भारत का इतिहास, भारत की दृष्टि: वामपंथी नियंत्रण से मुक्ति की ओर
- 2000 के शुरुआती वर्षों में एनसीईआरटी (NCRT) किताबों में बदलाव को वामपंथी इतिहासकारों और मीडिया ने ‘सांप्रदायिक’ कहा, जबकि यह उपनिवेशी सोच से मुक्ति और भारत-केंद्रित इतिहास का प्रयास था।
- रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब और आर.एस. शर्मा जैसे कुछ प्रभावशाली मार्क्सवादी इतिहासकारों ने दशकों तक पाठ्यक्रम और संस्थानों पर नियंत्रण रखा, जिसमें धर्म और परंपरा को हाशिए पर रखा गया।
- जातिवाद और मांसाहार जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई, लेकिन इस्लामी आक्रमण, मंदिर विध्वंस और जबरन धर्मांतरण को या तो छिपाया गया या नरम करके पेश किया गया।
- इनका इतिहास लेखन औपनिवेशिक पूर्वग्रहों पर आधारित रहा—हिंदू उपलब्धियों की अनदेखी हुई, जबकि इस्लामी शासकों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया; भारतीय विचारकों को दरकिनार किया गया।
- यह लेख इन इतिहासकारों की आलोचना का उत्तर देता है और दिखाता है कि कैसे वे नई खोजों को नकारते हैं। यह भारत के इतिहास को संतुलित, बहुपक्षीय और परंपरा-सम्मत दृष्टिकोण से लिखने की मांग करता है।
भारत को अपना अतीत कैसे याद रखना चाहिए और बच्चों को क्या पढ़ाया जाए — इस पर लंबे समय से बहस चल रही है। एनसीईआरटी किताबों में 2000 के दशक में हुए बदलाव दरअसल भारतीय शिक्षा व्यवस्था में मौजूद गहरे वैचारिक मतभेदों को उजागर करते हैं। जिसे ‘सांप्रदायिकरण’ कहा गया, वह असल में भारत के इतिहास लेखन को औपनिवेशिक और मार्क्सवादी प्रभाव से मुक्त करने की एक कोशिश थी।
यह लेख बताता है कि ये बदलाव विकृति नहीं थे, बल्कि इतिहास लेखन पर दशकों से चले आ रहे मार्क्सवादी-नेहरूवादी वर्चस्व को संतुलित करने की पहल थे। और, यह लेख पाठ्यपुस्तक सुधारों, संस्थागत नियंत्रण और वैश्विक उदाहरणों की चर्चा के साथ यह मांग करता है कि भारत के इतिहास को अधिक स्थानीय, बहुविध और धर्मनिष्ठ तरीके से बताया जाए — ताकि यह देश की चेतना को अपनी असली जड़ों से जोड़ सके।
भारतीय चेतना की पुनर्प्राप्ति का युद्ध
2000 के शुरुआती वर्षों में एनसीईआरटी द्वारा स्कूली पाठ्यपुस्तकों को दोबारा लिखने की प्रक्रिया ने देश में एक तीव्र विवाद खड़ा कर दिया। प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार जैसे रोमिला थापर, इरफान हबीब और बिपिन चंद्र ने इस कदम की कड़ी आलोचना की और उस समय की भाजपा सरकार पर शिक्षा को ‘तालिबानीकरण’ करने का आरोप लगाया, जो एक ऐसा शब्द है जो वैचारिक चरमपंथ और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के सबसे गंभीर आरोपों से जुड़ा था (Mukherjee & Mukherjee, 2001)[1]। नेशनल मीडिया, खासकर इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबारों ने तीखे संपादकीय लिखकर यह आशंका जताई कि भारत की बहुलतावादी परंपरा पर एक सांप्रदायिक एजेंडे के नाम पर हमला हो रहा है।
लेकिन इन बहसों और आरोपों के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा रहा, जिसे अनदेखा कर दिया गया — क्या आज़ाद भारत को अपना अतीत अपनी नजर से देखने का हक़ नहीं है? जिसे ‘सांप्रदायिक’ कहा गया, वह दरअसल नेहरूवादी और मार्क्सवादी इतिहास के दबदबे को खत्म करने की ज़रूरी कोशिश थी। यह कोई धोखा नहीं, बल्कि ज्ञान की आज़ादी और सभ्यतागत आत्मनिर्भरता की मांग थी — जिससे भारत का इतिहास विदेशी नजरिए से नहीं, अपनी परंपरा के आधार पर लिखा जा सके। इसका विरोध किसी गलती के खिलाफ नहीं, बल्कि विचारधारा की सत्ता को चुनौती देने के कारण हुआ।
भारतीय इतिहास पर मार्क्सवादी-नेहरूवाद का शिकंजा
स्वतंत्रता के बाद भारत में मार्क्सवादी इतिहासकारों का एक प्रभावशाली समूह उभरा, जिसने दशकों तक एनसीईआरटी, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) और विश्वविद्यालयों के इतिहास विभागों जैसे सरकारी संस्थानों के माध्यम से अपने दृष्टिकोण को संस्थागत रूप दिया। इस समूह में रोमिला थापर, आर.एस. शर्मा, सतीश चंद्र और इरफान हबीब जैसे प्रमुख नाम शामिल थे। इनका दृष्टिकोण मुख्यतः भौतिकवादी (materialist) था, जिसमें भारत के धार्मिक, सभ्यतागत या धर्म आधारित पहलुओं को या तो नज़रअंदाज़ किया गया या हाशिए पर डाल दिया गया।
हालांकि ये इतिहासकार अपने नजरिए को ‘वैज्ञानिक’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताते थे, लेकिन इनकी सोच नेहरूवादी समाजवाद से प्रभावित थी। इनके इतिहास लेखन में अक्सर अंग्रेज़ इतिहासकार जेम्स मिल जैसे लोगों की बनाई उपनिवेशकालीन धारणाएं झलकती थीं — जैसे भारत को धार्मिक टकरावों और सामाजिक पिछड़ेपन से भरी हुई सभ्यता बताना। अरुण शौरी ने Eminent Historians (1998)[2] में बताया कि इन इतिहासकारों के एक छोटे समूह ने नियुक्तियों, फंड और किताबों के पाठ्यक्रम पर ऐसा कब्ज़ा कर लिया कि बाकी विचारों के लिए जगह ही नहीं बची — पूरा इतिहास एक ही सोच के हिसाब से गढ़ा जाने लगा।
पक्षपाती सेक्युलरिज़्म और निष्पक्षता का भ्रम
मार्क्सवादी इतिहासकार खुद को तटस्थ और तार्किक बताते थे, लेकिन वे जानबूझकर चुनिंदा बातें बताते थे जिससे उनका झुकाव साफ नज़र आता है। उन्होंने इस्लामी आक्रमणों को “राजनीतिक विस्तार” कहा और मंदिरों की तोड़फोड़ को “पुराने मंदिरों का दोबारा इस्तेमाल” कहकर ढकने की कोशिश की (थापर, 2001)। वहीं, वैदिक युग को कभी कहानी तो कभी धर्म की सत्ता बताया गया, और हिंदू प्रतीकों को बस अध्ययन की वस्तु की तरह पेश किया गया।
प्रो. रोमिला थापर ने शतपथ ब्राह्मण और वसिष्ठ धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों के आधार पर प्राचीन भारत में गोमांस भक्षण को पाठ्यक्रम में शामिल करने की जोरदार मांग की। उन्होंने इसे ‘समीक्षात्मक शिक्षा’ कहा (थापर, 2001)[3]। लेकिन जब बात इस्लामी शासकों की बर्बरता की आती है—जैसे सोमनाथ मंदिर विध्वंस, टीपू सुल्तान का अत्याचार या औरंगज़ेब के ज़बरन धर्मांतरण, तो उनकी वह वैज्ञानिक दृष्टि कहीं गायब सी हो गई।
इरफ़ान हबीब (2001[4]) ने तो हर वैकल्पिक दृष्टिकोण को ‘झूठा इतिहास’ कहकर खारिज कर दिया, जबकि वे खुद आर्य आक्रमण सिद्धांत के पक्षधर रहे — जिसे अब डीएनए शोध (Shinde et al., 2019)[5] ने चुनौती दी है।
धर्मनिरपेक्षता की आड़ में औपनिवेशिक सोच
भारतीय मार्क्सवादी इतिहास लेखन की विडंबना यह रही कि उसने उपनिवेशकालीन मानसिकता को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर आगे बढ़ाया। जेम्स मिल द्वारा बनाई गई भारत की तीन कालों वाली विभाजन पद्धति — हिंदू, मुस्लिम, ब्रिटिश — जिसका उद्देश्य था हिंदुओं को पिछड़ा, मुस्लिमों को तानाशाह और अंग्रेज़ों को उद्धारक दिखाना — वही ढांचा मार्क्सवादी इतिहासकारों ने अपना लिया।
इन्होंने भारत की सभ्यतागत निरंतरता को नकारा, भगवान राम को मिथक कहा और धर्म आधारित परंपराओं को ‘ब्राह्मणवादी वर्चस्व’ तक सीमित कर दिया। अकबर की उदारता की प्रशंसा की, पर शिवाजी, महाराणा प्रताप, लचित बोरफुकन और रानी दुर्गावती जैसे वीरों को नज़रअंदाज़ किया।
इसी तरह विवेकानंद, श्री अरबिंदो, के.एम. मुंशी और धरमपाल जैसे राष्ट्रवादी चिंतकों के योगदान को भी हाशिए पर रखा गया। धरमपाल की किताब The Beautiful Tree (1983)[6], जो उपनिवेश-पूर्व भारतीय शिक्षा पर आधारित है, इन औपनिवेशिक और मार्क्सवादी झूठों का सशक्त खंडन करती है।
इतिहास लेखन पर उठे सवालों का जवाब
एनसीईआरटी बदलावों का सबसे ज़्यादा विरोध उन्हीं लोगों ने किया जो वर्षों से मार्क्सवादी-नेहरूवादी विचारधारा से शिक्षा व्यवस्था को चलाते रहे। इनके तर्क गंभीर लगते हैं, लेकिन जब इन्हें विस्तार से परखा जाए, तो इनमें से कई दावे आधारहीन साबित होते हैं। यह अनुभाग उन्हीं तर्कों का क्रमबद्ध उत्तर देता है।
रोमिला थापर: “सांप्रदायिक एजेंडा इतिहास नहीं बन सकता”
रोमिला थापर ने एनसीईआरटी की बदली किताबों की कड़ी आलोचना की है और पहले से चली आ रही अकादमिक सोच का समर्थन किया है। उनका कहना है कि इन बदलावों से इतिहास के नाम पर साम्प्रदायिक सोच को बढ़ावा दिया गया है। उनके अनुसार, गोमांस भक्षण और जातिवाद जैसे विषयों को हटाना ठीक नहीं था क्योंकि ये इतिहास को समझने के लिए ज़रूरी हैं। ऐसा करना किताबों की गंभीरता और सच्चाई को नुकसान पहुंचाता है।
प्रतिउत्तर
थापर ने बृहदारण्यक उपनिषद और शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथों के आधार पर गोमांस सेवन के ज़िक्र को पाठ्यक्रम में रखने की बात कही, जो ग्रंथों के स्तर पर सही है। लेकिन उनका गुस्सा चुनिंदा विषयों पर ही केंद्रित होता है, जो उनके वैचारिक पक्षपात को दिखाता है। जब बात हिंदू समाज की अंदरूनी आलोचना की हो — जैसे जातिवाद या सामाजिक बुराइयों की — तो वे मुखर हो जाती हैं। लेकिन जब विषय इस्लामी आक्रमण, मंदिरों की तोड़फोड़ या जबरन धर्मांतरण का होता है, तो उनकी आलोचना या तो बेहद हल्की हो जाती है या पूरी तरह से गायब हो जाती है।
मुद्दा यह नहीं कि गोमांस या जातिवाद पर चर्चा क्यों हुई, बल्कि यह है कि आलोचना का दृष्टिकोण केवल हिंदू समाज पर ही क्यों लगाया गया। बार-बार हिंदू परंपराओं को एक सामाजिक प्रयोग की तरह पेश किया गया, जहां असमानता और हिंसा को उजागर किया गया। इसके उलट, इस्लामी शासकों और उनके धार्मिक प्रभावों को “गंगा-जमुनी तहज़ीब” या “संस्कृतिक मेल” जैसे शब्दों में ढंका गया।
यही पक्षपाती इतिहास दशकों तक भारत की मुख्यधारा की कथा बनता रहा — कुछ विचारधाराओं को ऊँचा दिखाया गया और कुछ को दबा दिया गया। यही सोच भारत के इतिहास के डीकॉलोनाइज़ेशन यानी उपनिवेशी सोच से मुक्ति के प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। अगर सच में निष्पक्ष इतिहास लेखन चाहिए, तो हर अध्याय — चाहे वह देशी हो या विदेशी — पर एक जैसे कठोर सवाल उठने चाहिएँ। बिना वैचारिक झुकाव के ही इतिहास सही मायनों में आत्म-चेतना की नींव बन सकता है, न कि प्रचार का औजार।
बिपिन चंद्र: “ऐतिहासिक भूलें”
बिपिन चंद्र एनसीईआरटी की किताबों में एनडीए सरकार द्वारा किए गए बदलावों के सबसे तीखे आलोचकों में थे। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संशोधनों में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर एक तंग और साम्प्रदायिक सोच को बढ़ावा दिया गया। उनके अनुसार, इससे न सिर्फ देश की धर्मनिरपेक्ष नींव कमजोर होती है, बल्कि वह शैक्षणिक गुणवत्ता भी प्रभावित होती है जो सालों की मेहनत से बनी थी। बिपिन चंद्र के लिए ‘धर्मनिरपेक्ष’ इतिहास केवल एक विधि नहीं, बल्कि साम्प्रदायिकता को रोकने का एक ज़रूरी सुरक्षा कवच है। उनका मानना था कि इस दिशा से हटना स्वतंत्र भारत की बहुलतावादी सोच और सामाजिक समरसता के लिए ख़तरनाक हो सकता है।
प्रतिउत्तर
लेकिन बिपिन चंद्र जिस ‘धर्मनिरपेक्ष’ इतिहास परंपरा का कड़ा बचाव करते हैं, वह अपने अंदर मौजूद कई पक्षपातों को नज़रअंदाज़ कर देती है — जैसे मुग़ल दौर के अत्याचारों को कम करके दिखाना और इस्लामी कला, शासन और संस्कृति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, जबकि हिंदू सभ्यता के नायकों के संघर्ष और योगदान को पाठ्यक्रम में पीछे धकेल देना। उदाहरण के लिए, अकबर को धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का आदर्श बताकर महिमामंडित किया गया, लेकिन महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोबिंद सिंह जैसे प्रतिरोध के प्रतीकों को या तो नज़रअंदाज़ किया गया या फिर मामूली भूमिका में दिखाया गया।
इस तरह की एकतरफा प्रस्तुति इतिहास में एक विकृत नैतिक क्रम बना देती है — मुस्लिम शासकों को उदार बताकर ऊँचा दर्जा दिया जाता है, जबकि विदेशी सत्ता के खिलाफ लड़े हिंदू नायकों की वीरता और बलिदान को कम महत्व मिलता है। ऐसा इतिहास न सिर्फ सच को बिगाड़ता है, बल्कि देशी समाज के आत्मगौरव और स्वाभिमान को भी कमजोर करता है। इसमें हमलावरों को दयालु बताकर दिखाया जाता है, जबकि प्रतिरोध करने वालों को संकीर्ण सोच का बताया जाता है।
आख़िर में, बिपिन चंद्र की आलोचना इस मूल बात से मुंह मोड़ लेती है कि सच्चा अकादमिक दृष्टिकोण वह होता है जो हर पक्ष का निष्पक्ष और संतुलित मूल्यांकन करे। असली समस्या यह नहीं कि कुछ कड़वे तथ्य सामने लाए जा रहे हैं, बल्कि यह है कि उनके अपने विचारधारा वाले खेमे ने जानबूझकर कई तथ्यों को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया — जिससे भारत का इतिहास अधूरा और पक्षपाती बनकर रह गया।
इरफ़ान हबीब: “संघ परिवार द्वारा इतिहास का पुनर्लेखन”
इरफ़ान हबीब, जो भारत के प्रमुख मार्क्सवादी इतिहासकारों में गिने जाते हैं, वर्षों से यह चेतावनी देते आ रहे हैं कि संघ परिवार इतिहास को “सांप्रदायिक” रंग दे रहा है। उनका मानना है कि सरस्वती सभ्यता और वैदिक विज्ञान जैसे विषयों को बढ़ावा देना एक झूठे और कल्पित अतीत को गढ़ने की कोशिश है। वे इन प्रयासों को अवैज्ञानिक बताते हैं और कहते हैं कि इससे इतिहास में वैज्ञानिक सोच और धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुंचता है। उनके अनुसार, यह प्रवृत्ति इतिहास को एक धार्मिक-राष्ट्रवादी कल्पना में बदल रही है, जो गंभीर शोध की जगह भावना और विचारधारा को रखती है।[7]
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लेकिन हबीब की यह कठोर आलोचना आज के बहुआयामी वैज्ञानिक शोधों को नज़रअंदाज़ करती है — जिनमें पुरातत्व, भूविज्ञान, जलविज्ञान और सैटेलाइट इमेजिंग शामिल हैं। ये शोध उन विषयों को, जिन्हें पहले ‘मिथक’ माना गया था, अब ठोस वैज्ञानिक आधार दे रहे हैं। वसंत शिंदे[8] जैसे पुरातत्वविद् और राजेश पी.एन. राव जैसे कंप्यूटेशनल भाषाविदों ने कई ऐसे प्रमाण पेश किए हैं जो दिखाते हैं कि घग्घर-हकरा क्षेत्र में कभी हिमालय से निकलने वाली एक बड़ी नदी बहती थी — जिसे ऋग्वेद में सरस्वती कहा गया है। इन निष्कर्षों से वैदिक और हड़प्पा सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक निरंतरता की संभावना को बल मिलता है, और साथ ही उस आर्य आक्रमण सिद्धांत को भी गंभीर चुनौती मिलती है जो हबीब की वैचारिक सोच का आधार रहा है। यह सिद्धांत अब कई वैज्ञानिक शोधों के बाद अकादमिक दुनिया में लगभग खारिज हो चुका है, लेकिन फिर भी इसका उपयोग पुराने वैचारिक ढांचे को बचाने के लिए किया जा रहा है।
हबीब का इन नए प्रमाणों से दूरी बनाए रखना यह दिखाता है कि वे वैज्ञानिक सोच की रक्षा नहीं, बल्कि एक जमी हुई विचारधारा को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे दूसरों पर इतिहास का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन खुद उनके दशकों से वामपंथी संस्थानों जैसे ICHR में सक्रिय रहने और मार्क्सवादी झुकाव के कारण उनका तटस्थता का दावा अब अविश्वसनीय लगता है। उनका इतिहास लेखन एक कठोर भौतिकवादी ढांचे में बंधा हुआ है, जो ऐसे नए प्रमाणों के लिए जगह नहीं छोड़ता जो उनकी स्थायी धारणाओं को चुनौती देते हैं।
साथ ही, हबीब द्वारा बार-बार भारत में ‘सभ्यतागत निरंतरता’ को नकारना — खासकर यह मानने से इनकार करना कि वैदिक संस्कृति की जड़ें भारत में हो सकती हैं — यह दर्शाता है कि वे ऐसे दृष्टिकोणों से असहज हैं जो भारतीय आत्मगौरव को बढ़ावा देते हैं। वे आधुनिक तकनीकी और पुरातात्विक शोधों के आधार पर प्रमाणों की पुनर्व्याख्या करने से बचते हैं, क्योंकि वे उस औपनिवेशिक सोच से बंधे हैं जो भारत के अतीत को केवल विघटन, अंधविश्वास और बाहरी प्रभावों के रूप में देखती है।
इस संदर्भ में जब हबीब सरस्वती नदी पर हो रहे शोध को ‘छद्म-विज्ञान’ कहकर खारिज करते हैं, तो यह खराब शोध की आलोचना नहीं, बल्कि ‘बौद्धिक पहरेदारी’ का एक प्रयास लगता है — ताकि मार्क्सवादी इतिहास लेखन के लंबे चले वर्चस्व को कोई चुनौती न दे सके। सच्ची अकादमिक ईमानदारी यही है कि नए प्रमाणों के लिए मन खुला रखा जाए, न कि विचारधारा की रक्षा को ‘शोध पद्धति’ का नाम देकर ढका जाए।
आर. एस. शर्मा: “सांप्रदायिक सोच को इतिहास नहीं कहा जा सकता”
स्वर्गीय आर. एस. शर्मा, भारतीय मार्क्सवादी इतिहास लेखन के प्रमुख चेहरों में से एक थे। उन्होंने एनडीए सरकार के कार्यकाल में एनसीईआरटी की किताबों में हुए बदलावों का अपनी किताब Communalism and History Textbooks में तीव्र विरोध किया। शर्मा के अनुसार, नया पाठ्यक्रम एक पक्षपाती और सांप्रदायिक नजरिया पेश करता है — जिसमें मध्यकालीन मुस्लिम शासकों को भारत की लगभग हर ऐतिहासिक समस्या का दोषी ठहराया गया, और हिंदू नायकों को बिना आलोचनात्मक मूल्यांकन के महिमामंडित किया गया। उन्होंने इस बदलाव को धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक इतिहास से एक खतरनाक पीछे की ओर कदम बताया।
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शर्मा की आलोचना एक गलत धारणा पर आधारित है — कि इस्लामी शासकों की हिंसा या साम्प्रदायिक नीतियों को स्वीकारना ही सांप्रदायिकता कहलाता है। यह सोच कि किसी तथ्य को छुपाना ‘धर्मनिरपेक्षता’ है और उसे सामने लाना ‘सांप्रदायिकता’, बौद्धिक ईमानदारी के खिलाफ है। जिन बातों को शर्मा और उनके साथियों ने ‘सांप्रदायिक इतिहास’ कहकर नकारा, वे वही घटनाएं हैं जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास से या तो हटाया गया या कमज़ोर कर दिया गया।
कई ऐतिहासिक घटनाएं — जैसे महमूद ग़ज़नी द्वारा मंदिरों का विध्वंस, अलाउद्दीन खिलजी की हिंसक फौजी नीति, या टीपू सुल्तान द्वारा कूर्ग और मालाबार में हिंदुओं और ईसाइयों पर अत्याचार — सिर्फ दंतकथाएँ नहीं हैं। इनका उल्लेख फारसी इतिहास-लेखन, यूरोपीय यात्रियों की रिपोर्टों, मंदिरों के शिलालेखों और स्थानीय परंपराओं में मिलता है। इन साक्ष्यों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हटाना, छात्रों को उनके अतीत की पूरी तस्वीर से वंचित करता है।
शर्मा ने हिंदू नायकों के अधिक महिमामंडन पर असहजता जताई, लेकिन यह नजरअंदाज़ किया कि महाराणा प्रताप, शिवाजी और गुरु गोबिंद सिंह केवल राष्ट्रवादी प्रतीक नहीं थे — वे विदेशी सत्ता के विरुद्ध सभ्यतागत संघर्ष, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक रक्षा के प्रतीक थे। इनका पाठ्यपुस्तकों में स्थान किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृति का मूल भाग है, जिसे लंबे समय तक इसलिए दबाया गया क्योंकि इतिहास की धारा में आक्रमणकारियों को केंद्र में रखा गया, और प्रतिरोध को किनारे कर दिया गया।
इन प्रसंगों को ‘सांप्रदायिक’ कह देना, सच्चाई को नफरत बताने जैसा है। इतिहास की ईमानदारी का मतलब यह नहीं कि किसी समुदाय को दोषी ठहराया जाए, लेकिन यह ज़रूरी है कि असहज तथ्यों का भी सामना किया जाए। इन घटनाओं को किताबों में लौटाना कोई विकृति नहीं, बल्कि एक ज़रूरी पुनर्स्थापन है — जिससे इतिहास को संतुलित, व्यापक और वस्तुनिष्ठ रूप में समझा जा सके। इसमें न किसी को देवता बनाना है, न राक्षस — बल्कि सबको उनके समय और संदर्भ में समझना है।
‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर इस्लामी दौर की हिंसा को छुपाने की ज़िद खुद अकादमिक निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाती है। असली धर्मनिरपेक्ष इतिहास वही है जो अतीत की हर परत को निष्पक्षता से देखे — न कि अपनी विचारधारा के मुताबिक कुछ तथ्यों को दबा दे।
सतीश चंद्र: गुरु तेग़ बहादुर का बलिदान
सतीश चंद्र द्वारा गुरु तेग़ बहादुर की औरंगज़ेब के आदेश से हुई हत्या का चित्रण इस बात का उदाहरण है कि मुख्यधारा इतिहास लेखन में किस तरह वैचारिक सफाई (sanitization) की जाती है। उन्होंने इस घटना के धार्मिक पक्ष को स्वीकार करने के बजाय इसे सिर्फ एक राजनीतिक साज़िश के रूप में दिखाया — जिससे इस बलिदान की आध्यात्मिक और सभ्यतागत महत्ता पूरी तरह दबा दी गई। इस तरह का ‘रिविज़निस्ट’ तरीका धार्मिक अत्याचार को राजनीतिक संघर्ष बना देता है, और धर्म के लिए दिए गए प्रतिरोध को केवल सत्ता की लड़ाई की तरह सीमित कर देता है।
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गुरु तेग़ बहादुर का बलिदान सिर्फ सिख इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक परंपरा की रक्षा के लिए दिया गया एक महान त्याग है — जिसे सिख परंपरा में धर्म की रक्षा और आत्मबलिदान का प्रतीक माना जाता है। बचित्तर नाटक और सूरज प्रकाश जैसी समकालीन सिख रचनाएं इस बलिदान का विस्तार से वर्णन करती हैं। इन देसी स्रोतों को केवल ‘कथा’ कहकर खारिज करना, जबकि मुग़ल दरबार की प्रशस्तियों को ‘ऐतिहासिक तथ्य’ मानना — यह इतिहास लेखन में मौजूद गहरी दोहरी सोच को दिखाता है। गुरु तेग़ बहादुर के बलिदान को धार्मिक संदर्भ में देखना सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि भारतीय स्मृति और परंपरा के प्रति ईमानदारी है। इस पहलू को इतिहास से मिटाना किसी तटस्थता का संकेत नहीं, बल्कि एक वैचारिक सेंसरशिप है, जो असहज सच्चाइयों से बचने के लिए अपनाई जाती है।
अरजुन देव: एनसीईआरटी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर सवाल
अरजुन देव का आरोप है कि एनसीईआरटी पाठ्यक्रमों में बदलाव बिना पर्याप्त अकादमिक सलाह-मशविरा किए गए, और यह बदलाव एकतरफा और असंवैधानिक प्रयास था — जिसकी कोई वैध शैक्षणिक बुनियाद नहीं थी।
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राष्ट्रीय पाठ्यक्रम बनाने में विद्वानों की राय लेना ज़रूरी है, लेकिन अरजुन देव की आलोचना एक गहरे पक्षपात को उजागर करती है — कि सिर्फ मार्क्सवादी या वामपंथी विचार रखने वाले ही इस प्रक्रिया में मान्य माने जाएं। यही ‘बौद्धिक पहरेदारी’ (intellectual gatekeeping) भारत के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी बाधा रही है — जिसमें पारंपरिक ज्ञान रखने वाले विद्वानों, भारतीय दृष्टिकोण से सोचने वाले शोधकर्ताओं और पश्चिमी ढांचे से बाहर काम करने वालों को जानबूझकर बाहर रखा गया। सच्ची अकादमिक ईमानदारी का मतलब है विचारों की विविधता — न कि किसी एक विचारधारा का दबदबा। इतिहास को लेकर चर्चा को व्यापक बनाना और अलग-अलग नजरियों को शामिल करना विद्वत्ता का ह्रास नहीं, बल्कि उसका लोकतांत्रिक विस्तार है।
सुमित सरकार: क्या भारतीय इतिहास को फिर से लिखने की ज़रूरत है?
सुमित सरकार का तर्क है कि भारतीय इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिशें राजनीतिक कारणों से प्रेरित हैं और इनमें बहुसंख्यकवादी सोच छिपी है। उनका इशारा साफ़ है — कि जो भी प्रयास नेहरूवादी या मार्क्सवादी दृष्टिकोण से हटता है, वह अपने आप में संदेहास्पद मान लिया जाना चाहिए।
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सुमित सरकार का नजरिया इतिहास को एक ऐसी स्थिर और अचल कहानी मानता है, जो तब भी नहीं बदलती जब नए साक्ष्य और शोध सामने आते हैं। जबकि दुनिया भर में इतिहास समय-समय पर बदला गया है — जब समाजों ने बड़े राजनीतिक या वैचारिक परिवर्तन देखे। जैसे दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद के बाद, पूर्वी यूरोप ने सोवियत गिरावट के बाद, और जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपने इतिहास को फिर से लिखा — ताकि उपनिवेशवाद, तानाशाही और गलत धारणाओं को सुधारा जा सके। तो फिर भारत को यह अधिकार क्यों न मिले? अगर नए प्रमाणों और निष्पक्ष शोध के आधार पर इतिहास को दोबारा लिखा जाए, तो वह न तो बहुसंख्यकवाद है और न ही कोई विकृति — बल्कि यह बौद्धिक गुलामी से मुक्ति और हमारी सभ्यतागत चेतना की वापसी है।
मीडिया: संपादकीय मंच या वैचारिक अखाड़ा?
मुख्यधारा मीडिया — जैसे इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय और वीर सांघवी जैसे टिप्पणीकारों — ने पाठ्यपुस्तकों में हुए बदलावों को लेकर तीखी चेतावनियाँ दीं। उन्होंने कई बार ‘तालिबानीकरण’ जैसे अतिरंजित शब्दों का इस्तेमाल किया और आरोप लगाया कि दक्षिणपंथी ताक़तें इतिहास को मिटाकर उसकी जगह पौराणिक कथाएँ थोपना चाहती हैं।
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ऐसी तुलना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। भारत में पाठ्यक्रमों में बदलाव लोकतांत्रिक बहस, सार्वजनिक समीक्षा और कानूनी प्रक्रिया के तहत होते हैं — इसे तालिबान जैसे जबरन थोपे गए सांस्कृतिक विध्वंस के साथ जोड़ना, असली अत्याचारों को कमतर दिखाने जैसा है। यह एक वैचारिक चाल है, जिससे भारत में किसी भी प्रकार के सभ्यतागत पुनरुद्धार को ‘अवैध’ ठहराया जा सके। विडंबना यह है कि वही बुद्धिजीवी जो पश्चिमी विश्वविद्यालयों में ‘डीकॉलोनाइज़ेशन’ की मुहिम का स्वागत करते हैं, वे भारत में ऐसे ही प्रयासों को कट्टरता करार देते हैं। भारत की सभ्यतागत विरासत से जुड़ना कोई धार्मिक उग्रवाद नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान का स्वाभाविक और वैध अभ्यास है। मुख्यधारा मीडिया की यह तुरंत प्रतिक्रिया कोई संतुलित आलोचना नहीं, बल्कि उस बौद्धिक प्रभुत्व के टूटने से उपजा डर है, जो दशकों से ऐतिहासिक विमर्श पर छाया हुआ था।
इतिहास का पुनर्लेखन: वैश्विक दृष्टिकोण और भारत का दायित्व
इतिहास को दोबारा लिखना भारत के लिए कोई अनोखी या वैचारिक बात नहीं है। दुनिया के कई देशों ने ऐसा किया है। दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद के बाद अपने इतिहास में स्थानीय संघर्षों को प्रमुखता दी। पूर्वी यूरोप ने कम्युनिस्ट शासन के पतन के बाद पुराने प्रचार को खारिज किया। जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय स्मृति को नया रूप दिया।
इसके उलट, भारत आज भी बौद्धिक रूप से उपनिवेशग्रस्त बना हुआ है। लंबे समय तक चले वामपंथी वर्चस्व के कारण पुरातत्व, आनुवंशिकी और भाषाशास्त्र जैसे क्षेत्रों में हुई नई खोजों को इतिहास में शामिल नहीं किया गया। जिन विद्वानों ने भारतीय दृष्टिकोण से शोध किया — जैसे सुबाष काक, कोएनराड एल्स्ट, राजीव मल्होत्रा और के.के. मुहम्मद — उन्हें या तो अनदेखा कर दिया गया या ‘राजनीतिक एजेंडे’ के तहत खारिज कर दिया गया।
हालांकि, इतिहास को पुनर्प्राप्त करना किसी विचारधारा को थोपने का प्रयास नहीं है। यह एक बौद्धिक न्याय है, जिसके ज़रिए उन देशी दृष्टिकोणों को स्थान दिया जाता है जिन्हें उपनिवेशवाद और उत्तर-औपनिवेशिक विचारधाराएं दबाती रहीं। जैसा कि एस. एन. बलगंगाधर ने कहा है, भारतीय परंपराओं को बार-बार पश्चिमी सोच के ढांचे में जबरन फिट किया गया, जिससे उनका असली अर्थ खो गया। इसलिए इतिहास को अपने ही नजरिए से फिर से लिखना, भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की दिशा में एक ज़रूरी कदम है।[9]
विचारों पर पहरा: अकादमिक आज़ादी का पतन
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भिन्न मत रखने वालों के प्रति असहिष्णुता खुलकर सामने आ गई है। जो इतिहासकार मुख्यधारा की स्थापित सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें तुरंत ‘सांप्रदायिक’, ‘पिछड़े विचारों वाले’ या ‘फासीवादी’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। बौद्धिक पहरेदारी (गेटकीपिंग) इस हद तक बढ़ गई है कि सरस्वती-सिंधु संस्कृति की निरंतरता, भारतीय कालगणना की प्राचीनता, या वैदिक और हड़प्पा सभ्यताओं के संभावित संबंध जैसे विषयों को उठाना तक कलंक मान लिया गया है।
प्रो. डी.एन. झा द्वारा गो-निषेध पर लिखी आलोचनात्मक पुस्तक पर हुई प्रतिक्रिया को अक्सर दक्षिणपंथ की असहिष्णुता के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि खुद झा और उनके विचारधारात्मक खेमे ने दशकों तक किसी भी गैर-मार्क्सवादी सोच को शिक्षण संस्थानों और अकादमिक विमर्श में जगह नहीं दी। इसके उलट, मीनाक्षी जैन, विशाल अग्रवाल और संजीव सान्याल जैसे विद्वानों को गंभीरता से सुनने या बहस करने के बजाय अक्सर उपेक्षित या बदनाम किया गया।
इस प्रकार की वैचारिक एकपक्षीयता और संवादहीनता उन बुनियादी शैक्षणिक मूल्यों का ही उल्लंघन है जिनकी दुहाई ये इतिहासकार अक्सर देते हैं — जैसे तर्कशीलता, शोध की स्वतंत्रता और दृष्टिकोणों की विविधता।
पुनर्जागरण की ओर
भारत इस समय एक बेहद निर्णायक मोड़ पर है। असली बहस ‘सांप्रदायिक बनाम धर्मनिरपेक्ष’ के पुराने फ्रेम में नहीं, बल्कि ‘उपनिवेशीकृत बनाम स्वतंत्र चेतना’ के नए विमर्श में होनी चाहिए। भारतीय अकादमिक जगत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यह नहीं है कि वह किसी विचारधारा की रक्षा करे, बल्कि यह है कि वह अपनी खोई हुई सभ्यतागत स्मृति को फिर से प्राप्त करे।
इस संदर्भ में इतिहास को दोबारा लिखना कोई विकृति नहीं, बल्कि एक ज़रूरी सुधार है। यह कोई सांप्रदायिक एजेंडा नहीं, बल्कि हमारे सभ्यतागत यथार्थ को पहचानने और उसमें ईमानदारी से झाँकने की कोशिश है। इसके लिए ज़रूरी है कि हम उन वैकल्पिक दृष्टिकोणों को स्थान दें जिन्हें अब तक दबा दिया गया था, उन उपेक्षित स्रोतों को पढ़ें जिन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, और अपने अतीत की पीड़ा और प्रतिरोध — दोनों को स्वीकार करें।
जैसे-जैसे हम अपनी सोच को डीकॉलोनाइज़ करते हैं, वैसे-वैसे हमें अपनी स्मृति, अपनी पहचान और अपनी परंपराओं को भी फिर से आत्मसात करना होगा। यह सिर्फ एक अकादमिक प्रयास नहीं है — यह एक सांस्कृतिक, बौद्धिक और आत्मिक दायित्व है।
संदर्भ सूची
[1] Mridula Mukherjee and Aditya Mukherjee. Communalisation of Education: The History Textbook Controversy. Delhi Historians Group, 2001.
[2] Arun Shourie. Eminent Historians: Their Technology, Their Line, Their Fraud. ASA Publications, 1998.
[3] Romila Thapar. “Propaganda as History Won’t Sell.” Hindustan Times, 9 December 2001.
[4] Irfan Habib. “The Rewriting of History by the Sangh Parivar.” In Communalisation of Education: The History Textbook Controversy, Delhi Historians Group, 2001.
[5] Vasant Shinde, Vagheesh Narasimhan, et al. “An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Steppe Pastoralists or Iranian Farmers.” Cell, vol. 179, no. 3, 2019.
[6] Dharampal. The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century. Biblia Impex, 1983.
[7] Irfan Habib. “The Rewriting of History by the Sangh Parivar.” In Communalisation of Education: The History Textbook Controversy, Delhi Historians Group, 2001.
[8] Vasant Shinde, Vagheesh Narasimhan, et al. “An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Steppe Pastoralists or Iranian Farmers.” Cell, vol. 179, no. 3, 2019.
[9] S. N. Balagangadhara. Reconciling Cultural Differences: The Work of S. N. Balagangadhara. Manohar Publishers, 2012.
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