सेकुलरपंथी हिन्दू: भारत के लिए जिहादियों से भी बड़ा खतरा

जिहादियों की हिंसा का शिकार होते हैं। फिर भी ये सेकुलरपंथी हिन्दू इस पर चुप रह जाते हैं। उनकी निंदा तक करने की हिम्मत नहीं दिखा पाते। ऐसे ही सेकुलर लोग, इस्लामिक कट्टरपंथियों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए एक सुरक्षा ढाल देते है।
  • अंकित सक्सेना की हत्या 1 फरवरी 2018 को उसकी प्रेमिका के मुस्लिम परिवार द्वारा दिनदहाड़े कर दी गई थी, क्योंकि वह हिंदू था। लेकिन अंकित के पिता यशपाल ने इस घटना को धर्म से न जोड़ने की अपील की, बावजूद इसके कि हत्या धर्म आधारित थी और हत्यारे मुस्लिम परिवार ने इसे स्पष्ट रूप से धर्म से जोड़ा।
  • सेकुलरपंथी के प्रभाव में, यशपाल ने हत्या के चार महीने बाद इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया।
  • धर्मनिरपेक्षता की बीमारी अंकित के पिता जैसे हिन्दुओं को अंधा बना रही है, जो आतंकवादियों या इस्लाम का प्रचार करने वाले दुश्मनों की तुलना में हिंदू समाज के लिए बड़ा खतरा है।
  • धर्मनिरपेक्षता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। यह हिंदुओं को मुसलमानों और ईसाइयों के हमलों से बचाव करने से रोकती है, जबकि अधिकारी अक्सर अल्पसंख्यक समुदायों का पक्ष लेते हैं।
  • इस अंधी धर्मनिरपेक्षता का नतीजा कश्मीर जैसा हो सकता है, जहां से हिन्दुओं को कश्मीर से भागना पड़ा था और अब कुछ नए इलाकों से भी ऐसा ही पलायन देखने को मिल सकता है।

बर्बरता हमेशा सभ्यता के आसपास, उसके बीच ही मौजूद रहती है। बर्बरता हमेशा सभ्यता को हथियारों, सामूहिक पलायन, अनियंत्रित प्रजनन क्षमता से निगलने के लिए तैयार रहती है। बर्बरता जंगल की तरह है। यह कभी अपनी हार नहीं मानती। यह सदियों तक धैर्यपूर्वक उस क्षेत्र को वापस पाने का इंतज़ार करती है जिसे उसने खो दिया है।” विल डुरंट, द स्टोरी ऑफ़ सिविलाइज़ेशन[1]

अंकित सक्सेना की दिन-दहाड़े गला रेत कर हत्या कर दी गयी थी। यह क्रूरतम कुकृत्य अंकित की प्रेमिका शहजादी के रिश्तेदारों ने किया था। हत्या के छह साल बाद, हत्यारों को आखिरकार दोषी ठहराया गया। 7 मार्च, 2024 को, दिल्ली की एक अदालत ने सक्सेना की प्रेमिका शहजादी के माता-पिता अकबर अली और शहनाज़ बेगम और मामा मोहम्मद सलीम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। न्यायाधीश ने उन दोनों पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

1 फरवरी, 2018 को अंकित को उसकी 20 वर्षीय प्रेमिका के मुस्लिम परिवार ने घेर लिया था। इस क्रूर घटना के गवाहों बताया था कि शहजादी की मां ने अंकित की गाड़ी में अपना स्कूटर से धक्का दे कर हमला शुरू किया था। 23 वर्षीय फोटोग्राफर को अली, बेगम, उनके 14 वर्षीय बेटे और सलीम ने 15 मिनट तक पीटा। पुलिस ने यह भी कहा कि जब आरोपी युवक पर हमला कर रहे थे, तब उसके माता-पिता और दोस्त उसे बचाने आए। आरोपियों ने उसकी मां के साथ भी मारपीट की।[2]

अंकित की प्रेमिका की मां, शहनाज बेगम, खुद अंकित को चाकू से मार रही थी। अंकित ने उनसे गुहार लगाई, “आंटी, मैंने कुछ नहीं किया, मैंने आपकी बेटी को आपसे नहीं छीना है।” लेकिन इस कट्टरपंथी परिवार ने उस पर कोई दया नहीं दिखाई। उन्होंने कसाई की तरह अंकित का गला चाकू से रेत दिया। यह पूरी साजिश इतनी अच्छी तरह से रची गई थी और हमला इतना क्रूर था कि अंकित का सिर धड़ से अलग हो गया और कुछ ही पलों में उसकी मौत हो गई। अंकित के पिता, यशपाल, इस घटना के गवाह हैं। वे अपने बेटे को अस्पताल लेकर गए, इस उम्मीद में कि शायद वह बच जाए।

यदि उस मुस्लिम परिवार का मकसद सिर्फ अंकित की हत्या करना होता, तो वे उसे कहीं भी मार सकते थे। लेकिन उन्होंने हिंदुओं को यह संदेश देने के लिए यह कुकृत्य सार्वजनिक रूप से किया कि हमारी लड़की पर आँख डालोगे, तो हम तुम्हारा यही हाल करेंगे।

सेकुलरपंथी का वायरस

अंधा होना उतना बुरा नहीं है जितना कि आँखें होते हुए भी साफ चीजों को न देख पाना है। अंकित धर्मनिरपेक्षता के प्रभाव में इतना डूब गया था कि उसने मुस्लिम टोपी पहनना और अपने मुस्लिम ‘दोस्तों’ के साथ घूमना शुरू कर दिया था। उसने अपने हिंदू दोस्तों के साथ मिलकर ‘आवारा बॉयज’ नाम का एक समूह बनाया, जो एकतरफा धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करता था। अंकित को सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिंदू था। इसके बावजूद, उसके पिता यशपाल ने कहा, “मुझे इसमें मत घसीटो, मैं सभी से अपील करता हूं कि इसे धर्म से न जोड़ें और माहौल को खराब न करें।”[3]

सेकुलरपंथी की बीमारी से ग्रस्त यशपाल ने कहा, “भले ही मुझे न्याय न मिले, मैं किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत नहीं रखूंगा।”[4] यह सोच कर ही सिर घूम जाता है कि एक पिता जिसका इकलौता बेटा उसकी आंखों के सामने एक मुस्लिम परिवार द्वारा मार दिया जाता है, वह ऐसी बातें बोल रहा है। अंकित को मारते वक्त उक्त मुस्लिम परिवार ने चिल्ला-चिल्ला कर बोला था कि वे उसे एक मुस्लिम लड़की से दोस्ती करने के लिए मार रहे हैं। लेकिन, यशपाल ने मीडिया को इस हत्या को धर्म से न जोड़ने के लिए कहा।

हालांकि इस मे रत्ती भर भी संदेह नहीं हो सकता कि यह हत्या धर्म के आधार पर हुई थी, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की बीमारी इंसान को अब्राहमिक धर्मों (इस्लाम और इसाइयत) के खतरे के प्रति अंधा कर देती है। इसीलिए, मेरा मानना है कि हिन्दुओं के लिए अंकित और यशपाल जैसे सेकुलर हिंदू, इस्लामी आतंकवादी या ईसाई धर्म प्रचारक से ज़्यादा बड़ा ख़तरा हैं। इस मे किओ शक नहीं कि आतंकवादी और धर्म प्रचारक हमारी जान के दुश्मन हैं। लेकिन सेकुलर लोग इस से भी बड़ा खतरा हैं क्योंकि वे समाज के ताने-बाने को अंदर से खोखला करने का काम करते हैं। आप को यह जान कर हैरानी होगी कि सेकुलरपंथी की बीमारी से ग्रस्त अंकित के पिता ने अपने बेटे की हत्या के चार महीने बाद ही, मुसलमानों के लिए इफ़्तार पार्टी रखी और आवारा बॉयज़ ने मेहमानों को खिलाया-पिलाया, और दावत के बाद लड़कों ने मुसलमानों के लिए नमाज़ पढ़ने के लिए गली में जगह बनाई!

सेकुलारपंथी का वायरस खत्म क्यों नहीं होता

सेकुलरपंथियों के दिमाग मे खतरे को देखने की क्षमता नहीं है, इस लिए ये आशा मत रखें कि अंकित की हत्या बौद्धिक रूप से कमज़ोर सेकुलर लोगों को जिहादियों के साथ घुलने-मिलने और ‘भाईचारे’ को बढ़ावा देने से रोक पाएगी।

अब प्रश्न ये है कि भारत में सेकुलरिज्म का वायरस इतना ताकतवर क्यों है। इस का एक कारण ये हो सकता है कि भारत का सामूहिक आईक्यू (सामूहिकता की भावना) केवल 76 है, जबकि जापान का 106 है और दुनिया में सबसे अधिक है।[5]

दुर्भाग्य ये है कि भारत में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनका सामूहिक आईक्यू इससे भी कम है। 60 आईक्यू को आमतौर पर मानसिक रूप से चुनौती दिए जाने वाला माना जाता है। यानी, इस स्तर पर एक हिंदू (जिन्हे मूर्ख हिन्दू कहना चाहिए) जिहादियों और मिशनरियों के प्रभाव में आ जाता है। इन जिहादियों की ट्रेनिंग ऐसी होती है कि वे उच्च सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाले हिन्दुओं का भी ब्रेनवॉश कर सकते है। ऐसे में कम आईक्यू वाले हिन्दुओं को प्रभावित करना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल हैं। 60 या उससे कम आईक्यू वाले लोग “सभी धर्म समान हैं” और “सभी धर्म समान विचार सिखाते हैं” जैसी झूठी बातों पर सबसे अधिक भरोसा कर लेते हैं।

अंकित की हत्या इन बौद्धिक रूप से कमजोर सेकुलर लोगों को जिहादियों के साथ घुलने-मिलने से नहीं रोक पाएगी। क्योंकि उनके दिमाग में खतरे को देखने की क्षमता नहीं है। उच्च शिक्षित लोग भी नहीं जानते कि इस्लाम का तथाकथित भाईचारा केवल साथी मुसलमानों पर लागू होता है। यह भाईचारे की भावना काफिरों (जो इस्लाम को नहीं मानते) के लिए नहीं है।[6]

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा

भारत में मुसलमान और ईसाई हिंदुओं पर बेखौफ हो कर हमला कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें सेकुलर स्टेट (धर्मनिरपेक्ष राज्य) का समर्थन प्राप्त है। एनजीओ और अदालतों से लेकर राज्य सरकारों और पुलिस बलों तक, हिंदुओं को अपना बचाव करने से रोकते हैं।

द जयपुर डायलॉग्स (The Jaipur Dialogue) के संस्थापक संजय दीक्षित कहते हैं कि मोहनदास गांधी और उनके शिष्य जवाहरलाल नेहरू धर्मनिरपेक्षता कि बीमारी फैलाने के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार थे। “हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए, उन्होंने मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व को ऐसी छूटें दीं, जो आज भी राजनीति को परेशान कर रही हैं। उनका सर्व धर्म समभाव न केवल एक बड़ी आपदा थी, बल्कि इसने सनातन धर्म द्वारा इस्लामी जिहाद के खिलाफ विकसित की गई रक्षा प्रणाली को भी नष्ट कर दिया।”[7]

असल में हिंदुओं की तीन पीढ़ियाँ इस नारे पर पली-बढ़ी हैं कि एक नंगे फकीर ने अहिंसा के हथियार से ब्रिटिश साम्राज्य को हराया। स्वतंत्रता के लगभग पाँच दशकों तक, करोड़ों भारतीयों ने इस झूठी कहानी पर विश्वास करते आ रहे हैं, और अब उन्हें विश्वास हो गया कि अहिंसा एक जादुई छड़ी है, जो एक शत्रु को हरा सकती है। यह अलग बात है कि भारत के मुसलमानों ने कभी भी गांधी को अधिक महत्व नहीं दिया और स्वतंत्र भारत में होने वाले संघर्षों के लिए अपनी तलवारों की धार तेज़ करते रहे। हिन्दुओं के रक्षा तंत्र का ख़त्म होना ही हिंदुओं पर लगातार हमलों का कारण है। लेखक आनंद रंगनाथन के अनुसार, “सभी धर्म एक समान हैं” के इस्तेमाल से हिन्दुओं को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। आज “सबसे ज़्यादा पीड़ित हिंदू ही हैं।”[8]

लेखक और पूर्व पत्रकार तुफ़ैल अहमद इस बात पर ज़ोर देते हैं कि धर्मनिरपेक्षता भारत की “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा” बन गई है। “हर राजनेता, हर पुलिस अधिकारी, हर पत्रकार और हर धर्म गुरु जानता है कि धर्मनिरपेक्षता भारत की आत्मा को नुकसान पहुँचा रही है। हर कोई दिखावा करता है कि सब कुछ सही है। पुलिस धर्मनिरपेक्षता को व्यवस्था चलाने के लिए उपकरण के रूप में मानती है। यानी, क़ानून और व्यवस्था धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है।”[9]

तुफ़ैल अहमद हिंदू कार्यकर्ता कमलेश तिवारी की भी बात करते है, जिनकी हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने कर दी थी। भगवान राम का मजाक उड़ाने वाले मुस्लिम नेताओं के जवाब में तिवारी ने इस्लाम के पैगम्बर के बारे में अपमानजनक बयान दिया था, जिसके लिए पुलिस अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। “लेकिन उन्हीं पुलिस अधिकारियों में बिजनौर के इस्लामी मौलवियों को छूने की भी हिम्मत नहीं की, जिन्होंने 2015 में जेल में या बाहर तिवारी का सिर कलम करने के लिए 51 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। धर्मनिरपेक्षता भारत का राष्ट्रीय खेल बन गया है। हर कोई इसमें भाग लेता है, हर कोई दिखावा करता है, हर कोई ताली बजाता है, हर कोई वास्तविकता से अपनी आँखें मूंद लेता है।”

इस बीच, मीडिया और पढ़े-लिखे लोग जिहादियों के लिए ढाल का काम करते हैं, जैसे कि उदार मीडिया ने ये प्रचार किया कि अंकित की हत्या पितृसत्तात्मक समस्या के कारण हुई थी। एक मुस्लिम लेखक ने उदारवादियों के झूठी समानता की पोल खोलते हुए लिखा: “विडंबना यह है कि जिस दिन अंकित की हत्या हुई, उसी दिन मैंने अफगानिस्तान का एक भयानक वीडियो देखा, जिसमें एक महिला को कथित विवाहेतर संबंध के लिए बुरी तरह पीटा जा रहा था।”[10]

अंकित का कत्ल करने वाले मुस्लिम परिवार ने गर्व से दावा किया कि उन्होंने अंकित की हत्या उसके हिन्दू होने के कारण की। लेकिन ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दिब्येश आनंद ने इस बात से इंकार किया कि इसका धर्म से कोई लेना-देना है। वह कहते है, “यह घातक अवधारणा धर्म नहीं बल्कि स्वामित्व-पितृसत्तात्मक-परिवार-सम्मान है, जो कई हिंदुओं, मुसलमानों और अन्य लोगों को समान रूप से प्रभावित करती है।”

भारत के अंदर मिनी-पाकिस्तान की बढ़ती संख्या

सेकुलरपंथी अपने दरवाजे पर दस्तक देते हुए जिहादी खतरे को नजरअंदाज कर देते हैं, इस के लिए उनकी घोर आलोचना होनी चाहिए। हमें उन हिंदुओं पर भी द्या आती है जो संभवतः धिम्मी नामक दिमागी बीमारी का शिकार हो चुके हैं (धिम्मी शब्द, जिसका अर्थ निचले दर्जे के नागरिक होता है, मुस्लिम बस्तियों में रहने वाले गैर-मुस्लिमों के इस्तेमाल किया जाता है)। शायद मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले सक्सेना जैसे अन्य हिंदू भी स्टॉकहोम सिंड्रोम का शिकार हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि धर्मनिरपेक्ष राज्य कभी भी उनकी मदद के लिए नहीं आएगा।

जहां भारत हाथ-पर-हाथ धरे रहने की नीति अपनाऐ बैठा है, वहीं इज़राइल अपने यहूदी नागरिकों को 24/7 सुरक्षा प्रदान करता है जो चारों ओर से फिलिस्तीनियों से घिरे इलाकों में रहते हैं। ये यहूदी नागरिक स्वचालित राइफलों से लैस हैं और छतों पर इज़राइली रक्षा बल के स्नाइपर्स और सड़कों पर सुरक्षाकर्मी तैनात रहते है। भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था और जनसंख्या वाला देश है। मुस्लिमबहुल इलाकों में डर के साए में रहने वाले अपने हिंदू लोगों को आसानी से ऐसी सुरक्षा प्रदान कर सकता है। लेकिन न तो राज्य ने सुरक्षा देने का कोई निर्णय किया है, न ही हिंदुओं ने इसकी मांग की है।

आज भारत में कई इलाकों में मुस्लिम बस्तियां मिनी-पाकिस्तान में बदल रही है और सरकार चुप है। तुफैल अहमद चेतावनी देते हुए कहते हैं कि आने वाले समय में सेकुलरपंथी के कारण हिंदुओं को केरल, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों से भागने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जैसे हमारे जीवनकाल में हिंदुओं को कश्मीर से पलायन होने के लिए मजबूर किया गया था। सरकार के पास धर्मनिरपेक्षता का कोई समाधान नहीं है। दीमक की तरह, धर्मनिरपेक्षता का कीटाणु भारतीय गणतंत्र की जड़ों को खा रहा है और यह कीटाणु चुनाव के समय और भी ज्यादा पोषित हो जाता है।”[11]

सेकुलरपंथी को आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गैरकानूनी तरीके से संविधान में शामिल किया था। उस वक्त पूरा विपक्ष जेल में था या भूमिगत हो गया था।[12] इसलिए इसे संविधान से हटाने की जरूरत है। क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का एकमात्र काम हिंदू धर्म को नष्ट करना है।

 संदर्भ 

[1] Durant, The Story of Civilization, Chapter I, Our Oriental Heritage, page 265

[2] 2018 Ankit Saxena murder case: Three sentenced to life in prison by Delhi judge | Latest News Delhi – Hindustan Times;

https://www.hindustantimes.com/cities/delhi-news/three-who-killed-ankit-saxena-in-2018-sentenced-to-life-in-prison-by-delhi-judge-101709803441938.html

[3] Yes, My Son Was Killed, Don’t Link It To Religion: Delhi Photographer Ankit Saxena’s Father (ndtv.com), https://www.ndtv.com/delhi-news/yes-my-son-was-killed-dont-link-it-to-religion-delhi-photographer-ankit-saxenas-father-1808791

[4] Even If I Don’t Get Justice, Won’t Have Hatred Against Any Community, Says Father Of Ankit Saxena In An Appeal To Not Communalise Son’s Murder (outlookindia.com); https://www.outlookindia.com/society/even-if-i-dont-get-justice-wont-have-hatred-against-any-community-says-father-of-news-307803

[5] Revealed: World’s smartest nations; know India’s rank | Times of India Travel (indiatimes.com); https://timesofindia.indiatimes.com/travel/destinations/revealed-worlds-smartest-nations-know-indias-rank/photostory/107187581.cms

[6] The Concept of Brotherhood in Islam :: Gatestone Institute; https://www.gatestoneinstitute.org/2572/brotherhood-in-islam

[7] PHONEY SECULARISM IN INDIA — Time For The Pontiff and The Sultan to Rest in Peace | by Sanjay Dixit संजय | Medium; https://sanjay-dixit.medium.com/phoney-secularism-in-india-time-for-the-pontiff-and-the-sultan-to-rest-in-peace-ed53eaa1d75

[8] https://www.youtube.com/watch?v=EZzN_JDZMS8

[9] Secularism is a National Security Threat to India | IndiaFactsIndiaFacts; https://indiafacts.org/secularism-threat-india/

[10] Shameful to use Ankit Saxena’s murder to stoke Hindu-Muslim tensions (dailyo.in); https://www.dailyo.in/politics/ankit-saxena-murder-honour-killing-muslims-right-wing-delhi-crime-murder-22179

[11] Secularism is a National Security Threat to India – Indiafacts; https://www.indiafacts.org.in/secularism-threat-india/

[12] 42nd Amendment, Was it India’s or Indira’s Constitution? CCRD (vidhiaagaz.com); https://ccrd.vidhiaagaz.com/42nd-amendment-of-indian-constitution/

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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