संस्कृति को लेकर एक रचनात्मक प्रति-विमर्श की संरचना करे जिसमें देश के युवाओं को बौद्धिक और रचनात्मक रूप से शामिल किया जाये:
भारत को शिक्षा, विनियमन, जागरूकता और सदियों से राष्ट्र को एक साथ रखने वाले मूल्यों को संरक्षित करने के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता को शामिल करते हुए अपना स्वयं का स्वतंत्र कथानक बुनना चाहिए। यह एक नाज़ुक संतुलनकारी कार्य है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत आने वाले वर्षों तक जीवित और अक्षुण्ण रहे। इस प्रयास में, यह ज़रूरी है कि भारत वोक विमर्श की विभाजनकारी और एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों का शिकार न हो, बल्कि इसके बजाय एक ऐसा मार्ग तैयार करे जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का उत्सव मनाते हुए एकता, समावेशिता और प्रगति को बढ़ावा दे![16]
संदर्भ
[1] Why Indian youth is not at the polls: no desire to be part of the solution | The Indian Express; https://indianexpress.com/article/opinion/columns/why-indian-youth-is-not-at-the-polls-no-desire-to-be-part-of-the-solution-9319098/
[2] Politics and Instagram generation: Of memes, misinformation and whole lot of misguided youth; https://www.opindia.com/2020/07/instagram-memes-misinformation-jokes-woke-generation-politics/
[3] Where “woke” came from and why marketers should think twice before jumping on the social activism bandwagon; https://theconversation.com/where-woke-came-from-and-why-marketers-should-think-twice-before-jumping-on-the-social-activism-bandwagon-122713
[4] What is woke: How a Black movement watchword got co-opted in a culture war | Vox; https://www.vox.com/culture/21437879/stay-woke-wokeness-history-origin-evolution-controversy
[5] Ibid.
[6] A Brief History of Wokeism- Open the Magazine; https://openthemagazine.com/cover-story/a-brief-history-of-wokeism/#goog_rewarded
[7] Mohan Bhagwat: cultural Marxists, ‘woke people’ spoiling India’s ethos | Nagpur News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/cultural-marxists-woke-people-spoiling-indias-ethos-rss-chief/articleshow/104681467.cms
[8] ‘Woke Claim To Work for Lofty Goals, But Real Aim Is..’: RSS Chief Mohan Bhagwat; https://www.ndtv.com/india-news/woke-claim-to-work-for-lofty-goals-but-real-goal-is-rss-chief-mohan-bhagwat-4508902
[9] German embassy honors controversial Hindu-bashing Meena Kandasamy, who kept quiet about sexual harassment by fellow leftist; https://hindupost.in/world/german-embassy-honours-hindu-bashing-kandasamy/
[10] Dravidian Stock Writer Meena Kandasamy Shoots Herself In The Foot, Admits Protecting Her Molester Because He Was Non-Brahmin – The Commune; https://thecommunemag.com/dravidian-stock-writer-meena-kandasamy-shoots-herself-in-the-foot-admits-protecting-her-molester-because-he-was-non-brahmin/
[11] Meet India’s millennial political poets | Mint Lounge; https://lifestyle.livemint.com/news/big-story/meet-india-s-millennial-political-poets-111601292201092.html
[12] Unveiling the Biases in Indian Education: How it Alienates Youth from their Own Heritage – Hindu Dvesha; https://stophindudvesha.org/unveiling-the-biases-in-indian-education-how-it-alienates-youth-from-their-own-heritage/
[13] Snakes in the Ganga by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan, Ch 19. Ashoka University, Harvard University’s Junior Partner, p. 517-563.
[14] Is the import of wokeism in Bharatiya school textbooks a worrying trend?; https://hindupost.in/society-culture/is-the-import-of-wokeism-in-bharatiya-school-textbooks-a-worrying-trend/
[15] New Delhi’s Quiet Student Solidarity With Palestine – The Diplomat; https://thediplomat.com/2024/05/new-delhis-quiet-student-solidarity-with-palestine/
[16] Awakening India: Navigating Woke Narratives and Culture Wars in the pursuit of Narrative Sovereignty – Chintan; https://chintan.indiafoundation.in/articles/awakening-india-navigating-woke-narratives-and-culture-wars-in-the-pursuit-of-narrative-sovereignty/
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