संभल हिंसा: राजनीतिक अवसरवाद और अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप भारत की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की राह में बाधक
- संभल में हुई हिंसा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति से जुड़े हिंदू-विरोधी सोच का एक साफ उदाहरण है।
- न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण के दौरान संभल की शाही जामा मस्जिद में हुई हिंसा को हिंदू मंदिरों की पुनः प्राप्ति की वकालत करने वाले याचिकाकर्ताओं को बदनाम करने के लिए गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
- वामपंथी-उदारवादी समूह और कट्टरपंथी इस्लामवादी तत्व विवादित स्थलों के धार्मिक चरित्र की जांच के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाने से हिंदुओं को रोकने के लिए पूजा स्थल अधिनियम 1991 का उपयोग कर रहे हैं।
- जहां कई देशों ने अपने सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों को उपनिवेशवादियों और आक्रमणकारियों के प्रभाव से पुनः प्राप्त करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं, वहीं भारत में ऐसे प्रयासों को गलत तरीके से “असंवैधानिक” या “अल्पसंख्यक विरोधी” करार दिया जाता है।
राजीव मल्होत्रा और विजया विश्वनाथन अपनी पुस्तक “स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0” में भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल को पश्चिमी अकादमिक विचारों से बिगाड़ने के मुद्दे पर गहराई से चर्चा करते हैं। यह किताब मुख्य रूप से पश्चिमी अकादमिया में लोकप्रिय क्रिटिकल रेस थ्योरी के भारत में गलत तरीके से इस्तेमाल का मुद्दा उठाती है।
इन लेखकों का तर्क है कि क्रिटिकल रेस थ्योरी मूल रूप से पश्चिमी समाज में नस्लीय भेदभाव को समझने और सुधारने के लिए बनाई गई थी। लेकिन इसे जबरन भारत की जाति व्यवस्था पर लागू किया जा रहा है। इस सिद्धांत में नस्ल (रेस) की अवधारणा को भारत की जाति व्यवस्था पर थोपा जा रहा है। इस प्रकार की बौद्धिक गड़बड़ी “उत्पीड़क” और “उत्पीड़ित” जैसी कृत्रिम श्रेणियाँ बनाती है। इसमें तथाकथित “उच्च जातियों” को औपनिवेशिक शैली में उत्पीड़क और “निम्न जातियों” को पीड़ित के रूप में दिखाया जाता है।[1]
लेखक यह बात स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उत्तर-औपनिवेशिक और गैर-औपनिवेशिक अकादमिक ढाँचे, जो अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसी उपनिवेशित सभ्यताओं को सशक्त बनाने में सफल रहे हैं, भारतीय संदर्भ में इन्हें तोड़-मरोड़कर इस तरह लागू किया जाता है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता सशक्त और आत्मनिर्भर होने के बजाय और अधिक उपनिवेशवादी प्रभाव में फँस जाती है। वे तर्क देते हैं कि स्वदेशी दृष्टि कोणों को मजबूत करने के बजाय, ये ढाँचे औपनिवेशिक विरासत का महिमामंडन करते हैं और भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनः प्राप्त करने के प्रयासों को बदनाम करते हैं। यह विरोधाभास उन आक्रमणकारियों को महिमा मंडित करता है जिन्होंने भारत पर जबरन शासन किया और अत्याचार किए, जबकि शोषित भारतीय समुदायों को अपने समाज में ही अपराधी और शोषक के रूप में प्रस्तुत करता है। इसका नतीजा यह होता है कि भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को लेकर विकृत धारणाएँ बनती हैं।
पश्चिमी मीडिया और भारतीय मीडिया का एक वर्ग भी इस विमर्श को और बढ़ावा देता है। वे भारत के औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलने के प्रयासों को संवैधानिक सिद्धांतों और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला करार देते हैं। उदाहरण के तौर पर, हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को अक्सर “चरमपंथी दक्षिणपंथी” कहा जाता है और उनकी तुलना यूरोपीय राष्ट्रवादी आंदोलनों से की जाती है।
हालाँकि विशेषज्ञ मानते हैं कि हिंदू राष्ट्रवाद को ऐसे स्वदेशी आंदोलन के रूप में देखना अधिक उचित है, जो भारत को उपनिवेशवादी मानसिकता से बाहर निकालने और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कार्यरत हैं। लेकिन यह दृष्टिकोण अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इसके बजाय, उपनिवेशीकरण-मुक्ति के प्रयासों को “उत्पीड़क/उत्पीड़ित” की कथाओं में उलझा दिया जाता है, जिसमें हिंदू राष्ट्रवादियों को उत्पीड़क और अल्पसंख्यकों या दलितों को उत्पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर पनप रहा यह सतही विमर्श अक्सर तनाव का माहौल तैयार करता है, खासकर जब विवादित धार्मिक स्थल सार्वजनिक और न्यायिक जांच का विषय बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे स्थलों पर विवादों को सुलझाने के लिए अदालतों द्वारा आदेशित पुरातात्विक जांच को अक्सर वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान से नकारात्मक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। ये समूह दुष्प्रचार पर आधारित आख्यान गढ़ते हैं, तथा इन प्रयासों को सांप्रदायिक या संप्रदायवादी बताते हैं, जिससे समाज के भीतर पनप रही विभाजन रेखाएँ और भी अधिक गहराने लगती हैं।
हाल ही में संभल में हुई हिंसा इस घटना का ताज़ा उदाहरण है। 24 नवंबर, 2024 को उत्तर प्रदेश में संभल शाही जामा मस्जिद का न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण तब हिंसक हो गया, जब भीड़ ने अधिकारियों के काम में बाधा डाली। रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय स्तर पर बनी बंदूकों से पुलिस पर गोलीबारी की, जिससे पुलिसकर्मी घायल हो गए [2] और कम से कम चार लोगों की मौत हो गई। वाम-उदारवादी और इस्लामवादी तंत्र द्वारा इसे राज्य प्रायोजित हिंसा के रूप में पेश करने के प्रयासों के बावजूद, शव परीक्षण के निष्कर्षों से पता चला कि पीड़ितों की मौत देशी पिस्तौल से चली गोलियों के कारण हुई, जिससे यह प्रोपोगंडा सिरे से ख़ारिज हो जाता है।[3]
संभल प्रकरण ने भारत के पूजा स्थल अधिनियम के बारे में बहस को फिर से हवा दे दी है, क्योंकि न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण एक याचिका से उपजा था जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद भगवान कल्कि को समर्पित एक हिंदू मंदिर के ऊपर बनाई गई थी।[4] ऐसी घटनाएँ उस वृहत संदर्भ को उजागर करती हैं जिसमें भारत के अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दावों को तलाशने के प्रयासों को प्रतिरोध और गलत बयानी का सामना करना पड़ता है।
यह मामला भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के बारे में संतुलित और तथ्य-आधारित चर्चा की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वास्तविक विउपनिवेशीकरण के प्रयास वैचारिक रूप से प्रेरित विकृतियों से बाधित न हों।
संभल हिंसा के इर्द-गिर्द षड्यंत्र सिद्धांतों की भरमार
24 नवंबर, 2024 की संभल हिंसा ने उत्तर प्रदेश के संभल में मुगलकालीन मस्जिद के न्यायालय द्वारा आदेशित सर्वेक्षण को लेकर विवादों की एक श्रृंखला को प्रकाश में ला दिया है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, स्थानीय पुलिस ने क्षेत्रीय विपक्षी समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क सहित 2,700 से अधिक व्यक्तियों के खिलाफ आरोप दायर किए हैं।[5] बर्क पर अशांति फैलाने, कथित तौर पर बिना पूर्व अनुमति के मस्जिद का दौरा करने और हिंसा भड़काने का आरोप है। जबकि सांसद ने इन आरोपों से इनकार किया है और इलाहाबाद उच्च न्यायालय से कानूनी हस्तक्षेप की मांग की है, घटना के व्यापक निहितार्थ को देखते हुए करीबी जांच की अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है।[6] [7]
स्थानीय अधिकारियों ने हिंसा के सिलसिले में 30 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया है और 400 से ज़्यादा संदिग्धों की पहचान की है।[8] मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस घटनास्थल से पाकिस्तान और अमेरिका से आयातित गोला-बारूद बरामद करने के बाद बाहरी संस्थाओं की संभावित संलिप्तता की भी जांच कर रही है। कथित तौर पर घटनास्थल पर पाकिस्तान की Ordinance फैक्ट्री द्वारा निर्मित खाली कारतूस और अमेरिका निर्मित हथियारों से प्राप्त अन्य कारतूस पाए गए। जांचकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या ये सामग्री स्थानीय स्तर पर हासिल की गई थी या बाहरी लोगों की भागीदारी वाली किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा है।[9]
संभल हिंसा की वारदात में विदेशी संलिप्तता की संभावना को नकारा नहीं जा सकता, खास तौर पर पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण देशों की जानी पहचानी रणनीति को देखते हुए। ऐसे देश अक्सर भारत में सांप्रदायिक तनाव का फायदा उठाकर अपने भू-राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, और इस प्रकार की अशांति की घटनाओं का इस्तेमाल स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए भर्ती के साधन के रूप में करते हैं। रिपोर्ट बताती है कि आतंकवादी समूह भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की कहानियों को फैलाने के लिए संभल जैसी घटनाओं का फायदा उठा सकते हैं, जिससे उनकी भर्ती संबंधी रणनीतियों को बल मिलता है।[10]
संभल हिंसा को किसी अलग थलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारत में पिछले कुछ वर्षों से देखे जा रहे एक जाने माने पैटर्न का हिस्सा है। शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शनों से लेकर व्यापक किसान विरोध प्रदर्शनों तक, भारत में आंतरिक अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाकर अपने भू-राजनीतिक स्वार्थ साधने वाले बाहरी प्रभावों के बढ़ते प्रमाण मिले हैं। इस प्रकार के तथाकथित आंदोलन अक्सर पूरी प्लानिंग के साथ बड़ी सतर्कता से आयोजित किए जाते हैं। शायद इसीलिए इनके संदर्भ में अधिकतर “ वोक टूलकिट” जैसे शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। इस तरह के आंदोलनों का उद्देश्य अक्सर भारत को एक ऐसे दमनकारी राज्य के रूप में पेश करना प्रतीत होता है, जो अपने लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को कमज़ोर करता है। संभल हिंसा भी इसी कथानक का एक हिस्सा प्रतीत होती है, जिसमें विदेशी और घरेलू मीडिया द्वारा भारत पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया गया है।
संभल हिंसा के मद्देनजर, सार्वजनिक विमर्श का फोकस अराजकता की निंदा करने से हटकर उन लोगों की छवि धूमिल करने पर केंद्रित हो गया है, जिन्होंने सर्वेक्षण के लिए कानूनी सहारा मांगा था। अदालत द्वारा आदेशित जांच के पीछे के याचिकाकर्ताओं को अपने अधिकारों का प्रयोग करने वाले वैध अभिनेताओं के रूप में पहचाने जाने के बजाय, सांप्रदायिक कलह के लिए ज़िम्मेदार भड़काऊ अपराधियों के रूप में चित्रित किया जा रहा है। यह विकृति वाम-उदारवादी आख्यानों के भीतर एक व्यापक पूर्वाग्रह को दर्शाती है, जो अक्सर विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में निवारण की मांग करने वाले हिंदुओं को क़ानूनी रूप से अपने अधिकारों की माँग करने वाले व्यक्तियों के बजाय आंदोलनकारी के रूप में चित्रित करते है।
संभल हिंसा जैसी घटनाओं पर वाम-उदारवादी तंत्र का रुख परोक्ष रूप से यह सुझाव देता प्रतीत होता है कि हिंदुओं को विवादास्पद समझी जाने वाली याचिकाएं दायर करने से बचना चाहिए। यह आख्यान प्रभावी रूप से याचिकाकर्ताओं को हिंसा भड़काने के लिए दोषी ठहराता है।
सामने आ रहे साक्ष्य कई हितधारकों से जुड़ी एक सुनियोजित साज़िश की संभावना की ओर इशारा करते हैं। संभल शाही जामा मस्जिद मामले में मुख्य याचिकाकर्ता एडवोकेट विष्णु शंकर जैन को कई बार जान से मारने की धमकियां[11] और ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाओं का सामना करना पड़ा है।[12] विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में एक प्रमुख व्यक्ति जैन, अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मामले और वाराणसी में चल रहे श्रृंगार-गौरी-ज्ञानवापी मामले सहित महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहे हैं।
जैन को बार बार मिली धमकियां अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि हिंदू समुदाय की न्याय की खोज को रोकने के उद्देश्य से गाढ़े जा रहे एक व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं। कट्टरपंथी इस्लामवादी समूह और वाम-उदारवादी गुट धर्मनिरपेक्षता के बैनर का इस्तेमाल विवादित स्थलों पर हिंदू दावों को गलत साबित करने के लिए एक हथियार के रूप में करते हैं।
भारत के पूजा स्थल अधिनियम का आलोचनात्मक मूल्यांकन
पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का इस्तेमाल अक्सर वामपंथी-उदारवादी हितधारकों और कुछ मुस्लिम नेताओं द्वारा विवादित धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण के लिए अदालती आदेशों को चुनौती देने हेतु किया जाता है, अक्सर इन आदेशों को असंवैधानिक करार देते हुए। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 द्वारा शासित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या पुरातात्विक स्थल, 1991 अधिनियम के दायरे से बाहर हैं।[13] संभल एक ऐसा ही स्थल है।
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के तहत अधिनियमित, 1991 अधिनियम पूजा स्थलों के धार्मिक चरित्र की यथास्थिति को बनाए रखने का प्रयास करता है, यानी कि जो स्थिति 15 अगस्त, 1947 को थी, वही वर्तमान समय और भविष्य में भी बरकरार रहे। इस क़ानून के अंतर्गत एकमात्र अपवाद का प्रावधान राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के लिए रखा गया था, चूँकि यह मामला पहले से ही न्यायिक विचाराधीन था। [14]
2022 में संपन्न हुई सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई में, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की कि अधिनियम किसी धार्मिक स्थल के चरित्र को बदलने पर रोक लगाता है, लेकिन अदालतों को इसकी धार्मिक प्रकृति का निर्धारण करने से नहीं रोकता है।[15] हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल अवलोकन मात्र थीं और इन्हें कोर्ट के बाध्यकारी फैसले के रूप में नहीं लिया जाना चाहिये, वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर कार्यवाही के दौरान की गई यह टिप्पणियाँ वर्तमान परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण हो गयी हैं क्योंकि अधिनियम को चुनौती देने वाली कई जनहित याचिकाएं (पीआईएल) अब सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के अधीन हैं।[16]
शीर्ष अदालत ने विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े नए मामलों की सुनवाई को लेकर निचली अदालतों पर अस्थायी रोक लगाते हुए अधिनियम पर सरकार के विचार मांगे हैं। उसने यह भी निर्देश दिया है कि 1991 के अधिनियम के बारे में निर्णय तक पहुंचने तक , फ़िलहाल चल रहे मामलों में कोई नया सर्वेक्षण नहीं किया जाएगा।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की पिछली टिप्पणियों ने एक महत्वपूर्ण बिंदु को उजागर किया: कई विवादित स्थलों में स्पष्ट धार्मिक पहचान का अभाव है, जिससे अधिनियम द्वारा अनिवार्य 1947 की कट-ऑफ को लागू करने से पहले उनके ऐतिहासिक और धार्मिक चरित्र का पता लगाना ज़रूरी हो जाता है। उदाहरण के लिए, ज्ञानवापी मस्जिद मामले में, याचिकाकर्ता व्यास परिवार ने दावा किया कि उन्होंने 1993 तक मस्जिद के तहखाने में प्रार्थना की, जब तक कि पहुंच प्रतिबंधित नहीं हो गई। उन्होंने तर्क दिया कि वंशानुगत पुजारी के रूप में, उन्हें विवादित स्थल के भीतर अपने धार्मिक अनुष्ठान फिर से शुरू करने का वैध अधिकार है।[17]
ज्ञानवापी का विवादित स्थल लंबे समय से सांस्कृतिक और धार्मिक विवाद का केंद्र बिंदु रहा है। ऐतिहासिक रूप से, यह स्थल एक दोहरे धार्मिक स्थान के रूप में कार्य करता प्रतीत होता है, जिसमें हिंदू कथित तौर पर इसके तहखाने में अनुष्ठान करते थे। मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि हिंदू उपासक नियमित रूप से “व्यासजी का तहखाना” कहे जाने वाले क्षेत्र में प्रार्थना करते थे, जब तक कि पहुंच प्रतिबंधित नहीं हो गई। जनवरी 2024 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट के बाद, वाराणसी की एक अदालत ने इस तहखाने में पूजा अनुष्ठान की अनुमति दे दी। एएसआई की रिपोर्ट में इस स्थल पर एक बड़े हिंदू मंदिर की मौजूदगी की संभावना का उल्लेख था, जिसे सत्रहवीं शताब्दी में ध्वस्त कर दिया गया था।[18]
संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर भी कुछ ऐसी ही कहानी प्रचलित है, जो कि वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा साँझा किए गए निजी अनुभवों के माध्यम से इस विवादित स्थल की जटिल ऐतिहासिक पहचान चित्रित करती है। स्थानीय बुजुर्ग इस स्थल को “हरि हरि मंदिर” के रूप में याद करते हैं, जिससे यह अंदाज़ा लगता है कि यह कभी हिंदुओं की धार्मिक आस्था का केंद्र भी रहा होगा।[19] पत्रकार और हिंदू अधिकार कार्यकर्ता स्वाति गोयल शर्मा ने संभल में व्यापक स्तर पर फील्डवर्क किया, जिसमें प्रत्यक्ष अनुभवों के माध्यम से स्थल के दोहरे धार्मिक चरित्र का दस्तावेजीकरण किया गया। उनके निष्कर्षों के अनुसार, 1978 के सांप्रदायिक दंगों तक हिंदू इस स्थल पर अक्सर आते थे, जिसके कारण महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलाव हुए। दंगों के बाद कई हिंदू डर के मारे इस क्षेत्र से पलायन कर गए, जिससे यह स्थल मुख्य रूप से मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बन गया।[20]
इंडिया टीवी के साथ एक साक्षात्कार में, शर्मा ने दंगों के बाद हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के बारे में विस्तार से बताया। क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी काफी कम हो गई, खासकर विवादित स्थल के पास। बुजुर्ग निवासियों ने बातचीत के दौरान विवादित मस्जिद के पास स्थित एक कुएँ का ज़िक्र किया, जिसे अब पुलिस द्वारा ढक दिया गया है और उसकी सुरक्षा की जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक समय ऐसा था जब इस कुएँ पर हिंदू पूजा अनुष्ठान करते थे। शर्मा ने विभाजन के दौरान पाकिस्तान से संभल आए शरणार्थियों के साथ बातचीत को याद किया। इनमें से कई शरणार्थियों ने अपने आगमन पर इस स्थल की पहचान “हरि हरि मंदिर” के रूप में की। स्वतंत्रता के समय के स्थानीय लोगों ने इस विवादित स्थल की संरचना को अल्पविकसित और अपरिपक्व बताया। उनके अनुसार पहले के समय में इस बात को निर्धारित करने के लिए कोई स्पष्ट संकेत नहीं था कि यह स्थल मंदिर था या मस्जिद। उनके साक्षात्कारों के अनुसार, यह स्थल हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का था, जो एक धुंधले धार्मिक चरित्र को दर्शाता है जो समकालीन आख्यानों को चुनौती देता है।[21]
ऐसे स्थलों से जुड़े विवादों ने पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के औचित्य को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि यह धार्मिक समुदायों को अपने पूजा स्थलों को पुनः प्राप्त करने के लिए कानूनी उपाय मांगने के अधिकार से वंचित करके धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत को कमज़ोर करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिनियम मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें धर्म का पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार शामिल है। वे विवादित धार्मिक स्थलों को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से मुकदमों को प्रतिबंधित करके न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत का उल्लंघन करने के लिए अधिनियम की आलोचना करते हैं, जो भारत के संवैधानिक ढांचे की आधारशिला है।[22]
संभल हिंसा प्रकरण में विपक्ष की भूमिका
अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण भारत के राजनीतिक परिदृश्य की एक पुरानी विशेषता रही है, जो पार्टी लाइनों से परे है। चाहे वह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हो या कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियाँ, राजनीतिक रणनीतियाँ अक्सर विशिष्ट मतदाता आधारों को पूरा करने के इर्द-गिर्द केंद्रित होती हैं। दुर्भाग्य से, संभल हिंसा को इसी दायरे में घसीटा गया है, जो कानून और व्यवस्था के सीधे मुद्दे के बजाय राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का एक साधन मात्र बन कर रह गया है।
विपक्ष ने संभल हिंसा को राजनीतिक विवाद का विषय बना दिया है, और उत्तर प्रदेश सरकार पर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। फोरेंसिक साक्ष्य संकेत देते हैं कि पीड़ितों की मौत देसी पिस्तौल से चलाई गई गोलियों से हुई थी – मौजूदा तथ्य राज्य प्रायोजित हिंसा के दावों का खंडन करते हैं। फिर भी, विपक्षी नेताओं का आरोप है कि संभल हिंसा एक जानबूझकर की गई कार्रवाई थी, जिसे सत्तारूढ़ भाजपा ने पुलिस के साथ मिलीभगत करके अंजाम दिया। इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा में बार-बार उठाया गया है, जिसमें समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियाँ इसे राजनीतिक लाभ हेतु रची गई सांप्रदायिक साज़िश के रूप में पेश कर रही हैं।[23] कांग्रेस पार्टी ने भी इस घटना का फायदा उठाने की कोशिश की है, पीड़ितों से मुलाकात की है और संभल हिंसा को भाजपा की सोची-समझी रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया है।
संभल विवाद का एक बेहद खास पहलू विपक्षी दलों के आख्यानों का वाम-उदारवादी तंत्र द्वारा प्रचारित आख्यानों से मेल खाना है। इस विमर्श का केंद्र पूजा स्थल अधिनियम, 1991 है, जिसे कुछ इस अन्दाज़ में चित्रित किया जाता है, मानो यह कोई ऐसा पवित्र क़ानून हो जिसे कोई छू भी नहीं सकता और जिसका प्राथमिक उद्देश्य अल्पसंख्यक अधिकारों की अभेद्य सुरक्षा है। हालांकि, इस तरह के भ्रामक चित्रण इस वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करते हैं कि यह अधिनियम एक क़ानून मात्र है जिसे संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुसार संशोधित या निरस्त किया जा सकता है। विपक्षी नेताओं ने तर्क दिया है कि प्राचीन मंदिरों को पुनः प्राप्त करने की मांग करने वाले हालिया कानूनी मामले अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं। सार रूप में यह कह सकते हैं कि इन मामलों को निचली अदालतों द्वारा स्वीकार किए जाने को इस अधिनियम और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमले के रूप में चित्रित किया गया है।[24]
हालाँकि, यह कहानी बहुत ही सरल तरीके से पेश की गई है। प्राचीन धार्मिक स्थलों को फिर से प्राप्त करने के लिए हिंदुओं के प्रयासों में मुख्य रूप से कानूनी रास्तों का पालन किया गया है। इन मामलों में, विवादित स्थलों पर पहले हिंदुओं द्वारा की गई पूजा के बारे में ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं, और कई सर्वेक्षणों में ऐसी कलाकृतियाँ मिली हैं जो मंदिरों के अस्तित्व को दर्शाती हैं। हिंसा या अवैध तरीकों से इन स्थानों को फिर से प्राप्त करने की बजाय, हिंदू याचिकाकर्ताओं ने अपने दावों को पेश करने के लिए एक सुव्यवस्थित और वैध तरीका अपनाया है।
इन मुद्दों को राजनीति से जोड़ने से न केवल लोगों की सोच प्रभावित होती है, बल्कि यह सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ाता है। इससे एक ऐसा चक्र बन जाता है, जिसमें हिंसा जैसी घटनाएँ राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग होती हैं, जिससे समाज में और भी विभाजन और अशांति फैलती है। यह दुष्चक्र अवसरवादी नेताओं को फायदा पहुँचाता है और सामाजिक विभाजन को और गहरा करता है, जिससे वास्तविक समाधान या न्याय की संभावना बहुत कम हो जाती है।
भारत के सांस्कृतिक पुनर्स्थापना के प्रति शत्रुभाव
भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक लोकाचार के पुनरुद्धार की मुहिम का विरोध वाम-उदारवादी तंत्र के लिए एक केंद्र बिंदु बन गया है, जो अक्सर ऐसे प्रयासों को प्रतिगामी या विभाजनकारी बताता है। जबकि वैश्विक स्तर पर, औपनिवेशिक शासन की छाया से निकल अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनः स्थापित करना व्यापक रूप से एक वैध और आवश्यक प्रक्रिया के रूप में माना जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रीस ने, जैसा कि ऑपइंडिया के एक लेख में बताया गया है, सक्रिय रूप से उन चर्चों को बहाल किया है जिन्हें ओटोमन शासन के दौरान मस्जिदों में बदल दिया गया था, जिनमें से कई को 19वीं और 20वीं शताब्दी में पुनः स्थापित किया गया था।[25] इसी तरह, माली में, सरकार ने हाल ही में अपनी राजधानी बामाको में 25 सार्वजनिक स्थानों के नाम बदल डाले। माली सरकार ने औपनिवेशिक युग में दिये गये नामों को बदलकर इन सार्वजनिक स्थलों का विभिन्न अफ्रीकी हस्तियों के नामों के आधार पर नये सिरे से नामकरण किया। यह पहल निश्चित तौर पर सांस्कृतिक स्वतंत्रता की ओर एक कदम का संकेत है।[26]
दुनिया भर में, इस तरह की पहलों को गरिमा और विरासत की बहाली के रूप में मनाया जाता है। लेकिन जब भारत की बात आती है, तो इसकी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के किसी भी प्रयास को अक्सर तिरस्कार और शत्रुता के साथ देखा जाता है। आलोचक अक्सर यह तर्क देते हैं कि भारत की सड़कों, पार्कों और स्थलों पर आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों के नाम अंकित रहने चाहिए, जबकि वे इस बात को नजरअंदाज करते हैं कि इन आतातायिओं ने देश के हृद्य पटल पर कितने गहरे घाव छोड़े हैं।
यह प्रतिरोध अक्सर संवैधानिक बयानबाज़ी की चाशनी में लिपटा होता है, और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को “संविधान-विरोधी” के रूप में चित्रित करता है। हालाँकि, भारतीय संविधान, किसी भी जीवित दस्तावेज़ की तरह, व्याख्या और संशोधन के अधीन है। यह एक अपरिवर्तनीय पाठ नहीं है, न ही इसका दुरुपयोग औपनिवेशिक विरासतों का महिमामंडन करने या नव-औपनिवेशिक सांस्कृतिक वर्चस्व का बचाव करने के लिए किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर देश के सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का विरोध करने के व्यापक प्रयास में जबरन घसीटा गया है। हालाँकि, यह कथानक अक्सर एक छलावे के रूप में कार्य करता है, जो समुदाय को सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का समाधान करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय आक्रमणकारियों की मानसिकता से जोड़े रखता है। यह विमर्श एक अति-आक्रामक पहचान को बढ़ावा देता है जो मुस्लिम समुदाय को भारत की हिंदू जड़ों से अलग करती है, और एकता को बढ़ावा देने के बजाय विभाजन को प्रोत्साहन देती है।
यह रवैया एकदम ग़ैर-ज़िम्मेदाराना व भ्रामक है। भारतीय मुसलमानों को एक ऐसे कथानक के भीतर खुद को फिर से स्थापित करने पर विचार करना चाहिए जो भारत की प्राचीन सभ्यतागत लोकाचार के साथ संरेखित हो। भारत के मुस्लिम समुदाय को ज़रूरत है कि वे आक्रमणकारियों की विवादास्पद विरासत से चिपके रहने के बजाय भारत की समृद्ध साझा विरासत को अपनायें। बर्बर आक्रमणकारियों और लुटेरों के इतिहास के साथ ज़बरदस्ती अपनी पहचान के तार जोड़ना केवल अलगाव को गहरा करता है और प्रगति का मार्ग अवरुद्ध करता है।
लेखिका और शोधकर्ता अर्शिया मलिक ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक विचारात्मक लेख के माध्यम से इस मुद्दे को उजागर किया। वह मार्क्सवादी इतिहासकारों की भूमिका की आलोचना करती हैं, जो एक विकृत कथा को आकार देते हैं, इस्लामी आक्रमणों के प्रभाव को कम करके आंकते हैं, और मंदिरों और सांस्कृतिक प्रतीकों के विनाश की कटु सच्चाइयों पर पर्दा डालते हैं। मलिक भारतीय मुसलमानों से इन कथाओं में निहित थोपी गई पहचान को अस्वीकार करने और अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पर एक नये सिरे से विचार करने का आग्रह करती हैं। जैसा कि मलिक ने सटीक रूप से कहा है, भारतीय मुसलमानों के पास भारत के व्यापक सभ्यतागत ढांचे के भीतर अपनी जगह को फिर से परिभाषित करने का अवसर है – जो साझा इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए आपसी सम्मान में निहित है:
भारतीय मुसलमानों के लिए, यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान एक चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है। चुनौती रक्षात्मक इनकार के जाल में पड़े बिना हिंदुओं की ऐतिहासिक शिकायतों को स्वीकार करने में हालाँकि, अवसर संयोग के एक नए प्रतिमान को अपनाने में निहित है – जो भारत के बहुलवादी चरित्र को मान्यता देता है और देश के सांस्कृतिक और राजनीतिक पुनर्जागरण में सकारात्मक योगदान देने का प्रयास करता है। [27]
संदर्भ
[1] Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0 by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan
[2] As Islamists go on a rampage against a court-ordered survey of Jama Masjid, left-liberals blame Centre, former CJI for violence; https://www.opindia.com/2024/11/as-violence-grips-sambhal-over-court-ordered-survey-of-jama-masjid-left-liberals-twist-facts-to-shield-riotous-islamists-and-blame-authorities/#google_vignette
[3] Sambhal violence: Autopsy suggests deaths caused by country-made weapons, says DM | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/sambhal-violence-autopsy-suggests-deaths-caused-by-country-made-weapons-says-dm/articleshow/115677076.cms
[4] Sambhal Violence: A pre-mediated attack with a foreign element to it; https://organiser.org/2024/12/09/268504/bharat/sambhal-violence-a-pre-mediated-attack-with-a-foreign-element-to-it/
[5] Sambhal: Fear grips Indian city after deadly weekend clashes; https://www.bbc.com/news/articles/cr7ndg52y3zo#
[6] Sambhal Riot Accused MP To Face New FIR After ‘Electricity Theft’ Charge | Times Now; https://www.timesnownews.com/india/sambhal-riot-samajwadi-mp-zia-ur-rehman-barq-to-face-new-fir-after-electricity-theft-charge-article-116460959
[7] Show cause notice issued to Sambhal violence accused Samajwadi Party MP Zia ur Rehman Barq for unauthorised construction; https://www.opindia.com/2024/12/show-cause-notice-issued-to-sambhal-violence-accused-samajwadi-party-mp-zia-ur-rehman-barq-for-unauthorised-construction/
[8] Sambhal violence: 33 sent to jail, 400 persons identified so far; https://www.opindia.com/2024/12/sambhal-violence-33-sent-to-jail-400-identified-says-dm-rajendra-pensiya/
[9] Sambhal Violence: A pre-mediated attack with a foreign element to it; https://organiser.org/2024/12/09/268504/bharat/sambhal-violence-a-pre-mediated-attack-with-a-foreign-element-to-it/
[10] Ibid.
[11] संभल मस्जिद के याचिकाकर्ता विष्णु शंकर जैन को हत्या की धमकी | Sambhal masjid ke yachikakarta vishnu shankar jain ko hatya ki dhamki; https://hindi.opindia.com/news-updates/vishnu-shankar-jain-receives-death-threats-after-sambhal-mosque-violence/
[12] Lawyer for Hindu Group Receives Online Threat Amid Mosque Dispute | Meerut News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/meerut/lawyer-for-hindu-group-receives-online-threat-amid-mosque-dispute/articleshow/116221999.cms
[13] [13] Places of Worship Act, 1991- Provisions and Exemptions: Explained; https://www.opindia.com/2022/05/explained-places-of-worship-act-1991-provisions-and-exemptions-in-the-law-gyanvapi-dispute/
[14] Ibid.
[15] Remarks made in court an observation: Ex-CJI | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/remark-made-in-court-an-observationexcji-101734116493579.html
[16] Remark made in court an observation: Ex-CJI | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/remark-made-in-court-an-observationexcji-101734116493579.html
[17] Hindus Allowed To Worship in Sealed Basement of Varanasi’s Gyanvapi Mosque; https://www.ndtv.com/india-news/hindus-allowed-to-worship-in-sealed-basement-of-varanasis-gyanvapi-mosque-4966487
[18] Here’s All About The ‘Vyasji Ka Tehkhana’ in Gyanvapi Complex Where Varanasi Court Has Allowed Puja by Hindus; https://swarajyamag.com/news-brief/heres-all-about-the-vyasji-ka-tehkhana-in-gyanvapi-complex-where-varanasi-court-has-allowed-puja-by-hindus#:~:text=The%20Gyanvapi%20complex.,in%20the%20Gyanvapi%20mosque%20complex
[19] 16th-Century Mosque Standing On Shri Hari Har Temple Ruins In Sambhal, Residents Testify About Mosque Officials Denying Access to Ancient Well For Hindu Rituals; https://thecommunemag-com.translate.goog/16th-century-mosque-standing-on-shri-hari-har-temple-ruins-in-sambhal-residents-testify/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc
[20] Swati Goel Sharma on x; https://x.com/swati_gs/status/1861661337958453495?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1861661337958453495%7Ctwgr%5E78b83be90cda83949c291297a65808838b3c3129%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fthecommunemag.com%2F16th-century-mosque-standing-on-shri-hari-har-temple-ruins-in-sambhal-residents-testify
[21] Coffee Par Kurukshetra: संभल का हिंदू सर्वे क्या कहता है? | Sambhal Masjid Survey | Sambhal News – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=POCcBINXJhQ
[22] CJI-led bench to hear pleas against Places of Worship Act on December 12 | India News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/india/sc-places-worship-act-pleas-special-bench-9711758/
[23] Sambhal violence: Uproar in UP Assembly as government, opposition take potshots at each other; https://www.newindianexpress.com/nation/2024/Dec/16/sambhal-violence-uproar-in-up-assembly-as-government-opposition-take-potshots-at-each-other
[24] Places of Worship Act must be implemented in letter and spirit: Congress; https://www.nationalheraldindia.com/politics/places-of-worship-act-must-be-implemented-in-letter-and-spirit-congress#google_vignette
[25] Western media maligns India over Ram Mandir Pran Pratishtha: How Greece reclaimed churches turned into mosques under Ottoman rule; https://www.opindia.com/2024/01/western-media-maligns-india-over-ram-mandir-how-greece-reclaimed-churches-turned-into-mosques-under-ottoman-rule/
[26] Mali: Bamako renames 25 public places to honor national history; https://www.senenews.com/en/africa/mali-bamako-renames-25-public-places-to-honor-national-history-5216.html
[27] Global backlash against Muslims: Call for reflection, modernization – THE NEW INDIAN; https://www.newindian.in/global-backlash-against-muslims-call-for-reflection-modernization/
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