भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया के खिलाफ वोक एजेंडा: बदनाम करके समाप्त करने की मुहिम

भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया पर पश्चिमी वामपंथी उदारवादी मीडिया का लगातार चलने वाला हमला यह दिखाता है कि सांस्कृतिक पहचान, उपनिवेशवाद से मुक्ति और वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • पश्चिमी मीडिया और बुद्धिजीवी संस्थान भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को पक्षपाती और दक्षिणपंथी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • वोक तंत्र खुद को लोकपाल मानकर भारतीय मीडिया को लेबल और वर्गीकृत करता है।
  • वाम-उदारवादी प्रेस द्वारा अनदेखे मुद्दों को कवर करने पर राष्ट्रवादी मीडिया को वोक तंत्र द्वारा निशाना बनाया जाता है।
  • प्रेस की स्वतंत्रता पर भारत की छवि खराब करना वोक तंत्र की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
  • राष्ट्रवादी मीडिया को लक्षित करने के पीछे गहरा हिंदूफोबिया और भारत विरोधी भावना है।

 आधुनिक समाजों में, किसी भी विचारधारा का प्रभुत्व अक्सर मीडिया, शिक्षाविदों, और नागरिक संगठनों जैसे संस्थागत ढांचों के माध्यम से संचालित होता है। पारंपरिक रूप से, मार्क्सवादी दृष्टिकोण में वर्चस्व की अवधारणा सांस्कृतिक और बौद्धिक संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण की आलोचना तक सीमित थी। लेकिन आज, वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के बीच बदलते समीकरणों के संदर्भ में, इस अवधारणा को नए दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।

सांस्कृतिक प्रभुत्व का यह नया रूप विशेष रूप से पश्चिमी मीडिया द्वारा वैश्विक दक्षिण की मीडिया पर संरक्षणवादी दृष्टिकोण में झलकता है। यह धारणा प्रचलित है कि पश्चिमी पत्रकारिता सर्वोत्तम मानकों का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे गैर-पश्चिमी मीडिया को अपनाना चाहिए। जो मीडिया संस्थान इस यूरोसेंट्रिक मॉडल से अलग राह चुनते हैं, उन्हें अक्सर पक्षपाती या दक्षिणपंथी करार दिया जाता है।

भारतीय और पश्चिमी मीडिया के बीच संसाधन, पहुंच और प्रभाव में बड़ा अंतर है। इसके बावजूद, पश्चिमी मीडिया खुद को भारतीय मीडिया पर फैसला सुनाने वाले के रूप में प्रस्तुत करता है, खासकर राष्ट्रवादी या गैर-वामपंथी आउटलेट्स के संदर्भ में। यह दृष्टिकोण पश्चिमी मीडिया और बौद्धिक संस्थानों के उस वोक तंत्र से जुड़ा हुआ है, जो भारतीय मीडिया को “चरम दक्षिणपंथी” के रूप में लेबल करने में सक्रिय है।

भारतीय मीडिया संस्थान जो हिंदू समुदाय के मुद्दों, उपनिवेशवाद से मुक्ति, और भारत के सांस्कृतिक लोकाचार पर जोर देते हैं, उन्हें “हिंदुत्ववादी” या “दक्षिणपंथी” के रूप में खारिज किया जाता है। यह प्रवृत्ति भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया की आवाज़ को दबाने और उसे अवैध ठहराने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

यह लेख भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया पर इस व्यवस्थित हमले के अंतर्निहित ढाँचों और प्रेरणाओं का विश्लेषण करेगा। साथ ही, उन तरीकों पर भी प्रकाश डालेगा जिनसे यह एजेंडा भारतीय मीडिया और उसकी राष्ट्रीयता की पहचान को चुनौती दे रहा है।

राजनीतिक तटस्थता- वामपंथियों का पसंदीदा दिखावा!

भारत के राष्ट्रवादी मीडिया आउटलेट्स के प्रति पश्चिमी मीडिया का दृष्टिकोण गहरी पक्षपातपूर्ण धारणाओं से भरा हुआ है। इन आउटलेट्स पर बार-बार यह आरोप लगाया जाता है कि वे सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के प्रचार तंत्र के रूप में कार्य करते हैं। “हिंदुत्व फासीवाद,” “हिंदू राष्ट्रवाद,” और “हिंदू बहुसंख्यकवाद” जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल, अक्सर सनसनीखेज़ तरीके से, इन संगठनों की छवि धूमिल करने के लिए किया जाता है। तथ्यात्मक साक्ष्यों के अभाव के बावजूद, इन मीडिया संस्थानों की पत्रकारिता और पेशेवर ईमानदारी पर सवाल उठाए जाते हैं।

भारत की राष्ट्रवादी प्रेस की छवि धूमिल करने वाले प्रतिष्ठित पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स और बौद्धिक संस्थानों की सुर्खियों के निम्नलिखित उदाहरणों पर विचार करें:

  1. एक्स पर हिंदू राष्ट्रवादी ‘लव जिहाद’ की कहानियों को फैलाने में चरम दक्षिणपंथी मीडिया हाउसेज़ और संगठनों की भूमिका – ग्लोबल नेटवर्क ऑन एक्सट्रीमिज़्म एंड टेक्नोलॉजी, जनवरी 2024।[1]
  2. नफ़रत का माहौल – ऑपइंडिया – द लंदन स्टोरी।[2]
  3. शोध से पता चलता है कि भारत में फर्जी खबरों के पीछे राष्ट्रवाद एक प्रेरक शक्ति है – बीबीसी, नवंबर 2018।[3]
  4. भारत में स्वतंत्र मीडिया के लिए आशंकाएँ, क्योंकि शक्तिशाली उद्योगपति की नज़र प्रमुख समाचार चैनल पर है – द वाशिंगटन पोस्ट, अगस्त 2022।[4]
  5. मोदी के शासन में, भारत का प्रेस अब उतना स्वतंत्र नहीं रहा – द न्यूयॉर्क टाइम्स, अप्रैल 2020।[5]
  6. एक चरम दक्षिणपंथी भारतीय समाचार साइट नस्लवादी षड्यंत्र पोस्ट करती है, अमेरिकी टेक कंपनियाँ इसे बढ़ावा देती रहती हैं – वायर्ड, मई 2024।[6]
  7. स्वराज्य पत्रिका का हरिद्वार सम्मेलन को लेकर खतरनाक दोहरा चरित्र – हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स।[7]

“चरम-वामपंथ” जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल, भारतीय राष्ट्रवादियों को नाज़ीवाद जैसी चरमपंथी विचारधाराओं से जोड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इस प्रकार का नकारात्मक चित्रण स्पष्ट करता है कि उद्देश्य तथ्यों को प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टिकोणों को बदनाम करना है।

राष्ट्रवादी मीडिया संगठनों पर अक्सर भारत सरकार के मुखपत्र होने का आरोप लगाया जाता है, लेकिन ऐसे आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश नहीं किए जाते। इसके बजाय, इन मीडिया आउटलेट्स के विषय-केंद्रित रिपोर्टिंग को आधार बनाकर उन्हें भाजपा या संघ परिवार के करीब बताया जाता है। ऑपइंडिया, स्वराज्य, और ऑर्गनाइजर जैसे आउटलेट्स पर फ़ेक न्यूज़ फैलाने के आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन इन दावों को साबित करने वाले प्रमाण लगभग नदारद हैं।

इन आउटलेट्स की विकिपीडिया प्रविष्टियाँ भी पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती हैं, जो मुख्य रूप से वामपंथी स्रोतों पर आधारित हैं और तर्कों के प्रतिवाद को नजरअंदाज करती हैं। यह पक्षपात पश्चिमी मीडिया के पूर्वनिर्धारित कथानक को और बल प्रदान करता है।[8] [9] [10]

“गोदी मीडिया” शब्द का प्रयोग वोक तंत्र द्वारा प्रचलन में लाया गया है। इस का प्रयोग उन मीडिया आउटलेट्स को लेबल करने के लिए किया जाता है, जिन्हें मोदी सरकार के प्रति सहानुभूति रखने वाली इकाइयों के रूप में देखा जाता है।[11] यहाँ तक कि विकिपीडिया पर भी इस शब्द के लिए एक प्रविष्टि है, जिसमें पक्षपात के आरोपी मीडिया संगठनों की सूची दी गई है। विडंबना यह है कि इनमें से कई आउटलेट्स राष्ट्रवादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, भारत की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का संतुलित कवरेज प्रदान करते हैं और हिंदू समुदाय की चिंताओं को उजागर करते हैं। ये कार्य न तो भारत के मीडिया के लिए अद्वितीय हैं और न ही पक्षपात का कोई संकेत देते हैं – पश्चिमी मीडिया भी अक्सर विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अपनी-अपनी सरकारों की आफीशियल विचारधारा को ही प्रतिबिंबित करता है, और प्रायः सॉफ्ट पावर यानी सांस्कृतिक कूटनीति के राजदूतों के रूप में कार्य करता है। फिर आख़िर भारतीय मीडिया की इसी तरह की कवरेज को लेकर आलोचना क्यों की जाती है?

भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को बदनाम करने का एक महत्वपूर्ण कारक उनका उन विषयों पर ध्यान केंद्रित करना है जिन्हें वामपंथी-उदारवादी मीडिया संस्थानों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है, या कुतर्कों और प्रोपोगैंडा के माध्यम से दबा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, ‘एक्स पर हिंदू राष्ट्रवादी ‘लव जिहाद’ कथाओं को प्रसारित करने में चरम- दक्षिणपंथी मीडिया घरानों और संगठनों की भूमिका’[12] शीर्षक वाले एक लेख में राष्ट्रवादी मीडिया पर इस्लामोफोबिया का आरोप लगाया गया है। हालाँकि, इस तरह की कवरेज का तथ्यात्मक खंडन प्रस्तुत करने के बजाय, ये आलोचक इन मीडिया आउटलेट्स के दृष्टिकोण को बदनाम करने के लिए प्रोपोगैंडा के हथियारों का सहारा लेते हैं।

दूसरा उदाहरण वाशिंगटन पोस्ट का 2022 का लेख है[13], जिसमें गौतम अडानी द्वारा NDTV के अधिग्रहण के बाद भारत में “स्वतंत्र मीडिया” के बारे में चिंता जताई गई है। यह आलोचना इस तथ्य को आसानी से अनदेखा कर देती है कि कई तथाकथित स्वतंत्र मीडिया आउटलेट्स को भारत विरोधी निहित स्वार्थों वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से धन प्राप्त होता है। इसके विपरीत, ऑपइंडिया और स्वराज्य जैसे छोटे राष्ट्रवादी आउटलेट्स, जो सब्सक्राइबर समर्थन पर निर्भर हैं, उन्हें सरकारी प्रॉक्सी के रूप में लेबल किया जाता है।

द लंदन स्टोरी[14] ने शोध के नाम पर ऑपइंडिया को निशाना बनाया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि यह प्रकाशन पत्रकारिता के मानदंडों की अवहेलना करता है, फर्जी सूचनाओं पर आश्रित है, और भाजपा आईटी सेल द्वारा वित्तपोषित है। लेख में ऑपइंडिया का मज़ाक उड़ाने वाली एक कार्टून सीरीज़ भी शामिल है, जिसमें बेहद अपमानजनक पंचलाइन्स की भरमार है, जैसे “आपका कैश का बंडल आरएसएस मुख्यालय से आ रहा है।” इस तरह के निराधार लक्ष्यीकरण से वोक तंत्र के दोहरे मानदंडों का पता चलता है। अगर किसी भारतीय प्रकाशन द्वारा किसी प्रमुख पश्चिमी मीडिया आउटलेट पर इस तरह के व्यंग्य चित्र बनाए गए होते, तो इसकी निश्चित तौर पर वैश्विक निंदा होती।

दुर्भाग्य से, भारत में छोटे राष्ट्रवादी मीडिया संगठनों के पास ऐसे बदनाम करने वाले अभियानों का मुकाबला करने के लिए वित्तीय साधन नहीं हैं। उनके सीमित संसाधन उनके लिए इन कथाओं को प्रभावी ढंग से चुनौती देना लगभग असंभव बना देते हैं।

जबकि राष्ट्रवादी मीडिया को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ता है, भारत में वामपंथी या चरम-वामपंथी प्रकाशनों को इस प्रकार की जांच-पड़ताल से छूट प्राप्त है। हिंदुओं और भारतीय राज्य के खिलाफ खुलेआम प्रतिशोधी प्रचार में शामिल होने के बावजूद, इन आउटलेट्स को तटस्थता और नैतिक पत्रकारिता के आदर्श के रूप में सराहा जाता है। वोक तंत्र मानता है कि वाम-उदारवादी विश्वदृष्टि मीडिया नैतिकता के स्वर्ण मानक का प्रतिनिधित्व करती है, और इसलिए यह राष्ट्रवादी दृष्टिकोणों को स्वाभाविक रूप से पक्षपाती मानकर खारिज कर देता है।

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय वामपंथी मीडिया आउटलेट्स की आलोचना का स्वर भी पश्चिमी मीडिया, बौद्धिक संस्थानों और शिक्षाविदों से एकदम मिलता जुलता है, जिससे राष्ट्रवादी मीडिया के खिलाफ़ एक एकीकृत मोर्चा बनता है। यह गठबंधन भारतीय पत्रकारिता में राष्ट्रवादी आख्यानों को अमान्य करने के व्यापक वैचारिक एजेंडे को रेखांकित करता है।

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर अति राष्ट्रवादी होने का दोषारोपण

भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थान, विशेष रूप से राष्ट्रवादी आउटलेट्स, अक्सर पश्चिमी मीडिया और वोक तंत्र की आलोचना का सामना करते हैं, जो प्रायः रिपब्लिक भारत, रिपब्लिक वर्ल्ड, टाइम्स नाउ नवभारत और न्यूज़ 18 सरीखे न्यूज़ चैनलों को राष्ट्रवादी और सरकारी मुखपत्र के रूप में परिभाषित करते हैं। ये आरोप इन चैनलों पर इसलिए लगाये जाते हैं क्योंकि इनकी पत्रकारिता की शैली में पश्चिमी मीडिया में प्रचलित वामपंथी-उदारवादी पत्रकारिता मानदंड प्रतिबिंबित नहीं होते।

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क जैसे चैनलों को लेखों, टिप्पणियों और अकादमिक शोध-पत्रों में बार-बार निशाना बनाया गया है। इस लक्ष्यीकरण के प्राथमिक कारणों में हिंदू राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और भारत की वैश्विक छवि जैसे मुद्दों पर उनका ध्यान केंद्रित करना शामिल है। उनका कवरेज भारत के संदर्भ में पश्चिमी आख्यानों को चुनौती देता है, और अक्सर वामपंथी मीडिया द्वारा अनदेखा किए जाने वाले विषयों को उजागर करता है।

उदाहरण के लिए, 2019 में प्रकाशित “भारतीय मीडिया सत्ता से सच नहीं बोल सकता” शीर्षक वाले फॉरेन पॉलिसी प्रकाशन में छपे लेख[15] में भारतीय मीडिया पर भारत सरकार की विचारधारा पर चलने और उसे जवाबदेह ठहराने में विफल रहने का आरोप लगाया गया है। इस लेख में राष्ट्रवादी मीडिया की आलोचना की गई है क्योंकि वह संवेदनशील मुद्दों को पश्चिमी मानकों द्वारा निर्धारित दृष्टिकोण से हटकर कवर करता है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर हर मीडिया आउटलेट को अपना एजेंडा निर्धारित करने का अधिकार है। पश्चिमी आलोचना अक्सर भारतीय मीडिया द्वारा पश्चिमी प्रेस के एजेंडा-सेटिंग मानदंडों का पालन करने से इनकार करने के कारणवश उपजे असंतोष के रूप में दिखाई देती है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय मीडिया द्वारा की गई कवरेज, खास तौर पर उनकी विदेश यात्राओं के दौरान, विवाद का एक महत्वपूर्ण विषय रही है। पश्चिमी आउटलेट अक्सर इस कवरेज को अत्यधिक नाटकीय या राष्ट्रवादी बता इसका उपहास उड़ाते हैं। उदाहरण के लिए, जून 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स का एक लेख, जिसका शीर्षक है “भारतीय टीवी ने मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान उनकी प्रशंसा की”,[16] मोदी के कूटनीतिक प्रयासों के सकारात्मक चित्रण के लिए भारतीय चैनलों की आलोचना करता है, उन पर यह आरोप लगाते हुए कि इस तरह की कवरेज भारतीय सरकार की कथित घरेलू कमियों को छुपाती है।

हालांकि, ऐसी आलोचना यह पहचानने में विफल रहती है कि विदेशी यात्राएं महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाएँ हैं, और इन अवसरों के मीडिया कवरेज से आंतरिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की अपेक्षा करना अनुचित है। मोदी की यात्राओं के भारतीय मीडिया द्वारा किए गए चित्रण की आलोचना करने में पश्चिमी मीडिया की असंगत रुचि भारत के बढ़ते वैश्विक कद को लेकर उसकी बढ़ती असहजता और खीझ को ही प्रकट करती है।

फरवरी 2024 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक लेख में, जिसका शीर्षक था “लाइट्स! कैमरा! मोदी! यह भारतीय टेलीविजन पर वन-मैन शो है”,[17] अयोध्या राम मंदिर उद्घाटन की कवरेज के लिए भारतीय चैनलों पर निशाना साधा गया है। लेख में इस बात की आलोचना की गई है कि इस आयोजन में मोदी की भूमिका पर बहुत ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया गया है, जबकि लाखों हिंदुओं के लिए मंदिर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को अनदेखा किया गया है।

लेख में भारतीय मीडिया पर अयोध्या स्थल के विवादास्पद इतिहास का हवाला देते हुए “हिंदू राष्ट्रवाद” को बढ़ावा देने और विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया गया है। हालाँकि, इस तरह की टिप्पणियाँ अक्सर इस आयोजन से जुड़ी व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर देती हैं, जिससे यह एक सरलीकृत राजनीतिक आख्यान बन जाता है।

भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति वोक तंत्र की अवमानना, समकालीन भारत की आकांक्षाओं और पहचान के साथ प्रतिध्वनित होने वाली मीडिया कहानियों पर फोकस के कारण उपजी है। रिपब्लिक भारत और टाइम्स नाओ नवभारत जैसे चैनल अक्सर उपनिवेशवाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदू समुदाय के मुद्दों जैसे विषयों को कवर करते हैं – ऐसे विषय जिन्हें वामपंथी आउटलेट्स द्वारा खारिज या दरकिनार कर दिया जाता है।

पश्चिमी मीडिया के विपरीत, जो अक्सर अपनी सरकारों के सॉफ्ट पावर संबंधी कथानक को पुष्ट करता है, भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया भारत की संस्कृति और वैश्विक प्रासंगिकता को पेश करने में अधिक मुखर रुख अपनाता है। पत्रकारिता के वाम-उदारवादी ढाँचे से इतर जा राष्ट्रवादी मीडिया की यह कवरेज वोक तंत्र को अस्थिर कर देती है, जो भारत को गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी से ग्रस्त देश के रूप में चित्रित करना अधिक पसंद करता है।

भारतीय राष्ट्रवादी चैनल, जिनमें से कई भारतीय समूहों के स्वामित्व में हैं या रिपब्लिक मीडिया के अर्नब गोस्वामी जैसे भारतीय पेशेवरों द्वारा स्थापित हैं, ने पत्रकारिता में अपना खुद का रास्ता तय किया है। वे भारत की चुनौतियों को लेकर सस्ती लोकप्रियता दिलाने वाली सनसनीख़ेज़ कहानियों से बचते हैं और इसके बजाय उन कथाओं पर ज़ोर देते हैं जो देश की प्रगति और उभरती पहचान से जुड़ी हों।

ख़ुद का न्यूज़ एजेंडा निर्धारित करने को लेकर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की यह स्वतंत्रता वोक तंत्र को फूटी आँख नहीं सुहाती। भारत के राष्ट्रवादी न्यूज़ चैनलों की वैचारिक स्वायत्तता को लेकर पश्चिमी मीडिया की असहजता उनकी लगातार चल रही बेसिरपैर की आलोचनाओं में स्पष्ट है, जिनमें अक्सर तथ्यात्मक प्रमाणों का अभाव होता है और भारतीय पत्रकारिता के बारे में रूढ़िबद्ध धारणाओं की भरमार होती है।

प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग: भारतीय राष्ट्रवादी मीडिया की छवि धूमिल करने का एक हथियार 

 पश्चिमी मीडिया और बुद्धिजीवी संस्थान तंत्र द्वारा भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रणनीतियों में से एक है देश में प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में व्यवस्थित रूप से भय फैलाना। लेख, टिप्पणियाँ और मीडिया रिपोर्ट अक्सर भारतीय प्रेस की एक अतिशयोक्तिपूर्ण तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता में खतरनाक गिरावट का दावा किया जाता है। हालाँकि, ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। भारत एक जीवंत लोकतंत्र बना हुआ है जहाँ मीडिया संगठन, सोशल मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स और यहाँ तक कि देश के आम नागरिक भी स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त करते हैं, और अक्सर प्रधानमंत्री व सरकार के बारे में अत्यधिक अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं। इसके बावजूद, असहमति पर कोई व्यापक कार्रवाई नहीं की जाती है। चीन जैसे देशों से ठीक उलट, जहाँ सरकार के खिलाफ़ बोलना गंभीर परिणामों को आमंत्रित करता है, भारत में इस प्रकार की अभिव्यक्ति की आज़ादी, प्रेस की स्वतंत्रता की मज़बूत प्रकृति को रेखांकित करती है।

इस कथानक के केंद्र में रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) द्वारा प्रकाशित प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक है। यह सूचकांक लगातार भारत को बेहद निचले स्थान पर रखता है, जिससे इसकी कार्यप्रणाली और निष्पक्षता को लेकर शंकाएँ बढ़ती हैं। 2024 के संस्करण में, भारत 180 देशों में से 159वें स्थान पर था[18], यानी  पाकिस्तान, श्रीलंका, फिलिस्तीन और मालदीव जैसे देशों से भी नीचे। सूचकांक के मानदंडों में पारदर्शिता की कमी, व्यक्तिपरक आकलन पर निर्भरता और स्पष्ट पूर्वाग्रह इसे अत्यधिक संदिग्ध बनाते हैं।

भारतीय मीडिया आउटलेट्स ने ऐसी प्रेरित रैंकिंग्स की आलोचना करना शुरू कर दिया है, और उनकी अंतर्निहित खामियों को उजागर किया है। हालाँकि, इन आख्यानों को चुनौती देने के उनके प्रयासों को वोक तंत्र द्वारा पूर्वाग्रह और असहिष्णुता के आरोपों का सामना करना पड़ता है। भ्रामक तथ्यों के प्रचार-प्रसार और सुनियोजित प्रोपोगैंडा का यह अविरल चक्र भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को समझौतावादी और अविश्वसनीय के रूप में निरंतर चित्रित करता रहता है।

पश्चिमी मीडिया अक्सर इन दोषपूर्ण रैंकिंग्स को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, और भारत में प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट को लेकर ज़हरीला विमर्श बुनता है। उदाहरण के लिए, 2022 में डॉयचे वेले के एक लेख में, जिसका शीर्षक है ‘भारत की प्रेस स्वतंत्रता क्यों कम हो रही है’, भारतीय मीडिया की स्थिति पर दुख जताया गया है[19] और दावा किया गया है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से प्रेस में आमूलचूल परिवर्तन आया है। लेख में भारतीय मीडिया पर अति-पक्षपाती, अभिजात्य और सामाजिक रूप से रूढ़िवादी होने का आरोप लगाया गया है – यह उन राष्ट्रवादी मीडिया आउटलेट्स की एक दबी छिपी आलोचना है, जो वाम-उदारवादी ढांचे के अनुरूप न्यूज़ एजेंडा चलाने से इनकार करते हैं।

आरएसएफ की कार्यप्रणाली, जैसा कि डॉयचे वेले ने भी अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है, “प्रेस स्वतंत्रता उल्लंघन” और “प्रेस स्वतंत्रता विशेषज्ञों के सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं” जैसे अस्पष्ट संकेतकों पर निर्भर है। ऐसे व्यक्तिपरक उपायों में वैज्ञानिक निष्पक्षता का अभाव है और वे राष्ट्रों में संदर्भों की विविधता को ध्यान में रखने में विफल रहते हैं। इन तथाकथित विशेषज्ञों की तटस्थता और विश्वसनीयता को लेकर भी निश्चित रूप से सवाल उठते हैं, जिनका कोई तर्कसंगत जवाब फ़िलहाल मिलता दिखाई नहीं देता।

भारत की प्रेस स्वतंत्रता को लेकर वोक तंत्र की आलोचना चुनिंदा आख्यानों और कुतर्कों से भरी हुई है। ऐसे उदाहरण जहां मीडिया संगठनों को वित्तीय अनियमितताओं के लिए क़ानूनी एजेंसियों द्वारा बुलाया जाता है, या पत्रकारों को कानूनी जांच का सामना करना पड़ता है, उन्हें हिंदू राष्ट्रवाद और प्रेस स्वतंत्रता के दमन के बीच सीधा संबंध स्थापित करने हेतु हथियार बनाया जाता है। अक्सर, इन मामलों के संदर्भ या पृष्ठभूमि को सुविधाजनक रूप से छोड़ दिया जाता है, जैसे कि विदेशी पत्रकारों के लिए वीज़ा अस्वीकार करना या संदिग्ध फंडिंग की जांच, उसके उलट इन घटनाओं को  मीडिया दमन के व्यापक दावों के साथ तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है।

इन आख्यानों का मुख्य लक्ष्य प्रेस की स्वतंत्रता में कथित गिरावट के साथ इसे जोड़कर भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को अवैध ठहराना है। हालाँकि, यह आलोचना बहुत ही चयनात्मक है। जहाँ वामपंथी-उदारवादी मीडिया आउटलेट्स को सदाचार के आदर्श के रूप में चित्रित किया जाता है, वहीं राष्ट्रवादी मीडिया को प्रमुख पश्चिमी आख्यानों को चुनौती देने के लिए बदनाम किया जाता है।

वे भारतीय मीडिया आउटलेट्स जो राष्ट्रवादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करके, देश के सांस्कृतिक गौरव का उत्सव मनाकर, या भारत को गरीबी और निराशा की भूमि के रूप में चित्रित करने के घिसे पिटे फ़ार्मूले का विरोध करके वोक तंत्र द्वारा निर्धारित लीक पर चलने से इनकार कर देते हैं, उन्हें पक्षपाती करार दे दिया जाता है। वोक तंत्र की खीझ की असली वजह यह है कि भारत का राष्ट्रवादी मीडिया पश्चिम द्वारा परिभाषित पत्रकारिता मानदंडों के अनुरूप ख़ुद को ढालने से साफ़ इनकार कर देता है।

हाल की कुछ सुर्खियों पर सरसरी निगाह डालने से भारत की प्रेस स्वतंत्रता पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले दोहराव वाले विषयों के बारे में पता चलता है:

  1. भारत का मीडिया इतना स्वतंत्र नहीं है – द डिप्लोमैट, जनवरी 2019[20]
  2. क्या मोदी के एक दशक के बाद भी भारत का स्वतंत्र प्रेस उतना स्वतंत्र नहीं है? – सीएनएन, मई 2024[21]
  3. भारत में पत्रकारिता पर हमला हो रहा है – द वाशिंगटन पोस्ट, मई 2024[22]
  4. भारत की स्वतंत्र प्रेस की गौरवशाली परंपरा खतरे में है – द न्यूयॉर्क टाइम्स, फरवरी 2023[23]
  5. बढ़ते ‘नैरेटिव मैनेजमेंट’ के बीच भारत में प्रेस की स्वतंत्रता दांव पर है – जियोपॉलिटिकल मॉनिटर, मार्च 2024[24]
  6. भारत में प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट के कारण पत्रकारों को बढ़ते खतरों का सामना करना पड़ रहा है – फ्रांस 24, नवंबर 2023[25]

ये रिपोर्ट्स अक्सर हिंदू राष्ट्रवाद और प्रेस की स्वतंत्रता पर कथित प्रतिबंधों के बीच निराधार संबंध बनाती हैं, जिससे एक ऐसे कथानक को विस्तार मिलता है जिसमें बारीकियों और तथ्यात्मक समर्थन का अभाव होता है।

भारतीय मीडिया की वैश्विक आलोचना – स्पष्ट रूप से हिंदू-विरोधी

वोक तंत्र द्वारा भारत के राष्ट्रवादी मीडिया का व्यवस्थित रूप से दानवीकरण हिंदू-विरोधी और भारत विरोधी रवैयों, दोनों को दर्शाता है। पिछले एक दशक में, भारत की विदेश नीति लगातार मुखर होती गई है, जिसमें देश को एक वैश्विक शक्ति और वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में पेश करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। राष्ट्रवादी मीडिया आउटलेट्स ने इस दृष्टिकोण के साथ तालमेल बिठाया है, भारत की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और भारत को लेकर चले आ रहे घिसे पिटे वैश्विक आख्यानों को चुनौती दी है।

राष्ट्रवादी मीडिया को निशाना बनाए जाने का एक और कारण हिंदू मुद्दों पर उनका विशेष ध्यान देना है, जिन्हें वामपंथी-उदारवादी भारतीय मीडिया द्वारा बड़े पैमाने पर अनदेखा कर दिया जाता है और पश्चिमी आउटलेट्स द्वारा खारिज कर दिया जाता है। धर्मांतरण, लव जिहाद, हिंदू विरोधी घृणा अपराध और हिंसा जैसे विषयों को राष्ट्रवादी प्लेटफॉर्म्स के बाहर का मीडिया शायद ही कभी कवर करता है। पिछले कुछ वर्षों में, रिपब्लिक भारत, रिपब्लिक वर्ल्ड और सुदर्शन न्यूज़ जैसे भारतीय समाचार चैनलों ने इन मुद्दों को प्रमुखता से कवरेज देना शुरू कर दिया है, जिससे वे अक्सर आलोचना का निशाना बन जाते हैं।

उदाहरण के लिए, न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख जिसका शीर्षक है “लाइट्स! कैमरा! मोदी! यह भारतीय टेलीविजन पर एक व्यक्ति का शो है”, ने अयोध्या राम मंदिर उद्घाटन के कवरेज के लिए सुदर्शन न्यूज़ की कड़ी आलोचना की।[26] लेख में चैनल पर “विभाजनकारी एजेंडा” को आगे बढ़ाने और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए सरकारी सलाह की अवहेलना करने का आरोप लगाया गया, और संतुलित संदर्भ प्रदान किए बिना बड़ी ही बेशर्मी से चैनल को पक्षपाती के रूप में चित्रित किया गया।

इसी तरह, रिपब्लिक टीवी पर केंद्रित विकिपीडिया प्रविष्टि चुनिंदा उद्धरणों को विशिष्ट रूप से दर्शाती है, और चैनल को इस्लामोफोबिक व फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाला साबित करने के लिए केवल वामपंथी स्रोतों पर निर्भर रहती है।[27] प्रतिवाद या वैकल्पिक दृष्टिकोण को शामिल करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, जिससे इस पक्षपातपूर्ण कथानक को बढ़ावा मिलता है।

भारत का राष्ट्रवादी मीडिया एकरूपता से बहुत दूर है। इसमें रिपब्लिक भारत और टाइम्स नाओ नवभारत जैसे मुख्यधारा के चैनल शामिल हैं, साथ ही ऑपइंडिया, स्वराज्य और हिंदूपोस्ट जैसे छोटे आउटलेट्स भी शामिल हैं। ये छोटे आउटलेट्स अक्सर भारतीय मीडिया पदानुक्रम के भीतर अपनी पहचान स्थापित करने के लिए संघर्ष करते हैं और मुख्यधारा के इंटरनेट खोज परिणामों में शायद ही कभी दिखाए जाते हैं।

राष्ट्रवादी मीडिया के प्रति वोक तंत्र का यह वैमनस्यतापूर्ण रवैया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और उपनिवेशवाद के आख्यानों के प्रति इसके प्रतिरोध से उपजा है, जो ऐसे विचारों का समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति को “चरम-दक्षिणपंथी” या संघ परिवार से जुड़ा हुआ बता ख़ारिज कर देता है। यह अति सरलीकरण राष्ट्रवादी मीडिया तंत्र के भीतर की आवाज़ों की विविधता को खारिज करता है, जिसमें सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना करने वाले भी शामिल हैं, जो फिर भी हिंदू मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

निष्कर्ष

वोक तंत्र द्वारा भारत के राष्ट्रवादी मीडिया को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाना वाम-उदारवादी आख्यानों का वैश्विक एकाधिकार स्थापित करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होता है। यह उन आउटलेट्स को बढ़ावा देता है जो इसके विश्वदृष्टिकोण को प्रतिध्वनित करते हैं, जबकि उन मीडिया संस्थानों को हाशिए पर धकेल देता है, जो इसके वर्चस्व को चुनौती देते हैं। यह कैंसिल कल्चर यानी किसी भी वैकल्पिक दृष्टिकोण को बिना किसी तर्क के रद्द करने की संस्कृति विविध दृष्टिकोणों को दबाती है, और सार्वजनिक विमर्श को एक वैचारिक प्रतिध्वनि कक्ष में बदल देती है।

भारत का राष्ट्रवादी मीडिया केवल राजनीति के बारे में नहीं है; यह सांस्कृतिक पहचान को पुनः प्राप्त करने और देश की पुरानी धारणाओं को चुनौती देने की व्यापक आकांक्षा का भी प्रतिनिधित्व करता है। वोक तंत्र द्वारा इन आउटलेट्स का दानवीकरण यह दर्शाता है कि वैकल्पिक आख्यानों को दबाने और वैश्विक विमर्श पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए यह किस हद तक जा सकता है।

संदर्भ 

[1]  The Role of Far-Right Media Houses and Organisations in Disseminating Hindu Nationalist ‘Love Jihad’ Narratives on X – GNET;  https://gnet-research.org/2024/01/05/the-role-of-far-right-media-houses-and-organisations-in-disseminating-hindu-nationalist-love-jihad-narratives-on-x/

[2] Atmosphere of Hate – OpIndia – The London Story;  https://thelondonstory.org/wp-content/uploads/Atmosphere-of-hate.pdf

[3] Nationalism a driving force behind fake news in India, research shows; https://www.bbc.com/news/world-46146877

[4] Gautam Adani, Modi ally, makes hostile bid for Indian news channel NDTV – The Washington Post;    https://www.washingtonpost.com/world/2022/08/24/india-ndtv-adani-media-takover/

[5] Under Modi, India’s Press Is Not So Free Anymore – The New York Times; https://www.nytimes.com/2020/04/02/world/asia/modi-india-press-media.html

[6] A Far-Right Indian News Site Posts Racist Conspiracies. US Tech Companies Keep Platforming It | WIRED;  https://www.wired.com/story/india-opindia-google-facebook-advertising/

[7]  Swarajya magazine’s dangerous double-speak on the Haridwar conclave – Hindus for Human Rights;      https://www.hindusforhumanrights.org/en/blog/swarajya-magazines-criticism-of-the-haridwar-conclave

[8] Organiser (magazine) – Wikipedia;  https://en.wikipedia.org/wiki/Organiser_(magazine)

[9] OpIndia – Wikipedia;  https://en.wikipedia.org/wiki/OpIndia

[10] Swarajya (magazine) – Wikipedia; https://en.wikipedia.org/wiki/Swarajya_(magazine)

[11] Godi media – Wikipedia;  https://en.wikipedia.org/wiki/Godi_media

[12] The Role of Far-Right Media Houses and Organisations in Disseminating Hindu Nationalist ‘Love Jihad’ Narratives on X – GNET;   https://gnet-research.org/2024/01/05/the-role-of-far-right-media-houses-and-organisations-in-disseminating-hindu-nationalist-love-jihad-narratives-on-x/

[13] Gautam Adani, Modi ally, makes hostile bid for Indian news channel NDTV – The Washington Post; https://www.washingtonpost.com/world/2022/08/24/india-ndtv-adani-media-takover/

[14] Atmosphere of Hate – OpIndia – The London Story;  https://thelondonstory.org/wp-content/uploads/Atmosphere-of-hate.pdf

[15] India’s Media Can’t Speak Truth to Power – Foreign Policy;  https://foreignpolicy.com/2019/08/02/indias-media-cant-speak-truth-to-power-modi-bjp-journalism/

[16] Indian TV Praises Modi During His U.S. Trip – The New York Times;    https://www.nytimes.com/2023/06/22/us/politics/india-television-modi-us.html

[17] Lights! Camera! Modi! It’s a One-Man Show on Indian Television – The New York Times; https://www.nytimes.com/2024/02/03/world/asia/india-modi-ayodhya-media.html

[18] India’s press freedom has rapidly declined in recent years – Data – The Hindu;   https://www.thehindu.com/data/india-press-freedom-has-rapidly-declined-in-recent-years-data/article68160411.ece

[19] Why India’s press freedom is slipping – DW – 05/05/2022;  https://www.dw.com/en/why-is-india-falling-in-the-world-press-freedom-index/a-61697180

[20] India’s Not-So-Free Media – The Diplomat; https://thediplomat.com/2019/01/indias-not-so-free-media/

[21] India’s free press is not so free after a decade of Modi | CNN Business; https://edition.cnn.com/2024/05/22/media/india-elections-press-freedom-decline-intl-hnk/index.html

[22] Opinion | Journalism in India is under assault – The Washington Post;  https://www.washingtonpost.com/opinions/2024/05/03/india-journalists-under-attack/

[23] Opinion | India’s Proud Tradition of a Free Press Is at Risk -The New York Times;   https://www.nytimes.com/2023/02/12/opinion/modi-bbc-documentary-india.html

[24] India’s Press Freedom at Stake amid Growing  ‘Narrative Management’ | Geopolitical Monitor;  https://www.geopoliticalmonitor.com/india-press-freedom-at-stake-amid-growing-narrative-management/

[25] Journalists face increasing threats as India’s press freedom declines – Focus; https://www.france24.com/en/tv-shows/focus/20231102-india-s-declining-press-freedom-journalists-face-increasing-threats

[26] Lights! Camera! Modi! It’s a One-Man Show on Indian Television – The New York Times;    https://www.nytimes.com/2024/02/03/world/asia/india-modi-ayodhya-media.html

[27] Republic TV – Wikipedia;  https://en.wikipedia.org/wiki/Republic_TV

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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