पाकिस्तानी ईसाई: भारत को बांटने की सजा भुगत रहे हैं
- नागरिकता (संशोधन) अधिनियम पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में उत्पीड़न झेल रहे ईसाइयों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देता है।
- अविभाजित पंजाब के ईसाइयों ने पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया। उनका मानना था कि मुस्लिम समाज हिन्दू से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष है और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करता है।
- पाकिस्तान बनने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, पाकिस्तानी ईसाइयों को भारत विभाजन के बाद उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उनके गांवों में उनके साथ भेदभाव, हिंसा किया जाता है।
भारत में 12 मार्च, 2024 को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम लागू किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान जैसे तीन मुस्लिम बहुल देशों में उत्पीड़न का सामना कर रहे हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। 2019 में जब इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया गया, तो यह देखकर सभी को आश्चर्य हुआ कि इसमें ईसाई लाभार्थियों को भी शामिल किया गया था। आश्चर्य इस बात का था कि भारत के बंटवारे और पाकिस्तान के निर्माण के समय ईसाई समुदाय मुसलमानों से अधिक उत्साहित था। आज वही भारत उदारतापूर्वक उन्हें शरणार्थी का दर्जा और भारत में एक नया जीवन शुरू करने का अवसर प्रदान कर रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि भारतीय ईसाइयों ने उस समय हिंदुओं के खिलाफ़ काम किया था। आज भी पाकिस्तानी ईसाइयों का भारत के प्रति रवैया कोई विशेष सकारात्मक नहीं है।
‘The Role of Christians in the Freedom Movement of Pakistan’ शीर्षक वाले एक लेख में, मुनीर-उल-अंजुम और शहनाज़ तारिक लिखते हैं कि ईसाइयों ने पाकिस्तान के निर्माण में मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग का समर्थन किया।[1] ईसाइयों ने पाकिस्तान के विचार का समर्थन किया, जबकि मुस्लिम समुदाय के भीतर ही विभाजन का खासा विरोध था। उदाहरण के लिए, मुस्लिम हनफ़ी विद्वान, धार्मिक और राजनीतिक नेता सैय्यद अता उल्लाह शाह बुखारी ने कहा था, “जो लोग मुस्लिम लीग को वोट देते हैं वे सूअर खाने वाले हैं।” एक अन्य नेता, लुधियाना के मौलवी हबीबुर रहमान, जो अहरार संगठन के अध्यक्ष थे, ने घोषणा की, “दस हज़ार जिन्ना, जवाहरलाल नेहरू के जूते की नोक पर बलिदान हो सकते हैं।”[2] लेकिन ईसाइयों ने इन बातों की परवाह नहीं की और जिन्ना का समर्थन किया। पाकिस्तान आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रमुख ईसाई नेताओं में दीवान बहादुर एसपी सिंघा (संयुक्त पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष और बाद में पश्चिमी पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष), चौधरी चंदू लाल (वकील), फ़ज़ल इलाही (पंजाब विधानसभा के उपाध्यक्ष), एफई चौधरी (फ़ोटोग्राफ़र और पत्रकार), और बीएल रलिया राम (भारतीय ईसाइयों के अखिल भारतीय सम्मेलन के संस्थापक सचिव) शामिल थे।
ईसाइयों के कारण पाकिस्तान को मिला पंजाब
1946 के आम चुनाव के बाद भारत विभाजन के लिए ब्रिटेन ने कैबिनेट मिशन योजना बनाई। मुसलमानों ने पाकिस्तान के समर्थन में मुस्लिम लीग को वोट दिया। चुनावों के दौरान, ईसाइयों को “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाते हुए देखा और सुना गया। इसके बदले में, ईसाइयों से मुस्लिम लीग ने वादा किया कि उन्हें पाकिस्तान में अन्य अल्पसंख्यकों की तुलना में अधिक विशेषाधिकार दिए जाएंगे।[3]
1947 में भारत में प्रांतीय विधानसभाओं को विभाजन के मुद्दे पर फैसला करना था। 23 जून, 1947 को पंजाब विधानसभा की एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें इस बात पर विचार किया गया था कि उस समय की अविभाजित प्रांत पाकिस्तान का या भारत का हिस्सा होना चाहिए। विधानसभा के तीन ईसाई सदस्य आरए गोम्स, फजल इलाही और एफई चौधरी ने स्पीकर एसपी सिंघा के घर पर एक रात पहले मुलाकात की थी और पूरे पंजाब को पाकिस्तान को देने के लिए वोट करने का फैसला किया। बैठक की सुबह, अकाली दल नेता मास्टर तारा सिंह, विधानसभा के सामने सीढ़ियों पर कृपाण लेकर खड़े थे। उन्होंने धमकी देते हुए कहा था कि पाकिस्तान के साथ विलय के पक्ष में जो भी वोट करेगा, उसके खिलाफ इस कृपाण का उपयोग किया जाएगा। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए, सिंघा ने उन्हें चुनौती दी और नारा लगाया “सीने पे गोली खाएंगे, पाकिस्तान बनाएंगे।” हाथापाई तो हुई, लेकिन अन्य सदस्यों ने हिंसा होने से रोक दिया।[4]
मतदान शुरू हुआ। जिन्ना के लिए भी यह तनावपूर्ण स्थिति थी। क्योंकि भारत और पाकिस्तान के समर्थकों के पास बराबर-बराबर 88 वोट थे। ऐसे में, विधानसभा अध्यक्ष के रूप में निर्णायक मत रखने वाले सिंघा ने बड़ा खेल कर दिया और पाकिस्तान के पक्ष में अपना वोट डाला। विधानसभा के अन्य तीन ईसाई सदस्यों ने भी उनका समर्थन किया। पाकिस्तान तीन वोटों से जीत गया। परिणामस्वरूप, तीन ईसाई वोट के कारण पंजाब भारत से अलग हो गया।
मुनीर-उल-अंजुम और शहनाज़ तारिक के अनुसार, पाकिस्तान के लिए ईसाइयों का समर्थन इस विश्वास पर आधारित था कि मुस्लिम समाज, जाति-ग्रस्त हिंदू समाज की तुलना में अधिक धर्मनिरपेक्ष है और इसलिए धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। ईसाइयों ने तब कायदे-आज़म और मुस्लिम लीग का जोरदार समर्थन किया, जबकि एक नए मुस्लिम देश के गठन का बहुत विरोध हो रहा था। अखिल भारतीय ईसाई संघ ने पाकिस्तान के संस्थापक को बिना शर्त पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। पाकिस्तान के संस्थापक और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने ईसाइयों के इस समर्थन को मान्यता भी दी। ईसाइयों ने पाकिस्तान के निर्माण में बहुत मजबूत भूमिका निभाई थी। सीमा आयोग के समक्ष ईसाई मत ही पाकिस्तान के लिए एकमात्र निर्णायक मत था। ईसाई नेताओं ने पाकिस्तान के लिए मतदान किया। उनका मानना था कि कायदे-आज़म उनके अधिकारों और हितों के रक्षक साबित होंगे।”[5] जिन्ना ने पाकिस्तान की वकालत करने वाले एकमात्र अंग्रेजी दैनिक डॉन, दिल्ली के पहले संपादक के रूप में केरल के ईसाई पोथन जोसेफ को नियुक्त किया था।[6]
मुसलमानों से ज़्यादा वफ़ादार
1930 के दशक की शुरुआत में कैम्ब्रिज से स्नातक चौधरी रहमत अली पाकिस्तान का विचार ले कर आए थे। तब, एक भारतीय ईसाई नेता जोशुआ फ़ज़ल-उल-दीन ने इस विचार का समर्थन किया था। उसने दैनिक ‘इंक़लाब’ में लिखा कि पाकिस्तान का मध्य एशिया से संबंध है और यह एक अलग देश है। इसका शेष भारत से कोई संबंध नहीं है और वह इस क्षेत्र को भारत से अलग करने के बारे में चौधरी रहमत अली से सहमत है, यह गॉड (ऊपरवाले) की आवाज़ है।”[7]
खैर, जोशुआ फ़ज़ल-उल-दीन मूर्ख थे या उनकी दिली इच्छा थी कि भारत बंट जाए, ताकि एक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में हिंदुओं द्वारा भारत पर शासन न हो सके। असल में उनका मानना था कि अगर भारत सैकड़ों छोटे खण्डों में विभाजित हो जाता है, तो ईसाइयों के लिए जीतना आसान होगा। मजबूत और एकजुट भारत ईसाइयों के लिए और मुसलमानों के लिए खतरा है। उनके इस विचार को कांचा इल्लैया और कई कट्टरपंथी भारतीय ईसाईयों ने भी सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है।
1928 में, भारत में भविष्य की सर्वस्वीकार्य संवैधानिक व्यवस्था पर विचार-विमर्श करने के लिए कोलकाता में एक सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में सभी समुदायों की सहमति वाला एक संवैधानिक फार्मूला निकालने के लिए कांग्रेस नेता मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गयी। समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसे नेहरू रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है। लेकिन जिन्ना ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हिंदू अपने भारी बहुमत के आधार पर अन्य सभी समुदायों पर हावी हो सकते हैं। अन्य अल्पसंख्यकों के साथ-साथ अखिल भारतीय ईसाई सम्मेलन ने भी हिंदू नेतृत्व में अपना विश्वास न दिखाने की बात करते हुए रिपोर्ट को खारिज कर दिया। उस समय के भारतीय ईसाइयों के रूख के बारे में मुनीर-उल-अंजुम और शहनाज़ तारिक लिखते हैं: “नेहरू रिपोर्ट पेश किए जाने से काफी पहले इकबाल यह दावा कर रहे थे कि ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलिस्तान हमारा’ और जिन्ना को सरोजिनी नायडू ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत’ बताया था, तब , “उस समय एक ईसाई नेता जोशुआ फ़ज़ल-उद-दीन ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता में विश्वास करने वाले लोग मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं, क्योंकि ऐसा कोई भी प्रयास भारत को युद्ध स्थल बना देगा।”[8]
जिन्ना की सबसे बड़ी चापलूस श्रीमती केएल रलिया राम थीं, जो अखिल भारतीय ईसाई सम्मेलन के संस्थापक सचिव बीएल रलिया राम की बहन थीं। वह भारतीय सामाजिक कांग्रेस की महासचिव भी थीं और खान अब्दुल गफ्फार खान के सचिव मोहम्मद यूनुस की सास थीं। खान को सीमांत गांधी के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने 29 मई, 1946 को जिन्ना को लिखा कि उन्हें समान संप्रभु राज्य की मांग नहीं छोड़नी चाहिए। “हिंदुओं द्वारा उत्पीड़ित और अपमानित लोगों के पास भागने और शरण लेने के लिए एक जगह होनी चाहिए। पाकिस्तान ऐसे लोगों के लिए शरणस्थली होगा।”[9]
अपने नाम में राम होने के बाद भी, वह हिंदुओं के प्रति ज़हर से भरी हुई थीं। 22 सितंबर, 1946 को उसने लाहौर से जिन्ना को पत्र लिखा:“मैं चाहती हूं कि आप सिखों को भी जीत लें। लेकिन दिक्कत है कि हिंदू, मुसलमानों के साथ लड़ने के लिए सिखों को अपने पास रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। हिंदू नैतिक और शारीरिक रूप से कायर जाति हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि सिख उनकी सेना के रूप में काम करें। क्या आप जानते हैं कि 4,000 हिंदू दो दिन पहले ही मर्री से भाग गए, जब किसी ने कहा था कि मुसलमान समस्या खड़ी करेंगे।”[10]
पाकिस्तान में गुरदासपुर!
ईसाई वोटों ने पंजाब के भाग्य का फैसला करने के बाद, पंजाब के विभाजन पर ध्यान केंद्रित किया। भारत को तोड़ने से संतोष न मिला तो ईसाइयों ने पठानकोट और गुरदासपुर को पाकिस्तान में शामिल करने की पूरी कोशिश की, जो अभी भारत का हिस्सा हैं।
सीमा आयोग के सामने ईसाई नेताओं सिंघा, गिब्बन और फजल इलाही ने अपने रिकॉर्ड बयान में मांग की कि सीमांकन के लिए ईसाई आबादी को मुस्लिम आबादी का हिस्सा माना जाए।
चौधरी चंदू लाल ईसाई समुदाय के वकील थे। उन्होंने पठानकोट और गुरदासपुर का दौरा किया। इन जिलों में ईसाई आबादी से एक प्रस्ताव पारित करवाया, जिसमें कहा गया कि वे पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं। गिब्बन ने सीमा आयोग के समक्ष यह मांग की कि लाहौर पश्चिमी पंजाब का हिस्सा हो और सभी एंग्लो-इंडियन ईसाइयों को पाकिस्तान भेज दिया जाए। जब अगस्त 1947 में रैडक्लिफ़ लाइन की घोषणा की गई, तो ईसाइयों ने इसे गलत निर्णय माना। उनका मानना था कि इसका मकसद कश्मीर पर भारतीय कब्ज़ा करने की सुविधा देते हुए पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए समस्याएं पैदा करना था।[11] सिंघा ने इस निर्णय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई और कहा कि चूंकि बहुमत के सिद्धांत को क्रूरता से कुचल दिया गया था, इसलिए यह पाकिस्तान के लिए अनुचित था। यह पाखंड था क्योंकि ईसाइयों ने हिंदू बहुसंख्यक शासन को अस्वीकार कर दिया था।
ईसाई: पाकिस्तान के लिए अछूत
भारत विभाजन ने पंजाब को तहस-नहस कर दिया। सिख और हिंदू, मुस्लिम लीग के गुंडों के इस्लामी जेहाद के शिकार बन गए, वहीं ईसाई जो हिंदुओं और सिखों के पलायन से लाभ की उम्मीद कर रहे थे, वे हाथ पर हाथ धरे रह गए। ईसाई नेता सिखों (जो अविभाजित पंजाब में 60 प्रतिशत कृषि भूमि के मालिक थे) द्वारा छोड़ी गई कृषि भूमि पाने के लिए लार टपका रहे थे। लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। और यह होना ही था, क्योंकि मुसलमान आज भी मानते हैं कि पाकिस्तान भारत के मुसलमानों के लिए बनाया गया था, इसलिए अन्य समुदायों को कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
नए बने पाकिस्तान ने ईसाई किसान परिवारों को उनके गांवों से सामूहिक रूप से निकाल दिया। लगभग 60,000 ईसाई परिवार, जो सिख जमींदारों के किरायेदार थे, अब बेघर और बेरोजगार थे। “मुस्लिम शरणार्थियों को खाली की गई ज़मीन का ज़्यादातर हिस्सा दे दिया गया। तकरीबन हर परिवार को छह से आठ एकड़ ज़मीन दी गई थी, लेकिन इन ईसाइयों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया और उनकी ज़मीन शरणार्थियों को सौंप दिया गया था।”[12]
जनवरी 1948 में, सिंघा ने ईसाइयों को पीटने और हत्या जैसी घटना की निंदा की। इन्हें इसलिए पीटा जाता था, ताकि उनसे जमादार (स्वीपर और टॉयलेट क्लीनर) का काम करने के लिए मजबूर किया जा सके। पहले यह काम निचली जाति के हिंदू करते थे, लेकिन वे अब भारत आ गए थे। “उनकी दुर्दशा का कारण अपमान और भूख है। ईसाइयों के मुद्दे का समाधान केवल दो ही है। या तो हम उन्हें ज़िंदा दफना दें या हम उन्हें शरणार्थी शिविरों में भेज दें, क्योंकि उनके पास भोजन और घर नहीं है।”[13]
इतने के बाद भी, सिंघा ने अपने चुने हुए देश के नए शासकों को दोषी ठहराने के बजाय अपनी दुर्दशा के लिए सिखों को दोषी ठहराया। 20 जनवरी, 1948 को पंजाब विधानसभा में बोलते हुए, उन्होंने सिखों के भारत जाने और “ईसाइयों के लिए दुख और पीड़ा की विरासत छोड़ने” की निंदा की।[14]
जब उनकी चुनी हुई मातृभूमि ने अपना असली इस्लामवादी चेहरा दिखाया, तब गिब्बन ने पंजाब विधानसभा में कहा: “मैं सदन के कामकाज को स्थगित करने के लिए एक प्रस्ताव रखने की अनुमति मांगता हूं, ताकि तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा की जा सके। यानी, ईसाई किरायेदारों को उनके घरों और ज़मीनों से बिना किसी आश्रय और आजीविका के बेदखल करने के संबंध में सरकार की नीति पर चर्चा की जा सके। इस नीति के कारण लगभग 300,000 ईसाई बेघर हो गए और भूखमरी के कगार पर पहुंच गए।”[15]
जीते-जी नर्क
लगभग बीस लाख पाकिस्तानी ईसाई आज भी अपने साथ हुए विश्वासघात की कीमत चुका रहे हैं। 1960 में, जब पाकिस्तान ने नई राजधानी बनाई, तो बहुत से ईसाई इस्लामाबाद में बस गए। वे सड़क सफाईकर्मी और सीवेज क्लीनर के रूप में काम करते थे, क्योंकि उनके लिए यही काम बचा था।[16]
एक पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 1947 के बाद से ईसाइयों के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई है। उन्हें मुसलमानों के हाथों हिंदुओं की तरह ही जाति-आधारित प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। “ईसाइयों के खिलाफ हिंसा दिन-प्रतिदिन की बात हो गई है। चर्चों पर हमला किया गया है, ईसाइयों के घरों को जला दिया गया है और निर्दोष लोगों को क्रूरतापूर्वक निशाना बनाया जा रहा है। पंजाब में ईसाइयों को सबसे अधिक निशाना बनाया जाता है। ईसाइयों के खिलाफ अधिकांश हमले उसी प्रांत में हुए हैं जिसे एसपी सिंघा ने पाकिस्तान का हिस्सा बनाने के लिए संघर्ष किया था।”[17]
पाकिस्तानी समाज में बढ़ते इस्लामी कट्टरवाद को देखते हुए हालात और भी बदतर होने की संभावना है। ईसाइयों के खिलाफ ईशनिंदा मामलों की संख्या बढ़ी है। लेखिका आयशा जलाल कहती हैं, “इस्लामिक पाकिस्तान में कोई भी इस आरोप से सुरक्षित नहीं है।”[18]
पाकिस्तानी ईसाइयों को झूठे ईशनिंदा के मामलों में मौत की सज़ा सुनाई जाती है। बच्चों को भी नहीं माफ़ किया जाता। फरवरी 1995 में, दो ईसाइयों को ईशनिंदा के संदिग्ध आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। आरोपियों में से एक, सलामत मसीह, 13 साल का था। 2012 में, डाउन सिंड्रोम से पीड़ित 14 वर्षीय ईसाई लड़की रिमशा मसीह पर कुरान जलाने का गलत आरोप लगाया गया था। पाकिस्तान में महीनों तक उसे छिप कर रहना पड़ा था।[19]
कब ख़त्म होगी कट्टरता?
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम सताए गए पाकिस्तानी ईसाइयों को भारतीय नागरिकता प्रदान करता है। लेकिन, 2023 में पाकिस्तानी मुसलमानों ने एक चर्च को जलाया, तो एक पाकिस्तानी ईसाई ने कहा कि उसका देश भारत जैसा है और उसने पाकिस्तानी ईसाइयों की स्थिति की तुलना भारत के ईसाइयों से की।[20] जब हिंदू उदारता का इस तरह तिरस्कार किया जाता है, तो यह वसुधैव कुटुम्बकम, की प्राचीन अवधारणा को फिर से जांचने का अवसर देता है।
भारत में ईसाई तभी तक सुरक्षित हैं जब तक हिंदू बहुसंख्यक हैं। अगर मुसलमान कभी जनसंख्या युद्ध के सहारे भारत पर नियंत्रण कर लेते हैं, तो सबसे पहले वे भारत से ईसाई धर्म को मिटा देंगे। अगर आपको कोई संदेह है, तो बस सीमा पार जा कर देख लें। याद रखिये, पाकिस्तान में हिंदू धर्म नहीं है।
संदर्भ
[1] Munir-ul-Anjum and Shahnaz Tariq, Pakistan Journal of Social Sciences Vol. 32, No. 2, page 441, https://go.gale.com/ps/i.do?id=GALE%7CA364069389&sid=googleScholar&v=2.1&it=r&linkaccess=abs&issn=20742061&p=AONE&sw=w&userGroupName=anon%7E406f5233&aty=open-web-entry
[2] Mujeebur Rahman, The Life of Hadhrat Mirza Bashiruddin Mahmud Ahmad Khalifatul Masih II, page 160, https://archive.org/stream/FazlEUmar/Fazl-e-Umar_djvu.txt
[3] Jinnah’s Christians: From Pakistan Movement to the Formation of Pakistan | Pakistan Today; https://www.pakistantoday.com.pk/2021/08/15/jinnahs-christians-from-pakistan-movement-to-the-formation-of-pakistan/
[4] Kalsoom Hanif and Muhammad Iqbal Chawla, ‘State, Religion and Religious Minorities in Pakistan: Remembering the Participation of Christians in Punjab Legislative Assembly, 1947-55’ https://pssr.org.pk/issues/v4/2/state-religion-and-religious-minorities-in-pakistan-remembering-the-participation-of-christians-in-punjab-legislative-assembly-1947-55.pdf
[5] Munir-ul-Anjum and Shahnaz Tariq, Pakistan Journal of Social Sciences Vol. 32, No. 2, page 437, https://go.gale.com/ps/i.do?id=GALE%7CA364069389&sid=googleScholar&v=2.1&it=r&linkaccess=abs&issn=20742061&p=AONE&sw=w&userGroupName=anon%7E406f5233&aty=open-web-entry
[6] The Dawn of Pakistan – Dawn.Com; https://www.dawn.com/news/1338270
[7] Munir-ul-Anjum and Shahnaz Tariq, Pakistan Journal of Social Sciences Vol. 32, No. 2, page 439; https://go.gale.com/ps/i.do?id=GALE%7CA364069389&sid=googleScholar&v=2.1&it=r&linkaccess=abs&issn=20742061&p=AONE&sw=w&userGroupName=anon%7E406f5233&aty=open-web-entry
[8] Munir-ul-Anjum and Shahnaz Tariq, Pakistan Journal of Social Sciences Vol. 32, No. 2, page 440; https://go.gale.com/ps/i.do?id=GALE%7CA364069389&sid=googleScholar&v=2.1&it=r&linkaccess=abs&issn=20742061&p=AONE&sw=w&userGroupName=anon%7E406f5233&aty=open-web-entry
[9] Nazaria-i-Pakistan Trust (nazariapak.info); https://www.nazariapak.info/Pakistan-Movement/Jinnah-Punjab.php
[10] Pakistan: The Anti-India Identity – Indian Defence Review; https://www.indiandefencereview.com/news/pakistan-the-anti-india-identity/
[11] Munir-ul-Anjum and Shahnaz Tariq, Pakistan Journal of Social Sciences Vol. 32, No. 2, page 441; https://go.gale.com/ps/i.do?id=GALE%7CA364069389&sid=googleScholar&v=2.1&it=r&linkaccess=abs&issn=20742061&p=AONE&sw=w&userGroupName=anon%7E406f5233&aty=open-web-entry
[12] Kalsoom Hanif and Muhammad Iqbal Chawla, ‘State, Religion and Religious Minorities in Pakistan: Remembering the Participation of Christians in Punjab Legislative Assembly, 1947-55’; https://pssr.org.pk/issues/v4/2/state-religion-and-religious-minorities-in-pakistan-remembering-the-participation-of-christians-in-punjab-legislative-assembly-1947-55.pdf
[13] Christian slums are being targeted by bigoted authorities intent on cleaning up Islamic capital – British Asian Christian Association (britishasianchristians.org); https://www.britishasianchristians.org/baca-news/20290/
[14] Kalsoom Hanif and Muhammad Iqbal Chawla, ‘State, Religion and Religious Minorities in Pakistan: Remembering the Participation of Christians in Punjab Legislative Assembly, 1947-55’
[15] ibid
[16] Christian slums are being targeted by bigoted authorities intent on cleaning up Islamic capital – British Asian Christian Association (britishasianchristians.org); https://www.britishasianchristians.org/baca-news/20290/
[17] How four Christian votes made Pakistan possible (thefridaytimes.com); https://thefridaytimes.com/01-Jun-2018/how-four-christian-votes-made-pakistan-possible
[18] Ayesha Jalal, The Struggle for Pakistan, page 215
[19] Pakistan blasphemy case: who’s Rimsha Masih? – News18; https://www.news18.com/news/india/pakistan-blasphemy-case-whos-rimsha-masih-505520.html
[20] https://x.com/haidersaeedpti/status/1691874501976277341?s=20
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