बांग्लादेश नरसंहार:1971 की पाकिस्तानी क्रूरता की कहानी
- बांग्लादेश नरसंहार 25 मार्च, 1971 को शुरू हुआ। इसके तहत, सामूहिक हत्याएं और बलात्कार हुए। एक अनुमान के मुताबिक़, तीस लाख मौतें और 4 लाख से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हुई।
- बंगाली पुरुषों, हिंदुओं और बुद्धिजीवियों समेत कुछ ख़ास समूहों को निशाना बनाया गया। इसकी क्रूरता के केंद्र में सामूहिक हत्याएं और लिंग–हत्या की रणनीति काम कर रही थी।
- प्रत्यक्षदर्शी और पत्रकार, जैसे एंथनी मस्कारेनहास ने बांग्लादेश में सामूहिक हत्या के भयावह दृश्यों को रिपोर्ट किया था।
- क्रूर हिंसा की जानकारी होने के बावजूद, अमेरिका सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने हस्तक्षेप नहीं किया। इन लोगों ने उलटे पाकिस्तानी शासन का समर्थन ही किया।
- इस नरसंहार का प्रभाव आज भी बांग्लादेश के इतिहास और पहचान पर है। यह असर भविष्य में अत्याचारों को रोकने और पीड़ितों को याद रखने तथा उन्हें सम्मानित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
1971 का बांग्लादेश का नरसंहार मानव इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। इसमें निर्दोष लोगों के खिलाफ ऐसे अत्याचार किए गए थे, जिसकी कल्पना भी मुश्किल है। नौ महीनों के दौरान, लाखों लोगों की हत्याएं हुई। लाखों लोगों ने अकल्पनीय दुःख को झेला। इसे दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक माना जाता है। इस नरसंहार के दौरान तीस लाख लोगों की हत्या हुई और 4 लाख से अधिक महिलाओं और युवा लड़कियों के साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया।
ऑपरेशन सर्चलाइट: क्रूरता की शुरुआत
25 मार्च, 1971 को पश्चिमी पाकिस्तान ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। यह ऑपरेशन की शक्ल में नरसंहार की शुरुआत थी। पाकिस्तानी सेना द्वारा का यह एक सैन्य अभियान था। इस ऑपरेशन का लक्ष्य एक महीने के अंदर प्रमुख शहरों पर नियंत्रण करना और सभी विरोधों को खत्म करके बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाना था। ऑपरेशन से पहले, विदेशी पत्रकारों को सुनियोजित तरीके से बांग्लादेश से भगा दिया गया। सेना ने यह सुनिश्चित किया कि अत्याचार की खबर बाहर तक न जाए। ऑपरेशन सर्चलाइट मई 1971 के मध्य में बांग्लादेश के आखिरी बड़े शहर के पतन के साथ समाप्त हुआ। न्यूयॉर्क टाइम्स की शुरुआती रिपोर्टों ने संकेत दिया कि ऑपरेशन के पहले कुछ दिनों में लगभग 10,000 लोग मारे गए थे। बाद की रिपोर्टों ने बताया कि अभियान के शुरुआती चरणों के दौरान अकेले ढाका में 5,000 से 35,000 लोग मारे गए थे। इन सुनियोजित हत्याओं ने बंगाली आबादी को बेचैन कर दिया। नतीजतन, दिसंबर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान का उदय एक अलग राष्ट्र के तौर पर हुआ, जिसका नया नाम बांग्लादेश था।(1) बांग्लादेश नरसंहार की पहली रिपोर्ट पश्चिमी पाकिस्तानी पत्रकार एंथनी मस्कारेनहास ने 13 जून 1971 को द संडे टाइम्स, लंदन में “नरसंहार” शीर्षक से प्रकाशित की थी।(2) उन्होंने लिखा: “मैंने देखा कि हिंदुओं को गाँव-गाँव और घर-घर जाकर मारा जा रहा है। मैंने कोमिला में सर्किट हाउस परिसर में लोगों की चीखें सुनी हैं, जिन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया। मैंने लोगों से भरे ट्रक देखे हैं, जिन्होंने किसी की मदद करने की कोशिश की। उन्हें ट्रक में डाल कर अंधेरे और कर्फ्यू के बहाने कैंपों में ले जाया गया।
नरसंहार की व्यापकता
1971 के नरसंहार में लोगों की मौत चौंकाने वाली है। बांग्लादेशी अधिकारियों का अनुमान है कि तीस लाख लोग मारे गए थे। हालांकि, यह संख्या अभी भी सटीक नहीं है। बलात्कार, विस्थापन और मौतों की संख्या बांग्लादेश नरसंहार को बीसवीं सदी की सबसे भयावह घटनाओं में से एक बनाती है। 1971 के बांग्लादेश सामूहिक हत्याकांड बीसवीं सदी के कुछ सबसे भयावह नरसंहारों जैसे ही हैं, जिसमें प्रमुख रूप से होलोकॉस्ट और रवांडा के नरसंहार शामिल हैं।(3) पश्चिमी पाकिस्तानी सैन्य शासन ने लाखों बंगालियों को मारने के लक्ष्य से सामूहिक हत्या का एक सुनियिजित अभियान चलाया। 1970 के दिसंबर में हुए राष्ट्रीय चुनाव में अवामी लीग ने बंगाली क्षेत्र में भारी जीत हासिल की थी। यही इस सैन्य दमन का कारण बन गया। 22 फरवरी, 1971 तक, पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने अवामी लीग और उसके समर्थकों को कुचलने का फैसला कर लिया था। इसके बाद ही यह नरसंहार शुरू हुआ। 25 मार्च, 1971 को नरसंहार की शुरुआत हुई। ढाका विश्वविद्यालय पर हमला किया गया। सैकड़ों छात्रों को मार डाला गया। मौत के दानव ढाका की सड़कों पर घूमते रहे। एक ही रात में लगभग 7,000 लोगों को मार डाला गया। एक सप्ताह के अंदर, ढाका की आधी आबादी खाली हो गयी। कुछ भाग गए, कुछ मार दिए गए। कम से कम 30,000 लोग मारे गए। पूर्वी पाकिस्तान में आतंक फैल गया। लाखों लोग विस्थापित हो गए और शरण लेने लगे।
लैंगिक और संभ्रात वर्ग का नरसंहार
बुद्धिजीवियों, अमीरों और ख़ास कर पुरुषों का नरसंहार करने के लिए एक अलग तरीका अपनाया गया। बंगाली सैनिक, बंगाली हिंदू, अवामी लीग समर्थक, छात्र और बुद्धिजीवी पाकिस्तानी सेना के मुख्य लक्ष्य थे। एंथनी मैस्करेनहास ने अपनी पुस्तक “द रेप ऑफ बांग्ला देश”(4) में लिखा है कि कैसे इस नरसंहार में पुरुषों और बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया गया। एक ख़ास रणनीति के तहत पुरुषों को ही निशाना बनाया। हज़ारों स्वस्थ युवा पुरुषों को गिरफ़्तार किया गया। उन्हें प्रताड़ित कर के मार दिया गया। पाकिस्तानी सेना ने विरोध में शामिल होने की संभावना वाले लोगों की तलाश की। सेना ने युवा पुरुषों को पकड़ने और उन्हें मारने के लिए अभियान चलाया।
प्रत्यक्षदर्शियों के कथन
अलग-अलग स्रोतों से उस वक्त के प्रत्यक्षदर्शी और गवाहों ने जो बताया हैं, वह नरसंहार के दौरान किए गए अत्याचारों की एक भयावह तस्वीर पेश करती हैं। ढाका के पास हरिहरपारा गाँव सामूहिक नरसंहार का केंद्र बन गया। यहां कैदियों को मार दिया जाता था और उनके शवों को नदी में बहा दिया जाता था।(5) पूर्वी पाकिस्तान में भी इसी तरह के दृश्य देखे गए, जहाँ खेतों, नदियों और सेना के शिविरों के पास शव पाए गए।
सबसे कुख्यात नरसंहारों में से एक चुकनगर शहर में हुआ, जहां हज़ारों शरणार्थी भारत जाने के लिए जमा हुए थे। 10 मई, 1971 को पाकिस्तानी सैनिक वहाँ पहुँचे और भीड़ पर गोलियाँ चलाईं, जिससे कुछ ही मिनटों में हज़ारों लोग मारे गए।(6)
प्रत्यक्षदर्शी के बयान और विभिन्न स्रोतों से प्राप्त रिपोर्टें नरसंहार के दौरान किए गए अत्याचारों की एक भयावह तस्वीर पेश करती हैं। ढाका के पास हरिहरपारा गाँव व्यवस्थित सामूहिक हत्या का स्थल बन गया, जहाँ कैदियों को मार दिया गया और उनके शवों को नदी में फेंक दिया गया। इसी तरह के दृश्य पूरे पूर्वी पाकिस्तान में देखे गए, जहाँ शव खेतों, नदियों और सेना के शिविरों के पास पाए गए।
सबसे कुख्यात हत्याकांडों में से एक चुकनगर शहर में हुआ, जहाँ हजारों शरणार्थी भारत भागने के लिए एकत्र हुए थे। 10 मई 1971 को पाकिस्तानी सैनिक वहाँ पहुंचे और भीड़ पर गोलियाँ चला दीं, जिससे कुछ ही मिनटों में हजारों लोग मारे गए।
वैश्विक मिलीभगत
नरसंहार की योजना बहुत ही सावधानी से बनाई गई थी। इसे पाकिस्तानी जनरलों के एक छोटे समूह द्वारा अंजाम दिया गया। इसमें राष्ट्रपति याह्या खान और जनरल टिक्का खान शामिल था। अमेरिकी सरकार सब कुछ जानते हुए भी पाकिस्तानी शासन को सैन्य उपकरण की आपूर्ति करती रही।(7) निचले दर्जे के अधिकारी और सैनिक, जिन्होंने हत्याओं को अंजाम दिया, वे बंगाली नस्लवाद से प्रेरित और हिंदू विरोधी थे, जिसके कारण हिंसा को और बढ़ावा मिला।
“द ब्लड टेलीग्राम: निक्सन, किसिंजर, एंड ए फॉरगॉटन जेनोसाइड” (8) में, प्रिंसटन में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर गैरी जे. बास ने 1971 में बांग्लादेश के जन्म की भयानक कहानी और उसके साथ ही व्हाइट हाउस की घिनौनी और शर्मनाक कूटनीति का विवरण दिया है।[1]
प्रत्यक्षदर्शियों और ऐतिहासिक दस्तावेज नरसंहार की क्रूरता को बताते हैं। इस अत्याचार को ले कर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय समेत तमाम जिम्मेवार लोगों की उदासीनता इस नरसंहार की भयावहता की याद हरदम दिलाती रहेगी।[2]
निष्कर्ष
1971 का यह नरसंहार मानवीय क्रूरता और अनियंत्रित शक्ति के विनाशकारी प्रभाव की याद दिलाता है। इस काले अध्याय और मारे गए लोगों की कहानियों को याद किया जाना चाहिए। उनका सम्मान किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तरह के अत्याचार कभी न दोहराए जाएँ। नरसंहार की विरासत बांग्लादेश के इतिहास और पहचान पर आज भी प्रभावी है, जो अकल्पनीय पीड़ा का सामना करने में इसके लोगों की ताकत का प्रमाण है।
संदर्भ
[1] Bangladesh Genocide Archive | An online archive of chronology of events, documentations, audio, video, images, media reports and eyewitness accounts of the 1971 Genocide in Bangladesh in the hands of Pakistan army; https://www.genocidebangladesh.org/
[2] Opinion | Pakistan’s State of Denial – The New York Times; https://www.nytimes.com/2013/12/27/opinion/anam-pakistans-overdue-apology.html
[3] Bangladesh genocide; https://en.wikipedia.org/wiki/Bangladesh_genocide
[4] The Rape of Bangla Desh. Delhi: Vikas Publications (1971)
[5] 1971 killing of Bengali intellectuals; https://en.wikipedia.org/wiki/1971_killing_of_Bengali_intellectuals
[6] Recognize Chuknagar Genocide, demand activists; https://www.dhakatribune.com/bangladesh/court/270802/recognize-chuknagar-genocide-demand-activists
[7] 48049.pdf (state.gov); https://2001-2009.state.gov/documents/organization/48049.pdf
[8] The Blood Telegram: Nixon, Kissinger, and a Forgotten Genocide; https://en.wikipedia.org/wiki/The_Blood_Telegram:_Nixon,_Kissinger,_and_a_Forgotten_Genocide
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