कहानी एक दिल की: भारत में अंगदान मुद्दे से जुड़ी नैतिक दुविधाएं

गंभीर अंग की कमी और प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूचियों पर मर रहे हजारों भारतीयों के बीच, एक पाकिस्तानी लड़की को चेन्नई स्थित एनजीओ से दिल मिला, जिससे भारत में अंगदान पर नैतिक बहस शुरू हो गई।
  • भारत में अंगप्रत्यारोपण के लिए आवश्यक अंगों की भारी कमी है, प्रत्यारोपण का इंतज़ार करते-करते हज़ारों लोग मर जाते हैं।
  • एक पाकिस्तानी लड़की का ह्रदय प्रत्यारोपण चेन्नई स्थित एक गैर सरकारी संगठन की मदद से करवाया गया, जबकि भारतीय नागरिक अंगों के लिए सालों तक इंतज़ार करते हैं। इस वजह से देश में एक नई बहस छिड़ गई है।
  • यह घटना भारतीय नागरिकों की तुलना में विदेशी प्राप्तकर्ताओं को प्राथमिकता देने के मामले में निष्पक्षता और नैतिकता पर सवाल उठाती है।
  • दानकर्ताओं में सर्वाधिक गैर-मुस्लिम हैं। इस वजह से यह विवाद और गहराता जा रहा है।
  • ऐसी स्थिति में ऐसे नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियों के समाधान के लिए भारत की अंगदान नीतियों के पुनर्मूल्यांकन की मांग करती है।

भारत में प्रत्येक साल हज़ारों भारतीय हृदय प्रत्यारोपण इंतज़ार में मर जाते हैं। देश में हर साल हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत वाले 50,000 लोगों में से केवल 0.2 प्रतिशत यानी 100 से भी कम लोगों का ही हार्ट ट्रांसप्लांट हो पाता है[1] अंगों की भयंकर कमी के बावजूद, एक पाकिस्तानी लड़की का प्रतीक्षा सूची का उल्लंघन करते हुए ह्रदय प्रत्यारोपण करवाया गया। यह काम वामपंथी विचारक चित्रा विश्वनाथ द्वारा स्थापित ऐश्वर्यम ट्रस्ट के माध्यम से मुफ्त में किया गया[2]

इसके अतिरिक्त, ऑपरेशन के लिए जरूरी लगभग 40 लाख रुपये भी भारत में ही जुटाए गए। यह ह्रदय एक 68 वर्षीय दिमागी रूप से मृत घोषित एक मरीज का था। इस ह्रदय को कराची की पाकिस्तानी लड़की आयशा राशिद के लिए विशेष विमान के द्वारा दिल्ली से चेन्नई के एमजीएम हेल्थकेयर पहुंचाया गया था। डॉक्टरों ने दावा किया कि दिल्ली में किसी को भी इस ह्रदय की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन डॉक्टरों के इस दावे की सत्यता पर भारी संदेह है और यह दावा आगे आने वाले किसी विवाद को ख़त्म करने के लिए किए गए मालूम पड़ते है।

यह घटना तीन मुख्य प्रश्नों को जन्म देती है:

  1. क्या भारत को विदेशियों के लिए, विशेष कर पाकिस्तानियों के लिए, अंगदान की सुविधा समाप्त कर देनी चाहिए? प्रश्न है कि जब इन दोनों देशों के मुसलमान 1947 में भारत से अलग हो गए थे और जब वे हिंदू बहुल भारत में नहीं रहना चाहते थे तब अपनी अंग प्रत्यारोपण के लिए भारत क्यों आते हैं?
  2. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय मुसलमान अपने अंगदान करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि यह उनके इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध है। तो क्या उन्हें दूसरों से अंग प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए?
  3. क्या भारत को हिंदुओं, सिखों, जैनियों, ईसाइयों, बौद्धों और नास्तिकों के लिए समान अवसर निर्मित करने के लिए कानून बनाना चाहिए, जो आमतौर पर अंगदान करते हैं? ऐसी स्थिति में पूरे अंगदान उद्योग पर फिर से दृष्टि डालने की आवश्यकता है और यह घटना इसके लिए एक अच्छा अवसर भी दे रही है।
कौन हैं दानकर्ता?

दानकर्ताओं की जनसांख्यिकी की बात करें तो भारत में लगभग सभी अंगदानकर्ता गैर-मुस्लिम हैं। धार्मिक कारणों से मुसलमान शायद ही कभी अंगदान करते हैं। यह तस्वीर तेलंगाना के जीवनदान, राज्य शव अंग प्रत्यारोपण प्राधिकरण की ओर से एकत्र किए गए आकड़ें से बनती हुई दिखती है। 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, जीवनदान ने यह सुनिश्चित किया था कि 241 दिमागी रूप से मृत रोगियों के दान किए गए अंगों और ऊतकों से 1,000 से अधिक लाभार्थियों को जीवन मिला था। लेकिन यह संस्था एक भी मुस्लिम को अपने अंगदान करने के लिए मनाने या समझा पाने में असमर्थ था[3]

यह भी विचित्र बात है कि अंगदान के प्रति इस्लामी घृणा के होते हुए , मुसलमानों को दूसरों से अंग प्राप्त करने में कोई समस्या नहीं है। आकड़ें बताते हैं कि 2013 से 2016 तक, जीवनदान के अधिकारियों ने 39 मुस्लिम रोगियों को किडनी और लीवर जैसे अंग दान किए।

जीवनदान की समन्वयक डॉ. जी स्वर्णलता ने कहा, “हम मुस्लिम समुदाय को अंगदान पर समझाने-बुझाने के लिए एक बेहतर व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल सका है। हालांकि, इस समुदाय के कुछ प्रमुख लोग अंगदान के विषय का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन इससे भी काम बनता नहीं दिख रहा है।”

पूर्व क्रिकेटर सैयद किरमानी के मामले में यह समस्या भी सामने आई थी, जिन्होंने साथी मुसलमानों के विरोध के बाद अपने अंगदान करने का फैसला वापस ले लिया। उन्होंने कहा, “मैं कुछ धार्मिक मान्यताओं के कारण अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान नहीं कर पाऊंगा।”[4]

दान का मजाक

जब हिंदुओं और अन्य गैर-मुस्लिमों द्वारा दान किए गए अंग विदेशियों को दिए जाते हैं, तो इन दाताओं के परिवार को लगता है कि उनके इस त्याग का मजाक उड़ाया जा रहा है। भारतीय नागरिक, जो पहले से ही गंभीर स्थिति में हैं, पंक्ति में और नीचे धकेल दिए जाते हैं, जबकि देश में अंगों की कमी के कारण पहले से ही स्थिति बहुत गंभीर बनी हुई है।

धर्मनिरपेक्ष मीडिया की कारस्तानी

वर्ष 2009 में, केरल की 31 वर्षीय हिंदू महिला लेखा नंबूदरी ने एक विज्ञापन देखा। यह विज्ञापन शफी नवाज की तरफ से दिया गया था, जिसमें उन्हें एक किडनी दानकर्ता की तलाश थी। लेखा को शफी ने 15 लाख रूपये तक की पेशकश की थी। लेकिन, तमाम वित्तीय कठिनाइयों और चिकित्सा समस्याओं को किनारे करते हुए, लेखा ने शफी को मुफ्त में किडनी दान की[5]

जब प्रत्यारोपण की खबर सार्वजनिक हुई, तो लेखा को शफी से गाली मिलनी शुरू हो गयी। यह लेखा के लिए एक गंभीर झटका था। शफी इस बात के लिए लेखा को गाली दे रहा था कि उसके कारण ही अब उसके शरीर में एक हिंदू किडनी थी। शफी ने दावा किया कि उसके समुदाय के लोगों ने उसे एक हिंदू महिला की किडनी स्वीकार करने के लिए उसकी आलोचना कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि लेखा और उनके के बच्चे राष्ट्रवादी संगठन “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” के सदस्य हैं। हालांकि, केरल मीडिया ने लेखा के परिवार के आरएसएस से संबंध की खबर को दबाने की कोशिश की। धर्मनिरपेक्ष(!) मीडिया यह उजागर नहीं करना चाहता था कि एक हिंदू ने ऐसा निस्वार्थ कार्य किया है।

पाकिस्तानी कृतघ्नता

भारत में यह आम मान्यता है कि पाकिस्तानी कभी भी भारतीयों और हिंदुओं की उदारता के लिए आभारी नहीं हो सकते। जीवन रक्षक प्रत्यारोपण और आपातकालीन चिकित्सा देखभाल पाने के बावजूद, भारत और हिंदुओं के प्रति उनके मन में दुश्मनी बनी हुई है। यह विडंबनापूर्ण है कि जिन लोगों ने उनकी जान बचाई, आज भी उनके प्रति वे आज भी दुर्भावना रखते हैं।

आयशा के ह्रदय प्रत्यारोपण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, एक पाकिस्तानी इमाम ने दावा किया कि हिंदू व्यक्ति का हृदय काफिर है। इमाम ने कहा कि जो हृदय कभी हिंदू मूर्तियों के आगे झुकता था, वह अब अल्लाह के आगे सजदा करेगा। इमाम ने कहा,”जिस व्यक्ति ने लड़की को अपना हृदय दिया, वह हिंदू के रूप में मरा, इसलिए वह किसी पुण्य का हकदार नहीं है। हालांकि, जिस लड़की ने हृदय स्वीकार किया, वह बहादुर है। वह अब गैर-मुस्लिम हृदय को अल्लाह के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर करेगी और यही उसकी जीत है।”[6]

दरअसल, भारत से नया जीवन पाने के बाद, पाकिस्तानी रोगी शायद ही कभी अंगदान के जरिये अपनी जान बचाने के लिए भारतीयों को धन्यवाद देते हैं। इसके बजाय, अक्सर वे अल्लाह के प्रति आभार व्यक्त करते है। उनका यह कृत्य अंगदाताओं के प्रति उनकी कृतघ्नता और घृणा को ही बताता है। ऐसे में, सवाल उठता है कि अगर अल्लाह इतना महान है, तो वह पाकिस्तान और बांग्लादेश में सर्जरी क्यों नहीं करवा देता?

अवैध अंगप्रत्यारोपण व्यापार का जोखिम

भारत में हृदय प्रत्यारोपण करवाने वाली पाकिस्तानी लड़की के मामले ने देश में अंगदान की नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियों को सामने ला दिया है, जहां हजारों नागरिक प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा में मर जाते हैं।

विदेशियों के लिए अंग प्रत्यारोपण की अनुमति देने से संभावित दुरुपयोग और अवैध व्यापार बढ़ सकता है। इसे ले कर कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण भी हमारे समक्ष है। केरल उच्च न्यायालय ने लेकशोर अस्पताल को एक 18 वर्षीय भारतीय किशोर के दुर्घटना का शिकार होने के बाद, उसके लीवर को मलेशियाई नागरिक में प्रत्यारोपित करने को ले कर सम्मान जारी किया था। कानून का उल्लंघन करते हुए उस भारतीय किशोर की लीवर और किडनी निकाली गई, जो अंगों के दुरुपयोग की संभावना को दर्शाता है[7]

तमिलनाडु में एक पाकिस्तानी रोगी को हृदय मिलना कोई संयोग नहीं है। यह राज्य भारत के अंग प्रत्यारोपण रैकेट का केंद्र रहा है। 2018 में, तमिलनाडु सरकार द्वारा शुरू की गई एक जांच में पाया गया कि मृतक दाताओं के अंगों को विदेशी नागरिकों, विशेष रूप से मध्य पूर्व, मध्य एशियाई देशों और अफ्रीका के लोगों को दी जा रही थी और प्रतीक्षा सूची में भारतीय रोगियों को दरकिनार कर दिया गया था। 2017 में, राज्य में किए गए सभी हृदय प्रत्यारोपणों में से लगभग 25 प्रतिशत और फेफड़े के प्रत्यारोपणों में से 33 प्रतिशत विदेशियों के किए गए[8]

फेफड़े और हृदय प्रत्यारोपण के आंकड़े विशेष रूप से चिंताजनक हैं। इनमें से 25-33 प्रतिशत अंग नियमित रूप से विदेशी नागरिकों को आवंटित किए जाते हैं। कारण यह बताया जाता है कि प्रतीक्षा सूची में भारतीय रोगियों की कमी है, सूचीबद्ध भारतीय प्राप्तकर्ताओं की चिकित्सा अयोग्यता है या किसी विशिष्ट डॉक्टर की अनुपलब्धता रहती है[9]

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में नेफ्रोलॉजी के प्रोफेसर विवेकानंद झा के अनुसार, विदेशी नागरिकों को अंग आवंटित करना “भारतीय मृतक दान प्रणाली को ले कर धोखाधड़ी है।” वह बताते हैं कि मृतक अंगदान के लिए यह जरूरी है कि प्राप्तकर्ता की पहचान की जाए और अंग उपलब्ध होने के कुछ घंटों के भीतर प्रत्यारोपण पूरा हो जाए, जिससे यह अनुमान लगाना असंभव हो जाता है कि मिलान करने वाला अंग कब मिलेगा। इससे यह सवाल उठता है कि भारत में हृदय और फेफड़े की बीमारी वाले विदेशी नागरिक कैसे मौजूद हैं, जो उपयुक्त भारतीय प्राप्तकर्ताओं की कमी के कारण अंगों के मिलने की उम्मीद लिए इंतजार कर रहे हैं। ये मरीज़ उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा देखभाल के लिए भारत नहीं आ रहे हैं, बल्कि विशेष रूप से अपने देशों में उपलब्ध न होने वाले दुर्लभ अंगों को पाने के लिए भारत आ रहे हैं। “यह हिंसक व्यवहार है और प्रत्यारोपण पर्यटन के जैसा है।”[10]

क्या भारतीय दाताओं के अंग विदेशियों को दिए जाने चाहिए? झा बताते हैं कि भारत को इस प्रथा पर रोक लगानी चाहिए। वे कहते हैं,”देशों द्वारा मृतक दान कार्यक्रम विकसित करने में संसाधनों का निवेश करने का कारण गंभीर रूप से अंग विफलता वाले अपने नागरिकों के लिए अंगों की आवश्यकता को पूरा करना है। परोपकारी मृतक दाताओं के अंग एक राष्ट्रीय संसाधन हैं और उनका उपयोग विदेशी नागरिकों की सेवा के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जबकि हजारों भारतीय अंग विफलता से मर रहे हैं। यह दावा करना हास्यास्पद है कि 130 करोड़ के देश में, प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में कोई भी उपयुक्त भारतीय नहीं है।”

निष्कर्ष

अंगदाता जनसांख्यिकी के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक असमानताओं और अवैध प्रथाओं की संभावना को देखते हुए, भारत को सिंगापुर मॉडल अपनाना चाहिए, जहां अंगदाताओं को प्राथमिकता मिलती है[11]

सिंगापुर का मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम यानी ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक्ट (HOTA) एक ऑप्ट-आउट अंगदान प्रणाली है, जो प्रत्यारोपण उद्देश्य के लिए मृत सिंगापुर नागरिकों और स्थायी निवासियों के किडनी, लीवर, हृदय और कॉर्निया को निकालने की अनुमति देता है। कोई व्यक्ति मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम  के तहत सूचीबद्ध सभी या विशिष्ट अंगों के लिए ऑप्ट-आउट कर सकते हैं। अगर भविष्य में उन्हें अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, तो मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम  से बाहर निकलने वाले व्यक्तियों को अंग प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम  में बने रहने वालों की तुलना में कम प्राथमिकता मिलेगी। सिंगापुर मॉडल निष्पक्ष और पारदर्शी है। और अगर इसे भारत में लागू किया जाता है, तो यह सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करेगा। अभी एक समूह धर्म के नाम पर व्यवस्था से खेल रहा है। साफ़ है कि यही समय है जब इस कुप्रथा को समाप्त किया जा सकता है।

सन्दर्भ

[1] India’s Growing Heart Transplant Requirements: Fresh Insights (mohanfoundation।org); https://www।mohanfoundation।org/news/Indias-Growing-Heart-Transplant-Requirements-Fresh-Insights-1214।htm#:~:text=%22Each%20year%2C%20about%2090%2D,percent%20receive%20transplants%2C%22%20Dr

[2] Sound the Alarm on the Digital Dollar | American Hartford Gold (youtube।com); https://www।youtube।com/watch?v=NuBfwrUIyts

[3] Records show no organ donation from Telangana Muslims | Hyderabad News – Times of India (indiatimes।com); https://timesofindia।indiatimes।com/city/hyderabad/records-show-no-organ-donation-from-telangana-muslims/articleshow/53608829।cms

[4] Ex-India cricketer Syed Kirmani retracts statement after pledging to donate his eyes | Crickit (hindustantimes।com); https://www।hindustantimes।com/cricket/ex-india-cricketer-syed-kirmani-retracts-statement-after-pledging-to-donate-his-eyes/story-zRJV4nNMNOcQEKE9nL1McI।html

[5] When Kidney becomes Kafir: A Hindu women is abused by a Muslim man whom she donated kidney (organiser।org); https://organiser।org/2023/07/07/182640/bharat/the-communal-kidney-shocking-case-of-a-kerala-hindu-woman-who-faced-abuse-upon-donating-her-kidney-to-a-muslim-man/#:~:text=The%20kidney%20was%20donated%20by,media%20user%20shared%20its%20detail&text=Today%20Organiser%20will%20take%20you,kidney%20to%20a%20Muslim%20man

[6] Get To The Deepest Root With A Free Discovery Session From Bridgewater’s Leading PT Clinic (youtube।com); https://www।youtube।com/watch?v=h5jBrZsfuSA

[7] Kerala Court Issues Summons To Lakeshore Hospital, Its Doctors For Allegedly Transplanting Liver Of Brain Dead Patient In Violation Of Law (livelaw।in); https://www।livelaw।in/news-updates/kerala-court-summons-doctors-lakeshore-hospital-ernakulam-liver-transplant-violation-of-law-230618#:~:text=A%20Kerala%20Court%20recently%20issued,Act%20(THOA)%2C%201994

[8] In Chennai, the hearts beat for foreigners – The Hindu; https://www।thehindu।com/news/cities/chennai/organ-transplant-racket-surfaces-in-tamil-nadu/article61538843।ece

[9] The Wire: The Wire News India, Latest News,News from India, Politics, External Affairs, Science, Economics, Gender and Culture; https://thewire।in/health/underbelly-organ-transplantation-india#:~:text=Last%20month%2C%20an%20enquiry%20instituted,Central%20Asian%20republics%20and%20Africa

[10] The Wire: The Wire News India, Latest News,News from India, Politics, External Affairs, Science, Economics, Gender and Culture; https://thewire।in/health/underbelly-organ-transplantation-india#:~:text=Last%20month%2C%20an%20enquiry%20instituted,Central%20Asian%20republics%20and%20Africa

[11] Live On | Who Is Eligible To Be A Donor; https://www।liveon।gov।sg/who-is-eligible-to-be-a-donor।html#:~:text=All%20Singapore%20Citizens%20and%20Permanent,Which%20organs%20are%20included%3F&text=What%20is%20the%20purpose%3F

 

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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