कॉकरोच जनता पार्टी: आंदोलन, प्रचार या राजनीतिक प्रयोग?

2026 में अचानक चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने खुद को भारत के युवाओं की नई आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन उसके तेज़ सोशल मीडिया उभार, सीमित ज़मीनी समर्थन, वैचारिक विवादों और विदेशी मीडिया की भूमिका ने कई गंभीर सवाल भी खड़े किए।
सारांश

2026 में CJP अचानक भारत की तथाकथित Gen Z राजनीतिक आवाज़ बनकर उभरी। सोशल मीडिया पर मिली असाधारण लोकप्रियता और विदेशी मीडिया की व्यापक कवरेज ने उसे राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। लेकिन उसके तेज़ उभार, सीमित ज़मीनी उपस्थिति, नेतृत्व से जुड़े विवादों और वैचारिक रुझानों ने कई सवाल भी खड़े किए। आलोचकों का कहना है कि CJP सिर्फ छात्र असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं था। उसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक एजेंडा भी नज़र आता था। जंतर-मंतर प्रदर्शन, मीडिया कवरेज और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं की पड़ताल से सोशल मीडिया की दृश्यता और वास्तविक जनसमर्थन के बीच अंतर स्पष्ट होता है। शायद CJP की सबसे बड़ी सीख यही है कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता को हमेशा जनसमर्थन नहीं माना जा सकता। कई बार उसके पीछे सुनियोजित प्रचार भी हो सकता है।

ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाने वाले गंभीर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन आमतौर पर रातोंरात पैदा नहीं होते। वे समय के साथ आकार लेते हैं, लोगों की वास्तविक चिंताओं से जुड़ते हैं और निरंतर जनभागीदारी के बल पर आगे बढ़ते हैं। जैसे-जैसे किसी मुद्दे के प्रति जागरूकता बढ़ती है, वैसे-वैसे ऐसे आंदोलनों का प्रभाव और समर्थन भी बढ़ता जाता है। भारत हो या दुनिया का कोई अन्य देश, टिकाऊ आंदोलनों की पहचान उनका स्पष्ट उद्देश्य, व्यापक सामाजिक आधार और निरंतर जनसहभागिता होती है।

लेकिन हाल के वर्षों में एक अलग प्रवृत्ति सामने आई है। वैश्विक दक्षिण के कई देशों में ऐसे आंदोलन अचानक उभरते दिखाई दिए हैं जिन्हें स्वतःस्फूर्त Gen Z विद्रोह या युवा क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सोशल मीडिया पर उन्हें असाधारण दृश्यता मिलती है, एक्टिविस्ट नेटवर्क उनके पक्ष में सक्रिय हो जाते हैं और पश्चिमी मीडिया के कुछ प्रभावशाली वर्ग उन्हें लोकतांत्रिक जागरण की नई मिसाल के रूप में प्रचारित करने लगते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह पैटर्न प्रायः गैर-पश्चिमी देशों तक ही सीमित दिखाई देता है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस या जर्मनी जैसी स्थापित पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध इसी प्रकार की “Gen Z क्रांतियाँ” शायद ही कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ऐसा उत्साह अर्जित कर पाती हैं। इसके विपरीत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में उभरने वाले आंदोलनों को अक्सर नई पीढ़ी की ऐतिहासिक बगावत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या इन सभी आंदोलनों के पीछे वास्तव में उतना ही व्यापक जनसमर्थन होता है जितना मीडिया में दिखाई देता है, या फिर प्रचार और वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद होता है?

भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का अचानक उभार भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है[1]  कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर मिली असाधारण लोकप्रियता, विदेशी मीडिया की उत्साहपूर्ण कवरेज और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने उसे राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। समर्थकों ने इसे भारतीय युवाओं की नई राजनीतिक आवाज़ बताया। लेकिन आलोचकों ने शुरू से ही इस दावे पर सवाल उठाए।

आलोचकों का कहना था कि CJP की कहानी उतनी सरल नहीं है जितनी दिखाई देती है। उनके अनुसार इसके पीछे सोशल मीडिया प्रचार, वैचारिक समूहों और एक्टिविस्ट नेटवर्कों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

CJP के नेताओं, उसके संदेशों, विरोध के तौर-तरीकों और उसे मिली असाधारण मीडिया कवरेज को देखें तो कई असहज सवाल खड़े होते हैं। क्या यह वास्तव में युवाओं की चिंताओं से निकला एक स्वाभाविक आंदोलन था, या फिर विरोध की राजनीति के एक पुराने मॉडल को नई पैकेजिंग के साथ प्रस्तुत किया जा रहा था?

आइए, इसी सवाल को थोड़ा विस्तार से समझते हैं।

अचानक उभरी एक नई “Gen Z” राजनीति

मई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अचानक सोशल मीडिया पर छा गई। कुछ ही दिनों में उसके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स करोड़ों में पहुँच गए और देखते ही देखते वह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई[2] लेकिन जितनी तेजी से उसकी लोकप्रियता बढ़ी, उतनी ही तेजी से सवाल भी उठने लगे[3] [4] क्या यह वास्तव में युवाओं का स्वतःस्फूर्त आंदोलन था? या फिर सोशल मीडिया एल्गोरिदम, आक्रामक प्रचार और मीडिया कवरेज ने उसकी लोकप्रियता को वास्तविकता से कहीं बड़ा बनाकर पेश किया?

CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इसका अभियान अमेरिका से शुरू किया था[5] हाल ही में वे CJP के प्रदर्शन में शामिल होने भारत आए। आने से पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से आशंका जताई थी कि हवाई अड्डे पर पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है[6] लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें प्रदर्शन की अनुमति भी मिली और सुरक्षा भी उपलब्ध कराई गई[7] [8]

इस दौरान CJP के फॉलोअर्स को लेकर भी विवाद शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर साझा किए गए कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया कि उसके बड़ी संख्या में फॉलोअर्स भारत के बाहर से थे। पाकिस्तान, बांग्लादेश और तुर्की जैसे देशों का नाम भी सामने आया[9] [10] दिपके ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि संगठन के अधिकांश फॉलोअर्स भारतीय हैं[11] फॉलोअर्स की संख्या में आए अचानक उछाल ने एक और बहस को जन्म दिया। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या इस वृद्धि में बॉट अकाउंट्स की भी भूमिका हो सकती है। भले ही इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि न हुई हो, लेकिन इससे CJP की लोकप्रियता को लेकर संदेह ज़रूर पैदा हुआ।

सबसे बड़ा सवाल तब उठा जब सोशल मीडिया की चमक और ज़मीनी हकीकत की तुलना की गई। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला उत्साह जंतर-मंतर तक पहुँचते-पहुँचते फीका पड़ गया। वहाँ मीडिया कर्मी, इन्फ्लुएंसर्स और जाने-पहचाने राजनीतिक कार्यकर्ता तो मौजूद थे, लेकिन बड़ी संख्या में छात्र और युवा दिखाई नहीं दिए।

यही बात पूरे आंदोलन पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर यह छात्रों और युवाओं का आंदोलन था, तो सबसे ज़्यादा छात्र और युवा ही नदारद क्यों थे?

भारत-विरोधी नैरेटिव और वैचारिक सवाल

CJP के उभार के साथ उसके नेताओं और प्रमुख चेहरों के पुराने सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक रुखों पर भी चर्चा शुरू हो गई। आलोचकों का कहना है कि आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों का रिकॉर्ड केवल सरकार-विरोध तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि कई मामलों में उनके बयान भारत की राष्ट्रीय नीतियों, सुरक्षा चिंताओं और संवेदनशील मुद्दों पर विवाद खड़े करते रहे हैं।

इसी संदर्भ में CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके के कुछ पुराने सोशल मीडिया पोस्ट फिर चर्चा में आए। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर पर की गई उनकी टिप्पणियों को लेकर लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी ने पुणे पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि उनके पोस्ट अलगाववादी सोच को बढ़ावा दे रहे थे और लोगों को भड़काने का काम कर रहे थे[12]

शिकायत में कहा गया था कि दिपके की सोशल मीडिया गतिविधियाँ केवल राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे ऐसे विचारों को आगे बढ़ा रही थीं जो कश्मीर में अलगाववादी भावनाओं को मजबूत कर सकते थे। CJP के उभार के बाद ये आरोप फिर चर्चा में आ गए और उनके पुराने रुखों को लेकर नए सिरे से सवाल उठने लगे[13]

CJP के प्रमुख प्रवक्ता सौरव दास भी विवादों से अछूते नहीं रहे हैं। उनके आलोचकों का आरोप है कि उन्होंने अनुच्छेद 370, अयोध्या, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लगातार ऐसे रुख अपनाए हैं जो मुख्यधारा की राष्ट्रीय सोच से टकराते हैं। वे दिल्ली दंगों के षड्यंत्र मामले के आरोपी उमर खालिद के मुखर समर्थक रहे हैं[14] उन्होंने सैन्य संस्थानों की आलोचना भी की है और उन पर माओवादी विचारधारा से जुड़े व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप भी लगे हैं[15]

यही कारण है कि CJP को लेकर बहस केवल छात्र राजनीति या युवा असंतोष तक सीमित नहीं रही। आलोचकों का तर्क है कि आंदोलन के कई प्रमुख चेहरे लंबे समय से उन वैचारिक अभियानों से जुड़े रहे हैं जो भारत की संस्थाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों और सभ्यतागत पहचान के प्रति लगातार आलोचनात्मक या शत्रुतापूर्ण रुख रखते आए हैं।

उनके अनुसार CJP की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि उसने खुद को एक युवा आंदोलन के रूप में पेश किया। लेकिन पर्दे के पीछे सक्रिय कई आवाज़ें नई नहीं थीं। वे वही परिचित वैचारिक समूह और कार्यकर्ता थे जो अलग-अलग मुद्दों पर समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

आलोचकों का आरोप है कि ऐसे अभियानों में युवाओं की वास्तविक नाराज़गी और शिकायतों को एक बड़े राजनीतिक एजेंडे से जोड़ दिया जाता है। शिक्षा, बेरोज़गारी या अवसरों जैसे मुद्दे सामने रखे जाते हैं, लेकिन धीरे-धीरे बहस का केंद्र कहीं और खिसक जाता है। नतीजा यह होता है कि मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और आंदोलन व्यापक वैचारिक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है[16]

इसी वजह से CJP को लेकर यह सवाल बार-बार उठता रहा कि क्या यह वास्तव में छात्रों और युवाओं की समस्याओं पर केंद्रित आंदोलन था, या फिर एक पुराने राजनीतिक और वैचारिक ढाँचे को नए चेहरे और नई भाषा में पेश करने की कोशिश।

कुछ टिप्पणीकार पड़ोसी बांग्लादेश का उदाहरण भी देते हैं, जहाँ युवाओं के वास्तविक असंतोष को बाद में कहीं बड़े राजनीतिक एजेंडों ने अपने भीतर समाहित कर लिया। उनके अनुसार CJP को लेकर उठे सवालों को भी इसी व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

जंतर-मंतर प्रदर्शन: दावे और ज़मीनी हकीकत

भारत में कट्टर-वामपंथी और सरकार-विरोधी प्रदर्शनों की एक परिचित शैली रही है। मुद्दा चाहे कोई भी हो, कुछ नारे लगभग हर बार सुनाई देते हैं। “हमें चाहिए आज़ादी”, “तानाशाही नहीं चलेगी” और इसी तरह के अन्य राजनीतिक नारे अक्सर किसी भी विशेष मुद्दे से बड़े दिखाई देने लगते हैं।

जंतर-मंतर पर आयोजित CJP का प्रदर्शन भी इससे अलग नहीं था। रिपोर्टों के अनुसार वहाँ बड़ी संख्या में ऐसे लोग मौजूद थे जो विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में नियमित रूप से सक्रिय रहते हैं। आलोचकों का कहना है कि प्रदर्शन में छात्र और युवा कम, जबकि पेशेवर कार्यकर्ता और आंदोलनजीवी अधिक दिखाई दे रहे थे।

प्रदर्शन के दौरान कई ऐसे मुद्दे उठाए गए जिनका आपस में कोई संबंध नहीं था। आज़ादी के नारों से लेकर मणिपुर हिंसा तक, अनेक विषय मंच पर सामने आए। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, उसका मूल मुद्दा चर्चा के केंद्र से हटता गया। यदि प्रदर्शन का कोई स्पष्ट और केंद्रित संदेश था, तो वह आम दर्शकों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुँचा।

देखते ही देखते यह आयोजन छात्रों के एक मुद्दा-आधारित प्रदर्शन से अधिक दिल्ली की एक परिचित राजनीतिक रैली जैसा लगने लगा। वहाँ छात्र कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक समूहों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की मौजूदगी ने भी इस प्रदर्शन की मीडिया में चर्चा को और बढ़ा दिया[17] [18] [19]

भारत पहुँचने के बाद अभिजीत दिपके ने अपने बयानों से इस पूरे घटनाक्रम को और भी नाटकीय बना दिया। उनका कहना था कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे अपनी आज़ादी के आख़िरी क्षण जी रहे हों। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग जेल जाने के डर से समझौता कर चुके हैं, लेकिन देश का युवा नहीं बिका है[20]

समर्थकों ने इसे सत्ता के खिलाफ़ साहसिक आवाज़ बताया। लेकिन आलोचकों का कहना था कि यह वही पुरानी राजनीति है, जिसमें हर असहमति को लोकतंत्र और तानाशाही की लड़ाई बताकर पेश किया जाता है। उनका तर्क था कि इस तरह की भाषा अक्सर वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर भावनात्मक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है।

लेकिन इससे एक और बुनियादी सवाल उठता है। यदि लोकतांत्रिक संस्थाएँ पूरी तरह विफल हो चुकी हैं, जैसा कि ऐसे आंदोलनों में अक्सर दावा किया जाता है, तो फिर हर मुद्दे का समाधान केवल निरंतर विरोध और आंदोलन में ही क्यों खोजा जाता है? आलोचकों के अनुसार यही सोच कई कट्टर राजनीतिक अभियानों की पहचान बन चुकी है।

CJP को लेकर भी यही बहस आज तक जारी है। क्या यह केवल युवाओं की नाराजगी की अभिव्यक्ति थी, या फिर एक बड़े वैचारिक अभियान का हिस्सा? जंतर-मंतर का प्रदर्शन इस सवाल का अंतिम उत्तर भले न देता हो, लेकिन उसने इसे और अधिक प्रासंगिक अवश्य बना दिया।

संवाद या लेबलिंग?

जंतर-मंतर पर हुए CJP प्रदर्शन के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि सवाल पूछने वाले कुछ पत्रकारों और इन्फ्लुएंसर्स की बात हूटिंग और शोर-शराबे में दबाने की कोशिश की गई। कई बार असहज सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को “गोदी मीडिया” का लेबल दे दिया गया। पिछले कुछ वर्षों में यह शब्द राजनीतिक बहस का एक परिचित हथियार बन चुका है। किसी पत्रकार, मीडिया संस्थान या टिप्पणीकार की बात का जवाब देने के बजाय उसे एक लेबल देकर ख़ारिज करने का रिवाज सा हो गया है। जंतर-मंतर पर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

जंतर मंतर प्रदर्शन के दौरान एक पत्रकार को इतनी आक्रामक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा[21] कुछ अन्य वीडियो में महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार और मौखिक दुर्व्यवहार के आरोप भी सामने आए[22]

आलोचकों का कहना है कि यह “कैंसल कल्चर” की उसी राजनीति का हिस्सा है, जिसमें तर्क की जगह लोगों पर लेबल चिपका दिए जाते हैं। इसमें विरोधी विचार रखने वालों के तर्कों का जवाब देने के बजाय उन्हें बदनाम करने, शर्मिंदा करने या सार्वजनिक रूप से खलनायक साबित करने की कोशिश की जाती है। उद्देश्य बहस जीतना नहीं, बल्कि विरोधी आवाज़ों को हतोत्साहित करना होता है।

भारतीय राजनीतिक विमर्श में इसका एक परिचित उदाहरण “संघी” शब्द का इस्तेमाल है। राष्ट्रवादी या हिंदू दृष्टिकोण रखने वाले किसी व्यक्ति को इस लेबल के साथ खारिज कर देना कई हलकों में सामान्य बात बन चुकी है। आलोचकों का कहना है कि इससे स्वस्थ बहस कमजोर होती है और संवाद की जगह लेबलिंग ले लेती है।

CJP के डिस्कॉर्ड चैनल से जुड़ी कुछ रिपोर्टों ने भी इसी तरह के सवाल खड़े किए। OpIndia की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रतिभागियों ने दिल्ली दंगों के षड्यंत्र मामले के आरोपी उमर खालिद को एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया, उनकी रिहाई की मांग की और उन्हें नायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। यदि ये दावे सही हैं, तो आंदोलन के घोषित एजेंडे पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर यदि आंदोलन का मुख्य उद्देश्य शिक्षा सुधार और छात्र हितों की रक्षा था, तो उसके ऑनलाइन मंचों पर ऐसी बहसें प्रमुखता से क्यों दिखाई दे रही थीं? आलोचकों का कहना है कि CJP का सार्वजनिक चेहरा भले छात्र मुद्दों पर केंद्रित दिखाई देता हो, लेकिन उसके आसपास सक्रिय वैचारिक समूहों की प्राथमिकताएँ कहीं अधिक व्यापक राजनीतिक और वैचारिक संघर्षों से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं[23]

विदेशी मीडिया का उत्साह और “Gen Z क्रांति” का नैरेटिव

CJP को लेकर सबसे उल्लेखनीय बात केवल उसका सोशल मीडिया उभार नहीं था, बल्कि उसे मिली अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज भी थी। जिस आंदोलन की ज़मीनी उपस्थिति सीमित थी, उसे कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने भारत की राजनीति में एक संभावित मोड़ के रूप में प्रस्तुत किया। StopHindudvesha पहले भी इस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिला चुका है कि पश्चिमी मीडिया के कुछ प्रभावशाली वर्ग वैश्विक दक्षिण के देशों में उभरने वाले विरोध आंदोलनों को अक्सर असाधारण महत्व देते हैं। कई बार ऐसे आंदोलनों को सिर्फ़ किसी नीति के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की बगावत और बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत के रूप में पेश किया जाता है[24]

भारत, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों के संदर्भ में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। कई बार अपेक्षाकृत छोटे आंदोलनों को भी इस तरह चित्रित किया जाता है मानो वे पूरे देश की युवा पीढ़ी की सामूहिक आवाज़ हों।

CJP की कवरेज में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। जहाँ भारत का बड़ा मीडिया वर्ग उसके दावों और वास्तविक प्रभाव के बीच अंतर को लेकर सवाल उठा रहा था, वहीं BBC, The Guardian, Deutsche Welle, Al Jazeera, Reuters और France 24 जैसे कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने उसे असाधारण महत्व दिया।

गार्डियन ने CJP को ऐसा युवा आंदोलन बताया जो भारत की राजनीति को झकझोर सकता है। BBC ने उसे भारत की नई Gen Z राजनीतिक आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया। कई रिपोर्टों में यह धारणा उभरती दिखाई दी कि भारत के युवा मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से गहराई से निराश हैं और CJP उसी असंतोष का प्रतिनिधित्व कर रही है[25]

युवाओं की शिकायतों को सामने रखना गलत नहीं था। सवाल यह था कि कुछ सीमित घटनाओं के आधार पर पूरे देश की तस्वीर पेश की जाने लगी। जंतर-मंतर पर अपेक्षाकृत कम उपस्थिति वाले प्रदर्शन को एक उभरती हुई राष्ट्रीय राजनीतिक लहर के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि इसके समर्थन में ठोस प्रमाण बहुत कम दिखाई देते थे।

BBC की एक रिपोर्ट में 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग की बेरोज़गारी का हवाला देते हुए युवाओं की निराशा को CJP के उभार से जोड़ा गया[26] [27] लेकिन आलोचकों का कहना था कि केवल ऐसे आँकड़ों के आधार पर पूरी स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। इससे यह धारणा बन सकती है कि पूरी युवा पीढ़ी राजनीतिक व्यवस्था से विमुख हो चुकी है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक विविध और जटिल है[28] [29]

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि CJP को केवल एक आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र पर टिप्पणी के रूप में पेश किया जा रहा था। कई रिपोर्टों में यह संकेत मिलता था कि भारत की राजनीतिक संस्थाएँ युवाओं का विश्वास खो रही हैं और नई पीढ़ी पारंपरिक राजनीति से दूरी बना रही है।

लेकिन यहीं विदेशी मीडिया के नैरेटिव और ज़मीनी वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई देता है। यदि CJP वास्तव में भारत के युवाओं की व्यापक आवाज़ बन चुकी थी, तो उसका प्रभाव सोशल मीडिया से बाहर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए था। उपलब्ध संकेत ऐसे नहीं बताते।

यही कारण है कि आलोचकों ने CJP की कवरेज को केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक परिचित नैरेटिव का हिस्सा माना। उनके अनुसार मामला केवल एक छात्र आंदोलन का नहीं था। यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा था जिसमें वैश्विक दक्षिण के देशों में उभरने वाले कुछ आंदोलनों को वास्तविक आकार से कहीं अधिक बड़ा और ऐतिहासिक महत्व का बताकर प्रस्तुत किया जाता है।

भारत के युवाओं ने CJP को कितना स्वीकार किया?

जंतर-मंतर के बाद CJP ने अपने अभियान को दिल्ली से बाहर ले जाने की कोशिश की। बेंगलुरु, हैदराबाद और अन्य शहरों में भी गतिविधियाँ दिखाई दीं। लेकिन इसके बावजूद ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला कि आंदोलन भारत के युवाओं के बीच व्यापक समर्थन जुटाने में सफल रहा हो।

आलोचकों का आरोप है कि CJP ने NEET पेपर लीक और अन्य छात्र मुद्दों पर पहले से चल रहे आंदोलनों का सहारा लेकर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की। एक चर्चित घटना में इसके संस्थापक अभिजीत दिपके लखनऊ में छात्रों के एक प्रदर्शन में पहुँचे, लेकिन वहाँ उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और कुछ ही समय बाद वे वहाँ से चले गए[30] [31]

स्पष्ट है कि CJP की सोशल मीडिया की छवि और ज़मीनी वास्तविकता में जमीन-आसमान का अंतर है। विदेशी मीडिया के कुछ वर्ग जहाँ CJP को भारत में उभरती हुई एक बड़ी युवा राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे, वहीं वास्तविक जनसमर्थन के प्रमाण सीमित दिखाई देते थे।

परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के युवा राजनीति में रुचि नहीं रखते या सरकार की आलोचना नहीं करते। वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, अवसरों और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े मुद्दों पर युवाओं ने समय-समय पर अपनी आवाज़ बुलंद की है। लेकिन ऐसे आंदोलन आमतौर पर किसी ठोस मुद्दे और स्पष्ट मांग के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

शायद इसी कारण से CJP ने स्वयं को शिक्षा सुधार और छात्र हितों से जुड़े आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी। लेकिन जंतर-मंतर के प्रदर्शन और उसके आसपास उभरी बहसों ने यह धारणा मजबूत की कि उसका एजेंडा केवल छात्र मुद्दों तक सीमित नहीं था।

और संभवतः यही वजह है कि व्यापक प्रचार और मीडिया कवरेज के बावजूद CJP वह जनसमर्थन हासिल नहीं कर सकी जिसकी उसके समर्थकों को उम्मीद थी। भारत के अनेक युवा विरोध और जवाबदेही का समर्थन तो करते हैं, लेकिन वे उन आंदोलनों के प्रति अधिक सतर्क दिखाई देते हैं जो जल्द ही किसी बड़े वैचारिक संघर्ष का रूप ले लेते हैं।

CJP को मिली सीमित जन-प्रतिक्रिया कम से कम इतना तो संकेत देती ही है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली लोकप्रियता और वास्तविक जनसमर्थन हमेशा एक ही बात नहीं होते।

निष्कर्ष

वैश्विक दक्षिण के कई देशों में समय-समय पर ऐसे आंदोलन उभरते रहे हैं जिन्हें नई पीढ़ी की बगावत या लोकतांत्रिक जागरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कॉकरोच जनता पार्टी का प्रकरण भी कई मायनों में इसी प्रवृत्ति का हिस्सा दिखाई देता है।

सोशल मीडिया पर उसका तेज़ उभार, विदेशी मीडिया का असाधारण उत्साह, सीमित ज़मीनी समर्थन और उससे जुड़े वैचारिक विवाद, इन सभी को साथ रखकर देखें तो CJP की कहानी उतनी सरल नहीं लगती जितनी पहली नज़र में दिखाई देती है।

भारत के युवा न तो उदासीन हैं और न ही सत्ता से सवाल पूछने से डरते हैं। जब उन्हें लगता है कि उनकी चिंताओं की अनदेखी हो रही है, तो वे आवाज़ उठाते हैं, संगठित होते हैं और जवाबदेही की मांग भी करते हैं। लेकिन CJP का अनुभव यह भी दिखाता है कि वे हर उस आंदोलन को सहज रूप से स्वीकार नहीं करते जो खुद को उनकी आवाज़ बताता है।

इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है। करोड़ों फॉलोअर्स, अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ और लगातार प्रचार किसी आंदोलन को दृश्यता तो दे सकते हैं, लेकिन जनाधार नहीं। अंततः किसी भी आंदोलन की असली परीक्षा सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि समाज के बीच होती है। और CJP उस कसौटी पर अपने समर्थकों के दावों की तुलना में उतनी मजबूत दिखाई नहीं दी।

सन्दर्भ सूची

[1] Cockroach Janta Party (CJP): How Abhijit Dipke’s collective became an online sensation; https://www.bbc.com/news/articles/cz72y11jjq1o

[2] Cockroach Janta Party News: CJP beats BJP on Instagram, crosses 10 million followers in 5 days – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/cockroach-janta-party-10-million-followers-on-instagram-bjp-followers-cji-remarks-genz-youth-2914805-2026-05-21

[3] Organic wave or algorithm push? Internet debates “Cockroach Party” after it crosses 12 million followers in under a week;  https://www.moneycontrol.com/news/trends/organic-wave-or-algorithm-push-internet-debates-cockroach-party-after-it-crosses-12-million-followers-in-under-a-week-13926332.html

[4] Cockroach Janta Party’: Social Media Frenzy Or Just Hype; https://www.ndtv.com/india-news/cockroach-janta-party-social-media-frenzy-or-just-hype-11528958

[5] Who is Abhijit Dipke? The Brain Behind The Cockroach Janta Party Movement; https://www.brut.media/in/articles/india/politics/who-is-abhijit-dipke-the-brain-behind-the-cockroach-janta-party-movement

[6] ‘ I will most likely be arrested at the airport’, says Cockroach Janta Party founder Abhijeet Dipke on return to India | Delhi News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/delhi/i-will-most-likely-be-arrested-at-the-airport-says-cockroach-janta-party-founder-abhijeet-dipke-on-india-return/articleshow/131444211.cms

[7] Delhi Police allowed CJP’s protest to ‘pacify’ burgeoning youth anger; Dipke secured approval in minutes – The Hindu;  https://www.thehindu.com/news/national/cjp-founder-applied-for-permission-at-delhi-airport-got-it-within-minutes/article71070751.ece

[8] Six detained during CJP’s Jantar Mantar protest for ‘attempting to create’ disturbance;    https://www.newindianexpress.com/states/delhi/2026/Jun/06/six-detained-during-cjps-jantar-mantar-protest-for-attempting-to-create-disturbance

[9] Cockroach Janta Party has 80% Pak-Bangladesh followers, claim netizens; 94% are Indians, says Abhijit Dipke – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/new-updates/cockroach-janta-party-has-nearly-80-followers-from-pakistan-bangladesh-and-turkey-claim-netizens-potential-bot-activity-suspected/articleshow/131257112.cms?from=mdr

[10] Pakistan angle to ‘Cockroach Janta Party’? Some netizens question foreign followers on Instagram – Founder reacts!; https://www.wionews.com/photos/pakistan-angle-to-cockroach-janta-party-netizens-flag-large-number-of-pak-bangladesh-and-turkey-based-followers-1779363695816

[11] Cockroach Janta Party’s Instagram Followers Mostly From Pakistan, Bangladesh And Turkey? Here’s What The Numbers Reveal | Dailyhunt; https://m.dailyhunt.in/news/india/english/newsx+english-epaper-newsxen/cockroach+janta+partys+instagram+followers+mostly+from+pakistan+bangladesh+and+turkey+heres+what+the+numbers+reveal-newsid-n713219067

[12] EXCLUSIVE | Before Cockroach Janta Party went viral, founder Abhijeet Dipke faced complaint over Kashmir posts – The Statesman; https://www.thestatesman.com/india/exclusive-before-cockroach-janta-party-went-viral-founder-faced-complaint-over-kashmir-posts-1503596698.html

[13] How ‘Cockroach Party’ founder Abhijeet Dipke ‘supported separatists’, spread fear in Kashmir during abrogation of Article 370 | Dailyhunt; https://m.dailyhunt.in/news/india/english/news+bharati-epaper-newsbhar/how+cockroach+party+founder+abhijeet+dipke+supported+separatists+spread+fear+in+kashmir+during+abrogation+of+article+370-newsid-n713195743

[14] Exposing Saurav Das of CJP and his anti-India views;   https://organiser.org/2026/06/06/356844/bharat/exposing-cjps-saurav-das-inside-his-controversial-commentary-on-article-370-umar-khalid-nationalism/

[15] Exposing Saurav Das of CJP and his anti-India views;   https://organiser.org/2026/06/06/356844/bharat/exposing-cjps-saurav-das-inside-his-controversial-commentary-on-article-370-umar-khalid-nationalism/

[16] Ibid.

[17] Cockroach Janta Party Protest at Jantar Mantar Falls Flat Amid Low Turnout and Routine Slogans | Daily Pioneer; https://dailypioneer.com/news/slug-lite/cjp-protest-at-jantar-mantar-fizzles-out-without-impact?year=2026

[18] Cockroach Janta Party’s supposed protest for students sees random Azaadi slogans one hears at every leftist protest; https://thepamphlet.in/cockroach-janta-partys-supposed-protest-for-students-sees-random-azaadi-slogans-one-hears-at-every-leftist-protest/

[19] From ‘Azadi’ slogans to disrespect of national flag: Inside the Cockroach Janta Party protest at Jantar Mantar – VSK Telangana; https://www.vsktelangana.org/Encyc/2026/6/8/from-azadi-slogans-disrespect-national-flag-inside-cockroach-janta-party-protest-jantar-mantar.html

[20] Cockroach Janta Party Protest at Jantar Mantar Falls Flat Amid Low Turnout and Routine Slogans | Daily Pioneer; https://dailypioneer.com/news/slug-lite/cjp-protest-at-jantar-mantar-fizzles-out-without-impact?year=2026

[21] Journalists pushed around and heckled by CJP supporters during the recent protest at Jantar Mantar;  https://www.opindia.com/2026/06/6-incidents-of-cjp-supporters-heckling-journalists-during-the-protest-at-jantar-mantar/

[22] Ashish Kohli on X;  https://x.com/dograjournalist/status/2063500159049511254

[23] OpIndia Investigation:  How CJP Discord is running a dangerous campaign to support and whitewash Umar Khalid;  https://www.opindia.com/2026/06/cjp-discord-umar-khalid-supporters-manipulation-tactics-cockroach-nest/

[24] Gen Z Revolt: Western Media’s Indo-Nepal Play; https://stophindudvesha.org/the-gen-z-experiment-how-western-media-manufactures-revolt-in-india-and-nepal/

[25] What if all cockroaches came together?’ The youth movement threatening to shake up India’s politics | India | The Guardian;  https://www.theguardian.com/world/2026/jun/08/cockroach-janta-party-youth-movement-india-politics

[26] Cockroach Janta Party ( CJP): How Abhijeet Dipke’s collective became an online sensation;  https://www.bbc.com/news/articles/cz72y11jjq1o

[27] BBC Audio | What in the World | Why India’s Cockroach Janta Party has got people talking;  https://www.bbc.com/audio/play/w3ct991z

[28] Cockroach movement gives voice to India’s angry youth;  https://www.dw.com/en/cockroach-movement-gives-voice-to-indias-angry-youth/a-77391629

[29] The Man Turning the Cockroach Into a Gen-Z Movement in India – The New York Times;  https://www.nytimes.com/2026/05/28/world/asia/cockroach-janta-party-india-movement.html

[30] CJP founder Abhijeet Dipke attempts to hijack students’ protest in Lucknow, leaves within 30 minutes; https://www.opindia.com/news-updates/cjp-founder-abhijeet-dipke-attempts-to-hijack-students-protest-in-lucknow-leaves-within-30-minutes/

[31] Will Not Allow To Hijack’: CJP’s Abhijeet Dipke Faces Students’ Ire As He Attempts To Join Lucknow Agitation On CBSE Issue; https://www.thedailyjagran.com/india/will-not-allow-to-hijack-cjp-founder-abhijeet-dipke-faces-students-ire-as-he-attempts-to-join-lucknow-agitation-on-cbse-issue-10316218

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US