1995 का वक़्फ़ बोर्ड अधिनियम: स्वतंत्र भारत में हिंदू अधिकारों का ह्रास

वक़्फ़ की भूमि हड़पने की योजनाएँ, शोषणकारी आचरण और संवैधानिक उल्लंघनों की जांच-पड़ताल

सभ्यताएं हत्या से नहीं, बल्कि आत्महत्या से मरती हैं – अर्नोल्ड जे. टॉयनबी

  • 1995 का वक़्फ़ बोर्ड अधिनियम वक़्फ़ ट्रिब्यूनल और इसकी विस्तृत शक्तियों को लागू करके हिंदू अधिकारों के सुनियोजित क्षरण का प्रतीक है।
  • इस अधिनियम में उचित प्रक्रिया और कानूनी सहारा न होने के कारण वक़्फ़ों की सुरक्षा और बढ़ावा दिया जाता है, जबकि गैर-मुस्लिम हितों की अवहेलना की जाती है।
  • वक़्फ़ जिन लोगों की संपाती हथिया लेता है, उन्हीं पर अपनी संपत्तियों के अधिकार साबित करने का बोझ डाल दिया जाता है, जो सामान्य बुद्धि और न्याय का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • कुल मिलाकर, वक़्फ़ अधिनियम एक उपनिवेशोत्तर पहल के रूप में उभरता है, जो समय के साथ हिंदू अधिकारों का व्यवस्थित रूप से ह्रास करता है।

मूल रूप से वक़्फ़ (बहुवचन औक़ाफ़) अल्लाह के नाम से स्थायी रूप से स्थापित एक इस्लामिक ट्रस्ट है, जो किसी अन्य उपयोग से संरक्षित रहता है। और ट्रस्टों की तरह ना होते हुए, वक़्फ़ एक स्थायी और अपरिवर्तनीय होता है, जो केवल इस्लाम की आस्था पर आधारित होता है। इस में शरीयत-स्वीकृत गतिविधियों की अनिवार्यता तो होती है, पर कोई परोपकारी उद्देश्यों की अनिवार्यता नहीं होती।

यदि इतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो वक़्फ़ का उद्देश्य केवल इस्लामी विस्तार, धर्मांतरण प्रयासों और अन्य धार्मिक स्थलों के अधिग्रहण रहा है। सुल्तान और मुगल काल के दौरान, वक़्फ़ों का प्रबंधन केंद्रित रूप से होता था, जहां मुतवल्ली (ट्रस्टी) और काज़ी जैसे लोग निरीक्षक होते थे। न्याय प्रणाली मुख्य रूप से इस्लामी धर्मगुरुओं से मिलकर बनी थी, जो शरीयत का समर्थन करती थी और गैर-मुसलमानों के खिलाफ पक्षपाती फैसले लेती थी।

ब्रिटिश-पूर्व भारत में, सूफियों ने इस्लाम के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूफी नेटवर्क ने स्थानीय रीति-रिवाजों को इस्लामी प्रथाओं के साथ मिलाकर जनसंख्या को धर्मांतरित किया। इस धर्मांतरण प्रक्रिया में वक़्फ़ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि सूफी नेटवर्क को जीविका भत्ता प्रदान किया जाता था। कुछ उदाहरणों में तो  पूरे गांव जहां पहले खेती नहीं होती थी, सूफियों को दे दिए जाते थे,  ताकि वे इसे उपजाऊ बना सकें। इस प्रकार, प्रभावशाली मुस्लिम धार्मिक नेता स्थानीय आबादी के निकट संपर्क में आए और धीरे-धीरे उन्हें इस्लाम में शामिल किया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अन्य धर्मस्थलों को वक़्फ़ में बदलने और गिराने की परंपरा रही है। प्रसिद्ध उदाहरणों में काबा और यरुशलम की अल-अक्सा मस्जिद शामिल हैं। भारत में, जो ज़मीनें वक़्फ़ को दी गईं, उन पर अक्सर आदिवासी समूहों और स्थानीय हिंदू किसानों का अधिकार था, परंतु उनके दावों को उलेमा-प्रधान काज़ियों और अधिकारियों ने जबरदस्ती दबा दिया या नज़रअंदाज़ कर दिया। ये दावे हमारे समय में भी जारी हैं, जैसे अयोध्या और ज्ञानवापी विवादों में, और यहां तक कि राष्ट्रीय स्मारकों तक भी फैले हुए हैं। वक्फ के पास कोई ठोस कानूनी न होते हुए भी, वे “अल्लाह की संपत्ति, सदा के लिए और अहरणीय” जैसी भावनात्मक और वाद-विवाद के बेतुके तर्क देकर इन ज़मीनों पर कब्जा बनाने में कामयाब होते रहे हैं।

1954 – आत्म-विनाश का बीज बोने की क्रिया 
विभाजन के बाद जब हिंदू पाकिस्तान से भारत आए, तो पाकिस्तान में उनकी संपत्तियों को मुसलमानों और पाकिस्तानी सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। इसके विपरीत, भारतीय सरकार ने पाकिस्तान चले जाने वाले मुसलमानों की संपत्तियों को वक़्फ़ बोर्डों को आवंटित कर दिया। भारत ने 1954 में वक़्फ़ अधिनियम लागू किया[1], जिसके तहत वक़्फ़ बोर्ड को एक राजनीतिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया, जिसे कार्यकारी और अर्ध-न्यायिक शक्तियाँ दी गईं। इस कानून ने बोर्डों को संपत्तियों को पट्टे पर देने, गिरवी रखने, या बेचने का अधिकार दिया, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।

जो भी संपत्ति वक़्फ़ द्वारा किसी गैर-मुस्लिम पक्ष से ली जाती है, वह राज्य की स्वीकृति से किया गया एक नियमित अन्याय है, और इसके खिलाफ कोई न्यायिक उपाय नहीं है। यह वक़्फ़ अधिनियम को एक असीम शोषणकारी प्रथा बना देता है, जो स्पष्ट रूप से अन्य पक्षों के अधिकारों का हनन है।

हिंदुओं, सिखों, या ईसाइयों के लिए इस प्रकार की कोई समकक्ष संस्था नहीं है। 1925 का सिख गुरुद्वारा अधिनियम केवल गुरुद्वारों के प्रबंधन को नियंत्रित करता है, जबकि हिंदू मंदिरों और संगठनों के लिए विभिन्न अधिनियम, जैसे कि धार्मिक न्यास अधिनियम 1863 और भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882, राज्य सरकारों द्वारा नियोजित होते हैं, न कि हिंदुओं द्वारा।

1995 और 2013 – एक भयानक जिन्न का निर्माण

1954 के वक़्फ़ अधिनियम में 1964, 1969 और 1984 में कई संशोधन किए गए, जिसके बाद 1995 में इसका पूरी तरह से पुनर्गठन किया गया[2]। यह महत्वपूर्ण संशोधन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों द्वारा मुसलमानों के वोट बैंक को साधने के उद्देश्य से किया गया था। 1995 के संशोधन ने वक़्फ़ ट्रिब्यूनल का निर्माण किया, जो एक खतरनाक नवाचार था। इस ट्रिब्यूनल को वक़्फ़ से संबंधित संपत्तियों, पट्टों और किराए के मामलों का निपटारा करने के व्यापक अधिकार दिए गए। इसमें न्यायिक और सिविल सेवा के कर्मियों के साथ-साथ मुस्लिम कानून के जानकार व्यक्ति शामिल होते हैं। ट्रिब्यूनल के निर्णय अंतिम होते हैं और इसके खिलाफ कोई अपील का प्रावधान नहीं है। साधारण दीवानी अदालतों के विपरीत, यह ट्रिब्यूनल वक़्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा और उनके प्रबंधन को प्राथमिकता देता है। इस अंतर्निहित पक्षपात के कारण निर्दोष तृतीय पक्षों के लिए अपने वैध हितों को ट्रिब्यूनल के सामने रखना कठिन हो जाता है, जबकि दीवानी अदालत में ऐसा संभव होता। इस कानून की शोषणकारी प्रकृति को निम्न उदाहरणों से समझा जा सकता है:

  • अनुच्छेद 6 के तहत, वक़्फ़ संपत्तियों की प्रकाशित सूची पर कोई भी आपत्ति एक वर्ष के भीतर दर्ज करनी होती है। यह केवल एक दिखावा है, जो इसके असली उद्देश्य, अर्थात् वक़्फ़ के फैसलों को दिव्य आदेशों के रूप में दर्जा देना, को छिपाता है:

“6. 4[औक़ाफ़] से संबंधित विवाद… इस संबंध में ट्रिब्यूनल का निर्णय अंतिम होगा: बशर्ते कि 4[औक़ाफ़] की सूची के प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष की अवधि के बाद कोई भी मुकदमा ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

  • अनुच्छेद 40 (1) और 40 (2) के तहत, किसी भी संपत्ति को वक़्फ़ संपत्ति घोषित किया जा सकता है। यह काम जनता से जानकारी प्राप्त कर के किया जाता है, परंतु इसके लिए किसी सार्वजनिक सुनवाई की आवश्यकता नहीं होती। वक़्फ़ बोर्ड का निर्णय अंतिम होता है।

“40(1): संपत्ति वक़्फ़ है या नहीं का निर्णय— यदि बोर्ड को किसी संपत्ति के बारे में यह शक हो कि वह वक़्फ़ संपत्ति है, तो वह स्वयं उस संपत्ति के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकता है। अगर यह प्रश्न उठता है कि कोई विशेष संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति है या नहीं, या कोई वक़्फ़ सुन्नी वक़्फ़ है या शिया वक़्फ़, तो बोर्ड अपनी मर्जी के अनुसार जांच करने के बाद इस प्रश्न का निर्णय कर सकता है।”

“40(2): उपधारा (1) के तहत किसी प्रश्न पर बोर्ड का निर्णय अंतिम होगा, जब तक कि उसे ट्रिब्यूनल द्वारा रद्द या संशोधित न किया जाए। (3): यदि बोर्ड को यह विश्वास हो कि भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 (1882 का अधिनियम 2) या सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का अधिनियम 21) या किसी अन्य अधिनियम के तहत पंजीकृत किसी ट्रस्ट या सोसाइटी की संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति है, तो बोर्ड, उस अधिनियम में निहित किसी भी बात के बावजूद, ऐसी संपत्ति के संबंध में जांच कर सकता है। यदि इस जांच के बाद बोर्ड संतुष्ट हो जाता है कि यह संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति है, तो वह ट्रस्ट या सोसाइटी से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह इस संपत्ति को इस अधिनियम के तहत वक़्फ़ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कराए, या यह बताए कि यह संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति क्यों नहीं होनी चाहिए।”

  • अनुच्छेद 40(3) के अनुसार, स्वामित्व साबित करने का भार मूल भूमि स्वामी पर डाला गया है।

“40(3): यदि बोर्ड को यह विश्वास हो कि भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 या सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 या किसी अन्य अधिनियम के तहत पंजीकृत किसी ट्रस्ट या सोसाइटी की संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति है, तो बोर्ड उस अधिनियम में निहित किसी भी बात के बावजूद, ऐसी संपत्ति के संबंध में जांच कर सकता है। अगर इस जांच के बाद बोर्ड संतुष्ट हो जाता है कि यह संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति है, तो वह ट्रस्ट या सोसाइटी से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह इस संपत्ति को इस अधिनियम के तहत वक़्फ़ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कराए, या यह बताए कि यह संपत्ति वक़्फ़ संपत्ति क्यों नहीं होनी चाहिए।”

  • अनुच्छेद 85 वक़्फ़ अधिनियम ट्रिब्यूनल को अधिकार प्रदान करता है, और इसके फैसले अंतिम होते हैं। कोई भी अदालत, यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय भी, वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट नहीं सकती।

“85: दीवानी अदालतों का अधिकार क्षेत्र समाप्त— इस अधिनियम के तहत किसी भी वक़्फ़, वक़्फ़ संपत्ति या अन्य मुद्दे से संबंधित किसी भी विवाद, प्रश्न या मामले को निर्धारित करने के लिए ट्रिब्यूनल के अधिकार में हस्तक्षेप करने के लिए कोई मुकदमा या अन्य कानूनी कार्यवाही किसी भी दीवानी अदालत, राजस्व अदालत या किसी अन्य प्राधिकरण के समक्ष स्वीकार नहीं की जाएगी।”

इतना ही नहीं, इस अधिनियम में 2013 में एक और संशोधन किया गया[3], जिससे इसे किसी की भी संपत्ति को जब्त करने का असीम अधिकार मिल गया। इस संशोधन ने वक़्फ़ भूमि का अधिग्रहण करने के लिए सख्त शर्तें तय कीं, जिससे इसे चुनौती देना और आर्थिक रूप से अव्यवहारिक बनाना बहुत मुश्किल हो गया। इस संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि यह राष्ट्रीय विकास के लिए किसी भी दावे के खिलाफ वक़्फ़ संपत्तियों को कड़ी सुरक्षा प्रदान करता है। चूंकि वक़्फ़ भूमि का एक बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्रों में स्थित है, यह भारत में शहरी विकास के लिए एक बड़ी बाधा बन गया है।

वक़्फ़ के भूमि हथियाने के हथकंडे 

वक़्फ़ के भूमि हथियाने की योजना कैसे काम करती है, इसे समझने के लिए निम्नलिखित उदाहरण देखें[4]:

मान लीजिए कि श्रीमान X के पास एक ज़मीन का टुकड़ा है, जो श्रीमान Y की संपत्ति से सटी हुई है, और दोनों के बीच की सीमाएं विवादित हैं। श्रीमान Y का कहना है कि X की ज़मीन पर काभी एक कब्रिस्तान था, इसलिए वह वक़्फ़ की संपत्ति है, और बिना किसी औपचारिक दस्तावेज़ के स्वयं को या किसी अपने जानकार व्यक्ति को मुतवल्ली (ट्रस्टी) नियुक्त कर लेता है। इसके बाद वह इसे वक़्फ़ बोर्ड में पंजीकृत कराता है। बोर्ड उस ज़मीन की जांच करने का काम करता है, और यह निर्धारित करता है कि वह संपत्ति वक्फ की है या नहीं। श्रीमान X को अधिकार है की वो वक्फ बोर्ड में पंजीकरण को चुनौती दे। परंतु उसे न्याय मिलने की आशा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वक़्फ़ बोर्ड कोई धर्म निरपेक्षित संस्था नहीं है, और उसे अपने अधिकारों की रक्षा करना भली भांति आता है। राज्य के अधिकारी भी बोर्ड के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। इस लिए X के पास अपनी संपाती बचाने के लिए सीमित विकल्प ही बचते हैं। अगर जमीन को वक़्फ़ के रूप में आधिकारिक रूप से नामित कर दिया जाता है, तो X को Y और वक़्फ़ की विशाल नौकरशाही के खिलाफ लड़ना पड़ता है, जिसे वक़्फ़ फंड और बड़ी संख्या में कर्मचारियों का समर्थन प्राप्त होता है। 2013 के संशोधन ने इस चुनौती में आपराधिक मुकदमे का खतरा भी जोड़ दिया है।

यह उदाहरण कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। 2009 में वक़्फ़ के पास लगभग 400,000 पंजीकृत संपत्तियां और लगभग 600,000 एकड़ भूमि थी[5]। आज वक़्फ़ बोर्ड 8,54,509 संपत्तियों और 80,00,000 एकड़ से अधिक भूमि को नियंत्रित करता है[6], जो 2009 से दोगुनी हो गई है और अब सेना और रेलवे से भी अधिक है। 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले, भारत की तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी यूपीए ने दिल्ली में 123 प्रमुख संपत्तियों को वक़्फ़ बोर्ड को सौंपने का अत्यंत अनुचित कार्य किया। इस मूर्खता को 2023 में सही किया गया[7]

OpIndia ने पिछले कुछ वर्षों में 21 उदाहरणों का हवाला दिया है[8], जहां भारत में वक़्फ़ बोर्ड ने विभिन्न संपत्तियों पर अतिक्रमण किया, अवैध रूप से निपटारा किया और उल्लंघन किया। हाल ही में तमिलनाडु वक़्फ़ बोर्ड ने 1500 साल पुराने हिंदू मंदिर सहित संपत्तियों की घोषणा की, जो इस चिंताजनक प्रवृत्ति को और भी उजागर करता है।

वक़्फ़ बोर्ड अधिनियम पर संवैधानिक आपत्तियां

निजी संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड की नीतियों का खतरा तो स्पष्ट है ही, लेकिन इसके साथ ही यह अधिनियम कई संवैधानिक अधिकारों और प्रावधानों का भी उल्लंघन करता है:

  1. वक्फ अधिनियम 1995 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का हनन करता है, क्योंकि यह एक वर्ग की संपत्ति और धार्मिक सुविधाओं के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था बनाता है और अन्य सभी को इससे वंचित रखता है।
  2. दिलचस्प बात ये है कि जहां 1991 का पूजा स्थल अधिनियम मौजूदा धार्मिक स्थलों के स्वरूप की रक्षा करता है, वहीं 1995 का वक्फ अधिनियम वक्फ बोर्ड को किसी भी संपत्ति पर दावा करने की शक्ति प्रदान करता है। इसका अर्थ ये हुआ की ये दोनों कानून आपस में एक दूसरे के विपरीत हैं।
  3. वर्तमान वक़्फ़ कानून सार्वजनिक शांति और सामुदायिक सद्भाव को खतरे में डालता है, व्यक्तिगत संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन करता है और कट्टरपंथी राजनीति का समर्थन कर सकता है।
सारांश

वक़्फ़ अधिनियम एक अजीब कानून है जो मुस्लिमों को ऐसे अधिकार प्रदान करता है, जो “महत्वपूर्ण सार्वजनिक उपयोग” (Eminent Domain) जैसे होते हैं, लेकिन मुआवजे के बिना। यह स्वतंत्रता से पूर्व मुस्लिम शासकों द्वारा किए गए शक्ति के दुरुपयोग की गाथा है, जिस का स्वतंत्र भारत में कोई न्यायिक उपाय नहीं है। भारत जैसी विविध और बहु-धार्मिक संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसे कानूनों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, जो नागरिकों की पैतृक संपत्ति के अधिकारों को बिना अपील के मनमाने ढंग से छीन लेते हैं। भारतीय संसद को सभी वक़्फ़ अधिनियमों को तुरंत निरस्त कर देना चाहिए।

संदर्भ

[1] WAKF ACT, 1954 | Lawsisto Cental Acts; https://lawsisto.com/Read-Central-Act/488/WAKF-ACT-1954

[2] The Waqf Act of 1995, IndiaCode; https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/1984/1/199543.pdf

[3][3] The Wakf (Amendment) Act, 2013; minorityaffairs.gov.in; https://minorityaffairs.gov.in/WriteReadData/RTF1984/1658315616.pdf

[4] Suvrojyoti Gupta, Waqf in India: A Dangerous Anarchonism in a Secular State, India Foundation; https://indiafoundation.in/articles-and-commentaries/waqf-in-india-a-dangerous-anarchonism-in-a-secular-state/#_edn17

[5] Vivek Kumar, How the Waqf Board has the third largest ownership of land after the Indian Railways and the Defense Dept; https://lawstreet.co/speak-legal/waqf-board-third-largest-ownership-indian-railways-and-defense/#:~:text=Waqf%20Board%20has%20a%20tremendous%20amount%20of%20property.,report%20headed%20by%20K%20Rehman%20Khan%20in%202009.

[6] Rajiv Gupta, Waqf Act,1995: A Tool given to Waqf Boards to snatch the property of Hindus?; The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/myview/waqf-act1995-a-tool-given-to-waqf-boards-to-snatch-the-property-of-hindus/

[7] One India, Government takes back 123 properties gifted to Waqf Board before 2014 elections;  https://www.oneindia.com/india/government-takes-back-123-properties-gifted-to-waqf-board-before-2014-elections-3525257.html

[8] OPIndia, How Waqf Boards have been insidiously encroaching upon and occupying various properties and claiming their right over them; https://www.opindia.com/2022/10/21-instances-when-waqf-boards-india-illegally-encroaching-various-properties/#google_vignette

Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai G. Bansal
Dr. Jai Bansal is a retired scientist, currently serving as the VP Education for the Vishwa Hindu Parishad America (VHPA)
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