कार्तिगै दीपम प्रकरण: हिंदू परंपराओं की अपनी भूमि पर घटती जगह

कार्तिगै दीपम का यह विवाद दिखाता है कि आज हिंदू धार्मिक परंपराओं को अपनी ही भूमि पर अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासन की अनुमति से मिलने वाली अस्थायी छूट की तरह देखा जाने लगा है।
  • तिरुप्परंकुन्द्रम का विवाद यह स्पष्ट करता है कि समकालीन भारत में हिंदू धार्मिक अधिकार अक्सर प्रशासनिक सुविधा, राजनीतिक गणनाओं और संभावित अशांति की आशंकाओं के अधीन कर दिए जाते हैं, जिससे संवैधानिक संरक्षण व्यवहार में कमजोर पड़ता दिखाई देता है।
  • उच्च न्यायालय ने कार्तिगै दीपम को एक स्थापित, ऐतिहासिक और विधिसम्मत परंपरा मानते हुए भक्तों के अधिकार को स्वीकार किया, किंतु राज्य सरकार और मंदिर प्रशासन ने न्यायिक आदेशों को प्रभावी रूप से लागू करने के बजाय अवरोध और टालमटोल का मार्ग अपनाया।
  • तिरुप्परंकुन्द्रम पहाड़ी, दीपथून और कार्तिगै दीपम तमिल हिंदू सभ्यता के पवित्र भूगोल और सामूहिक स्मृति से जुड़े तत्व हैं, जिनका महत्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत भी है, और जिन्हें समय के साथ सीमित किया गया।
  • न्यायिक आदेशों की अवहेलना, उसके बाद न्यायाधीश पर राजनीतिक हमले और महाभियोग की कोशिशें यह संकेत देती हैं कि वैध हिंदू अधिकारों की रक्षा करना स्वयं न्यायिक स्वतंत्रता के लिए जोखिमपूर्ण बना दिया गया है।
  • यह प्रकरण किसी एक अनुष्ठान या स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता, प्रशासनिक अवरोध और ऐतिहासिक विस्मृति के उस व्यापक पैटर्न को उजागर करता है, जो सार्वजनिक जीवन में हिंदू धार्मिक अभिव्यक्ति के दायरे को लगातार संकुचित कर रहा है।

तमिलनाडु के तिरुप्परंकुन्द्रम पहाड़ी पर कार्तिगै दीपम जलाने को लेकर उठा विवाद किसी एक धार्मिक अनुष्ठान या त्योहार तक सीमित नहीं है। यह प्रकरण समकालीन भारत में हिंदू धार्मिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति को सामने लाता है। यह स्पष्ट करता है कि ये अधिकार अक्सर प्रशासनिक सुविधा, राजनीतिक गणनाओं और संभावित आशंकाओं के अधीन कर दिए जाते हैं। ऐसे में मामला एक धार्मिक प्रथा से आगे बढ़कर उस तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगा देता है, जिसे संविधान ने अधिकारों का संरक्षक बनाया है।

अदालत ने स्पष्ट रूप से यह माना कि मंदिर परिसर में दीपम जलाना भक्तों का अधिकार है। यह अधिकार प्राचीन परंपरा, ऐतिहासिक प्रमाणों और औपनिवेशिक काल में हुई मान्यताओं से जुड़ा है। इसके बावजूद तमिलनाडु सरकार ने उस आदेश को लागू करने के बजाय उसमें बाधाएं खड़ी करने का रास्ता चुना। यह अकेला मामला नहीं है; यह दिखाता है कि हिंदू प्रथाओं को स्थायी अधिकार नहीं, प्रशासनिक छूट माना जाता है। नतीजा यह होता है कि संवैधानिक सुरक्षा चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में कमजोर पड़ती दिखाई देती है।

तिरुप्परंकुन्द्रम की सभ्यतागत पृष्ठभूमि, दीपथून पर कार्तिगै दीपम का धार्मिक महत्व, उच्च न्यायालय का स्पष्ट फैसला और उसके बाद पैदा हुआ राजनीतिक तनाव—इन सबको एक साथ देखने पर यह साफ हो जाता है कि समस्या केवल एक दीप जलाने की नहीं है। समस्या एक ऐसे मानसिक ढांचे की है, जहां इतिहास को भुलाकर और प्रशासनिक अवरोध खड़े कर हिंदू धार्मिक स्थानों का दायरा धीरे-धीरे घटाया जा रहा है।

दीपथून और कार्तिगै दीपम की परंपरा

तिरुप्परंकुन्द्रम पहाड़ी तमिलनाडु के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में एक विशेष स्थान रखती है। पहाड़ी के नीचे स्थित अरुल्मिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है और तमिल हिंदुओं के लिए गहरी श्रद्धा का केंद्र है [1]। सदियों से यह पहाड़ी सिर्फ एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि पूजा, तीर्थ और पीढ़ियों की स्मृति से बना एक जीवंत पवित्र क्षेत्र रही है। मुरुगन मंदिर के साथ-साथ यहां प्राचीन जैन गुफाएं और सिकंदर बदूशा दरगाह भी स्थित हैं, जिन्हें चौदहवीं शताब्दी के मदुरै सल्तनत काल से जोड़ा जाता है।

पहाड़ी की चोटी पर बना दीपथून एक पुरातन पत्थर का दीपस्तंभ है, जो कार्तिगै दीपम परंपरा का केंद्र रहा है। तमिल हिंदू परंपरा में ऊंचे स्थानों पर दीप जलाना केवल एक रस्म नहीं माना जाता। यह आध्यात्मिक प्रकाश, चेतना के ऊंचे स्तर की ओर बढ़ने और सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक है। पुराने साहित्य, मंदिरों के अभिलेख और स्थानीय समुदाय की सामूहिक स्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि दीपथून सदियों तक इस अनुष्ठान का मुख्य केंद्र रहा है।

कार्तिगै दीपम की जड़ें संगम काल तक जाती हैं। तमिल महीने कार्तिगै की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन तमिलनाडु भर में घरों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर दीप जलाए जाते हैं, जिससे एक साझा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण बनता है [2]। तिरुप्परंकुन्द्रम में यह परंपरा खास तौर पर पहाड़ी की चोटी पर दीपथून पर दीप जलाने के रूप में प्रकट होती थी। भक्त बताते हैं कि यह ज्योति पीढ़ियों तक वहां प्रज्वलित होती रही और लोगों के लिए आस्था तथा निरंतरता का प्रतीक बनी रही।

समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे बाधित होती चली गई। भक्तों का मानना है कि विदेशी आक्रमणों, राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और बाद में प्रशासन की हिचकिचाहट के कारण पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाना बंद होता गया [3]। औपनिवेशिक दौर की रुकावटों और स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई सतर्क नीतियों के चलते दीपम को पहाड़ी के बीच में स्थित उचिपिल्लैयार मंडपम तक सीमित कर दिया गया। लेकिन दबाव या अस्थिर हालात में किसी अनुष्ठान का अस्थायी रूप से रुक जाना उसके दोबारा शुरू होने के अधिकार को खत्म नहीं कर देता। हिंदू अनुष्ठान अस्थायी रूप से रुक सकते हैं, पर अनुकूल अवसर पर फिर जीवित हो उठते हैं।

सदियों पुराने अनुष्ठान की न्यायिक मान्यता

राम रवि कुमार की मदुरै पीठ में याचिका से यह मामला औपचारिक रूप से शुरू हुआ। राम रवि कुमार ने मांग की कि दीपथून पर कार्तिगै दीपम जलाने की पुरानी परंपरा को फिर से शुरू किया जाए [4]। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कोई नई या हाल में शुरू हुई रस्म नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा है।

उन्होंने यह भी बताया कि पिछले कई दशकों से दीप जलाने की अनुमति पहाड़ी के बीच में स्थित उचिपिल्लैयार मंदिर के पास बने एक मंडपम तक सीमित कर दी गई थी। यह व्यवस्था किसी धार्मिक सिद्धांत या ऐतिहासिक प्रमाण पर आधारित नहीं थी, बल्कि केवल उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए किया गया एक समझौता था। मूल परंपरा इससे अलग थी, जिसमें दीपथून यानी पहाड़ी की चोटी ही इस अनुष्ठान का स्थान हुआ करती थी।

इस याचिका का विरोध मंदिर प्रशासन ने, जो हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग के अधीन आता है, और तमिलनाडु सरकार ने किया। सरकार की ओर से कई आपत्तियां उठाई गईं। इनमें दीपथून का दरगाह के पास होना, सार्वजनिक शांति, कानून-व्यवस्था और संभावित तनाव की आशंकाएं शामिल थीं। राज्य का तर्क यह था कि अगर अनुष्ठान को उसके पारंपरिक स्थल पर फिर से शुरू किया गया, तो सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए उनके अनुसार पहले से चली आ रही सीमित व्यवस्था को बनाए रखना ही अधिक सुरक्षित विकल्प था।

1 दिसंबर 2025 को न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन ने इस मामले में एक विस्तृत फैसला सुनाया। न्यायालय ने दीपथून पर कार्तिगै दीपम जलाने की अनुमति देते हुए भक्तों के परंपरा, आस्था और इतिहास में निहित अधिकार को बहाल किया [5]। अदालत ने साफ कहा कि यह अनुष्ठान कोई मनमानी मांग नहीं, बल्कि एक अच्छी तरह स्थापित परंपरा है, जिसके समर्थन में पर्याप्त साहित्यिक, ऐतिहासिक और न्यायिक प्रमाण मौजूद हैं [6]

अपने फैसले में न्यायालय ने कई पुराने दस्तावेजों और पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया। इनमें 1923 का वह दीवानी फैसला भी शामिल था, जिसमें तिरुप्परंकुन्द्रम पहाड़ी पर मंदिर के स्वामित्व को मान्यता दी गई थी। इस फैसले को बाद में प्रिवी काउंसिल ने भी सही ठहराया था। इन सबका हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि दीपथून मंदिर की भूमि पर स्थित है और वह दरगाह की परिसीमा के भीतर नहीं आता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2005 में हुई एक शांति बैठक के दौरान सिकंदर बदूशा दरगाह की ओर से दीप जलाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी, बशर्ते यह कार्य दरगाह से कम से कम पंद्रह मीटर की दूरी पर किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी परंपरा का अस्थायी ठहराव उसके स्थायी अंत का आधार नहीं बनता।

अंत में न्यायालय ने दीपथून पर दीपम जलाने का स्पष्ट निर्देश दिया और यह सुनिश्चित करने के लिए पुलिस सुरक्षा देने का भी आदेश दिया कि अनुष्ठान शांतिपूर्वक संपन्न हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि दीप जलाने जैसा प्रतीकात्मक और शांतिपूर्ण धार्मिक कार्य किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला नहीं माना जा सकता [7]।Top of Form

न्यायिक आदेश की अवहेलना

न्यायालय के आदेश के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, वह किसी भी संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। अदालत के स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देशों के बावजूद मंदिर प्रशासन ने अनुष्ठान को पहाड़ी के निचले हिस्से में बने मंडपम तक ही सीमित रखा। इसका सीधा अर्थ यह था कि न्यायालय का आदेश काग़ज़ पर तो था, लेकिन ज़मीन पर उसे लागू नहीं किया गया। इस खुली अवहेलना के चलते भक्तों को एक बार फिर अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा और अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी [8]

इस स्थिति में न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने एक और स्पष्ट आदेश पारित किया। उन्होंने याचिकाकर्ता और दस अन्य भक्तों को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की सुरक्षा में दीपथून तक जाकर कार्तिगै दीपम जलाने की अनुमति दी [9]। इस आदेश में उन्होंने खास तौर पर यह रेखांकित किया कि आस्था से जुड़े मामलों में प्रतीकों का विशेष महत्व होता है। दीप जलाना केवल एक औपचारिक क्रिया नहीं है, बल्कि वह धार्मिक जीवन, विश्वास और परंपरा से जुड़ा एक गहरा प्रतीक है। ऐसे प्रतीकों को हल्के में लेना या उन्हें प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नज़रअंदाज़ करना धार्मिक स्वतंत्रता की भावना के विपरीत है।

इसके बावजूद यह आदेश भी व्यवहार में लागू नहीं किया गया। स्थानीय पुलिस ने निषेधाज्ञा और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पहाड़ी तक जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया और अनुष्ठान को रोक दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि तनाव बढ़ा, विरोध प्रदर्शन हुए, कई लोगों को हिरासत में लिया गया और कुछ लोग घायल भी हुए। इसी बढ़ते तनाव और निराशा के माहौल में एक भक्त, तिरु पूर्णा चंद्रन, ने आत्मदाह कर लिया [10]

इसी दौरान राज्य सरकार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया [11]। जो मामला संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक अधिकारों के सामान्य और नियमित प्रवर्तन का होना चाहिए था, वह धीरे-धीरे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव का रूप लेने लगा। इस स्तर पर विवाद केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा। यह एक स्पष्ट संवैधानिक प्रश्न बन गया, जिसमें यह तय होना था कि न्यायालय के आदेशों का पालन कैसे होगा, संस्थाओं की जिम्मेदारियां क्या हैं और सत्ता की सीमाएं कहां तक जाती हैं।

न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला

जैसे-जैसे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, राजनीतिक बयानबाजी तेज होती चली गई। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन पर पक्षपात के आरोप लगाए गए और अंततः सौ से अधिक विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र सामने आया, जिसमें उनके पद से हटाने की मांग की गई [12]। आरोप यह था कि उन्होंने धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर फैसला दिया है। लेकिन इन आरोपों को ध्यान से देखने पर वे बेहद व्यापक और अस्पष्ट प्रतीत होते हैं। इतने गंभीर कदम के समर्थन में न तो कोई ठोस तथ्य पेश किया गया और न ही कोई स्पष्ट प्रमाण या सुविचारित कानूनी तर्क सामने रखा गया [13]

इस घटनाक्रम के जवाब में एक सशक्त संस्थागत प्रतिक्रिया देखने को मिली। सर्वोच्च न्यायालय और देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के छप्पन पूर्व न्यायाधीशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस महाभियोग प्रयास की कड़ी निंदा की। उन्होंने इसे “समाज के एक विशेष वर्ग की वैचारिक और राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप न चलने वाले न्यायाधीशों को डराने और दबाव में लेने का एक निर्लज्ज प्रयास [14]” बताया। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि यदि ऐसी कोशिशों को स्वीकार किया गया, तो यह लोकतंत्र और न्यायिक स्वतंत्रता की नींव को कमजोर कर देगा [15]

इस पूरे प्रकरण को केवल एक राजनीतिक विवाद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में समझना होगा। इससे यह संकेत मिलता है कि हिंदू अधिकारों की रक्षा अब जोखिमपूर्ण मानी जा रही है। न्यायिक स्वतंत्रता किसी एक आस्था या विचारधारा तक सीमित नहीं हो सकती। अगर कुछ आस्थाओं से जुड़े फैसलों पर न्यायपालिका की सराहना की जाती है, लेकिन वैध हिंदू आचार-प्रथाओं की रक्षा करने पर उसी न्यायपालिका पर हमला किया जाता है, तो इससे उसकी स्वतंत्रता केवल दिखावे में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी कमजोर पड़ने लगती है।

संविधान के अनुसार, किसी उच्च न्यायालय या भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के केवल दो ही आधार हो सकते हैं—सिद्ध दुराचार या अक्षमता [16]कृष्णा स्वामी बनाम भारत संघ [(1992) 4 SCC 605] मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी फैसले में गलती होना या उसका अलोकप्रिय होना दुराचार नहीं माना जा सकता। केवल पद का जानबूझकर दुरुपयोग, भ्रष्टाचार या नैतिक पतन ही इस कठोर कसौटी पर खरे उतरते हैं। इस दृष्टि से देखें तो न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के खिलाफ लगाए गए आरोप इन मानकों पर कहीं भी खरे नहीं उतरते [17]

धर्मनिरपेक्षता का दोहरा मानदंड

तिरुप्परंकुन्द्रम प्रकरण व्यवहार में लागू की जा रही धर्मनिरपेक्षता पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है। सिद्धांततः धर्मनिरपेक्ष शासन का अर्थ सभी आस्थाओं के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना है। किंतु इस मामले में राज्य सरकार का आचरण इस मूल भावना से भिन्न दिखाई देता है। जब अन्य धार्मिक समूहों से जुड़े न्यायालयीन आदेश बिना विलंब लागू किए जाते हैं, लेकिन हिंदू परंपराओं की बहाली को सार्वजनिक व्यवस्था या साम्प्रदायिक सौहार्द के नाम पर रोका या टाला जाता है, तब धर्मनिरपेक्षता तटस्थ सिद्धांत नहीं रह जाती। वह शासन का एक सुविधाजनक औजार बन जाती है, जहां अधिकारों का निर्धारण समानता और कानून के बजाय राजनीतिक सुविधा के आधार पर होने लगता है।

इसी कारण तिरुप्परंकुन्द्रम प्रकरण केवल एक स्थानीय या धार्मिक विवाद नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि यदि धर्मनिरपेक्षता को चयनात्मक ढंग से लागू किया जाता रहा, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएगी और संवैधानिक संतुलन को गंभीर रूप से क्षति पहुंचेगी [18]

रणनीतिक उलझाव

इस पूरे विवाद के दौरान दीपथून की पहचान खुद एक अलग विवाद का विषय बनती चली गई। कभी इसे ब्रिटिश काल का सर्वे-चिह्न बताया गया, कभी एक तटस्थ और धर्मनिरपेक्ष संरचना कहा गया, और बाद में इसे जैन स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई [19]। इन बदलते हुए दावों में किसी गंभीर, निष्पक्ष या निरंतर ऐतिहासिक शोध की झलक नहीं मिलती। इसके बजाय यह एक जानी-पहचानी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य हिंदू अनुष्ठान से जुड़े दावों को टालना, कमजोर करना या अनिश्चित बनाना होता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ये दावे किसी नए पुरातात्विक प्रमाण या ठोस ऐतिहासिक खोज के आधार पर सामने नहीं आए। इसके उलट, एक तयशुदा तरीका अपनाया गया—इतने अलग-अलग और परस्पर विरोधी कथानक खड़े कर दिए जाएं कि मूल हिंदू दावा अस्थायी, अस्पष्ट और समझौते लायक दिखने लगे [20]। जब एक ही वस्तु के बारे में कई वैकल्पिक पहचानें प्रचारित कर दी जाती हैं, तो सच्चाई अपने आप धुंधली पड़ जाती है और अधिकार का सवाल पीछे छूट जाता है।

पवित्र स्थलों से जुड़े अन्य विवादों में भी यही पैटर्न बार-बार देखा गया है। राम जन्मभूमि के प्रसंग में भी यही क्रम सामने आया—पहले पूरी तरह इनकार, फिर धीरे-धीरे दावे को कमजोर करने की कोशिश। बाबरी मस्जिद के नीचे मिले अवशेषों को मंदिर मानने से बचने के लिए उन्हें हर संभव नाम दिया गया। तिरुप्परंकुन्द्रम में दीपथून को बार-बार हिंदू पहचान से अलग किसी न किसी रूप में प्रस्तुत करना उसी सोच की पुनरावृत्ति है [21]। जब किसी स्थल की पहचान को लगातार बदला जाता है, तो उद्देश्य इतिहास को समझना नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा को अस्थिर और विवादित बनाना होता है।

प्रशासनिक विरोधाभास

तिरुप्परंकुन्द्रम प्रकरण में एचआर एंड सीई विभाग की भूमिका सबसे अधिक सवालों के घेरे में रही। जिस विभाग का उद्देश्य हिंदू मंदिरों और भक्तों के अधिकारों की रक्षा करना है, उसी ने इस मामले में भक्तों के पक्ष में खड़े होने के बजाय उनके दावों का विरोध किया। इतना ही नहीं, विभाग ने न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के उस फैसले के खिलाफ भी अपील दायर की, जिसने एक पारंपरिक हिंदू अनुष्ठान के अधिकार को मान्यता दी थी [22]। यह स्थिति एक गहरी संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करती है, जहां हिंदू संस्थाओं की रक्षा के लिए बनाया गया राज्य-नियंत्रित निकाय ही हिंदू धार्मिक अधिकारों के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है।

यदि कोई धार्मिक संस्था वास्तव में स्वायत्त होती, तो वह अपनी परंपराओं की रक्षा करती, अपने संसाधनों को संगठित करती और अपने भक्तों के साथ मजबूती से खड़ी होती। लेकिन व्यवहार में इसका उलटा हुआ; विभाग ने धार्मिक अधिकारों को नहीं, प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी। इससे साफ झलकता है कि निर्णय-प्रक्रिया में धार्मिक भावनाओं और परंपराओं से अधिक सरकारी प्रक्रियाओं और संभावित राजनीतिक दबावों को महत्व दिया गया।

यह अनुभव हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर लंबे समय से उठती रही आलोचनाओं को और मजबूत करता है। जब धार्मिक संस्थाओं का संचालन सीधे सरकार के हाथ में होता है, तो वे अपने धार्मिक दायित्वों के अनुसार काम करने के बजाय उस समय की राजनीतिक प्राथमिकताओं और प्रशासनिक सोच के अनुरूप ढलने लगती हैं। नतीजतन, मंदिर और उनसे जुड़े धार्मिक अधिकार स्वतंत्र रूप से सुरक्षित नहीं रह पाते। इसी कारण मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग को केवल वैचारिक या भावनात्मक आग्रह के रूप में नहीं देखा जा सकता। तिरुप्परंकुन्द्रम जैसे मामलों से स्पष्ट होता है कि यह मांग व्यावहारिक अनुभव से निकली एक वास्तविक संस्थागत आवश्यकता है।

न्यायिक स्वतंत्रता पर दबाव

तिरुप्परंकुन्द्रम प्रकरण एक बुनियादी सवाल उठाता है—क्या कोई वैध और ऐतिहासिक रूप से मान्य धार्मिक प्रथा केवल इस आशंका पर रोकी जा सकती है कि उससे विरोध हो सकता है या कहीं अशांति न फैल जाए, भले ही वह कानून के खिलाफ न हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 यह जरूर कहता है कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि केवल अटकलों, डर या पहले से गढ़ी गई आशंकाओं के आधार पर धार्मिक अधिकारों को निष्प्रभावी कर दिया जाए।

यदि वास्तविक या कल्पित अव्यवस्था की मात्र संभावना को ही संवैधानिक रूप से मान्य प्रथाओं को रोकने का आधार बना दिया जाए, तो इसका सीधा परिणाम यह होगा कि जो लोग सबसे अधिक दबाव डालते हैं या अव्यवस्था की धमकी देते हैं, उन्हें एक तरह की अनौपचारिक वीटो शक्ति मिल जाएगी। ऐसा दृष्टिकोण कानून के शासन को मजबूत करने के बजाय असहिष्णुता को बढ़ावा देता है, दबाव की राजनीति को पुरस्कृत करता है और धीरे-धीरे उन संवैधानिक भरोसों को कमजोर कर देता है, जिनकी रक्षा के लिए वे बनाए गए थे।

इसी संदर्भ में उन अधिकारों की रक्षा करने वाले न्यायाधीश को निशाना बनाया जाना भी उतना ही गंभीर और चिंताजनक है। न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव, जिसके सफल होने की कोई वास्तविक संवैधानिक संभावना नहीं थी, ने स्वाभाविक रूप से पूर्व न्यायाधीशों, विधि विशेषज्ञों और आम जनता की कड़ी आलोचना को जन्म दिया। जब एक सरकार अदालत के आदेशों को लागू करने से बचती है और साथ ही वैध हिंदू परंपरा की रक्षा करने वाले उसी न्यायाधीश को पक्षपाती बताकर बदनाम करती है, तो इससे एक खतरनाक संदेश जाता है। ऐसी स्थिति में न्यायाधीश केवल कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देने के बजाय यह सोचने को मजबूर हो सकते हैं कि उनके फैसलों के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे। यह न्यायिक स्वतंत्रता की मूल भावना के विरुद्ध है [23]

अदालतों के फैसलों से असहमति के लिए अपील, पुनर्विचार और संवैधानिक प्रक्रियाएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करते हुए वैध अधिकारों को मान्यता देने वाले न्यायाधीश पर व्यक्तिगत हमले करना किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

धार्मिक अभिव्यक्ति की सीमा

इस पूरे प्रकरण में एक और तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। हिंदू भक्तों ने हर चरण पर शांतिपूर्ण और संस्थागत रास्ते ही अपनाए। उन्होंने ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला दिया, प्रशासन के समक्ष आवेदन रखे, शांति समिति की बैठकों में हिस्सा लिया और अंततः अदालत का सहारा लिया। उनका व्यवहार संयमित रहा और यह दिखाता है कि वे संवैधानिक प्रक्रियाओं में भरोसा रखते हैं।

ऐसे शांतिपूर्ण और कानून-सम्मत आग्रह को उकसावा या अव्यवस्था बताकर प्रस्तुत करना अपने आप में एक असहज सवाल खड़ा करता है। अगर साल में सिर्फ एक बार, अपने पारंपरिक और ऐतिहासिक स्थल पर एक दीप जलाना भी विघटनकारी माना जाने लगे, तो यह संकेत देता है कि सार्वजनिक जीवन में हिंदू धार्मिक परंपराओं के लिए उपलब्ध स्थान लगातार सिमटता जा रहा है। जो समाज एक शांतिपूर्ण और वैध धार्मिक अनुष्ठान को भी साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा मानने लगता है, वह दरअसल हिंदू धार्मिक अभिव्यक्ति के प्रति अपनी गहरी असहजता को उजागर करता है।

समापन टिप्पणी

तिरुप्परंकुन्द्रम का यह प्रकरण आज के भारत के बारे में एक गंभीर और असहज सत्य सामने रखता है। जिस धरती पर हिंदू सभ्यता का जन्म हुआ और जिसने हजारों वर्षों तक अपने अनुष्ठानों, प्रतीकों और आस्थाओं के सहारे स्वयं को जीवित रखा, उसी भूमि पर आज हिंदू धार्मिक अधिकार अपने आप सुरक्षित और सुनिश्चित नहीं रह गए हैं। स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब अदालतों के स्पष्ट फैसलों के बावजूद कार्यपालिका उन्हें लागू करने से बचती है, जब ज़मीनी स्तर पर आदेशों का पालन रोका जाता है, और जब हिंदू अधिकारों की रक्षा करने वाले न्यायाधीशों को अलग-थलग किया जाता है या राजनीतिक निशाने पर ले लिया जाता है।

सभ्यताएं अचानक एक झटके में खत्म नहीं होतीं। उनका क्षरण धीरे-धीरे होता है—जब उनके अनुष्ठानों में बार-बार बाधाएं डाली जाती हैं, जब उनके पवित्र स्थलों को लगातार विवादों में घसीटा जाता है, और जब उनके अधिकारों को सिद्धांत के बजाय राजनीतिक सुविधा और तात्कालिक संतुलन पर टिका दिया जाता है। आज कई जगहों पर हिंदू उपासना किसी अधिकार की तरह नहीं, बल्कि समझौते, देरी और रियायतों के सहारे चलती हुई दिखाई देती है।

किसी दीपक का बुझाया जाना कभी केवल एक प्रतीकात्मक घटना नहीं होता। वह एक गहरे क्षरण का संकेत होता है—जहां कानून धीरे-धीरे झुकने लगता है, संस्थाएं निर्णय लेने में हिचकिचाने लगती हैं, और उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन जीवित धर्म राज्य और न्यायालयों के पूर्ण संरक्षण के बिना स्वयं की रक्षा करने को मजबूर हो जाता है। यही कारण है कि तिरुप्परंकुन्द्रम का मामला केवल एक स्थान या एक अनुष्ठान का सवाल नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि यदि ऐसे मुद्दों को हल्के में लिया गया, तो उनके प्रभाव बहुत दूर तक जाएंगे।

संदर्भ सूची

[1] Why DMK Admin Blocking Thiruparankundram Deepam Wounds Both The Constitution And Civilisation; https://swarajyamag.com/tamil-nadu/thiruparankundram-why-the-dmk-admins-blocking-of-karthigai-deepam-wounds-both-constitution-and-civilisation

[2] Judgement Analysis of the Karthigai Deepam order passed by Justice GR Swaminathan; https://hindupost.in/law-policy/judgement-analysis-of-the-karthigai-deepam-order-passed-by-justice-gr-swaminathan/#

[3] Karthigai Deepam Row | ‘Vague Fears’ Can’t Justify Denying Right to Worship: Hindu Site Tells Madras HC; https://lawchakra.in/high-court/karthigai-deepam-vague-fears/

[4] ‘Lighting lamp atop hill is a Tamil tradition, can’t offend anybody’s sensibilities’; Madras HC directs Karthigai Deepam to be lit at Deepathoon; https://www.scconline.com/blog/post/2025/12/04/madras-hc-lighting-lamp-atop-hill-tamil-tradition-devasthanam-karthigai-deepam-scc-times/

[5] Rama Ravikumar v. District Collector, Madurai, 2025 SCC OnLine Mad 11477, Decided on 01-12-2025]; or ‘Lighting lamp atop hill is a Tamil tradition, can’t offend anybody’s sensibilities’; Madras HC directs Karthigai Deepam to be lit at Deepathoon; https://www.scconline.com/blog/post/2025/12/04/madras-hc-lighting-lamp-atop-hill-tamil-tradition-devasthanam-karthigai-deepam-scc-times/

[6] Inhuman deal for harmonious Hindus; https://organiser.org/2025/12/08/329324/bharat/inhuman-deal-for-harmonious-hindus/

[7] ‘Lighting lamp atop hill is a Tamil tradition, can’t offend anybody’s sensibilities’; Madras HC directs Karthigai Deepam to be lit at Deepathoon; https://www.scconline.com/blog/post/2025/12/04/madras-hc-lighting-lamp-atop-hill-tamil-tradition-devasthanam-karthigai-deepam-scc-times/

[8] Rama Ravikumar v. KJ Praveenkumar IAS; CONT(MD) No. 3594 of 2025  https://www.verdictum.in/pdf_upload/rama-ravikumar-v-kj-praveenkumar-others-1757971.pdf

[9] Ibid

[10] Madurai: Hindu devotee dies by self-immolation over DMK government’s refusal to allow lighting of sacred lamp at Thiruparankundram Deepathoon; https://www.opindia.com/news-updates/madurai-man-dies-by-self-immolation-anguished-over-thiruparankundram-deepathoon-row/

[11] Tamil Nadu Officers Move Supreme Court Against Madras HC Order To Allow Temple Devotees To Light Lamp Near Thiruparankundram Hill Dargah; https://www.livelaw.in/top-stories/tamil-nadu-moves-supreme-court-against-madras-hc-order-allowing-lamp-lighting-near-thiruparakundram-hill-dargah-312247

[12] ‘Serious questions over impartiality’: Over 100 opposition MPs submit motion for Madras HC judge Justice G.S. Swaminathan’s removal; https://theleaflet.in/leaflet-reports/serious-questions-over-impartiality-over-100-opposition-mps-submit-motion-for-madras-hc-judge-justice-gs-swaminathans-removal

[13] Karthigai Deepam Row: Impeachment is intimidation; https://organiser.org/2025/12/21/331335/bharat/karthigai-deepam-row-impeachment-is-intimidation/

[14]  56 Former Judges Condemn Impeachment Move Against Justice GR Swaminathan, Call It Attempt To Browbeat Judiciary; https://www.livelaw.in/top-stories/56-former-judges-condemn-impeachment-move-against-justice-gr-swaminathan-call-it-attempt-to-browbeat-judiciary-313157

[15] Ibid

[16] Articles 218 and 124 of the Constitution of India; https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/19151/1/constitution_of_india.pdf

[17] Karthigai Deepam Row: Impeachment is intimidation; https://organiser.org/2025/12/21/331335/bharat/karthigai-deepam-row-impeachment-is-intimidation/

[18] Thiruparankundram: Of Shifting Pillars And Sacrifices; https://swarajyamag.com/culture/thiruparankundram-of-shifting-pillars-and-sacrifices

[19] Ibid

[20] Ibid

[21] Ibid

[22] BJP vs DMK: Why a Temple Deepam Lit a Political Fire in Tamil Nadu; https://www.newkerala.com/news/o/systematic-assault-hindu-rights-tn-bjp-attacks-dmk-govt-218

[23] From Lamp Dispute to Constitutional Crisis: Tamil Nadu Government’s War on the Judiciary; https://swarajyamag.com/states/from-lamp-dispute-to-constitutional-crisis-tamil-nadu-governments-war-on-the-judiciary

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