कौन दिलाएगा न्याय: पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न
- पाकिस्तान में हिंदू आबादी एक बहुत ही छोटा अल्पसंख्यक समुदाय है। ये लोग अधिकतर ग्रामीण सिंध क्षेत्र में बसे हुए हैं, जो ज़्यादातर भूमिहीन हैं और उन्हें कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। इन्हें सामाजिक और आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही, उन्हें राज्य द्वारा प्रायोजित भेदभाव और धार्मिक कट्टरपंथ के भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।
- इन्हें जबरन धर्म परिवर्तन, संपत्ति छीनने, झूठे ईशनिंदा के आरोप और महिलाओं के अपहरण जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- भारत का नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (CAA) पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों में सताए जा रहे हिंदू अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान करता है। हालांकि, इस अधिनियम को भारत विरोधी शक्तियों द्वारा भेदभावपूर्ण बताते हुए बदनाम किया गया है।
पाकिस्तान में हिंदुओं का उत्पीड़न और उनके खिलाफ हिंसा एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी ध्यान आकर्षित किया है। वहाँ हिंदुओं को जबरन धर्मांतरण, राशन से वंचित करना, संपत्तियों पर कब्जा करना, मंदिरों पर हमले करना, ईशनिंदा के झूठे आरोप और युवा हिंदू महिलाओं के अपहरण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वे अपने मंदिरों में जाकर पूजा करने तक की आज़ादी से वंचित हैं। पाकिस्तान के कानून भी उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं, जिससे उनके अधिकारों का हनन होता है। इसके अलावा, मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों में हिंदुओं को दुश्मन के रूप में दिखाया जाता है, जिससे उनके प्रति नफरत और बढ़ जाती है। यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान में हिंदुओं का जीवन अत्यंत कठिन हो गया है।
हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा का इतिहास
पाकिस्तान में हिंदू आबादी बहुत कम है, जो कुल जनसंख्या का केवल 1.2% है[1], यानी लगभग बीस लाख लोग। यह एक छोटा अल्पसंख्यक समुदाय है, जिसमें अधिकांश हिंदू सिंध के ग्रामीण इलाकों में बसे हुए हैं। इन इलाकों में ज्यादातर लोग भारतीय सीमा के पास स्थित संघर और थारपारकर जिलों में रहते हैं। इसके अलावा, बलूचिस्तान और पंजाब में भी हिंदुओं की छोटी-छोटी बस्तियाँ हैं। पाकिस्तान में हिंदू, विशेष रूप से सिंध और बलूचिस्तान के क्षेत्रों में, अक्सर अनुसूचित जाति के रूप में जाने जाते हैं और इन्हें भूमिहीन बंधुआ मजदूरों की तरह रखा जाता है। कस्बों और शहरों में इन्हें सफाईकर्मी या जमादार के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।
1947 में विभाजन से पहले सिंध में हिंदुओं की अच्छी-खासी आबादी थी, लेकिन विभाजन के दौरान कई हिंदू परिवार भारत आ गए। विभाजन के समय धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और नरसंहार अभियान चलाए गए, जिनमें पाकिस्तान के हिंदू समुदाय को भारी नुकसान झेलना पड़ा। भले ही पाकिस्तान के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है, परंतु हिंदुओं को अक्सर संदेह और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। सरकारी नीतियों और विफलताओं के कारण उन्हें बलि का बकरा बनाया गया और शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक विकास के अवसरों से वंचित रखा गया है।
धार्मिक उत्पीड़न और भेदभावपूर्ण कानून
पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और हिंसा की घटनाएँ बहुत आम हैं। जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौरान किए गए संवैधानिक संशोधनों ने हिंदुओं को एक आसान निशाना बना दिया। दक्षिण एशिया में इस्लामिक कट्टरपंथ बढ़ने से हिंदुओं पर हमले और हिंसा की घटनाएँ और भी अधिक हो गई हैं। भारत में 1992 की बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी घटनाओं ने पाकिस्तान में हिंदू विरोधी भावनाओं को और भड़काया, जिसके परिणामस्वरूप हिंदू मंदिरों पर हमले हुए[2], हिंदुओं के घरों और दुकानों में लूटपाट की गई, और हिंसक हमले किए गए। इन सभी नुकसान के बावजूद पाकिस्तान सरकार ने पीड़ित हिंदुओं को कोई मुआवजा या सहायता नहीं दी है।
पाकिस्तान में हिंदू महिलाएँ कट्टरपंथियों की हिंसा का सबसे अधिक शिकार होती हैं। उनका अपहरण किया जाता है, उन्हें यातनाएँ दी जाती हैं, और जबरन इस्लाम में धर्मांतरण करवा कर उनकी शादी बूढ़े मुस्लिम पुरुषों से कराई जाती है[3]। फ़र्स्टपोस्ट[4] के एक लेख के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदू समुदाय के खिलाफ़ धार्मिक उत्पीड़न के 26 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें अपहरण, बलात्कार, और जबरन धर्मांतरण शामिल थे। इसके अलावा, हिंदू मंदिरों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। 1990 के बाद से कुछ मंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया है। अक्सर, पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर हमले भारत में कथित “मुस्लिम उत्पीड़न” के विरोध के रूप में किए जाते हैं।
पाकिस्तानी हिंदुओं के खिलाफ़ यह खुला भेदभाव इस्लामिक पाकिस्तानी संविधान के कारण है और इस सबमें पाकिस्तानी सरकार का पूरा समर्थन भी है। संविधान में स्पष्ट रूप से गैर-मुस्लिम पहचान बताई गयी है, जो गैर-मुस्लिमों और अहमदिया को पाकिस्तानी सरकार में शीर्ष पदों के लिए अयोग्य बनाता है[5]। यहां तक कि एक मुस्लिम लीग के राजनेता ने भी कहा है कि हिंदुओं और सिखों का अपहरण पाकिस्तान में एक व्यवसाय बन गया है। साथ ही, हिंदुओं का इस्लाम में धर्मांतरण भी एक और लाभकारी व्यापार बन चुका है। लाहौर के पत्रकार और द डिप्लोमैट के लिए लिखने वाले कुंवर खुल्दुने शाहिद, पाकिस्तान के जटिल सामाजिक-धार्मिक हालात[6] को बखूबी बताते हैं और अल्पसंख्यकों के सामने आने वाले मुद्दों और देश के लिए इसके अर्थ पर प्रकाश डालते हैं।
अपने लेख, “Deep Ideological Roots of Anti-Hindu Sentiment in Pakistan”[7] में, शाहिद बताते हैं कि कैसे हिंदुओं सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक पाकिस्तान में इस्लामी उत्पीड़न का शिकार होते हैं। पंजाब प्रांत के भोंग गांव में एक हिंदू मंदिर में भीड़ द्वारा तोड़फोड़ की घटना पाकिस्तान में संस्थागत हिंदू विरोधी कट्टरता को उजागर करती है। शाहिद इस बात पर जोर देते हैं कि पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून, जिसे धार्मिक भावनाओं की रक्षा के उद्देश्य से बनाया गया था, आज इस्लामी भीड़ वाली हिंसा को बढ़ावा देने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। आज बहुसंख्यक सुन्नी संप्रदाय पाकिस्तान के धार्मिक दृष्टिकोण पर हावी है और हिंदुओं और ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव काफी स्पष्ट है।
यह पाकिस्तान की बेशर्मी ही कही जाएगी कि वहां के कुछ नेताओं ने हिंदू विरोधी भावनाओं पर बयान दिए हैं[8] या ‘ईशनिंदा करने वालों’ के लिए दंड का समर्थन किया है। पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर दानिश कनेरिया का हाई-प्रोफाइल मामला काफी चर्चित रहा है। कनेरिया हिंदू हैं और उन्होंने अपने पूर्व साथी शाहिद अफरीदी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अफरीदी ने उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की थी[9]। कनेरिया ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें अफरीदी और अन्य साथियों से धार्मिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, जिनमें से कुछ ने उनके साथ भोजन करने से भी इनकार कर दिया। इन खुलासों ने क्रिकेट जगत में नई बहस छेड़ दी, जिससे धार्मिक अल्पसंख्यकों की चुनौतियाँ उजागर हुईं।
नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (सीएए)
भारत की संसद ने 11 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (सीएए) पारित किया[10]। इस अधिनियम का लक्ष्य 2014 तक भारत आए अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता दी जाए। इसके लिए वह लोग पात्र थे, जिन्हें अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था और शरणार्थियों के रूप में 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आ चुके थे। इसमें हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शामिल हैं। यह नियम सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करते हैं और आर्थिक अवसर, मुक्त आवागमन और संपत्ति के अधिकार सुनिश्चित करते हैं। आवेदकों को अपने मूल देश की नागरिकता के त्याग की घोषणा करनी होगी।
अधिनियम का उद्देश्य संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप सताए गए अल्पसंख्यकों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है। हालांकि, भारत विरोधी ताकतों ने सीएए पर उसी तरह प्रतिक्रिया व्यक्त की जिस तरह उन्होंने अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। ऐसी ताकतों ने इस क़ानून से मुसलमानों को बाहर रखने के कारण धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया।[11],[12]
जैसे कश्मीर के बारे में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को प्रदर्शनकारियों, अलगाववादियों और भारत को तोड़ने वाली ताकतों ने कभी नहीं पढ़ा, उसी तरह सीएए अधिनियम को भी नहीं पढ़ा और केवल एजेंडा चलाने की कोशिश की। खैर, इस एजेंडा का समापन 2022 में शाहीन बाग में महीनों तक चलने वाले आंदोलन के रूप में हो ही गया[13], जिसने विरोध प्रदर्शनों के कारण भारतीय मुसलमानों[14] को और अलग-थलग कर दिया।
भारतीय मुसलमानों को भारत विरोधी ताकतों द्वारा गुमराह किया जा रहा था, जिन्हें “अराजकता के एजेंट” जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित किया गया था। इन पर अपने ओपन सोसाइटी फाउंडेशन[15] (ओएसएफ) के साथ, विभिन्न अलगाववादी आंदोलनों और अराजकतावादी समूहों का समर्थन करके सरकारों को अस्थिर करने का आरोप है।[16] भारत में ओएसएफ वित्तपोषित संगठनों पर राष्ट्र-विरोधी प्रोपेगेंडा चलाने का आरोप लगाया गया है[17], जो सोरोस और उनके फाउंडेशन पर लगे आरोपों की पुष्टि करता है।
इस क़ानून से मुस्लिम शरणार्थियों को बाहर रखने के लिए चौतरफा आलोचना की जा रही थी, तब मीडिया में किसी के मन में यह सवाल कभी नहीं आया कि मुस्लिम-बहुल देशों से मुस्लिम शरणार्थी क्यों आ रहे हैं और वे हिंदू-बहुल भारत में शरण क्यों मांगेंगे। फिर, इन मुस्लिम-बहुल देशों से बड़े पैमाने पर पलायन के कारणों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के बारे में शायद ही कोई सवाल उठाया गया हो।
इस तरह के प्रोपेगेंडा को चलने देने के लिए भारत सरकार भी आंशिक रूप से दोषी है। सरकार ने इस मुद्दे पर सही समय पर नियंत्रण नहीं किया, जिससे यह पूरी तरह से बिगड़ गया। मुसलमानों को बाहर रखने का कारण है कि इन तीन देशों ने इस्लाम को अपना स्टेट रिलिजन (राज्य धर्म) घोषित किया है। जाहिर है, यहां मुसलमानों को धार्मिक उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ता है। साथ ही, सीएए किसी भी भारतीय मुसलमान की नागरिकता को नहीं छीनता है।
लगभग 5 वर्षों के बाद, भारत सरकार ने 11 मार्च, 2024 को नागरिकता (संशोधन) नियम 2024 का कार्यान्वयन[18] शुरू किया, जिससे भारतीय नागरिकता के लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा मिली। भारत को तोड़ने वाली ताकतें एक बार फिर इस पर प्रोपेगेंडा फैलाने में लग गए कि इसमें मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है।[19] मीडिया में किसी ने यह पूछने की हिम्मत नहीं दिखाई कि मुस्लिम-बहुल राष्ट्र में मुस्लिम शरणार्थी क्यों होंगे और कोई भी मुस्लिम शरणार्थी हिंदू-बहुल भारत में शरण क्यों लेगा, एक ऐसा देश जिससे वे नफरत करते हैं।
रोशनी की किरण
स्वराज्य पत्रिका की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने भारत में पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों की दुर्दशा को कवर किया है। उनकी ग्राउंड रिपोर्ट ऐसे शरणार्थियों की चुनौतियों, उम्मीदों और संघर्षों पर प्रकाश डालती है। अपनी रिपोर्टों में उन्होंने दिल्ली में रह रहे पाकिस्तानी हिंदुओं[20] की भावनाओं को बहाली भांति बयान किया है। जब भारतीय संसद ने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को मंजूरी दी, तो इन शरणार्थियों ने कानून पर खुशी जताई। नई दिल्ली के आदर्श नगर में, मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास, स्वाति गोयल शर्मा ने पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों की स्थितियों पर प्रकाश डाला है। ये शरणार्थी हिंदू कार्यकर्ताओं की मदद से 2013 से झुग्गियों में रह रहे हैं।
इसके अलावा, स्वाति गैर-लाभकारी सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन[21] की संस्थापक हैं। फाउंडेशन का उद्देश्य स्थानीय और केंद्रीकृत सहायता के लिए एक तंत्र बनाना है, जो जरूरतमंद लोगों के लिए सेवा और न्याय सुनिश्चित करता है। उनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी निकायों, गैर सरकारी संगठनों और अच्छे इन्सानों के सहारे मौजूदा सेवा और न्याय तंत्र तक पहुंचने में कोई भी अक्षम न रहे।
निष्कर्ष
पाकिस्तान के पीड़ित हिन्दुओं की दुर्दशा दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामने आने वाली चुनौतियों में सबसे बड़ी समस्या है। धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली संवैधानिक गारंटी के बावजूद, पाकिस्तान में हिंदू भेदभाव, हिंसा और सरकारी भेदाभाव के बीच जीने को मजबूर है। भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम का कार्यान्वयन आशा की किरण है, जो पड़ोसी देशों से सताए गए अल्पसंख्यकों के लिए भारतीय नागरिकता के लिए एक रास्ता खोलता है। सभी के लिए न्याय और सम्मान सुनिश्चित करने का संघर्ष अभी भी जारी है। स्वाति गोयल शर्मा जैसे पत्रकार पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों के संघर्षों को सामने ला रही हैं। उनका सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन इन हिन्दू शरणार्थियों के कल्याण के लिए काम कर रहा है। इन जटिल सामाजिक-धार्मिक हालातों में समानता, न्याय और करुणा जैसे सिद्धांतों को बनाए और बचाए रखना जरूरी है। यह सुनिश्चित भी करना होगा कि कोई भी अपनी धार्मिक या जातीय पहचान के कारण पीड़ित न हो।
Citations
[1] Hindus in Pakistan – Minority Rights Group; https://minorityrights.org/communities/hindus-2/
[2] Hindu shrine desecration: Can Pakistan protect its religious minorities; https://www.bbc.com/news/world-asia-55545524
[3] Hindu women, minors remain unsafe amid rising abduction cases in Pakistan – The Hindu; https://www.thehindu.com/news/international/hindu-women-minors-remain-unsafe-amid-rising-abduction-cases-in-pakistan/article66063811.ece
[4] Pakistan: In 26 hate crimes in September, 40 Hindus abducted, raped, converted to Islam – Firstpost; https://www.firstpost.com/world/pakistan-in-26-hate-crimes-in-september-40-hindus-abducted-raped-converted-to-islam-13390132.html
[5] State Legislated Persecution: Ahmadiyya in Pakistan — Human Rights Pulse; https://www.humanrightspulse.com/mastercontentblog/state-legislated-persecution-ahmadiyya-in-pakistan
[6] Pakistan Continues to Exhibit Gory ‘Islamophobia’ Against Ahmadis – The Diplomat; https://thediplomat.com/2022/02/pakistan-continues-to-exhibit-gory-islamophobia-against-ahmadis/
[7] Pakistan’s Hindu Temple Ransacking Has Deep Ideological Roots – The Diplomat; https://thediplomat.com/2021/08/pakistans-hindu-temple-ransacking-has-deep-ideological-roots/
[8] Bigotry against Hindus rising in Pakistan – Asia Times; https://asiatimes.com/2020/02/bigotry-against-hindus-rising-in-pakistan/
[9] Danish Kaneria: ‘Shahid Afridi told me to convert…’: Danish Kaneria accuses former Pakistan skipper | Cricket News – Times of India (indiatimes.com); https://timesofindia.indiatimes.com/sports/cricket/news/shahid-afridi-told-me-to-convert-danish-kaneria-accuses-former-pakistan-skipper/articleshow/104746841.cms
[10] Parliament passes the Citizenship (Amendment) Bill 2019 (pib.gov.in); https://pib.gov.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=195783
[11] When Academics Spread Lies – Part 1 – Hindu Dvesha; https://stophindudvesha.org/when-academics-spread-lies1/
[12] When Academics Spread Lies – Part 2 – Hindu Dvesha; https://stophindudvesha.org/when-academics-spread-lies2/
[13] Shaheen Bagh protest; https://en.wikipedia.org/wiki/Shaheen_Bagh_protest
[14] https://x.com/TheEmissaryCo/status/1767250357049008450?s=20
[15] Open Society Foundations; https://www.opensocietyfoundations.org/
[16] Assessing the International Influence of Private Philanthropy: The Case of Open Society Foundations | Global Studies Quarterly | Oxford Academic (oup.com); https://academic.oup.com/isagsq/article/1/4/ksab039/6460388?login=false
[17] How Soros And His Minions Are Trying To Attack India’s Sovereignty – The Commune (thecommunemag.com); https://thecommunemag.com/how-soros-and-his-minions-are-trying-to-attack-indias-sovereignty/
[18] CAA implementation: Application for Indian citizenship to be made online | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/caa-implementation-application-for-indian-citizenship-to-be-made-online-101710217211155.html
[19] CAA: India to enforce migrant law that excludes Muslims (bbc.com); https://www.bbc.com/news/world-asia-68538260
[20] ‘We Are Happy…’—Persecuted Pakistani Hindus On CAB (swarajyamag.com); https://swarajyamag.com/newsletters/we-are-happypersecuted-pakistani-hindus-on-cab
[21] Home – Sewa Nyaya Utthan Foundation; https://sewanyaya.in/
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