वोक से जिहाद तक: कट्टरपंथ फैलाने में सोशल मीडिया की भूमिका

वोक विचारधारा, जो कभी सामाजिक न्याय के नाम पर शुरू हुई थी, अब सोशल मीडिया के  द्वारा जिहादी प्रोपेगंडा को बढ़ावा देने का ज़रिया बन चुकी है।
  • वोक विचारधारा ने कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को छुपाने और सही ठहराने वालेNarratives को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसने धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा को “प्रगतिशीलता” की आड़ में छिपा दिया है।
  • सोशल मीडिया, जिसकी पहुँच बहुत व्यापक है, अब जिहादी सोच फैलाने का एक मुख्य जरिया बन चुका है—खासकर उन विचारों को फैलाने में, जिन्हें वोकिज़्म ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है।
  • पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में ट्रैवल इन्फ्लुएंसर ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी ने भारत में ऑनलाइन कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे पर ध्यान खींचा है, जिससे यह साफ होता है कि सोशल मीडिया कैसे आतंकी अभियानों की ढाल बन सकता है।
  • ऑनलाइन कट्टरपंथ अब एक वैश्विक खतरा बन चुका है। यूरोप में “टिकटॉक जिहाद” जैसी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं और बेहद चिंता का विषय हैं।
  • आतंकी संगठन अब जनरेटिव एआई टेक्नोलॉजी का खुलेआम इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मकसद है—इन टूल्स की मदद से तेजी से प्रचार सामग्री बनाकर, उसे वैधता का रूप देकर चरमपंथ को सामान्य बनाना और फैलाना।

अमेरिका में, ट्रम्प प्रशासन विश्विद्यालय कैम्पसों में व्याप्त यहूदी विरोधी भावना पर लगातार नकेल कस रहा है और हमास समर्थकों और तथाकथित “आतंकवादी कार्यकर्ताओं” के विशाल नेटवर्क को ध्वस्त कर रहा है। इस बीच, भारत में, पहलगाम हमलों के बाद कार्यान्वित ऑपरेशन सिंदूर के पश्चात, पाकिस्तान के लिए कथित जासूसी करने के आरोप में [1] देश भर में दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

हालांकि प्रत्यक्ष रूप से इन घटनाओं का आपस में कोई संबंध दिखाई नहीं देता, लेकिन करीब से देखने पर एक साझा पहलू सामने आता है: जिहादी आख्यानों का सशक्तीकरण, कट्टरपंथी इस्लामिक चरमपंथ और आतंकवाद की लीपापोती करने और उन्हें बढ़ावा देने वाले आख्यानों का सामान्यीकरण और तेज़ प्रचार-प्रसार सीधा वोकिज़्म से जुड़ा हुआ है। आज के समय में हमें वोक वामपंथी तंत्र के ज़हरीले विमर्श और कट्टरपंथी इस्लामिस्ट तंत्र द्वारा फैलाये जा रहे प्रोपेगंडा का एक ख़तरनाक समन्वय देखने को मिलता है।

वोकिज़्म ने प्रगतिशील उदारवादियों और कट्टरपंथी चरमपंथियों के बीच एक ऐसे गठबंधन को संभव बनाया है, जिसकी कभी कल्पना भी करना मुश्किल था। इसने धार्मिक रूप से प्रेरित आतंकवाद की क्रूरता और कट्टरता को “आत्मनिर्णय”, “न्याय” और “स्वायत्तता” की भाषा में पुनः ब्रांड करने का काम किया है। यह बेहद चिंता की बात है कि अब आतंकवाद से सहानुभूति रखना, और उसे बढ़ावा देना भी समाज के एक हिस्से द्वारा नेक काम की तरह दिखाया और बताया जा रहा है। और तो और, आतंकवाद को जलवायु परिवर्तन, लैंगिक अधिकार, पहचान की राजनीति और सेक्सुअलिटी जैसे मुद्दों के साथ जोड़ दिया गया है।

सोशल मीडिया अपनी व्यापक पहुंच और शक्तिशाली प्रभाव के साथ, वोकिज़्म की आड़ में जिहादी आख्यानों को फैलाने का सबसे नया साधन बन गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और एआई टेक्नोलॉजीज का इस्तेमाल अब आतंकवादी संगठनों द्वारा अभूतपूर्व वैश्विक स्तर पर किया जा रहा है। एक तरफ, ए आई टेक्नोलॉजीज़ का इस्तेमाल युवाओं को आतंकवादी बनाने के लिए किया जा रहा है। दूसरी तरफ, जिहादी संदेशों के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक सॉफ्ट-पावर प्रोपेगंडा मशीन के रूप में हो रहा है।

इस लेख में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि दुनिया भर में जिहादी कथाओं को फैलाने के लिए जो सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसके पीछे का मक़सद क्या है। हम इस पर भी चर्चा करेंगे कि कैसे वोकिज़्म ने सोशल मीडिया को कट्टरपंथ फैलाने के एक शक्तिशाली माध्यम में बदल दिया है।

सोशल मीडिया की आड़ में देशद्रोह

राष्ट्रीय सुरक्षा को सोशल मीडिया से होने वाले खतरों को लेकर बहस भारत में फिर से तेज़ हो गई है। इस चर्चा ने सबसे ज़्यादा ज़ोर तब पकड़ा जब ट्रैवल इन्फ्लुएंसर ज्योति मल्होत्रा ​को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। 33 वर्षीय यूट्यूबर कथित तौर पर पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी के संपर्क में आयी थीं ( जिस अधिकारी को अब भारत सरकार द्वारा निष्कासित कर दिया गया है) और कम से कम दो बार पाकिस्तान का दौरा कर चुकी थीं। रिपोर्टों के अनुसार मल्होत्रा ​​ने स्नैपचैट, टेलीग्राम और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये पाकिस्तानी सुरक्षा और खुफिया अधिकारियों को राष्ट्र विरोधी जानकारी देने की बात कबूल की है।[2]

मीडिया रिपोर्ट्स यह भी संकेत देती हैं कि मल्होत्रा ​​को इस बात की पूरी जानकारी थी कि वह पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के सदस्यों से बातचीत कर रही थी। सुना  जा रहा है कि उसके तीन मोबाइल फ़ोन्स से प्राप्त डेटा में कॉल लॉग, चैट ट्रांसक्रिप्ट, वित्तीय रिकॉर्ड और वीडियो साक्ष्य शामिल हैं, जो उसे चार पाकिस्तानी एजेंटों से जोड़ते हैं। उस पर भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता से समझौता करने के लिए भारतीय न्याय संहिता और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं।[3]

पाकिस्तान के साथ मल्होत्रा की गठजोड़ शायद उसकी संदिग्ध देश विरोधी गतिविधियों का एक नमूना मात्र हैं। अब चीन और बांग्लादेश के साथ उसके संभावित संबंधों के सबूत भी सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की यात्रा करने के अलावा, मल्होत्रा ​​ने कथित तौर पर बांग्लादेश वीज़ा के लिए भी आवेदन किया था। अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने बांग्लादेश उच्चायोग को प्रस्तुत ज्योति मल्होत्रा के वीज़ा आवेदन को एक्सेस कर लिया है। हालांकि वीज़ा आवेदन की सटीक तारीख स्पष्ट नहीं है, मीडिया सूत्रों के अनुसार वीजा के फॉर्म संभवतः 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमलों के बाद में ही भरे गए हैं।[4]

दिलचस्प बात तो यह है कि मल्होत्रा ​​ने हमले से ठीक तीन महीने पहले जनवरी 2025 में पहलगाम का दौरा भी किया था। सब सबूतों को जोड़ते हुए जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) शेष पॉल वैद ने एक्स पर पोस्ट किया: “क्या यह महज़ संयोग है कि पाकिस्तानी उच्चायोग के कर्मचारी दानिश (संभवतः आईएसआई का व्यक्ति) के जाल में फंसी यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा ​​जनवरी 2025 में पहलगाम आई थी? वह कथित तौर पर आईएसआई संचालकों को संवेदनशील जानकारी दे रही थी। हमारी खुफिया सेवाएं आमतौर पर पाकिस्तान, चीन और अब बांग्लादेश जैसे दुश्मन देशों में या उनके उच्चायोगों में अक्सर जाने वालों पर नजर रखती हैं”। [5]

धीरे धीरे यह बात स्पष्ट हो रही है कि सोशल मीडिया विध्वंसकारी गतिविधियों के लिए एक मददगार साधन तो है ही, साथ ही वह इन गतिविधियों पर पर्दा डालने वाले मुखौटे के रूप में भी काम करता है। अधिकारी ज्योति मल्होत्रा केस की इस एंगल से जाँच कर रहे हैं कि उसके यूट्यूब चैनल की भारत विरोधी अभियान में भला क्या भूमिका रही होगी? हालाँकि एक नागरिक के रूप में क्लासिफाइड सैन्य खुफिया जानकारी तक ज्योति मल्होत्रा की पहुँच नहीं होगी, लेकिन भारत के संवेदनशील और दूरदराज के इलाकों में उसकी व्यापक यात्रा के चलते इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि शायद ज्योति मल्होत्रा ने विदेशी संचालकों के साथ उपयोगी रणनीतिक जानकारी साझा की हो।

दुश्मन खुफिया एजेंसियाँ, मल्होत्रा ​​जैसे लोगों का इस्तेमाल संभावित लक्ष्यों की टोह लेने के लिए आसानी से कर सकती हैं। इसलिए यह बेहद चिंताजनक है कि उसने भारत भर में कई उच्च सुरक्षा वाले धार्मिक स्थलों का दौरा किया – जिसमें पुरी का जगन्नाथ मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर और महाकुंभ शामिल हैं।[6] [7]

ज्योति मल्होत्रा ​​का मामला आतंकवाद की विचारधारा के प्रचार प्रसार में सोशल मीडिया की संदिग्ध भूमिका के भयावह ख़तरे को भी उजागर करता है। यह इस ओर भी संकेत करता है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल शायद एक टूलकिट की तरह किया जा रहा है – आतंकवादी योजनाएं बनाने और चलाने के लिए, और वह भी ऐसे पैमाने पर जिसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है। मल्होत्रा ​​के अलावा, पाकिस्तान से जुड़ी जासूसी जांच में कम से कम 11 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों द्वारा दी गई जानकारी पर बारीकी से पता चलता है कि उत्तर भारत में स्थानीय ऑपरेटिव्स की भर्ती के लिए विदेशी खुफिया एजेंसियों द्वारा सोशल मीडिया का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

हरियाणा के कैथल के 25 वर्षीय देवेंदर सिंह को सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ तस्वीरें पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वह 2024 में एक तीर्थयात्रा के दौरान पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों के संपर्क में आया और उसके बाद भी उनसे संवाद करता रहा। उस पर एक छावनी क्षेत्र की बाहर से तस्वीरें लेने और उन्हें साझा करने का भी आरोप है। हरियाणा के नूंह के एक अन्य व्यक्ति अरमान ने कथित तौर पर दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात एक कर्मचारी के माध्यम से पाकिस्तान को सैन्य गतिविधियों से संबंधित जानकारी दी। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि आरोपी कुछ समय से संवेदनशील जानकारी शेयर करने के लिए व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहा था। [8]

वोकइज़्म कैसे भारत के युवाओं को कट्टरपंथी एजेंडे के लिए तैयार कर रहा है

 ऊपर उल्लेखित मामलों में सबसे खास बात यह है कि पाकिस्तानी अधिकारियों के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए ज़्यादातर भारतीय 20 से 30-35 के बीच की उम्र के युवा वयस्क हैं। जल्दी पैसा कमाने के लालच से आगे बढ़कर यह सवाल ज़रूरी हो जाता है कि ऐसी कौन-सी गहरी वजहें हैं, जिनके चलते आज का युवा वर्ग कट्टरपंथ की ओर इतना जल्दी आकर्षित और प्रभावित हो रहा है?

इसका प्रमुख कारण वोकिज़्म की विचारधारा है, जो आतंक-सहानुभूति और आतंक-प्रचार को सामान्य एवं तर्कसंगत ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और कई मामलों में इनका महिमामंडन भी करती है। वोकिज़्म कई प्रभावशाली माध्यमों – शिक्षाविदों, बुद्धिजीवी संस्थानों, मीडिया, पॉप संस्कृति, और विशेष रूप से सोशल मीडिया के ज़रिये अपना यह जाल बुनता है।

सोशल मीडिया के माध्यम से यह ज़हरीला विमर्श आम जनता तक पहुँचता है, जिससे मनोवैज्ञानिक हेरफेर और वैचारिक ब्रेनवाशिंग को व्यापक स्तर पर बढ़ावा मिलता है।

इसी ज़हरीले विमर्श के चलते, आइवी लीग जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में कई भारतीय छात्र हमास की गतिविधियों को परोक्ष रूप से जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं, और इज़राइल को एक क्रूर अत्याचारी के रूप में पेश करते हैं। यहाँ तक कि अपनी ख़ुद की पढ़ाई और करियर तक को ख़तरे में डाल लेते हैं। सोशल मीडिया इज़राइली कंपनियों और संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान करने वाले वोक भारतीयों के लिए एजेंडा निर्धारित करता है, जो यहूदी विरोधी भावना और हमास जैसे आतंकवादी समूहों द्वारा यहूदियों पर की जाने वाली निरंतर हिंसा को आसानी से अनदेखा कर देते हैं।

स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0 में लेखक राजीव मल्होत्रा ​​और विजया विस्वनाथन बताते हैं कि कैसे प्रतिष्ठित पश्चिमी विश्वविद्यालय “भारत को तोड़ने” वाली ताकतों के निरंतर पनपने और फलने फूलने के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार करते हैं। पुस्तक में इस बात की भी आलोचना की गई है कि कैसे प्रतिष्ठित भारतीय संस्थानों ने अमेरिकी ब्रांड के वोकिज़्म को आँख मूंदकर आयात किया है, खासकर एकेडेमिया के माध्यम से। लेखक इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि कैसे मानविकी और सामाजिक विज्ञान शिक्षा और शोध भारत और हिंदुओं को निशाना बनाने वाले सॉफ्ट प्रोपेगंडा के चैनल बन गए हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी’स जूनियर पार्टनर नामक अध्याय में विस्तृत उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं, जो दर्शाते हैं कि अशोका यूनिवर्सिटी के कितने अध्यापक ऐसे शोध और शैक्षणिक हितों को आगे बढ़ाते हैं जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और एकता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। अध्याय में इस बात के प्रमाण दिए गए हैं कि कैसे अशोका यूनिवर्सिटी के प्रमुख अध्यापक, जिनमे एक पूर्व कुलपति भी शामिल हैं, नियमित रूप से राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का महिमामंडन करते हैं, हिंदूफोबिया के अस्तित्व को नकारते हुए इसे “हिंदू उत्पीड़न कॉम्प्लेक्स” कहते हैं, और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलनों के साथ-साथ भारतीय स्टेट के ख़िलाफ़ हुए माओवादी विद्रोह की भी प्रशंसा करते हैं।[9]

शिक्षा जगत के माध्यम से आयातित वोकिज़्म युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए वैचारिक आधार तैयार करता है, जो फिर सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे समाज में फैल जाता है। आतंकवादी नेटवर्क और उनके समर्थक भावनात्मक रूप से कमज़ोर व्यक्तियों को शिकार बनाने के लिए इस डिजिटल मीडिया तंत्र का फायदा उठाते हैं।

ईटीवी भारत की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जांचकर्ताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए आतंकवादी संगठनों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक नए तरीके का खुलासा किया है। सुरक्षा एजेंसियों ने इसे “मैजिक लैंटर्न टैक्टिक” (Magic Lantern Tactic) का नाम दिया है। इस रणनीति में हैंडलर विभिन्न प्लेटफार्मों पर भड़काऊ सामग्री पोस्ट करते हैं और उपयोगकर्ताओं की प्रतिक्रियाओं पर बारीकी से नज़र रखते हैं। जो व्यक्ति भावनात्मक समर्थन या तीव्र जुनून जैसी प्रतिक्रिया करते हैं, उन्हें आगे की कार्यवाई के लिए लक्ष्य बनाया जाता है।[10]

सोशल मीडिया: आतंकवाद का प्रवेश द्वार

 ऑनलाइन कट्टरपंथ का खतरा न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में एक बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है। Ynet News के एक लेख में[11] यूरोप में TikTok जिहाद की खतरनाक घटना पर प्रकाश डाला गया है। लेख में ऑस्ट्रिया में 2024 में हुई दो किशोरों की गिरफ्तारी का हवाला दिया गया है, जिन्होंने इस्लामिक स्टेट के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी और वियना में टेलर स्विफ्ट कॉन्सर्ट में आतंकी हमले की योजना बनाई थी। हालाँकि हमले को नाकाम कर दिया गया था, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑस्ट्रियाई किशोर एक ऐसे कॉन्सर्ट पर इतने जटिल और खतरनाक हमले की योजना बनाने में शामिल थे, जिसमें दसियों हज़ार लोग सम्मिलित हुए थे। इन तथ्यों ने यूरोप में ऑनलाइन कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कीं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स – विशेष रूप से टिकटॉक – का उपयोग युवा व्यक्तियों को कट्टरपंथी इस्लामिस्ट विचारधाराओं में ब्रेनवाश करने के लिए तेज़ी से किया जा रहा है। यह  एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसने पूरे यूरोप में जिहादी हमलों को नये सिरे से बढ़ावा दिया है, अकेले 2024 में कम से कम छह आतंकवादी हमले हुए हैं, और “सुरक्षा और खुफिया सेवाओं द्वारा 20 से अधिक योजनाबद्ध हमलों को नाकाम कर दिया गया है”।[12]

ऑनलाइन कट्टरपंथ में देखी गयी वृद्धि की वजह से पश्चिमी लोकतंत्रों में “लोन वुल्फ” (lone wolf) हमलों में भी ख़ासा इज़ाफ़ा देखा गया है। ये हमले ज़्यादातर ऐसे कट्टरपंथी लोगों द्वारा किए जाते हैं जो किसी आतंकवादी संगठन से सीधे जुड़े नहीं होते, बल्कि अकेले ही काम करते हैं। लोन वुल्फ हमलों को रोकना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि ये आमतौर पर उन सामान्य मानकों में नहीं आते जिनसे पहले से पहचान की जा सके।

इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस द्वारा किए गए एक अध्ययन में पश्चिम में लोन वुल्फ हमला करने वालों की संख्या में वृद्धि को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में पश्चिमी देशों में हुए घातक आतंकवादी हमलों में से 93 प्रतिशत वारदातों को अकेले हमलावरों द्वारा अंजाम दिया गया। 2024 में, यूरोप में ISIS से जुड़ी लगभग दो-तिहाई गिरफ्तारियों में किशोर शामिल थे। अध्ययन कट्टरपंथी सामग्री के संपर्क से लेकर सीधे हिंसक कार्रवाई तक के परिवर्तन को लेकर बेहद परेशान करने वाले तथ्य उजागर करता है: जबकि 2002 में, शुरुआती संपर्क से लेकर हमले को अंजाम देने में औसतन 16 महीने लगते थे, 2015 तक यह अवधि 40 प्रतिशत कम हो गई थी, यानि कि 16 महीनों से घट कर लगभग 10 महीने रह गई है।[13]

यह रिपोर्ट लोन वुल्फ हमलावरों की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहती है कि ” अकेले हमलावर कई तरह के धार्मिक, राजनीतिक और साजिश से जुड़े विचारों को मिलाकर अपनी एक अलग सोच बना लेते हैं, जो आम तौर पर बनाए गए लेबलों पर फिट नहीं बैठती।”[14]

यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज़ द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में अल-कायदा, तालिबान, ISIS, और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी समूहों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ऑनलाइन प्रोपेगंडा और भर्ती रणनीतियों का विश्लेषण किया गया यह दिखाता है कि डिजिटल मीडिया क्रांति ने इन संगठनों के भर्ती और फैलाव के तरीके को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के प्रसार ने आतंकवादी संगठनों के लिए चरमपंथी विचारधारा को तेज़ी से फैलाना और ऐसे व्यक्तियों की पहचान करना आसान बना दिया है, जिन्हें भर्ती के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा सकता है।[15]

भारत में ऑनलाइन कट्टरपंथ देश की एकता और बहुलतावादी समाज के लिए एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। भारतीय संदर्भ में इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति में अक्सर मुस्लिम युवाओं को लक्षित करके कट्टरपंथी बनाना शामिल होता है। भारत को लेकर अक्सर यह झूठा विमर्श फैलाया जाता है कि यहाँ की  “हिंदू बहुसंख्यकवादी” सरकार के अंर्तगत अल्पसंख्यक समुदाय का लगातार शोषण होता है। वोक तंत्र द्वारा फैलाया गया यह ज़हरीला प्रोपेगंडा भारतीय मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की ओर और ज़्यादा झुकाव वाला बना देता है। यह सोच उनके भीतर गुस्सा और असंतोष बढ़ाने का माहौल तैयार करती है, जिससे वे डिजिटल माध्यमों से फैलाए जा रहे कट्टरपंथी संदेशों के आसान शिकार बन जाते हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में आई ज़बर्दस्त वृद्धि ने आतंकवादी समूहों को बड़ी संख्या में लोगों को कट्टरपंथी बनाने और उनकी भर्ती करने के लिए एक कुशल साधन प्रदान किया है। ये समूह समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले लोगों को निशाना बनाकर आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित भारतीय मुस्लिम युवाओं की कमज़ोरियों का फायदा उठाते हैं।

इसके अलावा, सोशल मीडिया की टेक्नॉलजी चरमपंथी सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करके कट्टरपंथ की प्रक्रिया को और तेज़ कर देते हैं। ये प्लेटफ़ॉर्म ऐसे कंटेंट को ज़्यादा बढ़ावा देते हैं जो चर्चा में हो, उकसाने वाला हो, या समाज को बांटने वाले भावनात्मक मुद्दों से जुड़ा हो। राष्ट्रीय सुरक्षा या सामाजिक सद्भाव इनके लिए कोई मायने नहीं रखते। नतीजतन, ये विभाजनकारी सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं और कट्टरपंथी माहौल तैयार करते हैं।[16]

डिजिटल मीडिया और एआई कैसे चरमपंथ को बढ़ावा देते हैं

मीडिया को ऐसी अजीब और तनाव से भरी कहानियाँ पसंद आती हैं। अगर उनमें थोड़ा सनसनीख़ेज़ तड़का भी हो, तो वो टीआरपी और वायरल कंटेंट के लिए परफेक्ट बन जाती हैं। बात तब और बढ़ जाती है जब खुद डिजिटल मीडिया ही उस कहानी का हिस्सा बन जाता है।

ये सभी तत्व कुख्यात सीमा हैदर मामले में एक साथ आए। यह 30 वर्षीय विवाहित पाकिस्तानी महिला मई 2023 में नेपाल के रास्ते अपने चार बच्चों के साथ अवैध रूप से भारत में घुसी थी। इसका तथाकथित ध्येय अपने 22 वर्षीय प्रेमी सचिन मीना के साथ रहने  का था, जो उसके कहने के अनुसार उसे ऑनलाइन गेम PUBG के ज़रिए से मिला था । यह औरत भारत में अपने अवैध प्रवेश के बाद से ही भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) की जांच के दायरे में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह सचिन के अलावा PUBG के ज़रिए भारत में कई अन्य व्यक्तियों के संपर्क में भी थी।[17]

सीमा हैदर ने एक सार्वजनिक समारोह में सचिन मीना से शादी की और अभी भारत में ही रह रही है। हालांकि ऐसे बहुत से सबूत नजर आए हैं जिससे उसका पाकिस्तान की सेना और खुफिया सेवाओं के साथ संबंध झलकता है। लेकिन भारतीय मीडिया ने उसकी कहानी को एक नाटकीय धारावाहिक में बदल का रख दिया है और उसे “भारत की बहू”[18] जैसा दर्जा दे दिया है, इस लिए उसे बहुत से लोगों से सहानुभूति मिल रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार हैदर, या शायद यह कहना ज़्यादा उपयुक्त रहेगा कि उसके संचालकों ने, उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक विवाहित हिंदू महिला के तौर-तरीकों में अच्छी तरह से प्रशिक्षित करके स्थिति का पूरा फायदा उठाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, सीमा को भारत में भेजने से पहले पाकिस्तानी हैंडलर्स द्वारा नेपाल में प्रशिक्षित किया गया था। [19]

सीमा हैदर का किस्सा साफ दिखा रहा है कि आतंकवादी संगठन ऑनलाइन गेमिंग का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। चरमपंथियों द्वारा ऑनलाइन गेमिंग के दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ पहली बार कोविड-19 महामारी के दौरान सामने आईं, जब डिजिटल मीडिया के उपयोग में भारी बढ़ोतरी देखी गई। ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी समूह अक्सर गेम्स के अंदर के माहौल, किरदार या कहानियों को अपने कट्टरपंथी विचारों के हिसाब से बदल देते हैं ताकि वे अपनी सोच को छिपे तरीके से फैला सकें। इसका एक बड़ा उदाहरण कॉल ऑफ़ ड्यूटी गेम है, जिसे कथित रूप से इस्लामिक स्टेट ने अपने कट्टरपंथी विचारों को सामान्य दिखाने के लिए बदल दिया। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि ऐसे वीडियो गेम्स को वर्चुअल ट्रेनिंग ग्राउंड की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जहाँ चरमपंथी हमलों की प्लानिंग और युद्ध रणनीति की प्रैक्टिस कर सकते हैं। इसके अलावा, इस बात के भी सबूत मौजूद हैं कि इन-गेम मुद्रा प्रणालियों का उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग और धोखाधड़ी वाले वित्तीय लेनदेन के लिए किया जा रहा है। [20]

जिहादी प्रोपेगंडा को प्रचारित करने के लिए AI का उपयोग भी आम होता जा रहा है। हाल के वर्षों में AI की व्यापक उपलब्धता ने इस दुरुपयोग को काफी बढ़ावा दिया आतंकवादी समूह अब सिर्फ ध्यान खींचने वाले प्रचार के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अभियानों को और प्रभावी बनाने के लिए भी AI का इस्तेमाल कर रहे हैं। ग्लोबल नेटवर्क ऑन एक्सट्रीमिज़्म एंड टेक्नोलॉजी की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हमास, अल-कायदा और ISIS से जुड़े समूह जिहादी सोच को फैलाने के लिए AI-संचालित तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। रिपोर्ट में दी गई केस स्टडीज़ से साफ होता है कि ये संगठन असली खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर झूठी सामग्री फैलाने के लिए AI का इस्तेमाल कर रहे हैं। रिपोर्ट में ऑडियो डीपफेक के उपयोग का भी वर्णन किया गया है, जहाँ स्पंजबॉब स्क्वेयरपैंट्स, रिक सांचेज़ जैसे जाने-माने किरदारों और प्यूडीपाई और मिस्टरबीस्ट जैसे यूट्यूबर्स को युद्ध के नशीद गाते दिखाया जाता है। ये वो नारे हैं जिनका इस्तेमाल लड़ाकों को इस्लामिक युद्ध के लिए प्रेरित करने के लिए किया जाता है।[21]

जहाँ डार्क वेब और टेलीग्राम जैसे अनियंत्रित प्लेटफॉर्म्स पर जिहादी विचारधारा खुलेआम फैलाई जाती है, वहीं फ़ेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम जैसे मुख्यधारा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अधिक सूक्ष्म तरीक़े से “सॉफ्ट प्रोपेगैंडा” फैलाने के लिए किया जाता है। यह सॉफ्ट प्रोपेगैंडा अक्सर वोक इंफ्लुएंसर्स के ज़रिए फैलता है, जो जानबूझकर या अनजाने में जिहादी नेटवर्क की भाषा बोलते हैं और इस्लामी चरमपंथ को छुपाने या सही ठहराने का काम करते हैं। युवाओं के लिए ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर इस तरह के सॉफ्ट नैरेटिव से जुड़ना, कट्टरपंथी विचारधारा के संपर्क में आने का पहला कदम बन जाता है।

निष्कर्ष

 आतंकवादी संगठनों द्वारा – और व्यापक वोक तंत्र के भीतर सक्रिय विभिन्न इकाइयों द्वारा – जिहादी कथाओं को फैलाने के लिए सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग एक गंभीर खतरा पैदा करता है। एआई और डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल करके आतंकवादी संगठनों ने भर्ती और कट्टरपंथ फैलाने के काम में भौगोलिक सीमाओं को लगभग खत्म ही कर दिया है। आज की अत्यधिक जुड़ी हुई दुनिया में, लगभग हर व्यक्ति जिहादी विचारधारा के लिए एक सॉफ्ट टारगेट यानी आसान शिकार बन सकता है।

वोक तंत्र चुपचाप अलग-अलग माध्यमों—जैसे शिक्षा, मीडिया, थिंक टैंक, सोशल मीडिया और पॉपुलर कल्चर—के ज़रिए कट्टरपंथी सोच को फैलाने के लिए एक अनुकूल माहौल तैयार करता है। वैश्वीकरण के नाम पर फैले वोकिज़्म ने दुनिया भर में एक जैसी सोच थोप दी है, जिससे लोगों की आंतरिक सुरक्षा को लेकर समझ कमजोर पड़ी है और वे जिहादी कट्टरपंथ के प्रति और भी ज़्यादा संवेदनशील हो गए हैं।

संदर्भ सूची 

[1] Pakistan Spy Arrests:12 Held in Punjab, Haryana, UP Over Espionage Network – Delhi News – Times of India;   https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/youtuber-trader-student-security-guard-12-isi-linked-spies-held-from-punjab-haryana-and-up-come-from-all-walks-of-life/articleshow/121280413.cms

[2] Jyoti Malhotra, Jyoti Rani, Travel With Jo, YouTuber, India Pakistan, Operation Sindoor: Travel Vlogger Who Visited Pak Twice, Arrested for Spying;   https://www.ndtv.com/india-news/jyoti-malhotra-jyoti-rani-travel-with-jo-youtuber-india-pakistan-operation-sindoor-travel-vlogger-who-visited-pak-twice-arrested-for-spying-in-haryana-8438001

[3]  YouTuber Jyoti Malhotra was aware her Pakistani friends were ISI operatives, says police | Latest News India–- Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/youtuber-jyoti-malhotra-was-aware-her-pakistani-friends-were-isi-operatives-says-police-101748347423899.html

[4] Pakistani ‘Spy’ Jyoti Malhotra’s China Visit, Bangladesh Application Under Scanner: What Was Her Plan? | Republic World; https://www.republicworld.com/india/pakistani-spy-jyoti-malhotra-s-china-visit-bangladesh-application-under-scanner-what-was-her-plan

[5] Shesh Paul Vaid on X; https://x.com/spvaid/status/1924038591799586877?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1924038591799586877%7Ctwgr%5Eb82698f48afca52b364f49dd67d3d13d7f2449af%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fwww.moneycontrol.com%2Fcity%2Fpak-spy-youtuber-jyoti-malhotra-s-pahalgam-trip-before-terror-attack-under-scanner-article-13031035.html

[6] YouTuber Jyoti Malhotra questioned over temple visits amid espionage allegations –  India News | The Financial Express;  https://www.financialexpress.com/india-news/youtuber-jyoti-malhotra-questioned-over-temple-visits-amid-espionage-allegations/3856039/

[7]  Maha Kumbh to Golden Temple: Jyoti Malhotra visited over 10 key religious sites across India| Was it a recce for Pakistan? https://www.wionews.com/india-news/maha-kumbh-to-golden-temple-spy-jyoti-malhotra-visited-over-10-key-religious-sites-across-india-a-recce-for-pakistan-1747741103889

[8] YouTuber Jyoti Malhotra, 11 others arrested so far in Pakistan ‘spy’ probe | What we know | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/youtuber-jyoti-malhotra-11-others-arrested-so-far-in-pakistan-spy-probe-what-we-know-101747671321068.html

[9] Ashoka University: Harvard University’s Junior Partner. p.p 517-559.

[10]  Terror Outfits Resort To ‘Magic Lantern Tactic’ To Target Youth On Social Media;   https://www.etvbharat.com/en/!bharat/terror-outfits-resort-to-magic-lantern-tactic-to-target-youth-on-social-media-enn25052102366

[11] Tik Tok jihad: Online radicalization threat looms over Europe;  https://www.ynetnews.com/article/rjgiduh9c

[12] Ibid.

[13] Lone Wolf and Youth Terrorism by Institute for Economics & Peace;  https://www.economicsandpeace.org/wp-content/uploads/2025/03/Lone-Wolf-and-Youth-Terrorism.pdf

[14] Ibid.

[15] Social Media Strategies and Online Narratives of Terrorist Organizations; Case studies of Al-Qaeda, ISIS, Taliban and Lashkar – e- Taiba:: EFSAS;  https://www.efsas.org/publications/study-papers/social-media-strategies-online-narratives-of-terrorists-groups-al-qaeda-isis-taliban-lashkar/

[16] From clicks to chaos: How social media algorithms amplify extremism; https://www.orfonline.org/expert-speak/from-clicks-to-chaos-how-social-media-algorithms-amplify-extremism

[17] Seema Haider’s Pakistan Army, ISI link mystery deepens: Multiple PUBG contacts, fluent English – India Today;   https://www.indiatoday.in/india/story/seema-haider-sachin-meena-pakistan-army-isi-woman-pubg-love-story-uttar-pradesh-ats-questioning-illegal-entry-india-spy-2408234-2023-07-18

[18] Seema Haider should be shown empathy as she’s India’s daughter-in-law’ | Noida News – Times of India;https://timesofindia.indiatimes.com/city/noida/seema-haider-should-be-shown-empathy-as-shes-indias-daughter-in-law/articleshow/120781829.cms

[19] (45) Passports, Mobiles, Fake ID. What Was Seema’s Mission? | THE CHANAKYA DIALOGUES | Major Gaurva Arya – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=0DQNxolgLIM

[20] Gaming platforms: A new frontier for extremist recruitment and radicalisation;  https://www.orfonline.org/expert-speak/gaming-platforms-a-new-frontier-for-extremist-recruitment-and-radicalisation

[21] AI Jihad: Deciphering Hamas, Al-Qaeda and Islamic State’s Generative AI Digital Arsenal – GNET; https://gnet-research.org/2024/02/19/ai-jihad-deciphering-hamas-al-qaeda-and-islamic-states-generative-ai-digital-arsenal/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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