अराजकता का टूलकिट: कैसे पश्चिमी मीडिया जनरेशन Z को विद्रोह का चेहरा बना रहा है
- पश्चिमी मीडिया अब निष्पक्षता से बहुत दूर जा चुका है। पक्षपाती कथानकों के ज़रिए वह गैर-पश्चिमी देशों में अस्थिरता और अशांति को महिमामंडित कर रहा है।
- हाल ही में प्रकाशित बीबीसी का “जनरेशन Z” पर लेख भारत में विरोध को रोमांटिक रूप देने और युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाने का ताज़ा उदाहरण है।
- यही पैटर्न बांग्लादेश और नेपाल में भी दिखा, जहाँ हिंसक आंदोलनों को “लोकतांत्रिक जनरेशन Z क्रांतियों” का नाम देकर पेश किया गया।
- इन रिपोर्टों में पश्चिमी मीडिया का दोहरापन साफ़ झलकता है—जहाँ पश्चिमी देशों के प्रदर्शनों को “अराजकता” कहा जाता है, वहीं गैर-पश्चिमी देशों के विरोधों को “वीरता” का प्रतीक बना दिया जाता है।
- यह प्रवृत्ति एक नए रूप की “वृत्तांत-औपनिवेशिकता” (narrative colonialism) की ओर इशारा करती है, जिसका उद्देश्य भारत और नेपाल जैसे स्वतंत्र देशों की स्थिरता को कमजोर करना है।
मीडिया को अक्सर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन आज के वैश्वीकृत दौर में, जहाँ कुछ ताक़तवर देशों का दबदबा है, वही पश्चिमी “एलीट मीडिया” अब स्तंभ के बजाय विघटन का माध्यम बन गया है।
लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर, मुख्यधारा का पश्चिमी मीडिया मानो “वैश्विक बादशाहत” की भूमिका निभा रहा है। अपनी पक्षपाती और अधूरी रिपोर्टिंग के ज़रिए वह कभी सरकारों को कठघरे में खड़ा करता है, तो कभी आधे-अधूरे या तोड़े-मरोड़े तथ्यों के सहारे समाजों में अस्थिरता फैलाता है। हकीकत यह है कि आज पश्चिमी मीडिया का बड़ा हिस्सा पत्रकारिता के नाम पर वैचारिक हस्तक्षेप और प्रोपेगंडा का माध्यम बन चुका है।
“वोक” (woke) युग में मीडिया और पत्रकारिता अब केवल वैचारिक युद्ध के औज़ार बनकर रह गए हैं। पश्चिमी प्रेस का उपयोग ग्लोबल साउथ के देशों के विरुद्ध एक टूलकिट की तरह किया जा रहा है। यह वैचारिक खेल नया नहीं है—काफी समय से चलता आ रहा है। लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर ग्लोबल साउथ में अराजकता और हिंसा को सामाजिक आंदोलनों के रूप में गौरवान्वित किया जा रहा है। यह वही पुराना भू-राजनीतिक खेल है; फर्क बस इतना है कि इस बार हथकंडे अधिक आक्रामक हैं, जबकि खिलाड़ी वही पुराने हैं।
हाल ही में प्रकाशित BBC का एक लेख, जिसमें भारत की जनरेशन Z पर यह आरोप लगाया गया कि वे सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शनों से दूर रह रहे हैं, इस प्रवृत्ति की चरम सीमा को दर्शाता है। भारत और अन्य विकासशील देशों के आंदोलनों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए, पश्चिमी मीडिया ने अपनी तथाकथित निष्पक्षता का आख़िरी आवरण भी हटा दिया है। अब वह पूरी तरह मैदान में उतर चुका है, जहाँ खबरें और विचार इस तरह गढ़े जा रहे हैं मानो भारत जैसे देशों में हिंसा और अराजकता फैलने की संभावना ही उसकी सबसे वांछित ख़बर हो।
बीबीसी का भारत की जनरेशन Z को भड़काने का नया अभियान
बीबीसी लंबे समय से भारत और हिंदू समाज के ख़िलाफ़ पक्षपाती और नकारात्मक विमर्श फैलाने के लिए जाना जाता रहा है।
StopHinduDvesha द्वारा प्रकाशित बहुत सी रिपोर्ट्स ने बीबीसी की रिपोर्टिंग में निहित प्रो-इस्लामिक और भारत-विरोधी व हिंदू-विरोधी झुकाव का पर्दाफ़ाश किया है।[1] [2] पश्चिम के कई हिंदू संगठनों ने भी समय-समय पर बीबीसी की पत्रकारिता के इस हिंदूद्वेषी रवैये को लेकर कई बार सवाल उठाये हैं। ख़ास तौर पर INSIGHT UK ने बीबीसी के रिपोर्टिंग और कवरेज पैटर्न्स पर गहराई से शोध कर यह साबित किया है कि उसके कवरेज में यह हिंदू-विरोधी पक्षपात बार-बार झलकता है।[3]
लेकिन हाल ही में भारत की जनरेशन Z को निशाना बनाते हुए BBC ने जो लेख प्रकाशित किया, उससे उसने मानो अपने ही सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। “Gen Z rising? Why young Indians aren’t taking to the streets” (Gen Z का उदय? आखिर युवा भारतीय सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे?)[4] शीर्षक वाला यह लेख परोक्ष रूप से यह संकेत देता है कि भारत के युवा सड़कों पर उतरने से इसलिए हिचकते हैं क्योंकि उन्हें “देशविरोधी” कहे जाने का भय है।
अब सवाल यह उठता है कि इस लेख के लेखक आखिर इतने उत्सुक क्यों हैं कि भारत के युवा हर हाल में सड़कों पर उतरें? उनके अनुसार, देश को “भ्रष्टाचार” और “बेरोज़गारी” जैसी समस्याओं से बचाने के लिए यह आवश्यक है कि भारतीय युवा वर्ग सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करे। बीबीसी का यह लेख पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि जो लोग यह मानते हैं कि लोकतंत्र का अर्थ संवैधानिक और अहिंसक तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुँचाना है, वे शायद किसी भ्रम में हैं।
पूरा लेख औपनिवेशिक मानसिकता की पुरानी रूढ़ियों से भरा हुआ है। भले ही इसे लिखने वाले पत्रकारों के नाम भारतीय लगते हों, लेकिन इसकी दृष्टि उस पुराने उपनिवेशकालीन “white man’s burden” मानसिकता को उजागर करती है। लेखकों (और उनके माध्यम से बीबीसी) को मानो पूरा विश्वास है कि भारत की जनरेशन Z को अब सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना चाहिए। वे भारतीय युवाओं की तथाकथित “निष्क्रियता” की तुलना एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों के युवाओं से करते हैं, जहाँ उनके अनुसार “ज़मीनी स्तर पर बहुत कुछ हो रहा है।” भारत की जनरेशन Z के शांतिपूर्ण रवैये पर खेद जताते हुए लेख में कहा गया है— “एशिया और अफ्रीका के दूसरे हिस्सों में जनरेशन Z, यानी जिनका जन्म 1997 और 2012 के बीच हुआ है, हाल के दिनों में बिलकुल भी चुप नहीं रही है।”[5]
अगर ईमानदारी से कहा जाए तो यह पूरा लेख हिंसक आंदोलनों को महिमामंडित कर उन्हें प्रेरक दिखाने की एक बचकानी कोशिश प्रतीत होता है — मानो लेखक भारत की जनरेशन Z को अस्थिरता की ओर धकेलना चाहते हों। लेख का स्वर साफ़ संकेत देता है कि इसका असली उद्देश्य भारत की लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर करना, सरकार के प्रति असंतोष को भड़काना और देश को एक “बनाना रिपब्लिक” जैसे अराजक ढाँचे की ओर ले जाना है। कुछ इक्का-दुक्का बयानों के हवाले से यह दावा किया गया है कि भारतीय सरकार “प्रदर्शनों पर नकेल कस रही है” और इससे युवा भयभीत हैं, लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया है। कुल मिलाकर, लेख का लहजा ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह भारत की सड़कों पर हिंसा और अफरातफरी देखने की प्रतीक्षा कर रहा हो।
अब ज़रा उलटी स्थिति की कल्पना कीजिए — यदि कोई भारतीय मीडिया संगठन ब्रिटेन में जनरेशन Z के “प्रदर्शनों की कमी” पर ऐसा ही भड़काऊ लेख लिखे, तो ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी कठिन है।
दुर्भाग्य से, अंग्रेज़ी बोलने वाले भारतीयों का एक बड़ा अभिजात वर्ग, जो पश्चिमी मीडिया संस्थानों का प्रमुख पाठक भी है, इन लेखों को पढ़ते समय अपने विवेक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण को किनारे रख देता है। यह अंग्रेज़ी-शिक्षित तबका विदेशी मीडिया में भारत को लेकर लिखी हर बात को बिना सवाल उठाए “सत्य” मान लेता है — ख़ासकर जब वह बात भारत के संदर्भ में नकारात्मक हो। यही कारण है कि इस वर्ग के लिए यह कल्पना करना भी कठिन है कि भारतीय मीडिया को भी पश्चिमी लोकतंत्रों की कार्यप्रणाली की उतनी ही आलोचनात्मक समीक्षा करने का अधिकार है।
दक्षिण एशिया में जनरेशन Z को भड़काने की ‘डीप स्टेट’ स्क्रिप्ट
दक्षिण एशिया लंबे समय से वैश्विक डीप स्टेट के निशाने पर रहा है। पाकिस्तान की आतंक मशीनरी से लेकर नेपाल और श्रीलंका की राजनीतिक अस्थिरता तक — यह पूरा क्षेत्र भू-राजनीतिक स्वार्थों का खेल का मैदान बन चुका है।
BBC, The Guardian, The Washington Post, The New York Times और Deutsche Welle जैसे पश्चिमी मीडिया के वाम-उदारवादी संस्थान दक्षिण एशिया से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय अक्सर सनसनी फैलाने और पक्षपातपूर्ण रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं। कभी पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को “सीमा-पार संघर्ष” के रूप में नरम बनाकर पेश किया जाता है, तो कभी कश्मीर मुद्दे को उछालकर भारत के उभरते प्रभाव को रोकने की कोशिश की जाती है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ को नज़रअंदाज़ करना और यूनुस शासन के दौरान हिंदुओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा व अत्याचारों पर चुप्पी साध लेना — यह सब पश्चिमी मीडिया के दोहरे मानदंडों को साफ़ उजागर करता है।
अब जब “जनरेशन Z” नया नारा बन चुकी है — और बांग्लादेश से लेकर नेपाल तक इसका उपयोग “सत्ता परिवर्तन” के औज़ार के रूप में किया जा रहा है — तब यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि इन घटनाओं को हवा देने में पश्चिमी मीडिया की भूमिका क्या है। इसे अब और नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
StopHinduDvesha पहले ही कई विश्लेषणों में इस पक्षपात को सामने ला चुका है — ख़ास तौर पर बांग्लादेश में 2024 के हिंसक आंदोलन की रिपोर्टिंग को लेकर।[6] पश्चिमी मीडिया ने उस समय की हिंसा को “जनरेशन Z क्रांति” कहकर पेश किया, मानो यह कोई प्रगतिशील युवाओं का आंदोलन हो। असल में, इस कवरेज ने न सिर्फ़ हिंसा और आगज़नी का महिमामंडन किया, बल्कि उसी दौरान बांग्लादेश में फैली व्यापक हिंदू-विरोधी हिंसा (जो संभवतः आज भी यूनुस शासन के दौर में जारी है। ) को भी लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया दिया।
इसी तरह सितंबर 2025 में नेपाल में हुए तथाकथित “जनरेशन Z” प्रदर्शनों को पश्चिमी मीडिया ने ऐसे प्रस्तुत किया, मानो यह कोई आदर्शवादी युवा क्रांति हो। जबकि वास्तविकता यह थी कि इन प्रदर्शनों में भीषण हिंसा भड़क उठी और कई निर्दोष लोगों की जान गई। भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी जैसी वास्तविक समस्याओं से उपजा यह असंतोष जल्द ही उग्र समूहों के नियंत्रण में चला गया। लेकिन पश्चिमी मीडिया ने इस अराजकता को स्वीकारने के बजाय उसे “जनता की आवाज़” बताकर महिमामंडित किया — ठीक वैसे ही जैसे उसने बांग्लादेश के हिंसक आंदोलनों को “प्रगतिशील युवा विद्रोह” के रूप में प्रस्तुत किया था और उनके पीछे छिपे उग्रवाद व सांप्रदायिक हिंसा को पूरी तरह अनदेखा कर दिया था।
उदाहरण के लिए, नेपाल के जनरेशन Z प्रदर्शनों पर पश्चिमी मीडिया में छपी कुछ सुर्ख़ियाँ देखें —
- “Nepal’s uprising was a generation in the making” – The Washington Post, 12 सितंबर 2025[7]
“नेपाल का विद्रोह — जो एक पूरी पीढ़ी से आकार ले रहा था” - “Gen Z protests differently. This skull flag is one example” – The Washington Post, 17 सितंबर 2025[8]
“जेन ज़ेड का विरोध अलग ढंग से होता है — यह स्कल फ्लैग उसका एक उदाहरण है” - “Gen Z protests: Why are Asia’s youth so angry?” – Deutsche Welle, 14 अक्टूबर 2025[9]
“जेन ज़ेड विरोध: एशिया के युवा इतने नाराज़ क्यों हैं?” - “The Gen Z uprising in Asia shows social media is a double-edged sword” – BBC, 24 सितंबर 2025[10]
“एशिया में जेन ज़ेड विद्रोह बताता है — सोशल मीडिया दोधारी तलवार है” - “No Country for Young People: Nepal’s Gen Z Sees Little Hope at Home” – The New York Times, 24 अक्टूबर 2025[11]
“युवाओं के लिए नहीं बचा कोई देश: नेपाल की जेन ज़ेड को अपने घर में भी उम्मीद कम दिखती है” - “The Contagious Gen Z Uprisings” – The New York Times, 19 अक्टूबर 2025“[12]
इन सुर्ख़ियों का पैटर्न बेहद परिचित लगता है — नैतिकता का चोला ओढ़े, विदेशी पाठकों के लिए तैयार की गई एक “एक्ज़ॉटिक” कहानी। कुछ रिपोर्टों में भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी का ज़िक्र तो है, लेकिन असली मक़सद नेपाल की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों पर प्रकाश डालने की आड़ में वहाँ की हिंसक हलचल को “आंदोलन” के रूप में महिमामंडित करना है। कुछ लेख तो इस हद तक चले गए कि उन्होंने नेपाल को बाकी एशिया के लिए “प्रेरणा” के रूप में पेश करना शुरू कर दिया — यानी उनके अनुसार, दक्षिण एशिया के युवाओं को नेपाल की “जनरेशन Z क्रांति” से सबक़ लेना चाहिए।
Deutsche Welle ने लिखा — “दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के युवा ऑनलाइन पले-बढ़े हैं, अपने नेताओं से नाराज़ और अधीर। नौकरियाँ घट रही हैं और असमानता बढ़ रही है — उनके प्रदर्शन अब जड़ पकड़ चुके राजनीतिक ढाँचों को हिला रहे हैं।”
वहीं The New York Times तो मानो सोशल मीडिया की “क्रांतिकारी” संभावना को लेकर इतना उत्साहित नज़र आया कि उसने फ़िलीपींस, इंडोनेशिया, पेरू और केन्या तक के आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका को “परिवर्तन की चिंगारी” बताना शुरू कर दिया।
ग़ैर-पश्चिमी देशों में आंदोलनों की सनसनीख़ेज़ कवरेज
ग़ैर पश्चिमी देशों में होने वाले प्रदर्शनों और आंदोलनों को महिमामंडित करने का पश्चिमी मीडिया का इतिहास रहा है। वह लंबे समय से ग्लोबल साउथ के देशों में होने वाले विरोध प्रदर्शनों को किसी न किसी रूप में “न्याय की लड़ाई” या “लोकतंत्र की पुकार” के रूप में पेश करता आया है। जब बात ग़ैर पश्चिमी देशों में होने वाले आंदोलनों की आती है, तो पश्चिमी मीडिया संस्थानों की कवरेज ज़्यादातर पक्षपातपूर्ण, एकतरफ़ा, और विकृत रिपोर्टिंग पर आधारित होती है, जहाँ कहानी का सिर्फ़ एक पहलू दिखाया जाता है। ऐसी रिपोर्टिंग अक्सर नैतिकता का चोला ओढ़ क्रांति का पाठ पढ़ाती हैं, और प्रोटेस्टर्स को अक्सर “लोकतंत्र और मानवाधिकारों के रक्षक” के रूप में प्रस्तुत करती है, चाहे ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही क्यों न हो।
भारत में हुए CAA विरोधी प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग में यह पैटर्न साफ़ तौर पर दिखा। यह क़ानून दरअसल पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था, लेकिन पश्चिमी मीडिया ने इसे “इस्लामोफ़ोबिया” और “हिंदू बहुलतावादी साज़िश” के लेंस से पेश किया। इसी तरह 2020–2021 के किसान आंदोलन की कवरेज में भी यही पूर्वाग्रह दिखा। सरकार की ओर से संयम और संवाद की कोशिशों के बावजूद, पश्चिमी मीडिया ने इस आंदोलन को “स्टेट के दमनकारी रवैये” और “मानवाधिकार हनन” के चश्मे से पेश किया। किसान आंदोलन के संदर्भ में पश्चिमी मीडिया की कवरेज का ताना बाना तोड़ मरोड़ कर पेश किए गए विकृत तथ्यों और वैचारिक झुकाव वाले विमर्श से बुना गया था। यह कहना अठिशोक्ति नहीं होगी कि ऐसी कवरेज पत्रकारिता से ज़्यादा एक्टिविज़्म लगती थी।
मेडागास्कर में हाल ही में हुआ तथाकथित जनरेशन Z आंदोलन भी इसी सिलसिले की कड़ी है — जहाँ हिंसक प्रदर्शनों के फलस्वरूप सेना ने सत्ता संभाल ली, और पश्चिमी मीडिया ने इसे “युवा क्रांति” कहकर सराहा।[13]
The Japan Times के एक हालिया लेख ने बड़ी सटीकता से यह दिखाया है कि पश्चिमी मीडिया किस तरह ग़ैर-पश्चिमी देशों में अराजक आंदोलनों को हवा देता है। लेख में लिखा गया है: “पश्चिमी मीडिया ने एक बेहद आकर्षक, लेकिन खतरनाक कहानी कहने की कला विकसित कर ली है — युवा-नेतृत्व वाली ‘क्रांतियों’ की रोमांटिक दास्तानें, जो कथित रूप से दमनकारी और भ्रष्ट सरकारों को गिरा देती हैं। पिछले एक महीने की रिपोर्टिंग देखें — मेडागास्कर, नेपाल, इंडोनेशिया और फ़िलिपींस की राजनीतिक उथल-पुथल को एक ही पुराने फ़ॉर्मूले में ढाला गया। 2024 में बांग्लादेश में शेख़ हसीना की सत्ता से विदाई को भी एक ‘वीरता भरी मुक्ति’ के रूप में पेश किया गया, जबकि उसके बाद वहाँ इस्लामिस्ट कट्टरता और अव्यवस्था का दौर शुरू हो गया।”[14]
बीबीसी के ‘जनरेशन Z’ नैरेटिव पर तीखी प्रतिक्रियाएँ
बीबीसी का हालिया लेख — जो भारत की जनरेशन Z से नेपाल जैसी “युवा क्रांतियों” से प्रेरणा लेकर सड़कों पर उतरने की अप्रत्यक्ष अपील करता है — भारतीय मीडिया और नागरिक समाज में तीखी आलोचना का पात्र बना।
लेखक और अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने बीबीसी की इस “चूक” को सख़्त शब्दों में लताड़ा। अपने बयान में उन्होंने साफ़ कहा: “ब्रिटेन का सरकारी मीडिया यह सोचता है कि भारत के युवा राजनीतिक आंदोलनों में क्यों नहीं उतरते। तो सवाल है — वे भारत में क्या देखना चाहते हैं? अराजकता?”[15]
भारत के प्रमुख टीवी चैनल, जैसे CNN-News18 और DD इंडिया, ने भी बीबीसी के इस लेख पर न्यूज़ विश्लेषण और पैनल डिस्कशन के कार्यक्रम चलाए। CNN-News18 की एक बहस — “Gen Z rising or BBC itching for riots? Disconnect or Anti-Bharat Agenda” — (Gen Z का उदय या दंगे भड़काने को लेकर बीबीसी की उत्कंठा? डिसकनेक्ट या भारत-विरोधी एजेंडा)[16] में यह सवाल उठाया गया कि क्या बीबीसी अब पत्रकारिता की सीमाएँ लाँघकर भारत-विरोधी राजनीति का मंच बन गया है।
Firstpost में प्रकाशित एक विचार लेख ने भी सौतिक बिस्वास और अंतरिक्षा पठानिया द्वारा लिखी गयी बीबीसी की इस रिपोर्ट[17] की मंशा पर सवाल उठाया, और यह मुद्दा उठाया कि किस तरह से यह लेख भारत की जेनरेशन Z के विचारों और भावनाओं को तोड़ मरोड़ कर पेश कर एक ख़तरनाक भारत विरोधी विमर्श गढ़ता है: “बीबीसी का लेख चुनिंदा उदाहरणों, विरोध प्रदर्शनों, ऑनलाइन ध्रुवीकरण, किसान आंदोलनों और जातिगत तनावों को जोड़कर यह आभास देता है कि भारत में कोई क्रांति आने वाली है। जबकि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद या असहमति का अर्थ पतन नहीं होता — वह लोकतांत्रिक भागीदारी का ही हिस्सा है।”[18]
बीबीसी के जनरेशन Z लेख से जो सबसे स्पष्ट रूप से उभरकर आता है, वह यह है कि पश्चिमी मीडिया भारत की नकारात्मक छवि गढ़ने और देश में अस्थिरता भड़काने को लेकर दिन ब दिन अतिआतुर होता जा रहा है। जहां पश्चिमी प्रेस पहले भारत में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों को मिर्च मसाले के साथ पेश कर सनसनी फैलाती थी, वहीं यह आज उससे कई कदम आगे बढ़ हिंसा और अस्थिरता को सामान्य और “अपेक्षित” स्थिति की तरह पेश करने लगी है। कभी प्रदर्शनों का महिमामंडन, तो कभी अराजकता का सामान्यीकरण — पश्चिमी मीडिया का एजेंडा मानो यही बन गया है कि भारत को हमेशा “टूटने की कगार पर खड़े हुए देश” के रूप में प्रस्तुत किया जाए।
हाल के लद्दाख आंदोलन की कवरेज इसका ताज़ा उदाहरण है — जहाँ सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद मैगसेसे पुरस्कार विजेता पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया। पश्चिमी मीडिया में अब “लद्दाख प्रोटेस्ट टूलकिट” को चुपचाप भारत के अलग-अलग हिस्सों में जनरेशन Z आंदोलनों के “मॉडल” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।
“India Detains Popular Leader of Protest Movement” (भारत ने प्रोटेस्ट आंदोलन के लोकप्रिय लीडर को हिरासत में लिया), द न्यू यॉर्क टाइम्स की हेडलाइन कहती है। लेख में यह संकेत दिया गया है कि वांगचुक की गिरफ़्तारी, मोदी सरकार की उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत वह “अपने अधिकार को चुनौती देने वालों” पर कार्रवाई करती है — और इस सूची में शिक्षाविद, मीडिया संस्थान, धार्मिक अल्पसंख्यक और “सरकार की नीतियों से असहमत कार्यकर्ता” शामिल हैं।[19]
बीबीसी के जनरेशन Z लेख में भी यही स्वर झलकता है: “भारत में असंतोष की हल्की चिंगारियाँ दिखने लगी हैं। सितंबर में विवादित हिमालयी क्षेत्र लद्दाख में राज्य के दर्जे की माँग को लेकर हुए हिंसक टकरावों ने कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को यह कहने पर मजबूर किया कि यह ‘जनरेशन Z की बेचैनी’ और लंबे समय से दबे ग़ुस्से का संकेत है।”[20]
यह पूर्णतया स्पष्ट है कि पश्चिमी मीडिया अब पत्रकारिता की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता का दिखावा भी छोड़ चुका है। बीबीसी का यह हालिया लेख, जो भारत की जनरेशन Z को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाता प्रतीत होता है, देश के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप माना जा सकता है — और इसे सत्ता परिवर्तन की अप्रत्यक्ष कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
पश्चिमी मीडिया की दोहरी नीति का पर्दाफाश
न्यूज़ कवरेज को लेकर पश्चिमी मीडिया का रवैया इस बात पर निर्भर करता है कि विरोध-प्रदर्शन कहाँ हो रहे हैं — पश्चिम में या ग़ैर पश्चिमी देशों में। यही उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है।
जब सरकार के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध-प्रदर्शन पश्चिमी देशों में भड़कते हैं, तो मीडिया का लहजा अचानक संयमित और “नपा तुला” हो जाता है। वह प्रदर्शनकारियों को “नायक” नहीं बल्कि “उपद्रवी” या “व्यवधान पैदा करने वालों” के रूप में चित्रित करता है। पुलिस की सख़्ती को वह “क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने की ज़रूरत” बताकर जायज़ ठहराता है। लेकिन यही मीडिया जब किसी गैर-पश्चिमी देश, विशेषकर भारत, में होने वाले किसी विरोध-प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करता है, तो वही घटनाएँ अचानक “राज्य-प्रायोजित दमन” और “मानवाधिकारों के उल्लंघन” के रूप में चित्रित की जाने लगती हैं।
जनवरी 2024 में फ्रांस, पोलैंड, जर्मनी और रोमानिया जैसे कई यूरोपीय देशों में किसानों के बड़े आंदोलन हुए। इन आंदोलनों को लेकर की गयी पश्चिमी मीडिया कवरेज या तो सरकार-समर्थक थी या अपेक्षाकृत तटस्थ। पश्चिमी प्रेस की यह कवरेज उस तीखे नैरेटिव के बिलकुल उलट थी, जो उसने भारत के 2020–2021 किसान-आंदोलन के संदर्भ में रचा था। किसान आंदोलन के संदर्भ में भारतीय सरकार को निरंकुश और तानाशाह करार दिया गया, और भीड़ नियंत्रण या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए उठाए गए सामान्य प्रशासनिक कदमों को “दमनकारी कार्रवाई” घोषित कर दिया गया।[21]
इसी तरह, मार्च 2023 में जब ब्रिटेन में राजा चार्ल्स के राज्याभिषेक के दौरान पुलिस ने पचास से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया, तब पश्चिमी मीडिया में “राज्य दमन” या “लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन” को लेकर कोई नैतिक हाय-तौबा नहीं मची। इन गिरफ़्तारियों को बस एक सामान्य ख़बर की तरह पेश किया गया — जैसे यह स्वाभाविक हो कि राजकीय आयोजन में अव्यवस्था रोकना प्रदर्शन के अधिकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। [22]
इसके उलट, जब भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका या नेपाल जैसे गैर-पश्चिमी देशों में हिंसक या अराजक विरोध-आंदोलन भड़कते हैं, तो वही मीडिया उन्हें “जनक्रांति” और “लोकतंत्र की रक्षा” के रूप में पेश करता है। पश्चिम में वही दृश्य “अराजकता” कहलाते हैं, लेकिन एशिया या अफ्रीका में वे “स्वतंत्रता की पुकार” बन जाते हैं।
यह स्पष्ट दोगुलापन केवल खबरों का नहीं, बल्कि नज़रिए का भी है — एक ऐसा नज़रिया जो अब भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है। बस औज़ार बदल गए हैं। पहले यह वर्चस्व सेनाओं और साम्राज्यों के ज़रिए कायम किया जाता था, अब यह “नैरेटिव” और “कहानियों” के ज़रिए फैलाया जाता है। इक्कीसवीं सदी में उपनिवेशवाद की नई भाषा यही है — विचारों और विमर्श के ज़रिए औपनिवेशिक नियंत्रण।
समापन
पश्चिम-केंद्रित वाम-उदारवादी तंत्र तब तक गैर-पश्चिमी दुनिया के ख़िलाफ़ “अत्याचार साहित्य” (atrocity literature) रचता रहेगा, जब तक उसका पाठकवर्ग इन प्रकाशनों को आदर्श मानना बंद नहीं करता और उनकी पक्षपातपूर्ण मानसिकता को खुलकर चुनौती नहीं देता।
इस समस्या को और भी ज़्यादा जटिल बनाती है तथाकथित “ब्राउन सिपाही” मानसिकता — वह प्रवृत्ति जिसके तहत पश्चिमी शासन के अधीन रहे देशों के अंग्रेज़ीभाषी एलीट वर्ग की एक धारा, ख़ासकर भारत में, स्वयं ही भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी आख्यानों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाती है।
पश्चिमी मीडिया अपने इन विकृत चित्रणों को तभी छोड़ेगा जब ऐसे कंटेंट की माँग घटेगी। और यह तभी संभव है जब ग्लोबल साउथ अपने सामूहिक मानस को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने और अपने कथानकों पर अपना स्वामित्व पुनः स्थापित करने का ठोस, निरंतर और आत्मविश्वासी प्रयास करे।
सन्दर्भ सूची
[1] BBC’s bias against India//Hindus, pro-Islam stance known (StopHinduDvesha, February 2023); https://stophindudvesha.org/bbcs-anti-india-anti-hindu-and-pro-islamic-bias-is-an-established-fact/
[2] BBC Documentary: A Hit-job on India and its Prime Minister (StopHInduDvesha, February 2023); https://stophindudvesha.org/bbc-documentary-a-hit-job-on-india-and-its-prime-minister/
[3] Spotlight on the BBC – INSIGHT UK; https://insightuk.org/spotlight-on-the-bbc/
[4] Why India’s Gen Z is not taking to the streets (BBC, October 2025); https://www.bbc.com/news/articles/cq6zg9ele22o
[5] Ibid.
[6] Western Media’s Whitewashing of Hindu Genocide in Bangladesh (StopHInduDvesha, August 2024); https://stophindudvesha.org/western-medias-whitewashing-of-hindu-genocide-in-bangladesh/
[7] Nepal’s uprising was a generation in the making (The Washington Post, September 2025); https://www.washingtonpost.com/world/2025/09/12/nepal-uprising-government/
[8] Gen Z protest differently – The skull flag is one example (The Washington Post, September 2025); https://www.washingtonpost.com/opinions/2025/09/17/gen-z-nepal-indonesia-kenya-serbia-protests/
[9] Gen Z protests: Why are Asia’s youth so angry? (Deutsche Welle, October 2025); https://www.dw.com/en/gen-z-protests-why-are-asias-youth-so-angry/a-74349495
[10] Gen Z uprising in Asia shows social media is a double-edged sword (BBC, September 2025); https://www.bbc.com/news/articles/cn4ljv39em7o
[11] Nepal’s Gen Z Sees Little Hope at Home (The New York Times, October 2025); https://www.nytimes.com/2025/10/23/world/asia/nepal-protests-migrants-gen-z.html
[12] The Contagious Gen Z Uprisings (The New York Times, October 2025); https://www.nytimes.com/2025/10/19/world/gen-z-revolutions-protests-louvre-heist-gaza.html
[13] Madagascar military leader Colonel Michael Randiranirina sworn in as president and thanks protesters (BBC, October 2025); https://www.bbc.com/news/articles/cr7mn1n53jno
[14] What Western media calls insurrection at home, they call revolution abroad (The Japan Times, October 2025); https://www.japantimes.co.jp/commentary/2025/10/03/world/media-hypocrisy-on-insurrections-and-revolutions/
[15] Sanjeev Sanyal on X; https://x.com/sanjeevsanyal/status/1981356451835854989
[16] Gen Z rising Or BBC Itching For Riots? Disconnect Or Anti Bharat Agenda? (News18-YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=tHa5XZ8C0xY&t=114s
[17] Why India’s Gen Z is not taking to the streets (BBC, October 2025); https://www.bbc.com/news/articles/cq6zg9ele22o
[18] India isn’t heading for revolution, it’s redefining democracy (FirstPost, October 2025); https://www.firstpost.com/opinion/india-redefining-democracy-not-heading-for-revolution-13944739.html
[19] India Detains Popular Leader of Protest Movement (The New York Times, September 2025); https://www.nytimes.com/2025/09/27/world/asia/india-ladakh-protests-sonam-wangchuk.html
[20] Why India’s Gen Z is not taking to the streets (BBC, October 2025); https://www.bbc.com/news/articles/cq6zg9ele22o
[21] Exposing Western media double standards on coverage of protests in the West vs protests in Bharat (Hindu Post, January 2024); https://hindupost.in/world/exposing-western-media-double-standards-on-coverage-of-protests-in-the-west-vs-protests-in-bharat/#
[22] Police arrest 52, including republicans, during King Charles’ coronation (Reuters, May 2023); https://www.reuters.com/world/uk/police-arrest-anti-monarchy-protesters-ahead-king-charles-coronation-2023-05-06/
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