टैगोर की हिंदू अस्तित्व के बारे में कड़वी सच्चाइयाँ: बांग्लादेशी हिंदुओं के निरंतर उत्पीड़न का कारण

बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न से यह सवाल उठता है कि बार-बार की हिंसा के बावजूद यह समुदाय वहाँ क्यों बना हुआ है। रवींद्रनाथ टैगोर की धार्मिक विभाजन और हिंदू एकता की आवश्यकता पर दी गई चेतावनियाँ समुदाय के अस्तित्व के खतरों को उजागर करती हैं, और धर्मनिरपेक्षता व प्रतिरोध पर पुनर्विचार की मांग करती हैं।
  • बांग्लादेश के हिंदुओं को लगातार हिंसा और धार्मिक वैमनस्य का सामना करना पड़ता है। यह वही स्थिति है जिसे टैगोर ने अपरिहार्य बताया था।
  • रवींद्रनाथ टैगोर ने धार्मिक विभाजन और हिंदुओं में एकता न होने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि ये समस्याएं बांग्लादेश जैसे क्षेत्रों में हिंदुओं के लिए अस्तित्व का संकट पैदा करेंगी।
  • लगातार हो रही हिंसा के बावजूद, कई हिंदू बांग्लादेश में ही बने रहते हैं। इसका कारण सांस्कृतिक जड़ता, अपने देश से लगाव और अन्य विकल्पों की कमी इत्यादि हैं।
  • हिंदू समुदाय ने उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा पर बेहद धीमी प्रतिक्रिया दी है। इसे “उबलते मेंढक सिंड्रोम” के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसमें खतरा तब पहचाना जाता है जब बहुत देर हो चुकी होती है।
  • भारत, जो हिंदुओं के लिए स्वाभाविक शरणस्थली है, ने बांग्लादेशी हिंदुओं को अपनी सीमा में सुरक्षा पाने के लिए बहुत कम समर्थन या प्रोत्साहन दिया है, जिससे वे लगातार उत्पीड़न का शिकार होते रहते हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं को निशाना बनाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह इस्लामी देश की हिंदुओं के प्रति गहरी जमी हुई दुश्मनी का परिणाम है। यह उतना ही निश्चित है जितना कि रात के बाद दिन का आना। बांग्लादेश में गैर-मुसलमानों, विशेषकर हिंदुओं, का उत्पीड़न कोई नई घटना नहीं है। इसका इतिहास 1950 के पूर्वी पाकिस्तान दंगों[1] और 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ा हुआ है, जब हिंदुओं को जातीय और राजनीतिक संघर्षों के बीच खास तौर पर निशाना बनाया गया था। इस्लामी कट्टरपंथ, जो दशकों से कायम है और समय के साथ और अधिक बढ़ा है, इस हिंसा के पीछे का मुख्य कारण रहा है।[2]

हाल की हिंसा में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने आग में घी का काम किया है। बांग्लादेश में हिंदुओं को अक्सर बाहरी और तुच्छ समझा जाता है। उन्हें “काफिर” और “मूर्तिपूजक” मानना या उन्हें अवामी लीग का समर्थक बताना, राजनीतिक अस्थिरता के दौर में उनके खिलाफ हिंसा को और बढ़ावा देता है।

हिंदुओं का निरंतर उत्पीड़न कुछ अहम सवाल उठाता है। पहला, जब 1947 में बंगाल का विभाजन हुआ और बांग्लादेश (तब का पूर्वी पाकिस्तान) मुसलमानों को दे दिया गया, तब हिंदुओं ने देश क्यों नहीं छोड़ा? दूसरा, इतनी हिंसा और अत्याचार सहने के बाद भी वे क्यों बांग्लादेश में बने रहे? क्यों वे सामूहिक रूप से भारत, जो हिंदुओं का प्राकृतिक घर है, जाने के बजाय वहीं रहने का जोखिम उठा रहे हैं?

इन सवालों का उत्तर आसान नहीं है। एक बड़ा कारण मानव स्वभाव की जड़ता है। लोग उन्हीं कस्बों और गांवों में रहना पसंद करते हैं, जहां उनके पूर्वज सदियों से रह रहे हैं। कहावत भी है कि “घर जैसा कोई स्थान नहीं होता।” बांग्लादेश के हिंदुओं को अपने स्थान पर बने रहने का अधिकार तो है, परंतु अस्तित्व के खतरों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। जैसे कि एक भयानक चक्रवात के दौरान अपने घर में रहना आत्महत्या के समान होता है, वैसे ही जब आपके गांव या शहर पर ऐसे लोग कब्जा कर लें, जो आपकी धार्मिक मान्यताओं और पूजा स्थलों को नकारते हों, तो बाहर निकलना ही सही विकल्प होता है।

हिंदू समुदाय इस्लामी जिहाद के खतरे को क्यों नहीं समझ पा रहा, इसका एक कारण “उबलते मेंढक सिंड्रोम” है[3]। इसका मतलब यह है कि अगर एक मेंढक को अचानक उबलते पानी में डाला जाए, तो वह तुरंत कूदकर खुद को बचा लेगा। लेकिन अगर उसे गुनगुने पानी में धीरे-धीरे डाला जाए और तापमान बढ़ाया जाए, तो वह खतरे को महसूस नहीं करेगा और धीरे-धीरे पक जाएगा। मेंढक शुरुआत में गर्मी को सहन करने की कोशिश करता है, यह सोचते हुए कि यह बदलाव सामान्य है। लेकिन जब तापमान अचानक तेज़ी से बढ़ता है, तब उसे अहसास होता है कि उसने अपनी मृत्यु पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। तब तक वह अपनी शक्ति खो चुका होता है और बाहर कूदने की क्षमता नहीं बचती। हिंदू समाज भी इसी धीमे बदलाव को सहन कर रहा है, और जब तक उसे खतरे का पूरी तरह से एहसास होगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

हिंदुओं में सामूहिक रूप से यह विश्वास बन गया है कि 1950 और 1971 के नरसंहार जैसी घटनाएं फिर से नहीं होंगी, भले ही यह कितना भी तर्कहीन प्रतीत हो। इस सोच का एक प्रमुख कारण यह है कि हिंदू समुदाय इस्लाम और ईसाई धर्म की वास्तविकता को ठीक से समझ नहीं पाता। यह अब्राहमिक धर्म केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं को बनाए रखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अन्य धर्मों के खिलाफ नफरत, भेदभाव और हिंसा को भी प्रोत्साहित करते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म की गहरी समझ के अभाव में, हिंदू समुदाय इन धर्मों के अनुयायियों से उत्पन्न होने वाले खतरों का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हो पाता।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत की ओर से बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए कोई आकर्षण का कारण नहीं है। भले ही भारत हिंदुओं का स्वाभाविक शरणस्थल है, फिर भी यह उन्हें आपातकालीन आश्रय, आर्थिक सहायता या रोजगार जैसी मदद उपलब्ध नहीं कराता। मुसलमानों के लिए दशकों तक 2018 तक हज सब्सिडी दी जाती रही, जिसकी राशि लगभग 650 करोड़ रुपये थी, और यही धनराशि बांग्लादेश के हिंदू शरणार्थियों की मदद के लिए पर्याप्त हो सकती थी[4]। लेकिन लेखक आनंद रंगनाथन के अनुसार, भारत में हिंदू “आठवें दर्जे के नागरिक” हैं[5]। यदि आप बांग्लादेश से अवैध मुस्लिम प्रवासी या म्यांमार से रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी हैं, तो आपकी भारतीय नागरिकता जल्दी मिल जाती है, लेकिन हिंदुओं के लिए ऐसा कोई त्वरित प्रक्रिया नहीं है।

टैगोर की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह

बांग्लादेश के हिंदू यदि बंगाल के महान कवि और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह को आत्मसात करते, तो शायद वे हिंसा और भेदभाव से बच सकते थे। टैगोर भले ही आज के परिप्रेक्ष्य में एक सेक्युलर व्यक्तित्व माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने भारतीय मुसलमानों की मानसिकता को गहराई से समझा था। वे यह जानते थे कि भारतीय मुसलमानों की वफादारी आसानी से भटक सकती है। जैसे कि मोरक्को का मुसलमान अपने देश के प्रति वफादार होता है, लेकिन अधिकतर भारतीय मुसलमानों के लिए हिंदू-बहुल भारत उनकी पहली प्राथमिकता नहीं है। उनकी वफादारी अफगानिस्तान और उस्मानी तुर्की जैसे इस्लामी देशों की ओर अधिक झुकी रहती है, जैसा कि खलीफत आंदोलन के समय भारतीय मुसलमानों की प्रतिक्रिया से स्पष्ट था। वो हजारों मील डोरी पर स्थित तुर्की खलीफत के लिए लड़ने को उत्सुक थे, परंतु अपने हिंदू पड़ोसियों के खिलाफ जिहाद छेड़ने में कभी पीछे नहीं हटे। टैगोर के मत में, यह धार्मिक मेलजोल के मार्ग में एक विशाल अवरोध था।

1924 में, टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए एक साक्षात्कार में टैगोर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “मुसलमान अपनी देशभक्ति को किसी एक देश तक सीमित नहीं कर सकते। मैंने उनसे स्पष्ट रूप से पूछा था कि यदि कोई मुस्लिम शक्ति भारत पर आक्रमण करती है, तो क्या वे अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ खड़े होकर अपने देश की रक्षा करेंगे? मुझे उनके उत्तर से संतोष नहीं हुआ। यहाँ तक कि खलीफत आंदोलन के कट्टर नेता मोहम्मद अली ने यह घोषणा की थी कि किसी भी परिस्थिति में, किसी भी मुसलमान के लिए यह उचित नहीं है कि वह किसी अन्य मुसलमान के खिलाफ खड़ा हो, चाहे उसका देश कुछ भी हो।”[6]

टैगोर ने इस कट्टरता का कारण इस्लाम और ईसाई धर्म की प्रकृति में देखा। इतिहासकार कालीदास नाग को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था, “धरती पर दो धर्म ऐसे हैं, जो अन्य सभी धर्मों के प्रति स्पष्ट शत्रुता रखते हैं। ये दो धर्म हैं ईसाई धर्म और इस्लाम। ये केवल अपने धर्म का पालन करने से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि अन्य धर्मों को नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। इनके साथ शांति बनाने का एकमात्र तरीका इनके धर्म को अपनाना है।”[7]

टैगोर हिंदू समुदाय में एकता की कमी को लेकर भी चिंतित थे। उनके अनुसार, सेमिटिक (यहूदी, ईसाई और इस्लाम) धर्मों  की विनाशकारी ताकतों के खिलाफ एकता ही सबसे बड़ी ढाल हो सकती थी। उन्होंने कहा, “जब भी किसी मुस्लिम ने अपने समाज को पुकारा, तो उसे कभी कोई प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। वह एक ईश्वर ‘अल्लाह-हो-अकबर’ के नाम पर बुलाता था। दूसरी ओर, जब हम (हिंदू) कहते हैं, ‘आओ, हिंदुओं’, तो कौन हमारा उत्तर देगा? हम हिंदू छोटे-छोटे समुदायों में विभाजित हैं, जिनमें कई बाधाएँ – प्रांतवाद, जातिवाद – हैं। इन बाधाओं को पार कर कौन हमारे साथ खड़ा होगा? हम इतिहास में कई संकटों का सामना कर चुके हैं, लेकिन हम कभी एकजुट नहीं हो पाए। जब मोहम्मद गोरी ने भारत पर पहला आक्रमण किया, तब भी हिंदू एकजुट नहीं हो सके। यहाँ तक कि जब मुसलमानों ने हमारे मंदिरों को एक के बाद एक नष्ट करना शुरू किया और देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा, तब भी हिंदू छोटे-छोटे समूहों में लड़े और मारे गए, लेकिन वे कभी एकजुट नहीं हो सके।”

टैगोर का यह कथन हिंदू समाज के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था। हिंदुओं की आपसी फूट और एकता की कमी ने उन्हें बार-बार हार का सामना कराया। इतिहास ने हमें यही सिखाया है कि जब हम एकजुट नहीं होते, तब बाहरी ताकतें हमें विभाजित कर हमें कमजोर बनाती हैं। टैगोर का यह संदेश आज भी हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि अगर हमने एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया, तो हम बार-बार उसी दुखद अतीत का सामना करेंगे।[8]

बंगाल के लिए चेतावनी

रवींद्रनाथ टैगोर ने बंगाल के हिंदुओं के लिए एक गंभीर चेतावनी दी थी। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि मुसलमान बार-बार बंगाली हिंदुओं का अपमान करेंगे और हिंदू समुदाय को विभाजित करने वाली आंतरिक समस्याएँ उनके अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएंगी। 1940 के कोलकाता दंगों के संदर्भ में टैगोर ने लिखा था, “हिंदू समाज निरर्थक अनुष्ठानों में बँटा हुआ है, और यह विभाजन उन्हें लगातार हार की ओर ले जाता है। जहां हिंदू समाज आंतरिक और बाहरी दुश्मनों के हमलों से थका हुआ है, वहीं मुसलमान अपने धर्म और अनुष्ठानों में एकजुट हैं।”

टैगोर ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब मुसलमानों पर खतरा आता है, वे एकजुट होकर उसका मुकाबला करते हैं, चाहे वह बंगाली मुसलमान हो, दक्षिण भारतीय मुसलमान हो या दुनिया के किसी भी हिस्से से हो। वे हमेशा संकट के समय एक साथ खड़े होते हैं। इसके विपरीत, हिंदू समाज छोटे-छोटे समूहों में बँटा रहता है और इस विभाजन के कारण वे मुसलमानों का मुकाबला नहीं कर पाते। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि ऐसे दिन आने वाले हैं जब हिंदुओं को फिर से मुसलमानों द्वारा अपमानित किया जाएगा। टैगोर ने चेताया कि यदि हिंदू समाज एकजुट नहीं हुआ तो उनके बच्चों का भविष्य खतरे में होगा, और उन्हें अत्याचार सहना पड़ेगा।[9]

हिंदुओं को सलाह

बंगाल की एक और विडंबना यह है कि वामपंथी और उदारवादी वर्ग के लोग टैगोर को एक बंगाली दार्शनिक और सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में अपनाने का दावा करते हैं। वे रवींद्र संगीत के प्रति अपनी भक्ति दिखाते हैं और टैगोर के नाटकों का मंचन करते हैं, लेकिन जब कट्टरपंथी इस्लामियों से उत्पन्न राष्ट्रीय एकता को खतरे की बात आती है, तो वे टैगोर की चेतावनियों को नजरअंदाज कर देते हैं। यह प्रवृत्ति केवल बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत में वामपंथी और उदारवादी इसी प्रकार के रवैये के शिकार हैं।

उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके समर्थकों के लिए संयुक्त राष्ट्र के सत्रों में भाग लेना और विश्व शांति पर भाषण देना आसान था, लेकिन भारत को एक आर्थिक और सैन्य रूप से मजबूत राष्ट्र बनाने का कठिन काम करने के लिए वे तैयार नहीं थे। यह तो तब हुआ जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया, तब इन उदारवादियों और गांधीवादियों को यह एहसास हुआ कि एक ऐसी सेना की आवश्यकता है जो देश की रक्षा कर सके। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

ऐसे स्वप्नलोक में जीने वालों के लिए यह बेहतर होगा कि वे थोड़ी देर के लिए कविता पढ़ना छोड़ें और टैगोर की उन बातों पर ध्यान दें, जो देश के अस्तित्व पर मंडराते खतरे के बारे में थीं। टैगोर ने हिंदुओं को स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि कमजोरी पाप को बुलाती है। उन्होंने कहा था, “यदि मुसलमान हमें पीटते हैं और हम हिंदू इसे सहन करते हैं, बिना कोई प्रतिरोध किए, तो यह हमारी कमजोरी का ही परिणाम है। हमें अपनी कमजोरी छोड़नी होगी, ताकि हम अपने और अपने मुसलमान पड़ोसियों के भले के लिए खड़े हो सकें।”

टैगोर ने यह भी कहा कि यदि हिंदू कमजोर बने रहे और अपनी रक्षा नहीं कर सके, तो यातना और अत्याचार स्वतः आएंगे। जैसे कि प्राकृतिक तूफानों को कोई नहीं रोक सकता, वैसे ही कमजोर समाज पर अत्याचार होना स्वाभाविक है। उन्होंने चेताया कि हिंदू और मुसलमान थोड़े समय के लिए एक नकली मित्रता बना सकते हैं, लेकिन यह स्थायी नहीं हो सकती। जब तक जमीन की जड़ें शुद्ध नहीं की जातीं, जो कांटेदार झाड़ियों को बढ़ावा देती हैं, तब तक कोई सच्चा और सकारात्मक बदलाव नहीं आ सकता।[10]

टैगोर के अनुसार, भारत में हिंदू समाज ने मूर्खता और सामान्य समझ की कमी के कारण अपने ऊपर गुलामी थोप ली है। उन्होंने कहा कि “यह मूर्खता ही है, जिसके कारण भारत पर बार-बार आक्रमण होते रहे – कभी पठानों द्वारा, कभी मुगलों द्वारा और कभी ब्रिटिशों द्वारा। बाहर से हम सिर्फ उनके द्वारा किए गए अत्याचार को देख सकते हैं, लेकिन वे केवल उपकरण हैं। असली कारण हमारी मूर्खता और सामान्य समझ की कमी है।”

टैगोर ने हिंदू समाज को चेताया कि यदि हम केवल अत्याचार के बारे में सोचते रहेंगे, तो हमें कोई समाधान नहीं मिलेगा। इसके बजाय, हमें अपनी मूर्खता से छुटकारा पाना होगा और अपनी शक्तियों का पुनर्गठन करना होगा। तभी अत्याचारी हमारे सामने आत्मसमर्पण करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक हम अपनी आपसी फूट और विभाजन को समाप्त नहीं करेंगे, तब तक हम बार-बार हारे जाएंगे।[11]

टैगोर का धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण

टैगोर को अक्सर एक सेक्युलर दार्शनिक के रूप में देखा जाता है, और उनके इस्लामी विचारधारा पर किए गए तीखे विश्लेषणों को नजरअंदाज किया जाता है। लेकिन टैगोर ने स्पष्ट रूप से कट्टर इस्लाम के खतरों को पहचाना था। वे एक अंतर्राष्ट्रीयतावादी और मानवतावादी थे, जो मानवता को समृद्ध, व्यापक और बहुआयामी मानते थे।[12] उन्होंने यह माना कि मानवता की सीमाएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं हो सकतीं।

1926 में जब टैगोर ने इटली में मुसोलिनी से मुलाकात की, तो उन्होंने लिखा, “मैंने बार-बार कहा है कि पश्चिमी देशों द्वारा धार्मिक रूप से पोषित आक्रामक राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद की भावना पूरे विश्व के लिए एक बड़ा खतरा है।”[13] अपने उपन्यास ‘घरे-बाहिरे’ में भी टैगोर ने लिखा, “मैं अपने देश की सेवा करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मेरी पूजा उस सत्य के लिए आरक्षित है जो देश से कहीं बड़ा है। अपने देश की पूजा एक देवता के रूप में करना, उस पर अभिशाप लाने के समान है।”[14]

टैगोर ने एंग्लिकन पादरी सी.एफ. एंड्रयूज को लिखे एक पत्र में देशभक्ति के कुरूप पक्ष को भी समझाया। उन्होंने कहा, “देशभक्ति छोटी सोच वाले लोगों में मानवता के उच्च आदर्शों से अलग हो जाती है। यह आत्म-प्रशंसा का एक विशाल रूप बन जाती है, जो हमारी अशिष्टता, क्रूरता और लालच को बढ़ाती है। भगवान को हटाकर इस फूली हुई आत्मा को उसकी जगह पर बैठा देती है।”[15]

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान टैगोर ने धर्मनिरपेक्षता का समर्थन किया और यह तर्क दिया कि बंगाल के राष्ट्रवादी हिंदू केवल उच्च शिक्षित वर्गों से जुड़े हुए थे, जो मुसलमानों को राष्ट्रवादी आह्वान का हिस्सा बनाने में असफल रहे। टैगोर के अनुसार, यही कारण था कि मुसलमानों ने हिंदू समाज के साथ उस स्तर पर सहभागिता नहीं की, जो एकता के लिए आवश्यक थी।[16]

हाल ही में अगस्त 2024 में हुए नरसंहारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के उदारवादी हिंदू अपने ‘भाईचारे’ की धारणाओं के बारे में गलत थे। इस्लाम का भाईचारा केवल मुसलमानों तक सीमित है, और काफिरों पर लागू नहीं होता। इस स्थिति में, टैगोर की सलाह को आत्मसात करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। यदि हिंदू समाज धर्मनिरपेक्षता के खतरों को नहीं पहचानता और उसके खिलाफ जागरूक नहीं होता, तो उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हिंदुओं और सिखों का जो हाल हुआ है, वह बंगाली हिंदुओं के भविष्य के लिए एक चेतावनी है। या तो वे इस्लामी पाचन प्रक्रिया का हिस्सा बन जाएंगे, या फिर धिम्मी के रूप में जीवित रहेंगे, आधे-अधूरे।

संदर्भ

[1] The Legacy of the plight of Hindus in Bangladesh Part IV | Asian Tribune (archive.org); https://web.archive.org/web/20200610222518/http://www.asiantribune.com/index.php?q=node%2F6606

[2] Attacks on Hindus in Bangladesh show deep hatred. India must provide refuge (theprint.in); https://theprint.in/opinion/attacks-on-hindus-in-bangladesh-show-deep-hatred-india-must-provide-refuge/2225699/

[3] The Boiling Frog Syndrome (linkedin.com); https://www.linkedin.com/pulse/boiling-frog-syndrome-suyash-jaju/

[4] Haj subsidy discontinued: Credit for phasing it out goes to Supreme Court | The Indian Express; https://indianexpress.com/article/opinion/haj-subsidy-haj-india-modi-mukhtar-abbas-naqvi-5027434/

[5] Hindus are eighth-class citizens in their own country: Dr Anand Ranganathan (hindupost.in); https://hindupost.in/society-culture/hindus-eighth-class-in-own-country/

[6] Tagore and Khilafat: Only Hinduism can relieve world from meanness – The Sunday Guardian Live; https://sundayguardianlive.com/opinion/tagore-khilafat-hinduism-can-relieve-world-meanness-3#:~:text=PAN%2DISLAMISM%20MAKES%20HINDU%2DMUSLIM%20UNITY%20IMPOSSIBLE&text=In%20an%20interview%20to%20the,patriotism%20to%20any%20one%20country.

[7] The Arya Samaj | Article : Swami Sharddhananda and Mahatma Gandhi; https://thearyasamaj.org/articles?=187_Swami_Sharddhananda_and_Mahatma_Gandhi

[8] Tagore and Khilafat: Only Hinduism can relieve world from meanness – The Sunday Guardian Live; https://sundayguardianlive.com/opinion/tagore-khilafat-hinduism-can-relieve-world-meanness-3

[9] ibid

[10] Here is what Rabindranath Tagore thought of Islam (opindia.com); https://www.opindia.com/2019/05/the-side-of-rabindranath-tagore-that-liberal-intellectuals-dont-want-you-to-see-here-is-what-he-thought-of-islam/

[11] Tagore and Khilafat: Only Hinduism can relieve world from meanness – The Sunday Guardian Live; https://sundayguardianlive.com/opinion/tagore-khilafat-hinduism-can-relieve-world-meanness-3

[12] Tagore, Letters to a Friend, 1916, pages 115-116, https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.52214

[13] (PDF) Empire and Nation: Political Ideas in Rabindranath Tagore’s Travel Writings | Mohammad A. Quayum – Academia.edu; https://www.academia.edu/513093/Empire_and_Nation_Political_Ideas_in_Rabindranath_Tagores_Travel_Writings

[14] Rabindranath Tagore in 1908: ‘I will never allow patriotism to triumph over humanity as long as I live’ | Explained News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/explained/national-anthem-flag-in-theatre-rabindranath-tagore-supreme-court-4406145/

[15] Nationalism, Patriotism, Cosmopolitanism: Tagore’s Ambiguities and Paradoxes (Part II) | The Daily Star; https://www.thedailystar.net/literature/news/nationalism-patriotism-cosmopolitanism-tagores-ambiguities-and-paradoxes-part-ii-1889272

[16] Rabindranath Tagore on the Problems of Nationalism & Communalism on JSTOR; https://www.jstor.org/stable/44142701

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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