भाषा की आड़ में सच की हत्या: जिहादी आतंक और प्रगतिशील मीडिया का दोहरा खेल

जब आतंकी मुस्लिम होता है, तब नाम छिपाए जाते हैं, संदर्भ बदले जाते हैं और भाषा निष्क्रिय बना दी जाती है, जबकि अन्य मामलों में मीडिया बिना हिचक पहचान, विचारधारा और सामूहिक दोषारोपण तक पहुँच जाता है।
  • आतंकी हमलों के बाद मुख्यधारा मीडिया अक्सर पहचान और विचारधारा को धुंधला करता है, खासकर जब हमलावर इस्लाम से जुड़े हों।
  • भाषा का चयन और देरी पीड़ितों से ध्यान हटाकर ज़िम्मेदारी को हल्का करने का काम करती है।
  • मुस्लिम भले आदमी” की कहानियों से मूल प्रश्न यानी वैचारिक प्रेरणा पर चर्चा टाली जाती है।
  • दोष स्थानांतरण कर हिंदुओं, श्वेतों या यहूदियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति दिखती है।
  • इस चयनात्मक पत्रकारिता से जनता कम सूचित रहती है और वास्तविक जोखिम समझने में चूक होती है।

जब भी दुनिया में कोई आतंकी हमला होता है, मीडिया की प्रतिक्रिया लगभग एक ही परिचित रास्ते पर आगे बढ़ती है। इस प्रक्रिया में एक अजीब-सी झिझक साफ़ महसूस की जा सकती है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील मुख्यधारा मीडिया में, यदि आरोपी इस्लाम से जुड़ा हो, तो उसका नाम और विचारधारात्मक संदर्भ बताने में स्पष्ट हिचक दिखाई देती है। दशकों से जारी इस्लामी आतंकवाद की भारी मानवीय कीमत के बावजूद, मीडिया की यह हिचक कम नहीं होती।

कई अवसरों पर यह झिझक इतनी बढ़ जाती है कि भाषा स्वयं ही यथार्थ को ढकने का साधन बन जाती है। इसका सबसे चर्चित उदाहरण 9/11 की अठारहवीं बरसी पर सामने आया, जब द न्यूयॉर्क टाइम्स  (The New York Times) ने यह लिखा कि “हवाई जहाज़ों ने ट्विन टावर्स पर निशाना साधा।” इस कथन में यह मूल तथ्य पूरी तरह अनुपस्थित था कि उन बोइंग विमानों को 19 अल-क़ायदा आतंकियों ने जानबूझकर इमारतों से टकराया था[1] वाक्य-विन्यास ऐसा था मानो विमान स्वयं किसी स्वायत्त हिंसक इच्छा से संचालित हो रहे हों।

इस प्रकार की भाषाई कसरत मात्र शब्दों का खेल नहीं है। इसका प्रत्यक्ष लाभ उन नेताओं और विचारकों को मिलता है जो आतंकवाद की ज़िम्मेदारी को कमज़ोर या अस्पष्ट करने का प्रयास करते हैं। अमेरिकी सांसद इल्हान उमर द्वारा 9/11 जैसे भीषण आतंकी हमले को “कुछ लोगों ने कुछ किया[2] कहकर निरर्थक बना देना इसी मानसिकता का उदाहरण है। जब मीडिया स्वयं तथ्यों को धुंधला करता है, तो ऐसे वक्तव्य अधिक सहज और स्वीकार्य प्रतीत होने लगते हैं।

यह प्रवृत्ति किसी एक समाचार पत्र या चैनल तक सीमित नहीं है। अमेरिका में द वॉशिंगटन पोस्ट (The Washington Post), सीएनएन  (CNN) और बीबीसी (BBC) के अमेरिकी संस्करणों में यह पैटर्न बार-बार दिखाई देता है। भारत में भी द हिंदू (The Hindu) , द टाइम्स ऑफ़ इंडिया  (The Times of India) और द इंडियन एक्सप्रेस  (The Indian Express) जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों में जिहादी हिंसा की रिपोर्टिंग करते समय स्पष्टता के स्थान पर ऐसी सतर्कता अपनाई जाती है, जो धीरे-धीरे टालमटोल में बदल जाती है। 1993 के मुंबई बम धमाकों में 257 लोगों की हत्या के दोषी याक़ूब मेमन की फांसी के बाद द इंडियन एक्सप्रेस  की सुर्ख़ी—“और उन्होंने याक़ूब मेमन को फांसी दे दी”—इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है, जहाँ भाषा निंदा के बजाय सहानुभूति की ओर झुकती हुई प्रतीत हुई[3]

हालिया बॉन्डी बीच हमला भी इसी क्रम को आगे बढ़ाता है। सिडनी में हानुक्का समारोह के दौरान हुए इस आतंकी हमले में 16 लोगों की हत्या और 30 से अधिक के घायल होने के बावजूद, मुख्यधारा मीडिया ने लंबे समय तक हमलावरों की पहचान उजागर नहीं की। सोशल मीडिया पर तथ्य सामने आने के बाद ही यह स्वीकार किया गया कि हमलावर मुस्लिम पिता-पुत्र थे—साजिद अकरम और नावीद अकरम।

इन घटनाओं को अलग-अलग प्रकरणों के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस निरंतर प्रयास को दर्शाती हैं, जिसके अंतर्गत इस्लाम को उसके सबसे हिंसक अनुयायियों से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है, भले ही इसके लिए सत्य और स्पष्टता की कीमत क्यों न चुकानी पड़े। ऐसी मीडिया-प्रवृत्ति पत्रकारिता के मूल उद्देश्य के विपरीत है। यह जनता को अधूरी और विकृत जानकारी देती है और अंततः उस सोच को बल देती है, और जिसमें हिंसा करने वाले यह मानने लगते हैं कि वे उत्तरदायित्व से बच सकते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में आगे पाँच नियम प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो यह समझने में सहायक होंगे कि कट्टर इस्लाम और मुख्यधारा मीडिया के बीच यह असहज गठजोड़ किस प्रकार कार्य करता है और इसके पीछे की मानसिक संरचना क्या है।

पहला नियम

किसी आतंकी हमले के बाद मीडिया जितनी देर से आतंकियों की पहचान स्पष्ट करता है, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि हमलावर मुस्लिम हों।

आज के दौर में यह केवल संयोग नहीं, बल्कि आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए मीडिया की लगभग तयशुदा कार्यप्रणाली बन चुकी है। जैसे ही कोई हमला होता है, तथ्यों को सीधे और स्पष्ट रूप से सामने रखने के बजाय पहचान को धुंधला किया जाता है, शब्दों का चयन सावधानी से किया जाता है, और मूल प्रश्नों को टाल दिया जाता है।

पेरिस में हुए उस हमले को ही लें, जहाँ एक कट्टरपंथी मुस्लिम पुलिसकर्मी ने अपने ही चार सहकर्मियों की हत्या कर दी और दो अन्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस अत्यंत गंभीर घटना के बावजूद, कई घंटों तक मुख्यधारा मीडिया हमलावर को केवल “एक सरकारी कर्मचारी” कहकर संबोधित करता रहा। उसकी धार्मिक पहचान, उसका वैचारिक झुकाव और कट्टरपंथ की ओर उसका झुकाव जानबूझकर चर्चा से बाहर रखा गया। जब सोशल मीडिया पर तथ्य सामने आने लगे और दबाव बढ़ा, तब जाकर यह स्वीकार किया गया कि वह व्यक्ति एक मुस्लिम।[4]

दूसरा नियम

किसी इस्लामी आतंकी हमले के बाद मीडिया प्रायः तुरंत ध्यान भटकाने के लिए किसी “मुस्लिम भले आदमी” की तलाश में जुट जाता है।

बॉन्डी बीच आतंकी हमले के बाद यही पैटर्न देखने को मिला। जब हमलावरों की इस्लामी पहचान को छिपाना असंभव हो गया, तब जाकर मीडिया ने अपना फोकस अचानक बदला। अब खबरों का केंद्र यह बना दिया गया कि एक अरब मूल के युवक, अहमद अल-अहमद, ने साहस दिखाते हुए नावीद अकरम को काबू में किया और उसके हथियार छीन लिए।[5] इसमें संदेह नहीं है कि अल-अहमद ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई लोगों की जान बचाई। उनके माता-पिता हाल ही में सीरिया से शरणार्थी के रूप में आए थे और उनका साहस निस्संदेह सराहनीय है।

लेकिन समस्या उनकी बहादुरी को सामने लाने में नहीं थी। समस्या यह थी कि मीडिया और उदारवादी टिप्पणीकारों ने इस घटना को एक सुविधाजनक मोड़ की तरह इस्तेमाल किया। बहुत जल्द पूरी बहस इस वाक्य पर आकर टिक गई: “सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते।” यह कथन अपने आप में सही हो सकता है, लेकिन इस तरह की प्रस्तुति भ्रामक है, क्योंकि यह मूल प्रश्न से ध्यान हटा देती है। वह असहज सच्चाई यह है कि समकालीन वैश्विक आतंकी हिंसा का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस्लामवादी विचारधारा के नाम पर अंजाम दिया गया है। परन्तु मीडिया इस तथ्य से बचने के लिए बार-बार भावनात्मक उदाहरणों और व्यक्तिगत कहानियों का सहारा लेता है।

तीसरा नियम

जहाँ भी संभव हो, दोष मुसलमानों से हटाकर किसी आसान लक्ष्य पर डाल दिया जाएगा, जैसे कि हिंदू , श्वेत व्यक्ति या यहूदी।
अप्रैल 2013 में बोस्टन मैराथन बम धमाकों के बाद यही प्रवृत्ति सामने आई। एफबीआई वास्तविक हमलावरों की तलाश कर रही थी, तभी एक भारतीय-अमेरिकी छात्र, सुनील त्रिपाठी, को ग़लती से संदिग्ध मान लिया गया। अवसाद से जूझ रहे त्रिपाठी के बारे में झूठी अफ़वाहें रेडिट पर फैलीं और कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने उन्हें बिना पर्याप्त जांच के आगे बढ़ा दिया।[6] लेखिका तसलीमा नसरीन ने, जो बांग्लादेश में जिहादियों के खतरे के कारण भारत में शरण ले चुकी थीं, इस संभावना पर ट्वीट किया कि यदि बम हमले के पीछे कोई हिंदू निकला तो वह खुशी से नाचेंगी। उस समय तक सुनील त्रिपाठी एक महीने से लापता थे। बाद में, जब असली हमलावर, चेचन मूल के दो मुस्लिम भाई, पहचाने गए, तब जाकर त्रिपाठी का शव बरामद हुआ।

इसी मानसिकता को अगले ही दिन सैलॉन  पत्रिका के स्तंभकार डेविड सिरोटा ने खुलकर व्यक्त किया, जब उन्होंने लिखा कि “उम्मीद है बम हमले के पीछे कोई श्वेत अमेरिकी हो।[7] उनका तर्क था कि श्वेत आतंकियों को आमतौर पर “लोन वुल्फ़” माना जाता है और उनके कृत्यों के लिए पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जाता।

भारत में भी 26/11 मुंबई हमलों के बाद ,स्पष्ट पाकिस्तानी संलिप्तता के अकाट्य प्रमाणों के बावजूद, कुछ नेताओं, फ़िल्मकारों और पत्रकारों ने आरएसएस (RSS) पर आरोप मढ़कर हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। एक पुस्तक के विमोचन अवसर पर, जो उपयुक्त रूप से मुंबई के इस्लामिक जिमखाना में आयोजित किया गया था, कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि “गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्से…बहुसंख्यक आतंकवाद के गढ़ बन चुके हैं।[8]

चौथा नियम

यदि कोई आतंकवादी या गंभीर अपराधी हिंदू, ईसाई या यहूदी पृष्ठभूमि से धर्मांतरित होकर इस्लाम अपनाता है, तो मीडिया उसकी पहचान लगभग हमेशा उसके पुराने नाम से ही करता है।

यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित रणनीति है। इसका उद्देश्य यह स्थापित करना होता है कि “आतंक का कोई धर्म नहीं होता,” भले ही उपलब्ध तथ्य और संदर्भ इसके ठीक विपरीत संकेत क्यों न दें। नामों का यह चयन महज़ तकनीकी विवरण नहीं, बल्कि एक वैचारिक औज़ार बन जाता है, जिसके ज़रिये वास्तविकता को आंशिक रूप से छिपाया जाता है।

15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस ने एक आतंकवाद-रोधी अभियान में चार आतंकवादियों—इशरत जहाँ रज़ा, अमजद अली राणा, ज़ीशान जौहर और जावेद ग़ुलाम शेख—को मार गिराया। जाँच में यह स्पष्ट हुआ कि ये सभी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे और तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बना रहे थे। जावेद ग़ुलाम शेख केरल के एक हिंदू, गोपीनाथ पिल्लै, का पुत्र था। 1991 में उसने इस्लाम स्वीकार किया और साजिदा नामक मुस्लिम महिला से विवाह करने के लिए अपना नाम बदलकर जावेद शेख रख लिया।

इसके बावजूद, मीडिया ने उसे उसके नए मुस्लिम नाम से शायद ही कभी संबोधित किया। वह रिपोर्टिंग में लगातार “प्रणेश पिल्लै” ही बना रहा। इस नाम-चयन का प्रभाव स्पष्ट था। आतंकवादी की इस्लामी पहचान पृष्ठभूमि में चली गई और यह नैरेटिव मज़बूत हुआ कि हिंसा किसी विचारधारा या धार्मिक प्रेरणा से नहीं, बल्कि किसी अस्पष्ट व्यक्तिगत विचलन का परिणाम होती है। यही नहीं, एक दशक से अधिक समय बाद, जब शेख के पिता को हिंदू समाज के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणियों के कारण नायर सर्विस सोसाइटी के कोषाध्यक्ष पद से हटाया गया, तब टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह के एक अख़बार ने जावेद शेख को “गुजरात एनकाउंटर पीड़ित” के रूप में प्रस्तुत किया।[9]

पाँचवाँ नियम

भारत में जाँच के शुरुआती चरणों में, जब पुलिस किसी आतंकवादी या अपराधी की पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में होती है, तो अक्सर उसे एक सामान्य हिंदू नाम दे दिया जाता है। बाद में यदि यह स्पष्ट हो जाए कि आरोपी मुस्लिम है, तो मीडिया इस तथ्य को या तो नज़रअंदाज़ कर देता है या उसे कम महत्व देता है, और उसी पुराने हिंदू नाम का प्रयोग जारी रखता है।

2012 के ज्योति सिंह बलात्कार और हत्या मामले में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखी। पाँच आरोपियों में सबसे क्रूर अपराधी ने स्वयं को 17 वर्ष का बताकर नाबालिग होने का दावा किया, जबकि उसके पास कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं था। दिल्ली पुलिस ने उसे ‘राजू’ उपनाम दिया, और वर्षों तक वही उसकी पहचान बनी रही। सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं के प्रयासों के बाद ही यह सामने आया कि उसका वास्तविक नाम मोहम्मद अफ़रोज़ था।[10] इसके बावजूद, कई मीडिया संस्थान लंबे समय तक उसकी पहचान को दबाते रहे और उसे एक “भटके हुए” युवक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहे[11]

इसी तरह, बॉन्डी बीच नरसंहार के बाद, जब मुख्यधारा का मीडिया हमलावरों की पहचान उजागर करने में टालमटोल कर रहा था, तब सच्चाई सबसे पहले उन लोगों ने सामने रखी जो मुख्यधारा से बाहर थे: ब्रिटिश लेखक और कार्यकर्ता टॉमी रॉबिन्सन तथा डच राजनेता गीर्ट वाइल्डर्स जैसे लोग।[12] यह तथ्य अपने आप में बताता है कि सूचना देने की ज़िम्मेदारी क्यों और कैसे धीरे-धीरे पारंपरिक मीडिया से खिसककर अन्य मंचों की ओर स्थानांतरित हो रही है।

लोगों को जानने का अधिकार है

ऐसे हालात में यह कहना कि लोगों को घबराना नहीं चाहिए, व्यावहारिक नहीं है। जब दुनिया भर में मुसलमानों द्वारा किए गए आतंकी हमले, चाहे वे गैर-मुसलमानों के विरुद्ध हों या वास्तव में शांतिपूर्ण मुसलमानों के विरुद्ध, लगातार बढ़ते दिखाई दें, तो किसी नए हमले की ख़बर से भय उत्पन्न होना स्वाभाविक है। विशेष रूप से तब, जब आम लोग अपने बच्चों, परिजनों या मित्रों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हों, जो घटना-स्थल के आसपास हो सकते हैं। ऐसे क्षणों में लोग भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच के आधार पर निर्णय लेना चाहते हैं। दुर्भाग्यवश, ऐसी नाज़ुक परिस्थितियों में मीडिया अक्सर “राजनीतिक शुद्धता” के दबाव में चला जाता है और जनता से आवश्यक जानकारी साझा करने में हिचक दिखाता है।

लोगों को यह जानने का अधिकार है कि हमलावरों की वैचारिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक संबद्धता या धार्मिक पहचान क्या है। यह जानकारी किसी पूरे समुदाय को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि जोखिम को समझने और उससे बचाव के लिए आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी हमले में यह स्पष्ट हो कि हमलावर इस्लामवादी विचारधारा से प्रेरित हैं, तो लोग कुछ समय के लिए उन इलाकों से दूरी बना सकते हैं जहाँ और हमलावर सक्रिय हो सकते हैं। यदि किसी चर्च या मंदिर को निशाना बनाया गया हो, तो श्रद्धालु अतिरिक्त सतर्कता बरत सकते हैं या कुछ समय के लिए ऐसे स्थलों से दूर रहने का निर्णय ले सकते हैं। यदि चाकू से हमले बढ़ रहे हों, तो लोग सार्वजनिक स्थानों पर संदिग्ध गतिविधियों के प्रति अधिक सजग रह सकते हैं। और यदि कोई किशोर स्कूल में गोलीबारी कर रहा हो, तो अभिभावकों का स्कूल क्षेत्रों से बचना एक स्वाभाविक और जिम्मेदार प्रतिक्रिया होगी। यह सब भय फैलाने के उपाय नहीं हैं, बल्कि जोखिम कम करने की सामान्य और तार्किक रणनीतियाँ हैं।

वामपंथी और उदारवादी हलकों का यह तर्क अक्सर सामने आता है कि आतंकियों की पहचान उजागर करने से आम मुसलमानों पर प्रतिशोधी हमलों का खतरा बढ़ सकता है। सुनने में यह तर्क मानवीय लगता है, लेकिन व्यवहार में इसके ठोस प्रमाण नहीं मिलते। हिंदू, बौद्ध या पश्चिमी समाजों में सामूहिक प्रतिशोध की संस्कृति नहीं पाई जाती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 9/11 के बाद अमेरिका में देखने को मिला। 19 मुसलमानों द्वारा लगभग 3,000 न्यूयॉर्कवासियों की हत्या के बावजूद, अमेरिकी समाज ने मुसलमानों के खिलाफ व्यापक हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। कुछ गिनी-चुनी घटनाओं को छोड़ दें, तो किसी संगठित या सामूहिक बदले की स्थिति पैदा नहीं हुई। इसके विपरीत, अमेरिकी मुसलमान अपनी सुरक्षा को लेकर इतने आश्वस्त थे कि न्यूयॉर्क में ट्विन टावर्स के स्थल के पास एक मस्जिद बनाने का प्रयास तक किया गया, जिसे ‘ग्राउंड ज़ीरो मस्जिद’ कहा गया।[13]

गैर-मुसलमानों पर मुस्लिम हमलों पर मीडिया की चुप्पी

इसके उलट, जब किसी घटना में मुसलमान पीड़ित बताए जाते हैं, तो कई देशों में गैर-मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा भड़कने की घटनाएँ सामने आती हैं। 18 मार्च 2019 को नीदरलैंड्स के यूट्रेक्ट शहर में गोकमेन तानिस ने एक ट्राम स्टेशन पर यात्रियों पर गोलियाँ चलाईं, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई। तुर्की मूल के इस शरणार्थी ने कहा कि वह केवल तीन दिन पहले न्यूज़ीलैंड में मुसलमानों के नरसंहार का बदला लेना चाहता था। वस्तुतः, वह उसी देश के नागरिकों की हत्या करने को तैयार था, जिसने उसे शरणार्थी का दर्जा दिया था, ताकि वह तुर्की के सबसे ख़तरनाक प्रांतों में से एक, योज़गात, से दूर एक वास्तव में शांतिपूर्ण जीवन शुरू कर सके।[14]

इसी प्रकार, ईस्टर संडे के दिन श्रीलंका में 300 से अधिक ईसाइयों की हत्या भी की गई। यह नरसंहार संपन्न श्रीलंकाई मुसलमानों द्वारा अंजाम दिया गया, जिन्होंने दावा किया कि चर्चों में किए गए समन्वित बम धमाके न्यूज़ीलैंड में हुए नरसंहार के प्रतिशोध में थे।[15]

1992 में अयोध्या में एक विवादित मस्जिद के ध्वंस के कुछ ही घंटों बाद, पाकिस्तान और बांग्लादेश में आम मुसलमानों की भीड़ ने हिंदू मंदिरों पर हमले किए और उन्हें आग के हवाले कर दिया। केवल पाकिस्तान में ही 120 से अधिक हिंदू मंदिर नष्ट कर दिए गए।[16] लाहौर में हज़ारों लोग एक बुलडोज़र के साथ चल पड़े और एक हिंदू मंदिर को गिरा दिया। भीड़ ने छह अन्य मंदिरों में आग लगा दी और एयर इंडिया के कार्यालय पर भी हमला किया। इन घटनाओं में केवल हिंदू मंदिर ही नहीं, बल्कि कई चर्च भी नष्ट किए गए।

ऐसे समयों में मुख्यधारा के मीडिया को गैर-मुसलमानों की सुरक्षा को लेकर कोई विशेष संकोच या चिंता दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत, उनकी रिपोर्टिंग अक्सर एक तरह की उन्मादपूर्ण सक्रियता का रूप ले लेती है। वे नियमित रूप से “हिंदू चरमपंथी[17] जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं और कई बार ऐसा प्रतीत होता है मानो वे जानबूझकर हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा को भड़काने वाली भाषा अपना रहे हों।

बहुत कम अवसरों पर पीड़ितों को मीडिया से सीधे सवाल करने का मौका मिलता है। ऐसा ही एक दुर्लभ क्षण तब सामने आया, जब बॉन्डी बीच पर हानुक्का कार्यक्रम के दौरान घायल हुए एक व्यक्ति की बेटी विक्टोरिया टेप्लित्स्की एबीसी न्यूज़ ब्रेकफास्ट कार्यक्रम में उपस्थित हुईं। उनके पिता, 86 वर्षीय होलोकॉस्ट सर्वाइवर, के पैर में गोली लगी थी। टेप्लित्स्की ने कार्यक्रम के एंकरों का सीधे सामना करते हुए एबीसी से आग्रह किया कि वह इज़राइल को लेकर अपनी “पक्षपाती रिपोर्टिंग” बंद करे। उनका तर्क था कि 7 अक्टूबर 2023 के बाद से इस तरह की रिपोर्टिंग ने यहूदी ऑस्ट्रेलियाइयों के बीच यहूदी-विरोधी भावना और सामाजिक अलगाव को बढ़ावा दिया है[18]

इस प्रकार के आरोप मीडिया पक्षपात को लेकर व्यापक चिंताओं की ओर संकेत करते हैं। एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व संवाददाता मैटी फ़्रीडमैन ने दस्तावेज़ी रूप से दिखाया है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज किस प्रकार इज़राइल की कार्रवाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है, जबकि हमास जैसे संगठनों से उत्पन्न खतरों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। यह दोहरा मानदंड अन्य संघर्षों में देखने को नहीं मिलता[19]

हॉनेस्ट रिपोर्टिंग जैसे मीडिया निगरानी संस्थानों ने भी चयनात्मक चुप्पी और दानवीकरण के ऐसे पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया है, जो यहूदी-विरोधी भावना को बढ़ावा देते हैं। अपनी एक रिपोर्ट में संस्था ने कहा है कि[20]:

  • ऑस्ट्रेलियाई यहूदी समुदाय को निशाना बनाने वाला आतंकी हमला किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि वर्षों से पनप रही यहूदी-विरोधी घृणा की परिणति था।
  • हमले की मीडिया कवरेज में पीड़ितों की बजाय हमलावरों पर अधिक ध्यान दिया गया, जिससे अपराध की गंभीरता कमतर होकर सामने आई।
  • यहूदी-विरोध और आतंकवाद को स्पष्ट रूप से नाम देने से इनकार कर, प्रमुख मीडिया संस्थानों ने एक प्रकार की नैतिक उलटबांसी को बढ़ावा दिया, जिससे हिंसा के लक्षित स्वरूप को छिपाया गया और वही परिस्थितियाँ मज़बूत हुईं जिनमें ऐसे हमले बार-बार होते हैं।

7 अक्टूबर 2023 के बाद वैश्विक स्तर पर बढ़ती यहूदी-विरोधी भावना की पृष्ठभूमि में, यह एकतरफ़ा झुकाव दिखाता है कि पक्षपाती और विकृत नैरेटिव किस प्रकार वास्तविक दुनिया में न केवल यहूदी समुदायों, बल्कि अन्य गैर-मुस्लिम समूहों को भी गंभीर क्षति पहुँचा सकते हैं।

निष्कर्ष

एक समय था जब खबर पाने का पहला और सबसे भरोसेमंद स्रोत मुख्यधारा का मीडिया माना जाता था। आज यह स्थिति काफी हद तक बदल चुकी है। दुनिया के अनेक हिस्सों में मुख्यधारा के मीडिया संस्थान पीड़ितों के प्रति स्पष्ट संवेदना दिखाने के बजाय, आतंकवादियों की पहचान और उनकी प्रेरणा को धुंधला करने में अधिक रुचि लेते दिखाई देते हैं, विशेषकर इस्लामी आतंकवाद के मामलों में। दोहरे मानकों और चयनात्मक चुप्पी से लोग थक चुके हैं। जब असंवेदनशील एंकर और गैर-जिम्मेदार विश्लेषक उस समय भी तथ्यों को ढकने की कोशिश करते हैं जब हालात स्पष्ट रूप से गंभीर हों, तो जनता का भरोसा टूटना स्वाभाविक है।

यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में लोग ताज़ा खबरों के लिए बीबीसी या सीएनएन जैसे पारंपरिक माध्यमों की ओर नहीं देखते। वे वैकल्पिक स्रोतों और सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं, जहाँ सूचनाएँ राजनीतिक फ़िल्टर के बिना अधिक सीधे रूप में सामने आती हैं। यह बदलाव किसी साजिश का परिणाम नहीं, बल्कि उस रिक्तता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, जो मुख्यधारा मीडिया ने स्वयं पैदा की है। स्पष्टता, ईमानदारी और समय पर जानकारी ही वह आधार है जिस पर जनता का विश्वास टिका होता है, और आज उसी की सबसे अधिक कमी महसूस की जा रही है।

सन्दर्भ सूची

[1] New York Times Deletes Tweet Saying “Airplanes Took Aim” at Towers on 9/11. New York Post, September 11, 2019. https://nypost.com/2019/09/11/new-york-times-deletes-tweet-saying-airplanes-took-aim-at-towers-on-9-11/

[2] 9/11 Anniversary Mourner Who Lost Mother Criticizes Ilhan Omar’s “Some People Did Something” Comment. Fox News, September 11, 2019. https://www.foxnews.com/us/9-11-anniversary-mourner-who-lost-mother-in-attacks-criticizes-ilhan-omars-some-people-did-something-comment

[3] 1993 Serial Blasts Convict Executed: They Hanged Yakub Memon. The Indian Express, July 30, 2015. https://indianexpress.com/article/india/india-others/1993-serial-blasts-convict-executed-and-they-hanged-yakub-memon/

[4] 4 People Killed by Knife-Wielding Attacker at Paris Police Headquarters. NPR, October 3, 2019. https://www.npr.org/2019/10/03/766770627/4-people-killed-by-knife-wielding-attacker-at-paris-police-headquarters

[5] Bondi Beach Attack: Bystander Hero Recounts Chaos After Hanukkah Gathering Shooting. CNN, December 15, 2025. https://edition.cnn.com/2025/12/15/australia/bondi-beach-shooting-bystander-hero-intl-hnk

[6] Sunil Tripathi: A Hindu Man Wrongly Accused After the Boston Marathon Bombing. Reddit, r/IndiaSpeaks. https://www.reddit.com/r/IndiaSpeaks/comments/y4lb9x/sunil_tripathi_a_hindu_man_was_wrongly/

[7] Greenwald, Glenn. Let’s Hope the Boston Marathon Bomber Is a White American. Salon, April 16, 2013. http://www.salon.com/2013/04/16/lets_hope_the_boston_marathon_bomber_is_a_white_american/

[8] 26/11: Digvijaya Singh Flags It Off Again, This Time in Mumbai. The Indian Express, November 30, 2008. https://indianexpress.com/article/news-archive/web/rss-26-11-digvijaya-flags-it-off-again-this-time-in-mumbai/

[9] Narendra Modi Critic Gopinatha Pillai Removed from Nair Community Outfit. The Economic Times, January 7, 2014. https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/narendra-modi-critic-gopinatha-pillai-removed-from-nair-community-outfit/articleshow/28736886.cms

[10] Profile: Mohammed Afroz. TheyWillKillYou.com. https://theywillkillyou.com/profile/mohammed-afroz

[11] Delhi Gangrape Case: Juvenile Takes Up Painting in Reform Home. Firstpost, January 18, 2014. https://www.firstpost.com/living/delhi-gangrape-case-juvenile-takes-paintings-reform-home-1693043.html

[12] Robinson, Tommy. Post on Media Response to the Bondi Attack. X (formerly Twitter), December 2025. https://x.com/TRobinsonNewEra/status/2000497742376808448

[13] Park51. Wikipedia. https://en.wikipedia.org/wiki/Park51

[14] Who Is Gokmen Tanis? Utrecht Shooting Suspect Arrested After Killing Three. International Business Times, March 18, 2019. https://www.ibtimes.com/who-gokmen-tanis-utrecht-netherlands-shooting-suspect-arrested-after-killing-3-2776858

[15] Sri Lanka: ISIL Mastermind Behind Easter Sunday Bombings. Al Jazeera, October 5, 2021. https://www.aljazeera.com/news/2021/10/5/sri-lanka-isil-mastermind-easter-sunday-bombings

[16] Hindus. Minority Rights Group International. https://minorityrights.org/communities/hindus-2/

[17] Pakistan’s Disappearing Temples and Churches. Deutsche Welle, November 27, 2012. https://www.dw.com/en/pakistans-disappearing-temples-and-churches/a-16424654

[18] Bondi Attack Victim’s Daughter Slams ABC Media Bias, Politicians. Daily Caller, December 16, 2025. https://dailycaller.com/2025/12/16/bondi-attack-victim-daughter-victoria-teplitsky-slams-abc-media-bias-politicians/

[19] Journalist Matti Friedman Exposes Media Bias Against Israel. American Jewish Committee, podcast. https://www.ajc.org/news/podcast/journalist-matti-friedman-exposes-media-bias-against-israel

[20] Years of Ignored Antisemitism Led to Terror in Australia—and the Media Helped Normalize It. HonestReporting. https://honestreporting.com/years-of-ignored-antisemitism-led-to-terror-in-australia-and-the-media-helped-normalize-it/

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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