धर्म का अपहरण: मैसूरु दशहरा और हिंदू पहचान को मिटाने की कहानी
- आज देश में भक्ति और आस्था को “संस्कृति” और “विरासत” के नाम पर सरकारी प्रदर्शनों में बदला जा रहा है, जहाँ मंदिर पर्यटन स्थल और पूजा-परंपराएँ “राज्य आयोजन” बनती जा रही हैं।
- मैसूरु दशहरे में हिंदू परंपराओं की आलोचक बानू मुश्ताक को उद्घाटन के लिए बुलाने का निर्णय श्रद्धालुओं और पुजारियों में आक्रोश का कारण बना। इसे एक सुनियोजित प्रयास माना गया, जिसमें एक पवित्र हिंदू पर्व को “धर्मनिरपेक्ष” कार्यक्रम में बदला जा रहा है।
- दशकों से सरकारें हिंदू मंदिरों और त्योहारों पर “प्रबंधन” के नाम पर नियंत्रण करती रही हैं, जबकि अन्य धर्मों की संस्थाओं में ऐसा हस्तक्षेप नहीं होता। यही एकतरफा “धर्मनिरपेक्षता” अब आस्था पर नियंत्रण का माध्यम बन गई है।
- “समावेशिता” के नाम पर त्योहारों की आत्मा बदली जा रही है — पूजा की जगह प्रदर्शन और श्रद्धा की जगह भाषण आ गए हैं। धीरे-धीरे यह प्रक्रिया हिंदू पहचान के क्षरण की ओर ले जा रही है।
- यह विवाद किसी एक आयोजन का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रश्न है। यदि हिंदू समाज अपने पर्वों की रक्षा स्वयं नहीं करेगा, तो सरकारें उन्हें अपने राजनीतिक और वैचारिक ढाँचे में ढालती रहेंगी।
आज भारत में एक गहरी और चिंताजनक प्रवृत्ति दिख रही है — जहाँ ईश्वर के प्रति श्रद्धा को “साझी संस्कृति” का नाम दिया जा रहा है, और भक्ति की परंपराएँ “विरासत” के नाम पर सरकारी प्रदर्शन बन गई हैं। जो मंदिर कभी आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे रहते थे, वे अब पर्यटन केंद्रों में बदल रहे हैं। जिन उत्सवों की जड़ें सदियों की पूजा और साधना में थीं, वे आज “राज्य आयोजन” या “सांस्कृतिक कार्यक्रम” कहे जा रहे हैं। भक्त और भगवान के बीच का आत्मिक रिश्ता अब प्रशासनिक औपचारिकताओं और राजनीतिक प्रतीकों में बदलता जा रहा है।
इस पवित्रता के क्रमिक धर्मनिरपेक्षीकरण का ताज़ा उदाहरण इस वर्ष का मैसूरु दशहरा है। कर्नाटक सरकार ने प्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को उद्घाटन के लिए बुलाया — वही मुश्ताक, जो बार-बार हिंदू रीति-रिवाजों और मूर्तिपूजा के खिलाफ विष उगल चुकी हैं। देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित इस धार्मिक उत्सव में उनके बुलावे से श्रद्धालुओं, पुजारियों और सांस्कृतिक समुदाय में तीव्र विरोध भड़क उठा। लोगों ने इसे एक सोची-समझी वैचारिक चाल बताया — एक ऐसा प्रयास जिसमें एक जीवंत हिंदू पर्व को “धर्मनिरपेक्ष” सरकारी कार्यक्रम में बदला जा रहा है।
सरकार के समर्थक इसे “समावेशिता” कह सकते हैं, लेकिन असल में यह हिंदू पर्वों की आत्मा पर वैचारिक कब्ज़े का तरीका है। सतह पर यह सौम्य लगता है, पर भीतर यह धर्म की स्वतंत्रता पर नियंत्रण की सुनियोजित कोशिश है।
मैसूरु दशहरा विवाद: जब देवी का पर्व राजनीतिक अखाड़ा बन गया
मैसूरू दशेहरा, जो देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय के रूप में सदियों से मनाया जाता रहा है, वह इस बार राजनीतिक विवाद में बदल गया। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने प्रसिद्ध कन्नड़ लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक को मैसूरु दशहरा का उद्घाटन करने के लिए बुलाया। सरकार के इस निर्णय ने पूरे राज्य में विरोध भड़का दिया। लोगों ने सवाल उठाया कि हिंदू रीति-रिवाजों और मूर्तिपूजा की आलोचक मानी जाने वाली बानू मुश्ताक को एक धार्मिक उत्सव का मुखिया क्यों बनाया गया।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए कहा, “दशहरा कोई धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सभी धर्मों का पर्व है — हिंदू, ईसाई, बौद्ध, जैन। यहाँ तक कि हैदर अली और टीपू सुल्तान भी इसे मनाते थे।”[1] उन्होंने यह भी जोड़ा कि पहले भी मुस्लिम अतिथि बुलाए गए थे, जैसे 2017 में निसार अहमद।[2] लेकिन आलोचकों का कहना था कि गलत काम को दोहराने से वह सही नहीं हो जाता।
कई हिंदू संगठनों ने इस निर्णय को आस्था का अपमान बताया। भाजपा ने पूछा कि जब बानू मुश्ताक की अनुवादक दीपा भस्थी[3] — जिन्होंने उनके साथ अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार साझा किया — उपलब्ध थीं, तो उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया? आलोचकों का कहना था कि मुद्दा साहित्य या योग्यता का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जो “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर हिंदू परंपराओं को नीचा दिखाना चाहती है। एक टिप्पणी में कहा गया, “वह भले सम्मानित लेखिका हों, पर दशहरा कोई ऐसा मंच नहीं जहाँ सरकार अपनी ‘उपलब्धियाँ’ प्रदर्शित करे।” [4]
विवाद यहीं नहीं थमा। मैसूरु और आसपास के क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। श्रद्धालुओं, पुजारियों और सांस्कृतिक नेताओं ने देवी चामुंडेश्वरी तथा वाडियार राजपरिवार की परंपरा के अपमान पर कड़ा रोष जताया। कुछ याचिकाएँ कर्नाटक उच्च न्यायालय[5] और बाद में सर्वोच्च न्यायालय[6] में भी दायर हुईं, ताकि सरकार को यह निर्णय लागू करने से रोका जा सके। पर दोनों अदालतों ने याचिकाएँ खारिज कर दीं और राज्य सरकार का पक्ष स्वीकार किया।
धीरे-धीरे यह विवाद राजनीति से आगे बढ़कर आस्था और आत्मसम्मान की लड़ाई बन गया। देवी की विजय और धर्म की रक्षा का प्रतीक यह पर्व, राजनीतिक मंच में बदल गया। जो उत्सव कभी भक्ति, संस्कृति और श्रद्धा का संगम था, वह अब सरकारी तमाशे की तरह दिखने लगा।
इस विवाद एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि हमारी आस्था अब राजनीतिक प्रयोगों का साधन बन रही है। जहाँ पहले भक्ति थी, वहाँ अब सत्ता का प्रदर्शन है; जहाँ श्रद्धा थी, वहाँ अब संदेश और नियंत्रण की राजनीति है। “समावेशिता” के नाम पर जो नीति चलाई जा रही है, वह लोगों को जोड़ने के बजाय उन्हें उनकी जड़ों से काट रही है। धर्मनिरपेक्षता अब तटस्थता नहीं रही — वह एकतरफा हस्तक्षेप का औज़ार बन चुकी है।
हिंदू त्योहार: सनातन धर्म की धड़कन
मैसूरु दशहरा विवाद का असर क्यों इतना गहरा हुआ, यह समझने के लिए राजनीति से आगे बढ़कर हिंदू परंपराओं के सार को देखना होगा। हिंदू त्योहार केवल रौनक या आयोजन नहीं, बल्कि सनातन धर्म की धड़कन हैं। हर पर्व — चाहे दीवाली हो, होली या दशहरा — भक्त और भगवान के बीच एक पवित्र सेतु है। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि धर्म के उस शाश्वत संदेश की याद है जो सिखाता है कि प्रकाश अंधकार पर, विनम्रता अहंकार पर और धर्म अधर्म पर विजय पाता है।
इन त्योहारों में केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन निहित है। वे श्रद्धा, आत्मचिंतन और एकता की भावना जगाते हैं। पूजा, व्रत और साधना के माध्यम से वे व्यक्ति को भीतर से परिवर्तित करते हैं और ईश्वर के निकट लाते हैं। इसलिए हिंदू त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवंत साधना हैं — जो समाज और अध्यात्म दोनों को जोड़ते हैं।
सामाजिक दृष्टि से ये पर्व परिवारों में आत्मीयता बढ़ाते हैं, समुदायों को एक साझा पहचान देते हैं और आर्थिक-सांस्कृतिक जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं। व्यापार, कला, संगीत, नृत्य — सब इन उत्सवों से जुड़कर फलते-फूलते हैं। यही संतुलन इनकी सुंदरता है — जहाँ धर्म और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
इसी संदर्भ में दशहरे को केवल “राज्य आयोजन” या “सांस्कृतिक कार्यक्रम” कहना न केवल गलत है, बल्कि उसकी आत्मा को सीमित कर देना है। इस पर्व का केंद्र देवी चामुंडेश्वरी हैं, जो धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक हैं। सभी धर्मों के लोग इसमें भाग लें, यह स्वागतयोग्य है, पर इससे इसकी हिंदू पहचान मिट नहीं सकती। वाडियार परिवार के उत्तराधिकारी आर. राजा चंद्र उर्स ने सही कहा, “अगर अलग-अलग धर्मों के नेता इफ्तार में शामिल होते हैं, तो क्या रमज़ान धर्मनिरपेक्ष त्योहार बन गया? [7] उसी तरह, दशहरा भी हिंदू पर्व ही रहेगा, चाहे इसमें कोई भी भाग ले।”
राज्य द्वारा दशहरे को “राज्य उत्सव” कहना स्वाभाविक है — इससे पर्यटन और सांस्कृतिक गौरव बढ़ता है — लेकिन समस्या तब है जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उसके धार्मिक स्वरूप को नकार दिया जाता है।
बानू मुश्ताक पहले भी मूर्तिपूजा, हल्दी-कुमकुम और अन्य हिंदू परंपराओं का विरोध कर चुकी हैं।[8] ऐसे विचारों के बावजूद उन्हें उद्घाटन के लिए बुलाना स्वाभाविक रूप से अनुचित था। जो व्यक्ति देवी-देवताओं में विश्वास नहीं रखती, वह माँ चामुंडेश्वरी की आराधना का हिस्सा कैसे बन सकती है? [9] यदि उन्होंने श्रद्धा दिखायी होती या अपने विचार वापस लिए होते, तो हो सकता है हिंदू समाज उन्हें स्वीकार कर लेता — क्योंकि सनातन धर्म सबका स्वागत करता है। लेकिन सरकार ने जब ऐसे व्यक्ति को प्रतीक बना दिया, तो स्पष्ट हो गया कि उद्देश्य देवी की महिमा नहीं, बल्कि भक्ति को प्रदर्शन में बदलना है।
ऐसे पवित्र पर्वों को केवल “सांस्कृतिक आयोजन” कहना उन्हें उनकी आत्मा से रिक्त कर देना है। जब पूजा की जगह प्रदर्शन और श्रद्धा की जगह भाषण आ जाए, तो पर्व अपनी शिक्षाएँ खो देते हैं। बच्चे दशहरे को साधना या नवरात्रि के रूप में नहीं, बल्कि एक शो की तरह देखने लगते हैं। यह पतन किसी हमले से नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे बदलावों से शुरू होता है जो धीरे-धीरे पूरी परंपरा का स्वरूप बदल देते हैं।
कई जानकारों ने चेताया है कि यह कोई नई घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक अभियान है, जिसका लक्ष्य हिन्दू धर्म को नियंत्रित करना है। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने इसे स्पष्ट शब्दों में कहा — “यह धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि राज्य द्वारा धर्म का अधिग्रहण है।” [10] उन्होंने पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा का उदाहरण दिया[11], जो सदियों से श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक रही है। जब यूनेस्को ने इसे “सांस्कृतिक विरासत” घोषित किया, तो राज्य संस्थानों ने इसे धार्मिक नहीं, “सांस्कृतिक प्रतीक” के रूप में प्रचारित करना शुरू किया। गुप्ता ने कहा, “यही वह मोड़ है जहाँ से क्षरण शुरू होता है।” यानी जब कोई धार्मिक परंपरा केवल “संस्कृति” बनकर रह जाती है, तो उसकी आध्यात्मिक गहराई धीरे-धीरे मिट जाती है।
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने इस विवाद पर कहा, “कोई अविश्वासी व्यक्ति उस धार्मिक अनुष्ठान का उद्घाटन या संचालन नहीं कर सकता जो आस्था का अभिन्न हिस्सा हो।”[12] उन्होंने उदाहरण दिया कि मुसलमान कभी यह अनुमति नहीं देंगे कि कोई हिंदू व्यक्ति वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष बने या ईद की नमाज़ का नेतृत्व करे। यही सिद्धांत हिंदू पूजा और त्योहारों पर भी लागू होना चाहिए।
जैन की बात सार्थक है — हिंदू धर्म कोई प्रयोगशाला नहीं जहाँ “समावेशिता” के नाम पर भक्ति का अर्थ बदला जाए। जब कोई परंपरा साधना और श्रद्धा से जुड़ी होती है, तो उसमें हस्तक्षेप न केवल अनुचित, बल्कि समाज के धार्मिक संतुलन के लिए भी हानिकारक होता है।
राजभक्ति से राज्य प्रदर्शन तक
मैसूरु दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का जीवित प्रतीक है। वाडियार परिवार के वंशज आर. राजा चंद्र उर्स के अनुसार, “यह पर्व विजयनगर या वाडियारों की परंपरा तक सीमित नहीं, बल्कि उससे कहीं गहरी धार्मिक धारा का विस्तार है।”[13] इसके प्रमुख अनुष्ठान — पट्टदा आने, पट्टदा कुदुरे और पट्टदा हसु की पूजा — महज शाही परंपरा नहीं, बल्कि उस दिव्य इंद्रसभा के प्रतीक हैं जहाँ धर्म और शासन एक-दूसरे के पूरक बनते हैं।[14]
दशहरे को धर्मनिरपेक्ष रंग देने की कोशिश नई नहीं है। इतिहास बताता है कि 1930 के दशक में दीवान मिर्ज़ा इस्माइल की जुलूस में प्रमुख भूमिका पर जनता भड़क उठी थी। 1975 के बाद कई बार सरकारी अधिकारियों ने परंपरागत अनुष्ठानों में हस्तक्षेप किया।[15] धीरे-धीरे यह दखल “प्रबंधन” के नाम पर बढ़ता गया — प्रशासनिक नियंत्रण, आयोजन की नई संरचना और सरकारी दिखावे के ज़रिए इस पवित्र उत्सव की आत्मा कमजोर होती गई। यह क्रम इस प्रकार स्पष्ट होता है[16]:
- 1980: मुख्यमंत्री आर. गुंडू राव की कांग्रेस सरकार ने दशहरा उत्सव के प्रशासन पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया।
- 2001: मुख्यमंत्री एस. एम. कृष्णा ने वे अनुष्ठान स्वयं किए जो वाडियार परिवार के अधिकार क्षेत्र में थे।
- 2005: मुख्यमंत्री धरम सिंह ने स्वर्ण हौदे बैठ कर में पूजा कर सदियों पुरानी परंपरा की मर्यादा तोड़ी और दशहरा एक सरकारी प्रदर्शन में बदल गया।
- 2013: मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कवि चंद्रशेखर कंबर को मुख्य अतिथि बनाया, जिससे धार्मिक पर्व में राजनीतिक संदेश जोड़ा गया।
- 2025: बानू मुश्ताक को उद्घाटन के लिए बुलाना इसी प्रक्रिया की नवीनतम कड़ी है — जहाँ एक पवित्र हिंदू उत्सव को सरकारी संरक्षण में “सांस्कृतिक कार्यक्रम” बना दिया गया।
धर्मनिरपेक्षता का भ्रम
ये घटनाएँ केवल प्रशासनिक फैसले नहीं, बल्कि उस वैचारिक रुझान का हिस्सा हैं जो औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है — जिसमें राज्य धर्म के क्षेत्र में दखल देकर हिंदुओं को उनकी आस्था से अलग करता आया है। यह अभियान मंदिरों पर नियंत्रण के ज़रिए आगे बढ़ा है। चामुंडी पहाड़ियों का प्रसिद्ध मंदिर इसका उदाहरण है। जब सरकार मंदिरों के प्रशासन और कोष पर अधिकार जमा लेती है, तो मंदिर आर्थिक और संस्थागत रूप से निर्बल हो जाते हैं। जो केंद्र पहले श्रद्धा और सेवा के प्रतीक थे, वे अब सरकारी विभागों में बदल गए हैं। भक्तों की अर्पित दानराशियाँ, जो धर्मार्थ कार्यों के लिए होती हैं, अब सरकारी खजाने में समाहित हो जाती हैं।
“मंदिर प्रबंधन” के नाम पर शुरू हुआ यह हस्तक्षेप अब इस स्तर तक पहुँच चुका है कि सरकार तय करती है कि कौन हिंदू पर्व का उद्घाटन करेगा, कौन बोलेगा और कौन उसका प्रतिनिधि चेहरा बनेगा। दशहरे में यही हुआ — मंदिर निधि से होने वाला यह पर्व अब राजनीतिक समितियों के अधीन है, जो तय करती हैं कि कार्यक्रम का स्वरूप और संदेश क्या होगा।[17] “समावेशिता” का दावा करने वाले भूल जाते हैं कि यह आयोजन उन्हीं भक्तों की आस्था से पोषित है, जिनकी आस्था अब धीरे-धीरे उपेक्षित हो रही है।
सरकार इन कदमों को समानता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उचित ठहराती है, पर उसी समय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिए गए धार्मिक अधिकारों की अनदेखी करती है। “समावेशिता” के नाम पर ऐसे लोगों को बुलाना जो हिंदू आस्थाओं का उपहास उड़ाते हैं, न केवल असंवैधानिक है बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी आत्म-अपमान है।
यह हस्तक्षेप अनुच्छेद 29 की भावना का भी उल्लंघन करता है, जो हर नागरिक को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। दशहरा जैसे पर्व हिंदू सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान के केंद्र हैं। जब राज्य इन पर नियंत्रण करता है, तो वह न केवल इस अधिकार को कमजोर करता है, बल्कि हिंदुओं की अपनी परंपराओं को संरक्षित रखने की क्षमता भी घटा देता है।
यह दिखावे की धर्मनिरपेक्षता केवल एक दिशा में लागू होती है, यानि कि केवल हिंदू मंदिरों और परंपराओं पर। मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों पर ऐसा हस्तक्षेप नहीं होता। क्या कोई सरकार यह दावा कर सकती है कि उसे ईद की नमाज़ का मुख्य अतिथि चुनने या क्रिसमस सेवा का नेतृत्व करने का अधिकार है? फिर कोई सरकार कैसे कह सकती है कि चामुंडी पहाड़ी “सभी की” है? [18] यह दोहरा मापदंड समानता नहीं, बल्कि आस्था पर असमानता को स्थायी बनाता है।
“समावेशिता” के नाम पर थोपी जा रही यह धर्मनिरपेक्षता, सहयोग को नियंत्रण में और सहभागिता को अधिग्रहण में बदल देती है। हिंदू समाज सदा सर्वसमावेशी रहा है — किसी भी धर्म या समुदाय का व्यक्ति हिंदू पर्वों में भाग ले सकता है, यही सनातन परंपरा की सुंदरता है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि कोई बाहरी शक्ति उस पर्व के स्वरूप को बदल दे। पूजा का सार, उसकी पवित्रता और आत्मा किसी राजनीतिक प्रयोग का विषय नहीं हो सकती। हिंदू परंपरा सौहार्द और सम्मान सिखाती है, लेकिन वैचारिक या राजनीतिक हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं कर सकती।
यह धर्मनिरपेक्षीकरण अभियान तीन स्तरों पर काम करता है — नियंत्रण, पुनर्परिभाषा और मिटावट। पहले मंदिरों पर नियंत्रण किया जाता है, फिर त्योहारों को “सांस्कृतिक आयोजन” कहा जाता है, और अंत में उनके धार्मिक अर्थ को मिटा दिया जाता है। यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि धार्मिक स्वरूप को बदलने का प्रयास है — जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 जैसे अधिकारों का हनन होता है।
सभ्यतागत चेतना का प्रश्न
जब शासन स्वयं धर्म का ठेकेदार बन जाता है, तो आस्था अपनी पवित्रता खो देती है और सत्ता का साधन बन जाती है। इससे न केवल धार्मिक स्वतंत्रता पर असर पड़ता है, बल्कि हिंदू सभ्यता का आत्मविश्वास भी कमजोर होता है। मंदिरों और त्योहारों पर सरकारी नियंत्रण अब केवल प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं, बल्कि हिंदू चेतना को दिशा देने का माध्यम बन चुका है।
किसी ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित करना जो हिंदू परंपराओं का विरोध करता है, एक स्पष्ट संदेश है — कि अब आस्था राजनीतिक सुविधा पर निर्भर है। यह विविधता का सम्मान नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ खिलवाड़ है। सच्चा बहुलतावादी शासन वही है जो हर धर्म की पवित्रता की समान रूप से रक्षा करे, न कि किसी एक आस्था को उसकी जड़ों से काटे। हिंदू धर्म की समावेशिता उसकी मिट्टी में रची-बसी है — अपनी पहचान में दृढ़ रहते हुए सभी मार्गों का आदर करना ही उसका स्वभाव है।
निष्कर्ष
दशहरे को धर्मनिरपेक्ष बनाने का प्रयास हिंदू आध्यात्मिक स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। यह उसी सोच का विस्तार है जो सदियों से हिंदू आस्था को उसकी जड़ों से काटने की कोशिश करती रही है। यह विवाद किसी व्यक्ति या आयोजन का मुद्दा नहीं, बल्कि उस मूल अधिकार का प्रश्न है कि हिंदू अपने धर्म की पवित्रता को बिना बाहरी हस्तक्षेप के सुरक्षित रख सकें।
दशहरे को “राज्य आयोजन” या “सांस्कृतिक कार्यक्रम” कहकर पेश करना धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि हिंदू समाज को उसकी धार्मिक जड़ों से अलग करने का तरीका है। सच्चा बहुलतावाद किसी की पहचान मिटाने की बात नहीं करता; वह चाहता है कि हर धर्म अपनी गरिमा के साथ आगे बढ़े और परस्पर सम्मान बनाए रखे।
अब समय है कि हम अपने पर्वों को सरकारी नियंत्रण और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करें और उन्हें उनके वास्तविक संरक्षकों — भक्तों — के पास लौटाएँ। हमारे देवता, मंदिर और त्योहार कोई राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा हैं। किसी भी सरकार या संगठन को उन्हें बदलने या अपने अधिकार में लेने का न तो नैतिक और न ही संवैधानिक अधिकार है।
सन्दर्भ सूची
[1] Siddaramaiah Defends Invite To Banu Mushtaq For Dasara Opening, Cites Historical Precedents Of Hyder-Tipu Reigns; https://swarajyamag.com/news-brief/siddaramaiah-defends-invite-to-banu-mushtaq-for-dasara-opening-cites-historical-precedents-of-hyder-tipu-reigns
[2] ibid
[3] Mysuru Dasara ‘secular’, ‘cultural’ festival, says Siddaramaiah; Defends invite to Banu Mushtaq; https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/mysuru-dasara-secular-cultural-festival-says-siddaramaiah-defends-invite-to-banu-mushtaq/articleshow/123614160.cms?from=mdr
[4] SC Rejects Petition Against Invite to Banu Mushtaq for Mysuru Dasara | Karnataka News | News18; https://www.youtube.com/watch?v=FqVGgiyK1wE
[5] “Interfaith participation in religious festivals not against Constitution”; Karnataka High Court dismisses plea against Dasara festivities inauguration by Booker Prize winner Banu Mushtaq;
[6] Supreme Court Dismisses Plea Challenging Karnataka Govt’s Invite To Booker Prize Winner Banu Mushtaq For Dasara Festival; https://www.livelaw.in/top-stories/supreme-court-plea-against-karnataka-govt-invitation-to-banu-mushtaq-for-dasara-festival-304441
[7] Systematic Secularisation: How Congress Hijacked Mysuru Dasara, Diluted Its Hindu Core, and Turned It Into Political Theatre; https://swarajyamag.com/culture/systematic-secularisation-how-congress-hijacked-mysuru-dasara-diluted-its-hindu-core-and-turned-it-into-political-theatre
[8] Banu Mushtaq to inaugurate Mysuru Dasara: Why is the Karnataka Congress government targeting Hindus? ; https://hindupost.in/dharma-religion/banu-mushtaq-to-inaugurate-mysuru-dasara-why-is-the-karnataka-congress-government-targeting-hindus/#
[9] ibid
[10] SC Rejects Petition Against Invite to Banu Mushtaq for Mysuru Dasara | Karnataka News | News18; https://www.youtube.com/watch?v=FqVGgiyK1wE
[11] ibid
[12] ibid
[13] Systematic Secularisation: How Congress Hijacked Mysuru Dasara, Diluted Its Hindu Core, and Turned It Into Political Theatre; https://swarajyamag.com/culture/systematic-secularisation-how-congress-hijacked-mysuru-dasara-diluted-its-hindu-core-and-turned-it-into-political-theatre
[14] ibid
[15] ibid
[16]ibid
[17] Dussehra is a non-religious festival, appropriate for writer Banu Mushtaq to inaugurate it: Karnataka CM Siddaramaiah. https://www.newindianexpress.com/states/karnataka/2025/Aug/31/dussehra-is-non-religious-festival-appropriate-for-writer-banu-mushtaq-to-inaugurate-it-karnataka-cm-siddaramaiah-2
[18] ‘Chamundi Hill Not Just Hindu property,’ Says DK Shivkumar, BJP Hits Back; https://www.ndtv.com/india- https://www.ndtv.com/india-news/chamundi-hill-not-just-hindu-property-says-karnataka-deputy-chief-minister-dk-shivakumar-bjp-hits-back-9166622
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