जब मनोरंजन को सांस्कृतिक मानदंडों के ख़िलाफ़ एक हथियार बनाया जाता है: भारत की ओटीटी चुनौती
- ओटीटी वेब सीरीज वोकिज़्म और बढ़ते हिंदूफोबिया के लिए एक खेल का मैदान बन कर रह गई हैं, जिसमें हिंदू रीति-रिवाजों और देवी-देवताओं का मज़ाक़ उड़ाना अब आम बात हो गई है।
- भारतीय मध्यम वर्ग और हिंदू परिवारों के विकृत चित्रण को “प्रगतिशील” के रूप में पेश किया जा रहा है, जो पारंपरिक मूल्यों को खत्म करने के उद्देश्य से किए जाने वाले सॉफ्ट प्रोपेगैंडा के रूप में काम कर रहा है।
- कई हिंदी वेब सीरीज़ राजनीतिक टीका टिप्पणी के रूप में भी कार्य करती हैं, विरोध की संस्कृति का महिमामंडन करती हैं और मनोरंजन के बहाने वैचारिक पूर्वाग्रह को बढ़ावा देती हैं।
- यह वोक एजेंडा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में मीडिया, शिक्षाविदों और pop culture पर हावी होता हुआ एक बड़ा वैश्विक रुझान है।
- भारतीय सरकार ने ओटीटी प्लेटफार्मों को विनियमित करने के लिए कदम उठाए हैं, परंतु असली परिवर्तन तब आएगा जब हिंदू सक्रिय रूप से प्रतिरोध करेंगे, अपनी विरासत पर गर्व करेंगे, और सम्मानजनक, मूल्य-संचालित कंटेंट की मांग करेंगे।
हिंदूफोबिया एक वाचाल, गुप्त और वैश्विक प्रतिष्ठानों में गहराई से जड़ें जमाए हुए, दोहरा मापदंड है। यह सड़कों पर नारे लगा अपना परिचय नहीं देता, बल्कि नीति दस्तावेज़ों, अकादमिक रिपोर्ट्स, मीडिया चर्चाओं और वेब सीरीज़ जैसी सांस्कृतिक चीज़ों के ज़रिए धीरे-धीरे सोच में जगह बनाता है। इसके पीछे एक संगठित बौद्धिक नेटवर्क काम करता है। यह एक आधुनिक अंदाज़ में पेश किया गया परिष्कृत नैरेटिव है, जो सूट-बूट में छिपे ज़हर जैसा है—दिखने में शांत पर असल में बेहद खतरनाक।
राजीव मल्होत्रा और विजया विश्वनाथन की किताब Snakes in the Ganga दिखाती है कि पश्चिमी विश्वविद्यालय भारत में वोक विचारधारा को भेजते हैं, जो “सामाजिक न्याय” के नाम पर हिंदू मान्यताओं को कमजोर करती है। जब यह सोच भारतीय व्यवस्था में जगह बना लेती है, तो यह देश की शिक्षा, राजनीति और संस्कृति को बदलने वाली एक वैचारिक मशीन बन जाती है।
मीडिया इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा सहायक बनता है। वह इस नैरेटिव को लगातार प्रचारित करता है ताकि यह हर घर तक पहुंचे। जब इसमें बुद्धिजीवियों और नीति निर्धारकों को जोड़ दिया जाता है, तो यह जनमत को दिशा देने वाली एक पूरी व्यवस्था बन जाती है। लेकिन इस सोच को आम जनता तक पहुँचाने का सबसे असरदार तरीका जन-संस्कृति (pop culture) है।
नेटफ्लिक्स की घिसी-पिटी स्क्रिप्ट्स से लेकर खोखली बॉलीवुड फिल्मों तक, सभी में एक साफ एजेंडा दिखता है: परंपरा की हँसी उड़ाओ, धर्म को अपमानित करो, और नैतिक पतन को ‘प्रगति’ के नाम पर महिमामंडित करो। ‘वोकिज़्म’ ने समावेशिता के नाम पर डिजिटल प्रसिद्धि का एक आसान रास्ता बना लिया है। और क्योंकि युवा ही इसका मुख्य लक्ष्य हैं, इसलिए यह रणनीति महज़ इत्तेफ़ाक नहीं, बल्कि सोच-समझ कर अपनाई गई है।
बॉलीवुड पहले से ही हिंदुओं को नकारात्मक रूप में दिखाता रहा है: साधु अक्सर ठग दिखाए जाते हैं, और खलनायक तिलकधारी। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद यह प्रवृत्ति और तेज़ हो गई है। कोविड के बाद से ये प्लेटफॉर्म वोक नैरेटिव के लिए उर्वर ज़मीन बन गए हैं, जहाँ लॉकडाउन के दौरान कंटेंट की कमी का फायदा उठाकर हिंदू विरोधी कहानियाँ आसानी से परोसी गईं।
मुख्यधारा के सिनेमा के उलट, OTT पर निगरानी बेहद कम है। सेंसर बोर्ड की अनुपस्थिति ने हिंसक, अश्लील और हिंदू-विरोधी कंटेंट को बेरोकटोक फैलने दिया। जो कभी एक वैकल्पिक मनोरंजन माध्यम था, वह अब एक ऐसा मंच बन गया है जहाँ तोड़ी-मरोड़ी गई कहानियों के ज़रिए हिंदू आस्था और परंपराओं को निशाना बनाया जा रहा है।
आगे के हिस्सों में, हम विस्तार से समझेंगे कि OTT कैसे हिंदू-विरोधी सोच के प्रचार का जरिया बना, इसके पीछे कौन-सी शक्तियाँ काम कर रही हैं, और इसके बढ़ते प्रभाव पर रोक लगाने के लिए कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं।
हिंदूद्वेष (हिन्दू फोबिया) को बढ़ावा देना
पश्चिमी लोकप्रिय संस्कृति ने अक्सर हिंदुओं और उनकी परंपराओं को एक विचित्र और सतही तरीके से चित्रित किया है। रीति-रिवाजों और त्योहारों से लेकर देवी-देवताओं तक, ये चित्रण आमतौर पर अज्ञानता और वास्तविक समझ की कमी से आते हैं। शुरुआत में जिसे “विचित्र” बना कर दिखाया जाता है, वह समय के साथ अपमान और गलतफहमी का कारण बन सकता है, और फिर उसे खलनायक की तरह भी पेश किया जा सकता है।
NBC के SNL शो में दिखाया गया “कॉमिक” स्केच, जिसमें हिंदू देवताओं को किसी अंधविश्वासी गिरोह की तरह प्रस्तुत किया गया, इस बात का प्रमाण है कि यह एक वैश्विक ट्रेंड बनता जा रहा है। शो का एक अंश (जिसमें लोकप्रिय अमेरिकी गायिका लेडी गागा ने भी डेब्यू किया था), जो इंटरनेट पर वायरल हो गया, कथित तौर पर काली शक्तियों से जुड़े रीति-रिवाजों का मज़ाक उड़ाता दिखाया है, लेकिन वास्तव में हिंदू देवी-देवताओं का उपहास उड़ाता और उन्हें अंधविश्वासी रूप में पेश करता है।[1]
भले ही हम पश्चिम में हिंदू धर्म और संस्कृति की समझ की कमी को देखते हुए हिन्दू धर्म के ऐसे चित्रण को नासमझी कह कर अनदेखा कर दें, परंतु भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी में इस तरह की सामग्री की भरमार को हम किस आधार पर उचित ठहरा सकते हैं?
2021 में अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ “तांडव” हिंदूफोबिया की मिसाल बन गई। इस शो ने “अभिव्यक्ति की आज़ादी” के नाम पर हिंदू धर्म के खिलाफ ज़हर फैलाया और हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश की। विवाद की शुरुआत उस क्लिप से हुई, जिसमें विवेकानंद इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में आयोजित एक नाटक के मंच पर भगवान शिव और नारद मुनि के रूप में दो किरदारों के बीच बातचीत दिखाई गई थी। इस डायलॉग में “आज़ादी”, जातिवाद, सामंतवाद जैसे ‘वोक’ लेफ्टपंथी शब्दों का ज़िक्र था, और “एंटी-नेशनल” जैसे शब्दों का मज़ाक उड़ाया गया।[2] इस सीन को देखकर लोगों को लगा कि शो हिंदू देवताओं की बेइज़्ज़ती कर रहा है और जानबूझकर धर्म को राजनीति में घसीट रहा है। तांडव पर सोशल मीडिया पर भारी गुस्सा फूटा। हजारों हिंदुओं ने इसे हिंदू-विरोधी बताते हुए बॉयकॉट की मांग की, IMDb पर इसकी रेटिंग गिराई और सरकार से बैन लगाने की अपील की।[3]
लेकिन यह तो बस शुरुआत मात्र है। बहुत से भारतीय ओटीटी प्लेटफॉर्म्स अब इस होड़ में लगे हैं कि कौन ज़्यादा हिंदू विरोधी कंटेंट पेश कर सकता है। पाताल लोक, आश्रम, लीला, मेड इन हेवन, असुर और लूडो जैसे शो ऐसे विषयों से भरे पड़े हैं। उदाहरण के लिए, जून 2019 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई और दीपा मेहता द्वारा निर्देशित लीला एक अंधकारमय काल्पनिक भविष्य दिखाती है जहाँ “आर्यावर्त” नामक एक हिंदू राज्य लोगों के साथ उनके धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। असुर वेब सीरीज़, जिसमें साइको किलर हिंदू पवित्र ग्रंथों को पढ़ते हुए दिखाए गए हैं, यह धारणा बनाता है कि हिंदू धर्मग्रंथों को पढ़ने से व्यक्ति की अंतरात्मा की आवाज़ नष्ट हो जाती है और नकारात्मकता और विषाक्तता पैदा होती है। अमेज़न प्राइम सीरीज़ पाताल लोक में भी कई ऐसे दृश्य शामिल हैं जो हिंदू मान्यताओं और परंपराओं का मज़ाक उड़ाते हैं। एक दृश्य में एक हिंदू पुजारी को मांस पकाते हुए दिखाया गया है, जिसे एक राजनेता दुर्गा माँ की तस्वीर के सामने बैठकर खाता है। दूसरे में, भगवान शिव की एक कार्टून-शैली की छवि जेल की दीवार पर चित्रित की गई है, जो हिंदुओं के आराध्य शिव भगवान और अपराधियों के बीच के संबंध का संकेत देती है।[4]
अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम हो रही ज़ोया अख़्तर की मेड इन हेवन हिंदू विवाह की पवित्रता का खुलेआम मज़ाक उड़ाती है और इसे बदनाम करती है। यह सीरीज़ तारा नामक एक महत्वाकांक्षी महिला के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने दोस्त करण के साथ मिलकर दिल्ली में “मेड इन हेवन” नामक एक विवाह नियोजन एजेंसी चलाती है। प्रत्येक एपिसोड में एक हाई प्रोफाइल शादी दिखाई जाती है, जिसमें किरदारों की जीवन कहानियाँ भी शामिल होती हैं। सीरीज़ में दिखाए गए लगभग हर हिंदू विवाह में हिंदू रीति-रिवाजों, और हिंदू आस्थाओं को भीतर ही भीतर खोखला किया जाता है। इसी के साथ, जातिवाद, लिंग भेदभाव, रंगभेद आदि जैसे मुद्दों को जबरन पटकथा में जोड़ा जाता है।[5]
भारतीय ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी अनगिनत वेब सीरीज़ हैं, जो खुलेआम हिंदुओं और हिंदू धर्म का मज़ाक उड़ाती हैं। परंतु इस पर जिस तरह की सार्वजनिक प्रतिक्रिया होनी चाहिए, वह शायद ही कभी देखने को मिलती है। हालाँकि कुछ लोग चुनिंदा शोज़ के खिलाफ़ बोलते हैं, लेकिन ओटीटी कंटेंट में हिंदूफोबिया के बढ़ते सामान्यीकरण पर शायद ही कोई एकजुट आक्रोश दिखाई देता है।
इसका एक कारण यह है कि भारत में हिंदूफोबिया को अक्सर “प्रगतिशील सोच” या “आलोचनात्मक आत्मनिरीक्षण” के नाम पर दरकिनार ही नहीं किया जाता, बल्कि बढ़ावा दिया जाता है। इसलिए यदि कोई इस पर आवाज़ उठाता है, उसे ‘पिछड़ा’ करार दे दिया जाता है, या “हिंदुत्ववादी” कह कर खारिज कर दिया जाता है।
हालांकि अब धीरे धीरे हिंदू समाज पहले से ज़्यादा सतर्क होता जा रहा है और हिंदू-विरोधी सामग्री के विरोध में खुलकर बोलने लगा है। बढ़ते जन दबाव ने सरकार को भी इस पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया है। उदाहरण के लिए, जुलाई 2023 में तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी दी थी कि सरकार रचनात्मक स्वतंत्रता की आड़ में भारतीय समाज और संस्कृति का अपमान नहीं होने देगी।[6] नवंबर 2024 में भारत के आईटी मंत्रालय ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को विनियमित करने के लिए कानून बनाने के महत्व को दोहराया।[7]
अब वक्त आ गया है कि सरकार ठोस कार्रवाई करे और जनता के बीच इस विषय पर खुलकर संवाद हो। हिंदूफोबिया को पहचानना और उसे साफ़-साफ़ नाम देना बेहद ज़रूरी है, न कि उसे कला की आड़ में छिपा दिया जाए। OTT मंचों को ज़िम्मेदार ठहराना होगा, ताकि वे “क्रिएटिव एक्सप्रेशन” का बहाना बनाकर हिंदू धर्म को निशाना न बना सकें।
भारतीय संस्कृति को नष्ट करना
2020 में, बी-ग्रेड बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर अभिनीत वयस्क (adult) वेब सीरीज़ रसभरी अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुई। सॉफ्ट पोर्न की सीमा लांघता यह शो एक स्कूल टीचर की कहानी बताता है, जिसका पति अक्सर बाहर रहता है, और इसके चलते वह कई पुरुषों, जिनमें उसके छात्र भी शामिल हैं, की कल्पनाओं और आकर्षण का केंद्र बन जाती है। उसका एक दूसरा व्यक्तित्व भी है, जिसकी हरकतें यौन जुनून से भरी लगती हैं। इस सीरीज़ को कई लोगों ने असहज और देखना मुश्किल बताया है, खासकर इसकी शिक्षक-छात्र की पृष्ठभूमि को लेकर।
रसभरी को इसके अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट के लिए कई समीक्षा प्लेटफार्मों पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के प्रमुख प्रसून जोशी ने भी सार्वजनिक रूप से एक विशेष रूप से परेशान करने वाले दृश्य की आलोचना की, जिसमें एक बच्ची नशे में धुत पुरुषों के एक समूह के सामने अश्लील तरीके से नाचती हुई दिखाई गई थी।[8]
दुखद विषय यह है कि इस तरह की सामग्री बच्चों तक सिर्फ़ एक क्लिक के माध्यम से आसानी से पहुँच जाती है। और रसभरी तो बस शुरुआत है – कई वेब सीरीज़ में नग्नता और सॉफ्ट पोर्न की भरमार आम बात हो गई है, जिसका कारण केवल नियामक निगरानी की कमी है।
सबसे चिंता की बात ये है कि अब ये शोज़ भारतीय मिडल क्लास को भी मज़ाक बनाकर दिखा रहे हैं। ‘संस्कार’ के दिखावे के पीछे ये दिखाया जाता है कि इस समाज के भीतर नैतिक पतन छिपा हुआ है — आम आदमी और औरतों को हताश, कामुक और पारिवारिक मूल्यों से नफरत करने वाला बताया जाता है।
इन कहानियों में मिडल क्लास ज़िंदगी को एक दिखावटी नाटक की तरह पेश किया जाता है, जहाँ बाहर से लोग जितना आदर्श दिखते हैं, अंदर से उतना ही अपने ही मूल्यों को तोड़ते नज़र आते हैं। पहले सिर्फ अमीरों को नैतिक रूप से गिरा हुआ दिखाया जाता था, अब निशाना मिडल क्लास पर है। आज भारतीय मध्यवर्ग ‘वोक’ कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक नया निशाना बन गया है — जिनका मकसद संस्कृति की परिभाषा को दोबारा लिखना है। उदाहरण के लिए, मेड इन हेवन में, मुख्य पात्र तारा, जो एक मध्यम वर्गीय परिवार से आती है, अपनी सांस्कृतिक पहचान से शर्मिंदा है और एक अति-धनी व्यवसायी की सगाई तोड़ने और उससे शादी करने के लिए छल और यौन चालबाज़ी का इस्तेमाल करती है।[9]
सच तो ये है कि OTT प्लेटफॉर्म पर जो कंटेंट दिखाया जाता है, उसमें भारतीय मिडल क्लास (मध्यम वर्ग) की तस्वीर अक्सर तोड़ी-मरोड़ी हुई होती है। खासकर हिंदू परिवारों को एक ‘वोक’ नजरिए से दिखाया जाता है, जिससे धीरे-धीरे पारंपरिक भारतीय मूल्यों को कमजोर करने वाली एक छिपी हुई सांस्कृतिक प्रोपेगैंडा चलाई जाती है। इस तरह की ग़लत तस्वीरें मिडल क्लास को ऐसे पेश की जाती हैं मानो ये उन्हीं की सच्चाई हो, और इसी बहाने परिवार और संस्कृति की जड़ें धीरे-धीरे हिलाई जाती हैं।
वोकिज़्म का महिमामंडन
OTT प्लेटफॉर्म पर जहां एक ओर हिंदू विरोधी सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं कई हिन्दी वेब सीरीज़ में ‘वोक एजेंडा’ और विरोध-प्रधान संस्कृति को भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, जिनमें गहरा राजनीतिक रंग होता है।
इन सीरीज़ में अक्सर ठोस कहानी की कमी होती है। इसकी जगह चमक-दमक, अमीरों की जीवनशैली, सेक्स, शराब और तथाकथित ‘मुक्ति’ व ‘प्रगतिशील मूल्यों’ का तड़क-भड़क भरा मिश्रण परोसा जाता है। इन्हें देखकर लगता है जैसे यह कोई अति-वोक दुनिया हो, जहां हर बात में किसी न किसी सामाजिक आंदोलन की झलक दिखाई जाती है, और सेक्स, शराब व गालियों को स्वतंत्रता पाने का सबसे तेज़ रास्ता बताया जाता है।
भारतीय संदर्भ में एक और साफ़ दिखने वाली बात यह है कि जानबूझकर ‘लेफ्ट बनाम राइट’ यानी वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ की लड़ाई को कहानी में घुसेड़ा जाता है। इसमें अच्छे, उदार और प्रगतिशील किरदारों को दिखाया जाता है जो हमेशा परंपरावादी ‘हिंदुत्व’ विचारधारा वाले लोगों से लड़ते हैं। इन ‘हिंदुत्व वालों’ को अक्सर ज़्यादा दबंग, और महिलाओं व दलितों के प्रति दमनकारी बताया जाता है। इसके उलट, जो ‘अच्छे’ किरदार होते हैं, वो वही होते हैं जो हिंदू परंपराओं की आलोचना करते हैं। इस तरह कहानी सुनाने का उद्देश्य बदलकर एजेंडा थोपने में बदल जाता है—एक ऐसा ‘वोक नैरेटिव’ जो लगातार हिंदू धर्म, उसकी संस्कृति और उससे जुड़े राजनीतिक स्वर को बदनाम करता है।
उदाहरण के लिए, अमेज़न प्राइम की वेब सीरीज़ Four More Shots Please को देख लीजिए। यह शो चार अमीर शहरी महिलाओं की दोस्ती और निजी जीवन की कहानियों को दिखाता है, लेकिन इनकी समस्याएं भारतीय संदर्भ में बहुत सतही और गैर-प्रासंगिक लगती हैं। इसमें नारी वाद की एक चकाचौंध से भरी, सतही तस्वीर पेश की जाती है जो ज़्यादातर भारतीय महिलाओं की असली चुनौतियों से दूर है। इसके दूसरे सीज़न में अचानक ‘सोशल एक्टिविज़्म’ का एक ट्रैक जोड़ दिया जाता है, जिसमें एक पात्र, दामिनी रिज़वी रॉय, जो कि पत्रकार है, एक ताकतवर दक्षिणपंथी नेता के पीछे पड़ जाती है। सीज़न 2 की एनडीटीवी समीक्षा भी अनजाने में ही इस तरह की ‘वोक’ सीरीज़ का फॉर्मूला सामने रख देती है। भले ही वो समीक्षा तारीफ में लिखी गई हो, लेकिन वह यह दिखाती है कि इस कंटेंट की असली संरचना क्या है:
“प्रतिनिधि किरदार सिर्फ ठोड़ी, सिर और दिल से कहीं अधिक के बारे में बात करते हैं… वे बिना किसी बाधा के मानव शरीर रचना के अन्य भागों और शारीरिक तरल पदार्थों को सामने रखते हैं, और वहां से गहन विचारों की खोज में आगे बढ़ते हैं – लिंग गतिशीलता, तनाव-प्रेरित हार्मोनल असंतुलन, जन्म-विरोधीवाद, बहुविवाह, खुले विवाह और बहुत कुछ।”[10]
भारतीय वेब सीरीज़ में वोकिज़्म की यह लहर वैश्विक मीडिया, शिक्षा जगत और जन-संस्कृति पर हावी होने वाली व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। वोकिज्म अक्सर एक मार्केटिंग टूल के रूप में काम करता है जो विशिष्ट विचारधाराओं और जीवन शैली को आगे बढ़ाता है। आज के परिदृश्य में यह तेजी से दूर-दराज़ के वामपंथी और पूंजीवादी ताकतों के बीच एक गठबंधन को दर्शाता है, जो दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों के साथ एक वैश्विक प्रतिसंस्कृति को आकार देता है।
इस वोक ढांचे में गहरी हिंदू-विरोधी भावना समाहित है। यही कारण है कि भारतीय वेब सीरीज अक्सर अनावश्यक सेक्स, हिंसा, लैंगिक अस्थिरता, नैतिक पतन का महिमामंडन, मात्र दिखावे के लिए किया जाने वाला विद्रोह और हिंदू-विरोधी रूढ़ियों की निरंतर धारा से भरी होती हैं।
समाधान क्या है?
भारतीय घरों में ओटीटी वेब सीरीज़ की व्यापक पहुंच को देखते हुए, इस बढ़ते संकट को संबोधित करने हेतु एक गंभीर विमर्श की शुरुआत करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इंटरनेट इन इंडिया की 2023 रिपोर्ट के निष्कर्षों के अनुसार, भारत में 700 मिलियन से अधिक लोग OTT प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक उपयोगकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। इसके अलावा, 208 मिलियन लोग अब वीडियो सामग्री का उपभोग करने के लिए विशेष रूप से इन इंटरनेट से जुड़े उपकरणों का उपयोग करते हैं, जो कमर्शियल टीवी पर अभी भी निर्भर 181 मिलियन से अधिक हैं।[11] ये आँकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। OTT सामग्री में हिंदूफोबिया या हिंदू विरोधी भावना का खतरनाक प्रचलन भारतीय दर्शकों को हिंदूद्वेष के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है, जो पहले से ही मुख्यधारा के मीडिया, सोशल मीडिया, शिक्षाविदों आदि द्वारा प्रसारित हिंदू विरोधी सामग्री से घिरे हुए हैं।
हिंदू विरोधी और सांस्कृतिक रूप से आपत्तिजनक सामग्री के मुद्दे से निपटने के लिए दो चीजें सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं: लोगों में जागरूकता बढ़ाना और कड़े नियम लागू करना। हिंदू परंपराओं की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि सामाजिक संगठन और धर्मनिष्ठ लोग एकजुट होकर अनुचित कंटेंट का विरोध करें और सही आवाज़ बुलंद करें। चुप रहना अब कोई विकल्प नहीं है; हिंदू समुदाय को इस सांस्कृतिक विकृति के खिलाफ़ एक मज़बूत और सक्रिय रुख अपनाने की ज़रूरत है।
हाल के वर्षों में, भारत सरकार ने ओटीटी क्षेत्र की अधिक सूक्ष्मता से जांच करना शुरू कर दी है। मार्च 2024 में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पोर्नोग्राफ़िक और अश्लील सामग्री स्ट्रीम करने के लिए 18 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और उनसे जुड़े सोशल मीडिया एकाउंट्स पर प्रतिबंध लगाकर एक साहसिक कदम उठाया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत उठाया गया यह कदम महिला अधिकार, बाल संरक्षण और मीडिया नैतिकता जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों के परामर्श के बाद उठाया गया।[12]
इससे पहले, तांडव विवाद के जवाब में, सरकार ने 2021 में एक स्व-नियमन तंत्र पेश किया था, जिसके तहत ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को 15 दिनों के भीतर दर्शकों की शिकायतों का समाधान करना आवश्यक है। इसका पालन न करने पर सरकारी जांच और संभावित कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, कई आलोचकों का मानना है कि इस से भी अधिक सख्त नियमों की आवश्यकता है।
नवंबर 2023 में, सरकार ने ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल का मसौदा पेश किया,[13] जिसका उद्देश्य नेटफ्लिक्स और जियोसिनेमा जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को औपचारिक नियामक ढांचे के अन्तर्गत लाना था। विधेयक में यह सुनिश्चित करने के लिए एक निरीक्षण निकाय स्थापित करने का प्रस्ताव था कि सभी सामग्री कार्यक्रम और विज्ञापन संहिता में निर्धारित नियमों का पालन करे। 2024 में, एक संशोधित मसौदे ने YouTubers जैसे डिजिटल कंटेंट निर्माताओं को शामिल करने के लिए दायरे का विस्तार किया। हालाँकि, कुछ हितधारकों की प्रतिक्रिया के कारण, सरकार ने कथित तौर पर संशोधित मसौदे को वापस ले लिया।[14] विधेयक अभी तक संसद में पेश नहीं किया गया है,[15] लेकिन यदि यह पारित हो क़ानून बन जाता है, तो भारत में ओटीटी विनियमन के परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकता है, और हिंदू विरोधी सामग्री के प्रसार को रोकने में कारगर साबित हो सकता है।
इसी बीच, बढ़ते सरकारी दबाव के चलते, भारतीय ओटीटी उद्योग ने अधिक से अधिक पारिवारिक प्रोग्रामिंग की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। यह प्रवृत्ति न केवल इन प्लेटफॉर्म्स का विवाद से बचाव करती है, बल्कि विज्ञापनदाताओं के लिए भी ज़्यादा आकर्षक है और व्यापक दर्शक वर्ग को आकर्षित करती है।[16]
निष्कर्ष
जब भारत के ओटीटी क्षेत्र को साफ़ करने की बात आती है तो अश्लील और फूहड़ सामग्री को विनियमित करना इस मुद्दे के मात्र एक पहलू को संबोधित करना है। जो इससे भी बड़ा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है – यानी कि बड़े पैमाने पर हिंदूफोबिया या हिंदूद्वेष के प्रचार प्रसार का मुद्दा, वह अभी भी ज्यों का त्यों बना हुआ है।
स्पष्ट तौर पर भौंडे और अश्लील कंटेंट के विपरीत, हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह हमेशा प्रत्यक्ष रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराता। बल्कि यह पटकथा में परोक्ष रूप से चुपचाप घुसपैठ करता है – साइड प्लॉट्स, धूर्त संवाद, प्रतीकात्मक कल्पना, तो कभी विकृत रूढ़ियों के माध्यम से। यह बेहद सूक्ष्म, सुनियोजित और प्रत्यक्ष रूप से आपत्तिजनक कंटेंट से कहीं अधिक खतरनाक है क्योंकि अक्सर दर्शक वर्ग के मस्तिष्क में इसका सामान्यीकरण हो जाता है। अतः गिने चुने अतिवादी मामलों पर केंद्रित व्यापक विनियमन इस तरह की वैचारिक पैंतरेबाज़ी को नहीं पकड़ पाएंगे। यहां तक कि “परिवार के अनुकूल” कंटेंट की ओर का हालिया रुख़ भी इस समस्या का कोई अचूक समाधान नहीं है। हिंदूफोबिक कथाएँ अब शादियों, त्योहारों या छोटे क़स्बों शहरों की कहानियों जैसे हानिरहित विषयों की आड़ में पटकथाओं में घुसाई जा रही हैं।
अतः ओटीटी पर प्रसारित हिंदू विरोधी कंटेंट पर अंकुश लगाने में विनियमन मदद तो करता है – लेकिन केवल एक सीमा तक। इस समस्या को पूर्ण रूप से संबोधित करने हेतु हमें बड़े पैमाने पर सार्वजनिक सतर्कता और एक गंभीर सांस्कृतिक पुनरावलोकन की आवश्यकता है। हिंदुओं को अब जागृत होकर हिंदू विरोधी भावना के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की आवश्यकता है। हिंदू समुदय को चाहिये कि वह अपनी परंपराओं और सभ्यतागत मूल्यों पर अब गर्व करना शुरू करे। जब दर्शक ऐसे कंटेंट को अस्वीकार करना शुरू कर देते हैं जो उनकी पहचान का सूक्ष्म रूप से मज़ाक़ उड़ाता है, तो कंटेंट निर्माता भी ऐसी सामग्री परोसने से पहले 100 बार सोचेंगे। यही सही समय है कि स्वच्छ, विचारशील और सांस्कृतिक रूप से सम्मानजनक कंटेंट – विशेष रूप से वह कंटेंट जो हिंदू संस्कृति को सम्मान के साथ मानता है – को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित, प्रचारित और पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
संदर्भ सूची
[1] American broadcast television NBC’s SNL show demonizes Lord Ram and ‘Om Namah Shivaay’ mantra in a “comic” satanic skit; https://www.opindia.com/2025/03/rampant-hinduphobia-in-us-american-broadcast-television-nbc-snl-show-demonises-lord-ram-and-om-namah-shivaay-mantra-in-satanic-skit/
[2] Tandav’ surpasses past web-series in anti-Hindu and divisive content, netizens call for ban; https://hindupost.in/media/tandav-becomes-latest-web-series-to/?fbclid=IwY2xjawJXIn1leHRuA2FlbQIxMAABHZOf2PNcuAQq55JDWYmXdhbGViz-BTzOHeSXKMx-HK6JZLRtNtIdJ5FY5w_aem_g5-v33NAVidx0079U_A0pA
[3] Netizens call for a boycott of Tandav web-series on Amazon Prime; https://www.opindia.com/2021/01/netizens-call-for-a-boycott-of-tandav-web-series-on-amazon-prime/
[4] OTT turned into a subtle tool to demonize Indian culture and tradition; https://myvoice.opindia.com/2022/11/ott-turned-into-a-subtle-tool-to-demonise-indian-culture-and-tradition/
[5] Made in Heaven’ or Made in Hell soft propaganda to malign Hindus?; https://hindupost.in/media/made-in-heaven-or-made-in-hell-soft-propaganda-to-malign-hindus/
[6] Will not allow OTT platforms to demean Indian culture, society: Anurag Thakur – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/will-not-allow-ott-platforms-to-demean-indian-culture-society-anurag-thakur-2408444-2023-07-18
[7] Why IT Minister thinks India needs to urgently make laws to ‘regulate’ Netflix, Amazon Prime, Facebook, Instagram and other OTT/social media platforms – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/technology/tech-news/why-it-minister-thinks-india-needs-to-urgently-make-laws-to-regulate-netflix-amazon-prime-facebook-instagram-and-other-ott/social-media-platforms/articleshow/115737176.cms
[8] Swara Bhaskar’s series gets bad ratings, leftists say it is because she opposed CAA and NRC; https://www.opindia.com/2020/07/swara-bhasker-web-series-rasbhari-low-ratings-imdb-amazon-prime-leftists/
[9] ‘Made in Heaven’ or Made in Hell soft propaganda to malign Hindus?; https://hindupost.in/media/made-in-heaven-or-made-in-hell-soft-propaganda-to-malign-hindus/
[10] Four More Shots Please! Season 2 Review: Bolder, Brighter, Breezier Than Before; https://www.ndtv.com/entertainment/four-more-shots-please-season-2-review-bolder-brighter-breezier-than-before-3-5-stars-out-of-5-2213283
[11] Four More Shots Please! Season 2 Review: Bolder, Brighter, Breezier Than Before; https://www.ndtv.com/entertainment/four-more-shots-please-season-2-review-bolder-brighter-breezier-than-before-3-5-stars-out-of-5-2213283
[12] Govt bans 18 OTT platforms for streaming obscene, vulgar, and pornographic content; https://www.opindia.com/2024/03/govt-bans-18-ott-platforms-for-streaming-obscene-vulgar-and-pornographic-content/
[13] Washington Post peddles anti-Bharat propaganda alleging the government is censoring OTT content; https://hindupost.in/media/washington-post-peddles-anti-bharat-propaganda-alleging-the-government-is-censoring-ott-content/
[14] India’s OTT Regulation Bill: Digital Creators on the Radar; https://www.medianama.com/2025/03/223-standing-committee-urges-quick-action-on-broadcast-bill-in-parliament/
[15] Parliament panel seeks early talks on broadcast bill | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/parliament-panel-seeks-early-talks-on-broadcast-bill-101741720844184.html
[16] The rise of family-centric OTT content: A game-changer in streaming – Brand Wagon News | The Financial Express; https://www.financialexpress.com/business/brandwagon-the-rise-of-family-centric-ott-content-a-game-changer-in-streaming-3691495/
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