पक्षपाती सेकुलरिज़्म: न्यायपालिका में बराबरी पाने का हिंदू संघर्ष
- न्यायपालिका पर भरोसा उसकी निष्पक्षता और आस्था के सम्मान पर टिका है, लेकिन हिंदू समाज को हाल के वर्षों में पक्षपात और उपेक्षा का अनुभव हुआ है।
- खजुराहो जवरी मंदिर में टूटी विष्णु मूर्ति की पुनर्स्थापना याचिका को अदालत ने “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” कहकर खारिज किया और की गई टिप्पणी से आस्था का अपमान महसूस हुआ।
- संविधान अनुच्छेद 14 और 25 सभी को समान अधिकार देता है, पर व्यवहार में हिंदू संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण और अल्पसंख्यक संस्थाओं को अधिक स्वतंत्रता दिखती है।
- कई न्यायिक टिप्पणियाँ और फैसले हिंदू भावनाओं को हल्का साबित करते हैं, जबकि अन्य समुदायों की शिकायतें तुरंत गंभीरता से ली जाती हैं।
- सच्चा धर्मनिरपेक्ष संतुलन तभी संभव है जब सभी धर्मों के लिए समान संरक्षण, समयबद्ध सुनवाई, और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रियाएँ सुनिश्चित हों।
कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि ऐसा भी प्रतीत हो कि वास्तव में न्याय हुआ है।[1] यही सिद्धांत किसी भी न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास की नींव है। भारत के नागरिक न्यायपालिका पर इसलिए भरोसा करते हैं क्योंकि वे इसे अपने अधिकारों का रक्षक, विवाद के समय निष्पक्ष निर्णायक और संवैधानिक गारंटियों का अंतिम संरक्षक मानते हैं। जनता का यह भरोसा ही अदालतों को शक्ति और सम्मान प्रदान करता है।
लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिन्होंने विशेषकर हिंदू समाज में गहरी बेचैनी और असुरक्षा की भावना पैदा की है। धीरे-धीरे यह धारणा मज़बूत होने लगी है कि न्यायपालिका उनके धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में समान और निष्पक्ष नहीं दिखती। कई बार उसके निर्णय असंगत प्रतीत होते हैं और कभी-कभी वे पक्षपातपूर्ण भी लगते हैं।[2]
इस धारणा को और गहरा करने वाली सबसे हाल की घटना मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई द्वारा खजुराहो के जवरी मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की पुनर्स्थापना से संबंधित याचिका पर की गई टिप्पणी है। इस मामले में एक गंभीर याचिका को “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” कहकर खारिज कर दिया गया। यह केवल याचिका की अस्वीकृति नहीं लगी, बल्कि लाखों हिंदुओं के लिए यह उनकी आस्था की सहज उपेक्षा जैसी प्रतीत हुई। जब अदालत के भीतर से ही ऐसी टिप्पणी आती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों को यह अनुभव होता है कि उनकी धार्मिक संवेदनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।
भारत जैसे लोकतंत्र में, जहाँ धर्म और आस्था का समाज और राजनीति दोनों पर गहरा प्रभाव है, ऐसी धारणाएँ केवल भावनात्मक स्तर पर ही नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी गंभीर महत्व रखती हैं। यदि समाज का कोई वर्ग यह मानने लगे कि न्यायपालिका उनके धर्म को अन्य धर्मों की तुलना में कम सम्मान देती है या उनके मामलों में संवेदनशीलता नहीं दिखाती, तो न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत—भरोसा और विश्वसनीयता—डगमगाने लगती है। और यह बात केवल “छोटे” समूह की धारणा हो, तब भी उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। क्योंकि न्यायिक निष्पक्षता पर ज़रा सा भी संदेह पूरे तंत्र की नींव को हिला देता है।
इसी कारण यह लेख उन कारणों पर प्रकाश डालता है कि क्यों हिंदू समाज का एक हिस्सा न्यायपालिका से निराश हो रहा है, क्यों “चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता” की धारणा समस्याग्रस्त है।
संवैधानिक वादा और न्यायिक हकीकत
भारत का संविधान अनुच्छेद 14 के तहत स्पष्ट करता है कि सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। कागज़ पर ये प्रावधान सबके लिए समान हैं और किसी भी धर्म या समुदाय के व्यक्ति को बराबर अधिकार प्रदान करते हैं।
लेकिन जब व्यवहार की ओर देखा जाता है तो तस्वीर अक्सर अलग नज़र आती है। कुछ न्यायिक निर्णय और रुझान ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वे दोहरे मानकों पर आधारित हों।[3] हिंदू संस्थाओं पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, उनकी परंपराओं की कठोरता से जांच की जाती है और उनके पवित्र स्थल यानी मंदिर मुख्य रूप से राज्य के नियंत्रण में रहते हैं। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक संस्थाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता और सम्मान दिया जाता है। उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई होती है और उनकी परंपराओं को सरकारी हस्तक्षेप से बचाया जाता है।
संविधान के आदर्शों और वास्तविक व्यवहार के बीच यही विरोधाभास आलोचकों को यह कहने का आधार देता है कि धर्मनिरपेक्ष भारत और उसकी न्यायपालिका हिंदू मामलों में पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हैं। [4]
खजुराहो में आस्था का अपमान
इस संदर्भ में खजुराहो के जवरी मंदिर का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहाँ भगवान विष्णु की सात फुट ऊँची मूर्ति स्थापित है, जो मुग़ल आक्रमणों के समय तोड़ी गई थी और आज तक टूटी हुई अवस्था में ही पड़ी है। हिंदू समाज ने कई बार सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से इस मूर्ति की पुनर्स्थापना की माँग की, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
यह खंडित मूर्ति न केवल धार्मिक दृष्टि से पीड़ा का कारण है, बल्कि यह सीधे तौर पर अनुच्छेद 25 के तहत मिले स्वतंत्र पूजा-अधिकार का उल्लंघन भी है। जब किसी आस्था के केंद्र को अधूरा या अपमानित छोड़ दिया जाए, तो यह उस आस्था के अनुयायियों के मौलिक अधिकार का हनन बन जाता है। मूर्ति की पुनर्स्थापना का अधिकार सीधे संविधान से मिलता है, लेकिन यहाँ ASI अधिनियम (1958) को अधिक महत्व दिया जा रहा है।[5] परिणामस्वरूप, आस्था और मौलिक अधिकार तकनीकी प्रावधानों के अधीन कर दिए गए हैं। यह स्थिति अनुच्छेद 13(2) के विरुद्ध है, जो स्पष्ट रूप से कहता है कि मौलिक अधिकारों से टकराने वाला कोई भी कानून अमान्य होगा। सवाल यह है कि क्या कोई साधारण क़ानूनी प्रावधान संविधान में दिए मौलिक अधिकार से ऊपर हो सकता है?
जब सरकार और ASI ने इस मुद्दे की अनदेखी की, तब हिंदुओं ने न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाया। किंतु अदालत ने न तो मूर्ति की पुनर्स्थापना का आदेश दिया, न ही सरकार को कानून में संशोधन करने का सुझाव दिया। इसके विपरीत, याचिका को “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” कहकर खारिज कर दिया गया। इतना ही नहीं, सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश गवई ने टिप्पणी की—“जाकर खुद देवता से कहो कुछ करें। अगर आप विष्णु भक्त हैं, तो प्रार्थना और ध्यान कीजिए।” [6] यह टिप्पणी भक्तों को छोटा दिखाने जैसी लगी और कई लोगों को यह उनकी श्रद्धा का मज़ाक उड़ाने के समान प्रतीत हुई।[7]
लाखों हिंदुओं के लिए मूर्ति केवल पत्थर का टुकड़ा नहीं होती, बल्कि ईश्वर का सजीव स्वरूप होती है। भारतीय कानून भी मूर्ति को “कानूनी व्यक्तित्व” मानता है। इसलिए यदि अदालत को लगता था कि उसका इस मामले में अधिकार-क्षेत्र नहीं है, तो वह केवल ASI की शक्ति का हवाला देकर याचिका को ख़ारिज कर सकती थी। श्रद्धा पर चोट करने वाली टिप्पणी की आवश्यकता नहीं थी।[8]
एडवोकेट विनीत जिंदल ने मुख्य न्यायाधीश से उनकी टिप्पणी वापस लेने की मांग की।[9] मुख्य न्यायाधीश ने बाद में सफाई दी कि उनके शब्दों को गलत ढंग से समझा गया और वे सभी धर्मों को समान सम्मान देते हैं।[10] यद्यपि यह सफाई स्वागतयोग्य थी, पर इसने यह प्रश्न जन्म दिया—क्या अदालत के भीतर इस तरह की टिप्पणी उचित है? उस देश में, जहाँ न्यायाधीश के कथन भविष्य का निर्धारण कर सकते हैं, वहाँ अनजाने में कही गई बातें भी पक्षपात का आभास देती हैं।
भारतीय परंपरा में न्यायाधीशों को हमेशा यह चेतावनी दी जाती रही है कि वे केवल निष्पक्ष रहें ही नहीं, बल्कि ऐसा भी प्रतीत हो कि वे निष्पक्ष हैं। न्याय का अर्थ केवल निष्पक्ष निर्णय देना नहीं है, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना भी है कि उनके साथ न्याय हुआ है।
जब हिंदू आस्था न्यायिक उदासीनता से टकराती है
विष्णु मूर्ति का मामला कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार हिंदू समाज से जुड़ी याचिकाएँ अदालतों द्वारा खारिज की गईं और प्रायः ऐसी टिप्पणियों के साथ खारिज की गईं जिनसे उनकी श्रद्धा का अपमान झलकता है। और यह वही टिप्पणियाँ हैं, जो यदि किसी अल्पसंख्यक समुदाय के संदर्भ में की गई होतीं, तो संभवतः उन्हें सहन नहीं किया जाता। कुछ उदाहरण ध्यान देने योग्य हैं[11]:
- बॉम्बे हाईकोर्ट (2025): होली महोत्सव का मज़ाक उड़ाने पर रोक लगाने की याचिका खारिज करते हुए कहा गया—“इतने संवेदनशील मत बनो।”
- इलाहाबाद हाईकोर्ट (2025): देवी गायत्री का अपमान करने वाली किताब पर लगी याचिका को “दोहराव” कहकर खारिज कर दिया गया।
- बॉम्बे हाईकोर्ट (2025): भगवान शिव का मज़ाक उड़ाने वाले गीत के मामले में कहा गया—“हर वह काम जो किसी वर्ग को नापसंद हो, धार्मिक भावनाओं का अपमान नहीं होता।”
- सुप्रीम कोर्ट (2023): आदिपुरुष फिल्म में हिंदू ग्रंथों के विकृतिकरण पर आपत्ति करने वाली याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की—“आजकल हर कोई हर बात पर चिढ़ जाता है।”
- मद्रास हाईकोर्ट (2022): धर्मांतरण और लाउडस्पीकर के दुरुपयोग पर मामला खारिज कर कहा गया—“सहनशीलता हर हिंदू का धर्म है।”
- बॉम्बे हाईकोर्ट (2018): सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म का मज़ाक उड़ाने वाले मामलों पर कहा गया—“हास्य-बोध विकसित करो।”
- सुप्रीम कोर्ट (2014): पीके फिल्म पर आपत्ति करने वालों से कहा गया—“अगर पसंद नहीं है तो मत देखो।”
इन सभी निर्णयों और टिप्पणियों का असर यह हुआ कि हिंदू परंपराओं और उनकी आस्थाओं का अपमान सामान्य और स्वीकार्य-सा लगने लगा। यही नहीं, भारतीय न्याय संहिता (2023) का अध्याय 16 और भारतीय दंड संहिता (1860) का अध्याय 15 धर्म से जुड़े अपराधों को रोकने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन ये प्रावधान हिंदुओं के मामलों में शायद ही कभी लागू होते हैं। इसके विपरीत, अन्य समुदायों के मामलों में इन्हें तुरंत लागू किया जाता है।[12]
भारतीय सेकुलरिज़्म की विषमता
कल्पना कीजिए, यदि वही टिप्पणी जो खजुराहो के विष्णु मूर्ति मामले में हिंदुओं के लिए की गई थी, मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में कही जाती। परिणाम तुरंत और विस्फोटक होता। बार काउंसिल जैसे संस्थान तुरंत बयान जारी करते, मीडिया “न्यायिक इस्लामोफ़ोबिया” का शोर मचाता, कई अंतरराष्ट्रीय NGO संयुक्त राष्ट्र तक याचिकाएँ पहुँचा देते और राजनीतिक दल एक साथ मिलकर तीखी प्रतिक्रिया देते। संभवतः मुख्य न्यायाधीश को “कट्टरपंथी” या “पक्षपाती” कहकर घेरा जाता। [13]
लेकिन जब इसी तरह की टिप्पणी हिंदुओं के लिए होती है, तो चारों ओर सन्नाटा छा जाता है। [14] न कोई वकीलों का संगठन प्रस्ताव पारित करता है, न बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन होते हैं, न राजनीतिक दल सक्रिय होते हैं और न ही किसी न्यायाधीश से इस्तीफ़े या मामले से अलग होने की माँग उठती है। यही असमानता भारत के वर्तमान सेकुलर ढाँचे की सबसे बड़ी कमजोरी है। यहाँ अल्पसंख्यकों की पीड़ा तुरंत सुर्खियाँ बनती है, लेकिन हिंदुओं की पीड़ा को हल्का बताकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यही वजह है कि आज “सेकुलरिज़्म” का अर्थ संतुलन से हटकर एकतरफ़ा झुकाव बन गया है।
इसी विषमता की झलक हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में दिखाई दी, जब वक्फ संशोधन अधिनियम (2025) की कुछ धाराओं, जिनमें अतिक्रमण रोकने से जुड़े प्रावधान भी थे, पर रोक लगा दी गई।[15] यह फैसला अपेक्षाकृत तेज़ी से हुआ। लेकिन इसके उलट, हिंदू समाज से जुड़े कई गंभीर मामले जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर–ज्ञानवापी मस्जिद विवाद या पूजा स्थलों का अधिनियम (1991) की संवैधानिकता को चुनौती, दशकों से लंबित पड़े हैं। [16] ये मामले पीढ़ियों तक चलते रहते हैं और कोई अंतिम समाधान सामने नहीं आता। इसके विपरीत, अल्पसंख्यक समुदाय की याचिकाओं पर त्वरित सुनवाई होती है और राहत भी जल्दी मिलती है। यह स्थिति चाहे जिस नाम से पुकारें, असल में यह सेकुलरिज़्म के नाम पर पक्षपात है।
हिंसा को इनाम, आस्था को सज़ा
यह असमानता केवल अदालतों के निर्णयों में ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक प्रतिक्रिया में भी दिखाई देती है। कारण यह है कि अलग-अलग समुदाय अपनी शिकायतें अलग ढंग से सामने लाते हैं। मुस्लिम समुदाय जब किसी बात से आहत होता है तो प्रतिक्रिया अक्सर सड़कों पर उतरकर हिंसा, तोड़फोड़ और दंगों में बदल जाती है। उदयपुर में कन्हैया लाल की नृशंस हत्या इसका सबसे भयावह उदाहरण है। उन्होंने केवल नूपुर शर्मा का समर्थन किया था और उनकी गला काटकर हत्या कर दी गई। यहाँ संदेश साफ़ था—हिंसा ही ताकत है। [17]
राज्य और न्यायपालिका, रक्तपात के डर से अक्सर पीछे हट जाती हैं और दोष असल अपराधियों की बजाय पीड़ित पर ही डाल दिया जाता है। यही हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने हत्यारों को सज़ा देने के बजाय नूपुर शर्मा को ही “ढीली ज़ुबान” कहकर डांटा और यहाँ तक कहा कि उन्होंने “देश में आग लगा दी।” इससे स्पष्ट संदेश गया कि न्याय झुक गया और हिंसा हावी हो गई।
इसके उलट, हिंदू समाज अपनी शिकायतें अदालतों में ले जाता है। वे याचिकाएँ दायर करते हैं, तर्क प्रस्तुत करते हैं और कानूनी प्रक्रिया पर विश्वास रखते हैं। लेकिन परिणामस्वरूप उन्हें न तो समय पर न्याय मिलता है, न ही सम्मान। उनकी याचिकाएँ या तो वर्षों तक लंबित रहती हैं या मज़ाक बना दी जाती हैं। यह खतरनाक संदेश देता है कि जो समुदाय आक्रामक होकर हिंसा करता है, उसकी बातें तुरंत सुनी जाती हैं, जबकि जो समुदाय धैर्य रखकर कानूनी रास्ता अपनाता है, उसकी अनदेखी कर दी जाती है। [18] ऐसी व्यवस्था अगर लंबे समय तक जारी रही तो लोकतंत्र की नींव खोखली हो जाएगी।
सबूत का असमान बोझ
यह पक्षपात सबूतों की माँग में भी स्पष्ट दिखाई देता है। वक्फ संशोधन अधिनियम (2025) में विवादित “वक्फ बाय यूज़र” धारा को हटाया गया। यह धारा केवल “प्रयोग” के आधार पर ज़मीन को वक्फ घोषित कर देती थी, चाहे कोई दस्तावेज़ी प्रमाण हो या न हो। इस सुधार की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि मुस्लिम संस्थाएँ 500 साल पुराने ज़मीन के रिकॉर्ड कैसे पेश करेंगी।[19]
लेकिन जब बात राम जन्मभूमि की आई, तो हिंदुओं से सदियों पुराने दस्तावेज़, पुरातात्त्विक साक्ष्य और शास्त्रीय प्रमाण पेश करने को कहा गया। स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथ, औपनिवेशिक दौर के नक्शे, यहाँ तक कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई रिपोर्ट तक को बार-बार परखा गया, तभी जाकर मंदिर के पक्ष में निर्णय आया। [20] यानी जहाँ मुस्लिम दावों के लिए सहूलियत दिखाई जाती है, वहीं हिंदुओं से सबसे कठोर प्रमाण की अपेक्षा की जाती है। यह दोहरा रवैया न्याय की आत्मा के विपरीत है।
न्यायिक असंगतियाँ और समान संरक्षण का प्रश्न
कई टिप्पणीकारों ने इस असमानता की ओर ध्यान आकर्षित किया है। डॉ. आनंद रंगनाथन ने हाल ही में कहा कि सुप्रीम कोर्ट की विष्णु मूर्ति पर की गई टिप्पणी कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है।[21] उन्होंने याद दिलाया कि अदालत ने 1990 में हुए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार मामलों को “समय बीत जाने” का हवाला देकर दोबारा खोलने से मना कर दिया। जबकि इससे छह साल पहले हुई 1984 की सिख-विरोधी हिंसा के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित कर दिया गया। यह तुलना अपने आप में स्पष्ट करती है कि न्याय के तराज़ू का संतुलन बराबर नहीं है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि हिंदू मंदिरों पर तो सरकार का सीधा नियंत्रण है, लेकिन मस्जिदों और चर्चों पर ऐसा कोई नियंत्रण क्यों नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में भी यही दोहरापन दिखाई देता है। नूपुर शर्मा को केवल इस्लामी शास्त्र उद्धृत करने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई, लेकिन जब तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की, तो अदालत खामोश रही।
डॉ. रंगनाथन ने अन्य उदाहरण भी दिए। जैसे हिंदुओं के लिए पशु बलि पर प्रतिबंध लागू किया गया, लेकिन मुसलमानों के लिए हलाल प्रथा आज भी जारी है। पूजा स्थलों का अधिनियम (1991) को अयोध्या फ़ैसले में वैध करार दिया गया, जिससे ऐतिहासिक अन्याय स्थायी रूप से “फ्रीज़” हो गए। सबरीमला निर्णय में केवल हिंदू परंपराओं को असंवैधानिक बताया गया, जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म में समान परंपराओं को अनदेखा कर दिया गया। सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान शाहीन बाग़ की नाकेबंदी को अदालत ने ग़ैरक़ानूनी माना, लेकिन कार्रवाई करने के बजाय केवल मध्यस्थता का रास्ता अपनाया। यह नरमी भी केवल उसी समुदाय के लिए दिखाई गई। [22]
एडवोकेट विष्णुशंकर जैन ने भी ऐसे ही सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया [23] कि दिल्ली हाईकोर्ट ने जब एक मंदिर तोड़ने की अनुमति दी, तो यह टिप्पणी की कि “भगवान शिव को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है।” सुप्रीम कोर्ट ने भी इस टिप्पणी को बरकरार रखा। वहीं दूसरी ओर, वक्फ से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुन लेता है, जबकि हिंदू मंदिरों से जुड़े मामलों को निचली अदालतों में भेज दिया जाता है।
उन्होंने एक उदाहरण और दिया—2013 में दाख़िल हिंदू मंदिर न्यास कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ लगभग 12 साल तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहीं, और अंततः उन्हें हाईकोर्ट भेज दिया गया। इसके विपरीत, 2025 में वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केवल कुछ ही महीनों में सुनवाई हुई और अंतरिम राहत भी दे दी गई।
विष्णुशंकर जैन ने जवरी मंदिर मामले में की गई टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे शब्द हिंदू समाज को गहरी पीड़ा पहुँचाते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कोविड-19 महामारी के दौरान जगन्नाथ यात्रा और कांवड़ यात्रा को रोक दिया गया, लेकिन बकरीद के जुलूसों की अनुमति उसी न्यायिक पीठ (न्यायमूर्ति नरीमन, अब सेवानिवृत्त) ने दी। इसी तरह, जहाँगीरपुरी तोड़फोड़ मामले को सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सुना, लेकिन जब हिंदुओं ने अनुच्छेद 32 के तहत मंदिर अधिकारों के लिए राहत माँगी, तो उन्हें निचली अदालतों का दरवाज़ा दिखाया गया। [24]
न्यायिक सत्यनिष्ठा: निष्पक्षता का धर्म
न्यायाधीश का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य सत्यनिष्ठा है। इसका अर्थ केवल भ्रष्टाचार से दूर रहना नहीं, बल्कि हर स्थिति में पूर्ण निष्पक्षता, निर्लिप्तता और न्यायप्रियता बनाए रखना है। भारतीय सभ्यता के दृष्टिकोण में न्यायिक सत्यनिष्ठा को एक पवित्र कर्तव्य माना गया है। इसे यज्ञ के समान पुण्यदायक समझा गया है। स्मृतियों और नीति शास्त्रों ने इस धारणा को बहुत व्यापक रूप दिया है। बृहस्पति के अनुसार [25] न्यायाधीश को किसी व्यक्तिगत लाभ, हानि या पक्षपात का विचार किए बिना मामलों का निर्णय करना चाहिए और वह निर्णय शास्त्रों में निर्धारित विधि के अनुरूप होना चाहिए। जो न्यायाधीश इस प्रकार अपने दायित्व निभाता है, वह उतना ही पुण्य अर्जित करता है जितना यज्ञकर्ता।
निष्पक्षता बनाए रखने के लिए प्राचीन ग्रंथों में अत्यंत कठोर सावधानियाँ बताई गई हैं। मुकदमों की सुनवाई खुले न्यायालय में होनी चाहिए ताकि जनता देख सके कि कार्यवाही पारदर्शी है। जब कोई मामला लंबित हो, तब न्यायाधीश को पक्षकारों से निजी बातचीत की अनुमति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ऐसी मुलाकातें पक्षपात की आशंका पैदा कर सकती हैं। शुक्र-नीतिसार निष्पक्षता को नष्ट करने वाले पाँच कारण गिनाता है [26]: आसक्ति, लोभ, भय, शत्रुता और निजी सुनवाई। वही ग्रंथ आगे यह मानदंड तय करता है कि राजा द्वारा नियुक्त न्यायाधीश विधि में पारंगत, बुद्धिमान, सुसंस्कृत, मधुरभाषी, मित्र और शत्रु दोनों के प्रति निष्पक्ष, सत्यनिष्ठ, सक्रिय और क्रोध, लोभ तथा निजी लाभ की इच्छा से मुक्त होना चाहिए।[27]
भारत की न्यायिक परंपरा विश्व की सबसे पुरानी परंपराओं में से है। सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा और उत्तरदायित्व की जो ऊँची कल्पना यहाँ की गई है, वह बहुत कम सभ्यताओं में दिखाई देती है। इसी कारण न्यायपालिका से अपेक्षा रहती है कि वह केवल न्याय करे ही नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि समाज को स्पष्ट रूप से दिखाई दे कि न्याय हुआ है। न्याय का नैतिक बल यहीं से आता है।
आगे का मार्ग: समान न्याय की पुकार
निष्पक्ष मूल्यांकन के साथ यह भी मानना होगा कि अनेक ऐतिहासिक मामलों में भारत की न्यायपालिका ने हिंदू धर्म और व्यापक भारतीय परंपरा को दुर्बल होने से बचाया है। सास्त्री बनाम मुलदास (1966) [28] में सुप्रीम कोर्ट ने स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायियों को गैर-हिंदू बताने के प्रयास को अस्वीकार किया और स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म एक व्यापक, जीवंत और समावेशी परंपरा है। इसकी जड़ें वेद, स्मृतियाँ, पुराण और उपनिषद जैसे ग्रंथों में हैं। यह निर्णय केवल एक कानूनी निष्कर्ष नहीं था, बल्कि धर्म के विखंडन से बचाने वाली एक सभ्यतागत सुरक्षा भी था।
इसी प्रकार अरुणा रॉय बनाम भारत संघ (2002) [29] में अदालत ने स्कूल शिक्षा में वैदिक और अन्य धार्मिक ज्ञान के समुचित परिचय को वैध माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रों को सभी धर्मों के ग्रंथों से परिचित कराना धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन नहीं है, बल्कि ज्ञान के संतुलित प्रसार का एक तरीका है। इन निर्णयों ने लगातार यह संकेत दिया कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू परंपराओं के निषेध से नहीं, बल्कि सभी परंपराओं के प्रति समान सम्मान से है।
हिंदू समाज न्यायपालिका का गहरा सम्मान करता है और लोकतंत्र व न्याय-व्यवस्था को टिकाए रखने में उसकी भूमिका को अमूल्य मानता है। यह सम्मान तभी स्थायी रह सकता है जब न्यायिक प्रक्रियाएँ निष्पक्षता और पारदर्शिता के मानकों पर लगातार खरी उतरें। इस संदर्भ में कुछ सुधार आज अत्यंत आवश्यक प्रतीत होते हैं।
- सभी धर्मों के लिए समान संरक्षण: हिंदू धर्म पर होने वाला कोई भी हमला उसी गंभीरता से लिया जाना चाहिए जिस गंभीरता से किसी अन्य धर्म पर हमले को लिया जाता है। यदि केवल कुछ धार्मिक भावनाओं पर तत्काल न्यायिक या राजनीतिक प्रतिक्रिया आती है और अन्य मामलों में उदासीनता देखी जाती है, तो यह न धर्मनिरपेक्षता के अनुरूप है और न ही न्याय के। भारतीय न्याय संहिता (2023) में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से संबंधित जो दंड प्रावधान हैं, उनका प्रयोग सभी मामलों में समान रूप से होना चाहिए, चाहे आरोपी किसी भी धर्म का हो।
- चुनिंदा सेकुलरिज्म का अंत: समस्या की जड़ धर्मनिरपेक्षता की विकृत व्याख्या है, जिसमें सर्व धर्म समभाव का सिद्धांत पीछे छूट गया है और उसकी जगह कुछ समूहों का तुष्टिकरण तथा अन्य की उपेक्षा दिखने लगती है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू परंपराओं का लोप नहीं है। यह सभी परंपराओं के लिए समान सम्मान और समुचित सुरक्षा की माँग करता है। यदि नीति और व्यवहार में यह संतुलन न हो, तो संविधान का मूल वादा ही दुर्बल पड़ जाता है।
- न्यायपालिका की सार्वजनिक जिम्मेदारी: भारत में धर्मनिरपेक्षता के वास्तविक अर्थ पर विधिक और सार्वजनिक स्तर पर अधिक स्पष्टता आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट अपने महत्वपूर्ण निर्णयों में इस अवधारणा की स्पष्ट, कार्यात्मक परिभाषा प्रस्तुत कर सकता है। जब तक यह सुस्पष्ट न हो, न्यायाधीश सार्वजनिक और शैक्षणिक मंचों पर इसकी व्याख्या करें तो जनता और राजनीतिक दल दोनों को दिशा मिलेगी। यदि न्यायपालिका खुले रूप में चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता के जोखिम और दुष्परिणाम समझाती है, तो राजनीतिक दल भी उसे वोट-बैंक के औज़ार की तरह उपयोग करने में हिचकेंगे और नागरिक समाज भी विभाजनकारी प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करेगा। न्यायपालिका, राजनीति और समाज के बीच यही संतुलन संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित गरिमा और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करेगा।
- मंदिर स्वायत्तता और धार्मिक समानता: वर्तमान व्यवस्था में हिंदू मंदिरों पर व्यापक राज्य नियंत्रण दिखाई देता है, जबकि अन्य धार्मिक संस्थाएँ अपेक्षाकृत स्वायत्त हैं। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से असमानता का भाव पैदा करती है। न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। या तो सभी धार्मिक संस्थाएँ समान मानकों के अंतर्गत आएँ, या सभी को समान रूप से स्वतंत्रता मिले। आंशिक समानता भी दीर्घकाल में भेदभाव ही सिद्ध होती है। इस विषय में एक समान नीति ही टिकाऊ समाधान दे सकती है।
- याचिकाओं की समयबद्ध और समान सुनवाई: हिंदू समाज की एक प्रमुख शिकायत यह है कि उनके महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई वर्षों तक लंबित रहती है, जबकि कुछ अन्य मामलों को बहुत शीघ्र प्राथमिकता मिलती है। कभी-कभी तो आधी रात तक सुनवाई के उदाहरण सामने आते हैं। उदाहरण के लिए वक्फ संशोधन अधिनियम (2025) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कुछ ही महीनों में अंतरिम राहत मिल गई, जबकि इसी अवधि में पूजा स्थलों का अधिनियम (1991) की संवैधानिकता, ज्ञानवापी और हरिहर मंदिर (संभल) जैसे मामलों में लंबा इंतजार जारी रहा। कई बार हिंदू मामलों को हाई कोर्ट भेज दिया जाता है, जबकि अन्य धर्मों से जुड़े समान विषय सीधे सुप्रीम कोर्ट में सुने जाते हैं। यह भिन्नता संदेह और असंतोष दोनों को बढ़ाती है। [30]
संतुलन बहाल करने के लिए अदालतों को समानता का एक स्पष्ट और अनुपालनयोग्य मानक अपनाना चाहिए। समान प्रकृति के मामलों को समान प्राथमिकता और समान प्रक्रिया मिले। यदि सुप्रीम कोर्ट किसी विषय को सीधे सुनने का निर्णय करता है, तो उसी प्रकृति के हिंदू मामलों पर भी यही मापदंड लागू हो। और यदि कोई मामला निचली अदालत में भेजा जाता है, तो लिखित रूप में यह स्पष्ट किया जाए कि पहले सीधे सुने गए अन्य मामलों से यह अलग क्यों है। कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत यही अपेक्षा करता है, और पारदर्शिता से संदेह दूर होते हैं तथा विश्वास मजबूत होता है।
- सभी अदालती कार्यवाहियों का लाइव प्रसारण: कार्यवाहियों का लाइव-स्ट्रीमिंग पारदर्शिता बढ़ाती है और जनता को भरोसा देती है कि फैसले विधि और साक्ष्य पर आधारित हैं, न कि व्यक्तिगत पसंद पर। स्वप्निल त्रिपाठी (2018) [31] [32] में न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि धूप की रोशनी सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। यह बात न्यायिक प्रक्रियाओं पर भी लागू होती है। प्रत्यक्ष प्रसारण से वैचारिक पक्षपात की आशंका घटती है, अदालतों का उत्तरदायित्व बढ़ता है और समाज को यह संदेश जाता है कि न्यायालय किसी के लिए भी विशेष या कम विशेष नहीं हैं। जहाँ सुरक्षा और गोपनीयता के प्रश्न हों, वहाँ उपयुक्त अपवाद बनाए जा सकते हैं, पर समग्र दिशा पारदर्शिता की होनी चाहिए।
- मामलों की योग्यता पर सुनवाई: हर मामले का निर्णय उसकी मेरिट पर होना चाहिए। इसका अर्थ है कि अदालतें कानूनी तर्क, उपलब्ध साक्ष्य, उपयुक्त उपचार और प्रासंगिक नज़ीरों के आधार पर निर्णय दें, न कि किसी न्यायाधीश के निजी वैचारिक झुकाव के आधार पर।[33] विशेष रूप से धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में यह अपेक्षा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदू धर्म से संबंधित याचिकाओं को बिना ठोस विश्लेषण के अस्वीकार करना केवल कुछ दलीलों को नकारना नहीं है, बल्कि यह मूलभूत कानूनी सवालों, गहरी सभ्यतागत भावनाओं और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में निहित अधिकारों को भी अछूता छोड़ देता है। ऐसा होने पर असमानता का बोध और निराशा दोनों बढ़ती है।[34]
- न्यायिक सत्यनिष्ठा के मानक और जवाबदेही: बृहस्पति, शुक्र-नीतिसार और अन्य ग्रंथों में बताए गए सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। आधुनिक भारत को न्यायाधीशों के आचरण के लिए स्पष्ट, क्रियान्वयन योग्य और समय-समय पर समीक्षा योग्य आचार संहिता चाहिए। सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, और भय, लोभ, आसक्ति से मुक्त आचरण को केवल आदर्श के रूप में नहीं छोड़ा जा सकता। उन्हें विधिवत संहिताबद्ध किया जाए, उनके अनुपालन की निगरानी हो और उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई हो। भ्रष्ट आचरण, हितों के टकराव, या अनुचित बयानों के लिए स्पष्ट जवाबदेही तंत्र होना आवश्यक है। यही व्यवस्था न्यायपालिका की गरिमा को बढ़ाती है और जनता के विश्वास को मजबूत रखती है।
इन सुधारों का उद्देश्य किसी समुदाय को विशेषाधिकार देना नहीं है। उद्देश्य यह है कि सभी नागरिकों को, उनके धर्म और पहचान से परे, समान गरिमा और समान संरक्षण मिले। हिंदू धर्म ने भारतीय समाज में हमेशा बहुलता और सह-अस्तित्व को महत्व दिया है। किंतु यह अपेक्षा न्यायसंगत नहीं कि केवल वही समुदाय बार-बार समझौता करे, अतिरिक्त सहनशीलता दिखाए और अपने अधिकारों को निरंतर टालता रहे, जबकि अन्य समुदायों के लिए त्वरित उपाय उपलब्ध हों। सच्ची धर्मनिरपेक्षता की परीक्षा इसी कसौटी पर होती है कि समान परिस्थितियों में सभी को समान न्याय मिले।
निष्कर्ष: हिंदुओं के लिए समान न्याय की ओर
भारतीय संविधान सभी धर्मों के लिए समान सम्मान और संरक्षण का वादा करता है। जब व्यवहार में चुनिंदा सेकुलरिज्म दिखाई देता है, जहाँ कुछ शिकायतें तुरंत सुनी जाती हैं और अन्य को टाल दिया जाता है, तो संविधान का यह वादा क्षीण पड़ता है।[35] हिंदू समाज के लिए, जिसने इस भूमि की सभ्यता को हजारों वर्षों तक संजो कर रखा है, न्याय का अर्थ सिर्फ यह नहीं हो सकता कि उन्हें कहा जाए कि वे और अधिक सहनशील बनें, केवल प्रार्थना करें या दशकों तक प्रतीक्षा करें जबकि अन्य को तुरंत राहत मिल जाए। यदि धर्मनिरपेक्षता का कोई वास्तविक अर्थ है, तो वह सभी के लिए समान गरिमा और समान संरक्षण है।
हिंदू विशेषाधिकार नहीं माँग रहे, वे केवल बराबरी चाहते हैं। जब मंदिर तोड़े जाते हैं, जब मूर्तियों, त्योहारों और परंपराओं का उपहास किया जाता है, और जब याचिकाएँ वर्षों तक बिना समाधान लंबित रहती हैं, तब चोट केवल किसी एक धर्म को नहीं लगती। इससे भारत के संविधान में निहित समानता का सिद्धांत भी आहत होता है। न्यायपालिका को इस वास्तविकता पर गंभीरता से विचार करना होगा। बहुसंख्यक समुदाय का विश्वास, जिसके पूर्वजों ने इस सभ्यता को सुरक्षित रखा, अपने आप में नहीं बना रहता। उसे निष्पक्ष आचरण और पारदर्शी प्रक्रियाओं से निरंतर सुदृढ़ करना पड़ता है।
सच्ची धर्मनिरपेक्षता तभी संभव है जब हिंदुओं की चिंताओं को वही गंभीरता, वही गरिमा और वही तात्कालिकता मिले जो अन्य सभी समुदायों की चिंताओं को मिलती है। न्याय का तराजू तभी संतुलित कहलाएगा, जब समान परिस्थितियों में समान मानक लागू हों। यही मार्ग न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को और ऊँचा करेगा तथा समाज के हर वर्ग के विश्वास को फिर से एकजुट करेगा।
सन्दर्भ सूची
[1] Detailed Notes on the Principles of Natural Justice; https://lawctopus.com/clatalogue/clat-pg/notes-on-the-principles-of-natural-justice/
[2] CJI Gavai makes a sarcastic jibe while denying restoration of Lord Vishnu’s idol in Khajuraho: Read 5 stark instances that expose judiciary’s entrenched anti-Hindu bias; https://www.opindia.com/2025/09/cji-gavai-makes-a-sarcastic-jibe-while-denying-restoration-of-lord-vishnus-idol-in-khajuraho-read-5-stark-instances-that-exposes-judiciarys-entrenched-anti-hindu-bias/
[3] Apathy in Robes: Systematic Judicial Disregard for Hindu Sentiments; https://hindupost.in/society-culture/apathy-in-robes-systematic-judicial-disregard-for-hindu-sentiments/#
[4] ibid
[5] The Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act 1958; https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/15477/1/the_ancient_monuments_and_archaeological_sites.pdf
[6] ‘Publicity Interest Litigation’: Supreme Court Dismisses Plea Seeking Repair Of Dilapidated Lord Vishnu Idol At Khajuraho Temple; https://www.livelaw.in/top-stories/publicity-interest-litigation-supreme-court-dismisses-plea-seeking-repair-of-dilapidated-lord-vishnu-idol-at-khajuraho-temple-304107
[7] Mainstreaming of Hinduphobia: Dear CJI BR Gavai, If ‘go pray’ is the response to a plea for the restoration of a desecrated idol, why have courts at all? https://www.opindia.com/2025/09/cji-br-gavai-petition-dismissed-restore-lord-vishnu-idol-khajurao-go-pray-hinduphobia/
[8] ibid
[9] Advocate Seeks Withdrawal of Remarks on Hindu Faith from CJI in Khajuraho Idol Case; https://lawbeat.in/top-stories/advocate-seeks-withdrawal-of-remarks-on-hindu-faith-from-cji-in-khajuraho-idol-case-1518745
[10] “I Respect All Religions”: CJI Gavai Reacts To Social Media Row Over His Comments In Vishnu Idol Case; https://www.livelaw.in/top-stories/i-respect-all-religions-cji-gavai-reacts-to-social-media-row-over-his-comments-in-vishnu-idol-case-304332
[11] 8 Cases When Judiciary Rejected Pleas Over Hurting Hindu Sentiments, Advising Hindus Not To Be “So Sensitive” (2014 to 2025); https://d3ksk6inf0f90y-medias.s3.ap-south-1.amazonaws.com/uploads/focus/8-cases-when-judiciary-rejected-pleas-over-hurting-hindu-sentiments-advising-hindus-not-to-be-so-sensitive-2014-to-2025.pdf
[12] Apathy in Robes: Systematic Judicial Disregard for Hindu Sentiments; https://hindupost.in/society-culture/apathy-in-robes-systematic-judicial-disregard-for-hindu-sentiments/#
[13] Mainstreaming of Hinduphobia: Dear CJI BR Gavai, If ‘go pray’ is the response to a plea for the restoration of a desecrated idol, why have courts at all?; https://www.opindia.com/2025/09/cji-br-gavai-petition-dismissed-restore-lord-vishnu-idol-khajurao-go-pray-hinduphobia/
[14] ibid
[15] Supreme Court stays key provisions of the Waqf Amendment Act 2025; https://www.scobserver.in/reports/constitutionality-of-waqf-amendment-act-interim-stay-judgement-pronouncement/
[16] Chief Justice BR Gavai’s ‘Deity Remark’ Controversy, Lawyer Vishnu Jain Exclusive| #plainspeak; https://www.youtube.com/watch?v=NHxw4J3ib24
[17] CJI Gavai makes a sarcastic jibe while denying restoration of Lord Vishnu’s idol in Khajuraho: Read 5 stark instances that expose judiciary’s entrenched anti-Hindu bias; https://www.opindia.com/2025/09/cji-gavai-makes-a-sarcastic-jibe-while-denying-restoration-of-lord-vishnus-idol-in-khajuraho-read-5-stark-instances-that-exposes-judiciarys-entrenched-anti-hindu-bias/
[18] ibid
[19] The Silent Discrimination: Is India’s judiciary systematically ignoring rights of Hindus?; https://organiser.org/2025/04/22/288470/bharat/the-silent-discrimination-is-indias-judiciary-systematically-ignoring-rights-of-hindus/
[20] ibid
[21] SC Rejects Petition Against Invite to Banu Mushtaq for Mysuru Dasara | Karnataka News | News18; https://www.youtube.com/watch?v=FqVGgiyK1wE
[22] ibid
[23] Chief Justice BR Gavai’s ‘Deity Remark’ Controversy, Lawyer Vishnu Jain Exclusive| #plainspeak; https://www.youtube.com/watch?v=NHxw4J3ib24
[24] ibid
[25] The Indian Judicial System: A Historical Survey (Page No. 3) – By Mr. Justice S.S. Dhavan, High Court, Allahabad; https://www.allahabadhighcourt.in/event/TheIndianJudicialSystem_SSDhavan.pdf
[26] ibid
[27] ibid
[28] 1966 AIR 1119; https://indiankanoon.org/doc/145565/
[29] AIR 2002 SUPREME COURT 3176; https://indiankanoon.org/doc/509065/
[30] Chief Justice BR Gavai’s ‘Deity Remark’ Controversy, Lawyer Vishnu Jain Exclusive| #plainspeak; https://www.youtube.com/watch?v=NHxw4J3ib24
[31] AIR 2018 SUPREME COURT 4806; https://indiankanoon.org/doc/43629806/
[32] Live-streaming debate: Supreme Court must prevent sensationalism; https://www.barandbench.com/columns/live-streaming-debate-court-must-prevent-sensationalism
[33] Chief Justice BR Gavai’s ‘Deity Remark’ Controversy, Lawyer Vishnu Jain Exclusive| #plainspeak; https://www.youtube.com/watch?v=NHxw4J3ib24
[34] ibid
[35] Apathy in Robes: Systematic Judicial Disregard for Hindu Sentiments; https://hindupost.in/society-culture/apathy-in-robes-systematic-judicial-disregard-for-hindu-sentiments/#
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