मालेगांव केस: न्यायालय का निर्णय और ‘भगवा आतंकवाद’ मिथक का अंत

तथाकथित “भगवा आतंकवाद” नैरेटिव का ढहना केवल कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह एक सभ्यतागत चेतावनी भी है। एक दशक से अधिक समय तक निर्दोष हिंदुओं को बदनाम किया गया, उन पर तमाम तरह के अत्याचार ढाए गए और उन पर “आतंकवादी” होने का ठप्पा लगा, उन्हें सरेआम घसीटा गया, और असली अपराधी खुलेआम घूमते रहे।
  •  मालेगाँव केस में एनआईए अदालत का फैसला यह उजागर करता है कि किस तरह झूठे आरोप लगाकर पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने के लिए“भगवा आतंकवाद” का झूठा विमर्श गढ़ा गया।
  • आरोपियों को केवल बरी कर देना पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सार्वजनिक माफीन्यायपूर्ण मुआवज़ा, और इस घटनाक्रम के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई बेहद जरूरी है।
  • उस समय की सरकार ने जाँच एजेंसियों और राष्ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग किया, जबकि असली गुनहगार आज भी नहीं पकड़े गए। इससे यह साफ़ पता चलता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने व बम धमाके में मारे गये लोगों और घायल पीड़ितों को न्याय दिलाने की बजाय राजनीतिक नैरेटिव को प्राथमिकता दी गयी।
  • धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के चुनिंदा उपयोग ने हमेशा हिंदुओं को निशाना बनाया, जबकि दूसरों को उस प्रकार के जाँच-पड़ताल के दायरे से सुरक्षित रखा गया। इस तरह का भेदभाव संविधान द्वारा नागरिकों को गारंटीकृत समानता की आत्मा को खोखला करता है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अर्थ यह कदापि नहीं है कि पूरे हिंदू समाज को बदनाम किया जाये, या आरोपियों पर “आतंकवादी” होने का ठप्पा लगाकर उनके ख़िलाफ़ बाक़ायदा एक मीडिया ट्रायल चलाई जाए।
  • हिंदू धर्म आतंकवाद का बिलकुल उलट है। यह अहिंसा, धर्माचरण और सृष्टि के नैसर्गिक संतुलन के मूल सिद्धांतों पर आधारित है , न कि आतंक या नफ़रत फैलाने की विचारधारा पर।

31 जुलाई 2025 को मुंबई की विशेष NIA अदालत ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। शायद यह कहना ज़्यादा सटीक होगा कि इस फ़ैसले को पूरे देश के लिए आत्ममंथन व  आत्मचिंतन का क्षण बनना चाहिए था। 17 सालों तक चले राजनीतिक तमाशे, मीडिया ट्रायल्स और सरकारी संस्थाओं के खुल्लम खुल्ला दुरुपयोग के बाद, 2008 मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया गया। अदालत को आरोप साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिला।

यह फैसला सिर्फ उन व्यक्तियों को बरी करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने “भगवा आतंकवाद” के पूरे के पूरे विमर्श को भी ध्वस्त कर दिया। यह एक ऐसा मनगढ़ंत विमर्श था, जिसे कुछ स्वार्थी ताक़तों ने जानबूझकर गढ़ा था, ताकि हिंदू धर्म को बदनाम किया जा सके और उसे हिंसा से जोड़कर प्रस्तुत किया जा सके।

लेकिन जिन राजनीतिक इकाइयों ने इस ज़हरीले विमर्श को गढ़ा था, वे आज भी आत्मचिंतन करने की बजाय, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता” जैसे घिसे पिटे जुमलों का सहारा ले रही हैं। अगर इस जुमले का वास्तविकता में कोई अर्थ है, तो फिर क्यों एक पूरे धर्म—सनातन धर्म—पर निशाना साधा गया और धार्मिक प्रोफ़ाइलिंग का सहारा ले उसे बदनाम किया गया? आख़िर क्यों साधुओं और सम्मानित सैन्य अधिकारियों को बिना किसी ठोस सबूत के यातनाएँ दी गयीं, उन्हें सालों तक कैद में रखा गया और वैश्विक स्तर पर अपमानित किया गया?

‘स्टॉप हिंदूद्वेष’ के एक लेख में यह पहले ही उजागर किया जा चुका है कि किस प्रकार से “भगवा आतंकवाद” का नैरेटिव पूरी तरह से एक मनगढ़ंत विमर्श था जिसका उद्देश्य हिंदुओं को बदनाम करना, भगवा आवाज़ों को दबाना और असली आतंकवादियों को बचाना था।[1]
इसलिए, यह लेख भगवा आतंकवाद विमर्श की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दोहराने के बजाय मालेगांव केस के अंतिम कानूनी निष्कर्ष और उससे जुड़े व्यापक सभ्यता-सम्बन्धी मुद्दों पर प्रकाश डालता है। लेख निम्नलिखित पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेगा:

  • किस तरह इस झूठे विमर्श को फैलाने के लिए स्टेट की संस्थाओं का बाक़ायदा इस्तेमाल किया गया,
  • किन-किन राजनीतिक और मीडिया ताकतों की इसमें भूमिका रही,
  • किस प्रकार से आरोपियों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ,
  • और सबसे ज़रूरी, आज के समय में हिंदुओं को ऐसे कौन से कदम उठाने चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस तरह का लक्षित उत्पीड़न उन्हें दोबारा न झेलना पड़े।
मालेगांव 2008: सच्चाई को ताक पर रख कर खेला गया राजनीतिक खेल

29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव के भिक्कू चौक के पास एक बम धमाका हुआ। इस घटना में छह लोगों की मौत हुई और सौ से ज़्यादा लोग घायल हो गए। शुरुआती खुफिया जानकारी, घटनास्थल पर आतंकियों द्वारा अपनाई गयी कार्यप्रणाली और पुराने मामलों के रिकॉर्ड के आधार पर शक सबसे पहले सिमी और अन्य इस्लामिक आतंकी संगठनों पर गया। लेकिन अचानक ही जांच का रुख बदल दिया गया और एजेंसियों ने एक कथित हिंदू टेरर मॉड्यूल पर फोकस करना शुरू कर दिया। इसके बाद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और ले.कर्नल प्रसाद पुरोहित जैसे प्रमुख लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद, पूरे 17 साल तक उन्हें बदनाम किया गया, जेल में रखा गया (बाद में ज़मानत पर छोड़ा गया) और लगातार अपमानित किया गया।

विडंबना यह है कि जिन लोगों ने यह पूरा षड्यंत्र रचा, उनके पास आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत कभी था ही नहीं। और 17 साल बाद अदालत ने इसी बात की पुष्टि की – प्रॉसिक्यूशन के दावों की कोई ठोस बुनियाद ही नहीं थी। जिस कथित “क्रांतिकारी हिंदू टेरर मॉड्यूल” को लेकर इतना शोर मचाया गया, वह महज़ एक वैचारिक कल्पना साबित हुआ।

लेकिन, मुक़दमे की प्रक्रिया के दौरान एक सोची-समझी चाल चली गई — जनचर्चा का पूरा रुख़ बदल दिया गया। हिंदुओं को पीड़ित के बजाय आरोपी के रूप में पेश किया जाने लगा, जबकि लश्कर-ए-तैयबा, इंडियन मुजाहिदीन और सिमी जैसे इस्लामिक आतंकी संगठनों का सीधा संबंध मुंबई 2008, दिल्ली 2005 और हैदराबाद 2007 जैसे कई बड़े हमलों से साफ़ तौर पर जुड़ चुका था।

आज़ादी के शुरुआती दौर से ही भारत के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में हिंदू पहचान के प्रति गहरा पूर्वाग्रह बोया गया। जैसा कि सुषमा स्वराज ने 1996 की विश्वास मत बहस में संसद में कहा था: लुटियंस दिल्ली में किसी भी व्यक्ति को एक  “प्रबुद्ध बुद्धिजीवी” तब तक नहीं माना जा सकता था, जब तक वह अपने भारतीय होने पर शर्मिंदा महसूस न करे, और हिंदू होने पर शर्म से पानी पानी न हो जाये।[2] स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि वे “शिक्षा से ईसाई, संस्कृति और परंपरा से मुसलमान, और जन्म के संयोग से ही हिंदू” हैं[3] हिंदू पहचान के प्रति इस तिरस्कार ने एक ऐसी ज़मीन तैयार की, जिस पर वामपंथी-उदारवादी विशिष्ट वर्ग और छद्म-धर्मनिरपेक्ष ताकतें “हिंदू आतंकवाद” की ज़हरीली अवधारणा आसानी से बो और उगा सकीं। यह कोई आकस्मिक गलतफहमी नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक साज़िश थी, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में पेश करना था ताकि साज़िशकर्ता अपने दलगत और वैचारिक हित साध सकें।

भगवा आतंकवादका झूठ अदालत में ढहा

फैसला सुनाते हुए अदालत ने साफ कहा कि यह तो साबित हो चुका है कि बम धमाका हुआ था, लेकिन अभियोजन (Prosecution) यह साबित करने में नाकाम रहा कि इसके पीछे यही  सात लोग थे[4] एटीएस (Anti-Terrorism Squad) और एनआईए (National Investigation Agency) द्वारा पेश किए गए सबूतों को खारिज करते हुए अदालत ने टिप्पणी की: रिकॉर्ड पर उपलब्ध समस्त सबूतों का गहन मूल्यांकन करने के बाद मेरी स्पष्ट राय है कि अभियोजन ठोस, विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश करने में विफल रहा है। गवाहों की गवाही गंभीर असंगतियों और विरोधाभासों से भरी हुई है। ऐसे विरोधाभास अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता को खत्म कर देते हैं और आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे जाकर दोष साबित करने की कसौटी पर खरे नहीं उतरते[5]

अदालत की यह टिप्पणी यह रेखांकित करती है कि अभियोजन पक्ष ने ज़बरदस्ती कबूलनामे (coerced confessions) का सहारा लिया और कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी की। उदाहरण के लिए धमाके में कथित रूप से इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर रजिस्टर्ड थी, लेकिन सालों से किसी और के पास थी। इसलिए अभियोजन कोई सीधा संबंध साबित नहीं कर पाया। इसके अलावा सब गवाह मुकर गये, और दस्तावेज़ी सबूतों के साथ छेड़छाड़ की बात सामने आई। सबसे अहम बात यह सामने आयी कि अदालत ने माना कि एटीएस ने आरोपियों को हिरासत में रखकर उन्हें प्रताड़ना देकर बयान उगलवाए, जो सीधे-सीधे अभियुक्तों के मौलिक संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है। अदालत की सख़्त पड़ताल के बाद पूरा मुक़दमा ढह गया और “भगवा आतंकवाद” का मनगढ़ंत विमर्श पूरी तरह से बेनक़ाब हो गया।

एक गढ़ा हुआ झूठ

लेखक एम.के. पांडेय ने “सफेद-आतंक: ह्यूम से मैनो तक”[6] में “भगवा आतंकवाद” की गढ़ी हुई अवधारणा को बेहद सटीक रूप से सफेद आतंक कहा है, यानी एक ऐसा आतंकवाद जो दरअसल “सफेद झूठ” पर आधारित था और जिसे सफेदपोश यानी एलीट वर्ग के लोगों – प्रभावशाली नेताओं, नौकरशाहों, और उनके मीडिया व अकादमिक सहयोगियों, ने मिलकर फैलाया। पांडेय विस्तार से बताते हैं कि यह झूठ बड़ी सावधानी से गढ़ा गया। पहले इसके माध्यम से हिंदू प्रतीकों, परंपराओं और राष्ट्रीय भावनाओं को निशाना बनाया गया, और फिर बड़े ही योजनाबद्ध तरीक़े से इस झूठ को सार्वजनिक चर्चा में घोला गया। लेखक आगे बताते हैं कि एक सुनियोजित साज़िश के तहत इस झूठे विमर्श को इतना ज़्यादा बढ़ा चढ़ाकर प्रसारित किया गया कि वह देश के कोने-कोने में पहुँच गया और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक गूँजने लगा।

भगवा आतंकवाद के झूठे विमर्श का पर्दाफाश करने के लिए पांडेय उस कहावत का सहारा लेते हैं कि, “कोई झूठ अगर बार-बार बोला जाए, तो वह सच लगने लगता है”। उनके अनुसार, तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगियों ने इसी तरीके से “भगवा आतंकवाद” के नैरेटिव को आगे बढ़ाया। राजनीतिक हलकों, भाषणों और मीडिया में इसे लगातार दोहराकर उन्होंने एक झूठ को “स्वीकृत सच” में बदल दिया।

पांडेय का तर्क है कि ऐसे झूठ फैलाने वाले, असली आतंकियों को बचाने वाले, या एक पूरे समुदाय को बदनाम करने वाले, सब उतने ही दोषी हैं जितने कि असली आतंकी अगर न्यायपालिका बीच में हस्तक्षेप न करती, तो यह मनगढ़ंत झूठ हिंदू धर्म को हमेशा के लिए कलंकित कर देता। एनआईए अदालत का यह फैसला सिर्फ निर्दोषों को बरी करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने हिंदू सभ्यता को एक ऐसे कलंक से भी मुक्त कर दिया जो एक राजनीतिक षड्यंत्र के अंतर्गत उस पर जबरन थोपा गया था।  

‘भगवा आतंकवादके मिथक की मानवीय कीमत

एनआईए अदालत के फैसले ने भले ही सबूतों की कमी और कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी के आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया हो, लेकिन कोई भी न्यायिक निर्णय उन व्यक्तिगत, मानसिक, पेशेवर और सामाजिक नुक़सानों की भरपाई नहीं कर सकता जो उन्होंने लगभग दो दशकों तक सहे। ये साधारण आरोपी नहीं थे। इनमें सम्मानित सैन्य अधिकारी और साधु-संत शामिल थे, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा में अर्पित कर दिया। इन्हीं में साध्वी प्रज्ञा भी थीं, जिन्होंने अपना जीवन धर्म और राष्ट्र को समर्पित किया, लेकिन उन्हें “आतंकवादी” कहकर बदनाम किया गया। मीडिया ने उन्हें खलनायक की तरह प्रस्तुत किया और राजनीति ने उनके चरित्र को अमानवीय तरीके से कलंकित किया।

साध्वी प्रज्ञा ने अनेक बार सार्वजनिक रूप से बताया है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ कैसा क्रूर व्यवहार हुआ। उन्होंने खुलासा किया कि उन्हें कपड़े उतरवाकर पीटा गया, झूठा कबूलनामा देने के लिए मजबूर किया गया और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के नाम प्रकरण में घसीटने का दबाव डाला गया। यह यातना केवल शारीरिक नहीं थी, बल्कि उनकी आत्मा को तोड़ने और हिंदू धर्म को कलंकित करने की सुनियोजित साज़िश थी।

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, जो मिलिट्री इंटेलिजेंस में तैनात थे और आतंकवादी नेटवर्क में घुसपैठ कर राष्ट्र की सुरक्षा के लिए जोखिम उठा रहे थे, उन्हें नौ साल जेल में रखा गया। उन्हें न्यायिक प्रक्रिया से वंचित किया गया और सेवा से निलंबित कर दिया गया। उनके करियर, सम्मान और पारिवारिक जीवन को अपूरणीय क्षति पहुँची। अन्य आरोपियों ने भी इसी तरह की यातनाएँ और अपमान सहे।

इस अन्याय का असर उनके परिवारों पर भी पड़ा। वे समाज से बहिष्कृत हुए, रोज़गार छिन गया और उन पर “हिंदू आतंकवादी” का ठप्पा लगा दिया गया। आज तक उन्हें न कोई मुआवज़ा मिला, न ही औपचारिक माफी। मानसिक पीड़ा, सामाजिक अलगाव और आर्थिक तबाही का जो दंश उन्होंने झेला, वह पीढ़ियों तक पीछा करेगा।

यह मामला दिखाता है कि विलंबित न्याय अक्सर न्याय से वंचित करना ही नहीं, बल्कि उत्पीड़न का हथियार भी बन सकता है। इस प्रकरण में कानूनी तंत्र का इस्तेमाल उन लोगों को तोड़ने के लिए हुआ जिन्हें सत्ता वैचारिक चुनौती मानती थी। इससे जनता का राज्य संस्थानों पर विश्वास टूटा और भारत की बहुलतावादी छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ठेस पहुँची।

सबसे गंभीर प्रश्न भविष्य को लेकर है। इतनी यातना के बाद क्या कोई अधिकारी फिर आतंकवादी संगठनों में घुसपैठ करने का जोखिम उठाएगा? जब राष्ट्र की रक्षा करना ही आपकी आज़ादी और गरिमा छीन ले, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का बड़ा संकट है।

 न्याय केवल बरी होने से पूरा नहीं होता

“भगवा आतंकवाद” का विमर्श ध्वस्त होना सिर्फ आरोपियों की न्यायिक जीत तक सीमित नहीं है। आरोपियों का बरी होना तो एक शुरुआत है, जिसके आधार पर प्रणालीगत सुधारों की एक मुहिम शुरू होनी चाहिये। जांच एजेंसियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त किया जाना चाहिए और एक ऐसी जवाबदेही व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए जिसके चलते कोई भी नागरिक किसी वैचारिक एजेंडे का शिकार न बन पाये।

जिन लोगों को वर्षों तक गलत तरीके से फँसाया गया, उन्हें जेलों में क़ैद रख उनपर यातनाएँ ढाई गयीं, और जिन्हें सार्वजनिक रूप से बदनाम किया गया, केवल “चुपचाप बरी” होने से उनको न्याय नहीं मिलता। वे इससे कहीं ज़्यादा के हकदार हैं। कम से कम, उस समय की सत्ताधारी सरकार और वे राजनीतिक नेता, जिन्होंने “भगवा आतंकवाद” का झूठा विमर्श गढ़ा, आरोपियों को जान-बूझकर फँसाया और वोट बैंक, तुष्टिकरण व वैचारिक मकसदों के लिए जाँच प्रक्रिया का दुरुपयोग किया — उन्हें सार्वजनिक रूप से माफ़ी तो माँगनी ही चाहिए।

सालों की छिनी हुई आज़ादी, बर्बाद करियर और कलंकित हुई प्रतिष्ठा के लिए पर्याप्त मुआवज़ा देना कोई दया का काम नहीं, बल्कि न्याय के सिद्धांतों के तहत न्यूनतम ज़िम्मेदारी है। जिन लोगों ने झूठे मुकदमे झेले हैं, वे उन व्यक्तियों और मीडिया संस्थानों पर मानहानि का मुकदमा भी करें, जिन्होंने अदालत का फैसला आने से पहले ही उन्हें “आतंकवादी” कहकर बदनाम किया। साथ ही, इस पूरे मामले की पुनः जांच हो और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध सख़्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

ऐसे कदम न सिर्फ निर्दोषों की गरिमा बहाल करेंगे, बल्कि यह साफ़ संदेश भी देंगे कि कोई भी सरकार, एजेंसी या मीडिया इकाई राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों को अपने संकीर्ण राजनीतिक या सांप्रदायिक हितों के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं कर सकती। और यदि वह ऐसा करती है, तो उसे उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सच्चे न्याय की प्रक्रिया तब तक पूरी नहीं होती, जब तक अन्याय के घाव पूरी तरह से भर न जायें, और उस व्यवस्था की जवाबदेही न सुनिश्चित की जाये, जिसने इस अन्याय को जन्म दिया।

 जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धर्म के ख़िलाफ़ हथियार बन जाए

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार निरंकुश (absolute) नहीं है। इसके साथ कुछ युक्तिसंगत प्रतिबंध भी जुड़े हैं—जैसे राष्ट्र की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, अपराध के लिए उकसाना और मानहानि से संबंधित:

उपखंड (1) के खंड (क) में निहित कुछ भी, भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के हित में, या न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिए उकसावे के संबंध में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने वाले किसी वर्तमान विधि के प्रवर्तन या किसी विधि के निर्माण को प्रभावित नहीं करेगा।” — भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(2)

लेकिन जब मीडिया सहित राज्य की अन्य संस्थाएँ “हिंदू आतंकवाद” या “भगवा आतंकवाद” जैसा झूठा विमर्श गढ़ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने लगें, तो संविधान की बुनियादी संरचना ही गहरे संकट में पड़ जाती है। मालेगांव केस और उससे जुड़े अन्य मामलों में पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम किया गया, और साध्वी प्रज्ञा जैसे व्यक्तियों पर लक्षित हमले किए गए, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया, और यहां तक कि उनके ख़िलाफ़   Hate Speech तक का प्रचार-प्रसार किया गया।

ऐसी परिस्थितियों में न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों की सर्वोच्च संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए थी। माननीय सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक सक्रियता या स्वप्रेरणा के माध्यम से हस्तक्षेप करना चाहिए था, ताकि सरकार और उसके अधिकारी हिंदू धर्म पर अपमानजनक टिप्पणियाँ न करें और “हिंदू आतंक” जैसे निराधार शब्दों का प्रयोग न हो, विशेषकर तब जब मामला अभी न्यायालय के विचाराधीन था। अदालत यह सुनिश्चित कर सकती थी कि कोई भी राज्य संस्था धर्म को आतंकवाद से न जोड़े और हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाए।

इसी तरह, जांच एजेंसियों को सख़्त निर्देश दिए जाने चाहिए थे कि वे मुक़दमे की निष्पक्षता को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक बयान न दें। मीडिया को भी “मीडिया ट्रायल” करने से रोका जाना चाहिए था, जो निर्दोष माने जाने की धारणा जैसे आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है। यदि समय पर न्यायिक हस्तक्षेप हुआ होता, तो इस झूठे विमर्श से हुआ नुकसान काफी हद तक टल सकता था। इसके अभाव में यह नैरेटिव पूरे देश और दुनिया में फैल गया, जिससे केवल व्यक्तियों ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा भी गहरी आहत हुई।

चुनिंदा सेक्युलरिज़्म: हिंदुओं के ख़िलाफ़ एक हथियार

भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार के लिए बनाया गया था, जिसे “सर्व धर्म समभाव” कहा जाता है। लेकिन व्यवहार में यह अक्सर चुनिंदा राजनीति का औज़ार बनकर रह जाता है, और सबसे अधिक निशाना हिंदू समाज ही बनता है। “भगवा आतंकवाद” का नैरेटिव इसी प्रवृत्ति का ताज़ा उदाहरण है, जो मालेगांव मामले में अदालत के फैसले के साथ पूरी तरह ढह गया। इस झूठे विमर्श ने सालों तक हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं को कलंकित किया।

कई राजनेताओं, स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं और कुछ मीडिया संस्थानों ने बिना सबूत पूरे समुदाय पर “हिंदू आतंकवाद” जैसे ठप्पे लगाए। यह जानते हुए भी कि मामला अदालत में लंबित था, उन्होंने संतों, सैनिकों और हिंदू प्रतीकों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन जब अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया, तो वही लोग अचानक अपने पुराने राग पर लौट आए और कहना शुरू किया कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।” सवाल यह है कि अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है, तो मालेगांव जैसी घटना को इतनी आसानी से “हिंदू आतंकवाद” क्यों कहा गया? यह धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक दुरुपयोग था—एक सुनियोजित चाल, जिसके पीछे वोट बैंक की राजनीति और हिंदू सभ्यता को कमजोर करने की प्रवृत्ति छिपी थी।

विडंबना यह है कि जब आतंकवाद किसी अन्य धर्म के नाम पर होता है, तो नेता और मीडिया जनता से संयम बरतने की अपील करते हैं और धर्म को अलग रखने की बात करते हैं। लेकिन यदि किसी घटना का आरोप किसी हिंदू पर लगे, तो अचानक सारी संवेदनशीलता गायब हो जाती है और पूरे हिंदू समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

एनआईए अदालत का फैसला इस दोहरे मापदंड को उजागर करता है। फैसले के बाद छाई चुप्पी पहले लगाए गए तीखे आरोपों के ठीक विपरीत है। यह दिखाता है कि यह तथाकथित सेक्युलरिज़्म सौहार्द के लिए नहीं, बल्कि हिंदुओं को बदनाम करने और दूसरों को सामूहिक दोष से बचाने का औज़ार है।

हिंदू और आतंकवाद: एक सभ्यतागत विरोधाभास

यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हिंदू समुदाय और आतंकवाद स्वभावतः एक-दूसरे के विपरीत हैं। सनातन धर्म में न तो काफ़िर जैसी कोई संकल्पना है, और न ही अविश्वास के लिए कोई दंड निर्धारित है। हिंदू धर्म में धर्मांतरण को लेकर न तो कोई धार्मिक आदेश है और न ही यह कोई धार्मिक कर्तव्य है। मोक्ष का मार्ग सभी के लिए खुला है, चाहे वे किसी भी आस्था से जुड़े हों। अब्राहमिक धर्मों के विपरीत, हिंदू धर्म:

  • सत्य पर किसी एकाधिकार का दावा नहीं करता,
  • विविध दार्शनिक परंपराओं (द्वैत, अद्वैत, नास्तिक मत) को स्वीकार करता है, और
  • यहाँ तक कि नास्तिकता को भी एक वैध बौद्धिक साधना मानता है।

तो एक ऐसी सभ्यता, जो सभी आध्यात्मिक मार्गों का सम्मान करती है, आतंकवाद से कैसे जोड़ी जा सकती है? हिंदू न तो अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपते हैं, न ही निंदा करने वालों को पत्थर मारते हैं, न ही apostates यानी धर्मत्याग करने वालों का सिर कलम करते हैं, और न ही फ़तवे जारी करते हैं।

हिंदू धर्म में गहराई से निहित अहिंसावसुधैव कुटुंबकम् और धर्म के मूल सिद्धांत धार्मिक वर्चस्व के नाम पर की जाने वाली हिंसा के हर रूप का खंडन करते हैं। इसलिए तथाकथित भगवा आतंकवाद का विमर्श न केवल एक झूठ था, बल्कि पूरे हिंदू  धर्म और उसकी सभ्यता को बदनाम करने का एक सोचा-समझा, और सुनियोजित प्रयास था।

धर्म की रक्षा का दायित्व

यह समझना बहुत आवश्यक है कि हिंदू धर्म का स्वरूप आतंकवाद से एकदम विपरीत है। आतंकवाद निर्दोषों को भयभीत करने के लिए अंधाधुंध हिंसा करता है, जबकि धर्म का उद्देश्य सृष्टि में नैतिक संतुलन, न्याय और कर्तव्य का पालन है। हिंदू दर्शन का परम लक्ष्य शांति, करुणा और अहिंसा है। फिर भी धर्मग्रंथों, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता, में यह स्पष्ट कहा गया है कि जब धर्म पर आघात हो और निर्दोषों पर अत्याचार किया जाए, तब धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करना अनिवार्य है।

हमारे शास्त्र कहते हैं: “धर्मो रक्षति रक्षितः,”[7] अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसी की रक्षा करता है। भारतीय इतिहास में यह सिद्धांत बार-बार दिखाई देता है। चाहे रामायण में राम और रावण का संघर्ष हो या महाभारत में पांडवों और कौरवों का युद्ध, हर जगह वास्तविक लड़ाई धर्म और अधर्म के बीच रही है। इन प्रसंगों से यह शिक्षा मिलती है कि धर्म की रक्षा करना प्रत्येक हिंदू का सर्वोच्च कर्तव्य है।

आज “भगवा आतंकवाद” जैसे मिथ्या विमर्श हिंदू धर्म की आत्मा को कलंकित करने का प्रयास करते हैं। केवल निजी स्तर पर इन झूठों को नकारना पर्याप्त नहीं है। मौन रहना भी अधर्म का समर्थन करने के बराबर है। इसलिए सामूहिक और वैधानिक रूप से इन आक्रमणों का प्रतिरोध करना आवश्यक है। क्षत्रिय का मूल धर्म ही है धर्म की रक्षा, और यही भाव हर हिंदू में जागृत होना चाहिए।

हमारे ग्रंथ यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिंसा कभी पहला विकल्प नहीं होती। भगवान राम ने रावण से पहले शांति वार्ता का प्रयास किया, और भगवान कृष्ण ने युद्ध रोकने के लिए कौरवों के पास दूत बनकर गए। लेकिन जब सभी उपाय विफल हो गए, तब धर्मयुद्ध को अंतिम उपाय के रूप में स्वीकार किया गया। यही गीता का सार है: अधर्म के सामने कायरता अहिंसा नहीं, बल्कि दोष है।

इसलिए यह भेद समझना आवश्यक है कि आतंकवाद निर्दोषों की हत्या करता है, जबकि धर्मयुद्ध में न्याय, संयम और नैतिकता होती है। हिंदू परंपरा में अहिंसा का अर्थ है — कभी आक्रमण की शुरुआत न करना, परंतु जब धर्म संकट में हो, तो उसकी रक्षा के लिए पीछे न हटना। यही सनातन सत्य है, और यही हमारी सभ्यता की रक्षा का शाश्वत आधार।

गढ़े हुए नैरेटिव्स के विरुद्ध धर्म की रक्षा

जब राज्य की संस्थाओं का प्रयोग सत्य की खोज करने के बजाय विमर्श गढ़ने के लिए किया जाने लगे, तो उसका परिणाम अत्यंत विनाशकारी होता है। एटीएस, सीबीआई और एनआईए जैसी संस्थाओं का दायित्व है कि वे निष्पक्ष और तटस्थ होकर अपना कार्य करें। किंतु दुर्भाग्यवश, ऐसा कई बार देखा गया कि ये संस्थाएँ राजनीतिक इकाइयों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गयीं। विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को “पिंजरे का तोता” कहा था,[8] इस बात को रेखांकित करते हुए कि यह संस्था राजनीतिक दबाव में आसानी से झुक जाती है। दुख की बात तो यह है कि इतने वर्षों बाद भी कोई ठोस संस्थागत सुधार नहीं किए गए, जिसके कारण भविष्य में भी “भगवा आतंकवाद” जैसे मनगढ़ंत मिथक बनाए जा सकते हैं, जिससे निर्दोष नागरिकों पर निशाना साधा जा सकता है।

ऐसे अन्याय को दोबारा होने से रोकने के लिए हिंदुओं को एकजुट होकर, व कानूनी सीमाओं के भीतर रहते हुए, अपने धर्म पर होने वाले हमलों का प्रतिरोध करना होगा। अधिवक्ता जे. साई दीपक ने सही कहा है:गीता का प्रयोग अहिंसावाद सिखाने के लिए मत करोगीता का प्रयोग क्षत्रिय धर्म सिखाने के लिए करो..[9]

जब हिंदू समाज अपने धर्म की रक्षा के प्रति सजगता और संकल्प प्रदर्शित करेगा, तब कोई भी सत्ता, चाहे उसका वैचारिक झुकाव कुछ भी हो, अथवा कोई भी पक्षपाती जांच एजेंसी या मीडिया समूह, हिंदू धर्म को बदनाम करने या उसे लेकर झूठे नैरेटिव गढ़ने का दुस्साहस करने से पहले सौ बार सोचेगा।

कुछ हद तक वैधानिक प्रतिरोध (lawful deterrence) अनिवार्य है।[10] जो लोग हिंदू धर्म को बदनाम करने का प्रयास करते हैं — चाहे वे व्यक्ति हों, सरकारें हों, या राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया — उन्हें यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि हिंदू समाज इस प्रोपेगंडा का एकजुट होकर, और दृढ़ संकल्प के साथ वैधानिक तौर पर प्रतिरोध करेगा। यह विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंदू धर्म का मूल स्वरूप सार्वभौमिक और करुणामय सिद्धांतों पर आधारित है, जैसे:

  • वसुधैव कुटुम्बकम् — सम्पूर्ण विश्व ही एक परिवार है।
  • सर्वे भवन्तु सुखिनः — सब सुखी हों।
  • सर्वे सन्तु निरामयाः — सब निरोगी हों।
  • सर्वे भद्राणि पश्यन्तु — सब मंगल देखें।
  • मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् — कोई भी दुःख का भागी न बने।[11]

ये शाश्वत मूल्य स्वयं सिद्ध करते हैं कि आतंकवाद और हिंदू धर्म का आपस में कोई मेल नहीं है। किंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि इन मूल्यों का अर्थ यह कदापि नहीं है कि जब धर्म पर कुटिल आक्रमण या आघात हो, तो हम मौन या निष्क्रिय बने रहें।

निष्कर्ष

तथाकथित “भगवा आतंकवाद” का ढहना केवल अदालत के फैसले से जुड़ा प्रसंग नहीं है, बल्कि यह पूरे राष्ट्र के लिए एक गहरी सीख है। वर्षों तक हिंदू समाज को कलंकित किया गया, उसके प्रतीकों को अपमानित किया गया और संतों से लेकर सैनिकों तक को बिना प्रमाण के लांछित किया गया। निर्दोषों की रिहाई केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की विजय है। यह हमें स्मरण कराती है कि असत्य चाहे जितना लंबा टिके, अंततः पराजित होता है।

यह प्रकरण दिखाता है कि राजनीतिक पक्षपात, विचारधारात्मक मीडिया और चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता मिलकर कैसे झूठा विमर्श गढ़ सकते हैं। इसका नुकसान केवल अभियुक्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर चोट करता है और विश्व पटल पर सनातन धर्म की छवि को विकृत करता है। इसलिए यह स्पष्ट कहना आवश्यक है कि हिंदू धर्म आतंकवाद का प्रतिपक्ष है। हमारे धर्मशास्त्र बताते हैं कि धर्मरक्षा के लिए उठाया गया शस्त्र हिंसा नहीं, बल्कि धर्म का पालन है। अर्जुन को गीता में युद्ध से पीछे हटने को नहीं, बल्कि अधर्म के विनाश हेतु आगे बढ़ने को कहा गया था।

आज नैरेटिव की शक्ति सेनाओं जितनी प्रभावी है। यदि हम मौन रहेंगे, तो असत्य हमारे विरुद्ध हथियार बन जाएगा। इसीलिए हमें एकजुट रहकर सतर्कता और साहस के साथ अपनी सभ्यता की रक्षा करनी होगी। “भगवा आतंकवाद” प्रकरण यह सिखाता है कि जब हम धर्म पर दृढ़ रहते हैं, तो कोई भी षड्यंत्र सत्य के प्रकाश को दबा नहीं सकता।

सन्दर्भ सूची

[1] The “Saffron Terror” Myth: How a Dangerous Narrative was Manufactured (StopHinduDvesha.Org, 2025); https://stophindudvesha.org/the-saffron-terror-myth-how-a-dangerous-narrative-was-manufactured/

[2] Malegaon blast verdict shatters ‘Saffron Terror’ lie of UPA government; Hindu terror theory falls apart; https://organiser.org/2025/08/02/305858/bharat/malegaon-blast-verdict-shatters-saffron-terror-lie-of-upa-government-hindu-terror-theory-falls-apart/

[3] Ibid.

[4] State of Maharashtra vs. Pragyasingh Chandrapalsingh Thakur; https://images.assettype.com/barandbench/2025-08-02/d5itwyxj/State_of_Maharashtra_vs__Pragyasingh_Chandrapalsingh_Thakur.pdf

[5] Testimony of witnesses riddled with inconsistencies: NIA Court junks evidence in Malegaon case;  https://www.deccanherald.com/india/maharashtra/testimony-of-witnesses-riddled-with-inconsistencies-nia-court-junks-evidence-in-malegaon-case-3661803

[6] “Safed-Aatank: Hume Se Maino Tak”- by M.K. Pandeya (Manoj Jwala); ISBN: 978-81-923388-1-1

[7] Dharmo Rakshati Rakshit – धर्मो रक्षति रक्षितः; https://gurukul.org/blog/spirituality/dharmo-rakshati-rakshit/

[8] “Be you ever so high”: A brief history of the Supreme Court’s call for impartial agencies; https://www.scobserver.in/journal/be-you-ever-so-high-a-brief-history-of-the-supreme-courts-call-for-impartial-agencies/

[9] Teach Kshatra dharma to your kids with Bhagavat Gita – J. Sai Deepak; https://www.youtube.com/shorts/N5rOX9FzBlk

[10] Saffron Terror: A Congress Manufactured Conspiracy;

https://sangamtalks.org/all-talks/saffron-terror-a-congress-manufactured-conspiracy-shwetank-bhushan-singh/

[11] Om Sarve Bhavantu Sukhinah – In Sanskrit with meaning; https://greenmesg.org/stotras/vedas/om_sarve_bhavantu_sukhinah.php

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