प्रोजेक्ट 2025: रिपब्लिकन एजेंडा और भारतीय-अमेरिकी सपने पर मंडराता खतरा
- प्रोजेक्ट 2025 की कठोर वीज़ा नीतियाँ, संभावित निर्वासन और ईसाई राष्ट्रवादी झुकाव भारतीय-अमेरिकियों में गहरी असुरक्षा और पहचान-संकट पैदा कर रहे हैं।
- भारतीय-अमेरिकी परिवार, जो दशकों से बहुलतावादी अमेरिका में फलते-फूलते रहे, अब सामाजिक माहौल में बढ़ती ज़ेनोफ़ोबिया, नस्लीय टिप्पणियों और राजनीतिक ध्रुवीकरण का दबाव महसूस कर रहे हैं।
- प्रोजेक्ट 2025 की इमीग्रेशन योजनाएँ—जैसे H-1B सख्ती, परिवार-आधारित वीज़ा में कटौती और USCIS की “पॉज़ अथॉरिटी”—विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों, वीज़ा-निर्भर परिवारों और नए स्नातकों को प्रभावित कर सकती हैं।
- सख्त इमीग्रेशन नीतियों से नवाचार, तकनीकी सहयोग और भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है, क्योंकि वैश्विक प्रतिभा अमेरिका से दूर जा सकती है।
- बदलते राजनीतिक माहौल और बढ़ती घृणा-भावनाओं ने भारतीय-अमेरिकी परिवारों को contingency plans पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है, जिससे “अमेरिकी सपने” की स्थिरता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो रहा है।
अमित गुप्ता (गोपनीयता की दृष्टि से नाम परिवर्तित) भारतीय-अमेरिकी सफलता की कहानी का एक प्रतिनिधि उदाहरण माने जा सकते हैं। वे न्यू जर्सी में पैदा हुए, जहाँ उनके माता-पिता सत्तर के दशक में दिल्ली छोड़कर आ बसे थे। दीपावली के पारिवारिक उत्सवों और फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई (Fourth of July) की देशभक्ति से भरी गर्मियों के बीच बीता उनका बचपन भारतीय और अमेरिकी—दोनों सांस्कृतिक परिवेशों में सहज रूप से ढलता रहा। उनके पिता रासायनिक अभियंता थे और माता एक विद्यालय शिक्षिका। परिवार में अनुशासन, परिश्रम, आत्मविश्वास और उपलब्ध अवसरों का सदुपयोग करने की प्रवृत्ति को विशेष महत्व दिया जाता था।
कंप्यूटर विज्ञान की पढ़ाई पूरी करने के बाद अमित ने सिलिकॉन वैली की एक अग्रणी तकनीकी कंपनी में अपना कैरियर आरंभ किया और क्रमिक उन्नति के साथ आज सैन होज़े में वरिष्ठ उपाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। उनकी पत्नी, जो स्वयं दूसरी पीढ़ी की भारतीय-अमेरिकी हैं और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी हैं, के साथ उनकी दो बेटियाँ—माया और तारा—अमेरिका के उदार, शिक्षित और बहु सांस्कृतिक वातावरण में पली-बढ़ीं। परिवार हर दो वर्ष में भारत अवश्य जाता है, परंतु उनका दैनिक जीवन, शिक्षा और सामाजिक परिवेश पूर्णतः अमेरिकी मूल्यों से निर्मित है।
कैलिफ़ोर्निया की विविध सामाजिक संरचना ने इस परिवार को विकसित होने का अनुकूल अवसर दिया। वे फ़्रेमॉन्ट उपनगर में रहते हैं, जहाँ अनेक देशों, नस्लों और भाषाओं के लोग पास-पास रहते हुए एक बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक समुदाय बनाते हैं। माया और तारा जनरेशन-Z के उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनमें सामाजिक न्याय, पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक विविधता प्रमुख तत्व हैं। अमित अक्सर अपने माता-पिता के परिश्रम का ज़िक्र करते हुए कहते थे कि उनका परिवार इस विचार का जीवंत उदाहरण है कि अमेरिका में व्यक्ति का मूल्य उसकी मेहनत और कौशल से तय होता है, न कि धर्म या रंग से।
प्रोजेक्ट 2025: एक भय का वातावरण
परंतु उनके इस विश्वास को 1 नवंबर 2025 को अचानक गहरा धक्का लगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने श्वेत ईसाई मतदाताओं की एक बड़ी रैली में यह कहते हुए विवाद उत्पन्न कर दिया कि वे आशा करते हैं कि उनकी पत्नी, जो एक हिंदू परिवार में पली-बढ़ी थीं, ईसाई धर्म अपना लें।[1] इस टिप्पणी ने भारतीयों और हिंदुओं के प्रति बढ़ती कटुता को एक बार फिर उजागर कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप के 2024 में पुनर्निर्वाचन के बाद से भारतीय-अमेरिकियों ने रिपब्लिकन और MAGA समूहों में फैली एशियाई-विरोधी तथा नस्लवादी वक्तव्यों में उल्लेखनीय वृद्धि महसूस की है। “ग्रॉयपर” नामक समूह, जो एक कट्टर ईसाई राष्ट्रवादी धारा का प्रतिनिधित्व करता है[2], विशेष रूप से भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रवासियों के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपनाने में सक्रिय रहा है।[3]
इन्हीं घटनाक्रमों के बीच पहली बार अमित के भीतर गहरी असुरक्षा और अनिश्चितता उत्पन्न हुई। उन्हें लगा कि यह केवल हाशिये की अतिवादी सोच नहीं, बल्कि संभवतः एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन की पूर्वपीठिका है। मन के द्वंद्व ने उन्हें रात देर तक जागते हुए प्रोजेक्ट 2025 के व्यापक दस्तावेज़ से अवगत करा दिया, वह दस्तावेज़ जिसे हेरिटेज फ़ाउंडेशन तथा अनेक रूढ़िवादी संगठनों ने ट्रंप के संभावित दूसरे कार्यकाल के लिए रूपांकित किया था। इसे पढ़ते हुए स्पष्ट हुआ कि यह सामान्य नीति-संक्षेप नहीं, बल्कि अमेरिका के शासन ढाँचे को एक विशिष्ट ईसाई राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के अनुरूप पुनर्गठित करने की योजना है।[4]
दस्तावेज़ में वर्णित प्रस्तावों ने अमित की आशंकाओं को और बल दिया। इसमें संघीय एजेंसियों की शक्तियों को सीमित कर “बाइबल-आधारित” पारिवारिक नीतियों को लागू करने, सार्वजनिक शिक्षा में ईसाई मूल्यों को प्राथमिकता देने और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रदान की जाने वाली विधिक सुरक्षा में कटौती करने का सुझाव दिया गया था। नागरिक अधिकार कानूनों की व्याख्या को इस प्रकार बदलने की बात की गई थी कि गैर-ईसाई समुदायों के साथ भेदभाव की गुंजाइश उत्पन्न हो सके। दस्तावेज़ का स्वर कई स्थानों पर ऐसा लगता था मानो भारतीयों, मुसलमानों, यहूदियों और अन्य अल्पसंख्यकों को अमेरिकी पहचान के लिए संभावित “खतरे” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हो।
अमित जैसे व्यक्ति के लिए, जो एक धार्मिक हिंदू हैं, यह विचार मात्र राजनीतिक विमर्श का विषय नहीं रहा; यह उनके व्यक्तिगत अस्तित्व से भी जुड़ गया। प्रोजन्मसिद्ध नागरिकता समाप्त करने, व्यापक निर्वासन और निशाने पर रखे गए समुदायों की निगरानी संबंधी नीतियाँ उनके परिवार के लिए सीधा खतरा बन सकती थीं। इसके अतिरिक्त, स्कूलों में “क्रिटिकल रेस थ्योरी” पर प्रतिबंध और शैक्षणिक बजट में कटौती जैसे कदम अल्पसंख्यक समुदायों की ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक अनुभवों को हाशिये पर धकेलने की दिशा में प्रतीत हुए। उन्होंने पत्नी से कहा, “यह केवल नीति नहीं, बल्कि पहचान को मिटाने का प्रयास है। हो सकता है कि हमारी बेटियाँ अपना धर्म छुपाकर जीने के लिए बाध्य हो जाएँ।”
प्रोजेक्ट 2025 की रूपरेखा
अप्रैल 2023 में प्रकाशित प्रोजेक्ट 2025, हेरिटेज फ़ाउंडेशन की प्रसिद्ध “मैंडेट फ़ॉर लीडरशिप” श्रृंखला का ताज़ा अध्याय है, जो रीगन काल से ही रिपब्लिकन प्रशासनिक नीतियों का मार्गदर्शन करती रही है। इस दस्तावेज़ में लगभग 50,000 संघीय कर्मचारियों को हटाकर उनकी जगह राजनीतिक निष्ठावान व्यक्तियों की नियुक्ति, शिक्षा विभाग को समाप्त करने, न्यायपालिका को कार्यपालिका के अधीन लाने, और पर्यावरण संरक्षण, प्रजनन अधिकार और इमीग्रेशन संबंधी नीतियों में व्यापक कटौती का प्रस्ताव शामिल था।[5]
इसके समर्थक इस परियोजना को “वोक” प्रवृत्तियों की अति और बढ़ती नौकरशाही पर नियंत्रण के लिए आवश्यक सुधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, किंतु राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न हिस्सों में इसके आलोचक इसके अधिनायकवादी रुझानों और समाज पर पड़ने वाले दीर्घकालिक दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। मूल रूप से, प्रोजेक्ट 2025 एक ऐसी कार्यपालिका की परिकल्पना करता है जिसमें समस्त शक्ति राष्ट्रपति के हाथों में केंद्रित हो—यह ट्रंप के प्रथम कार्यकाल के “शेड्यूल F” कार्यकारी आदेश की याद दिलाता है, जिसका उद्देश्य संघीय कर्मचारियों को पुनर्वर्गीकृत कर उन्हें सरलता से हटाने का मार्ग खोलना था।[6] नवंबर 2025 तक, इस खाके के कई तत्व प्रशासनिक संक्रमण-योजना में चर्चा का विषय बन चुके हैं, जिससे इसके व्यावहारिक परिणामों को लेकर तात्कालिक प्रश्न उठने लगे हैं।
प्रोजेक्ट 2025 और इमीग्रेशन नीति
प्रोजेक्ट 2025 का इमीग्रेशन संबंधी अध्याय अमेरिकी नीति-ढाँचे में व्यापक और गहरे परिवर्तन का संकेत देता है। दस्तावेज़ स्पष्ट रूप से वैश्विक स्तर पर प्रतिभा-भर्ती की परंपरा से हटकर घरेलू एकीकरण और नियंत्रित प्रवासन को प्राथमिकता देने की दिशा में झुकाव दर्शाता है।[7] प्रस्तावित व्यवस्था “मेरिट-आधारित” मॉडल पर आधारित होगी, जिसमें उच्च वेतन प्राप्त करने वाले, उच्च कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों तथा केवल तत्काल परिवार को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही, परिवार-आधारित इमीग्रेशन और गेस्ट-वर्कर कार्यक्रमों को सीमित करने की अनुशंसा की गई है।[8]
प्रोजेक्ट 2025 H-1B वीज़ा कार्यक्रम को समाप्त नहीं करता, बल्कि इसे अधिक कठोर शर्तों और कड़े मानकों के साथ जारी रखने का प्रस्ताव रखता है। दस्तावेज़ में केवल “सबसे अधिक कुशल” और “सबसे अधिक वेतन पाने वाले” विदेशी उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने, न्यूनतम वेतन मानकों को बढ़ाने, कुल वीज़ा संख्या में कमी लाने और उन कंपनियों पर कठोर निगरानी लागू करने की बात कही गई है जो H-1B कर्मचारियों का उपयोग कम लागत वाले श्रम के रूप में करती हैं।[9] इन परिवर्तनों का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ने की संभावना है, विशेष रूप से उन युवाओं पर जो छात्र वीज़ा से पेशेवर जीवन में कदम रख रहे हैं। एंट्री-लेवल और मध्यम स्तर की नौकरियों के लिए अनुमोदन कठिन होने के कारण भारतीय आवेदकों की संख्या घट सकती है।
रोज़गार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया, जो भारतीय नागरिकों के लिए पहले ही दशकों तक लंबी खिंचती है, इन परिवर्तनों के बाद और भी धीमी पड़ सकती है। यदि पारिवारिक-आधारित मार्गों को सीमित किया जाता है, तो हजारों H-1B धारकों को अनिश्चित और अस्थायी स्थिति में और अधिक समय तक बने रहना पड़ सकता है।[10]
हालाँकि अमेरिका में जन्मे भारतीय-अमेरिकियों को प्रत्यक्ष रूप से वीज़ा संबंधी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता, किंतु इन नीतिगत परिवर्तनों के अप्रत्यक्ष सामाजिक और आर्थिक प्रभाव स्पष्ट रूप से महसूस किए जाएंगे।[11]
एक ओर, यदि विदेश से आने वाले कम-कुशल या मध्यम-कुशल प्रवासियों की संख्या घटती है, तो कुछ क्षेत्रों में रोजगार की प्रतिस्पर्धा अमेरिकी-जन्मे युवाओं, जिनमें भारतीय-अमेरिकी भी शामिल हैं, के पक्ष में झुक सकती है।
परंतु दूसरी ओर, तकनीक, चिकित्सा और प्रोफेशनल सेवाओं जैसे वे क्षेत्र, जिनमें भारतीय-अमेरिकी व्यापक रूप से कार्यरत हैं, वैश्विक प्रतिभा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विस्तृत प्रवासी नेटवर्क पर निर्भर करते हैं। अगर इमीग्रेशन कम किया गया, तो नए विचार, व्यवसाय और वे नेटवर्क प्रभावित हो सकते हैं, जिनसे इन समुदायों को लगातार फायदा मिलता रहा है। इसके अतिरिक्त, कठोर इमीग्रेशन नीतियाँ यदि समाज में एंटी-इमिग्रेंट भावना को बढ़ाती हैं, तो सामाजिक तनाव, नस्लीय गलतफहमियाँ और कार्यस्थलों तथा विश्वविद्यालयों में भेदभाव की संभावनाएँ भी बढ़ सकती हैं। इस प्रकार, दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय-अमेरिकियों को भले ही कुछ रोजगार-संबंधी लाभ प्राप्त हों, परंतु दीर्घकालिक सामाजिक और व्यावसायिक वातावरण अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
H-1B दुरुपयोग पर नियंत्रण
H-1B कार्यक्रम के आलोचकों का तर्क है कि कुछ कंपनियाँ, विशेषकर आउटसोर्सिंग फर्में, इस कार्यक्रम का उपयोग अपेक्षाकृत सस्ते विदेशी श्रम के रूप में करती हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार H-1B वीज़ा धारकों में लगभग 72 प्रतिशत भारतीय और 12 प्रतिशत चीनी नागरिक होते हैं। आलोचक मानते हैं कि इस प्रवृत्ति के कारण अमेरिकी कर्मचारियों—विशेषकर तकनीकी क्षेत्र के नए स्नातकों—के अवसर सीमित होते हैं और कई उद्योगों में वेतन-स्तर दबता है।[12]
एक सर्वेक्षण में 56 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने विश्वास व्यक्त किया कि H-1B कार्यक्रम उनके रोजगार अवसरों को प्रभावित करता है।[13] सरकारी जाँचों ने भी इस कार्यक्रम में दुरुपयोग की पुष्टि की है। सितंबर 2025 तक श्रम विभाग 175 मामलों की जाँच कर रहा है, जिनमें कर्मचारियों को कम वेतन देना, नकली कार्य-स्थलों का प्रस्तुत करना और “बेंचिंग”—अर्थात कर्मचारियों को बिना काम के लंबे समय तक बैठाए रखना—जैसी अनियमितताएँ शामिल हैं।[14]
इसके अतिरिक्त, सैन फ्रांसिस्को की एक संघीय अदालत में दायर मुकदमे में यह आरोप लगाया गया कि टेस्ला ने वीज़ा-निर्भर कर्मचारियों को प्राथमिकता देकर और अमेरिकी नागरिकों को कम अनुपात में नौकरी देकर संघीय नागरिक अधिकार कानूनों का उल्लंघन किया है, क्योंकि वीज़ा-निर्भर कर्मचारी कंपनियों के लिए अपेक्षाकृत सस्ते साबित होते हैं।[15]
विश्लेषकों का यह भी मत है कि “बॉडी-शॉप मॉडल,” अर्थात H-1B वीज़ाधारकों को कम वेतन पर अनुबंधित कर लगातार बदलना, न केवल वेतन-स्तर को नीचे रखता है, बल्कि वीज़ा धारकों की पेशेवर गतिशीलता को भी सीमित कर देता है।[16]
इन परिस्थितियों को देखते हुए यह तर्क स्वाभाविक रूप से सामने आता है कि H-1B नियमों का कठोर और पारदर्शी प्रवर्तन आवश्यक है, ताकि प्रणाली में विश्वास बना रहे, अमेरिकी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, और कौशल-आधारित इमीग्रेशन मॉडल की विश्वसनीयता बनी रहे। यदि कोई कार्यक्रम व्यापक रूप से “दुरुपयोग-ग्रस्त” समझा जाने लगे, तो उसकी सामाजिक और राजनीतिक वैधता कमजोर होती है और उच्च-कौशल प्रवासन के प्रति अमेरिकी जनता का समर्थन भी घट सकता है। इसी कारण युवा अमेरिकी कर्मचारियों के लिए यह भरोसा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि उनकी नौकरियाँ कम वेतन पर कार्य करने वाले विदेशी श्रमिकों के कारण समाप्त नहीं हो रही हैं।
इसी संदर्भ में, प्रोजेक्ट 2025 द्वारा प्रस्तावित कड़ा प्रवर्तन—जैसे बेहतर वेतन-निगरानी, सीमित loopholes और मजबूत निरीक्षण व्यवस्था—को सीधे “इमीग्रेशन-विरोधी” कहना उचित नहीं होगा। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि H-1B कार्यक्रम अपने वास्तविक लक्ष्य—उच्च-कौशल विदेशी प्रतिभा के माध्यम से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना—के अनुरूप संचालित हो, न कि अमेरिकी कर्मचारियों के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाए।
चेन माइग्रेशन और अवैध सीमा-पार प्रवेश
प्रोजेक्ट 2025 का एक महत्वपूर्ण अध्याय अमेरिकी इमीग्रेशन व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करता है। इस दस्तावेज़ में कांग्रेस से स्पष्ट रूप से “चेन माइग्रेशन” समाप्त करने की मांग की गई है। इस प्रस्ताव में सुझाव है कि माता-पिता और बच्चों तक सीमित परिवारों को छोड़कर बाकी परिवार-आधारित वीज़ा रास्ते बंद कर दिए जाएँ। इस दृष्टिकोण के पीछे यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि व्यापक परिवार-आधारित प्रवासन से कम-कौशल वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ती रहती है, जिससे आर्थिक संसाधनों, सामाजिक सेवाओं और श्रम बाज़ार पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न होता है।[17] यह विचार रिपब्लिकन पार्टी की लंबे समय से चली आ रही नीति-रेखा के अनुरूप है, जिसमें कौशल को पारिवारिक संबंधों की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है।
अवैध इमीग्रेशन के संदर्भ में प्रोजेक्ट 2025 अत्यंत कठोर रुख अपनाता है।[18] योजना में बड़े पैमाने पर निर्वासन, सीमा दीवार के विस्तार और त्वरित निष्कासन प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी गई है। अनधिकृत प्रवेश को राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि ये उपाय उन कानूनी मार्गों से सीधे नहीं टकराते जिन्हें अधिकांश भारतीय-अमेरिकी अपनाते हैं, परंतु ऐसी नीतियाँ प्रवासी समुदायों के प्रति निगरानी, संदेह और संभावित भेदभाव में वृद्धि कर सकती हैं।
यदि प्रशासन प्रोजेक्ट 2025 में उल्लिखित USCIS की “पॉज़ अथॉरिटी” को लागू करता है, तो इसके दूरगामी और गंभीर प्रभाव हो सकते हैं। इस प्रावधान के अंतर्गत किसी भी कार्यक्रम की पारदर्शिता और सत्यापन समीक्षा के दौरान नए आवेदनों पर अस्थायी रोक लगाई जा सकती है। ऐसी स्थिति में रोज़गार-आधारित ग्रीन कार्ड की पूरी प्रक्रिया रुक सकती है, जिससे दसियों हज़ार प्रवासी अपनी वैध स्थिति खोने या अनैच्छिक रूप से अपने मूल देश लौटने के लिए बाध्य हो सकते हैं। यह परिस्थिति केवल आर्थिक असुरक्षा को नहीं बढ़ाती, बल्कि प्रवासी समुदायों के भीतर गहरी अस्थिरता और भय भी उत्पन्न कर सकती है।[19]
दीर्घकालिक प्रभाव
इमीग्रेशन केवल जनसांख्यिकीय आँकड़ों का विषय नहीं है; यह अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीतिक शक्ति की मूल आधारशिला रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की तकनीकी और वैज्ञानिक श्रेष्ठता का केंद्र उसकी यह क्षमता रही है कि वह विश्वभर के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों को आकर्षित करता रहा है और उन्हें अपने यहाँ अवसर प्रदान करता रहा है। शीतयुद्ध के दौर में यूरोप से आए भौतिकविदों से लेकर आज के डेटा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों तक, प्रवासी प्रतिभा ने बार-बार अमेरिका की तकनीकी प्रगति को नई दिशा दी है। किंतु यदि इमीग्रेशन व्यवस्था “बंद दरवाज़ों” की ओर बढ़ती है, तो यह ऐतिहासिक लाभ क्रमशः कमजोर पड़ सकता है।
MAGA समर्थकों द्वारा अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि गैर-श्वेत प्रवासियों के स्थान पर यूरोपीय मूल के श्वेत प्रवासियों को अमेरिका आकर्षित किया जा सकता है, परंतु वास्तविक परिस्थितियाँ इस धारणा का समर्थन नहीं करतीं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जैसा परिदृश्य अब अस्तित्व में नहीं है। यूरोप दशकों से जनसंख्या गिरावट की चुनौती का सामना कर रहा है, जिससे वहाँ बड़े पैमाने पर प्रवासन की क्षमता सीमित हो चुकी है। इसके अतिरिक्त, यूरोपीय देशों में आजीवन सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और आर्थिक स्थिरता अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ हैं, जिसके कारण उनके नागरिकों के लिए अमेरिका स्थानांतरित होना अब पहले जितना आकर्षक विकल्प नहीं रहा।
ऐसी स्थितियों में अमेरिका के वैज्ञानिक और तकनीकी ढाँचे के लिए विशेषतः एशिया—मुख्य रूप से भारत और चीन—की प्रतिभा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। कांग्रेस बजट ऑफिस के आकलनों के अनुसार, यदि उच्च-कौशल प्रवासियों की संख्या आगामी दो दशकों में लगातार घटती है, तो अमेरिकी GDP की वार्षिक वृद्धि दर में 0.3–0.5 प्रतिशत अंकों तक की गिरावट आ सकती है।[20]
इसके साथ ही, पेटेंट दाखिलों, स्टार्टअप गठन और STEM शिक्षा में नामांकन का सीधा और प्रमाणित संबंध प्रवासी समुदाय की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा है। यदि वैश्विक इमीग्रेशन का प्रवाह पूर्व की ओर—भारत के उभरते तकनीकी केंद्रों, चीन के AI गलियारों और यूरोप के अनुसंधान नेटवर्कों—की दिशा में और तेज़ी से बढ़ता है, तो अमेरिका की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने की आशंका है। अल्पकाल में कुछ स्थानीय रोजगार स्थिर दिखाई दे सकते हैं, परंतु नवाचार और उच्च-तकनीकी नेतृत्व के क्षेत्र में अमेरिकी बढ़त कमज़ोर पड़ सकती है।
भारत-अमेरिका साझेदारी के केंद्र में दशकों से एक सुदृढ़ बौद्धिक संबंध रहा है। सिलिकॉन वैली और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) के बीच सहयोग ने तकनीकी विकास, नवाचार और उद्यमिता को निरंतर गति दी है। यदि अमेरिका को धीरे-धीरे “अस्वागत योग्य” देश के रूप में देखा जाने लगे, तो अगली पीढ़ी के भारतीय इंजीनियर कनाडा, ब्रिटेन या अन्य देशों की ओर रुख कर सकते हैं। यह परिवर्तन वैश्विक प्रतिभा के प्रवाह को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकता है और अमेरिका के लिए रणनीतिक तथा आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।[21]
भारत और अमेरिका के सम्बन्ध
इन सभी चुनौतियों के बावजूद भारत और अमेरिका के संबंधों का संस्थागत आधार अब भी सुदृढ़ है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, आतंकवाद-रोधी सहयोग और उन्नत तकनीकी साझेदारी जैसे साझा रणनीतिक उद्देश्य दोनों देशों को परस्पर जुड़ाव बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। किंतु भविष्य में इस साझेदारी की गुणवत्ता किस दिशा में विकसित होगी, यह बड़े पैमाने पर “मोबिलिटी डिप्लोमेसी”—अर्थात छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के मुक्त एवं सुगम आवागमन—पर निर्भर करेगा। यदि ट्रंप प्रशासन आर्थिक राष्ट्रवाद और बौद्धिक/शैक्षणिक विनिमय के बीच संतुलन स्थापित करने में असफल रहता है, तो द्विपक्षीय संबंधों में मौजूद सद्भावना तीव्र गति से कमज़ोर पड़ सकती है।
आने वाले वर्षों में भारत अपने डिजिटल और रक्षा उद्योगों के व्यापक विस्तार के साथ अमेरिका से बाजार-प्रवेश जैसी रणनीतिक रियायतों की अपेक्षा कर सकता है। इसके विपरीत, वॉशिंगटन व्यावहारिक नीति अपनाते हुए AI, क्वांटम कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर अनुसंधान जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में लक्षित वीज़ा-प्रणालियों की ओर झुक सकता है। यदि ऐसी शिथिलता नहीं लाई गई, तो प्रोजेक्ट 2025 अनजाने में भारत को अपनी साझेदारियों में विविधता लाने की दिशा में और आगे धकेल सकता है, जिससे दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव क्रमशः कम हो सकता है।
समापन पर यह उल्लेखनीय है कि प्रवासियों के प्रति बढ़ती नफ़रत ने अमेरिका के भीतर विचारशील रूढ़िवादी वर्गों को भी चिंतित किया है। बेन शापिरो जैसे कठोर आलोचकों ने फ़्यूएंटेस समर्थकों को “श्वेत वर्चस्ववादी” और “अमेरिकी संविधान तथा बहुलतावाद के विरोधी” बताते हुए चेतावनी दी है कि इस प्रकार की राजनीति धीरे-धीरे रिपब्लिकन मुख्यधारा में प्रवेश कर रही है। यह टिप्पणी स्वयं इस परिवर्तन की गंभीरता और संभावित प्रभावों को इंगित करती है।[22]
भविष्य की चिंता और परिवार पर गहराता असर
प्रोजेक्ट 2025 ने प्रवासी समुदाय, विशेष रूप से भारतीय-अमेरिकियों के भीतर, पहचान से जुड़ी एक नई बेचैनी को जन्म दिया है। पहली पीढ़ी के अधिकांश भारतीय-अमेरिकी पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह पार्टी प्रवासी-समर्थक, बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की संरक्षक प्रतीत होती रही है। हालांकि हाल के वर्षों में रिपब्लिकन पार्टी ने युवा भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में कुछ प्रभाव अवश्य बनाया था, जिन्हें आर्थिक रूढ़िवाद, अपेक्षाकृत कम कर-ढांचा और “मजबूत शासन” की राजनीति आकर्षित करती थी। किंतु 2025 की कठोर नीतियाँ—वीजा असुरक्षा, संभावित निर्वासन और प्रशासनिक निगरानी—इन उभरते राजनीतिक रुझानों को पुनः बदलने की क्षमता रखती हैं।
पार्टी-राजनीति से अलग, “अमेरिका फ़र्स्ट” की नीतियाँ विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों में संस्थागत समावेशिता को सीमित कर सकती हैं। भारतीय-अमेरिकी सीधे लक्ष्य न भी बनें, लेकिन बहुसांस्कृतिक संवेदनशीलता में कमी से सामाजिक संबंध कठोर होने लगते हैं। नागरिक संगठनों की अनेक रिपोर्टों में भारतीय पेशेवरों के प्रति माइक्रो-अग्रेशन, नस्लीय टिप्पणियों और ऑनलाइन शत्रुता में वृद्धि दर्ज की गई है। अक्सर उन्हें आउटसोर्सिंग का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, मानो वे स्थानीय आर्थिक असुरक्षा के मूल कारण हों।
यह वातावरण सामाजिक असुरक्षा, पेशेवर अनिश्चितता और राजनीतिक तनाव को जोड़कर एक ऐसी अनुभूति उत्पन्न करता है जिसे कई प्रवासी “शर्तों पर आधारित नागरिकता” के रूप में देखते हैं—जहाँ स्वीकृति स्थायी न होकर परिस्थितियों पर निर्भर प्रतीत होती है। जो समुदाय कभी अमेरिकी प्रवासी सफलता की मिसाल माना जाता था, वही आज अमेरिका की बदलती पहचान-बहस के केंद्र में खड़ा है। कांग्रेसमैन राजा कृष्णमूर्ति ने भी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस की टिप्पणियों की आलोचना करते हुए कहा कि वे “ऐसे समय में बड़े पैमाने पर निर्वासन की बात कर रहे हैं, जब हिंदू और भारतीय-अमेरिकी समुदाय बढ़ते पूर्वाग्रह का सामना कर रहे हैं।” [23]
प्रोजेक्ट 2025 H-1B वीज़ा कार्यक्रम को समाप्त नहीं करता, बल्कि इसे कठोर मानकों और सख्त शर्तों के साथ जारी रखने की अनुशंसा करता है। दस्तावेज़ में वर्णित सुधारों में केवल “सबसे अधिक कुशल” और “सबसे अधिक वेतन प्राप्त करने वाले” विदेशी उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना, न्यूनतम वेतन-मानकों में वृद्धि, कुल वीज़ा संख्या में कमी और उन कंपनियों पर कठोर निगरानी शामिल है, जो H-1B कर्मचारियों का उपयोग कम लागत वाले श्रम के रूप में करती हैं। इन परिवर्तनों का सर्वाधिक प्रभाव भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ने की संभावना है, विशेषकर उन युवाओं पर जो छात्र वीज़ा से पेशेवर जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। एंट्री-लेवल और मध्य-स्तर की नौकरियों के लिए स्वीकृति कठिन होने से भारतीय आवेदकों की संख्या में गिरावट आ सकती है, जिससे भावी इमीग्रेशन मार्ग भी प्रभावित हो सकते हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद गुप्ता हार नहीं मानते। वे प्रोजेक्ट 2025 की डिस्टोपियन दृष्टि के विरोध में अपनी भागीदारी को और अधिक सक्रिय बना रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे जनमत-सर्वेक्षणों में रूढ़िवादी रुझान मजबूत दिखाई देने लगे हैं, अमेरिका की बहुलता पर उनका विश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा है। वे कहते हैं, “मैंने अपना जीवन e pluribus unum—अनेकता में एकता—की भावना पर खड़ा किया। अब लगता है कि अनेकता में एक ही आस्था का प्रभुत्व दिखाई दे रहा है।”
गुप्ता परिवार के लिए अमेरिकी सपना अभी भी उपस्थित है, किंतु उसके पीछे अब contingency plans की छाया है—यह स्मरण कराते हुए कि किसी भी क्षण “अपनापन” छीना जा सकता है। उनकी कहानी उन पचास लाख भारतीय-अमेरिकियों की सामूहिक चिंता को प्रतिबिंबित करती है: एक प्रवासियों के देश में “हम” को परिभाषित करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
सन्दर्भ सूची
[1] “U.S. News: ‘I Hope Eventually My Wife…’: JD Vance Faces Severe Backlash for His Comments on Usha Vance’s Faith.” The Economic Times. https://economictimes.indiatimes.com/news/international/global-trends/us-news-i-hope-eventually-my-wife-jd-vance-faces-severe-backlash-for-his-comments-on-usha-vances-faith/articleshow/124984069.cms.
[2] Chabria, Anita. “MAGA’s JD Vance: Tucker Carlson, Nick Fuentes, and the Rise of a Dangerous Movement.” Los Angeles Times, November 4, 2025. https://www.latimes.com/california/story/2025-11-04/chabria-column-maga-jd-vance-tucker-carlson-nick-fuentes.
[3] “Amid Rising Hate Crimes Against Indians in US: Here’s a List of Incidents of Violence in 2025.” Republic World. https://www.republicworld.com/world-news/amid-rising-hate-crimes-against-indians-in-us-here-s-a-list-of-incidents-of-violence-in-2025.
[4] Mandate for Leadership 2025: The Conservative Promise. The Heritage Foundation. https://static.heritage.org/project2025/2025_MandateForLeadership_FULL.pdf.
[5] Pengelly, Martin. “Project 2025: Trump’s Plan to Fire Civil Service Employees Raises Alarm.” The Guardian, September 25, 2024. https://www.theguardian.com/us-news/2024/sep/25/project-2025-trump-plan-fire-civil-service-employees.
[6] “Trump’s Schedule F Plan Explained.” Protect Democracy. https://protectdemocracy.org/work/trumps-schedule-f-plan-explained/.
[7] “What Project 2025 Says About Immigration.” American Immigration Council. https://www.americanimmigrationcouncil.org/blog/what-project-2025-says-about-immigration/.
[8] “What Project 2025 Says About Immigration.” American Immigration Council. https://www.americanimmigrationcouncil.org/blog/what-project-2025-says-about-immigration/.
[9] “Project 2025 and Work-Based Immigration: Repercussions of H-1B Visa Changes.” RN Law Group. https://www.rnlawgroup.com/project-2025-and-work-based-immigration-repercussions-of-h-1b-visa-changes/.
[10] “Project 2025’s Impact on Immigration.” Nolo Legal Encyclopedia. https://www.nolo.com/legal-encyclopedia/project-2025-s-impact-on-immigration.html.
[11] “How to Keep Up with the Changes in Immigration Law.” Docketwise. https://www.docketwise.com/blog/how-to-keep-up-with-the-changes-in-immigration-law/.
[12] Martin, Jeffery. “What Project 2025 Says About H-1B Visas.” Newsweek. https://www.newsweek.com/what-project-2025-says-about-h-1b-visas-2007161.
[13] “H-1B Backlash Grows as Majority of US Citizens See Foreign Talent as Job Competitors.” Financial Express. https://www.financialexpress.com/business/investing-abroad-h-1b-backlash-grows-as-majority-of-us-citizens-see-foreign-talent-as-job-competitors-3973182/.
[14] “Trump Administration Probes 175 Cases of H-1B Visa Misuse, Says US Labour Department.” Outlook India. https://www.outlookindia.com/international/trump-administration-probes-175-cases-of-h-1b-visa-misuse-says-us-labour-department.
[15] Shepardson, David. “Lawsuit Says Musk’s Tesla Hires Visa Holders Instead of Americans So It Can Pay Less.” Reuters, September 12, 2025. https://www.reuters.com/business/world-at-work/lawsuit-says-musks-tesla-hires-visa-holders-instead-americans-so-it-can-pay-less-2025-09-12/.
[16] “Caught Between a Visa and a Job: An American Woman Exposes How the H-1B System Exploits Both Immigrants and US Workers.” The Times of India. https://timesofindia.indiatimes.com/education/news/caught-between-a-visa-and-a-job-an-american-woman-exposes-how-the-h-1b-system-exploits-both-immigrants-and-us-workers/amp_articleshow/124322754.cms.
[17] “Project 2025: Unveiling the Far Right’s Plan to Demolish Immigration in a Second Trump Term.” Niskanen Center. https://www.niskanencenter.org/project-2025-unveiling-the-far-rights-plan-to-demolish-immigration-in-a-second-trump-term/.
[18] “Project 2025 Immigration Overview.” America’s Voice. https://americasvoice.org/blog/project-2025-immigration/.
[19] Mandate for Leadership 2025: The Conservative Promise. The Heritage Foundation. https://static.heritage.org/project2025/2025_MandateForLeadership_FULL.pdf.
[20] Clemens, Michael A. “The Effect of High-Skill Immigration on U.S. Wages and Employment: Working Paper 25836.” National Bureau of Economic Research, 2019. https://www.nber.org/system/files/working_papers/w25836/w25836.pdf.
[21] “Project 2025 and Work-Based Immigration: Repercussions of H-1B Visa Changes.” RN Law Group. https://www.rnlawgroup.com/project-2025-and-work-based-immigration-repercussions-of-h-1b-visa-changes/.
[22] Chabria, Anita. “MAGA’s JD Vance: Tucker Carlson, Nick Fuentes, and the Rise of a Dangerous Movement.” Los Angeles Times, November 4, 2025. https://www.latimes.com/california/story/2025-11-04/chabria-column-maga-jd-vance-tucker-carlson-nick-fuentes.
[23] Raja Krishnamoorthi (@CongressmanRaja). “Post on anti-immigrant rhetoric and threats.” X (Twitter). https://x.com/CongressmanRaja/status/1985127113318453249.
[24] “Arizona tribal member nearly deported after Iowa jail issues ICE detainer by mistake.” AZMirror. https://azmirror.com/2025/11/12/arizona-tribal-member-nearly-deported-after-iowa-jail-issues-ice-detainer-by-mistake/
[25] “Anti–South Asian Online Hate Surged.” NBC News. https://www.nbcnews.com/news/asian-america/anti-south-asian-online-hate-surged-rcna193006.
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