राष्ट्रपति बदलते रहेंगे, पर अमेरिका की भारत नीति वहीं की वहीं रहेगी

अमेरिका की विदेश नीति में चर्च का बहुत बड़ा हाथ होता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति कोई भी हो, अमेरिका की भारत नीति न कभी निष्पक्ष रही है, और न कभी ऐसा होने की संभावना है।
  • अमेरिका की विदेश नीति चर्च-प्रेरित है, न कि केवल राष्ट्रपति या उनकी पार्टी की सोच पर आधारित; इसका प्रमुख उद्देश्य वैश्विक ईसाई धर्म विस्तार है।
  • भारत इस एजेंडे के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है क्योंकि यह एक सनातन धर्म आधारित राष्ट्र है, जो अब्राहमिक मजहबों के विस्तार के सामने वैचारिक चुनौती प्रस्तुत करता है।
  • चर्च समर्थित संस्थाएं भारत को ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ बताकर उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करती हैं।
  • IRFA कानून और USCIRF जैसी संस्थाएं धर्मांतरण विरोधी नीतियों के आधार पर भारत के खिलाफ लगातार रिपोर्टें बनाती हैं, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिन्दुओं के नरसंहार पर चुप रहती हैं।

अमेरिका की विदेश नीति वहाँ के राष्ट्रपति या उनकी पार्टी की सोच से नहीं बनती। असल में, अमेरिका की विदेश नीति का असली मकसद है ईसाई मजहब को पूरी दुनिया में फैलाना, और यह नीति चर्च की योजनाओं पर आधारित होती है।

इस लक्ष्य को पाने में सबसे बड़ी रुकावट भारत है। हालाँकि भारत का संविधान आधिकारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन देश की संस्कृति और आत्मा एक प्राचीन धर्मिक सोच पर टिकी हुई है, जो अब्राहमिक मजहबों (जैसे इस्लाम और ईसाइयत) से अलग है। यही भारत की पहचान इन रिलीजन के विस्तार के लिए एक बड़ी वैचारिक चुनौती बन जाती है।

भारत में ईसाईकरण करने के लिए इस सांस्कृतिक पहचान को तोड़ना ज़रूरी समझा जाता है। इसलिए पश्चिमी देशों ने लगातार ऐसे विचारों को बढ़ावा दिया है जो भारत को बांटते और कमजोर करते हैं, और पाकिस्तान जैसे अलग हुए इलाकों को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन देते हैं।

इस रणनीति को बनाने और लागू करने में अमेरिका के कई ईसाई मिशन और विचारधारा से जुड़े संगठन मिलकर काम करते हैं। वहाँ का कोई भी राष्ट्रपति हो, किसी भी पार्टी का हो – भारत के लिए यह रणनीति कभी नहीं बदलती, और न ही बदलने की कोई संभावना है।

इसी सत्य का विश्लेषण करता है यह लेख।       

दोस्ती का नकाब

यह एक रोचक संयोग रहा कि जब डोनाल्ड ट्रम्प पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तभी नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे। दोनों नेताओं के पहले कार्यकाल के दौरान आपसी संबंधों में काफी मिठास देखने को मिली और भारत-अमेरिका के रिश्ते पहले से बेहतर हुए। लेकिन जब ट्रम्प अगला चुनाव हार गए और जो बाइडन राष्ट्रपति बने, तो रिश्तों की वह गर्मजोशी कुछ कम होती दिखी। यह धारणा बनने लगी कि अगर ट्रम्प फिर से सत्ता में आए तो पुराने रिश्तों की मिठास लौट आएगी।

लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने दुनिया के कई देशों पर भारी टैक्स (टैरिफ)[1] लगाकर व्यापारिक रिश्तों की नई परिभाषा तय करनी शुरू कर दी। साथ ही अमेरिका में रहने वाले विदेशियों के लिए इमिग्रेशन नियम भी कड़े कर दिए गए, जिसका असर भारत पर भी पड़ा।

इसी दौरान, जब भारत ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को जवाब देने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया और पाकिस्तान को झुकने पर मजबूर किया, तब अमेरिका से भारत को कुछ हद तक नैतिक समर्थन तो मिला, लेकिन ट्रम्प सरकार ने पर्दे के पीछे पाकिस्तान की मदद भी की। पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से तात्कालिक भारी आर्थिक सहायता दिलवा दी गई, जबकि भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था। IMF की बैठक में भारत ने साफ कहा था कि पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक मदद दरअसल उसकी खुफिया एजेंसियों और आतंकी संगठनों—जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद—के हाथ में जाती है, जो भारत पर हमले करते हैं। ऑपरेशन सिंदूर की वजह से पहले ही संकट में डूबा पाकिस्तान, इस आर्थिक मदद से कुछ हद तक संभल गया।

इतना ही नहीं, कुछ ही समय बाद संयुक्त राष्ट्र (UNO) में पाकिस्तान को ‘तालिबान प्रतिबंध समिति’ का अध्यक्ष और ‘आतंकवाद विरोधी समिति’ का उपाध्यक्ष भी बना दिया गया।[2] यह फैसला चौंकाने वाला था क्योंकि पाकिस्तान खुद आतंकवाद का मुख्य समर्थक रहा है। यह सब अमेरिका की मंजूरी और सहयोग के बिना संभव नहीं था, क्योंकि IMF और UNO जैसे संगठन काफी हद तक अमेरिका की इच्छा पर काम करते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि ट्रम्प, जो कभी मोदी जी के खास दोस्त माने जाते थे और भारत-समर्थक छवि रखते थे, उनके शासन में ऐसा बदलाव क्यों आया? इसका जवाब अमेरिका की राजनीति के पीछे छिपे वास्तविक ताकतों और विचारधाराओं में मिलता है।

ईसाई विस्तारवाद से नहीं बचा कोई राष्ट्रपति

यह बात अब कोई रहस्य नहीं रही कि नई दिल्ली को लेकर वाशिंगटन की नीति और मंशा कभी भी पूरी तरह ईमानदार नहीं रही है। जिस पाकिस्तान को वह कभी आतंकवाद का केंद्र और विश्व शांति के लिए खतरा बताता है, और जिसे चेतावनी देता है कि मदद बंद कर देगा, उसी पाकिस्तान की वह कभी-कभी पीठ भी थपथपाने लगता है।

फिर चाहे राष्ट्रपति ट्रम्प हों या ओबामा, बुश हों या क्लिंटन – सभी ने समय-समय पर यही दोहरी नीति अपनाई है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका की विदेश नीति, खासकर भारत को लेकर उसकी सोच, सिर्फ राष्ट्रपति की मर्जी पर नहीं चलती। इसके पीछे कुछ खास समितियाँ, सलाहकार समूह और संस्थाएँ काम करती हैं, जो असली दिशा तय करते हैं। इसलिए इन नीतियों को सही से समझने के लिए इन शक्तियों और उनके इरादों को भी जानना जरूरी है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका के इतिहास में जितने भी राष्ट्रपति हुए हैं, वे लगभग सभी किसी न किसी रूप में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार यानी ‘धार्मिक विस्तारवाद’ के समर्थक रहे हैं। पिछले सौ सालों में अमेरिका की विदेश नीति में इस ईसाई एजेंडे का बहुत गहरा असर रहा है।

जिमी कार्टर और बिल क्लिंटन जैसे नेताओं को अक्सर उदारवादी (liberal) कहा जाता है, लेकिन यह भी सच है कि वे कभी ‘सदर्न बैपटिस्ट’ चर्च के प्रचारक रहे थे। राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे विदेशी देशों में चर्च मिशनों द्वारा कराए जाने वाले ईसाईकरण का समर्थन करते रहे।[3] यह एक परंपरा बन चुकी है, जिससे अब तक कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति अलग नहीं हुआ है। आज अमेरिका में मुख्यधारा की राजनीति में आने वाले हर उम्मीदवार के लिए जरूरी हो गया है कि वह खुद को एक “सच्चा ईसाई” दिखाए।[4] और वहाँ “सच्चा ईसाई” होने का मतलब होता है – पूरी दुनिया में ईसाइयत को फैलाने के लिए समर्पित होना।

इसी कारण अमेरिकी संसद (कांग्रेस), राष्ट्रपति और व्हाइट हाउस के शीर्ष अधिकारियों में से ज़्यादातर किसी न किसी रूप में ऐसे ईसाई संगठनों या मिशनों से जुड़े रहते हैं, जो धार्मिक प्रचार और धर्मांतरण के एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं। अमेरिकी कांग्रेस के बहुत से प्रमुख नेता और नौकरशाह एक गुप्त ईसाई प्रचारक समूह “द फैमिली” के सदस्य रहे हैं, जिसने दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति को प्रभावित किया।[5]

चर्च-समर्थित संस्थाओं की गिरफ्त में अमेरिकी विदेश नीति

अमेरिका की विदेश नीति खासकर भारत को लेकर सिर्फ राष्ट्रपति की सोच से तय नहीं होती, बल्कि उस पर कई शक्तिशाली ईसाई संस्थाओं का भी गहरा असर होता है। ऐसी ही एक प्रमुख संस्था है – Policy Institute for Religion and State (धर्म और राज्य के लिए नीति संस्थान) अर्थात PIFRAS (पीफरास)। इसके सभी सदस्य अब्राहमिक हैं और इनके विचार अक्सर हिन्दू धर्म के मूल स्वभाव से टकराते हैं।[6]

यह संस्था अमेरिका की कई दूसरी ईसाई संस्थाओं के साथ मिलकर भारत के खिलाफ झूठे प्रचार में लगी रहती है। जैसे – United Methodist Board of Church and Society, National Council of Churches of Christ in USA, Institute of Religion in Public Policy, Ethics and Public Policy Center और Apostolic Commission for Ethics and Policy। ये सब मिलकर भारत को दुनिया के सामने एक “ईसाई विरोधी देश” के रूप में दिखाने की कोशिश करती हैं और फिर उसी के आधार पर अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत को लेकर नीतियाँ बनाने के सुझाव देती हैं।

इसी तरह एक और बेहद ताकतवर संस्था है – Freedom House, जिसे Center for Religious Freedom भी कहा जाता है। इसके साथ जुड़ी हुई एक और संस्था है – United Christian Forum for Human Rights। भारत में All India Christian Council, Indian Social Institute for Human Rights Documentation Center और All India Federation of Organisations for Democratic Rights जैसी संस्थाएँ इनके स्थानीय एजेंट के रूप में काम करती हैं।

इनके माध्यम से ‘फ्रीडम हाउस’ भारत के लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों पर हमलों की मनगढ़ंत रिपोर्टें तैयार करवाता है, जिन्हें फिर अमेरिका के नीति-निर्माण सलाहकारों को सौंपा जाता है। इस तरीके से अमेरिका की ‘भारत नीति’ को प्रभावित किया जाता है।[7] इसके अलावा Asian Society, Ford Foundation जैसी संस्थाएँ भी भारत के खिलाफ नकारात्मक छवि बनाने में सक्रिय रहती हैं और अमेरिकी नीतियों को उसी दिशा में ढकेलती हैं। इनमें Ethics and Public Policy Center का नाम खास तौर पर उल्लेखनीय है, जो यहूदी-ईसाई नैतिक परंपराओं को अमेरिकी विदेश नीति में लागू करवाने के पक्ष में हमेशा मुखर रहता है। इसके कई सदस्य अमेरिका की सरकार और संयुक्त राष्ट्र (UNO) जैसी संस्थाओं में ऊँचे पदों पर रहे हैं। इन्होंने भारत के विरोध में पाकिस्तान को अमेरिकी हथियारों की मदद दिलवाने में भी भूमिका निभाई है।[8]

इसके अलावा भी कई संगठनों की सक्रियता भारत के खिलाफ देखी जाती है – जैसे World Vision, Christian Community Development Association, World Evangelical Alliance, National Baptist Convention, RAND Corporation, और Global Human Rights and International Operations। इन सभी संस्थाओं की लॉबिंग और दबाव के कारण ही 1998 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को ‘International Religious Freedom Act (IRFA)’ यानी ‘अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ पारित करना पड़ा।[9] इस कानून ने एक तरफ तो ईसाई धर्म को दुनिया भर में फैलाने के लिए कानूनी रास्ता खोला, और दूसरी तरफ अमेरिका की भारत नीति को भी उसी एजेंडे के तहत नियंत्रित करने का आधार बना दिया।

अमेरिकी ‘भारत नीति’ पर चर्च से जुड़ी चौकड़ी का दबाव

अमेरिका का International Religious Freedom Act (IRFA) यानी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम असल में उन देशों के खिलाफ है, जो ईसाई धर्म में जबरन या छलपूर्वक धर्मांतरण को रोकते हैं। यह कानून सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है—इसका दायरा लगभग पूरी दुनिया (194 देशों) तक फैला हुआ है।

कागज़ों पर तो यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर बनाया गया है, जिससे लगता है कि इससे किसी भी मानवाधिकार-पसंद देश को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन असल में यह कानून अमेरिका को किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का बहाना दे देता है, खासकर वहां जहां चर्च मिशनरियाँ धर्मांतरण करना चाहती हैं। इस कानून के पीछे जो सोच है, उसमें ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का मतलब असल में ‘गैर-ईसाइयों को बेझिझक ईसाई बनाने की आज़ादी’ है। अगर कोई देश चर्च की धर्मांतरण गतिविधियों पर रोक लगाने की कोशिश करता है, तो उसे अमेरिका मानवाधिकार हनन का दोषी मानता है। फिर अमेरिका की विदेश नीति उस देश के खिलाफ कठोर रुख अपना लेती है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों से जबसे मोदी सरकार ने धर्मांतरण को रोकने के लिए कदम उठाए हैं, तब से अमेरिका की रिपोर्टों में भारत को बार-बार ‘धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करने वाला देश’ बताया गया है। यही IRFA कानून इसके लिए आधार बनता है। इस कानून के तहत अमेरिकी सरकार तीन अहम संस्थाओं के ज़रिए दुनिया भर में इस एजेंडे को लागू करती है:

  • अमेरिकी विदेश मंत्रालय को सलाह देने के लिए एक विशेष राजदूत,
  • अमेरिकी संसद (कांग्रेस) और राष्ट्रपति को सुझाव देने वाला USCIRF (US Commission on International Religious Freedom),
  • अमेरिकी राष्ट्रपति की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में नियुक्त एक विशेष सलाहकार[10]

इन सभी संस्थाओं के प्रतिनिधि अमेरिकी राष्ट्रपति को विदेश नीति पर सलाह देने वाली एक स्थायी समिति में शामिल रहते हैं। इस समिति का नाम है: President’s Advisory Council on Faith-Based Neighborhood Partnerships। यहाँ “Faith” यानी आस्था का मतलब सिर्फ अब्राहमिक धर्मों—ईसाई और इस्लाम—से होता है।

इस समिति की शुरुआत 2001 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने की थी। ओबामा ने इसका नाम बदला और इसे और मज़बूत किया। ट्रम्प के पहले कार्यकाल में यह Center for Faith and Opportunity Initiatives बन गई, और अब उनके दूसरे कार्यकाल में इसे White House Faith Office कहा जाता है। USAID की वेबसाइट भी साफ़ कहती है कि “Faith” का मतलब सिर्फ ईसाई और यहूदी धर्म से है।[11] अब्राहमवादी आस्था यानी लीजन जिसमें ईसाई और यहूदी होते हैं, और मजहब यानी जिसमें मुस्लिम होते हैं।

यह परिषद अमेरिकी राष्ट्रपति की आंख और कान मानी जाती है।[12] इस परिषद के ज़्यादातर सदस्य चर्च मिशनरियों और ईसाई प्रचार संगठनों के प्रमुख होते हैं, जो सीधे Vatican City से निर्देशित होते हैं। इनका एजेंडा साफ होता है: हिन्दू धर्म का उन्मूलन, हिन्दू समाज का विभाजन और भारत राष्ट्र का विखंडन। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन चर्च संगठनों का मानना है कि पूरी दुनिया को ईश्वर के तथाकथित इकलौते पुत्र जीसस क्राइस्ट का अनुयायी होना चाहिए। जबकि भारत की आत्मा है सनातन धर्म, जो अब्राहमिक नहीं, बल्कि ब्रह्म से निकला धर्म है। यही बात इन मिशनरियों के मार्ग में सबसे बड़ी पैदा करती है।

जब बराक ओबामा राष्ट्रपति बने तो उम्मीद जगी थी कि शायद यह कट्टर ईसाई पकड़ कमजोर पड़ेगी, लेकिन हुआ उल्टा। ओबामा ने इस समिति के सदस्य जॉशुआ डुबॉयस को अपना खास सलाहकार बना लिया – वही व्यक्ति जिसने उनके लिए कट्टर चर्च समूहों से वोट जुटाए थे।

सच तो यह है कि इस परिषद की बात को कोई अमेरिकी राष्ट्रपति नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। जिमी कार्टर और बिल क्लिंटन जैसे उदारवादी माने जाने वाले राष्ट्रपति भी इसकी कट्टर सिफारिशों को टाल नहीं सके। फिर ट्रम्प जैसे नेता इससे अलग कैसे हो सकते हैं?

 पश्चिम का पाकिस्तान के प्रति प्रेम का कारण है दोनों का ‘अब्राहमिक’ होना

यह बात गौर करने लायक है कि अमेरिका, इस्लामी आतंकवाद से कई बार प्रभावित होने के बावजूद, ऐसे आतंकी संगठनों और उन्हें समर्थन देने वाले पाकिस्तान के साथ अक्सर नरमी से पेश आता है। इसके पीछे एक गहरा कारण है – पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है और अमेरिका एक ईसाई राष्ट्र। दोनों की धार्मिक पहचान अब्राहमिक है, जबकि भारत की पहचान सनातन धर्म से जुड़ी हुई है, जो अब्राहमिक परंपरा से अलग है।

यही कारण है कि अमेरिका की ‘पाकिस्तान नीति’ में भारत की तुलना में अक्सर नरमी दिखाई देती है। सोचिए, पिछले 60–70 सालों में पाकिस्तान और बांग्लादेश में राज्य-प्रायोजित हिंसा और आतंक के जरिए हिंदू जनसंख्या लगभग साफ कर दी गई, लेकिन अमेरिका ने कभी इन देशों के खिलाफ कोई बड़ी आपत्ति नहीं जताई। न ही उसने इस विषय पर किसी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की शुरुआत की। इसके उलट, जब कश्मीर में भारतीय सेना आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तब अमेरिका बार-बार ‘मानवाधिकार हनन’ का सवाल उठाता है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय, अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत भारत पर यह आरोप लगाता है कि यहाँ के धर्मांतरण-निरोधक कानून हिन्दू संगठनों को ‘आक्रामक’ बना रहे हैं। इसके आधार पर USCIRF (यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम) भारत को कठघरे में खड़ा करता है। लेकिन, जो इस्लामी देश हिंदू समाज को पूरी तरह मिटा देने पर आमादा हैं, उनकी सरकारी नीतियों पर यह अमेरिका पूरी तरह चुप रहता है।

हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भारत पर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें उसे “धार्मिक स्वतंत्रता के लिहाज़ से सबसे चिंताजनक देशों” की सूची में डाल दिया गया। साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की ‘भारत-नीति’ वास्तव में उन चर्च-प्रभावित ताकतों के इशारे पर तय होती है जो व्हाइट हाउस की President’s Advisory Council on Faith-Based Neighborhood Partnerships नामक सलाहकार परिषद के ज़रिए काम करती हैं।

भारत को लेकर अमेरिका की नीति कोई अपवाद नहीं है बल्कि अमेरिका की पूरी नीति-व्यवस्था अब्राहमिक सोच से संचालित होती है, और भारत जैसे गैर-अब्राहमिक, धर्म-आधारित राष्ट्रों के प्रति उसका दृष्टिकोण हमेशा सन्देह और कठोरता भरा रहता है। कश्मीर का मुद्दा इसका एक अच्छा उदाहरण है। यह मामले पिछले 75 वर्ष से उलझे हुआ है, और इसका असली कारण है अमेरिकी-ब्रिटिश गठबंधन की वह कूटनीति, जो दक्षिण एशिया में अपने धार्मिक और सामरिक हितों को साधना चाहता था। सन 1947 में, भारत विभाजन के समय ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन ने जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के लिए वहां के महाराजा पर हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश की थी।[13] लेकिन जब वह इसमें नाकाम रहा, तो अपनी नाराज़गी और हताशा में उसने यह चाल चली कि भारत-कश्मीर विलय के मामले को प्रधानमंत्री नेहरू के जरिए संयुक्त राष्ट्र में भिजवा दिया।

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे असली मकसद यह था कि ईसाई-बहुल ब्रिटेन और अमेरिका का गठजोड़, दक्षिण एशिया में अपने सामरिक हितों के लिए कश्मीर को भारत से अलग रखना चाहता था। क्योंकि अगर कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए या स्वतंत्र देश बन जाए, तो अमेरिका और ब्रिटेन उस ज़मीन का उपयोग भारत और चीन दोनों के खिलाफ अपने सैन्य उद्देश्यों के लिए कर सकते हैं।

इसी रणनीति के तहत अमेरिका हमेशा कश्मीर के मामले में ‘मध्यस्थता’ करने की कोशिश करता रहा है। अब जबकि भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह अपनी मुख्यधारा में शामिल कर लिया है, तब अमेरिका जैसे ताकतवर देश को पाकिस्तान की ज़रूरत और भी बढ़ गई है। ऐसे में संकट के समय अमेरिका पाकिस्तान की मदद क्यों न करे?

समापन

भारत के नीति-निर्माताओं को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अमेरिका की ‘भारत नीति’ केवल ट्रम्प या ओबामा जैसे नेताओं की सोच से तय नहीं होती। असल में उसका मूल समीकरण यही है—ईसाई धर्म के विस्तार का समर्थन करना और इसके लिए भारत की राष्ट्रीय पहचान यानी सनातन धर्म के विरोधियों को आगे बढ़ाना।

इसलिए अब समय आ गया है कि भारत भी अपनी विदेश नीति तय करते वक्त अपनी राष्ट्रीयता—जो कि सनातन संस्कृति और धर्म पर आधारित है—को नीति का आधार बनाए। भारत की ‘अमेरिका नीति’ भी अब इसी दृष्टिकोण से बननी चाहिए और उसी भावना से लागू होनी चाहिए।

संदर्भ सूची 

[1] Wikipedia, Tariffs in the second Trump administration; https://en.wikipedia.org/wiki/Tariffs_in_the_second_Trump_administration

[2] Dainik Bhaskar, आतंक फैलाने वाले पाकिस्तान को UNSC में बड़ी जिम्मेदारी:तालिबान प्रतिबंध कमेटी का अध्यक्ष बना, आतंक रोकने वाली समिति का उपाध्यक्ष भी बना; https://www.bhaskar.com/international/news/pakistan-unsc-taliban-sanctions-committee-2025-update-russia-135166862.html

[3] Malhotra, Rajiv, and Aravindan Neelakandan. Breaking India: Western Interventions in Dravidian and Dalit Faultlines. Amaryllis (Manjul Publishing House), 2011; (Hindi version, p. 243) .

[4] ibid, (Hindi version, p. 243)

[5] Ibid, (Hindi version, p. 259)

[6] Ibid, (Hindi version, p. 261)

[7] Ibid, (Hindi version, p. 265)

[8] Ibid (Hindi version, p. 269)

[9] Ibid, (Hindi version, p. 296)

[10] Ibid (Hindi version, p. 296), and Wikipedia, International Religious Freedom Act of 1998; https://en.wikipedia.org/wiki/International_Religious_Freedom_Act_of_1998 

[11] ibid, (Hindi version, p. 315)

[12] ibid, (Hindi version, p. 317)

[13] JK Now, माउंटबेटन नहीं चाहते थे जम्मू कश्मीर का भारत के साथ अधिमिलन, जानिए माउंटबेटन और महाराजा हरि सिंह का आपसी टकराव की पूरी कहानी; https://www.jammukashmirnow.com/hindi/Encyc/2019/6/19/why-Mountbatten-didn-t-want-accession-of-J-K-with-India-A-detailed-Answer-.html

Manoj Jwala
Manoj Jwala
Journalist, writer, and researcher-educator actively engaged in public awakening through ongoing investigation and publication on the global and colonial religious-political-intellectual conspiracies against the Indian nation, Dharma, and Dharmic society. Published Books: Mahatma Ki Beti aur Siyasat – A novel exploring the political condition and direction of India. Safed Aatank: Hume Se Maino Tak – A counter-narrative book exposing the myth of "saffron terror." SecularTITIS: Gujarat Se Dilli Tak – A satirical novel dissecting the farce of Indian secularism. The Story of the Gurukul Experiment – A critique of Macaulay’s English education system. Modern Apparatus of the Deva-Asura War – A study on Western intellectual subversion against India. Forthcoming Books: Bharat Punarutthaan: Ek Daivīya Abhiyan – On India’s civilizational resurgence. Majhab Hi Sikhata Hai Vair Karna – A critical exploration of doctrinal hatred. Dharma Under Siege by Religion and Majhab – On the targeting of Dharma. British Visha-Kanya and the Ramkalis of Sindhu Shores – A serial narrative on the tragedy of Partition, Hindu persecution, and the rationale for the CAA law.
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