सोशल मीडिया का ज़हर: कैसे वोकिज़्म, सनसनी और हिंदू विरोधी भावनाओं का मिला जुला तंत्र युवाओं को भ्रष्ट करता है

सोशल मीडिया द्वारा संचालित एल्गोरिदम (algorithm) सनसनीखेज़ खबरें, वोकिज़्म और हिंदू-विरोध को सामान्य बना रहे हैं, जिससे युवा अपनी नैतिकता और सांस्कृतिक पहचान खो रहे हैं, और पारंपरिक मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं।
  • भारतीय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रणवीर अलाहबादिया का मामला, जिन्होंने एक भारतीय टेलीविज़न शो में एक प्रतियोगी के माता-पिता को लेकर अश्लील मज़ाक़ किए, सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित पतित संस्कृति और युवाओं पर इसके हानिकारक प्रभावों का सशक्त प्रतीक है।
  • सोशल मीडिया एल्गोरिथम्स जानबूझकर सनसनीख़ेज़ और आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देते हैं, और वायरल कंटेंट अक्सर ऐसी सामग्री पर ही निर्भर करता है।
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स आत्म-क्षति और दुर्व्यवहार का महिमामंडन करने वाली सामग्री को जगह देते हैं और ऑनलाइन वेश्यावृत्ति को भी बढ़ावा देते हैं।
  • सोशल मीडिया भारतीय संस्कृति के धार्मिक तंत्र को नष्ट कर रहा है, जिससे युवा आकस्मिक हिंदूफोबिया की ओर बढ़ रहे हैं।
  • सोशल मीडिया वोकिज़्म के बढ़ते प्रभाव से गहराई से प्रभावित है, जो कि “पीड़ित-विद्रोही” मानसिकता को बढ़ावा देकर युवा लोगों की असुरक्षा और कमजोरियों का फायदा उठाता है।
  • सोशल मीडिया कंपनियों को उनके प्लेटफ़ॉर्म पर होस्ट की गई सामग्री के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है जो वायरल कंटेंट के सिद्धांत पर चलता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का बिज़नेस मॉडल वायरल कंटेंट के इर्द गिर्द ही घूमता है। अपनी इस प्रवृत्ति के चलते सोशल मीडिया अक्सर तुच्छ और औसत दर्जे की सामग्री को असाधारण स्तर तक बढ़ा चढ़ा कर पेश करता है, और फिर इसी प्रकार के कंटेट की बाढ़ सी आ जाती है। यह घटनाक्रम विकृत, अशिष्ट व अपमानजनक कंटेंट के व्यापक प्रचार- प्रसार हेतु एक माहौल तैयार करता है, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक धारणा और सामाजिक विमर्श कुछ इस तरह से प्रभावित होते हैं जिसका निष्कर्ष अक्सर सामाजिक मूल्यों की गरिमा के अनुरूप तो बिलकुल नहीं निकलता।

इस तरह के कंटेंट का बड़े पैमाने पर प्रचार लोगों की सोच और मानसिकता को गहराई से प्रभावित कर सकता है और सामाजिक मानदंडों व मूल्यों को तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। परंतु जब यही सोशल मीडिया कंटेंट नैतिक सीमाओं को पार कर जाता है, तो समाज की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है। जागरूक नागरिकों और अधिकारियों की यह प्रतिक्रिया एक सुधारात्मक कदम की तरह काम करती है, जो भटकाव फैलाने वाले कंटेंट के लिए ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने में मदद करती है।

भारत के संदर्भ में इस ट्रेंड का एक हालिया उदाहरण लोकप्रिय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रणवीर अलाहबादिया के मामले में सामने आया, जिन्हें बीयर बाइसेप्स के नाम से भी जाना जाता है। अलाहबादिया, जो कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और हिंदू दर्शन के कई समर्थकों सहित प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ अपने विचारपूर्ण और ज्ञानवर्धक साक्षात्कारों के लिए व्यापक रूप से पहचाने जाते हैं, जब रियलिटी शो इंडियाज गॉट लेटेंट शो के एक हाल के एपिसोड का      वीडियो ऑनलाइन सामने आया, तो वे विवादों के केंद्र में आ गए।

क्लिप में अलाहबादिया एक प्रतियोगी के माता-पिता का बेहद भद्दे और अश्लील अन्दाज़ में मज़ाक उड़ाते हुए नज़र आए। उन्होंने एक बेहद अनुचित और मर्यादा-विहीन सवाल पूछा: “क्या आप अपने माता-पिता को हर दिन सेक्स करते देखना पसंद करेंगे, या फिर एक बार उनके साथ इस प्रक्रिया में सम्मिलित हो उनके बीच की इस एक्टिविटी को हमेशा के लिए खत्म करना ज़्यादा उचित समझेंगे?”[1]

के अश्लील मज़ाक़ को लेकर बेहद तीखी और कठोर प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। अलाहबादिया के ख़िलाफ़ कई शिकायतें दर्ज की गईं, जिसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा जैसे बड़े नेताओं ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी।[2]

विवाद अंततः भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा, जहां अलाहबादिया ने अपने ख़िलाफ़ शुरू की गई कानूनी कार्यवाही से राहत मांगी। हालांकि जहां अदालत ने उन्हें गिरफ़्तारी से सुरक्षा प्रदान की, वहीं अश्लील कमेंट्स को लेकर जवाबदेही से मुक्त नहीं किया। न्यायाधीशों ने उनकी टिप्पणियों की कड़ी निंदा की, और कहा कि उनके शब्दों में एक बहुत ही अनुचित मानसिकता झलकती है। अदालत ने उनकी टिप्पणियों को “बहुत गंदा” बताया और राष्ट्रीय टेलीविजन पर उनके आचरण के लिए उन्हें फटकार लगाई। फैसले के हिस्से के रूप में, अलाहबादिया को YouTube पर आगे कोई भी कंटेंट प्रसारित करने से प्रतिबंधित कर दिया गया और उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया, जिससे बिना पूर्व अनुमति के उनकी यात्रा प्रतिबंधित हो गई।[3]

यह घटना एक व्यापक मुद्दे को रेखांकित करती है- हिंदू समाज के नैतिक और सामाजिक मूल्यों का पतन, जो सोशल मीडिया के व्यापक प्रभाव से और भी बढ़ गया है। परिवार हिंदू संस्कृति की आधारशिला है; इस संरचना के भीतर, माता-पिता को दैवीय महत्व के व्यक्तियों के रूप में सम्मानित किया जाता है। हिंदू महाकाव्यों में कई कथाएँ हैं जो बच्चों और उनके माता-पिता के बीच पवित्र बंधन को उजागर करती हैं। उदाहरण के लिए श्रवण कुमार की कहानी पुत्रवत भक्ति का प्रतीक है; अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाने के लिए संपूर्ण हिंदू समाज द्वारा श्रवण कुमार की जय-जयकर की जाती है, जो उनके प्रति उनके अटूट सम्मान और प्रेम का प्रमाण है। उनके पिता और माता के प्रति निश्चल प्रेम और सेवा भाव को हर पुत्र और पुत्री के लिए एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, अलाहबादिया की अनुचित टिप्पणी न केवल अपमानजनक थी बल्कि लाखों लोगों द्वारा अपनाए गए मूल्यों के बिल्कुल विपरीत थी।

अलाहबादिया से जुड़ा विवाद एक बड़े संकट को उजागर करता है – कैसे सोशल मीडिया पारंपरिक मूल्यों को नष्ट कर रहा है और युवा संस्कृति के नाम पर एक मूल्य-विहीन और विकृत विमर्श को आकार दे रहा है। सोशल मीडिया के रुझानों की बारीकी से जांच करने पर पता चलता है कि अलाहबादिया की विवादास्पद टिप्पणियां केवल एक विशाल समुद्र में पानी की एक बूँद के समान हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर सनसनीखेज, उत्तेजक और अश्लील सामग्री के आधार पर फलते फूलते हैं, और युवा दर्शकों को नकारात्मकता और विषाक्तता के कुचक्र में खींचते हैं।

इस तरह की सामग्री के अनियंत्रित प्रसार के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। कई युवा हानिकारक सामग्री के संपर्क में आते हैं जो मानसिक और शारीरिक शोषण को सामान्य बनाती है। चिंताजनक रूप से, ऐसी सामग्री में भी वृद्धि हुई है जो आत्म-क्षति और आत्महत्या का महिमामंडन करती है, जिससे युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट और अधिक बढ़ गया है। यह घटना केवल हिंदू समाज तक ही सीमित नहीं है वरन् एक वैश्विक मुद्दा है। जहरीले सोशल मीडिया प्रवृत्तियों के दुष्प्रभावों के चलते पारिवारिक और सामुदायिक ढांचे खंडित हो रहे हैं, जिससे युवा वर्ग अलग-थलग पड़ रहा है और अपनी पहचान और भविष्य के बारे में अनिश्चित हो रहा है।

युवा संस्कृति पर सोशल मीडिया का प्रभाव एक जटिल और बेहद प्रासंगिक मुद्दा है। जैसे जैसे समय के साथ डिजिटल टेक्नोलॉजीज और भी अधिक विकसित होती जा रही है, सोशल मीडिया के व्यापक दुष्प्रभावों को लेकर चिंताएँ और भी बढ़ती जा रही हैं। इसीलिए इस मुद्दे को लेकर गहन शोध की आवश्यकता है। निम्नलिखित अनुभागों में, हम इस घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं पर गहनता से विचार करेंगे, तथा यह जांच करेंगे कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स आधुनिक दुनिया में व्यवहार, नैतिकता और सामाजिक मानदंडों को कैसे आकार देते हैं।

सोशल मीडिया किशोरों के व्यवहार को कैसे आकार देता है

अमेरिका में किशोरों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) के नवीनतम सर्वेक्षण में पाया गया कि टिकटॉक (TikTok), स्नैपचैट (Snapchat) और इंस्टाग्राम (Instagram) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स किशोरों के बीच व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं, बल्कि कुछ किशोरों ने इन साइटों पर लगातार बने रहने की बात स्वीकार की है। सर्वेक्षण के अनुसार, किशोरों द्वारा सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म की सूची में YouTube सबसे ऊपर है, जिसमें दस में से नौ अमेरिकी किशोर साइट का उपयोग करने की रिपोर्ट करते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, TikTok और Instagram का उपयोग लगभग दस में से छह किशोर करते हैं, और Snapchat का उपयोग लगभग 55 प्रतिशत अमेरिकी किशोर करते हैं।[4]

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि किशोर इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग लगातार करते हैं। 73 प्रतिशत से अधिक किशोरों ने प्रतिदिन YouTube पर सर्फिंग करने की बात स्वीकार की, जबकि दस में से छह किशोर प्रतिदिन TikTok पर जाते हैं, जहाँ 16 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं ने अपने उपयोग को “लगभग निरंतर” बताया।[5]

इस प्रकार यह अध्ययन सोशल मीडिया की लत के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। सभी आयु वर्ग के लोग सोशल मीडिया की लत के प्रति संवेदनशील हैं, लेकिन युवा लोग जीवन के जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसके कारण वे और भी अधिक संवेदनशील हैं। युवाओं में सेल्फी की लत के विषय पर भी काफी शोध हुआ है और इस को लेकर भी विमर्श चल रहा है कि यह लत उनके आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार से क्षति पहुँचाती है।

मेडिकल न्यूज़ टुडे द्वारा प्रकाशित एक लेख सेल्फी की लत के विषय में और युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए इसके संभावित हानिकारक परिणामों के बारे में बहुमूल्य जानकारी देता है। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे फ़िल्टर का अत्यधिक उपयोग किशोरों के मन-मस्तिष्क में अवास्तविक सौंदर्य मानकों की स्थापना में योगदान दे सकता है, और लाइक्स के प्रति अत्यधिक जुनून अस्वीकार्यता की भावना को जन्म दे सकता है। लेख आगे कहता है कि सेल्फी संस्कृति युवाओं को साइबर-प्रताड़ना, साइबर क्राइम के माध्यम से डराना धमकाना और दुर्व्यवहार सहित अवांछित स्थितियों में ले जा सकती है।[6]

सेल्फी संस्कृति के संभावित खतरों के बावजूद, कोरोना से पहले के दौर में सेल्फी का चलन बहुत ज़्यादा था। ऐसा क्यों था? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को खुद को अनेकों मनचाहे पोज़ में क्लिक करने के युवा वर्ग के जुनून में एक बेहद व्यावसायिक रूप से आकर्षक संभावना दिखी। उन्होंने भाँप लिया कि सेल्फ़ी को लेकर युवा वर्ग में जो दीवानगी है, इसका लाभ उठाकर अच्छा ख़ासा बिज़नेस मॉडल तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार “सेल्फ़ी” सोशल मीडिया का एक शाश्वत चलन बन गया। हालाँकि 2025 में, अन्य ट्रेंड हावी हो गए हैं, लेकिन सेल्फी संस्कृति के मुरीद यूज़र्स की संख्या अभी भी अच्छी ख़ासी है। इंस्टाग्राम पर हैशटैग सेल्फी के अन्तर्गत लगभग 449 मिलियन पोस्ट हैं। इनमें से सर्वाधिक पॉपुलर पोस्ट्स में महिलाओं की अश्लील और अरुचिकर तस्वीरें शामिल हैं।

सेल्फी संस्कृति में यूँ तो कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन ये सवाल तो सब के मन-मस्तिष्क में उठता ही है कि आख़िर सेल्फ़ी ट्रेंड उत्तेजक मुद्राओं में अर्धनग्न महिलाओं के दृश्यों पर क्यों आश्रित है? यह सोशल मीडिया एल्गोरिदमस के काम करने के तरीके के बारे में बहुत कुछ बताता है। सोशल मीडिया कंपनियाँ हमेशा लोकप्रिय कंटेंट को बढ़ा चढ़ा के पेश करने की कोशिश करती हैं। हैशटैग इसी तरह काम करते हैं। वायरल हैशटैग्ज़ के अंतर्गत बहुत से समान कंटेंट का प्रसार होता है, जिससे एडवरटाइज़र्स को विज्ञापन टारगेट करने में आसानी होती है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि सनसनीखेज और अप्रिय सामग्री को वायरल करना आसान है। इस प्रकार, सोशल मीडिया एल्गोरिदम, जो बिज़नेस और मार्केटिंग संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस प्रकार डिज़ाइन किए गए हैं कि सर्वाधिक पॉपुलर कंटेंट लूप्स के माध्यम से बार बार वायरल होकर सर्कुलेट होता रहे, जानबूझकर सनसनीख़ेज़ और आपतिजनक सामग्री को बढ़ावा देते हैं।   सोशल मीडिया कंपनियों के लिए गुणवत्तापूर्ण कंटेंट को बढ़ावा देने की तुलना में ऐसी सामग्री को वायरल करना आसान है। इस प्रकार, युवाओं को भ्रष्ट और पतित बनाना भले ही उनका मौलिक उद्देश्य न हो, लेकिन जाने अनजाने में सोशल मीडिया ट्रेंड्स का परिणाम युवाओं के संदर्भ में अक्सर नकारात्मक ही निकलता है।

हिंदू धर्म का जड़ से उन्मूलन? सोशल मीडिया हिंदू युवाओं को कैसे बरगलाता है

सोशल मीडिया एल्गोरिथम्स में अंतर्निहित हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह और सांस्कृतिक संवेदनशीलता की कमी हिंदू युवाओं की मानसिकता पर हानिकारक प्रभाव डालती है।

हिंदू संस्कृति, महाकाव्यों, और देवी-देवताओं का अपमानजनक चित्रण सोशल मीडिया पर व्याप्त है। यह एक ऐसी युवा संस्कृति को बढ़ावा देता है जिसमें युवा वर्ग धीरे-धीरे अपनी परंपराओं और संस्कृति के प्रति सम्मान खोने लगता है। वे हिंदूफोबिया या हिंदू-विरोधी भावना की कुसंस्कृति से घिर जाते हैं, जिसे वे फिर अपने भीतर समाहित कर लेते हैं। सोशल मीडिया के ट्रेंड्स इस विकृतीकरण के लिये काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं।

हैशटैग “मंकीगॉड” (Monkey God) के अंर्तगत इंस्टाग्राम पर 13.8k पोस्ट हैं। जबकि अधिकतर हिंदुओं के लिए यह शब्द अपमानजनक है, इसका इस्तेमाल अभी भी हिंदू देवता हनुमान जी को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। सोशल मीडिया पर इस तरह के हैशटैग्स का अस्तित्व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा हिंदूफोबिया को आत्मसात् किए जाने के ट्रेंड को दर्शाता है और हिंदू युवाओं के लिए इसके हानिकारक परिणामों की ओर इशारा करता है।

हिंदू देवी-देवताओं का अपमानजनक चित्रण सोशल मीडिया पर इतना आम हो गया है कि हिंदू समाज ने हिंदूफोबिया या हिंदू विरोधी भावना को इस हद तक आत्मसात कर लिया है कि वह इस तरह के अपमानजनक चित्रण को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में उचित ठहराता है। हिंदू समुदाय के कुछ सदस्य संज्ञान लेते हैं और शिकायत दर्ज कराते हैं, लेकिन यह आवाज़ें गिनी चुनी हैं। सितंबर 2024 में, मंगलारू पुलिस ने एक फेसबुक पेज पर हिंदू देवताओं की अपमानजनक तस्वीरें पोस्ट करने के आरोप में एक शिकायत दर्ज की[7]। 2020 में केरल में हुई एक और घटना में, केरल की फ़ोटोग्राफ़र दीया जॉन का हिंदू देवताओं का अपमानजनक चित्रण करने वाला फ़ेसबुक पोस्ट वायरल हो गया। फ़ोटोग्राफ़र ने कथित तौर पर फ़ेसबुक पर दो पोस्ट अपलोड किए थे, जिसमें लाल साड़ी पहने एक महिला मॉडल ने हिंदू देवी की तरह पोज़ दिया था, जहाँ उसे शराब पीते और गांजा फूंकते देखा जा सकता था। दीया जॉन को अपमानजनक पोस्ट को सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के व्यापक आक्रोश का सामना करना पड़ा, जबकि केरल स्थित एक हिंदू मंदिर ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए उनके खिलाफ़ पुलिस शिकायत भी दर्ज कराई।[8]

हिंदू देवी-देवताओं और संस्कृति के ऐसे अपमानजनक चित्रण का युवाओं पर क्या असर पड़ता है, इसका अंदाज़ा लगाना शायद इतना कठिन नहीं है। शिकायतें दर्ज की जाती हैं; क्रिएटर्स शायद लोगों के आक्रोश के कारण कुछ पोस्ट्स हटा भी लेते हैं, लेकिन ऐसी सामग्री को प्रतिबंधित करने वाले सोशल मीडिया नियमों की कमी के कारण यह दुष्चक्र जारी रहता है। इसका नतीजा यह होता है कि युवा न केवल हिंदूफोबिया को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं, बल्कि आधुनिकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अपनी संस्कृति और परंपराओं की विध्वंसक छवि पेश करने के लिए भी प्रोत्साहित होते हैं। इस प्रकार, कई बार, युवा कंटेंट क्रिएटर खुद ही हिंदू विरोधी सामग्री बनाने के लिए अति-आतुर नज़र आते हैं, जिससे हिंदू धर्म के अपमानजनक चित्रण का और भी अधिक सामान्यीकरण हो जाता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड द फ्यूचर ऑफ़ पॉवर (Artificial Intelligence and the Future of Power) में, प्रसिद्ध लेखक और शोधकर्ता राजीव मल्होत्रा ​​का मानना ​​है कि बड़ी तकनीकी कंपनियां भारतीय दर्शकों पर इतना प्रभाव डालने में इसलिए कामयाब रही हैं क्योंकि भारत अभी तक एक ऐसा मज़बूत तंत्र विकसित करने में सक्षम नहीं हो पाया है, जिसके माध्यम से अगली पीढ़ी को प्राचीन विचारों से अवगत कराया जा सके और उन्हें वर्तमान संदर्भ में एकीकृत किया जा सके, और इन विचारों को डिजिटल प्लेटफार्मों को चलाने वाले विभिन्न मॉडलों में शामिल किया जा सके।[9]

मल्होत्रा ​​आगे कहते हैं कि भारत को एक राष्ट्रीय भव्य कथानक बनाने की आवश्यकता है, जिसके अनुसार देश का डिजिटल तंत्र संचालित होना चाहिए। उनके सुझाव वास्तव में सोशल मीडिया पर हिंदू संस्कृति और परंपराओं के अपमानजनक चित्रण के दुष्चक्र को तोड़ने और हिंदू युवाओं को उनकी अपनी संस्कृति और विरासत के बारे में शिक्षित करने के लिए समाधान तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

वेश्यावृत्ति, तस्करी और ऑनलाइन लालच

 फ्रांसीसी वेश्यावृत्ति विरोधी समूह द्वारा 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में दावा किया गया है कि टिंडर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऑनलाइन वेश्यावृत्ति और यौन शोषण के बढ़ते उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं। फाउंडेशन स्केल्स की रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया है कि वेश्यावृत्ति “सड़क से इंटरनेट पर” चली गई है, जहाँ दलाल इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से युवा लड़कियों को भर्ती करके “एयरबीएनबी (AirBnB) पर किराए के अपार्टमेंट में उनसे वेश्यावृत्ति करवाते हैं।”[10]

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, “यौन शोषण: नई चुनौतियाँ, नए उत्तर” शीर्षक वाली रिपोर्ट ने 35 देशों में रुझानों का विश्लेषण किया। इसने इज़राइल और फ्रांस सहित विभिन्न देशों में ऑनलाइन वेश्यावृत्ति नेटवर्क के कामकाज के तौर-तरीकों को उजागर किया। इसने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ऑनलाइन माध्यम, अपनी पहचान गुप्त रखने की जो सुविधा देता है, उसके कारण अपराधियों को ट्रैक करना मुश्किल था और विज्ञापन कभी भी प्रत्यक्ष नहीं थे। इसके बजाय, हमेशा “सुखद क्षणों” और मालिश के लिए अस्पष्ट और परोक्ष विज्ञापन देखने को मिलते थे।[11] [12]

द अल्टामोंट एंटरप्राइज (The Altamont Enterprise ) की 2018 की रिपोर्ट न्यूयॉर्क में सेक्स ट्रैफिकिंग उद्योग का एक भयावह विवरण देती है और बताती है कि कैसे सोशल मीडिया इसे बढ़ावा देता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे दलाल विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से कमज़ोर पृष्ठभूमि की किशोर लड़कियों को सेक्स ट्रैफिकिंग के लिए निशाना बनाते हैं।[13]

ऑनलाइन वेश्यावृत्ति जैसे मुद्दे की गंभीर प्रकृति और युवा महिलाओं के जीवन पर इसके इतने गहरे दुष्प्रभाव के बावजूद, इसे मुख्यधारा के मीडिया द्वारा शायद ही कभी कवर किया गया है। हालाँकि भारत सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में ऑनलाइन वेश्यावृत्ति रैकेट का भंडाफोड़ होने की कई मीडिया रिपोर्टें हैं[14]। लेकिन वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया की भूमिका और उनके पेजों पर जो कुछ भी घटित होता है, उसके लिए इन प्लेटफार्मों को जवाबदेह बनाने की आवश्यकता पर शायद ही कभी चर्चा होती है।

भारतीय समाज में, पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित पारंपरिक पारिवारिक संरचना और नैतिक मूल्यों ने युवाओं को विकृति और नैतिक पतन से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि, जैसे-जैसे भारतीय समाज कई मोर्चों पर नाटकीय परिवर्तनों से गुज़र रहा है, ये पारंपरिक संरचनाएँ धीरे-धीरे टूट रही हैं, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर युवा वर्ग दिशाहीन हो गया है और उसके पाँव ग़लत रास्ते पर पड़ रहे हैं। भारत में कुछ वोक वर्गों द्वारा वेश्यावृत्ति को तेज़ी से महिमामंडित किया जा रहा है, जो पश्चिमी समाजों में प्रचलित “मेरा शरीर, मेरी पसंद” की शब्दावली से प्रेरित है। बॉलीवुड द्वारा वेश्यावृत्ति का बेतहाशा ग्लैमराइज़ेशन भी किसी से छिपा नहीं हैं। नतीजन, इन सभी विकृतियों से प्रभावित हो कई युवा लड़कियाँ शारीरिक और मानसिक शोषण के रास्ते पर स्वतः ही निकल पड़ती हैं। सोशल मीडिया ने इस घटनाक्रम को और अधिक बढ़ावा दिया है।

जब संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित वेब सीरीज हीरामंडी रिलीज़ हुई, जो विभाजन से पहले के लाहौर में वेश्याओं के जीवन पर आधारित थी, तो सोशल मीडिया पर युवतियों द्वारा हीरामंडी साउंडट्रैक पर वेश्याओं का रूप धारण करके सोशल मीडिया रील बनाने के ट्रेंड की बाढ़ सी आ गई। वेश्यावृत्ति को बेधड़क तरीके से ग्लैमराइज करने वाली यह फिल्म मन-मस्तिष्क को परेशान करती है [15] और भंसाली की सजी-धजी वेश्याओं को अपना आदर्श मानने वाली युवतियों का घटनाक्रम भी उससे कम भयावह नहीं जान पड़ता।

किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य संकट में

2017 में यू.के. में सोशल मीडिया से जुड़ा एक विचित्र मामला सामने आया, जब एक ब्रिटिश किशोरी मौली रसेल ने आत्महत्या कर ली। अपनी तरह के पहले फ़ैसले में, एक ब्रिटिश अदालत ने ब्रिटिश किशोरी की मौत के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को ज़िम्मेदार ठहराया। मौली रसेल ने कथित तौर पर अपनी मौत से पहले 6 महीने की अवधि में आत्महत्या, अवसाद और आत्म-क्षति से संबंधित सोशल मीडिया पर 2,000 से भी अधिक पोस्ट्स देखी थीं। किशोरी ने कथित तौर पर इंस्टाग्राम, पिंटरेस्ट और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर ऐसी सामग्री देखी। यू.के. की अदालत ने पाया कि ब्रिटिश किशोरी द्वारा देखी गई सोशल मीडिया सामग्री ने उसे आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया।[16]

मौली रसेल मामला सोशल मीडिया की विकृत दुनिया के उस अंधेरे, घिनौने और विध्वंसकारी चेहरे की कहानी है, जिसे मुख्यधारा का मीडिया बिरले ही उजागर करता है। भले ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने अब “आत्महत्या”को हैशटैग या सर्च टर्म के रूप में काफी हद तक नियंत्रित कर दिया है, लेकिन “SuicideSquad” जैसे संबंधित हैशटैग्स का उदारतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। ऐसे हैशटैग और कीवर्ड हिंसक और परेशान करने वाली सामग्री की झड़ी लगा देते हैं, जिससे युवा लोगों में आत्म-क्षति की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है। आत्महत्या करने की घटना को लाइवस्ट्रीम करने वाले युवा लोगों के मामले सोशल मीडिया पर तेज़ी से आम होते जा रहे हैं।

सोशल मीडिया कंपनियाँ बार-बार दावा करती हैं कि वे केवल मध्यस्थ के रूप में काम करती हैं और उनके प्लेटफ़ॉर्म पर पोस्ट की गई सामग्री के प्रति उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। लेकिन ऐसे समय में जब ये कंपनियाँ निर्दोष उपयोगकर्ताओं के मूल्यवान डेटा का इस्तेमाल करके रिकॉर्ड मुनाफ़ा कमा रही हैं, क्या इस प्रकार के कुतर्कों का कोई औचित्य है?

ब्रिटिश किशोरी मौली रसेल के पिता इयान रसेल, जिन्होंने 2017 में सोशल मीडिया पर खुद को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री को लगातार देखने के कारण आत्महत्या कर ली थी, ने जनवरी में यूके सरकार से ऑनलाइन सुरक्षा के लिए तंत्र को मजबूत करने का आह्वान किया, और चेतावनी दी कि कड़े सोशल मीडिया नियमों को लागू करने में देरी से बच्चे और भी अधिक जोखिम की स्थिति में पड़ जाएँगे। ब्रिटिश प्रधान मंत्री को लिखे एक पत्र में, इयान रसेल ने ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम को लागू करने के लिए यूके के संचार नियामक के दृष्टिकोण की आलोचना की। उन्होंने एक्स और मेटा जैसी तकनीकी कंपनियों पर सुरक्षा से ऊपर मुनाफे को रखने और अत्यधिक अनियमित ऑनलाइन वातावरण को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया।[17]

वोकिज़्म युवाओं को नष्ट करता हुआ

सोशल मीडिया के रुझान प्रचार-प्रसार के अन्य माध्यमों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति में मौजूदा रुझान सोशल मीडिया तक पहुँचते हैं, जो इन प्लेटफॉर्म्स पर लोकप्रिय होने वाली सामग्री को प्रभावित करते हैं। अकादमिक और बुद्धिजीवी तंत्र, विभिन्न मुद्दों पर अपने रुख के माध्यम से, मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति के लिए एजेंडा निर्धारित करता है, और इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से सोशल मीडिया कंटेंट को भी प्रभावित करता है।

वोकिज़्म के बढ़ते प्रभाव ने वैश्विक मीडिया और अकादमिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। सोशल मीडिया भी इस कड़ी का हिस्सा है। युवाओं में पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा देने और उनकी कमजोरियों का फायदा उठाने पर अपने विकृत फोकस के माध्यम से वोकिज़्म सोशल मीडिया पर प्रसारित कंटेंट को भी प्रभावित करता है।

सामान्य ज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारी की कीमत पर व्यक्तिगत व्यक्तिपरकता के अपने तर्कहीन महिमामंडन के साथ, वोकिज़्म युवाओं को एक विशिष्ट “पीड़ित-विद्रोही” सिंड्रोम में ढाल देता है। यह युवाओं की कमज़ोरियों और असुरक्षाओं का शोषण कर हर तरह की वस्तुओं और विचारों को बेचने का एक क्लासिक मामला है, जिसमें कॉस्मेटिक उत्पादों जैसी दिखने में हानिरहित चीज़ों से लेकर ड्रग्स, सेक्स और यहाँ तक कि सेक्स चेंज ऑपरेशन जैसी हानिकारक चीज़ें शामिल हैं। युवाओं के बीच अपनी व्यापक पहुँच के साथ, सोशल मीडिया वोक विचारों के लिए एक सुविधाजनक प्रयोग स्थल बन गया है। कंपनियाँ और विज्ञापनदाता युवाओं को आकर्षित करने और अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए बाज़ार बनाने के लिए इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फ़ेसबुक, आदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सभी तरह के वोक विचारों को बखूबी भुनाते हैं। इस प्रक्रिया में, वे युवाओं के सामाजिक और नैतिक मूल्य तंत्र को पूरी तरह से  नष्ट कर देते हैं और उन्हें एक बनावटी अस्तित्ववादी संकट के सतत चक्र में झोंक देते हैं।

स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0 में राजीव मल्होत्रा ​​और विजया विस्वनाथन ने अशोका यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों और गोदरेज इंडिया कल्चर लैब जैसी परियोजनाओं के माध्यम से भारत में अमेरिकी वोकिज़्म के आयात के बारे में बात की है, जो लेखकों के अनुसार, युवाओं पर जबरन हिंदू विरोधी वोक विचारधारा थोपते हैं। पुस्तक की ये पंक्तियाँ युवा मानसिकता पर सोशल मीडिया वोकिज़्म के विनाशकारी परिणामों के सार को सटीक रूप से चित्रित करती हैं:

वोक अमेरिकी युवा वर्ग अपनी पहचान, लिंग और सेक्सुअलिटी को लेकर चिंतित, आसानी से उत्तेजित और भ्रमित हैं। वे निरंतर पुष्टि चाहते हैं, और सोशल मीडिया एक प्रतिध्वनि कक्ष है जो भावनात्मक सुदृढ़ीकरण प्रदान करता है। युवाओं के लिए TikTok और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ऐसे वीडियोज़  से भरे पड़े हैं, जिनमें युवा अपनी कामुकता और तरल लिंग स्पेक्ट्रम में अपने वर्तमान स्थान की घोषणा करते हुए दिखाई देते हैं। यह वर्तमान जुनून है। कामुकता, लिंग और व्यक्तिगत सर्वनाम की नई श्रेणियां दैनिक आधार पर उभरती हैं। अमेरिकी युवा स्पष्ट रूप से एक मनोवैज्ञानिक संकट से गुज़र रहे हैं।[18]

वोकिज़्म स्वाभाविक रूप से हिंदू विरोधी है; यह हिंदू धर्म को दक़ियानूसी, पितृसत्तात्मक और महिला विरोधी के रूप में चित्रित करता है। यही नहीं, यह विचारधारा हिन्दू धर्म के अनुयायियों और ग़ैर अनुयायियों,दोनों को ही इसे  नकारात्मक रूप से देखने और इसके बारे में नकारात्मक धारणायें फैलाने के लिए भड़काती है। वोकिज़्म युवा वर्ग को हिंदू धर्म और दर्शन के साथ गहरे जुड़ाव बनाने के ख़िलाफ़ उकसाता है। सोशल मीडिया पर हिंदू विरोधी सामग्री की अधिकता और इसकी बढ़ती लोकप्रियता के लिए वोकिज़्म को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह न केवल हिंदूफोबिया या हिंदू विरोधी भावना का सामान्यीकरण करता है, बल्कि यह हिंदू युवाओं को अपने धर्म और संस्कृति का मज़ाक़ उड़ाने के लिए भी प्रोत्साहित करता है।  इस प्रकार यह उन्हें पहचान के गहरे संकट के एक दुष्चक्र में धकेलता है और उन्हें समुदाय और समाज के पारंपरिक बंधनों से अलग करता है।

राजीव मल्होत्रा ​​और विजया विस्वनाथन की नवीनतम पुस्तक, हू इज रेजिंग योर चिल्ड्रन, भारतीय शिक्षा प्रणाली द्वारा पश्चिमी शिक्षा मॉडल के आयात का मुद्दा उठाती है। लेखक तर्क देते हैं कि वैश्विकतावादी धीरे-धीरे भारतीय शिक्षा प्रणाली को नियंत्रित कर रहे हैं क्योंकि वैश्विक शैक्षिक पाठ्यक्रम प्रगतिशील शिक्षा के नाम पर कुछ विचारों को जबरन थोप रहा है। लेखक आगे तर्क देते हैं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली पर पश्चिमी शिक्षा मॉडल थोपने से भावी पीढ़ी अपनी स्थानीय संस्कृति और मूल्य प्रणाली से अलग हो जाती है और देशभक्ति जैसी अवधारणाओं को भी नकारती है, जो किसी राष्ट्र की मूल्य प्रणाली के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। पुस्तक मार्क्सवाद-आधारित सामाजिक विज्ञान और वैदिक सामाजिक विज्ञान के बीच के अंतरों पर गहराई से चर्चा करती है, यह तर्क देते हुए कि भारत को सामाजिक विज्ञान के पश्चिमी मॉडल को आयात करने के बजाय वैदिक प्रणाली पर आधारित सामाजिक विज्ञान पाठ्यक्रम अपनाना चाहिए। लेखक पाठक को इस खतरे के प्रति भी सचेत करते हैं कि बच्चों को यौन शिक्षा और लिंग संवेदनशीलता सिखाने के नाम पर स्पष्ट यौन सामग्री के संपर्क में लाया जा रहा है और लिंग की तरलता और वैकल्पिक यौनिकता को अपनाने की अवधारणाओं में ढाला जा रहा है।[19] [20]

आगे की राह

एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस कड़े कानून के तहत विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मालिक टेक दिग्गजों पर यह ज़िम्मेदारी डाली गई है कि वे नाबालिगों को इन प्लेटफॉर्म्स पर लॉग इन करने से रोकें, या फिर 32 मिलियन अमरीकी डॉलर तक का जुर्माना भरने के लिए तैयार रहें।[21]

सोशल मीडिया कंपनियों ने इस कानून की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है।[22] कई विशेषज्ञों ने भी कथित तौर पर प्रतिबंध का विरोध किया है, उनका तर्क है कि शिक्षा और मीडिया साक्षरता बढ़ाना शायद सीधे प्रतिबंध लगाने की तुलना में संकट का बेहतर समाधान पेश करता है।[23]

आत्म-नियमन और सोशल मीडिया जागरूकता की बातें सैद्धांतिक रूप से तो अच्छी लगती हैं, लेकिन क्या यह दृष्टिकोण वास्तविक धरातल पर काम करता है, जब बात मुनाफ़ा कमाने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों की हो, जो संभवतः बच्चों को अपने प्लेटफार्मों के विकास को बढ़ावा देने के लिए एक आकर्षक दर्शक वर्ग के रूप में देखते हैं, व उनकी सुरक्षा और भलाई से कम ही सरोकार रखते हैं?

पूर्ण प्रतिबंध 100 प्रतिशत कारगर हो भी सकते हैं और नहीं भी, लेकिन वे शायद “नो-बैन” परिदृश्य की तुलना में एक उल्लेखनीय सुधार हैं। फ्रांस और अमेरिका के कुछ राज्यों जैसे विभिन्न देशों ने भी माता-पिता की सहमति के बिना नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को प्रतिबंधित करने के लिए कानून पारित किया है।[24] यूके का नया ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम सोशल मीडिया फर्मों पर बच्चों को पोर्नोग्राफ़ी, आत्म-क्षति और हिंसक सामग्री जैसे कंटेंट से बचाने की ज़िम्मेदारी डालता है। ऐसा न करने पर नए कानून के अनुसार भारी जुर्माना लगाया जाएगा।[25] ऑस्ट्रेलियाई प्रतिबंध ने भारत में भी बहस छेड़ दी, जिसमें विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि भारत में बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के मसौदा नियमों के अनुसार[26], 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति की आवश्यकता होगी। नियम अभी भी मसौदा चरण में हैं, और भारत सरकार ने हाल ही में मसौदे पर सार्वजनिक सुझाव और आपत्तियाँ मांगने की प्रक्रिया पूरी की है। इसके बाद सरकार भविष्य की कार्रवाई का निर्धारण करने के लिए फीडबैक पर विचार करेगी।

युवाओं को सोशल मीडिया के हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिए, अश्लील, या हिंसक सामग्री के प्रदर्शन को प्रतिबंधित करने के लिए समग्र सोशल मीडिया विनियमन समय की मांग है। बच्चों के लिए सोशल मीडिया को विनियमित करना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन यह युवा लोगों की मानसिकता को नष्ट करने वाले सोशल मीडिया की समस्या को पूरी तरह से हल नहीं करता है। सोशल मीडिया कंपनियों को उनके प्लेटफॉर्म्स पर साझा की गई सामग्री के लिए उत्तरदायी बनाने के लिए एक बहुआयामी रणनीति समय की मांग है। शायद उन्हें अब यह कहकर बच निकलने में सक्षम नहीं होना चाहिए कि वे केवल मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं। शायद यह सही समय है कि उन्हें नियमित मीडिया कंपनियों के रूप में वर्गीकृत किया जाए ताकि वे देश के कानूनों के प्रति समान रूप से उत्तरदायी हों। सोशल मीडिया कंपनियों से यह उम्मीद करना कि वे अपने प्लेटफ़ॉर्म को स्वयं सेंसर करें और स्वेच्छा से अश्लील और अपमानजनक सामग्री पर नकेल कसें, मूर्खतापूर्ण है। ऐसी सामग्री कई सोशल मीडिया रुझानों को चलाती है, जिससे इन कंपनियों को बड़ा मुनाफा होता है। वे कुछ हैशटैग्स को नियंत्रित करने या दिखावे मात्रा के लिए आधे-अधूरे मन से कुछ मनमाने मानदंड लागू कर सकते हैं। परंतु, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्ज़ आसानी से इन नियमों को दरकिनार कर देते हैं, और दुष्चक्र चलता रहता है।

समापन

जैसा कि रणवीर अलाहबादिया प्रकरण दर्शाता है, सोशल मीडिया युवाओं की मूल्य प्रणाली को नष्ट कर देता है, जिससे वे किसी भी तरह की नैतिक अपील के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। अलाहबादिया एक लोकप्रिय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं, जिन्होंने धार्मिक तंत्र के भीतर आध्यात्मिक नेताओं और अन्य संस्थाओं के साथ साक्षात्कार करके बहुत लोकप्रियता हासिल की है। जब उनके असंख्य प्रशंसकों ने वह फ़ुटेज देखा जिसमें वे अपने माता पिता के बारे में भद्दी और अश्लील टिपणियाँ करते हुए सहजता से हंस रहे थे, तो उनमे से कई लोगों ने छंला हुआ महसूस किया और उनकी भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची।

दूसरे शब्दों में कहें तो रणवीर अलाहबादिया का मुखौटा उतर गया क्योंकि लोगों को उसका अधार्मिक पक्ष देखने को मिला। यहां तक ​​कि भारत की सर्वोच्च अदालत ने भी एक टेलीविज़न शो में विकृति के प्रदर्शन के लिए अलाहबादिया को काफी सख्त भाषा में फटकार लगाई। यह सोशल मीडिया की दोहरी प्रकृति का भी एक रूपक है। सनसनीख़ेज़ और वायरल के अविरल महिमामंडन के माध्यम से, यह युवा वर्ग में एक ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देता है जिसके वशीभूत हो वे “सोशल मीडिया कंटेंट” को नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक मान्यताओं के सभी दायित्वों से अलग थलग करके देखते हैं।

संदर्भ 

[1]  Ranveer Allahbadia shocks Samay Raina on India’s Got Latent with ‘inappropriate’ jokes, draws massive backlash | Today News;  https://www.livemint.com/news/trends/ranveer-allahbadia-shocks-samay-raina-on-india-s-got-latent-with-inappropriate-jokes-draws-massive-backlash-11739171476365.html

[2]  Ranveer Allahbadia Row: Mumbai police reaches YouTuber’s residence over remarks at ‘India’s Got Latent’ | Top updates | Latest News India – Hindustan Times;  https://www.hindustantimes.com/india-news/ranveer-allahbadia-row-mumbai-police-reaches-youtubers-residence-over-remarks-on-india-s-got-latent-top-updates-101739255016083.html

[3] Supreme Court slams Ranveer Allahbadia: ‘Something very dirty in his mind’ | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/supreme-court-slams-ranveer-allahbadia-something-very-dirty-in-his-mind-101739858269274.html

[4]  Teens, Social Media and Technology 2024 | Pew Research Center;   https://www.pewresearch.org/internet/2024/12/12/teens-social-media-and-technology-2024/

[5] Ibid.

[6]  Teen health and selfies: The impact and forming healthy habits;  https://www.medicalnewstoday.com/articles/teen-health-and-selfies#selfies-and-social-media

[7] FIR registered in Mangaluru over derogatory pictures of Hindu deities on Facebook;   https://www.deccanherald.com/india/karnataka/fir-registered-in-mangaluru-over-derogatory-pictures-of-hindu-deities-on-facebook-3186453

[8] Kerala photographer Dia John posts derogatory images of Hindu deities;  https://www.opindia.com/2020/10/kerala-photographer-dia-john-posts-derogatory-images-of-hindu-deities/

[9]  Artificial Intelligence and the Future of Power by Rajiv Malhotra, p. 354

[10] Apps, Social Media Fuel ‘Booming’ Online Prostitution [Study];     https://theglobepost.com/2019/06/04/social-media-fuels-prostitution/

[11]  Ibid.

[12]  Apps, social media fuel ‘booming’ online prostitution: study; https://www.business-standard.com/article/pti-stories/apps-social-media-fuel-booming-online-prostitution-study-119060401191_1.html

[13] Sex trafficking is here, largely fueled by social media | The Altamont Enterprise;   https://altamontenterprise.com/02272018/sex-trafficking-here-largely-fueled-social-media

[14]  Online prostitution racket busted in Gurugram – Hindustan Times;   https://www.hindustantimes.com/cities/gurugram-news/online-prostitution-racket-busted-in-gurugram-101663179047105.html

[15]  Sanjay Leela Bhansali’s Heeramandi and Bollywood’s obsession with the glorification of prostitution;   https://hindupost.in/media/sanjay-leela-bhansalis-heeramandi-and-bollywoods-obsession-with-the-glorification-of-prostitution/#

[16]  UK considering banning social media for under 16-year-olds, should Bharat follow suit?;      https://hindupost.in/media/uk-considering-banning-social-media-for-under-16-year-olds-should-bharat-follow-suit/

[17]  Father of Molly Russell urges UK to strengthen online safety laws | Digital Watch Observatory; https://dig.watch/updates/father-of-molly-russell-urges-uk-to-strengthen-online-safety-laws

[18] Snakes in the Ganga by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan, p. 574

[19] (74) Who Is Raising Your Children? Our New Book | ‘A MASTERFUL EXPOSE!’ – YouTube;   https://www.youtube.com/watch?v=RVcTlVvsiOg

[20] (74) Hidden dangers of Western education models | Vijaya Viswanathan | Who Is Raising Your Children? – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=FO1f_NMqxco

[21] Australia passes social media ban for children under 16 | Reuters;  https://www.reuters.com/technology/australia-passes-social-media-ban-children-under-16-2024-11-28/

[22]   How will Australia’s under-16-year social media ban work? We asked the law’s enforcer: NPR;  https://www.npr.org/2024/12/19/nx-s1-5231020/australia-top-regulator-kids-social-media-ban#:~:text=The%20law%20came%20over%20the,regulated%20corners%20of%20the%20internet.

[23]  Will the Australian social media ban work | Media@LSE;   https://blogs.lse.ac.uk/medialse/2025/02/18/will-the-australian-social-media-ban-for-under-16s-work/

[24] Australia passes social media ban for children under 16 | Reuters;  https://www.reuters.com/technology/australia-passes-social-media-ban-children-under-16-2024-11-28/

[25] Online Safety Bill: Social media faces big changes under new Ofcom rules;   https://www.bbc.com/news/articles/cj0467e9e43o

[26]  Parental consent must for children to open social media account: Centre in draft rules for Data Protection – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/story/centre-in-draft-rules-for-data-protection-parental-consent-must-for-children-to-open-social-media-account-2659474-2025-01-03

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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