दफ़न सच: गांधीवाद की चादर तले 1948 का चितपावन ब्राह्मण नरसंहार

गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में भड़की हिंसा, कांग्रेस नेताओं की शह पर हुआ चितपावन ब्राह्मणों का संगठित नरसंहार, सावरकर परिवार पर हमला और हज़ारों निर्दोषों की मौत—एक ऐसा अध्याय जिसे इतिहास ने दबा दिया।
  • गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों पर संगठित हिंसा हुई। हज़ारों लोग मारे गए, महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और घर-दुकानें जला दी गईं।
  • यह हिंसा कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा भड़काई और नेतृत्व की गई थी। इसे “बदले” का नाम दिया गया, जबकि यह नरसंहार था।
  • वीर सावरकर के घर पर हमला हुआ, उनके भाई को पत्थरों से मारकर हत्या कर दी गई। कई ब्राह्मण परिवार पलायन कर गए या गरीबी में चले गए।
  • पुलिस रिकॉर्ड आज तक सील हैं, मीडिया ने इस हिंसा को लगभग नज़रअंदाज़ किया, और किसी को भी सज़ा नहीं मिली।
  • 1948 का यह नरसंहार भारत के इतिहास की उन त्रासदियों में है, जिनकी सच्चाई आज तक दबाई गई और जिनसे देश अब तक मुँह मोड़े हुए है।

 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र पर डर और हिंसा का साया छा गया। नाथूराम गोडसे, जो चितपावन ब्राह्मण था, ने गांधी को गोली मारी। लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह और भी भयावह था। बदले की आग में जलती भीड़ ने हज़ारों निर्दोष लोगों को सिर्फ़ इसलिए निशाना बनाया कि वे गोडसे की जाति से थे। गांधी की मौत की खबर फैलते ही पुणे, मुंबई, नागपुर और सतारा, कोल्हापुर, बेलगाम जैसे ग्रामीण इलाकों में भीड़ उमड़ पड़ी। यह भीड़ अचानक नहीं भड़की थी, बल्कि सुनियोजित थी[1] हाथों में दरांतियाँ, लोहे की छड़ें और केरोसीन के डिब्बे लिए उन्मादी लोग निहत्थे चितपावन ब्राह्मणों पर टूट पड़े।

निहत्थे चितपावन ब्राह्मणों के इस भयावह नरसंहार की विडंबना भी उतनी ही ज्वलंत और रोंगटे खड़े कर देने वाली थी जितनी उन आग की लपटें, जिन्होंने मासूम लोगों के घरों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। गांधी के अनुयायी, जो “पूर्ण अहिंसा” का दावा करते थे[2], वही स्वतंत्र भारत के शुरुआती और सबसे हिंसक सामुदायिक नरसंहारों में से एक को अंजाम दे रहे थे।

रिपोर्टों के अनुसार इन हमलों में कांग्रेस के कार्यकर्ता सक्रिय थे। उन्होंने गांधी की मौत को ढाल भी बनाया और हिंसा का बहाना भी। आंकड़ों पर नज़र डालें तो सिर्फ़ पुणे में, हत्या के कुछ ही घंटों में 50 ब्राह्मणों को उनकी जाति की पहचान करके मार डाला गया। यहाँ तक कि 31 जनवरी को न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी, जिसका हिंदू-विरोधी झुकाव जगजाहिर था, मुंबई में 15 मौतों की पुष्टि की।

यह एक सुनियोजित नरसंहार था, जो पूरे सप्ताह चला। करीब 300 जिलों में योजनाबद्ध तरीके से हमले हुए, जिनमें घरों को जलाना, मारपीट, हत्या और बलात्कार जैसी वारदातें शामिल थीं। इतिहासकार कोएनराड एल्स्ट मृतकों की संख्या कुछ सैकड़ों बताते हैं, जबकि विक्रम संपत, बचे हुए लोगों की गवाही के आधार पर, इसे 2,000 से 5,000 के बीच मानते हैं। वहीं, हिंदू नरसंहार पर अपने शोध में आरती अग्रवाल ने इस संख्या को 8,000 के करीब बताया है।[3] लेकिन कोई भी आंकड़ा निश्चित रूप से साबित नहीं हो सका, क्योंकि सच्चाई जले हुए सरकारी रिकॉर्ड्स, आधिकारिक चुप्पी और वैचारिक उदासीनता के अंधेरों में दफ़न पड़ी है। जो बचा है—वह है एक नरसंहार, जिसे नकारा गया, दबा दिया गया, और जिसकी सच्चाई आज तक छुपाई जा रही है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

चितपावन ब्राह्मण, जो इतिहास में मराठा साम्राज्य के पेशवाओं (प्रधानमंत्री) के रूप में जाने जाते हैं, 18वीं और 19वीं शताब्दी में महाराष्ट्र की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति के केंद्र थे। इन्होंने इस्लामिक साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ छिड़े निर्णायक संघर्ष का पूरे भारत में नेतृत्व किया था। मराठा साम्राज्य ने भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से को इस्लामिक शासन की सदियों की ग़ुलामी से मुक्त कराया।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भी इस समुदाय ने भारत को कई महान स्वतंत्रता सेनानी दिए—वीर सावरकर, महादेव रानडे, गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक और चापेकर बंधु (दामोदर, बालकृष्ण, वासुदेव) जैसे नाम चितपावन ब्राह्मण समाज की परंपरा से ही आए। महाराष्ट्र की कुल आबादी में चितपावन ब्राह्मण केवल 4–5 प्रतिशत थे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में उनकी मजबूत मौजूदगी पहले से ही ब्राह्मण-विरोधी भावनाएँ रखने वाले समूहों के लिए खटकती थी। गांधी की हत्या ने इन विरोधी ताक़तों को चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाने का बहाना दे दिया। तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के समर्थन से इस समुदाय पर हिंसा की बाढ़ टूट पड़ी। गांधी की मृत्यु की आड़ में “बदले” की भावना के नाम पर एक पूरे समुदाय को निशाना बनाया गया[4]

हिंसा गांधी की मृत्यु के तुरंत बाद ही शुरू हो गई, जिससे स्पष्ट होता है कि यह सब एक सोची-समझी साज़िश के तहत हुआ था। स्रोतों के अनुसार, भीड़ के पास केरोसीन, लोहे की छड़ें और दरांतियाँ थीं, और वे महाराष्ट्र भर में ब्राह्मणों के घरों, दुकानों और फैक्ट्रियों को चुन-चुन कर निशाना बना रहे थे। इन हमलों में हत्या, बलात्कार, आगजनी और लूटपाट जैसी घटनाएँ शामिल थीं। वीर सावरकर जैसे चर्चित लोगों की संपत्ति तक को नहीं छोड़ा गया। 300 जिलों में हिंसा का एकसाथ फैलना यह बताता है कि इस घटनाक्रम को केवल “दंगे” कहकर सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। मौजूदा सबूत साफ़ इशारा करते हैं कि यह एक सोचा-समझा, पूर्वनियोजित नरसंहार था[5]

अपनी किताब सावरकर, Vol. II में लेखक विक्रम संपत, वकील पी.एल. इनामदार को उद्धृत करते हैं: महाराष्ट्र के दक्षिणी जिलों में मेरे कई करीबी रिश्तेदार सिर्फ इसलिए इस हिंसक वारदात के निशाने पर थे क्योंकि वे मराठी ब्राह्मण थे। वे सिर्फ इस वजह से जान बचा सके क्योंकि रेड के समय वे घर पर मौजूद नहीं थे।[6]

कोल्हापुर में प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता भालजी पेंढारकर का स्टूडियो जला दिया गया। एक और घटना में हिंदू नेता जी.एच. जोशी की पूरी फैक्ट्री को आग लगा दी गई। सांगली में ब्राह्मणों द्वारा संचालित एक कपड़ा मिल और एक अस्पताल को जला डाला गया। पंचगनी में एक स्कूल को सिर्फ़ इसलिए जला दिया गया क्योंकि उसका प्रमुख ब्राह्मण था। उडत्रे गांव की एक महिला और उसके पोते को, और कपारे गांव के एक पूरे परिवार को केवल ब्राह्मण होने के कारण जिंदा जला दिया गया[7]

चितपावन ब्राह्मणों को निशाना बनाने वाली इस हिंसा ने आनंद खटवाकर के पूरे परिवार को गरीबी के गर्त में धकेल दिया। अपनी आपबीती सुनाते हुए वे बताते हैं:
मेरा परिवार इसका जीता-जागता सबूत है। मेरे दादा उस समय पुणे के सबसे अमीर व्यापारियों में से एक थे, उनके पास तीन कपड़े की दुकानें थीं। लेकिन एक सुनियोजित हमला हुआ, जिसमें उनकी दुकानें जला दी गईं। एक ही झटके में पूरा परिवार कंगाल हो गया। क़र्ज़ चुकाने के लिए सारी संपत्ति बेचनी पड़ी। इस नुकसान से उबरने में परिवार को करीब 30 साल लग गए—हम 1970 के दशक के अंत तक जाकर ही कुछ संभल पाए।[8]

सावरकर परिवार पर कहर

सत्ताधारी पार्टी के भड़कावे पर बेकाबू भीड़ ने वीर सावरकर के घर पर हमला कर दिया। घटनाओं से साफ़ दिखता है कि इस स्वतंत्रता सेनानी के खिलाफ पहले से ही साज़िश चल रही थी। गांधी की हत्या वाले दिन ही सावरकर के दोनों अंगरक्षकों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे उनकी सुरक्षा समाप्त हो गई। इसके तुरंत बाद दादर स्थित सावरकर सदन पर भीड़ टूट पड़ी। घर में तोड़फोड़ हुई, लाइब्रेरी जला दी गई और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज नष्ट कर दिए गए। लेकिन कुछ समर्पित अनुयायियों की मदद से सावरकर किसी तरह बच निकले।[9]

भीड़ इस बात से और भी उग्र हो गई कि वह वीर सावरकर तक नहीं पहुँच पाई। उसने अपना गुस्सा उनके छोटे भाई नारायणराव सावरकर पर उतारा, जो एक डॉक्टर थे और गरीबों की सेवा के लिए प्रसिद्ध थे। उन्मादी भीड़ ने उन्हें पत्थरों से बुरी तरह पीटा, और गंभीर चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस निर्मम हत्या के बावजूद किसी एक व्यक्ति को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया।

वीर सावरकर ने अपनी इस पारिवारिक त्रासदी पर लिखा:
जिसने जीवनभर राष्ट्र की सेवा की, जिसने जनता के लिए दिन-रात खपाया, जिसने अंग्रेज़ों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया, जिसने भारत माता की मुक्ति के लिए जीवन अर्पित किया, उसी को आज उन्हीं भाइयों ने पत्थर मारकर मार डाला, जिनके लिए वह लड़ा था।”

यह विडंबना ही थी कि जिस परिवार ने भारत की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उसी परिवार को भारत के ही लोगों ने तबाह कर दिया। कुछ संपन्न ब्राह्मण परिवार अमेरिका और अन्य देशों में पलायन कर गए। जो आर्थिक सामर्थ्य की कमी के चलते विदेश नहीं जा सके, उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर बसना चुना—ताकि उनकी अगली पीढ़ियाँ सुरक्षित रह सकें।

सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की भूमिका

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता द्वारका प्रसाद मिश्रा, जो बाद में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी बने, ने अपनी आत्मकथा लिविंग इन ऐन एरा: इंडिया’स मार्च टू फ्रीडम में स्वीकार किया कि नागपुर और बेरार में हुई हिंसा में कांग्रेस पार्टी के सदस्य शामिल थे। 100 से ज़्यादा लोगों की गिरफ़्तारी हुई, लेकिन किसी पर भी मुकदमा नहीं चला।[10]

मिश्रा लिखते हैं: “गांधीजी की हत्या के बाद दंगाइयों की भीड़ ने ब्राह्मणों के घरों और दुकानों पर हमला किया और उन्हें जलाने की कोशिश की। यहाँ तक कि ब्राह्मणों द्वारा चलाए जा रहे शैक्षणिक संस्थानों को भी नहीं बख्शा गया। नागपुर के जोशी हाई स्कूल को आग के हवाले कर दिया गया। फायर ब्रिगेड को भी भीड़ ने लौटने पर मजबूर कर दिया। इन भयावह और दिल दहला देने वाली घटनाओं में ज़्यादातर गैर-ब्राह्मण हमलावर कांग्रेस पार्टी से ही थे। कुछ तो कांग्रेस की स्थानीय समितियों के पदाधिकारी भी थे।[11]

इतिहासकार विक्रम संपत भी मानते हैं कि कांग्रेस के कार्यकर्ता, और यहाँ तक कि पार्टी पदाधिकारी, इस हिंसा में सीधे तौर पर शामिल थे। कुछ ने साज़िश की योजना बनाने में भूमिका निभाई, तो कुछ स्वयं सक्रिय रूप से हिंसा का हिस्सा बने। इतनी बड़ी संख्या में गिरफ़्तारियाँ होने के बावजूद किसी पर मुक़दमा न चलना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।[12]

ब्रिटिश पत्रकार मॉरीन पैटरसन और इतिहासकार आरती अग्रवाल का कहना है कि पुलिस रिकॉर्ड्स जानबूझकर दबा दिए गए, और भारतीय मीडिया ने इन घटनाओं को या तो बहुत कम कवर किया या पूरी तरह अनदेखा कर दिया—ताकि सत्तारूढ़ पार्टी की छवि को नुकसान न पहुँचे या हालात और न बिगड़ें[13]

इतिहासकार कोएनराड एल्स्ट लिखते हैं: “आमतौर पर जनसंहारों में मरने वालों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, लेकिन इस मामले में ठीक उलटा हुआ—सरकार ने जानबूझकर आंकड़े दबा दिए, ताकि गांधीवाद की छवि को कोई नुकसान न पहुँचे और इसे नकारात्मक रूप में न देखा जाए।[14]

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को मासूम ब्राह्मणों पर हुए भीषण अत्याचारों की पूरी जानकारी थी। फिर भी, बिना किसी ठोस सबूत के, उन्होंने गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दोषी ठहरा दिया—जबकि गोडसे काफी पहले ही संघ छोड़ चुका था। 14 मार्च 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा ज़िले में नेहरू ने यह तक कह दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो वह अपने पद से इस्तीफ़ा देकर संघ से लड़ने के लिए मैदान में उतरने को तैयार हैं।[15]

क्या नेहरू के इस बयान का अर्थ यह निकाला जाए कि वे हिंदू कार्यकर्ताओं के घर जलाने और उनकी हत्याएँ करने तक के लिए तैयार थे? इतना तो स्पष्ट है कि नेहरू और उनके बाद की सरकारों के पास ब्राह्मणों के इस नरसंहार से जुड़े हर रिकॉर्ड को मिटा देने का पूरा कारण था।

एक ऐसा नरसंहार जो इतिहास के पन्नों में दफ़न रह गया

चितपावन ब्राह्मणों का नरसंहार स्वतंत्र भारत की उन विरल सांप्रदायिक घटनाओं में से एक है, जिसकी न तो पर्याप्त रिपोर्टिंग हुई और न ही इसे इतिहास में ठीक से दर्ज किया गया। मृतकों की संख्या को लेकर व्यापक असहमति है—कहीं कुछ दर्जनों का अनुमान मिलता है, तो कहीं यह आँकड़ा 12,000 तक पहुँचता है। किंतु सटीक संख्या आज भी अज्ञात है।

इस घटना की अनदेखी के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है सरकारी रिकॉर्ड्स का दबाया जाना और मीडिया की चुप्पी। पुलिस फाइलें अब तक जनता की पहुँच से बाहर हैं। स्वाभाविक प्रश्न उठता है—क्या सरकार ने जानबूझकर सबूतों को दफन कर दिया? तुलना करें तो, 1984 के सिख विरोधी दंगे विस्तृत जाँच, मीडिया कवरेज और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टिंग में दर्ज हुए, जबकि 1948 की यह हिंसा लगभग पूरी तरह उपेक्षित रही। उस समय प्रेस स्वतंत्रता सीमित थी, रेडियो सरकार के नियंत्रण में था, और अख़बारों में कवरेज नगण्य। न जवाबदेही की कोई ठोस व्यवस्था थी और न ही बाद में कोई गंभीर अकादमिक शोध हुआ। परिणामस्वरूप, आज भी इतिहासकार बिखरे स्रोतों पर निर्भर हैं—पीड़ितों की गवाही, कुछ विदेशी समाचार रिपोर्टें, और इक्का-दुक्का राजनीतिक आत्मकथाएँ। कोएनराड एल्स्ट जैसे विद्वानों का मानना है कि व्यवस्थित अध्ययन के अभाव ने इस त्रासदी को लगभग इतिहास की स्मृति से मिटा दिया।

शोध की कमी ने सटीक आँकड़ा तय करना और समग्र डेटा तैयार करना बेहद कठिन बना दिया। विक्रम संपत का अनुमान—2,000 से 5,000 मृतकों का—फिलहाल सबसे विश्वसनीय माना जाता है, यद्यपि प्राथमिक दस्तावेज़ों की अनुपस्थिति इसकी पुष्टि को सीमित करती है।

इस नरसंहार की एक और चुनौती थी इसका व्यापक भौगोलिक फैलाव। यह केवल किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महाराष्ट्र के 300 से अधिक जिलों में फैला, जिनमें सतारा, कोल्हापुर और बेलगाम जैसे ग्रामीण क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए। कमजोर संचार व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत ने केंद्रीकृत दस्तावेज़ीकरण को लगभग असंभव बना दिया। हिंसा भले ही चार-पाँच दिन चली, पर उसकी तीव्रता—हत्या, बलात्कार, आगज़नी और लूटपाट—अत्यंत विनाशकारी थी। न मृतकों की आधिकारिक गिनती हुई, न किसी ठोस जाँच या मूल्यांकन की प्रक्रिया चली। नतीजतन, इस त्रासदी का अधिकांश सच इतिहास में दबकर रह गया।

यदि 1984 के सिख विरोधी दंगों को आधार बनाकर 1948 की इस हिंसा का अनुमान लगाया जाए, तो उसकी भयावहता और स्पष्ट होती है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 3,000 से अधिक लोग मारे गए थे, मुख्यतः दिल्ली और उत्तर भारत में। वे हमले भी सुनियोजित और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त थे, जिनमें कांग्रेस की मिलीभगत रही[16] 1948 की हिंसा का भौगोलिक विस्तार इससे कहीं अधिक था—300 से अधिक जिलों में—और लक्षित हमलों का तरीका भी लगभग वैसा ही था। ऐसे में यह तर्कसंगत प्रतीत होता है कि मृतकों की संख्या हज़ारों में रही होगी और संभवतः 1984 से भी अधिक।

भौगोलिक विस्तार, हिंसा की तीव्रता, बचे हुए पीड़ितों की गवाही और दबे हुए रिकॉर्ड्स को देखते हुए एक संतुलित अनुमान यही है कि मृतकों की संख्या लगभग 3,000 से 6,000 के बीच रही होगी। यह अनुमान न तो घटना को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है और न ही उसे कम करके आँकता है। यह यथार्थपरक आकलन विक्रम संपत के अनुमानों से भी मेल खाता है।

लेकिन यह केवल संख्या की बात नहीं है। यह अनुमान उस हिंसा की सुनियोजित प्रकृति को उजागर करता है—जहाँ एक पूरे समुदाय को सोच-समझकर निशाना बनाया गया, और साथ ही पीड़ितों के लंबे समय तक चले विस्थापन, आर्थिक तबाही और संस्थागत चुप्पी की भयावहता को भी सामने लाता है।

दफ़न सच को उजागर करने की ज़रूरत

चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार की असली तस्वीर सामने लाने के लिए कई स्तरों पर ठोस प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, यदि 1948 के पुलिस और प्रशासनिक दस्तावेज़ अब भी सुरक्षित हैं, तो उन्हें तुरंत सार्वजनिक किया जाना चाहिए। सतारा, कोल्हापुर और पुणे जैसे जिलों के राजकीय अभिलेखागारों में महत्वपूर्ण सुराग़ छिपे हो सकते हैं—ज़मीन के रिकॉर्ड, प्राथमिकी रिपोर्टें (FIRs) और उस समय की प्रशासनिक चिट्ठियाँ, जिनकी सावधानीपूर्वक जाँच से घटनाओं की कड़ियाँ जुड़ सकती हैं।

जिस तरह होलोकॉस्ट और भारत विभाजन पर शोध में जीवित बचे लोगों की गवाही निर्णायक रही, उसी तरह इस नरसंहार में भी बचे हुए लोगों और उनके वंशजों की स्मृतियों को सुनना, दर्ज करना और संरक्षित करना अनिवार्य है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया—द टाइम्स (यूके), द गार्डियन, द न्यूयॉर्क टाइम्स, टाइम मैगज़ीन और द शिकागो ट्रिब्यून—ने गांधी की हत्या पर व्यापक रिपोर्टिंग की थी; उनके पुरालेखों में इस हिंसा से जुड़े संदर्भ या विवरण मिलने की संभावना है।

अंततः, 1984 के सिख विरोधी दंगों जैसे बेहतर दस्तावेजीकृत नरसंहारों के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन न केवल इस घटना का ऐतिहासिक संदर्भ समझने में मदद करेगा, बल्कि मौतों और नुकसान के अधिक सटीक अनुमान लगाने का आधार भी देगा।

निष्कर्ष

1948 का चितपावन ब्राह्मण नरसंहार इतिहास के पन्नों में गुम होकर रह गया। इसकी वजह यह नहीं थी कि उसमें त्रासदी की कोई कमी थी; बल्कि यह नरसंहार इतना नृशंस और भयावह था कि इसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ, मीडिया की उदासीनता और संस्थागत चुप्पी के कारण यह घटना खामोशी के साए में दफन हो गई।

आज, जब भारत अपने अतीत की कड़वी सच्चाइयों का ईमानदारी से सामना करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब इस काले अध्याय पर रोशनी डालना केवल ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न नहीं है; यह न्याय, स्मृति और सत्य को जानने के अधिकार का भी सवाल है। जब तक हम इस तरह की लक्षित हिंसा से जुड़े सत्य को पहचानकर उसका दस्तावेज़ीकरण नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाएँ यूँ ही इतिहास के पन्नों में गुम होती रहेंगी।

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि गांधी और उनके अनुयायियों का “पूर्ण अहिंसा” का सिद्धांत मुख्यतः ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ राजनीतिक प्रदर्शन का एक साधन भर था। जो ब्रिटिश लगभग 200 वर्षों तक भारत पर अवैध रूप से शासन कर रहे थे, उनके ख़िलाफ़ हथियार उठाना “अहिंसा” के नाम पर वर्जित था। उसी तरह, मुस्लिम समुदायों को छूना भी मना था। इस प्रकार गांधी का “पूर्ण अहिंसा” सिद्धांत अंततः हिंदुओं को भ्रमित करने का एक औज़ार बन गया। अहिंसा के नाम पर हिंदू समाज को इस हद तक ब्रेनवॉश कर दिया गया कि वे देशभर में मुस्लिम भीड़ के हमलों के ख़िलाफ़ अपना बचाव तक करने में असमर्थ हो गए।[17]

लेकिन जैसे ही इस हिंसा का निशाना ब्राह्मण बने, कांग्रेस ने इस “अहिंसा” की चादर उतार फेंकी। एक निहत्थे और शांतिप्रिय हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ संगठित हिंसा की गई—और गांधी के अनुयायियों ने स्वयं उसमें भाग लिया। 1984 में यही क्रम फिर दोहराया गया—इस बार सिखों को टार्गेट करके, ताकि सत्ता पर पकड़ और मजबूत की जा सके। इसलिए यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि गांधी की मृत्यु के साथ ही तथाकथित “गांधीवाद” ने भी अपने प्राण त्याग दिए।[18]

सन्दर्भ सूची

[1] It is about time we talk about the 1948 genocide of Maharashtrian Brahmins that followed M K Gandhi’s assassination (OpIndia, 2022); https://www.opindia.com/2022/01/maharashtra-brahmin-massacre-nathuram-godse-gandhi-assassination/

[2] Hindu Rashtra Darshan (Veer Savarkar); https://library.bjp.org/jspui/bitstream/123456789/286/1/Hindu%20Rashtra%20Darshan.pdf

[3] How Nehruvian Congress manipulated Mahatma Gandhi’s assassination to emasculate Hindu nationalism (Firstpost, 2022); https://www.firstpost.com/opinion/how-nehruvian-congress-manipulated-mahatma-gandhis-assassination-to-emasculate-hindu-nationalism-10961811.html

[4] “The First Political Massacre of Chitpavan Brahmins in Independent India” (Adhiyajna Sharma in Medium, 2020); https://medium.com/%40AdhiyajnaSharma/after-hundreds-of-years-of-freedom-struggle-india-got-her-independence-from-foreigners-in-563aeb7db7f7

[5] Congress officials orchestrated anti-Brahmin pogrom after Gandhi’s death, no cases were filed: Vikram Sampath (TimesNowNews.Com, 2021); https://www.timesnownews.com/india/article/congress-officials-orchestrated-anti-brahmin-pogrom-after-gandhi-s-death-no-cases-were-filed-vikram-sampath/789834

[6] It is about time we talk about the 1948 genocide of Maharashtrian Brahmins that followed M K Gandhi’s assassination (OpINdia, 2022); https://www.opindia.com/2022/01/maharashtra-brahmin-massacre-nathuram-godse-gandhi-assassination/

[7] The Brahmin Files: Independent India’s First Political Genocide (IgauravMahajan); https://igauravmahajan.in/the-brahmin-files-independent-indias-first-political-genocide/

[8] Maharashtran Brahmin Genocide – 8000 Killed (Arti Agarwal in Hindu Genocide, 2019); https://hindugenocide.com/political-crimes/1948-maharashtrian-brahmin-genocide-8000-killed/

[9] The Brahmin Files: Independent India’s First Political Genocide (IgauravMahajan); https://igauravmahajan.in/the-brahmin-files-independent-indias-first-political-genocide/

[10] It is about time we talk about the 1948 genocide of Maharashtrian Brahmins that followed M K Gandhi’s assassination (OpINdia, 2022); https://www.opindia.com/2022/01/maharashtra-brahmin-massacre-nathuram-godse-gandhi-assassination/#google_vignette

[11] The untold story of Maharashtrian Brahmin genocide committed by Congress after Gandhi’s death – No cases were filed (Satyagrah.Com); https://satyaagrah.com/history/hindu-genocide/563-the-untold-story-of-maharashtrian-brahmin-genocide-committed-by-congress-after-gandhi%25E2%2580%2599s-assassination-in-1948

[12] Congress officials orchestrated anti-Brahmin pogrom after Gandhi’s death, no cases were filed: Vikram Sampath (TimesNowNews.Com, 2021); https://www.timesnownews.com/india/article/congress-officials-orchestrated-anti-brahmin-pogrom-after-gandhi-s-death-no-cases-were-filed-vikram-sampath/789834

[13] The untold story of Maharashtrian Brahmin genocide committed by Congress after Gandhi’s death – No cases were filed (Satyagrah.Com); https://satyaagrah.com/history/hindu-genocide/563-the-untold-story-of-maharashtrian-brahmin-genocide-committed-by-congress-after-gandhi%25E2%2580%2599s-assassination-in-1948

[14] How Nehruvian Congress manipulated Mahatma Gandhi’s assassination to emasculate Hindu nationalism (Firstpost, 2022); https://www.firstpost.com/opinion/how-nehruvian-congress-manipulated-mahatma-gandhis-assassination-to-emasculate-hindu-nationalism-10961811.html

[15] The untold story of Maharashtrian Brahmin genocide committed by Congress after Gandhi’s death – No cases were filed (Satyagrah.Com); https://satyaagrah.com/history/hindu-genocide/563-the-untold-story-of-maharashtrian-brahmin-genocide-committed-by-congress-after-gandhi%25E2%2580%2599s-assassination-in-1948

[16] Rajiv Gandhi responsible for anti-Sikh riots – Satpal Singh Satti (The Times of India, 2019); https://timesofindia.indiatimes.com/city/shimla/take-back-bharat-ratna-conferred-on-rajiv-gandhi-satti/articleshow/69287607.cms

[17] Learning from Mahatma Gandhi’s Mistakes – 2 (Konraad Elst in Center for Indic Studies); https://cisindus.org/indic-varta-internal.php?vartaid=105

[18] Gandhi’s philosophy of ‘ahimsa’ died with him.” Arti Agarwal on Chitpavan Brahmins (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=89NNPeDFZE8

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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