हिंदू मंदिरों की मुक्ती हेतु संघर्ष: जागरूकता की नई लहर

कुछ प्रमुख हिंदू संगठन और कार्यकर्ता इस मुद्दे को लेकर जागरूकता बढ़ा रहे हैं और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए दबाव बना रहे हैं, लेकिन हिन्दू समाज की इस विषय पर उदासीनता चिंताजनक है।

[संपादक का नोट: यह लेख भारत में हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के मुद्दे पर तीन-भाग की श्रृंखला का हिस्सा है। पहले भाग में पाठक को हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की राजनीति की कानूनी और संवैधानिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी दी गई। दूसरे भाग में इस बात पर गहराई से चर्चा की गई कि हिंदू मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से क्यों मुक्त किया जाना चाहिए।

यह लेख, श्रृंखला का अंतिम हिस्सा है, जो पाठक को पिछले कुछ वर्षों में भारत में ज़ोर  पकड़ने वाले “हिंदू मंदिरों को मुक्त करो” आंदोलन की झलक देगा।  लेख में हिंदू मंदिरों के भविष्य पर भी चर्चा की गई है, यानि की उस समय क्या परिदृश्य होगा जब वे सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो जाएंगे। यह समुदाय द्वारा हिंदू मंदिरों के सक्रिय प्रबंधन के लिए सुझाए गए विभिन्न प्रतिमानों के बारे में जानकारी देता है।]

  • हिंदू समुदाय का एक बड़ा वर्ग मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के मुद्दे से अनभिज्ञ है, जिसके कारण समुदाय के भीतर गहरी अज्ञानता और उदासीनता घर कर चुकी है।
  •  हिंदू संगठन और नेता हिंदुओं में जागरूकता बढ़ाने और मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन पर्याप्त समर्थन जुटाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
  •  सद्गुरु और जे. साई दीपक जैसे व्यक्ति कानूनी और सार्वजनिक मंचों का उपयोग करके इस मुद्दे को उजागर करने के लिए हिंदू मंदिर स्वायत्तता की वकालत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
  •  इस बात को लेकर भिन्न भिन्न मत हैं कि सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के बाद, क्या मंदिरों को पारंपरिक वैदिक मानदंडों के अनुसार प्रबंधित किया जाना चाहिए,या समुदाय में उनकी भूमिका को मज़बूत करने के लिए आधुनिक कॉर्पोरेट प्रशासन को शामिल किया जाना चाहिए।
  •  हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर भविष्य में पारंपरिक अनुष्ठानों को आधुनिक प्रबंधन प्रथाओं के साथ मिलाना शामिल हो सकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे समुदाय के लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बने रहें।

भारत में एक आम हिंदू अक्सर इस बात से अनभिज्ञ होता है कि हिंदू मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं, उन्हें मुक्त कराने के प्रयासों में शामिल होना तो दूर की बात। दुर्भाग्य से यह व्यापक अज्ञानता हिंदू समुदाय में गहराई से समा गई है। हालाँकि भारत में मंदिरों के सरकारी नियंत्रण के परिपेक्ष्य में हिंदुओं की उदासीनता एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात है इस विषय को लेकर हिंदुओं की अज्ञानता। उदासीनता तो बहुत बाद में आती है, सबसे ज़रूरी बात तो यह है कि हिंदू समाज के अधिकतर लोगों को यह मालूम ही नहीं की मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं, और इस नियंत्रण के अर्थ क्या हैं।

जब कोई समुदाय व्यवस्थित रूप से अपनी संस्कृति और सभ्यता की जड़ों से अलग हो जाता है, जैसा कि सदियों से हिंदुओं के साथ होता आया है, तो उदासीनता आना लाज़मी है। हालाँकि, यह उदासीनता केवल बेपरवाही या मोहभंग से पैदा नहीं होती है। इसके बजाय, यह हिंदूद्वेष या हिंदू विरोधी भावना के सबसे कपटी रूप का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे हिंदुओं ने अपने भीतर समाहित कर लिया है, जिससे कई लोग अपने पूजा स्थलों की स्थिति के बारे में बेपरवाह हो गए हैं।

भारत में “Free Hindu Temples” आंदोलन का प्राथमिक ध्यान जन जागरूकता बढ़ाना रहा है। विश्व हिंदू परिषद (VHP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), हिंदू जनजागृति समिति और रिक्लेम टेम्पल्स जैसे हिंदू संगठन इस मुद्दे के बारे में लोगों को शिक्षित करने में सबसे आगे रहे हैं। सद्गुरु जैसे प्रमुख हिंदू आध्यात्मिक गुरु और सुप्रीम कोर्ट के वकील जे. साई दीपक जैसे कानूनी कार्यकर्ताओं ने भी हिंदू मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की आवश्यकता को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस मुद्दे को चुनावी चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहिए ताकि सरकार पर हिंदू मंदिरों को मुक्त करने के लिए एक राष्ट्रीय कानून पारित करने का दबाव बनाया जा सके। भारत में हिंदुओं के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह इस लक्ष्य को कार्यान्वित करने हेतु सही दिशा में काम कर रहे हैं। हालाँकि, हिंदू समुदाय के बीच उनकी संस्कृति और सभ्यता को प्रभावित करने वाले मुद्दों के बारे में जागरूकता चिंताजनक रूप से कम है, जो यह दर्शाता है कि भारत सरकार पर राजनीतिक रूप से कार्रवाई करने के लिए दबाव डालने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटाने में समय लगेगा।

इसके बावजूद, एक सकारात्मक शुरुआत हो चुकी है। हालाँकि हिंदू मंदिरों को मुक्त कराने के लिए राष्ट्रीय कानून अभी तक आसन्न नहीं है, लेकिन स्थानीय और राज्य स्तर पर कुछ प्रगति हुई है। हिंदू अधिकार कार्यकर्ताओं और इस उद्देश्य के लिए समर्पित संगठनों के अथक प्रयासों की बदौलत कई मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करा लिया गया है।

निम्नलिखित अनुभाग इस मुद्दे पर की गई कुछ प्रगति की समीक्षा करेगा।

हिंदू मंदिरों को मुक्त कराने का आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा है

जब हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की बात आती है, तो समग्र तस्वीर को देखने के बजाय, ज़मीनी स्तर पर विशिष्ट उदाहरणों की जाँच करके प्रगति का आकलन करना अधिक प्रभावी होता है। आखिरकार, यह कई छोटी-छोटी जीतों का संचय ही है जो अंततः महत्वपूर्ण बदलाव लाता है।

हिंदू जनजागृति समिति (HJS) भारत के “Free Temples Movement” में एक प्रमुख सहभागी रही है। देश भर में अलग-अलग मंदिरों पर ध्यान केंद्रित करने वाले अपने लक्षित अभियानों के माध्यम से, HJS ने सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार को सफलतापूर्वक उजागर किया है, कुप्रथाओं पर अंकुश लगाया है, और हिंदू मंदिरों में ड्रेस कोड लागू करने की वकालत की है।[1]

HJS वेबसाइट भारत भर में सरकार द्वारा प्रबंधित मंदिरों में उजागर हुए कई घोटालों और भ्रष्टाचार के मामलों का विस्तृत विवरण देती है। The Times of India ने मार्च 2023 में अपनी साइट पर सबसे हालिया मामलों में से एक को रिपोर्ट किया।[2] इस रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक बंदोबस्ती (मुजराई) विभाग के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इसके नियंत्रण में मंदिरों की कम से कम 625 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण किया गया था। सर्वेक्षण में 5,700 से ज़्यादा मंदिरों को शामिल किया गया, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि अतिक्रमण की गई ज़मीन का वास्तविक आँकड़ा इससे कहीं ज़्यादा होने की संभावना है, क्योंकि प्रचारित किए गए आँकड़ों में अतिक्रमण के सभी मामलों का हिसाब नहीं है।[3]

HJS की वेबसाइट पर 9-सूत्रीय घोषणापत्र भी दिया गया है जिसमें बताया गया है कि हिंदुओं को मंदिरों की स्वायत्तता के मामले में सरकार के सामने क्या क्या क्या माँगें रखनी चाहिएँ। घोषणापत्र में कुछ बेहद प्रासंगिक माँगें शामिल हैं जैसे:

  1. सरकार को मंदिर के पुजारियों के लिए एक निर्धारित मासिक वेतन तय करना चाहिए।
  2. सरकार की ओर से एक घोषणा जारी की जाए जिसमें कहा गया हो कि मंदिर की संपत्ति का इस्तेमाल विकास के उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाएगा।
  3. तीर्थस्थलों और मंदिरों पर अतिक्रमणों का तत्काल सर्वेक्षण और उन्हें हटाने की माँग।
  4. सरकार को अदालत के आदेशों का पालन करते हुए उन मंदिरों को मुक्त करना चाहिए जिन्हें सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया है।[4]

“Reclaim Temples ” एक और महत्वपूर्ण हिंदू संगठन है जो हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने पर केंद्रित है। उनके दृष्टिकोण में अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्येक राज्य में विशिष्ट कानून बनाना शामिल है। रीक्लेम टेम्पल्स ने हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के विमर्श को ख़ासा विस्तार भी दिया है- इसने एजेंडे में उन विवादित स्थलों की व्यापक समीक्षा को भी शामिल किया है, जहाँ इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा प्राचीन हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था और उनकी जगह मस्जिदें बनाई गई थीं। इसलिए, मौजूदा मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त कराने के प्राथमिक लक्ष्य के साथ ही इस आंदोलन का उद्देश्य प्राचीन हिंदू मंदिरों के व्यापक पुनर्ग्रहण और उन भूमियों को भी शामिल करना है जिनकी भूमि पर आक्रमणकारियों ने कब्ज़ा कर लिया था।[5]

इसके अतिरिक्त, रीक्लेम टेम्पल्स का एक समर्पित एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल भी है जो भारत के विभिन्न राज्यों में प्राचीन हिंदू मंदिरों के बारे में नियमित अपडेट प्रदान करता है जो वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं और जिन्हें तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है।[6]

Global Hindu Heritage Foundation (GHHF) ने भी इस मुद्दे के बारे में जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है।[7] उनके मिशन वक्तव्य में निम्नलिखित केंद्रबिंदु शामिल हैं:

  • सरकार, व्यक्तियों और/या किसी भी संगठन द्वारा हिंदू धार्मिक संस्थानों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली सभी नीतियों, कानूनों और गतिविधियों के खिलाफ आवश्यक और उचित कानूनी और अहिंसक कार्रवाई करना।
  • एक ‘हिंदू मंदिर शासी निकाय’ की स्थापना जो भारत भर में सभी हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने हेतु आवश्यक कानूनी कदम उठाएगी।
  • पुराने और जीर्ण-शीर्ण मंदिरों को पुनर्जीवित और पुनर्निर्मित करना।
  • सरकार या व्यक्तियों की अवैध गतिविधियों, अतिक्रमण या मंदिर की संपत्ति के अधिग्रहण को रोकने के लिए कदम उठाना।

GHHF ने इस क्षेत्र में ज़मीनी स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण और ठोस काम किया है, मंदिरों की भूमि को अतिक्रमण से बचाया है और हिंदू समुदाय के लिए एक दान तंत्र विकसित करने में मंदिरों की मदद की है। उन्होंने हिंदू मंदिरों के सरकारी नियंत्रण के मुद्दे को वैश्विक मंच पर उठाने और इस तरह हिंदू प्रवासियों को इस मुद्दे के लिए संगठित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2012 में, GHHF ने अमेरिका के डलास क्षेत्र में हिंदू मंदिरों को बचाने के मुद्दे पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इससे पहले 2007 में, ग्लोबल हिंदू हेरिटेज फाउंडेशन ने 6 मई, 2007 को तत्कालीन राज्य के मुख्यमंत्री की शिकागो यात्रा के दौरान आंध्र प्रदेश के बंदोबस्ती अधिनियम के खिलाफ एक प्रदर्शन आयोजित किया था। इसके अतिरिक्त, जून 2007 में हैदराबाद में एक सार्वजनिक मंच का आयोजन किया गया था, जहाँ हिंदू संतों सहित कई वक्ताओं द्वारा हिन्दू मंदिरों की सरकारी नियंत्रण के मुद्दे पर राय प्रस्तुत की गई थी, और आंध्र प्रदेश सरकार से मंदिर को हिंदुओं को वापस सौंपने का आग्रह किया गया था।

प्रसिद्ध हिंदू आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक, सद्गुरु, “Free Hindu Temples” आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार रहे है, विशेष रूप से तमिलनाडु के संदर्भ में, जहाँ हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा है, जैसा कि इस श्रृंखला के भाग 1 और 2 में बताया गया है।

फरवरी 2024 में एक कार्यक्रम के दौरान, सद्गुरु ने मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का आग्रह करते हुए कार्रवाई के लिए एक नया आह्वान किया। उन्होंने भारत की विडंबना को उजागर किया कि वह खुद को एक धर्मनिरपेक्ष देश कहता है, जबकि अधिकांश हिंदू मंदिर सरकार द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं, सरकारी क्लर्कों द्वारा चलाए जाते हैं, और व्यवस्थित रूप से बद से बदतर होते जा रहे हैं। सद्गुरु ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये मंदिर, जो हजारों सालों से कला, संगीत, संस्कृति और आध्यात्मिकता के केंद्र रहे हैं – आधुनिक मशीनरी के अस्तित्व में आने से बहुत पहले से – अब सरकारी प्रशासन के तहत पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर हैं।[8]

अंग्रेजी बोलने वाले भारतीय युवाओं में सद्गुरु के अनुयायियों की संख्या बहुत ज़्यादा है। वे उन हिंदू गुरुओं में से एक हैं जो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलते हैं और वैश्विक स्तर पर उनका ख़ासा प्रभाव है। इस प्रकार, हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए सद्गुरु द्वारा किए जा रहे प्रयास एक मील का पत्थर साबित हो सकते हैं, खासकर इस मुद्दे के लिए युवाओं का समर्थन जुटाने में। सोशल मीडिया पर उनके फ़ैन्स की संख्या लाखों में है, और उन्होंने कई बार मीडिया साक्षात्कार, वार्ता, सोशल मीडिया पोस्ट्स आदि माध्यम से इस मुद्दे को उठाया है। 2021 में CNN न्यूज़ 18 को दिए गए एक साक्षात्कार में, सद्गुरु ने हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का खाका भी तैयार किया:

देखिए, चूँकि यह एक जटिल मुद्दा है, इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि कल सुबह ही लगभग 36,000 मंदिर लोगों को सौंपे जा सकें। ठीक है। इसलिए आपको समुदाय का एक राज्य स्तरीय बोर्ड बनाना होगा जिसमें ज़िम्मेदार लोग हों जो वहां मौजूद पैसे या जो भी संपत्ति है, उसके लिए नहीं आ रहे हैं। ऐसे लोग जो सफल हैं, जिन्हें मंदिर में क्या है, इसकी परवाह नहीं है; उनके दिल में कुछ भक्ति है। आप सरकार के लिए उस तरह के लोगों का एक ट्रस्ट बनाते हैं और फिर हर शहर, हर जिले के लिए, जो भी आप बनाते हैं, और अधिक ट्रस्ट बनाते हैं। यह एक लंबी प्रक्रिया है। यह कल नहीं होने वाला है। मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि इसमें चार साल या पांच साल लगें, लेकिन प्रक्रिया कम से कम इरादे से शुरू होनी चाहिए, कम से कम आपको इरादा दिखाना चाहिए। मैं समझ सकता हूँ कि प्रक्रिया जटिल है, इसे क्रमिक तरीके से करने की आवश्यकता है। यदि आप इसे एक सुनियोजित तरीके से नहीं करते हैं, तो यह गड़बड़ हो सकता है। [9]

सुप्रीम कोर्ट के वकील और लेखक साई दीपक “Free Temple” आंदोलन में एक और प्रभावशाली सहभागी  हैं। वे इस विमर्श को एक गहन कानूनी परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं, हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की जटिलताओं के बारे में जनता को शिक्षित करने और सरकारी निगरानी से मुक्त होने के बाद उनके प्रबंधन के लिए रणनीतियों का प्रस्ताव देने के लिए कई वार्ता और साक्षात्कार आयोजित करते हैं। दीपक केरल में सबरीमाला मंदिर परिसर से संबंधित कानूनी चुनौतियों को संबोधित करने में विशेष रूप से सक्रिय रहे हैं। उन्हें सबरीमाला मामले में धार्मिक सिद्धांतों की वकालत करने के लिए जाना जाता है।

फरवरी 2023 में सबरीमाला मंदिर पुजारी नियुक्ति मामले की केरल उच्च न्यायालय की सुनवाई के दौरान, जे. साई दीपक ने कई महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए। “पीपुल फॉर धर्म” ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मंदिर के मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुख्य पुजारी की नियुक्ति स्वाभाविक रूप से एक धार्मिक विषय है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), और 16(2) द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता है। यह मामला त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड द्वारा 27 मई, 2021 को जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के बाद शुरू हुआ था। अधिसूचना में सबरीमाला मंदिर में मुख्य पुजारी के पद के लिए विशेष रूप से मलयाला ब्राह्मणों से आवेदन आमंत्रित किए गए थे।[10]

चुनावी ताकत: हाल के चुनावों से सबक

भारत में किसी भी मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का सबसे प्रभावी तरीका उसे चुनावी मुद्दा बनाना है। लोकतंत्र इसी तरह काम करता है। अगर मतदाता यह धारणा बनाते हैं कि किसी विशेष मुद्दे को संबोधित न करने से किसी राजनीतिक दल को महत्वपूर्ण वोटों का नुकसान होगा, तो वे काफी हद तक आश्वस्त हो सकते हैं कि सत्ता में बैठी पार्टी उन वादों पर काम करेगी। यह कुछ कुछ सट्टेबाज़ी की तरह है, परिणाम किस प्रकार के आयेंगे, कोई इसकी गारंटी नहीं ले सकता, लेकिन यह अनिश्चितता लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक हिस्सा है।

2021 में पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में ठीक यही हुआ, जब सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने विवादास्पद “देवस्थानम बोर्ड अधिनियम” को रद्द कर दिया, जिससे बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों सहित 51 मंदिरों को प्रभावी रूप से राज्य के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया।

देवस्थानम बोर्ड की स्थापना दिसंबर 2019 में त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने की थी। चार धाम (हिंदू धर्म के चार पवित्र तीर्थस्थल) सहित उत्तराखंड के 51 मंदिरों को राज्य के नियंत्रण में लाने के कदम का देशभर के साधु-संतों और हिंदू संगठनों ने व्यापक विरोध किया। इस कदम की शुरुआत करने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। जैसे ही इस फैसले के खिलाफ आंदोलन तेज़ हुआ, तीरथ सिंह रावत के बाद उत्तराखंड के सीएम बने पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे का अध्ययन करने और सिफारिशें देने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। कथित तौर पर समिति ने इन मंदिरों के प्रबंधन में जनता की भावना और विभिन्न हितधारकों की चिंताओं पर विचार करते हुए बोर्ड को भंग करने की सिफारिश की।

इस प्रकार, दिसंबर 2021 में, पुष्कर सिंह धामी सरकार ने देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को भंग कर दिया। उस समय प्रचलित राय यह थी कि मार्च 2022 में उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए राज्य सरकार को यह निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।[11] [12]

इसी तरह, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अप्रैल 2023 में राज्य के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के अपने निर्णय की घोषणा की। चौहान ने घोषणा की कि सरकार ने मंदिरों की गतिविधियों पर नियंत्रण छोड़ने का फैसला किया है, और कलेक्टरों के बजाय पुजारी मंदिर की भूमि की नीलामी करेंगे।

मई 2023 में, मध्य प्रदेश सरकार ने आधिकारिक तौर पर मंदिर के पुजारियों को मंदिर के स्वामित्व वाली कृषि भूमि से होने वाली आय का उपयोग करके अपनी आजीविका चलाने की अनुमति दी। इस नए निर्णय के अनुसार, पुजारी अपने द्वारा प्रबंधित मंदिरों से जुड़ी 10 एकड़ तक की कृषि भूमि से होने वाली आय का उपयोग कर सकते हैं। यदि भूमि 10 एकड़ से अधिक है, तो पुजारी पहले 10 एकड़ से होने वाली आय रख सकते हैं, जबकि शेष भूमि से होने वाली आय को नए प्रावधानों के तहत मंदिर के खाते में जमा करना होगा।[13]

मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन है, लेकिन मोहन यादव नए मुख्यमंत्री हैं, जो 2023 में शिवराज सिंह चौहान के उत्तराधिकारी बने। पिछले मुख्यमंत्री की घोषणाओं के बाद राज्य सरकार मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए और अधिक ठोस कदम उठाएगी या नहीं, यह देखना अभी बाकी है। हालांकि, एक दिलचस्प पैटर्न उभर रहा है। उत्तराखंड और मध्य प्रदेश दोनों में लगातार स्थानीय चुनावों में हिंदू मुद्दों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन मुद्दों के बारे में स्थानीय स्तर पर काफी जागरूकता भी है, जिसका मतलब है कि राज्य सरकार की ऐसे फैसले लेने की संभावना नहीं है, जिससे व्यापक हिंदू समुदाय पार्टी के ख़िलाफ़ हो जाए।

तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में स्थिति बिल्कुल अलग है, जहां आज़ादी के बाद से ईसाई धर्मांतरण खतरनाक दर पर हुआ है, और आज भी धड़ल्ले से जारी है। इन राज्यों में, स्थानीय हिंदू समुदाय, आम तौर पर, हिंदू मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त कराने को लेकर, काफी हद तक उदासीन दिखता है, संभवतः स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए। इसके अलावा, यह तथ्य कि कट्टर हिंदू विरोधी कम्युनिस्ट सरकारें लगातार इन राज्यों पर शासन करती रही हैं, इस चुनौती को और भी बढ़ाता है, जिससे इस संबंध में किसी भी महत्वपूर्ण प्रगति की उम्मीद कम हो जाती है।

हालांकि, हिंदू विरोधी दक्षिण में, जहां हिंदू मुद्दों को चुनावों में प्रमुखता हासिल करना चुनौतीपूर्ण रहा है, वहां मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण हटाने के मामले में कानूनी रास्ता अधिक कारगर साबित हुआ है। इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण जुलाई 2020 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, जिसने केरल में प्राचीन श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन के लिए त्रावणकोर शाही परिवार के अधिकारों को बरकरार रखा। इस फैसले ने 2011 के केरल उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया, जिसने राज्य सरकार को मंदिर की संपत्ति और प्रबंधन पर नियंत्रण रखने के लिए एक बोर्ड स्थापित करने का निर्देश दिया था।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर, जिसे मूल रूप से 6वीं शताब्दी में बनाया गया था और 18वीं शताब्दी में त्रावणकोर रॉयल हाउस द्वारा अपने वर्तमान स्वरूप में पुनर्निर्मित किया गया था, लंबे समय से पूर्ववर्ती शाही परिवार द्वारा प्रबंधित एक ट्रस्ट के नियंत्रण में रहा है। अपने गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ, मंदिर अपने प्रबंधन को लेकर विवादों में घिरा हुआ था, जिसमें केरल सरकार एक देवस्वम बोर्ड के गठन के माध्यम से मंदिर पर नियंत्रण चाहती थी। सरकार ने शाही परिवार के प्रशासन के तहत कथित वित्तीय अनियमितताओं को औचित्य के रूप में उद्धृत किया।हालाँकि, नौ साल की कानूनी लड़ाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाही परिवार और धार्मिक संस्थानों के हिंदू स्व-प्रबंधन के व्यापक सिद्धांत के लिए एक महत्वपूर्ण जीत थी।[14]

राष्ट्रीय कानून बनाने की मांग

भारत प्रतिदिन एकतरफा “धर्मनिरपेक्षता” के दुष्परिणामों को झेलता है, जिसके परिणामस्वरूप हिंदू धार्मिक संस्थाएं इस असंतुलित दृष्टिकोण का ग्रास बनती जा रही हैं। यह तथ्य कि आज तक किसी भी सरकार ने भारतीय संसद में हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को संबोधित करने वाला विधेयक पेश करने की हिम्मत नहीं की है, इस मुद्दे की संवेदनशीलता और हिंदू बहुल राष्ट्र में हिंदुओं को किस हद तक हल्के में लिया गया है, इसका प्रमाण है।

निजी सदस्यों द्वारा हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने वाले विधेयक पेश करने के कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन इनमें से कोई भी प्रयास भारतीय संसद के निचले सदन, लोकसभा में बहस के बिंदु तक नहीं पहुंचा है। यह इस मुद्दे को लेकर भारत में सभी दलों के सुनियोजित राजनीतिक रुख को दर्शाता है, चाहे उनकी वैचारिक झुकाव कुछ भी हो। हालांकि वे सार्वजनिक दबाव में आकर कभी-कभार कुछ रियायतें या छूट दे सकते हैं – जैसे कि कुछ राज्यों में कुछेक मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना, या मंदिरों के प्रशासन में सरकारी हस्तक्षेप को कम करने का आश्वासन देना, आदि, लेकिन भारत की प्रत्येक सरकार ने हिंदू मंदिर तंत्र पर अपनी मज़बूत पकड़ बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। यानि जहां बात मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से पूर्णतया मुक्त करने की आती है, इस मामले को लेकर मानो सभी सरकारों को साँप सूँघ जाता है। जैसा कि कई विशेषज्ञों ने बताया है, हिंदू मंदिरों पर निरंतर नियंत्रण रखने की इस सरकारी इच्छा का सीधा संबंध इनमें से कई प्रतिष्ठित मंदिरों की अपार संपत्ति से है।

हिंदू मंदिरों को मुक्त करने के लिए एक ऐसा ही निजी सदस्य विधेयक 2019 में भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था। हालाँकि, विधेयक को प्रभावी रूप से स्थगित कर दिया गया था, क्योंकि इसे संसद में बहस के लिए कभी आगे नहीं लाया गया। सत्यपाल सिंह ने 2019 में विधेयक को फिर से पेश किया, यह दर्शाता है कि उन्होंने अतीत में भी इसी तरह के प्रयास किए थे। दिलचस्प बात यह है कि अगर कोई Google पर “सत्यपाल सिंह हिंदू मंदिर” खोजता है, तो पहले पृष्ठ पर इस विधेयक के बारे में कोई प्रासंगिक परिणाम नहीं मिलते हैं, जो दर्शाता है कि इस प्रयास को कितना कम ध्यान मिला है।

हालांकि, YouTube पर, सत्यपाल सिंह द्वारा विधेयक को फिर से पेश करने के बाद 2019 में भारतीय समाचार चैनल Times Now द्वारा आयोजित एक बेहतरीन विमर्श है। जबकि विधेयक के घटकों की विस्तृत चर्चा इस लेख के दायरे से बाहर है, जो लोग इस विषय को लेकर अधिक जानकारी पाने के इच्छुक हैं, वे Times Now का यह वीडियो देख सकते हैं, जिसमें सत्यपाल सिंह खुद हिंदू मंदिरों को मुक्त करने के लिए प्रस्तावित विधेयक के प्रमुख पहलुओं पर चर्चा करते हैं।[15]

गूगल सर्च रिजल्ट में इस विधेयक के बारे में खबरों का लगभग पूरी तरह से न होना हिंदुओं और उनके मुद्दों के प्रति गहरी उदासीनता को दर्शाता है। एक वैकल्पिक परिदृश्य की कल्पना करें: यदि भारत में मस्जिद या चर्च राज्य के नियंत्रण में होते, और उन्हें मुक्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया जाता, तो यह खबर न केवल भारतीय मीडिया में पूरी तरह छा जाती, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी इसे हफ्तों तक बड़े पैमाने पर कवर करता। यदि ऐसा कोई विधेयक इसी तरह से अटका होता, तो पश्चिमी मीडिया और वैश्विक बौद्धिक संस्थान इसे “अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन” करार देते, जिससे भारत सरकार को संसद में विधेयक पर बहस करने के लिए अंततः मजबूर होना पड़ता। लेकिन सत्यपाल सिंह के विधेयक के मामले में, यह मुद्दा बिना किसी हलचल के चुपचाप गायब हो गया, क्योंकि यहाँ बात हाशिये पर पड़े हिंदुओं के धार्मिक संस्थानों के लिए स्वायत्तता की मांग से जुड़ी है। और जहां बात हिंदुओं की आती है, वहाँ कोई भी मीडिया या बुद्धिजीवी तंत्र उस प्रकार की मुस्तैदी नहीं दिखता।

आगे की राह

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब भारत के हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो जाएँगे, तब इनका क्या होगा। यानि इन्हें किन इकाइयों द्वारा और किस प्रकार से संचालित किया जाएगा? कई प्रमुख मंदिर, विशेष रूप से दक्षिण भारत में, स्वतंत्रता के बाद से या कुछ मामलों में उससे भी पहले से, राज्य के नियंत्रण में हैं। इसलिए, यह केवल मूल मंदिर समितियों को प्रशासन सौंपने का मामला नहीं है, क्योंकि इनमें से कई समितियाँ तो अब मौजूद ही नहीं हैं।

इस मामले को लेकर अलग अलग मत हैं। कुछ हिंदुओं का मानना ​​है कि मंदिरों का प्रबंधन पारंपरिक रूप से किया जाना चाहिए, वैदिक काल के दौरान स्थापित मानदंडों का पालन करते हुए, प्रत्येक मंदिर के साथ ऐतिहासिक रूप से जुड़े जाति-आधारित नियमों के अनुसार प्रबंधन किया जाना चाहिए। कई प्रमुख हिंदू मंदिरों, विशेष रूप से दक्षिण भारत स्थित मंदिरों में, इस बारे में बहुत विशिष्ट नियम हैं कि कौन अनुष्ठान कर सकता है। आम धारणा के विपरीत, ब्राह्मणों के पास हमेशा ये विशेषाधिकार नहीं होते हैं; वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है, क्योंकि प्रत्येक मंदिर पारंपरिक रूप से एक विशेष जाति से जुड़ा हुआ है। यह जटिल प्रणाली इन मंदिरों के प्रबंधन में अंतर्निहित गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को दर्शाती है।

हिंदुओं का एक अन्य समूह मानता है कि मंदिरों का प्रबंधन आधुनिक समय की संस्थाओं की तरह किया जाना चाहिए, जिसमें कॉर्पोरेट प्रशासन के तत्व शामिल हों। यह दृष्टिकोण ज़ोर पकड़ रहा है, खास तौर पर हिंदू धर्म पर बढ़ते आक्रामक हमलों और भारत में हिंदुओं के बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के मद्देनजर। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का तर्क है कि मंदिरों का एक राजनीतिक प्रयोजन भी होना चाहिए, उन्हें सामुदायिक विकास पहलों को वित्तपोषित करने के लिए वित्तीय रूप से मज़बूत बनना चाहिए – जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, हिंदू संस्कृति का प्रचार-प्रसार और धार्मिक कला, संगीत और सांस्कृतिक रूपों का संरक्षण।

समाधान संभवतः इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं है। 21वीं सदी में, हिंदू मंदिरों को कुछ हद तक कॉर्पोरेट प्रशासन को अपनाने और इस सिस्टम से आने वाली धनराशि का उपयोग हिंदू समुदाय के विकास के लिए करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, अब समय आ गया है कि भारत के मंदिर हिंदू समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक केंद्र बिंदु बनकर उभरें। यह सब धार्मिक सिद्धांतों से समझौता किए बिना हासिल किया जा सकता है। पारंपरिक नियम-प्रक्रिया का पालन करते हुए पूजा और अनुष्ठानों का तंत्र ज्यों का त्यों बना रहना चाहिए, लेकिन जहां बात हिंदू मंदिरों के प्रबंधन और प्रचार प्रसार की आती है, उस परिपेक्ष्य में आधुनिक और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने से हिचकना नहीं चाहिए।

अमेरिकी लेखक और शोधकर्ता Stephen Knapp वैदिक संस्कृति और आध्यात्मिकता पर अपने लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर कई नवीन सुझाव दिये हैं। लेख के अंत में इनमें से कुछ सुझाव हम आपके साथ साझा कर रहे हैं:

  • वैदिक परंपराओं और दर्शन की बेहतर समझ को सक्षम करने के लिए सभी आयु समूहों के लिए नियमित मंदिर कक्षाएं।
  • कक्षाओं का पाठ्यक्रम शुरू में योग, आयुर्वेद, ज्योतिष और वास्तु जैसे लोकप्रिय विषयों के इर्द-गिर्द घूमना चाहिये। यह रणनीति लोगों के मन में हिंदू धर्म के प्रति जिज्ञासा पैदा करने का एक अच्छा तरीका है, क्योंकि आम लोग पहले से ही इन विषयों से अवगत हैं।
  • मंदिरों में नियमित रूप से संस्कृत भाषा सीखने के लिए विभिन्न स्तरों पर कक्षायें होनी चाहिएँ।
  • मंदिर के पुजारियों को वैदिक परंपराओं और आधुनिक शिक्षा दोनों में अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • मंदिरों को युवा-केंद्रित गतिविधियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी वैदिक संस्कृति और परंपराओं से जुड़ सके।
  • मंदिरों को युवाओं के लिए तरह तरह की रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन करनी चाहिए, जैसे कि कहानी सुनाने के सत्र, नाटक मंचन, उन्हें पवित्र महाकाव्यों की कहानियों पर वीडियो देखने, वैदिक सिद्धांतों पर कार्यशालाएँ और मंत्र और श्लोक जपने के लिए प्रेरित करना।
  • मंदिर प्रदर्शनी, उपहार की दुकानें, आउटरीच कार्यक्रम, आध्यात्मिक पुस्तकालय, सहायता समूह, आदि।[16]
संदर्भ 

[1] HJS’s Campaign to Free Hindu Temples from Government Control – Sanatan Prabhat;  https://sanatanprabhat.org/english/80485.html

[2] Free Hindu Temples – Hindu Janajagruti Samiti;  https://www.hindujagruti.org/free-hindu-temples

[3] Survey: Some 625 acres of temple land encroached in Karnataka | Bengaluru News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/city/bengaluru/survey-some-625-acres-of-temple-land-encroached-in-karnataka/articleshow/98376442.cms?from=mdr

[4] Free Hindu Temples – Hindu Janajagruti Samiti;  https://www.hindujagruti.org/free-hindu-temples

[5]   Articles | #ReclaimTemples;  https://reclaimtemples.com/articles/

[6] Reclaim Temples (@ReclaimTemples) / X;  https://x.com/ReclaimTemples?ref_src=twsrc%5Egoogle%7Ctwcamp%5Eserp%7Ctwgr%5Eauthor

[7] Welcome to SaveTemples.org! Mission to Protect and Preserve Hinduism and Hindu Temples Worldwide. | A project of Global Hindu Heritage Foundation [GHHF] USA; https://www.savetemples.org/post/welcome-to-the-global-hindu-heritage-foundation/1

[8] Sadhguru returns to ‘free temple’ movement >> Swadharma;  https://swadharma.in/sadhguru-returns-to-free-temple-movement/

[9]  (26) Free Hindu Temples from Govt Control – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=lua5F0T3m70&t=2

[10] J Sai Deepak makes five critical points during argument in Sabarimala temple priest appointment case  – Oneindia News; https://www.oneindia.com/india/j-sai-deepak-makes-five-critical-points-during-argument-in-sabarimala-temple-priest-appointment-case-3534830.html

[11]  Uttarakhand govt dissolves ‘Devasthanam Board’, scraps Act ahead of polls;    https://www.deccanherald.com/india/uttarakhand-govt-dissolves-devasthanam-board-scraps-act-ahead-of-polls-1056154.html

[12] Dhami govt finally announces dissolution of Devasthanam Board | Garhwal Post; https://garhwalpost.in/dhami-govt-finally-announces-dissolution-of-devasthanam-board/

[13] Shivraj Singh Chouhan starts to make good his promise of govt relinquishing control of Temple activities: Read about latest cabinet decision that would help priests;  https://www.opindia.com/2023/05/shivraj-singh-chouhan-mp-govt-big-step-free-hindu-temples-govt-control-cabinet-decision-priest-agriculture-land/

[14] Padmanabhaswamy Temple case: Supreme Court verdict on Sree Padmanabhaswamy Temple; All you need to know | India News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/sc-set-to-announce-on-sree-padmanabhaswamy-temple-all-you-need-to-know/articleshow/76932542.cms

[15] (27) Bill tabled to ‘Free’ Temples; Who behind this ‘Historic Wrong’? | India Upfront – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=MhYriyDFpsg

[16] Vedic Temples: Making Them More Effective; http://stephenknapp.info/vedic_temples_making_them_more_effective.htm

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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