भारत की स्कूली संस्कृति पर हमला: हिंदू बच्चों को साधन बनाकर फैलाया जा रहा हिंदू-विरोध

“सेक्युलर” शिक्षा के मुखौटे की आड़ में एक सुनियोजित खेल चल रहा है—जिसका मक़सद है हिंदू सांस्कृतिक गौरव को मिटाकर उसकी जगह अब्राहमिक सोच ठूँस देना, ताकि अगली पीढ़ी अपनी सभ्यतागत जड़ों से पूरी तरह से कट  जाये, और अपनी ख़ुद की सभ्यतागत पहचान को घृणा और नफ़रत के भाव से देखे।
  • हिंदू पहचान मिटाने के इरादे से स्कूली संस्कृति को हथियार बनाया जा रहा है। धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर हिंदू छात्रों को तंग करना, डराना और प्रताड़ित करना अब भारतीय स्कूलों में आम हो गया है।
  • कई बार उन पर दबाव डाला जाता है कि वे अब्राहमिक रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करें।
  • शिक्षक और सहपाठी हिंसा तक का सहारा लेकर हिंदू बच्चों को धमकाते हैं।
  • वाम-उदारवादी तंत्र इस एजेंडे को “सेक्युलरिज़्म” और “धार्मिक विविधता” कहकर सही ठहराता है, और विरोध करने वालों को “हिंदुत्व वर्चस्ववादी” बताकर खारिज कर देता है।
  • सुनियोजित तरीके से हिंदू छात्रों को उनकी सांस्कृतिक-सभ्यतागत जड़ों से काटकर भारत-विरोधी विमर्श की ओर मोड़ा जा रहा है।
  • असल में, यह शिक्षा प्रणाली को मोहरा बनाकर हिंदू धर्म, संस्कृति और सभ्यता को कमजोर करने की संगठित कोशिश है।

भारत की शिक्षा व्यवस्था एक लंबे समय तक नव उपनिवेशवाद की छाया से ग्रस्त रही। आज़ादी के बाद से ही वाम-उदारवादी तंत्र ने शिक्षा व्यवस्था पर गहरी पकड़ बना ली, जिसके चलते स्कूली पाठ्यपुस्तकों में इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाने लगा और हिंदू सभ्यता की पहचान को धूमिल किया गया। हिंदू राजाओं, विद्वानों और विचारकों के योगदान को या तो नगण्य दिखाया गया या पूरी तरह दबा दिया गया, जबकि विदेशी आक्रमणकारियों का महिमामंडन किया गया और भारत के प्राचीन इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण के बजाय पश्चिमी नज़रिये से पढ़ाया गया। भारतीय ज्ञान-परंपराओं की उपेक्षा कर पश्चिमी उपलब्धियों का बखान किया गया। दशकों तक यही पक्षपात चलता रहा—NCERT की किताबों में मुग़ल बादशाहों की प्रशंसा की गई, जबकि हिंदू धरोहर को हाशिये पर धकेल दिया गया।

हालाँकि नई शिक्षा नीति 2020 ने इन विकृतियों को दुरुस्त करने की जो शुरुआत की है,[1] उससे एक नई आशा की किरण तो ज़रूर जगती है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों में हाल के संशोधन इसी बदलाव की दिशा को दिखाते हैं—जहाँ औरंगज़ेब को “मंदिर तोड़क,” बाबर को “निर्दयी आक्रांता,” और अकबर को “क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण” बताया गया है। यह कदम लंबे समय से चल रहे वामपंथी इतिहासकारों के प्रोपेगंडा को सशक्त चुनौती देने वाली पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन असली समस्या सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों की संस्कृति में भी गहराई से मौजूद है। कई हिंदू बच्चों के लिए इस प्रकार का हिंदू-विरोधी पक्षपात रोज़मर्रा का अनुभव है। किसी का बिंदी पहनने या तिलक लगाने पर मज़ाक उड़ाया जाता है, तो किसी के जनेऊ को “पिछड़ा” कहकर उसे नीचा दिखाया जाता है। कहीं कहीं तो हिंदू त्योहारों को अंधविश्वास का प्रतीक लेबल कर उन्हें ख़ारिज कर दिया जाता है। बच्चों को स्कूल में अपनी मातृभाषा बोलने से रोका जाता है, या दीवाली जैसे त्योहारों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है जबकि दूसरे त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। कुछ बच्चों को तो अपनी हिंदू पहचान की वजह से तमाम तरीक़े की प्रताड़नाएं तक झेलनी पड़ती है। यहाँ तक कि कभी-कभी मासूम बच्चों को खुलेआम डराया धमकाया जाता है, और उन्हें शारीरिक यातनाओं तक का सामना करना पड़ता है, कभी सहपाठियों के हाथों, तो कभी शिक्षकों के।[2]

लगातार ऐसे कड़वे अनुभव झेलते-झेलते बच्चे भीतर से टूटने लगते हैं। ज़हरीले माहौल का असर उनके मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा होता है कि वे स्कूल जाने से कतराने लगते हैं। जो स्थान उनके जीवन को सँवारने और उज्ज्वल भविष्य की तैयारी का केंद्र होना चाहिए, वही एक खामोश रणभूमि में बदल जाता है—जहाँ हिंदू धर्म, संस्कृति और सभ्यता को धीरे-धीरे कुचला जाता है। शिक्षा का यह हथियारीकरण भारत के भविष्य के लिए अत्यंत गंभीर चुनौती है, लेकिन विडंबना यह है कि अब तक इस पर कोई ठोस चर्चा तक शुरू नहीं हुई है। लोगों को इसकी गहराई और ख़तरे का अंदाज़ा भी शायद ही हो पाया है।

कलावे से तिलक तक: हिंदू प्रतीक निशाने पर

मीडिया रिपोर्टों से साफ़ दिखता है कि स्कूलों में हिंदू छात्रों को उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के कारण तंग करने, डराने-धमकाने और प्रताड़ित करने की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। इसके बावजूद, हिंदू बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ते hate crimes यानी घृणा अपराधों पर मुख्यधारा मीडिया में समग्र और गंभीर विमर्श लगभग नदारद है। अधिकतर मामलों में मीडिया तब ही संज्ञान लेता है जब कोई घटना इतना बड़ा रूप ले ले कि राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ जाए। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाले छोटे मीडिया प्लेटफ़ॉर्म लगातार ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग करते हैं, जहाँ हिंदू छात्रों को उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के कारण सुनियोजित रूप से निशाना बनाया जाता है।

ऐसा ही एक भयावह मामला हाल ही में छत्तीसगढ़ के बगडुमर में सामने आया, जहाँ मदर टेरेसा स्कूल की प्रिंसिपल को गिरफ़्तार किया गया। आरोप है कि उन्होंने ढाई साल की एक मासूम बच्ची को सिर्फ़ इसलिए बेरहमी से पीटा और उसके मुँह पर टेप चिपका दिया क्योंकि उसने उन्हें “राधे-राधे” कहकर नमस्कार किया था। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार “बच्ची के गाल पर चोट के निशान थे और उसके पेट पर खरोंचें पाई गईं।[3]

ऐसी ही एक और घटना बिहार में हुई, जहाँ 30 बच्चों को दो शिक्षकों द्वारा सिर्फ़ इसलिए पीटा गया क्योंकि उन्होंने अपनी कलाई पर कलावा (हिंदुओं द्वारा पहना जाने वाला पवित्र धागा) बाँधा हुआ था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इन दोनों शिक्षकों ने (जिनकी पहचान ईसाई धर्म से जुड़ी बताई गई) बच्चों को खासतौर से कलावा पहनने के लिए ही निशाना बनाया[4]

ठीक इसी तरह, झारखंड के बोकारो स्थित कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल में भी एक हाई स्कूल छात्र को कलावा पहनने पर शिक्षक ने पीटा और उसे कलावा काटने के लिए मजबूर किया[5]

देशभर के स्कूलों से ऐसी कई ख़बरें आती रहती हैं, जहाँ हिंदू छात्रों को महज़ कलावा पहनने, तिलक लगाने या कलाई पर राखी बाँधने के लिए प्रताड़ित किया जाता है, या मारा-पीटा जाता है।[6] [7] [8] [9] अगर आप “Hindu student beaten up for wearing tilak” या “Hindu student beaten up for wearing Kalawa” जैसे वाक्यों की गूगल सर्च करेंगे, तो आपको देशभर के स्कूलों से दिल दहला देने वाली ऐसी कई घटनाओं के वृत्तांत मिल जाएँगे। रिपोर्ट हुए मामलों की संख्या ही इतनी अधिक है कि यह कल्पना करना कठिन हो जाता है कि कितने और मामले ऐसे होंगे जो दर्ज ही नहीं हो पाए और दबा दिए गए। यह और भी विचलित करने वाली बात है कि एक तथाकथित “हिंदू बहुल” देश में हिंदू बच्चों की स्कूलों में ऐसी दुर्दशा हो रही है। लेकिन कटु सत्य यही है। यह उसी देश की हकीकत है जहाँ “सेक्युलरिज़्म” को अक्सर इस तरह इस्तेमाल किया जाता है कि हिंदू समाज की चिंताओं को दरकिनार कर दिया जाए, और “अल्पसंख्यक मुद्दों” को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए कि बहुसंख्यक समुदाय पर हो रहा अन्याय सामान्य और तुच्छ प्रतीत होने लगे।

रिपोर्ट किए गए मामलों में कई उदाहरण ऐसे भी हैं जहाँ हिंदू छात्रों को डराकर या मानसिक दबाव डालकर ज़बरदस्ती अब्राहमिक धार्मिक परंपराओं और रिवाजों में शामिल किया गया। जुलाई में सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में कोटा (राजस्थान) के एक स्कूल में हिंदू छात्रों को सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान कलमा (इस्लामिक दुआ) पढ़वाते हुए देखा गया। हालाँकि, स्कूल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि फुटेज कई साल पुराना है और वार्षिक कार्यक्रम के दौरान रिकॉर्ड किया गया था, फिर भी ज़िला शिक्षा विभाग ने मामले की जाँच शुरू कर दी है।[10]

अक्टूबर 2023 में गुजरात के एक स्कूल में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहाँ हिंदू छात्रों को जागरूकता कार्यक्रम के नाम पर नमाज़ अदा करने के लिए कहा गया।[11] हाल ही में उज्जैन (मध्य प्रदेश) के एक सरकारी स्कूल में एक शिक्षक पर आरोप लगा कि उसने हिंदू देवी-देवताओं और भारत माता की तस्वीरें जला दीं। छात्रों के बयान के मुताबिक, उस शिक्षक ने उनके सामने माँ सरस्वती, भगवान गणेश और भारत माता की तस्वीरें फाड़ीं और फिर आग के हवाले कर दीं। यही नहीं, उस शिक्षक पर बच्चों से ज़बरदस्ती नमाज़ पढ़वाने और उन्हें क़ुरान का अध्ययन करने के लिए मजबूर करने का भी आरोप है।[12]

मार्च 2024 में प्रकाशित OpIndia की एक रिपोर्ट में देश भर के 14 मामलों का विस्तार से उल्लेख किया गया, जहाँ स्कूलों पर छात्रों को जबरन ईद मनाने के लिए मजबूर करने के आरोप लगे। इनमें से एक मामला गुरुग्राम के मशहूर दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) से जुड़ा था, जिसने पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के लिए “वर्चुअल दरगाह टूर” आयोजित करने की घोषणा की, यह कहते हुए कि इससे बच्चे ईद का महत्व समझ पाएँगे। लेकिन इस पहल ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया, और आलोचकों ने आरोप लगाया कि स्कूल हिंदू बच्चों को ज़बरन मुस्लिम संस्कृति में ढालने की कोशिश कर रहा है। इसी तरह, मध्य प्रदेश के एक निजी स्कूल में भी शिकायतें सामने आईं कि वहाँ हिंदू छात्रों पर ईद के मौक़े पर होने वाले आयोजनों में इस्लामिक दुआ पढ़ने और हिजाब पहनने के लिए दबाव डाला जाता था, जिससे उन्हें इस्लामिक परंपराओं और रिवाजों में शामिल किया जा सके।[13]

मार्च में हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित ऑकलैंड हाउस स्कूल ने एक नोटिस जारी किया कि 28 मार्च को ईद से पहले के कार्यक्रम में प्राथमिक कक्षाओं के छात्र कुर्ता-पायजामा और छोटी टोपी पहनकर आएँ। वीएचपी नेता ए.पी. सिंह ने स्कूल के इस कदम पर आपत्ति जताते हुए इसे “सतही सेक्युलरिज़्म की एक मिसाल” बताया। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों के त्योहार मनाना तो ठीक है, लेकिन बच्चों को किसी ख़ास तरह का पहनावा पहनने के लिए मजबूर करना हद से ज़्यादा है। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या स्कूल जन्माष्टमी या रामनवमी जैसे हिंदू त्योहारों के लिए भी अनिवाय ड्रेस कोड से संबंधित ऐसे आदेश जारी करेगा?

स्कूल ने अपने कदम को सही ठहराते हुए सफाई दी कि यह आयोजन बच्चों को भारत की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना सिखाने की दिशा में एक पहल है। लेकिन भारी विरोध के बाद कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। उन्हीं घिसे पिटे कुतर्कों को दोहराते हुए, वाम-उदारवाद तंत्र ने इस रद्दीकरण को “हिंदुत्व की साज़िश” बताकर पेश किया और इसे भारत में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता का सबूत बताया।[14]

असल में यह वाम-उदारवादी तंत्र की वही पुरानी चाल है—हिंदू बच्चों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अब्राहमिक संस्कृति की ओर ढकेलने की कोशिश को “सेक्युलरिज़्म” और “धार्मिक विविधता” का नाम देना। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा भी वाम-उदारवादी तंत्र की साज़िश के ख़िलाफ़ हिंदुओं द्वारा किया जाने वाले इस प्रतिरोध को तथाकथित “हिंदुत्व वर्चस्व आंदोलन” का हिस्सा बताता है। और ग़ौर करने वाली बात तो यह है कि अगर हालात इसके बिल्कुल विपरीत होते, यानी मुस्लिम या ईसाई बच्चों को हिंदू त्योहार मनाने के लिए मजबूर किया जाता, उन्हें कलावा बाँधने या तिलक लगाने के लिए कहा जाता, तो यही वाम-उदारवादी तंत्र आसमान सिर पर उठा लेता, और ऐसी घटनाओं को  अल्पसंख्यक अधिकारों पर “हिंदुत्व का हमला” करार देता।

यानि कि हर हाल में ठीकरा “हिंदुत्व” पर ही फोड़ दिया जाता है, जिससे हिंदू बच्चे स्कूली संस्कृति में सक्रिय हिंदू विरोधी आख्यानों और हिंदू विरोधी तंत्र के मानसिक दबाव के प्रति और भी ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।

भारत की एलीटशिक्षा में औपनिवेशिक विरासत

हिंदू धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन करने या हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं को निभाने पर छात्रों के साथ हुई बदसलूकी और उत्पीड़न की जितनी भी रिपोर्टें सामने आई हैं, उनमें से काफ़ी मामलों में मिशनरी स्कूलों का नाम आता है। OpIndia की 2022 की एक रिपोर्ट में[15] ऐसे 19 मामले दर्ज हैं, जहाँ मिशनरी स्कूलों में पढ़ने वाले हिंदू छात्रों पर या तो धर्म बदलने का दबाव डाला गया, या उनकी हिंदू आस्था के कारण उन्हें अपमानित व प्रताड़ित किया गया। रिपोर्ट ऐसी कई हृदय विदारक घटनाओं का उल्लेख करती है:

  • छात्रों की कलाई से राखियों के काटे जाने की घटनायें।
  • माथे पर चंदन लगाने और रुद्राक्ष पहनने पर शिक्षक द्वारा छात्रों को मारने पीटने की घटनायें।
  • भगवान अय्यप्पा की माला पहनने पर एक छात्र को स्कूल में घुसने नहीं दिये जाने की घटना।
  • दीवाली मनाने पर छात्रों को निलंबित किया जाना।
  • एक स्कूल प्रिंसिपल का ईसाई धर्म पर प्रवचन देने के दौरान हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक बातें कहना।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में स्वयं स्कूल प्रबंधन ही इसमें शामिल पाया गया है—चाहे वह हिंदू बच्चों को डराना-धमकाना हो, हिंदू प्रतीकों और परंपराओं को नीचा दिखाना हो, या फिर छात्रों के बीच हिंदू-विरोधी प्रोपेगंडा फैलाना। ऐसी घटनाएँ आमतौर पर गिनी-चुनी रिपोर्टों के ज़रिए ही सामने आती हैं, क्योंकि “सेक्युलर” छवि बनाए रखने की कोशिश में मुख्यधारा का मीडिया प्रायः इन ख़बरों से दूरी बनाए रखता है। यद्यपि कई मामलों में पुलिस या प्रशासन द्वारा जाँच शुरू की जाती है और कुछ मामलों में संबंधित शिक्षक या प्रिंसिपल की गिरफ़्तारी भी होती है, लेकिन इससे समस्या का मूल समाधान नहीं हो पाता। इस समस्या से निर्णायक रूप से निपटने के लिए ज़रूरी है कि मिशनरी स्कूलों के फंडिंग नेटवर्क की गहराई से जाँच की जाए और साथ ही स्कूल प्रबंधन की संभावित भूमिका की भी व्यापक पड़ताल हो।

सबसे ज़्यादा आवश्यकता है इन घटनाओं को उस वृहत् ऐतिहासिक संदर्भ में समझने की, जहाँ मिशनरी संस्थाओं ने लंबे समय तक हिंदू-विरोधी विमर्श फैलाने में एक बेहद सक्रिय भूमिका निभाई है।

यह गहरी चिंता का विषय है कि भारत को आज़ादी मिले 75 साल से भी अधिक समय बीत चुका है, लेकिन देश की ‘एलीट’ स्कूलिंग व्यवस्था पर आज भी मिशनरी स्कूलों का दबदबा कायम है। नैनीताल, मसूरी, शिमला, ऊटी और दार्जिलिंग जैसे स्थलों पर बने कई प्रतिष्ठित रिहायशी स्कूल ब्रिटिश शासनकाल की देन हैं, और यही औपनिवेशिक विरासत आज भी भारत की एलीट शिक्षा संस्कृति को आकार दे रही है।

विडंबना यह है कि जिस समय भारत अपने प्राचीन वैदिक अतीत के आधार पर सांस्कृतिक और सभ्यतागत विमर्श को नए सिरे से गढ़ने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है, उसी समय देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था अब भी पश्चिमी मूल्यों और मान्यताओं के चक्रव्यूह में उलझी हुई है।

सवाल यह उठता है कि आखिर कौन सी ताक़तें भारत को अपनी प्राचीन परंपराओं की रोशनी में स्कूली शिक्षा का पुनर्निर्माण करने से रोक रही हैं? क्यों हम अपनी गुरुकुल परंपरा की समृद्ध विरासत को आधुनिक शिक्षा ढांचे में समाहित कर, हिंदू सभ्यता और संस्कारों के अनुरूप शैक्षिक वातावरण नहीं बना पा रहे हैं? दुखद सच्चाई यह है कि 2025 में भी वे संस्थान, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंदू-विरोधी विमर्श फैलाते हैं, भारतीय शिक्षा व्यवस्था के “सर्वोत्तम” स्कूलों के रूप में प्रतिष्ठित किए जाते हैं।

देशभक्ति बनाम देश-विरोध

एक तरफ़ तो हिंदू छात्रों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे अब्राहमिक धर्म की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ अपनाएँ व अपनी ख़ुद की संस्कृति-सभ्यता और परंपराओं से दूरी बना लें। वहीं दूसरी तरफ़, जब वही छात्र “राष्ट्रभक्ति” के  भाव का प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। हिंदू स्कूली बच्चों पर यदि अब्राहमिक तौर-तरीक़े जबरन थोपे जाएँ तो इस प्रक्रिया को न सिर्फ़ परोक्ष तौर पर बढ़ावा दिया जाता है, बल्कि उसे सराहा भी जाता है। लेकिन जब वही बच्चे “भारत माता की जय” के नारे लगाते हैं, तो उसे न केवल नापसंद किया जाता है, बल्कि छात्रों को स्कूल से निलंबित तक कर दिया जाता है।

स्कूलों में हिंदू-विरोध और भारत-विरोध की यह अजीबोग़रीब मिली-जुली प्रवृत्ति समस्या को और भी ज़्यादा गंभीर बना देती है। अगर एक सुनियोजित एजेंडे के तहत छात्रों को उनकी सांस्कृतिक और सभ्यतागत जड़ों से काटा जा रहा है, और साथ ही उन्हें भारत-विरोधी सोच अपनाने के लिए बाक़ायदा ब्रेनवाश किया जा रहा है, तो यह वाक़ई गंभीर चिंता का विषय है।

ऐसी घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। जुलाई 2025 में उज्जैन (मध्य प्रदेश) के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक को पुलिस ने इसलिए गिरफ़्तार किया क्योंकि उस पर भारत माता व कई हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें फाड़कर जलाने का आरोप था।[16] 2017 में जमशेदपुर के एक प्राइवेट स्कूल ने 10 छात्रों को सिर्फ़ इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि उन्होंने स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान “भारत माता की जय” के नारे लगाए थे।[17] अक्टूबर 2018 में बलिया (उत्तर प्रदेश) के ज़िला प्रशासन को शिकायत मिली कि एक स्कूल में छात्रों को “भारत माता की जय” बोलने या “वंदे मातरम” गाने पर सज़ा दी जाती है। शिकायतकर्ता संस्था को स्कूल के एक शिक्षक ने बताया कि स्कूल में वंदे मातरम गाना या “भारत माता की जय” बोलना पूरी तरह से प्रतिबंधित है, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करता है, उसे दंडित किया जाता है।[18]

भारत भर में कई छात्रों को सिर्फ़ इसलिए प्रताड़ित किया गया, उन्हें सज़ा दी गई, और यहाँ तक कि निलंबित भी कर दिया गया क्योंकि उन्होंने भारत का राष्ट्रगान गाया, या देशभक्ति के नारे लगाए।[19] [20] [21] इससे बड़ी विडंबना आख़िर क्या होगी कि जो बातें किसी भी राष्ट्र के लिये गौरव और सम्मान का विषय हैं, उन्हीं बातों के लिए स्कूल छात्रों को सज़ा दे रहे हैं। जब देश-प्रेम को ही अपराध बना दिया जाए, तो यह खुल्लम-खुल्ला भारत-विरोधी विमर्श को महिमामंडित करने जैसा है।

हिंदू-विरोधी तंत्र ऐसे भारत-विरोधी विमर्श को बढ़ावा देने के लिए अजीबोगरीब तर्क गढ़ता है। बड़ी ही शातिरता से “पीड़ित होने” का कार्ड खेलते हुए, इस तंत्र की इकाइयाँ अक्सर ये दावा करती हैं कि “भारत माता की जय” हिंदू धार्मिक भाव से जुड़ा एक राष्ट्रवादी नारा है।[22]

विडंबना तो यह है कि जहाँ एक ओर हिंदू छात्रों को अब्राहमिक धर्मों के त्योहार मनाने के लिए मजबूर किया जाता है, उनसे इस्लामिक दुआएँ पढ़वाई जाती हैं, या उन्हें बाइबिल पढ़ाई जाती है, वहीं दूसरी ओर जब कुछ राज्य सरकारें भगवद्गीता को पाठ्यक्रम में अनिवार्य बनाने का निर्णय लेती हैं, तो उस पर आपत्ति जताई जाती है। उदाहरण के लिए, The Wire ने गुजरात सरकार द्वारा कक्षा 9 और 12 में भगवद्गीता को “प्रथम भाषा विषय” के रूप में शामिल करने के फ़ैसले की आलोचना करते हुए लिखा कि “स्कूल धार्मिक शिक्षा का मैदान नहीं होने चाहिए।[23] Maktoob Media ने गुजरात के पाठ्यक्रम में सभी धर्मों की शिक्षाएँ शामिल करने की माँग की, ताकि भारत के “संवैधानिक सेक्युलरिज़्म” को बनाए रखा जा सके।[24] वहीं Feminism in India नाम की वेबसाइट ने स्कूली पाठ्यक्रम में भगवद्गीता को शामिल करने के सरकारी निर्णय को “शब्दों की बाज़ीगरी और भारतीय संस्कृति को एकरूप करने की कोशिश” बताया।[25]

स्कूली संस्कृति हिंदू विरोधी विमर्श की गिरफ़्त में

असल समस्या तो यह है कि हिंदुओं के ख़िलाफ़ एकसाथ कई मोर्चों पर एक वैचारिक युद्ध छेड़ा दिया गया है। वाम-उदारवादी तंत्र, कट्टरपंथी इस्लामिक ताक़तें, मिशनरी तंत्र, वोक एक्टिविस्ट्स व इनके जैसे अनेकों समूहों ने योजनाबद्ध तरीक़े से भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाई है। उनका मक़सद है हिंदू-विरोधी सोच को धीरे-धीरे सामान्य बना देना—कक्षा के भीतर भी और बाहर भी। इसका नतीजा यह निकलता है कि भोले-भाले, कम उम्र के बच्चों के मन में हिंदू पहचान को लेकर हीनता और दुश्मनी के बीज बो दिए जाते हैं।

इस प्रक्रिया की जड़ें गहरी हैं। यह सब आज़ादी के बाद बने नेहरूवादी ढाँचे से शुरू हुआ और अब “वोकिज़्म” की घुसपैठ से और भी मज़बूत हो गया है। हालाँकि यह प्रक्रिया अब सिर्फ़ मिशनरी स्कूलों तक सीमित नहीं रही; वाम-उदारवादी विचारधाराएँ भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इतनी गहरी पैठ बना चुकी हैं कि अब एक ऐसी संस्कृति को वैधता मिल रही है, और उसे निरंतर फलने फूलने के अवसर दिये जा रहे हैं, जिसका आधार ही हिंदू पहचान का घोर विरोध है।

चिंता की बात यह भी है कि यह घटनाएँ सिर्फ़ बड़े शहरों के एलीट स्कूलों तक सीमित नहीं हैं—जहाँ ऐसे नैरेटिवस की मौजूदगी की उम्मीद की जा सकती है। बल्कि, इनमें से कई मामले भारत के छोटे शहरों और कस्बों से सामने आ रहे हैं। यह सच्चाई हिंदू-विरोध को समझने के पारंपरिक ढाँचों को चुनौती देती है। छोटे कस्बों के स्कूलों में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या दिखाती है कि हिंदू-विरोधी नैरेटिव भारतीय समाज की हर परत में रिसकर पहुँच चुका है।

समापन

भारत की स्कूली संस्कृति में बढ़ती हिंदू-विरोधी लहर से निपटना कोई आसान काम नहीं है। इस समस्या का कोई तात्कालिक हल भी नहीं है। इससे निबटने के लिए कई स्तरों पर ठोस और बहुआयामी प्रयास करने होंगे।

सबसे पहले, ऐसे मामलों में शिकायत करने वालों के लिए कानूनी मदद के साधनों को और मज़बूत बनाना ज़रूरी है। हिंदू समाज को मिलकर इन मामलों को अदालत तक ले जाना चाहिए और सक्रिय रूप से याचिकाएँ दायर करनी चाहिए, ताकि छात्रों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।

जहाँ स्कूल प्रबंधन ही सीधे तौर पर छात्रों को उनके धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं के कारण तंग करने या अपमानित करने में शामिल पाया जाए, वहाँ इन संस्थानों की फंडिंग और संसाधनों की पूरी जाँच होनी चाहिए। गंभीर मामलों में स्कूल का लाइसेंस निलंबित करने जैसे प्रावधान लागू किए जाने चाहिए, ताकि हिंदू-विरोधी शैक्षणिक संस्थानों को कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया जा सके।

अंततः, सरकार को ऐसे स्कूलों को बढ़ावा देना चाहिए, जिनकी संस्कृति भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक जड़ों में रची-बसी हो। बड़े निजी संस्थानों को भी इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे वैदिक गुरुकुल परंपरा के तत्वों को आधुनिक शिक्षा पद्धति के साथ समन्वित करने वाले नए संस्थानों की स्थापना करें।

सन्दर्भ सूची

[1] NCERT corrects leftist propaganda by introducing “Dark Ages”;  https://organiser.org/2025/07/17/303113/bharat/ncert-corrects-leftists-propaganda-by-introducing-dark-ages-no-more-glorification-of-tyrants-like-akbar-babar/

[2] 7 incidents here teachers harassed, assaulted Hindu students for sporting tilak, kalawa and religious symbols;  https://www.opindia.com/2023/08/hindu-students-beaten-harassed-by-teachers-for-sporting-tilak-kalawa-kada-seven-incidents/

[3] Chhattisgarh school principal held for assaulting child over ’Radhe Radhe’  greeting | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/chhattisgarh-school-principal-held-for-assaulting-child-over-radhe-radhe-greeting-101754046414123.html?fbclid=IwY2xjawMHvr5leHRuA2FlbQIxMQABHu9WKWqWgoGl90XAUxpU8S_61Lkl-72raMGoxKB8MtXVnu422goJRHddPMJD_aem_1LYJzpd0CF122aP0unxHog

[4] Bihar: 30 students beaten allegedly for wearing Kalawa;  https://organiser.org/2025/05/16/292619/bharat/bihar-row-erupts-after-over-30-students-beaten-allegedly-for-wearing-kalawa-in-munger/

[5] Christian school teacher beats up Hindu student for wearing red thread on his wrist – Sanatan Prabhat;  https://sanatanprabhat.org/english/79074.html

[6] Cultural Disrespect: Hindu Children Compelled To Cut Rakhis At Christian School in Bareilly;  https://swarajyamag.com/uttar-pradesh/cultural-disrespect-hindu-children-compelled-to-cut-rakhis-at-christian-school-in-bareilly

[7] Uttar Pradesh: Students of St. Anthony school stopped from wearing Tilak, Rakhi and Kalawa;  Probe initiated; https://organiser.org/2023/09/16/196289/bharat/uttar-pradesh-students-of-st-anthony-school-stopped-from-wearing-tilak-rakhi-and-kalawa-probe-initiated/

[8] Hindu boy thrashed by students over tilak at Alwar school, family told to convert – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/rajasthan-alwar-students-hindu-muslim-clash-over-wearing-tilak-in-school-forced-religious-conversion-2412958-2023-07-28

[9] Teachers Punished: 2 govt teachers punished for objecting to Hindu students applying tilak, one for removing skull caps; principal transferred | Agra News – Times of;  https://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/2-govt-teachers-punished-for-objecting-to-hindu-students-applying-tilak-one-for-removing-skull-caps-principal-transferred/articleshow/113000447.cms

[10] Hindu students made to recite Islamic verse in Kota school, video viral – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/story/rajasthan-kota-hindu-students-recite-islamic-verses-kalma-video-viral-2750211-2025-07-03

[11] Students made to perform namaz in Gujarat school, probe ordered after protests – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/students-made-to-perform-namaz-in-gujarat-school-probe-ordered-after-protests-2444062-2023-10-04

[12] Ujjain: Teacher Shakeel Mohammad burns photos of Hindu deities, pressures students to read Namaz and Quran; https://www.opindia.com/2025/07/ujjain-teacher-shakeel-mohammad-burns-photos-of-hindu-deities-pressures-students-to-read-namaz-and-quran/

[13] Incidents of schools across Bharat accused of forcing Hindu Students to  celebrate Eid; https://hindupost.in/featured/schools-forcing-hindu-to-celebrate-eid/

[14] How Hindu students are forced to participate in Eid-celebrations by schools;   https://www.opindia.com/2025/03/how-hindu-students-are-forced-to-participate-in-eid-celebrations-by-schools/#google_vignette

[15] M Lanvanya and 18 more cases where Hindu students have faced torture and harassment at Missionary schools; https://www.opindia.com/2022/01/forced-conversion-harassment-justice-for-m-lavanya-cases-where-missionaries-have-traumatised-hindu-children/

[16] Madhya Pradesh Government school teacher detained for burning pictures of Bharat Mata, religious deities; https://www-newindianexpress-com.translate.goog/nation/2025/Jul/17/madhya-pradesh-government-school-teacher-detained-for-burning-pictures-of-bharat-mata-religious-deities?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc

[17] Bharat Mata: I-Day ‘mischief’: School suspends 10 boys  for chanting ‘Bharat Mata Ki Jai’ | Jamshedpur News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/jamshedpur/i-day-mischief-school-suspends-10-boys-for-chanting-bharat-mata-ki-jai/articleshow/60169031.cms

[18] UP school allegedly punishes kids for singing Vande Mataram, probe ordered | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/probe-ordered-into-allegation-that-up-school-punished-students-for-singing-vande-mataram/story-0Kw6k54gc0SR3oaSWNVuHL.html

[19] Madhya Pradesh: Christian missionary school punishes student for ‘Bharat Mata ki Jai’ slogan;   https://www.opindia.com/2022/11/madhya-pradesh-christian-missionary-school-bharat-mata-ki-jai-slogan/

[20] Principal Thrashes Students For Singing National Anthem and Vande Mataram, Saying ‘Bharat Mata ki Jai’; https://hindupost.in/news/principal-thrashes-students-singing-national-anthem-vande-mataram-saying-bharat-mata-ki-jai/

[21] Missionary school in Rajasthan suspends 8 students for chanting ‘Bharat Mata Ki Jai’;  https://www-opindia-com.translate.goog/2023/12/missionary-school-in-rajasthan-suspends-8-students-for-chanting-bharat-mata-ki-jai/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc

[22] Another school in India under threat by Hindu nationalists | Crux; https://cruxnow.com/global-church/2018/01/another-school-india-threat-hindu-nationalists

[23] Bhagavad Gita For All Gujarat Students – The Wire; https://thewire.in/education/bhagavad-gita-for-all-gujarat-students

[24] Call for inclusion of all faiths’ teachings in Gujarat school curriculum amid Bhagavad Gita addition;  https://maktoobmedia.com/india/call-for-inclusion-of-all-faiths-teachings-in-gujarat-school-curriculum-amid-bhagavad-gita-addition/

[25] Bhagavad Gita’ In Schools: Semantic Wrangling And The Homogenisation of Indian Culture | Feminism in India; https://feminisminindia.com/2024/11/28/bhagavad-gita-in-schools-semantic-wrangling-and-the-homogenisation-of-indian-culture/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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