तिलक से शिखा तक: कॉरपोरेट दुनिया में हिंदू प्रतीक ही क्यों निशाने पर?

‘प्रोफेशनलिज़्म’ के नाम पर बनाई जा रही कुछ कॉरपोरेट नीतियों पर आरोप है कि वे हिंदू प्रतीकों को सीमित करती हैं, जबकि अन्य धार्मिक अभिव्यक्तियों को अपेक्षाकृत अधिक स्थान देती हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि जिन संस्थानों की नींव हिंदू उपभोक्ताओं, हिंदू कर्मचारियों और हिंदू-बहुल समाज की आर्थिक शक्ति पर टिकी है, वहाँ ऐसा सांस्कृतिक पक्षपात क्यों दिखाई देता है।
सार

एक ऐसे देश में, जहाँ लगभग 80 प्रतिशत आबादी हिंदू है और वही सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग भी है, हाल के वर्षों में कॉरपोरेट जगत से जुड़े कई विवाद कार्यस्थलों में हिंदू पहचान के साथ भेदभाव और पक्षपात को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। लेंसकार्ट और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) जैसी कंपनियों से जुड़े आरोपों ने इस बहस को और तेज़ कर दिया है। आरोप हैं कि तिलक, बिंदी, कलावा और शिखा जैसे स्पष्ट हिंदू प्रतीकों को “पेशेवर छवि” के नाम पर हतोत्साहित या सीमित किया जा रहा है। यह मामला केवल ड्रेस कोड तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि एक ऐसे व्यापक कॉरपोरेट माहौल की ओर संकेत करता है, जहाँ हिंदू पहचान को सीमित करने की प्रवृति दिखाई देती है, जबकि अन्य धार्मिक पहचानों को अपेक्षाकृत अधिक सहज स्वीकार्यता मिलती है। यह लेख इसी प्रवृत्ति की पड़ताल करता है कि किस प्रकार कार्यस्थल की नीतियाँ, कॉरपोरेट संस्कृति, मीडिया की प्रस्तुति और कुछ वित्तीय व्यवहार मिलकर भारत के कॉरपोरेट ढाँचे में हिंदू पहचान को हाशिये पर धकेले जाने की चिंता बढ़ा रहे हैं।

हाल के दिनों में भारत के कॉरपोरेट जगत से जुड़े कुछ ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने कार्यस्थलों की नीतियों और वहाँ के माहौल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन विवादों ने यह चिंता भी बढ़ा दी है कि क्या दफ़्तरों में हिंदू सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के लिए जगह धीरे-धीरे सीमित की जा रही है।

आरोप हैं कि कई बड़ी कंपनियों में काम करने वाले हिंदू कर्मचारियों पर औपचारिक साज-सज्जा संबंधी नियमों के माध्यम से अपने धार्मिक प्रतीकों को हटाने, छिपाने या कम से कम दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है। तिलक, कलावा, शिखा, सिंदूर और बिंदी जैसे प्रतीक, जो लंबे समय से हिंदू जीवन और संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा रहे हैं, अब “पेशेवर स्वरूप” के नाम पर हतोत्साहित किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में कर्मचारियों को दफ़्तर के समय इन प्रतीकों को हटाने या सीमित रखने तक के निर्देश दिए जाने के आरोप लगे हैं।

एक ऐसे देश में, जहाँ हिंदू समाज लगभग 80 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और वही सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग भी है, इस प्रकार की घटनाओं ने स्वाभाविक रूप से गहरी चिंता पैदा की है। जो प्रतीक कभी सामान्य सांस्कृतिक जीवन का सहज हिस्सा थे, वे अब कुछ पेशेवर वातावरणों में “अनुचित” या “अत्यधिक प्रदर्शन” के रूप में देखे जाने लगे हैं।

लेंसकार्ट की साज-सज्जा संबंधी दिशानिर्देशों से जुड़ा विवाद इस बहस को अचानक केंद्र में ले आया। आरोप यह रहे कि कथित नियमों में जहाँ कुछ हिंदू प्रतीकों को सीमित करने की बात कही गई, वहीं हिजाब और अन्य इस्लामी पहचान-चिन्हों को स्पष्ट रूप से अनुमति दी गई थी। इसी प्रकार की शिकायतें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) और कुछ अन्य बड़ी कंपनियों से भी सामने आई हैं, जहाँ कुछ कर्मचारियों का कहना है कि नौकरी में आगे बढ़ने या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उन पर अपनी धार्मिक पहचान को दबाने का दबाव बनाया गया।

सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यह है कि जिन कंपनियों का व्यापार भारत के विशाल हिंदू-बहुल बाज़ार, हिंदू कर्मचारियों और उनकी क्रय-शक्ति पर आधारित है, उन्हीं पर अब हिंदू पहचान को सीमित करने के आरोप लग रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इससे एक प्रकार का सांस्कृतिक असंतुलन पैदा होता है, जिसमें बहुसंख्यक हिंदू पहचान को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जबकि अन्य धार्मिक पहचानों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहजता बरती जाती है। विडंबना यह है कि यह बहस उन्हीं कार्यस्थलों को लेकर उठ रही है, जो बड़ी सीमा तक हिंदू प्रतिभा, हिंदू उपभोक्ताओं और उनके आर्थिक योगदान पर टिके हुए हैं।

लेंसकार्ट का विवादित दस्तावेज़ और उठते सवाल

लेंसकार्ट से जुड़ा विवाद तब अचानक सुर्खियों में आ गया, जब कंपनी का एक आंतरिक साज-सज्जा संबंधी दस्तावेज़ ऑनलाइन सामने आया। दस्तावेज़ की सामग्री देखकर सोशल मीडिया पर व्यापक हैरानी और नाराज़गी देखने को मिली। इसमें कथित तौर पर साफ़ लिखा था कि “बिंदी की अनुमति नहीं है”, “सिंदूर बहुत हल्का हो और माथे पर स्पष्ट रूप से न दिखे” तथा “धार्मिक धागे या कलाई पर बंधे बैंड हटाने होंगे” — जिसे व्यापक रूप से कलावे से जोड़कर देखा गया[1]

सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर हुआ कि जहाँ इन दिशानिर्देशों में कई हिंदू प्रतीकों को सीमित करने या हटाने की बात कही गई, वहीं हिजाब और पगड़ी जैसे अन्य धार्मिक पहचान-चिन्हों को स्पष्ट रूप से अनुमति दी गई थी। लेखिका और सामाजिक टिप्पणीकार शेफाली वैद्य इस दस्तावेज़ को सार्वजनिक रूप से चुनौती देने वालों में प्रमुख रहीं। उनका कहना था कि उन्होंने विश्वसनीय स्रोतों और एआई आधारित जाँच की सहायता से दस्तावेज़ की प्रामाणिकता की पुष्टि की है[2] [3]

जनता के तीव्र विरोध के बाद लेंसकार्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पियूष बंसल ने सफाई देते हुए कहा कि यह मार्गदर्शिका “पुरानी” है और कंपनी की वर्तमान नीति को प्रतिबिंबित नहीं करती[4] लेकिन शेफाली वैद्य ने इस दावे को तत्काल खारिज करते हुए इसे भ्रामक बताया। उन्होंने सामाजिक मंच X पर लिखा:

“मेरे पास पुख्ता प्रमाण हैं कि Lenskart_com के CEO पियूष बंसल झूठ बोल रहे हैं, जब वे कहते हैं कि ‘नो बिंदी’ वाला ग्रूमिंग कोड पुराना है। मेरे पास 08/04/2026 की एक वीडियो ऑडिट का प्रमाण है, जिसमें एक कर्मचारी को बिंदी पहनने पर कम रेटिंग दी गई। समय आने पर मैं इसे साझा करूँगी। एक अच्छे वकील के साथ सबूत साझा करने को भी तैयार हूँ। लेंसकार्ट एक सूचीबद्ध कंपनी है, जिसे SEBI के नियमों का पालन करना होता है, न कि किसी निजी जागीर की तरह चलना चाहिए। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 की भावना के विपरीत है।” — शेफाली वैद्य, X पर [5]

यह दस्तावेज़ कब तैयार किया गया था, या वर्तमान में लागू था या नहीं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी नीति बनाने की आवश्यकता आखिर क्यों महसूस की गई। आलोचकों का तर्क है कि किसी संगठन के भीतर ऐसी सोच का जन्म अपने आप में इस बात का संकेत माना जा सकता है कि वहाँ सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों को लेकर एक प्रकार का भीतरी पक्षपात मौजूद है।

कार्यस्थल की संस्कृति पर उठते गंभीर प्रश्न

लेंसकार्ट को लेकर सामने आया विवाद केवल एक साज-सज्जा नियमावली तक सीमित नहीं रहा। आलोचकों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इसने कंपनी के भीतर हिंदू धार्मिक प्रतीकों और पहचान को लेकर एक गहरे पूर्वाग्रह की ओर संकेत किया, जिसे धीरे-धीरे सामान्य मान लिया गया।

जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, देश के विभिन्न हिस्सों से लेंसकार्ट स्टोर्स की तस्वीरें और अनुभव सामने आने लगे। कुछ स्थानों पर मुस्लिम महिलाएँ हिजाब पहनकर ग्राहकों की सेवा करती दिखाई दीं, जबकि हिंदू कर्मचारी बिना किसी स्पष्ट धार्मिक प्रतीक के नज़र आए। इसने सामाजिक माध्यमों पर बहस को और तेज़ कर दिया। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिंतित नागरिकों ने स्वयं स्टोर्स का दौरा कर स्थिति का आकलन करने का दावा किया। उनके द्वारा साझा किए गए कुछ चित्रों और वीडियो में यह आरोप लगाया गया कि हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें कर्मचारियों की मेज़ों के नीचे या पैरों के पास रखी गई थीं, ताकि वे ग्राहकों को दिखाई न दें[6]

इसके बाद कंपनी के कुछ पूर्व कर्मचारियों के बयान भी सामने आने लगे। कुछ लोगों ने दावा किया कि तिलक, कलावा या अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीकों को हटाने से इनकार करने पर उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया या सेवा समाप्त कर दी गई[7] सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित एक चर्चित पोस्ट में यह आरोप भी लगाया गया कि इसी प्रकार के कारणों से बड़ी संख्या में कर्मचारियों को हटाया गया। हालाँकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि व्यापक स्तर पर नहीं हो सकी, फिर भी इतने बड़े पैमाने पर सामने आए व्यक्तिगत अनुभवों ने बहस को और गहरा कर दिया, विशेषकर इसलिए क्योंकि कई लोगों ने अपनी पहचान सार्वजनिक रखी और कुछ बयान वीडियो के रूप में भी सामने आए।

लेंसकार्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पियूष बंसल की प्रतिक्रिया को लेकर भी मतभेद रहे। पहले कंपनी ने संबंधित नियमावली को “पुराना” बताते हुए उससे दूरी बनाने की कोशिश की, और बाद में एक नया “समावेशी” साज-सज्जा मार्गदर्शक जारी किया[8] लेकिन आलोचकों का एक वर्ग इसे वास्तविक सुधार से अधिक छवि बचाने का प्रयास मानता है। उनका तर्क था कि यदि पहले से लागू नियम भेदभावपूर्ण थे, तो केवल एक संशोधित दस्तावेज़ जारी कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता[9]

कर्मचारियों के कुछ अनुभवों ने इस विवाद को और गंभीर रूप दिया। गुजरात के ज़ील सोगहासिया ने दावा किया कि नौकरी के साक्षात्कार के दौरान ही उनसे शिखा कटवाने और तिलक हटाने को कहा गया था। उनके अनुसार, ऐसा न करने पर उन्हें नवी मुंबई स्थित प्रशिक्षण केंद्र से वापस भेज दिया गया[10]

कुछ अन्य आरोपों में यह भी कहा गया कि धार्मिक अवसरों को लेकर व्यवहार में असमानता दिखाई देती थी। शिकायतकर्ताओं के अनुसार रमज़ान के दौरान अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन दिखाया जाता था, जबकि हिंदू त्योहारों को समान महत्व नहीं मिलता था। कुछ महिला कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि वीडियो निरीक्षण के दौरान उनसे बिंदी हटाने को कहा गया, और कुछ मामलों में निरीक्षकों द्वारा स्वयं बिंदी हटाने जैसी घटनाएँ भी हुईं। कुछ कर्मचारियों का कहना था कि हिंदू धार्मिक प्रतीकों को धारण करने पर उन्हें ताने, फटकार या अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता था[11]

आलोचकों के अनुसार, लेंसकार्ट विवाद ने एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया है: क्या भारत के आधुनिक कार्यस्थलों में हिंदू धार्मिक पहचान को “पेशेवर छवि” के नाम पर सीमित किया जा रहा है? बिंदी हटाने का दबाव, शिखा के कारण नौकरी से वंचित किए जाने के आरोप, या धार्मिक चित्रों को नज़र से दूर रखने जैसे दावे, इन आरोपों ने बहस को और तीखा बना दिया है। कुछ लोगों ने इसे सांस्कृतिक भेदभाव तक की संज्ञा दी है, जबकि अन्य इसे कॉरपोरेट नीतियों और धार्मिक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन का जटिल प्रश्न मानते हैं।

फैबइंडिया से HDFC तक: क्या यह महज़ संयोग है?

जैसे-जैसे लेंसकार्ट विवाद बढ़ता गया, सामाजिक माध्यमों पर कई अन्य बड़ी भारतीय कंपनियों के नाम भी चर्चा में आने लगे। आरोप लगाए गए कि उनकी साज-सज्जा संबंधी नियमावलियाँ हिंदू धार्मिक प्रतीकों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती हैं। एयर इंडिया के केबिन क्रू से जुड़े कुछ दिशानिर्देश, जो व्यापक रूप से ऑनलाइन साझा किए गए, बिंदी, कलावा, तिलक और सिंदूर जैसे प्रतीकों को सीमित करने के कारण लेंसकार्ट विवाद से जोड़े जाने लगे। बाद में एयर इंडिया ने स्पष्ट किया कि ये पुराने दिशानिर्देश हैं और वर्तमान में लागू नहीं हैं[12] इसी प्रकार, कुछ व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक माध्यमों पर साझा किए गए दावों में आयुर्वेदिक ब्रांड Forest Essentials पर भी हिंदू प्रतीकों को हतोत्साहित करने के आरोप लगाए गए[13]

दरअसल, बीते कुछ वर्षों में भारत का कॉरपोरेट जगत ऐसे कई विवादों के कारण चर्चा में रहा है। अक्टूबर 2021 में फैबइंडिया को दीपावली को “जश्न-ए-रिवाज़” नाम से प्रचारित करने पर तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। 2020 में तनिष्क के एक विज्ञापन को लेकर भारी विवाद हुआ, जिसे आलोचकों के एक वर्ग ने “लव जिहाद” को सामान्य और स्वीकार्य दिखाने की कोशिश बताया। बढ़ते विरोध के बाद कंपनी को वह विज्ञापन वापस लेना पड़ा। अक्टूबर 2023 में नवरात्रि के अवसर पर HDFC बैंक के एक प्रचार अभियान की भी आलोचना हुई, जिसमें एक महिला की बिंदी को “नो एंट्री” चिह्न में बदलकर दिखाया गया था। इसी तरह मार्च 2019 में Surf Excel के एक विज्ञापन ने बहस छेड़ दी थी, जिसमें एक लड़की एक मुस्लिम बच्चे को होली के रंगों से बचाते हुए दिखती है, ताकि वह साफ़ कपड़ों में मस्जिद पहुँच सके[14]

लेंसकार्ट के लिखित साज-सज्जा नियमों से अलग, TCS नासिक से जुड़ा विवाद कार्यस्थल पर दबाव के एक अलग रूप को सामने लाता है। आरोपों के अनुसार, कुछ कर्मचारियों को केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित रहने के लिए नहीं कहा गया, बल्कि उन्हें ऐसे वातावरण का सामना करना पड़ा, जहाँ कुछ धार्मिक-सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप न चलने पर पेशेवर नुकसान की आशंका महसूस होती थी। कई लोगों का मानना हैकि जब कार्यस्थल का वातावरण इस प्रकार का दबाव पैदा करने लगे, तो वह सामान्य समायोजन की सीमा पार कर संस्थागत दबाव का रूप ले सकता है।

इन विवादों की आवृत्ति और विस्तार को देखते हुए कुछ लोगों का मानना है कि लेंसकार्ट प्रकरण शायद एक बड़े चलन का केवल दिखाई देने वाला हिस्सा है। बहुत-सी घटनाएँ संभवतः सामने ही नहीं आ पातीं, क्योंकि कर्मचारी नौकरी या पेशेवर भविष्य पर असर पड़ने के डर से खुलकर बोलने से बचते हैं। सूचना देने वालों की सुरक्षा की सीमित व्यवस्था और मीडिया की चुनिंदा रुचि भी कई मामलों को लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा में आने से रोक देता है।

एक और उल्लेखनीय प्रवृत्ति यह रही है कि कार्यस्थलों में हिंदू धार्मिक प्रतीकों के साथ कथित भेदभाव से जुड़े आरोप अक्सर सबसे पहले सामाजिक माध्यमों, मुखबिरों या स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से सामने आते हैं, न कि मुख्यधारा के समाचार माध्यमों से। TCS नासिक मामले में भी आलोचकों का कहना था कि शुरुआती रिपोर्टों में आरोपों को मुख्यतः यौन उत्पीड़न तक सीमित कर दिया गया, जिससे धार्मिक दबाव और कार्यस्थल की संस्कृति से जुड़े पहलू पीछे छूट गए[15] इसी प्रकार, लेंसकार्ट विवाद की कुछ रिपोर्टों में इसे महज़ “सोशल मीडिया विवाद” के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि उनके दावों की गंभीरता से जाँच करने के बजाय ध्यान बहस की तीखी प्रतिक्रिया पर केंद्रित कर दिया गया।

आलोचकों का तर्क है कि यह असंतुलन केवल साज-सज्जा संबंधी नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे वित्तीय और नीतिगत ढाँचों में भी दिखाई देने लगा है। उनके अनुसार, जिस प्रकार कुछ धार्मिक मान्यताओं को संस्थागत स्तर पर सहज स्वीकार्यता मिलती है, उसी अनुपात में हिंदू सांस्कृतिक पहचान को अक्सर अधिक नियंत्रण और सीमाओं के दायरे में देखा जाता है। यही प्रश्न अब कॉरपोरेट भारत की निष्पक्षता और सांस्कृतिक संतुलन को लेकर व्यापक बहस का विषय बनता जा रहा है।

कॉरपोरेट भारत में बढ़ता इस्लामिक तुष्टिकरण

कुछ लोगों के अनुसार भारतीय कॉरपोरेट जगत में कुछ धार्मिक मान्यताओं के प्रति बढ़ती संस्थागत संवेदनशीलता और विशेष व्यवस्थाएँ और रियायतें, कार्यस्थलों में हिंदू पहचान को लेकर उठ रहे प्रश्नों को और अधिक गंभीर बना देती हैं। उनके अनुसार, जब एक ओर हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर सीमाएँ लगाने या उन्हें “पेशेवर स्वरूप” के नाम पर नियंत्रित करने के आरोप सामने आते हैं, और दूसरी ओर कुछ धार्मिक प्रथाओं के लिए विशेष सुविधाएँ दी जाती हैं, तो इससे सांस्कृतिक संतुलन और समानता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

TCS नासिक विवाद के दौरान, टेक महिंद्रा के गोरेगांव (मुंबई) स्थित कार्यालय को लेकर भी सामाजिक माध्यमों पर तीखी बहस देखने को मिली। अधिवक्ता आशुतोष दुबे ने X पर दावा किया कि रमज़ान के दौरान कंपनी के भोजन-कक्ष (पैंट्री) को “जूता-मुक्त क्षेत्र” घोषित किया गया था, ताकि नमाज़ और इफ़्तार की व्यवस्था सुचारु रूप से हो सके, और कर्मचारियों से “एकता” के नाम पर इस व्यवस्था का पालन करने को कहा गया। इसके अतिरिक्त सामाजिक माध्यमों पर कंपनी के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों, धार्मिक अवसरों पर कथित रूप से विशेष रियायतें देने और नियमों के असमान अनुपालन जैसे आरोप भी लगाए गए। हालाँकि टेक महिंद्रा ने इन सभी आरोपों को अस्वीकार करते हुए कहा कि आंतरिक जाँच में वे तथ्यहीन पाए गए[16]

TCS नासिक विवाद के बाद टाटा समूह को भी अपने Tata Ethical Mutual Fund को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। 1996 में शुरू हुई यह योजना इस्लामी वित्तीय सिद्धांतों के अनुरूप निवेश करती है और बैंकिंग, बीमा, शराब, तंबाकू, जुआ तथा कुछ मनोरंजन क्षेत्रों से दूरी बनाए रखती है। टाटा म्यूचुअल फंड के अनुसार यह एक ऐसी इक्विटी योजना है, जो शरिया मानकों के अनुरूप विभिन्न भारतीय कंपनियों में निवेश करती है, जिनमें इन्फोसिस, TCS, टेक महिंद्रा और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कंपनियाँ शामिल हैं[17] [18]

यद्यपि इस प्रकार की निवेश योजनाएँ पूरी तरह वैध हैं और भारतीय क़ानून के अंतर्गत संचालित होती हैं, फिर भी आलोचकों का एक वर्ग इसे व्यापक सांस्कृतिक असंतुलन के संदर्भ में देखता है। उनका तर्क है कि यदि विशेष धार्मिक मान्यताओं पर आधारित वित्तीय ढाँचों को सहज संस्थागत स्वीकार्यता मिल सकती है, तो हिंदू जीवन-मूल्यों पर आधारित समानांतर निवेश विकल्प मुख्यधारा में क्यों दिखाई नहीं देते। कुछ आलोचक “सात्विक निवेश” जैसी अवधारणाओं की अनुपस्थिति को इसी असमानता का उदाहरण मानते हैं।

हालाँकि इस विषय पर मतभेद भी स्पष्ट हैं। समर्थकों का कहना है कि शरिया-अनुरूप निवेश केवल एक वित्तीय श्रेणी है, जैसा कि पर्यावरण-अनुकूल (ESG) या नैतिक निवेश मॉडल होते हैं, और इसे किसी वैचारिक या धार्मिक विस्तारवाद से जोड़कर देखना उचित नहीं है। दूसरी ओर, आलोचक इसे एक बड़े संस्थागत झुकाव के हिस्से के रूप में देखते हैं, जहाँ कुछ धार्मिक मानदंडों को संस्थागत मान्यता मिलती है, जबकि हिंदू सभ्यतागत दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत कम स्थान मिलता है।

इसी बहस ने कॉरपोरेट भारत में सांस्कृतिक निष्पक्षता, समान मानदंड और धार्मिक अभिव्यक्ति के संतुलन को लेकर एक व्यापक प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या सभी धार्मिक पहचानों और परंपराओं के साथ वास्तव में समान व्यवहार हो रहा है, या कहीं कुछ अदृश्य असमानताएँ धीरे-धीरे संस्थागत रूप ले रही हैं?

जब हिन्दू ही हिंदू पहचान पर पहरा लगाने लगें

इन विवादों को विशेष रूप से असहज और चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि जिन कंपनियों पर हिंदू पहचान के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये के आरोप लग रहे हैं, वे कोई विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नहीं हैं, जो बाहर से सांस्कृतिक मूल्य थोप रही हों। ये भारतीय कंपनियाँ हैं, जिनका नेतृत्व प्रायः हिंदू मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, संस्थापकों और प्रवर्तकों के हाथों में है — ऐसे लोग, जो एक ओर हिंदू-बहुल बाज़ार, हिंदू कर्मचारियों और भारतीय सांस्कृतिक भावनाओं से आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं, लेकिन दूसरी ओर उन्हीं संस्थानों के भीतर हिंदू पहचान को सीमित करने के आरोपों से घिरे रहते हैं।

यह विरोधाभास आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक मंचों पर अनेक कॉरपोरेट नेता भारतीय परंपरा, संस्कृति और सभ्यतागत गौरव की बातें करते दिखाई देते हैं। विज्ञापनों में दीपावली, योग, परिवार और भारतीय मूल्यों का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन आलोचकों का आरोप है कि दफ़्तरों के भीतर वही दिखाई देने वाले हिंदू प्रतीक — जैसे तिलक, बिंदी, कलावा या शिखा — कई बार “पेशेवर छवि” या “वैश्विक मानकों” के नाम पर असुविधाजनक मान लिए जाते हैं।

कुछ आलोचक इसे भारत के कॉरपोरेट अभिजात वर्ग के एक हिस्से में मौजूद गहरे सांस्कृतिक संकोच का प्रतिबिंब मानते हैं। उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता, विदेशी निवेशकों की अपेक्षाएँ और तथाकथित “वैश्विक” छवि की दौड़ में, कुछ कंपनियाँ हिंदू पहचान के स्पष्ट प्रतीकों को आधुनिक छवि के प्रतिकूल या अत्यधिक पारंपरिक समझने लगती हैं। परिणामस्वरूप, जिस सभ्यतागत आधार, सांस्कृतिक परिवेश और उपभोक्ता वर्ग से वे लाभ अर्जित करती हैं, उसी की सार्वजनिक अभिव्यक्तियों को लेकर झिझक दिखाई देने लगती है।

आलोचकों के अनुसार, यह केवल दोहरे मानदंड या पाखंड का प्रश्न नहीं रह जाता। वे इसे एक ऐसी मानसिकता के रूप में देखते हैं, जहाँ हिंदू पहचान त्योहारों, विज्ञापनों और विपणन अभियानों में तो स्वागतयोग्य मानी जाती है, लेकिन कार्यस्थल के औपचारिक वातावरण में उसे सीमित या नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। उनका तर्क है कि जिन प्रतीकों पर किसी अन्य समुदाय के संदर्भ में प्रतिबंध लगाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया होती, वही प्रतीक हिंदुओं से जुड़े होने पर अपेक्षाकृत सहजता से नियंत्रित कर दिए जाते हैं।

इसी कारण कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि जब हिंदू-स्वामित्व वाली या हिंदू नेतृत्व वाली कंपनियों पर ही हिंदू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सीमित करने के आरोप लगने लगें, तब यह बहस केवल साज-सज्जा नियमों तक सीमित नहीं रहती। उनके अनुसार, यह एक व्यापक सांस्कृतिक आत्म-संकुचन की ओर संकेत करती है, जहाँ समाज का प्रभावशाली वर्ग ही अपनी सभ्यतागत पहचान को सार्वजनिक जीवन से सीमित करने की प्रक्रिया में सहभागी बन जाता है।

जब उपभोक्ता जागता है, कॉरपोरेट बदलता है

लेंसकार्ट विवाद के दौरान जब व्यापक बहिष्कार की अपीलें सामने आईं, तो कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई[19] #BoycottLenskart अभियान लंबे समय तक सामाजिक माध्यमों पर चर्चा का विषय बना रहा। आलोचकों का कहना था कि कंपनी ने अपनी कथित हिंदू-विरोधी साज-सज्जा नीति को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने के बजाय उसे “पुराना दस्तावेज़” बताकर विवाद को शांत करने की कोशिश की। हालाँकि बाद में सभी धर्मों के प्रतीकों को अनुमति देने वाले नए दिशानिर्देश जारी किए गए, फिर भी अनेक ग्राहकों के मन में संदेह बना रहा। आलोचकों के एक वर्ग का मानना है कि यह कदम वास्तविक आत्ममंथन से अधिक सार्वजनिक छवि को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास था, और आशंका जताई गई कि समय बीतने पर पुरानी प्रवृत्तियाँ लौट सकती हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जहाँ सामाजिक माध्यमों पर इस विषय को लेकर व्यापक आक्रोश दिखाई दिया, वहीं वास्तविक जीवन में प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही। आलोचकों का तर्क है कि लंबे समय से चली आ रही एकतरफा धर्मनिरपेक्ष सोच ने शहरी हिंदू समाज के एक हिस्से को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े प्रश्नों के प्रति उदासीन बना दिया है। उनके अनुसार, कई लोग सार्वजनिक जीवन में धार्मिक निष्पक्षता के नाम पर ऐसे मामलों को गंभीरता से देखने से बचते हैं, भले ही वे अपनी ही सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जुड़े हों।

इसी संदर्भ में कुछ समूह यह तर्क दे रहे हैं कि हिंदू उपभोक्ताओं को अपनी आर्थिक शक्ति का संगठित रूप से प्रयोग करना चाहिए। उनका कहना है कि यदि उपभोक्ता अपने ख़रीद संबंधी निर्णय केवल सुविधा या मूल्य के आधार पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान और संस्थागत व्यवहार को ध्यान में रखकर लेने लगें, तो कंपनियाँ अपनी नीतियों को लेकर अधिक जवाबदेह बनने को बाध्य होंगी। आलोचकों के अनुसार, जब तक उपभोक्ता वर्ग व्यापक उदासीनता बनाए रखेगा, तब तक कॉरपोरेट नेतृत्व पर बदलाव का दबाव सीमित ही रहेगा।

हालाँकि केवल प्रतीकात्मक विरोध से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होगा। इस बहस के बीच कुछ लोगों ने कुछ संरचनात्मक सुझाव भी सामने रखे हैं:

  • कार्यस्थलों पर सभी धार्मिक पहचानों के लिए समान मानदंड सुनिश्चित करने हेतु स्पष्ट और पारदर्शी आचार-संहिता।
  • कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और गोपनीय शिकायत व्यवस्था, ताकि वे प्रतिशोध के भय के बिना अपनी बात रख सकें।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक भेदभाव से जुड़े मामलों की स्वतंत्र समीक्षा और समय-समय पर बाहरी जाँच।
  • कंपनियों की साज-सज्जा नीतियों, अवकाश संबंधी नियमों और आंतरिक दिशानिर्देशों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना।
  • विविध सांस्कृतिक परंपराओं को समान सम्मान देने वाले वैकल्पिक सामाजिक और आर्थिक ढाँचों पर चर्चा।

अंततः यह बहस केवल लेंसकार्ट या किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में आधुनिक कार्यस्थल किस प्रकार ऐसी व्यवस्था विकसित करें, जहाँ पेशेवर अपेक्षाओं और सांस्कृतिक-धार्मिक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बना रहे, और किसी भी समुदाय को यह महसूस न हो कि उसकी पहचान को सीमित किया जा रहा है।

सन्दर्भ सूची

[1] Lenskart controversy: Bindi-hijab storm refuses to die down despite CEP Peyush Bansal’s clarification. Here’s why – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/story/lenskart-dress-code-controversy-boycott-calls-backlash-ceo-peyush-bansal-2898118-2026-04-18

[2] Shefali Vaidya on X;  https://x.com/ShefVaidya/status/2044302806446944638

[3] Shefali Vaidya on X; https://x.com/ShefVaidya/status/2044385244296646976

[4] India Today News Desk. “Lenskart Controversy: Bindi-Hijab Storm Refuses to Die Down Despite CEO Peyush Bansal’s Clarification. Here’s Why.” India Today, April 18, 2026. https://www.indiatoday.in/india/story/lenskart-dress-code-controversy-boycott-calls-backlash-ceo-peyush-bansal-2898118-2026-04-18

[5] Shefali Vaidya on X;  https://x.com/ShefVaidya/status/2045358331141771326

[6] Lenskart Row: Shefali Vaidya’s call – ‘Stand up, don’t stay silent’; https://organiser.org/2026/04/21/349813/bharat/lenskart-row-shefali-vaidya-to-hindus-stand-up-for-yourselves-dont-wait-for-someone-else-to-fight-for-your-dharma/

[7] I was asked to remove tilak: Ex-Lenskart staff alleges discriminatory firing: watch video; https://www.msn.com/en-in/money/topstories/i-was-asked-to-remove-tilak-ex-lenskart-staff-alleges-discriminatory-firing-watch-video/ar-AA21f1x4?ocid=finance-verthp-feeds&apiversion=v2&domshim=1&noservercache=1&noservertelemetry=1&batchservertelemetry=1&renderwebcomponents=1&wcseo=1&bundles=feat-es2020-c

[8] Lenskart Issues New Dress Code After Backlash Over Bindi, Tilak, Peyush Bansal’s clarification; https://www.ndtv.com/india-news/lenskart-issues-new-dress-code-after-backlash-over-bindi-tilak-peyush-bansals-clarification-11378195

[9] Ibid.

[10] Video and Audio Evidence Reveal Peyush Bansal’s Lenskart Penalized Hindus For Wearing Bindi, Kumkum, Kalawa – The Commune; https://thecommunemag.com/video-and-audio-evidence-reveal-peyush-bansals-lenskart-penalized-hindus-for-wearing-bindi-kumkum-kalawa/

[11] Ibid.

[12] After Lenskart, Air India’s grooming policy document goes viral; https://organiser.org/2026/04/20/349473/bharat/after-lenskart-air-indias-grooming-policy-document-goes-viral-bindi-sindoor-and-tilak-come-under-fire/

[13] Shefali Vaidya on X; https://x.com/ShefVaidya/status/2046214480770838917

[14] Exposing the Corporate Jihad across Bharat; https://organiser.org/2026/04/20/349580/bharat/corporate-jihad-across-bharat-the-systematic-erasure-of-hindu-identity-at-workplace/

[15]Lenskart Row: Tilak vs Hijab Dress Code Sparks Backlash | Peyush Bansal Controversy |  N18V – Youtube; https://www.youtube.com/watch?v=Xb048zZF6cU

[16] Tech Mahindra denies religious bias claims amid wide scrutiny on IT workplace practices – BusinessToday; https://www.businesstoday.in/technology/story/tech-mahindra-denies-religious-bias-claims-amid-wider-scrutiny-on-it-workplace-practices-525795-2026-04-15

[17] After TCS Nashik scandal, Tata faces fresh backlash over Rs 3624.91 cr ‘shariah-compliant’ ethical mutual fund;  https://www.dnaindia.com/india/report-after-tcs-nashik-scandal-tata-faces-fresh-social-media-backlash-over-rs-3624-cr-shariah-compliant-ethical-mutual-fund-3206871

[18] Tata Ethical Fund Direct Growth – Tata Mutual Fund; https://www.tatamutualfund.com/mutual-funds/tata-ethical-fund-direct-growth

[19] Lenskart shares tumble 5% amid online backlash over dress code row – The Economic Times;   https://economictimes.indiatimes.com/markets/stocks/news/lenskart-shares-tumble-5-amid-boycott-calls-online-backlash-over-religious-dress-code-controversy/articleshow/130385860.cms?from=mdr

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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