यूके के यूनिवर्सिटी कैंपसों में बढ़ता इस्लामी कट्टरपंथ का ख़तरा : भारतीय छात्रों के लिए एक चेतावनी

यूएई द्वारा यूके की यूनिवर्सिटियों की फंडिंग रोकना केवल औपचारिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था में कट्टर इस्लामी नेटवर्क गहराई से जड़ें जमा चुके हैं।

 

 

  • 7 अक्टूबर के बाद पश्चिमी विश्वविद्यालयों में प्रो-हमास प्रदर्शनों ने वोक राजनीति, वैचारिक अज्ञानता और यहूदी-विरोधी भावनाओं के खतरनाक मेल को उजागर किया।
  • ब्रिटिश कैंपसों में बढ़ते इस्लामवादी प्रभाव को देखते हुए यूएई द्वारा फंडिंग रोकना शिक्षा व्यवस्था पर गहराते संकट की स्पष्ट चेतावनी है।
  • मुस्लिम ब्रदरहुड ने दशकों में छात्र संगठनों, अकादमिक संस्थानों और सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से यूरोप में संगठित घुसपैठ स्थापित की है।
  • ब्रिटेन में ‘इस्लामोफोबिया’ की राजनीति और सरकारी तुष्टिकरण ने कट्टरपंथ के खिलाफ ठोस कार्रवाई को कमजोर किया है।
  • बदलते कैंपस माहौल, भारत-विरोधी विमर्श और वैचारिक दबाव भारतीय छात्रों व अभिभावकों के लिए नए और गंभीर जोखिम पैदा कर रहे हैं।

7 अक्टूबर को इज़रायल पर हमास के आतंकी हमलों के बाद पश्चिमी विश्वविद्यालयों में जिस तरह हमास-समर्थक गतिविधियाँ बढ़ीं, उन्हें किसी भी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इन प्रदर्शनों के पीछे कई जटिल कारण थे, लेकिन कुल मिलाकर यह ‘वोकिज़्म’ की एक विकृत और डरावनी तस्वीर ही पेश करते हैं। शांति, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे जाने-पहचाने नारों की आड़ में, वोक सोच से प्रभावित छात्रों की आक्रामक भीड़ ने खुले तौर पर यहूदी-विरोधी भावनाएँ दिखाईं।

7 अक्टूबर के बाद पश्चिमी कैंपसों में जिस तेज़ी से प्रो-हमास गतिविधियाँ फैलीं, वह उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें दोषी खुद को पीड़ित बताने लगते हैं। विडंबना यह रही कि इन प्रदर्शनों में शामिल कई युवाओं को न तो यह ठीक से पता था कि वे किसका समर्थन कर रहे हैं, और न ही उन मुद्दों का इतिहास और सच्चाई क्या है। वास्तव में, यह उग्र भीड़ विश्वविद्यालयों में फैल रहे इस्लामवादी कट्टरपंथ की ही शिकार थी।

इसी पृष्ठभूमि में यूएई का हालिया फैसला खास महत्व रखता है। ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में बढ़ते कट्टरपंथ, खासकर मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रभाव को देखते हुए, यूएई ने यूके जाने वाले छात्रों की सरकारी फंडिंग रोक दी है।

किसी इस्लामिक देश का यह मानकर एहतियाती कदम उठाना कि उसके युवा ब्रिटिश कैंपसों में कट्टर सोच के प्रभाव में आ सकते हैं, अपने आप में एक बड़ी चेतावनी है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि ब्रिटेन की उच्च शिक्षा व्यवस्था में कट्टर इस्लामवादी प्रभाव गहराई से जड़ जमा चुका है, जिसमें सरकार की तुष्टिकरण नीति का भी योगदान रहा है।

भारत के उन छात्रों के लिए, जो उच्च शिक्षा के लिए पश्चिमी देशों की ओर देखते हैं, अमेरिका की कड़ी होती वीज़ा नीति के चलते ब्रिटेन एक उभरता हुआ विकल्प बन रहा है। लेकिन यह विकल्प अब गंभीर चिंता का विषय भी बनता जा रहा है।

इस पृष्ठभूमि में यह विशेष रूप से चिंताजनक है कि भारत के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में आज भी ‘वोक’ सोच से प्रभावित ऐसे वक्ताओं को मंच मिलता है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कट्टर इस्लामवादी विचारधाराओं के प्रति सहानुभूति या समर्थन प्रदर्शित करते हैं। वहीं, ऑक्सफोर्ड जैसे शीर्ष ब्रिटिश संस्थानों में पढ़ने वाले भारतीय छात्र एक ऐसे शैक्षणिक वातावरण का सामना कर रहे हैं, जहाँ भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विमर्श को धीरे-धीरे, लेकिन योजनाबद्ध और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जा रहा है।

ऐसे हालात में भारतीय अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि वे समय रहते ब्रिटिश कैंपसों की वास्तविक स्थिति को समझें और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर सोच-समझकर फैसले लें।

कैंपसों पर इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के पनपने की आशंका: यूएई का यूके यूनिवर्सिटियों को स्पष्ट संदेश

परिस्थितियों के एक नाटकीय मोड़ के रूप में, यूएई ने हाल ही में अपने नागरिकों को ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए मिलने वाली सरकारी फंडिंग पर रोक लगा दी है। यूएई का कहना है कि ब्रिटेन की शिक्षा व्यवस्था में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े तत्वों का प्रभाव इतना गहरा हो चुका है कि वहाँ अध्ययन करने वाले छात्र कट्टरपंथ की ओर प्रभावित हो सकते हैं। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है, जब यूके सरकार मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगाने से लगातार बचती रही है, जबकि यूएई सहित कई इस्लामिक देश इस संगठन को पहले ही आतंकी घोषित कर चुके हैं।[1]

यूएई के शिक्षा मंत्रालय ने हाल ही में विदेशी विश्वविद्यालयों की एक संशोधित सूची जारी की, जिन्हें आधिकारिक मान्यता और सरकारी फंडिंग के लिए मंज़ूरी दी गई है। इस सूची में अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यहाँ तक कि इज़रायल की विश्वविद्यालयें भी शामिल थीं, लेकिन ब्रिटिश विश्वविद्यालय पूरी तरह अनुपस्थित थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने इस पर आपत्ति जताई, तो यूएई प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि यह निर्णय बहुत सोच समझ कर लिया गया था, क्योंकि “वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे विश्वविद्यालय परिसरों में कट्टरपंथ की ओर धकेले जाएँ।[2]

इसी बीच, GB News की एक हालिया रिपोर्ट ने यूके विश्वविद्यालयों में Muslim Brotherhood की बढ़ती पैठ को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, यह संगठन छात्र समूहों को आड़ के रूप में इस्तेमाल करता है, ताकि औपचारिक जाँच-पड़ताल से बचते हुए अपनी चरमपंथी विचारधारा का प्रसार कर सके। इन छात्र संगठनों के माध्यम से परिसरों में इस्लामवादी वक्ताओं को आमंत्रित किया जाता है, जिनके व्याख्यान युवाओं को कट्टरता की दिशा में प्रभावित कर सकते हैं। रिपोर्ट में यूके के आधिकारिक आँकड़ों का भी उल्लेख है, जिनके अनुसार 2023–24 के शैक्षणिक वर्ष में 70 विश्वविद्यालय छात्रों को इस्लामवादी कट्टरपंथ की आशंका के आधार पर सरकार के Prevent डी-रैडिकलाइज़ेशन कार्यक्रम के अंतर्गत संभावित रेफ़रल के लिए चिन्हित किया गया। उल्लेखनीय है कि यह संख्या पिछले शैक्षणिक वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी थी।[3] [4]

यह पहली बार नहीं है, जब यूएई ने मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर यूके को चेतावनी दी हो। यूएई ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार पर बार-बार व्यापारिक और भू-राजनीतिक दबाव बनाया है। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2015 में यूएई ने कथित तौर पर यूके को आगाह किया था कि अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरून  मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहे, तो अरबों पाउंड के हथियार सौदे रोके जा सकते हैं, देश में आने वाला निवेश बंद किया जा सकता है, और खुफिया सहयोग भी ठप्प किया जा सकता है।[5]

StopHindudvesha ने यूरोप में तेजी से बढ़ रहे कट्टर इस्लामीकरण पर विस्तार से चर्चा की है। यूरोप में कट्टर इस्लामीकरण के बढ़ते प्रभाव के चलते वहाँ चरम दक्षिणपंथी एक्टिविज़्म को ख़ासा बढ़ावा मिला है। जिस बहुसंस्कृतिवाद (multiculturalism) के मॉडल ने दशकों तक यूरोप की पहचान को आकार दिया, वही आज पूरे महाद्वीप में गहन बहस और आत्ममंथन का विषय बन चुका है[6] लेकिन यूके एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र के तत्व सरकार और राजनीतिक विमर्श में इस कदर घुल-मिल चुके हैं कि इस्लामिस्ट कट्टरपंथ की समस्या से निपटने को लेकर की गई कोई भी बात तुरंत ‘इस्लामोफोबिया’ के आरोपों के घेरे में आ जाती है, जिससे कट्टर इस्लामिस्ट विचारधारा के विरोध में उठने वाला कोई भी स्वर शुरुआत में ही दबा दिया जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि एक ओर यूके सरकार आज तक ‘इस्लामोफोबिया’ की कोई स्पष्ट आधिकारिक परिभाषा तय नहीं कर पाई है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर भी वह लगातार टालमटोल करती रही है। संगठन को भले ही “क्लोज़ रिव्यू” के तहत रखा गया हो, लेकिन उस पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। 2015 में डेविड कैमरून की सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड की गतिविधियों की समीक्षा के बाद यह माना था कि इसे “चरमपंथ का संभावित संकेतक” समझा जा सकता है, फिर भी प्रतिबंध लगाने से परहेज़ किया गया।[7]

ब्रिटिश कैंपसों में इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को लेकर उठाई जाने वाली गंभीर चिंताओं के बावजूद, यूके के कई मुस्लिम राजनेता आज भी आतंकवाद की लीपापोती करने के प्रयास में लिप्त दिखते हैं। अप्रैल 2025 में द स्पेक्टेटर में छपे एक लेख में लेखक ने ईद पर लंदन के मेयर सादिक़ ख़ान के सोशल मीडिया संदेश की आलोचना करते हुए उसे असंतुलित और विवादास्पद बताया: “एकता और शांति” की भाषा की आड़ में ख़ान ने एक ऐसा राजनीतिक भाषण दिया जो आतंकवाद को परोक्ष रूप से वैध ठहराता है, समाज में विभाजन बढ़ाता है और इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष के नैतिक संदर्भ को मूल रूप से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करता है।”

सितंबर 2025 में यहूदी मीडिया ने शबाना महमूद की नियुक्ति पर सवाल खड़े करते हुए उनके फ़िलिस्तीन समर्थक अभियानों और BDS आंदोलन से जुड़ाव की ओर ध्यान दिलाया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वे 2014 में हुए एक विरोध प्रदर्शन में शामिल थीं, जिसके बाद एक सेंसबरी सुपरमार्केट को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ा।[8]

मुस्लिम ब्रदरहुड का इतिहास

1928 में मिस्र में एक स्कूल शिक्षक और इस्लामिक मौलवी हसन अल-बन्ना द्वारा स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड की नींव ही एक ऐसी विचारधारा पर टिकी थी, जो शरिया, यानी इस्लामिक क़ानून के आधार पर इस्लामिक राज्यों की स्थापना की पैरवी करती है। इसका नारा, इस्लाम ही समाधान है, इसकी कट्टर इस्लामिस्ट सोच को स्पष्ट तौर पर उजागर करता है। काहिरा रिव्यू ऑफ़ ग्लोबल अफेयर्स ने इसे पिछली सदी के दूसरे दशक में अपनी स्थापना के समय से ही एक “कट्टर, धार्मिक-शासनवादी (थियोकैटिक) संगठन” के रूप में वर्णित किया है।

1954 में मुस्लिम ब्रदरहुड के एक सदस्य ने अलेक्ज़ान्ड्रिया में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर की हत्या की कोशिश की। उसने उस मंच पर आठ गोलियाँ चलाईं, जहाँ राष्ट्रपति भाषण दे रहे थे। नासिर तो बाल-बाल बच गए, लेकिन मंच पर मौजूद कई अन्य लोग घायल हो गए। इस हमले के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई और उसके सैकड़ों सदस्यों को जेल में डाल दिया गया।[9] [10] [11]

स्थापना के कुछ ही समय बाद मुस्लिम ब्रदरहुड ने पूरे अरब जगत में अपनी शाखाएँ खड़ी कर लीं। अरब दुनिया से बाहर के कई कट्टर इस्लामिस्ट आंदोलन, जो आज आतंकवाद फैलाने में अपनी भूमिका को लेकर बदनाम हैं, अपनी वैचारिक जड़ें मुस्लिम ब्रदरहुड से ही जोड़ते हैं। पाकिस्तान स्थित जमात-ए-इस्लामी ऐसा ही एक संगठन है, जिसकी सोच मुस्लिम ब्रदरहुड की कट्टर इस्लामी विचारधारा से प्रभावित रही है।

1950 के दशक में मिस्र सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ़ अपनी कार्रवाई और तेज़ कर दी। वजह थी इस्लाम की उसकी राजनीतिक व्याख्या, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा माना गया। मिस्र में संगठन पर प्रतिबंध लगने के बाद, आने वाले दशकों में इराक, ट्यूनीशिया और सीरिया समेत कई अन्य इस्लामिक देशों ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड के ख़िलाफ़ इसी तरह की सख़्त कार्रवाइयाँ शुरू कीं।

इसी प्रक्रिया ने मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए धीरे-धीरे यूरोप में घुसपैठ का रास्ता खोला। संगठन के कई सदस्य शरणार्थी बनकर यूके, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड जैसे यूरोपीय देशों में पहुँचे और वहाँ रहते हुए उन्होंने इस्लामिस्ट संगठनों का नेटवर्क खड़ा करना शुरू किया। यही वह दौर था, जब मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा ने यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक ज़मीन पर अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं।[12]

ब्रिटिश समाज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में मुस्लिम ब्रदरहुड की घुसपैठ

मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1990 के दशक की शुरुआत से ही ब्रिटिश नागरिक समाज, राजनीतिक हलकों और अकादमिक जगत में गहरी पैठ बनानी शुरू कर दी थी। सितंबर 1999 में संगठन ने लंदन में एक “ग्लोबल इंफॉर्मेशन सेंटर” की स्थापना की। इसके उद्घाटन के बाद मुस्लिम न्यूज़ में प्रकाशित बताई जाने वाली एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि यह केंद्र “मुस्लिम ब्रदरहुड के दृष्टिकोण और रुख को बढ़ावा देने में विशेषज्ञता रखेगा और इस्लामिक आंदोलनों तथा वैश्विक मीडिया के बीच संवाद स्थापित करने का माध्यम बनेगा।”

1990 के दशक में लंदन में अफ़ग़ान इस्लामिस्टों की बढ़ती मौजूदगी ने भी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी थी। आरोप था कि ये तत्व फ्रांस के खिलाफ़ आतंकवादी गतिविधियों के संचालन के लिए लंदन का इस्तेमाल एक बेस के रूप में कर रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में फ्रांसीसी सुरक्षा एजेंसियों ने ब्रिटेन की राजधानी को व्यंग्यात्मक रूप से “लंदनिस्तान” कहना शुरू किया।[13]

इससे पहले, 1980 के दशक में भी लंदन में कई राजनीतिक इस्लामिस्ट संगठन उभरे, जिनका लक्ष्य मुस्लिम ब्रदरहुड की ही तरह खिलाफ़त की स्थापना था। इन्हीं में से एक संगठन था हिज़्ब उत-तहरीर (इस्लामिक लिबरेशन पार्टी—HT)। इस समूह ने शुरुआत में अरब छात्रों को निशाना बनाते हुए यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन जैसी प्रतिष्ठित ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों में अपनी पकड़ बनानी शुरू की। जल्द ही यह संगठन छात्र जगत में अपने विषैले एजेंडे के लिए बदनाम हो गया, जिसमें जियोनिज्म-विरोधी, यहूदी-विरोधी, हिंदू-विरोधी, सिख-विरोधी, समलैंगिक-विरोधी, और लोकतंत्र-विरोधी प्रचार शामिल था। हालात इतने बिगड़ गए कि 1994 में नेशनल यूनियन ऑफ़ स्टूडेंट्स ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद यहूदी छात्र संगठनों की तरफ़ से लगातार आने वाली शिकायतों के चलते धार्मिक दबाव के खिलाफ़ सख़्त दिशानिर्देश जारी किए गए।[14]

ब्रिटिश कैंपसों में बढ़ते इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के संदर्भ में एक और बेहद चिंताजनक पहलू यह है कि यूके में मुस्लिम ब्रदरहुड के कई नेता मूल रूप से छात्र के तौर पर ही देश में आए थे। अक्सर वे ऐसे प्रभावशाली परिवारों से संबंध रखते थे, जिनके संगठन से पहले से गहरे रिश्ते थे। उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में जन्मे और लंदन में पढ़ाई करने वाले इंजीनियरिंग छात्र अब्दुल्ला अल-हद्दाद एक प्रमुख ब्रदरहुड परिवार से थे और बाद में ख़ुद भी मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रवक्ता बने। उनके पिता, इस्साम अल-हद्दाद, ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम से पीएचडी की थी, इस्लामिक रिलीफ़ वर्ल्डवाइड की सह-स्थापना की थी और क़ाहिरा (Cairo) में गिरफ़्तारी व क़ैद से पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के वरिष्ठ सदस्य रहे थे।

रिपोर्टों के अनुसार, कई विश्वविद्यालय प्रोफेसर भी इस कट्टर इस्लामिस्ट संगठन से जुड़े पाए गए हैं। इनमें तारिक़ रमज़ान का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे 2017 तक University of Oxford के St Antony’s College में कंटेम्पररी इस्लामिक स्टडीज़ के प्रोफेसर रहे और विश्वविद्यालय के थियोलॉजी एंड रिलीजन विभाग से भी जुड़े थे। रमज़ान, मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक हसन अल-बन्ना के नाती हैं, और उनके पिता भी इस संगठन के एक प्रमुख सदस्य रह चुके थे।[15]

आज के दौर में फ़ेडरेशन ऑफ़ स्टूडेंट इस्लामिक सोसाइटीज़ (FOSIS) जैसे प्रभावशाली छात्र संगठनों के नाम भी मुस्लिम ब्रदरहुड से कथित संबंधों के चलते सामने आते हैं। 1963 में स्थापित FOSIS का दावा है कि वह यूके और आयरलैंड में 3.5 लाख से अधिक मुस्लिम छात्रों और इस्लामिक सोसाइटीज़ का प्रतिनिधित्व और समर्थन करता है।[16]

मुस्लिम ब्रदरहुड की एक बड़ी ताक़त, और साथ ही उसका सबसे बड़ा ख़तरा, उसकी अस्पष्ट, अपारदर्शी और विकेंद्रित संरचना है। इसी कारण प्रशासन के लिए संगठन के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई करना कठिन हो जाता है, और किसी भी व्यापक प्रतिबंध को ज़मीनी स्तर पर लागू करना भी आसान नहीं रहता। जैसा कि कई रिपोर्टों में[17] बताया गया है – पश्चिमी देशों में ब्रदरहुड की कार्यशैली “नियंत्रित विकेंद्रीकरण” पर आधारित है। उससे जुड़े अनगिनत संगठन पश्चिमी लोकतंत्रों में फैले हुए हैं, जो धीरे-धीरे नागरिक समाज, अकादमिक जगत और राजनीतिक ढांचे के भीतर खुद को स्थापित करते जाते हैं। ब्रदरहुड की छतरी तले ऐसे “राष्ट्रीय प्रतिनिधि” संगठन खड़े किए जाते हैं, जो मीडिया के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रीय प्रशासन को प्रभावित करने की भी कोशिश करते हैं। रजिस्टर्ड कंपनियों और चैरिटीज़ से लेकर अकादमिक सेंटर, थिंक-टैंक, धार्मिक संस्थाएँ और यहाँ तक कि स्पोर्ट्स क्लब, मुस्लिम ब्रदरहुड की मौजूदगी हर स्तर पर इतनी गहरी है कि कट्टरपंथ के वास्तविक स्रोतों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

कुछ मायनों में मुस्लिम ब्रदरहुड उन आतंकी संगठनों से भी अधिक ख़तरनाक साबित हो सकता है, जो खुले तौर पर हिंसक हमले करते हैं। ब्रदरहुड ने दशकों के दौरान खुद को एक अत्यंत परिष्कृत, चालाक और सर्वव्यापी आंदोलन के रूप में ढाल लिया है, जो मीडिया, अकादमिक संस्थानों, राजनीतिक मंचों और बौद्धिक नेटवर्क के माध्यम से जमीनी स्तर पर वैचारिक प्रभाव फैलाते हुए लोकतांत्रिक समाजों को भीतर से प्रभावित करने का प्रयास करता है।

यही कारण है कि यूके के यूनिवर्सिटी कैंपसों पर मुस्लिम ब्रदरहुड से सीधे तौर पर या परोक्ष रूप से जुड़े समूहों की सक्रिय मौजूदगी इतनी गंभीर चुनौती बन चुकी है। ऊपर से ‘इस्लामोफोबिया’ का विमर्श और कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव इस समस्या को और भी ज़्यादा जटिल बना देते हैं। इस विषैले विमर्श की बलि चढ़ते हैं इन विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे छात्र, जो कट्टरपंथी ताक़तों के इस खेल में मात्र बलि का बकरा बन कर रह जाते हैं।

इस्लामिस्ट कट्टरपंथ का केंद्र बनती यूके यूनिवर्सिटियाँ

यदि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध रिपोर्टों, मीडिया लेखों और विश्लेषणों को देखा जाए, तो एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। यह ऐसी वास्तविकता है, जिसकी गंभीरता को पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं है। यूके के विश्वविद्यालय परिसरों पर कट्टरपंथ का प्रभाव अब केवल मुस्लिम ब्रदरहुड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उससे कहीं आगे बढ़ चुका है। धीरे-धीरे ब्रिटिश विश्वविद्यालय इस्लामवादी कट्टरपंथ के केंद्र बनते जा रहे हैं।

7 अक्टूबर को इज़रायल पर हमास द्वारा किए गए आतंकी हमलों के बाद ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में उभरे प्रो-हमास एक्टिविज़्म और यहूदी-विरोधी माहौल को लेकर अनेक मीडिया रिपोर्टें सामने आई हैं। कई यूनिवर्सिटी सोसाइटीज़ और छात्र समूहों पर हमास से संबंध बनाए रखने के आरोप लगे हैं। मई 2025 में, कथित तौर पर 18 यूनिवर्सिटी सोसाइटीज़ ने एक कानूनी याचिका का समर्थन किया, जिसका उद्देश्य “टेररिज़्म एक्ट 2000 की धारा 4 के तहत हमास को आतंकी संगठन की सूची से हटाना” था।  इनमें लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की पैलेस्टाइन सोसाइटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्मिंघम की स्टूडेंटस्टाफ़ कोएलिशन फ़ॉर पैलेस्टाइन जैसी संस्थाएँ शामिल थीं।

कई ब्रिटिश यूनिवर्सिटी सोसाइटीज़ पर हमास या मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े वक्ताओं को आमंत्रित करने के आरोप भी लगे हैं। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) की मार्क्सिस्ट सोसाइटी समेत कई छात्र संगठनों को “इंतिफ़ादा टिल विक्ट्री” जैसे नारों का समर्थन करने, जिसे हिंसक प्रतिरोध के रूप में देखा गया, या प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के खुले समर्थन के चलते निलंबित भी किया गया।[18]

इस संदर्भ में 2011 में कॉम्बैटिंग टेररिज़्म सेंटर द्वारा प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट—British Universities Continue to Breed Extremists (ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में उग्रवादियों का पनपना जारी है), बेहद महत्वपूर्ण है। यह रिपोर्ट यूके यूनिवर्सिटियों में आतंकी नेटवर्क की घुसपैठ की पृष्ठभूमि को विस्तार से सामने रखती है। इसके अनुसार, 1990 के दशक में ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों ने वैश्विक जिहादी नेटवर्क के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिपोर्ट का दावा है कि कई यूके यूनिवर्सिटियाँ गुप्त रूप से जिहादी संगठनों के लिए भर्ती केंद्र बन गई थीं, जहाँ से ऐसे युवाओं को तैयार किया गया, “जिनके पास यूके पासपोर्ट थे और जो दुनिया भर में आसानी से आवाजाही कर सकते थे”। रिपोर्ट में कई ऐसे मामलों का हवाला भी दिया गया है, जिनमें ब्रिटिश मुस्लिम आतंकी हमलों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में शामिल पाए गए।[19]

रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि यूके कैंपसों में कट्टरपंथ की वास्तविक सीमा पर और गंभीर शोध की तत्काल आवश्यकता है, विशेषकर उन छात्रों के संदर्भ में, जिन्होंने आतंकवादी हमलों को योजनाबद्ध करने और उन्हें अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई।

रिपोर्ट का एक निष्कर्ष विशेष रूप से चौंकाने वाला है। इसमें कहा गया है कि “ऐसा जान पड़ता है कि कई यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट्स ने उन आतंकी हमलों में अहम भूमिका निभाई, जो ‘सफल’ होने के सबसे करीब पहुँचे।” साथ ही, रिपोर्ट में लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी की एक विस्तृत केस स्टडी भी प्रस्तुत की गयी है, जिसमें 2009–2010 के शैक्षणिक वर्ष के दौरान हुई घटनाओं की एक कड़ी बताई गई है, जहाँ एक छात्र संगठन ने कैंपस के भीतर ऐसा माहौल तैयार किया, जो कट्टर इस्लामिस्ट विचारधारा के प्रसार के लिए अनुकूल साबित हुआ।[20]

2010 में हेनरी जैकसन सोसाइटी द्वारा प्रकाशित एक अलग रिपोर्ट—Radical Islam on UK Campuses—ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों में फैले इस्लामिस्ट कट्टरपंथ की एक व्यापक और डराने वाली तस्वीर पेश करती है। यह रिपोर्ट निम्नलिखित बातें विस्तार से दर्ज करती है:

  • 2011 की CTC रिपोर्ट का महत्व(ISOC) के उन अध्यक्षों और वरिष्ठ सदस्यों से जुड़ी विस्तृत जानकारियाँ जो आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाये गये।
  • ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों में पढ़ने वाले उन छात्रों की प्रोफ़ाइल, जिन्हें इस्लामिस्ट विचारधारा से प्रेरित आतंकी अपराधों में दोषी ठहराया गया।
  • यूनिवर्सिटी-दर-यूनिवर्सिटी का यह विवरण कि किन-किन कैंपसों में कट्टरपंथी प्रचारक सक्रिय रहे।
  • 2008 में किए गए एक छात्र सर्वे के बेहद चिंताजनक निष्कर्ष, जिसमें इस्लाम को लेकर यूके के छात्रों के रुझानों का आकलन किया गया था। सर्वे में शामिल लगभग 32 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों ने माना कि धर्म के नाम पर हत्या कुछ परिस्थितियों में जायज़ हो सकती है, जबकि 33 प्रतिशत ने शरिया क़ानून से शासित एक वैश्विक इस्लामिक खिलाफ़त के समर्थन की बात कही।[21]
भारतीय छात्रों के लिए एक चेतावनी

देश की प्रतिष्ठित भारतीय यूनिवर्सिटियों के कैंपसों में हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी नैरेटिव्स के विस्तार को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। StopHindudvesha ने अपने लेखों में यह विस्तार से दर्ज किया है कि देश की शीर्ष यूनिवर्सिटियों के मानविकी, सामाजिक विज्ञान, और लिबरल आर्ट्स विभागों में पश्चिमी एकेडेमिया से आयातित वोक विचारधारा ने किस हद तक घुसपैठ कर ली है।[22] इस प्रवृत्ति ने कट्टर इस्लामिस्ट और हिंदू-विरोधी विमर्श के प्रचार-प्रसार के भरपूर रास्ते खोले हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इस प्रकार का विमर्श प्रायः चरम वामपंथी एजेंडों के साथ तालमेल बिठाये हुए होता है।

कई मामलों में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के मानविकी विभागों ने ऐसे विचारों को मंच दिया है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन करते हैं। उदाहरण के तौर पर, नवंबर 2023 में IIT बॉम्बे के छात्रों ने कट्टर वामपंथी एक्टिविस्ट सुधन्वा देशपांडे के एक ऑनलाइन व्याख्यान के खिलाफ़ पुलिस शिकायत दर्ज कराई थी, जिन पर व्याख्यान के दौरान फ़िलिस्तीनी आतंकवादियों का महिमामंडन करने के आरोप लगे थे।[23]

पश्चिमी अकादमिक जगत और कैंपस एक्टिविज़्म आज भी भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विमर्श का मुख्य स्रोत बने हुए हैं, जिनका असर भारत की शीर्ष यूनिवर्सिटियों के सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभागों के कुछ हिस्सों में साफ़ दिखता है। हालाँकि भारत में स्थिति उतनी भयावह नहीं है। यहाँ राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के नये सिरे से उभरने और वामपंथी नैरेटिव्स के कमजोर पड़ने से एक अपेक्षाकृत संतुलित वैचारिक स्पेस बन रहा है, जहाँ गैर-वामपंथी विचारों को भी धीरे-धीरे जगह मिल रही है।

लेकिन जब बात यूके की यूनिवर्सिटियों की आती है, तो तस्वीर कहीं ज़्यादा गंभीर हो जाती है। वहाँ कैंपसों पर जिहादी नेटवर्क्स की मौजूदगी की जो सच्चाई सामने आई है, उसे देखते हुए भारत के हिंदू अभिभावकों को अपने बच्चों की उच्च शिक्षा की योजना बनाते समय वृहत तस्वीर को ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही, उन्हें अपने बच्चों को कैंपसों में मौजूद इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के संभावित ख़तरों के प्रति समय रहते सचेत भी करना चाहिये।

ऑक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में होने वाली बहसों और वहाँ के मौजूदा विमर्श पर पाकिस्तानी स्टेट का जो गहरा प्रभाव है, उसे उजागर करने वाली कई प्रमाण मौजूद हैं। भारत की पाकिस्तान नीति पर हुई हालिया ऑक्सफोर्ड यूनियन डिबेट से जुड़ा विवाद इसका ताज़ा उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में ऑक्सफोर्ड यूनियन द्वारा आयोजित कई बहसों का विश्लेषण यह दिखाता है कि कश्मीर से लेकर मोदी सरकार के आकलन तक, भारत को लेकर एक सोचा समझा और तयशुदा नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता रहा है।[24]

ऐसे वैचारिक रूप से आवेशित अकादमिक माहौल में, हिंदू छात्र, जो अपनी सहज सहिष्णुता, विविध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति खुलेपन, लचीले धर्मिक दृष्टिकोण और गैर-अब्राहमिक विश्वदृष्टि के कारण जाने जाते हैं, अक्सर आसान निशाना बन जाते हैं। 7 अक्टूबर के बाद पश्चिमी कैंपसों में हुए प्रो-हमास प्रदर्शनों ने यह भी दिखाया कि वोक और चरम-वामपंथी  नैरेटिव्स से प्रभावित हिंदू छात्र खुद भी कट्टरपंथ की चपेट में आ सकते हैं। वैचारिक ब्रेनवॉश से आगे जाकर यदि बात करें तो ब्रिटिश कैंपसों पर जिहादी नेटवर्क्स की मौजूदगी हिंदू छात्रों को उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के प्रति भी खास तौर पर संवेदनशील बना देती है। इन नेटवर्क्स का खुला हिंदू-विरोधी रुख़ इस आशंका को और भी गहरा करता है कि आने वाले समय में ब्रिटिश यूनिवर्सिटियों में हिंदू छात्र सांस्कृतिक ‘policing’ का शिकार बन सकते हैं, यानी उनके विरोध में एक ऐसा माहौल तैयार किया जा सकता है, जिससे वे अपनी हिंदू पहचान और संस्कृति को खुले तौर पर अपनाने से भी कतराने लगें। यह एक एक ऐसा खतरा है जिसे अब अनदेखा करना आत्मघाती सिद्ध होगा।

समापन

यूके के यूनिवर्सिटी कैंपसों में व्याप्त इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के ख़तरे का एक बेहद गंभीर पहलू यह भी है कि खुद प्रशासन इस समस्या को स्वीकार करने से कतराता रहा है, सुधारात्मक कदम उठाना तो दूर की बात है। प्रशासन की इस ग़ैर जवाबदेही के चलते यह ख़तरा और भी ज़्यादा तात्कालिक व व्यापक हो जाता है।

‘इस्लामोफोबिया’ की अतिरंजित जुमलेबाज़ी, इस्लामिस्ट तुष्टिकरण की नीति का अविरल चलता कुचक्र, और “मुक्त समाज” व “अभिव्यक्ति की आज़ादी” के नाम पर एक ऐसे विषाक्त माहौल का तैयार किया जाना, जो जिहादी नेटवर्क्स के पनपने के लिए अनुकूल हो, इन सबका मिला जुला नतीजा यह निकलता है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में पढ़ने वाले छात्र कट्टर इस्लामिस्ट ब्रेनवाशिंग के प्रति अति संवेदनशील बन जाते हैं।

भारत से आए हिंदू छात्रों के लिए यह जोखिम और भी अधिक गहरा हो जाता है। ज़हरीली पहचान की राजनीति के इस माहौल में जो भी छात्र इस्लामिस्ट कट्टरपंथ को लेकर खुलकर चिंता जताता है, उसे फौरन “हिंदुत्ववादी” या “इस्लामोफोबिक” लेबल कर दिया जाता है। वहीं, हिंदू-विरोधी भेदभाव, यानी हिंदूफोबिया पर, पश्चिमी अकादमिक जगत एक रहस्यपूर्ण चुप्पी साध लेता है। यह चुप्पी इस संकट को और भी अधिक गंभीर और विस्फोटक बना देती है।

 

 

संदर्भ  सूची 

[1] UAE warns of Islamic radicalisation in UK universities, ends students’ scholarships – India Today;  https://www.indiatoday.in/world/story/world-news-uae-warns-of-islamic-radicalisation-in-uk-universities-cuts-students-scholarships-britain-college-ban-2850496-2026-01-12

[2] UAE Cuts Scholarships to UK Universities Citing Risk of Islamist Radicalization – Hungarian Conservative; https://www.hungarianconservative.com/articles/current/uae-uk-scholarships-university-radicalization-muslim-brotherhood/

[3] Muslim Brotherhood radicalising British universities’ as UAE concerned about UK Islamism;  https://www.gbnews.com/news/muslim-brotherhood-british-universities-radicalised-uae

[4] The Muslim Brotherhood in British universities: breeding grounds for extremism under student fronts – En.ImArabic; https://en.imarabic.com/the-muslim-brotherhood-in-british-universities-breeding-grounds-for-extremism-under-student-fronts/

[5] UAE told UK: crackdown on Muslim Brotherhood or lose arms deals | United Arab Emirates | The Guardian; https://www.theguardian.com/world/2015/nov/06/uae-told-uk-crack-down-on-muslim-brotherhood-or-lose-arms-deals

[6] Democracy on the Defensive: Europe Confronts Radical Islam;   https://stophindudvesha.org/democracy-on-the-defensive-europe-confronts-radical-islam/

[7] Muslim Brotherhood under ‘close review’ for UK ban | The National;  https://www.thenationalnews.com/news/uk/2025/12/05/muslim-brotherhood-under-close-review-for-uk-ban/

[8] Which is the real Shabana Mahmood? – The Jewish Chronicle – The Jewish Chronicle;  https://www.thejc.com/news/politics/which-is-the-real-shabana-mahmood-h696tjxx

[9] Muslim Brotherhood and Jama’at -i – Islami | Pew Research Center;  https://www.pewresearch.org/religion/2010/09/15/muslim-networks-and-movements-in-western-europe-muslim-brotherhood-and-jamaat-i-islami/

[10] Today in terrorism | Attempted assassination of Egyptian president Nasser;   https://borealisthreatandrisk.com/october-26-1954-attempted-assassination-of-egyptian-president-nasser/

[11] The Truth about the Muslim Brotherhood – The Cairo Review of Global Affairs;    https://www.thecairoreview.com/essays/the-truth-about-the-muslim-brotherhood/

[12] Muslim Brotherhood and Jama’at -i – Islami | Pew Research Center;    https://www.pewresearch.org/religion/2010/09/15/muslim-networks-and-movements-in-western-europe-muslim-brotherhood-and-jamaat-i-islami/

[13] The Advance of the Muslim Brotherhood in the UK | Hudson Institute;   https://www.hudson.org/national-security-defense/the-advance-of-the-muslim-brotherhood-in-the-uk

[14] Ibid.

[15] Why the UAE fears the Muslim Brotherhood’s UN influence | The Jerusalem Post; https://www.jpost.com/international/article-883013

[16] Ibid.

[17] The Muslim Brotherhood in Britian: Analysis of Recent Sanctions | Counter Extremism Project;    https://www.counterextremism.com/blog/muslim-brotherhood-britain-analysis-recent-sanctions

[18] Why the UAE fears the Muslim Brotherhood’s UN influence | The Jerusalem Post;    https://www.jpost.com/international/article-883013

[19] British Universities Continue to Breed Extremists – Combating Terrorism Center at West Point;  https://ctc.westpoint.edu/british-universities-continue-to-breed-extremists/

[20] Ibid.

[21] Radical Islam On UK Campuses: A Comprehensive List of Extremist Speakers at UK Universities; https://henryjacksonsociety.org/wp-content/uploads/2013/01/RADICAL-ISLAM-ON-CMAPUS.pdf

[22] Indian Education’s Bias: Alienating Youth from Heritage;  https://stophindudvesha.org/unveiling-the-biases-in-indian-education-how-it-alienates-youth-from-their-own-heritage/

[23] IIT Bombay students file police complaint against an online talk delivered by radical leftist Sudhanva Deshpande that glorified Palestinian terrorists; https://hindupost.in/media/iit-bombay-students-file-police-complaint-against-an-online-talk-delivered-by-radical-leftist-sudhanva-deshpande-that-glorified-palestinian-terrorists/

[24] From Oxford to Academia at Large: Free Inquiry or Scripted Discourse Against Hindu?;  https://stophindudvesha.org/from-oxford-to-academia-at-large-free-inquiry-or-scripted-discourse-against-hindus/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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