हिंदू समाज में ‘गुमराह बेवकूफ़ों’ का उदय

खुद को उदारवादी, बुद्धिजीवी मानने वाले हिन्दू कैसे जाने-अनजाने कट्टरपंथी गिरोहों के चंगुल में फंस कर उनके मोहरे बन जाते हैं, पता तक नहीं चलता। फिर वे ऐसी विचारधाराओं और कृत्यों का समर्थन शुरू कर देते हैं, जिससे उनकी अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक जड़े कमजोर होनी शुरू हो जाती है।
  • ‘गुमराह बेवकूफ़’ ऐसे लोगों को कहते है, जो अनजाने में ऐसे कार्यों का समर्थन करने लगते हैं, जो उनकी अपनी मान्यताओं के ठीक उऐसा ही कुछ भारत में भी हो रहा है। यहां हिंदू धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी अनजाने में उल्टी विचारधाराओं का समर्थन करते हैं, जो उनकी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को उखाड़ने की साजिशें करती हैं।
  • यह अवधारणा भारत से बाहर भी है, जहां पत्रकार और बुद्धिजीवी दमनकारी सरकारों का समर्थन करते हैं और जनता को गुमराह करते हैं।
  • ‘गुमराह बेवकूफ़’ जिन चीजों का समर्थन करते है, उसके बारे में आम तौर पर वे न्यूनतम जानकारी भी नहीं रखते है। ऐसे में, वे कथित और स्वघोषित करिश्माई नेताओं के चंगुल में फंस जाते हैं।
  • ऐसे शोषण से बचने के लिए आलोचनात्मक सोच और संदेह करने की जरूरत होती है।

गुमराह बेवकूफ़ ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो बिना सही जानकारी के, किसी ऐसे राजनीतिक एजेंडे का समर्थन या प्रचार करता है, जो अंततः अपने ही हितों के साथ धोखा करता है। यह शब्द सोवियत साम्यवाद के दौर में अस्तित्व में आया था और इसे विशेष रूप से उन पश्चिमी समर्थकों के लिए गढ़ा गया था, जो अनजाने में सोवियत सरकार और विचारधारा का समर्थन कर रहे थे, जबकि वह विचारधारा उनके अपने लोकतांत्रिक और उदारवादी मूल्यों के विपरीत थी। इनमें पश्चिमी पत्रकार और बुद्धिजीवी भी शामिल थे, जिन्हें यह भ्रम था कि वे सही काम कर रहे हैं, लेकिन असल में उनका समर्थन कट्टरपंथी और दमनकारी ताकतों को ही लाभ पहुँचा रहा था। बाद में, इस शब्द का उपयोग उन लोगों के लिए भी होने लगा, जो बिना किसी तथ्यात्मक जानकारी के, भावनाओं में बहकर किसी भी विचारधारा या संगठन का समर्थन करने लगते हैं।

पिछले दस वर्षों में भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान ने एक नई दिशा और तीव्रता प्राप्त की है, जो हिंदुत्व-केंद्रित सामाजिक-राजनीतिक तस्वीर के उदय के साथ जुड़ी हुई है। इसके साथ ही, गुमराह बेवकूफ़ लोगों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, खासकर उन हिंदू बुद्धिजीवियों के बीच, जो स्वयं को ‘धर्मनिरपेक्ष’ और प्रगतिशील मानते हैं। विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर हम जैसे प्रगतिशील मुस्लिम, ट्रिपल तलाक, एफजीएम (महिला जननांग विकृति), और बुर्का जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने या उनमें सुधार की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, ऐसे ‘गुमराह बेवकूफ़’ वामपंथी हिंदू हमारी आलोचना करने में लगे रहते हैं। वे हम पर ‘इस्लामोफोबिया’ का आरोप लगाते हैं, जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड ने आलोचना और विचार-विमर्श को दबाने के उद्देश्य से गढ़ा था। इस प्रकार वे वास्तविक सुधारों के प्रयासों को बाधित करने का काम करते हैं, और अप्रत्यक्ष रूप से कट्टरपंथी ताकतों को ही प्रोत्साहन देते हैं।

तानाशाही के अंधसमर्थक

 गुमराह बेवकूफ़ केवल भारतीय या हिंदू बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं हैं। कई पश्चिमी पत्रकारों और विचारकों ने भी इतिहास में दमनकारी शासन और तानाशाहों का समर्थन किया है। इसका परिणाम यह हुआ कि राजनेता और जनता इन दमनकारी सरकारों की क्रूरता को नजरअंदाज कर, उसे एक कल्पना मात्र मानने लगे, जबकि बर्गन-बेल्सन जैसे भयंकर यातना शिविरों की सच्चाई से मुँह मोड़ लिया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय की एक भयानक वास्तविकता थी। पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार वाल्टर डुरेंटी इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने स्टालिन के दिखावटी मुकदमों का समर्थन किया और लाखों लोगों की जान लेने वाले यूक्रेनी अकाल को सिरे से नकार दिया। ऐसे ‘गुमराह बेवकूफ़’ अनजाने में या कभी-कभी जानबूझकर क्रूर तानाशाहों और उनकी विनाशकारी नीतियों के लिए नैतिक आवरण तैयार करते हैं, जिससे सत्य की आवाज़ दब जाती है और निर्दोष लोगों की पीड़ा अनदेखी रह जाती है।[1]1932 में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने भी यूएसएसआर में अकाल की खबरों को ‘बकवास’ बताकर खारिज कर दिया[2], जबकि लाखों लोग भूख से मर रहे थे। कुछ पश्चिमी वामपंथी वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज के दमनकारी शासन की प्रशंसा कर रहे थे। शावेज को ‘प्रगतिशील और नव-उदारवाद को खारिज करने वाली सरकार” बता रहे थे[3], जबकि देश गंभीर आर्थिक और मानवीय संकटों का सामना कर रहा था। ऐसा ही हो ची मिन्ह, माओत्से तुंग और पोल पॉट के समर्थकों ने भी किया था। एक तरफ, नरसंहारों के दौर जारी था, दूसरी तरफ ये लोग उन सरकारों को ‘प्रगतिशील’ बता रहे थे।

आज के दौर के गुमराह बेवकूफ़ों की सूची में पूर्व एनबीए स्टार डेनिस रोडमैन जैसे व्यक्ति शामिल हैं, जिन्होंने उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन[4] के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और इस सरकार के मानवाधिकार हनन की अनदेखी की। विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज भी हैं, जिन्होंने सही संदर्भ के बिना संवेदनशील जानकारी[5] फैलाई। उनके कार्यों की प्रशंसा और आलोचना की गई है, लेकिन कुछ लोग उन्हें भू-राजनीतिक साजिश के मोहरे के रूप में भी देखते हैं। एडवर्ड स्नोडेन एक और उदाहरण हैं, जिन्होंने व्यापक सरकारी निगरानी कार्यक्रमों का खुलासा करने वाले सीक्रेट दस्तावेज़ों को लीक किया[6]

इसी तरह जब रिहाना[7], मिया खलीफा[8] और जॉन क्यूसैक[9] भारत में किसान प्रदर्शनों या सीएए विरोधी शाहीन बाग़ प्रदर्शनों के पक्ष में आवाज़ उठाते हैं या ट्वीट करते हैं, तो वे असल में अत्याचार को बौद्धिक कवच देने का अपराध कर रहे होते हैं।

कई मैग्सेसे और पुलित्जर पुरस्कार विजेता लगातार भारत विरोधी रुख अपना रहे हैं। भारत को बदनाम करने के लिए सक्रिय रूप से काम करते हैं। जार्ज सोरोस वित्तपोषित ओपन सोसाइटी[10] से होने वाली संभावित फंडिंग के बारे में संदेह पैदा करते हैं। सोरोस अपने पैसे और एजेंडाधारियों के सहारे भारत को अस्थिर करने पर आमादा हैं। और ऐसे लोग आदतन तब एकजुट हो जाते हैं जब उनमें से किसी पर गंभीर अपराध का आरोप लगाया जाता है। जैसे उमर खालिद के मामले में हुआ, जो खुद को नास्तिक कहता है लेकिन दूसरे देशों के कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतों से समर्थन भी लेता है[11]

‘काम के काफिर’: कट्टरपंथी इस्लाम के हिंदू समर्थक

‘गुमराह बेवकूफ़’ आम तौर पर घटनाओं, विचारों, या कार्यों के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हुए भी उनका समर्थन करते हैं। उनका यह भोलापन उन्हें प्रभावशाली नेताओं और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के लिए आसान निशाना बना देता है। विडंबना यह है कि ऐसे लोग कभी-कभी ऊँचे पदों पर भी होते हैं, और वे इन पदों का इस्तेमाल किसी विशेष “कॉज” का समर्थन करने के लिए करते हैं, चाहे वह कितना भी गलत क्यों न हो। इसका एक उदाहरण ‘इरफ़ान हबीब स्कूल ऑफ़ हिस्ट्री’ की प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर हैं[12], जिन्होंने तुर्क-मुगलों के भारत पर आक्रमण को जायज ठहराने की कोशिश की, यह दिखाने का प्रयास किया कि यह एक “सभ्यता परिवर्तन” था, न कि एक हिंसक आक्रमण। ऐसे ही दृष्टिकोणों ने ऐतिहासिक सच्चाइयों को तोड़ा-मरोड़ा और एक विकृत विमर्श को बढ़ावा दिया, जिससे पीढ़ियों तक भ्रम की स्थिति बनी रही।

इन ताकतों ने भारत की स्वतंत्रता के बाद भी भारतीयों को मानसिक रूप से अपना उपनिवेश बनाए रखने का प्रयास जारी रखा। इसके परिणामस्वरूप, नई पीढ़ी के कई हिंदू अपनी संस्कृति और जड़ों से कट गए, जबकि धर्मांतरित मुसलमानों के वंशज मुस्लिम बहुल क्षेत्रों, जैसे कश्मीर, हैदराबाद, और अलीगढ़ के साथ-साथ वामपंथी शैक्षणिक संस्थानों में रहकर भारत को तोड़ने की साजिशें रचते रहे। इन संस्थानों में मौजूद हिंदू धर्म के ‘गुमराह मूर्खों’ ने औपनिवेशिक मानसिकता को और भी गहराई से जड़ें जमाने में मदद की।

जैसे-जैसे इस्लामिक ताकतों और वामपंथियों के बीच एकजुटता बढ़ती गई, वैसे-वैसे इन ‘गुमराह मूर्खों’ ने आतंकवाद, कट्टरपंथ और मुस्लिम समाज में व्याप्त महिला-पुरुष अधिकारों के हनन जैसे मुद्दों पर भी बौद्धिक समर्थन देना शुरू कर दिया। यह गठजोड़ न केवल भारतीय समाज की एकता और अखंडता के लिए चुनौती बना, बल्कि इन बुद्धिजीवियों की भूमिका ने कट्टरपंथी तत्वों को बौद्धिक कवच प्रदान कर उनके दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह ‘गुमराह बेवकूफ़ी’ अब एक वायरल बीमारी का रूप ले चुकी है, जिसने राजनीतिक आंदोलनों से लेकर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं तक को अपनी चपेट में ले लिया है। डिजिटल युग में, इस खतरनाक भोलेपन का हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है। इसका अक्सर उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है, जो अनजाने में अपने ही जनसांख्यिकीय या आर्थिक हितों के खिलाफ जाकर हानिकारक सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों का समर्थन कर बैठते हैं।

भारत में राजनीतिक विमर्श के संदर्भ में, इस शब्द का प्रयोग अब वामपंथी और उदारवादी व्यक्तियों के लिए होने लगा है, जो दक्षिणपंथी (Right-wing) विचारधारा की बढ़ती आवाज का विरोध करते हैं। ऐसे लोग राजनीतिक दलों द्वारा अपनाए गए एकतरफा धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टिकरण को जायज़ ठहराते हैं। हम जैसे सुधारवादी मुसलमान इन्हें ‘गुमराह बेवकूफ़’ मानते हैं, क्योंकि हम उनकी भोली-भाली सोच को पहचानते हैं, जो वास्तव में किसी विडंबना से कम नहीं। उनके कृत्यों ने, विडंबना यह है, मुसलमानों को ही सबसे अधिक कट्टरता और ईशनिंदा का शिकार बनाया है, अन्य समुदायों की तुलना में।

बोस्टन विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रिचर्ड लैंड्स ने अपनी रचना “फ्रॉम यूजफुल इडियट टू यूजफुल इनफिडेल: मेडिटेशन्स ऑन द फॉली ऑफ 21सेंचुरी इंटेलेक्चुअल्स”[13] में इस शब्द का इस्तेमाल किया है। उदारहरण के लिए, ऐसे उदार बुद्धिजिवी, जो लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और समृद्धि का फ़ायदा लेते हुए, लोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ ही चलने वाले उग्र और हिंसक आंदोलनों (नक्सलवाद) को नैतिक और भौतिक समर्थन देते है।

लैंड्स का तर्क है कि ऐसे लोग आत्म-आलोचना में उलझे रहते हैं, और यह एक ऐसी कमजोरी है जिसका फायदा कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें आधुनिकता को गलत साबित करने के लिए उठाती हैं। उनका मानना है कि इससे मानवाधिकारों के विमर्श में समस्याएं उत्पन्न होती हैं, क्योंकि इससे प्राचीन काल के परपीड़न (दूसरों को कष्ट देना) और आधुनिक काल के दमनकारी मर्दवाद के बीच एक विकृत गठबंधन बनता है।

ऐसे व्यक्तियों के लिए एक और शब्द ‘सिंपलटन’ (सरल व्यक्ति) का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिसे लेनिन ने अपने राजनीतिक विरोधियों का वर्णन करने के लिए गढ़ा था। ये “सरल” लोग आतंक की वास्तविकता को समझने में असमर्थ होते हैं और आम जनता, मजदूरों और किसानों को धोखा देते हैं, जबकि खुद को ऐसे लोगों से जोड़ लेते हैं जो आतंक और उत्पीड़न के दोषी हैं।

आज के समय में, कुछ बुद्धिजीवी अपनी ईमानदारी और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर प्रगतिशील और समतावादी आंदोलनों की जगह कट्टरपंथी इस्लाम की रक्षा में जुटे रहते हैं। इससे मुस्लिम सुधारवादियों के प्रयासों में बड़ी रुकावटें पैदा होती हैं, क्योंकि कट्टरपंथी ताकतों को वैधता और समर्थन मिल जाता है, जो उनके सुधार के काम को कमजोर करता है।

गिल्स केपेल की पुस्तक “जिहाद: द ट्रेल ऑफ़ पॉलिटिकल इस्लाम”[14] इस्लामिक आंदोलनों के विकास और उनके पश्चिमी लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ बदलते संबंधों की गहन व्याख्या करती है। शुरुआती दौर में, इन आंदोलनों ने पश्चिमी विचारों को सिरे से खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि वे पूरी तरह ‘पश्चिमी’ हैं और इस्लामिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन समय के साथ, कई इस्लामवादी दलों और आंदोलनों ने अपनी रणनीति बदल ली और खुद को डेमोक्रेट के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। अब, वे मानवाधिकार और स्वतंत्रता के उन्हीं पश्चिमी सिद्धांतों का हवाला देकर सत्ता के दमन की आलोचना करने लगे हैं, जिन्हें वे कभी खारिज करते थे।

इस बदलाव को कुछ लोगों ने वास्तविक विचारधारात्मक परिवर्तन माना, जबकि कई ने इसे केवल एक पैंतरेबाज़ी समझा, जो आज की कई कम्युनिस्ट पार्टियों की रणनीति से मेल खाती है। कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी, खासकर जब सोवियत संघ अपने चरम पर था, लोकतांत्रिक भाषा का इस्तेमाल कर अपने समर्थकों को भ्रमित करती थीं, ताकि वे बुद्धिजीवियों और लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों का समर्थन हासिल कर सकें। इस रणनीति ने मजदूर आंदोलनों से जुड़े कई ईमानदार लोगों को आकर्षित किया, क्योंकि वे यह मानते थे कि यह आंदोलन उनके हितों का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार, लोकतांत्रिक भाषा का यह दोहरा इस्तेमाल, एक षड्यंत्रकारी रणनीति के रूप में काम आया, जिसका उद्देश्य अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना था।

‘गुमराह बेवकूफ़’ अक्सर यह सोचते हैं कि वे अपने हितों या विचारधाराओं का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में वे केवल मोहरे होते हैं। उन्हें किसी विचारधारा या आंदोलन का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि इसके पीछे एक छिपा हुआ एजेंडा काम करता है, जिसे वे समझ नहीं पाते। ऐसे गुमराह बेवकूफ़ शायद ही कभी अपनी भागीदारी की गहराई को जान पाते हैं। गलत सूचनाएँ और भ्रामक जानकारी उनका शोषण करने के प्रमुख साधन होते हैं।

इन सूचनाओं का उद्देश्य उन्हें भ्रमित कर, अपने एजेंडे की दिशा में मोड़ना होता है। इस प्रकार, ये लोग अनजाने में झूठ का प्रचार करने वाले समर्थक बन जाते हैं और धीरे-धीरे उस झूठ को व्यापक समाज में फैलाते हैं। भारत में, ‘ऑल्टन्यूज़’ वेबसाइट के संस्थापक, संपादक और व्यवस्थापक[15] इसी रणनीति का उपयोग करते हैं। वे अपने आपको ‘फैक्ट-चेकर’ के रूप में प्रस्तुत करते हुए, भ्रामक जानकारी फैलाने का काम करते हैं, ताकि एक विशेष राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ा सकें। यह एक उदाहरण है कि कैसे ‘गुमराह बेवकूफ़ों’ का इस्तेमाल कर सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की कोशिश की जाती है।

भटके हुए मुसाफिर

‘गुमराह बेवकूफ़’ असल में आधुनिक उदारवाद के रास्ते से भटकने का नतीजा हैं। उदारवाद का मूल दर्शन गलत नहीं था। व्यक्तिगत अधिकार, समानता, लोकतंत्र, और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे सिद्धांत किसे आकर्षित नहीं करेंगे? लेकिन आधुनिक उदारवाद अपने इन मूलभूत सिद्धांतों से भटक गया है। इसके अनुयायी अब अनजाने में ही दुनिया के अमीर और प्रभावशाली लोगों के उपकरण बन चुके हैं। वे अति-दक्षिणपंथी इस्लामवादियों का बचाव करते हैं और जटिल राजनीतिक मुद्दों को ‘हम बनाम वे’ में बांटकर आलोचना और विचार-विमर्श को खारिज कर देते हैं।

मार्क्सवाद, साम्यवाद, और वामपंथी विचारधाराओं ने कभी आय असमानता और आर्थिक असुरक्षा जैसे मुद्दों का समाधान देने का वादा किया था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद से लेकर पिछले दशक तक, इन विचारधाराओं ने मीडिया और जनसंचार के माध्यम से गरीबी का महिमामंडन ही किया। विरोधाभास देखिए—जहाँ एक ओर ‘शैंपेन सोशलिस्ट’[16] (तारेक फतेह के शब्दों में ‘शरिया बोल्शेविक’) अपने लंबे अकादमिक करियर, सेमिनारों, टॉक सर्किट और शैंपेन एक्टिविज्म की आड़ में विलासिता भरे जीवन का आनंद लेते रहे, वहीं दूसरी ओर, गरीब तबका उसी गरीबी के चक्रव्यूह में फंसा रहा। यह दोहरा रवैया केवल दिखावटी समर्थन है, जिससे गरीबों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया, और असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का काम ही किया गया।

“गुमराह बेवकूफों” की 6 पहचान

जेम्स ब्लडवर्थ का लेख ‘Six Types of Useful Idiots’[17]  उन व्यक्तियों की गहराई से पड़ताल करता है, जो जानबूझकर या अनजाने में दमनकारी शासन या विचारधारा का समर्थन करते हैं। ब्लडवर्थ ने इन ‘गुमराह बेवकूफ़ों’ को छह श्रेणियों में विभाजित किया है, जिनमें से प्रत्येक श्रेणी उन विभिन्न मानसिकताओं और व्यवहारों को दर्शाती है, जो इन लोगों को सत्तावादी ताकतों का समर्थक बनाती हैं।

  1. सेलिब्रिटी समर्थक – इस प्रकार के ‘गुमराह बेवकूफ़’ वे लोग होते हैं, जो दमनकारी शासन या नेताओं की कथित उपलब्धियों की प्रशंसा में लीन रहते हैं। ये अक्सर प्रायोजित यात्राओं पर इन देशों का दौरा करते हैं और वहाँ के मानवाधिकार हनन और राजनीतिक दमन को या तो नजरअंदाज कर देते हैं या फिर उसे कमतर दिखाने की कोशिश करते हैं, जिससे ऐसी सरकारों को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है। भारत के संदर्भ में रिहाना और जॉन क्यूसैक जैसे सेलिब्रिटी इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने बिना पूरी जानकारी के केवल सुर्खियाँ बटोरने के लिए भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की।
  2. वैचारिक सहानुभूति रखने वाले – यह श्रेणी उन ‘गुमराह बेवकूफ़ों’ की है, जो सामाजिक न्याय की इच्छा से प्रेरित होकर चरमपंथी विचारधाराओं या आंदोलनों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। वे क्रांतिकारी संघर्षों को एक रोमांटिक दृष्टिकोण से देखते हैं और दमनकारी शासन को पश्चिमी साम्राज्यवाद या पूंजीवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए एक आवश्यक बुराई मान सकते हैं। ऐसे लोग प्रगतिशील होने का दावा तो करते हैं, लेकिन जब उनके पसंदीदा समूहों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, तो या तो उसे नजरअंदाज कर देते हैं या उसे सही ठहराने का प्रयास करते हैं। भारत में, दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जादवपुर, टीआईएसएस, अशोका विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के कई शिक्षाविद् इस श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा, वामपंथी झुकाव वाले कुछ वार्ताकार भी इसी समूह में आते हैं, जो कश्मीर घाटी जाकर यासीन मलिक जैसे आतंकवादियों से राजनेता बने लोगों से मिलते थे और उनके विचारों के प्रति सहानुभूति दिखाते थे।
  3. सांस्कृतिक सापेक्षवादी – इस प्रकार के ‘गुमराह बेवकूफ़’ यह मानते हैं कि सभी संस्कृतियाँ अपने आप में समान रूप से मान्य हैं और उन्हें पश्चिमी मानकों से परखना अनुचित है। उनका तर्क यह होता है कि ऑनर किलिंग, महिला जननांग विकृति, या बाल विवाह जैसी प्रथाएँ केवल सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए। ऐसे विचारों का परिणाम यह होता है कि ये लोग खतरनाक सामाजिक कुप्रथाओं को भी संस्कृति के नाम पर सही ठहराने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी नारीवादी हिजाब का समर्थन करती हैं या ‘नाइकी’ जैसी कंपनियाँ बुर्किनी पर अपना ब्रांड लोगो लगाकर इसे “सशक्तिकरण” का प्रतीक बताती हैं। विडंबना देखिए कि जहाँ एक ओर ईरान की महिलाएँ जबरन हिजाब पहनने का विरोध कर रही हैं और इसके लिए उन्हें मारा-पीटा या जेल में डाला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ये सापेक्षवादी इसे सांस्कृतिक विविधता का हिस्सा मानकर समर्थन दे रहे हैं।
  4. अमेरिका विरोधी षड्यंत्र सिद्धांतकार – इस श्रेणी के ‘गुमराह बेवकूफ़’ हर वैश्विक समस्या के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराते हैं और मानते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा हस्तक्षेपवाद ही दुनिया की सभी समस्याओं की जड़ हैं। वे इस विचारधारा के प्रति इतने अंधे हो जाते हैं कि अन्य सत्तावादी शासनों द्वारा किए गए अत्याचारों को या तो नजरअंदाज कर देते हैं या उनका बचाव करते हैं। अमेरिका को बलि का बकरा बनाकर, वे इन तानाशाही शासनतंत्रों को हर तरह की जवाबदेही से मुक्त कर देते हैं, जिससे वैश्विक राजनीति की जटिलताओं को एकतरफा दृष्टिकोण से देखना आसान हो जाता है। इस समूह का सबसे प्रसिद्ध चेहरा नोम चोम्स्की हैं, जो लंबे समय से अमेरिका विरोधी षड्यंत्र सिद्धांतों के मुख्य प्रवक्ता बने हुए हैं। उनकी विचारधारा का प्रभाव यह है कि अमेरिका की आलोचना के नाम पर वे अन्य दमनकारी सरकारों के अत्याचारों को अनदेखा करते हैं।
  5. कॉर्पोरेट शिल (पैसा लेकर समर्थन करने वाले) – इस प्रकार के ‘गुमराह बेवकूफ़’ वे लोग होते हैं, जो मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता को दरकिनार कर आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। ये लोग उन उद्योगों की पैरवी करते हैं जो दमनकारी सरकारों के साथ मिलकर बड़े मुनाफे कमाते हैं, भले ही इसका परिणाम श्रम शोषण, पर्यावरण का विनाश, या भ्रष्टाचार के रूप में सामने आए। ये कॉर्पोरेट शिल्स उन नैतिक प्रश्नों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिनका सामना करना चाहिए, और केवल मुनाफे की ओर ध्यान केंद्रित रखते हैं। सत्तावादी सरकारों के साथ आर्थिक संबंध बनाकर, वे अनजाने में ही ऐसे दमनकारी शासनों को और मजबूत करने में योगदान देते हैं, जिससे उन देशों में मानवाधिकारों की स्थिति और बदतर हो जाती है।
  6. विरोध के लिए विरोध करने वाले – इस श्रेणी के ‘गुमराह बेवकूफ़’ मुख्यधारा के नैरेटिव को चुनौती देने और पारंपरिक मान्यताओं से असहमति जताने में ही बौद्धिक उत्तेजना का अनुभव करते हैं। वे केवल बौद्धिक संतोष के लिए हर स्थापित विचार का विरोध करते हैं और अक्सर इसके परिणामस्वरूप वे चरमपंथी विचारधाराओं के अनजाने प्रवक्ता बन जाते हैं। उनका यह रवैया चरमपंथ के खिलाफ चल रही लड़ाई को कमजोर कर सकता है। उदाहरण के लिए, क्रिस्टोफर हिचेन्स स्वतंत्र आवाज़ और वैकल्पिक दृष्टिकोणों के समर्थक थे, लेकिन 9/11 के बाद उन्होंने इराक पर अमेरिका के आक्रमण का समर्थन किया, यह मानते हुए कि वहाँ ‘वीपन ऑफ़ मास डिस्ट्रक्शन’ मौजूद हैं—जो बाद में पूरी तरह गलत साबित हुआ। उनकी इस स्थिति ने उस समय अमेरिकी आक्रमण के नैरेटिव को एक वैधता दी, जिससे वैश्विक स्तर पर आलोचना कमजोर पड़ी।

ब्लडवर्थ का लेख समकालीन समाज में ‘गुमराह मूर्खों’ को उजागर करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। यह लेख दिखाता है कि दमनकारी शासन और चरमपंथी विचारधाराओं का मुकाबला करने के लिए आलोचनात्मक सोच, नैतिकता और बौद्धिकता कितनी आवश्यक हैं। ऐसे व्यक्तियों की रणनीतियों को उजागर करके, वह पाठकों को गलत सूचनाओं से सतर्क रहने और इन भ्रामक विचारों का शिकार न बनने की सलाह देते हैं।

निष्कर्ष
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में बौद्धिकता और विवेक बनाए रखना पहले से कहीं बड़ी चुनौती बन गया है। एआई के आने से गलत सूचनाएँ फैलाने की संभावना बढ़ गई है, जिससे ‘गुमराह बेवकूफ़’ अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों का फायदा उठाने वाले भ्रामक संदेश आसानी से तैयार कर सकते हैं। ऐसे में, ‘गुमराह बेवकूफ़’ बनने से बचने के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल और आलोचनात्मक सोच का विकास करना बेहद जरूरी है। इससे निपटने के लिए, किसी भी जानकारी पर सवाल उठाना, स्रोतों की सत्यता की जांच करना, और विविध दृष्टिकोणों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की सतर्कता हमारी निर्णय-क्षमता को स्वतंत्र बनाती है। सही सूचना से लैस रहना और वायरल खबरों को लेकर हमेशा संदेह की दृष्टि रखना ही भ्रम और भटकाव से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है।
संदर्भ

[1] Walter Duranty: The New York Times Reporter Who Failed To Report Soviet-Triggered Famines – History (historyonthenet.com); https://www.historyonthenet.com/walter-duranty-new-york-times

[2] GEORGE BERNARD SHAW (holodomorsurvivors.ca); https://www.holodomorsurvivors.ca/Harvest%20of%20Despair/GEORGE%20BERNARD%20SHAW.html

[3] Hugo Chavez proves you can lead a progressive, popular government that says no to neo-liberalism | The Independent | The Independent; https://www.independent.co.uk/voices/comment/hugo-chavez-proves-you-can-lead-a-progressive-popular-government-that-says-no-to-neoliberalism-8202738.html

[4] Dennis Rodman and North Korea: A brief guide to the weird, long history – The Washington Post; https://www.washingtonpost.com/news/reliable-source/wp/2018/06/12/a-brief-guide-to-dennis-rodmans-long-weird-history-with-north-korea/

[5] Julian Assange’s mission was to change the world – but at what cost? | CNN; https://www.cnn.com/2024/04/27/europe/julian-assange-profile-intl-cmd/index.html

[6] Edward Snowden: the whistleblower behind the NSA surveillance revelations | The NSA files | The Guardian; https://www.theguardian.com/world/2013/jun/09/edward-snowden-nsa-whistleblower-surveillance

[7] Farmers’ protest: Rihanna tweet angers Indian government (bbc.com); https://www.bbc.com/news/world-asia-india-55914858

[8] Mia Khalifa reiterates support for farmers protest amid criticism | India | Manorama English (onmanorama.com); https://www.onmanorama.com/news/india/2021/02/05/mia-khalifa-reiterates-support-for-farmers-protest-amid-criticism.html

[9] International celebrities show support for India’s protesting farmers – DW – 02/04/2021; https://www.dw.com/en/celebrities-support-indias-farmers/g-56456019

[10] George Soros – Open Society Foundations; https://www.opensocietyfoundations.org/george-soros?gad_source=5

[11] India: Amnesty calls denial of bail to Muslim activist ‘big blow’ | Protests News | Al Jazeera; https://www.aljazeera.com/news/2022/3/25/india-amnesty-calls-denial-of-bail-to-muslim-activist-big-blow

[12] How Romila Thapar and her brand of historiography have dented India’s image globally – Firstpost; https://www.firstpost.com/opinion/how-romila-thapar-and-her-brand-of-historiography-have-dented-indias-image-globally-12054062.html

[13] From Useful Idiot to Useful Infidel: Meditations on the Folly of 21st Century “Intellectuals” | Augean Stables (theaugeanstables.com); https://theaugeanstables.com/2010/06/08/from-useful-idiot-to-useful-infidel-meditations-on-the-folly-of-21st-century-intellectuals/

[14] Review: [Untitled] on JSTOR; https://www.jstor.org/stable/26199556

[15] Home – Alt News; https://www.altnews.in/

[16] Champagne socialist – Wikipedia; https://en.wikipedia.org/wiki/Champagne_socialist

[17] Six types of ‘useful idiot’ – UnHerd; https://unherd.com/2018/06/six-types-useful-idiot/

Arshia Malik
Arshia Malik
Arshia Malik is an influential writer, blogger, and social commentator. She hails from Srinagar and is currently based in Delhi. Her areas of expertise and focus include Muslim women's issues and conflict zones in India, with a particular emphasis on the complex dynamics in Kashmir. She regularly contributes to a number of reputable publications such as The New Indian, Swarajya, News18, and Firstpost. She has earned recognition for her insightful commentary on a range of subjects related to sharia, Muslim women, Islam, and the broader South Asian context.
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US