भारत में जातीय जनगणना की राजनीति: हिन्दू-विरोधी अंग्रेजी षड्यंत्र की परिणति
- ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने हिन्दू समाज को कमजोर करने के लिए जातिगत जनगणना की एक रणनीतिक प्रणाली बनाई, जिसमें ‘जाति‘ को नस्ल, नाक की बनावट और खानपान जैसी बातों से जोड़कर कृत्रिम वर्गीकरण किया गया।
- वेदों और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, न कि नस्ल आधारित; परंतु पश्चिमी भाषाविदों और मिशनरियों ने इसे जानबूझकर नस्लीय भेद के रूप में प्रस्तुत किया।
- फ्रेडरिक मैक्समूलर और हर्बर्ट रिस्ले जैसे विद्वानों ने वेदों की तोड़-मरोड़ कर व्याख्या की और ‘आर्य-द्रविड़’ सिद्धांत जैसे झूठे आख्यान गढ़े, जिससे भारत की सामाजिक संरचना को खंडित किया गया।
- ब्राह्मणों को धर्मांतरण में बाधक मानते हुए मिशनरियों ने उन्हें टार्गेट किया और जनगणना के माध्यम से हिन्दू समाज में अंदरूनी विभाजन को बढ़ावा दिया।
- आज की जातिगत जनगणना प्रणाली उसी औपनिवेशिक नस्लवाद पर आधारित है; जब तक उसे नकारा नहीं जाता, तब तक भारत की सामाजिक एकता और ऐतिहासिक स्मृति पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकती।
इन दिनों पूरे भारत में जातिगत जनगणना को लेकर जो राजनीतिक हलचल मची है, उसके पीछे एक गहरी बौद्धिक साजिश है, जो ‘श्वेत चमड़ी’ की श्रेष्ठता और रिलीजियस विस्तारवाद की सोच से जुड़ी है। यह साजिश अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाई गई थी ताकि उनके शासन को उचित ठहराया जा सके। उस समय चर्च और ईसाई मिशनरियों को बढ़ावा देने के लिए हिन्दू समाज को तोड़ना और छोटा करना इस योजना का अहम हिस्सा था।
इसी मकसद से अंग्रेजों ने जनगणना की एक ऐसी पद्धति बनाई जिससे हिन्दू समाज को सैकड़ों जातियों और नस्लों में बाँटकर उसका भू-सांस्कृतिक आकार घटाया जाए और उसे ईसाई या इस्लाम जैसे संगठित मजहबों के मुकाबले एक कमजोर, बिखरा हुआ समुदाय बना दिया जाए। वरना, इतनी बड़ी आबादी वाले समाज में जाति या नस्ल के आधार पर ऐसी पहचान थोपने की कोई तुक नहीं थी।
अंग्रेजों द्वारा बनाए गए जनगणना फॉर्म में मुस्लिमों को सीधे ‘मुस्लिम’ के रूप में गिना गया, लेकिन हिन्दू समाज को अलग-अलग जातीय और नस्ली पहचान देकर तोड़ा गया, और फिर जो थोड़े लोग बचे, उन्हें ही ‘हिन्दू’ माना गया। 1891 के जनगणना आयुक्त अर्थल्स्टेन बेन्स ने लिखा भी कि जैन, बौद्ध, सिख, आदिवासी और इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी मतावलंबियों की गिनती के बाद जो बाकी बचता है, वही ‘हिन्दू’ है।[1]
औपनिवेशिक शासन से पहले भारत की स्थिति; वर्ण-व्यवस्था और जाति-
यह जानना जरूरी है कि हिन्दू समाज में ‘जाति’ जैसी कोई व्यापक सामाजिक संरचना न तो किसी भारतीय धर्मशास्त्र में मिलती है, और न ही भारत के असली ऐतिहासिक ग्रंथों में इसका कोई ज़िक्र है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. निकोलस डर्क्स भी कहते हैं कि “जाति, भारतीय परंपरा की मूल पहचान नहीं है।” उनके अनुसार, ‘जाति’ असल में एक आधुनिक चीज़ है, जो भारत और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बीच हुई ऐतिहासिक टकराव का नतीजा है।”[2]
ब्रिटिश शासन के दौर में भारतीय समाज में लोगों की पहचान कई आधारों पर होती थी — जैसे मंदिर-समुदाय, गांव और पड़ोस, वंश-गोत्र, पारिवारिक या पेशेवर समूह, और विभिन्न आध्यात्मिक-धार्मिक पंथ। 16वीं–17वीं सदी के यूरोपीय यात्रियों ने ‘जाति’ का ज़िक्र बहुत ही कम किया है। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सैन्य अधिकारी और लेखक-अनुवादक अलेक्जेंडर डॉव ने 1768 में फारसी इतिहासकार मोहम्मद काशिम अस्तराबादी की किताब ‘हिन्दोस्तान का इतिहास’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद ‘हिस्ट्री ऑफ हिन्दोस्तान’ नाम से किया था।[3] उस ग्रंथ में डॉव ने ‘जाति’ को सिर्फ एक पृष्ठ में ही समेटा है, जिससे साफ पता चलता है कि उस समय भारत में ‘जाति’ कोई अहम मुद्दा नहीं था। शुरुआती यूरोपीय लेखकों ने ‘जाति’ को भारत की कोई अनोखी विशेषता नहीं माना, बल्कि उन्होंने अपनी ही समाज में प्रचलित ‘कास्ट सिस्टम'[4] की समझ के आधार पर भारतीय वर्ण-व्यवस्था को उसी जैसा मान लिया।
प्राचीन भारतीय समाज में व्यवसाय आधारित जातियाँ ज़रूर थीं, लेकिन आज जो जातिवाद है, वह रूप तब नहीं था। यूरोपीय लेखक मेगस्थनीज, जो लंबे समय तक भारत में रहा, उसने ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में लिखा कि भारतीय समाज सात व्यावसायिक वर्गों में बँटा हुआ था। लेकिन यह वर्गीकरण भारत की वर्ण-व्यवस्था जैसा न होकर, उस समय की रोमन सामाजिक व्यवस्था जैसा था, जिससे वह खुद परिचित था।[5]
आज जो जातिवाद अपने विकृत रूप में मौजूद है, वह असल में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा है। यह रणनीति रिलीजियस विस्तारवाद की नीतियों और उससे जुड़े बुद्धिजीवियों की चालों से पैदा हुई। प्राचीन भारत से लेकर अंग्रेजी शासन आने तक, जातियाँ कोई स्थिर व्यवस्था नहीं थीं। वे चार वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — के भीतर समय के साथ उभरती और विलीन होती रहती थीं। ब्राह्मण यानी धार्मिक शिक्षक, कई बार कथित निचली जातियों से भी होते थे। उदाहरण के लिए, संत रविदास एक चर्मकार थे — चमड़े का काम करने वाले, और संत कबीर एक जुलाहा — यानी बुनकर।
मानवविज्ञानी सुज़ैन बेली भी कहती हैं, “असल में, इस बात पर संदेह है कि अंग्रेजों द्वारा ‘जाति’ को भारत की प्रमुख सामाजिक पहचान बनाए जाने से पहले इसका कोई खास असर या उग्रता समाज में थी।”[6] क्योंकि निकोलस डर्क्स, जी.एस. घुर्ये, रिचर्ड ईटन, डेविड शुलमैन और सिंथिया टैलबोट जैसे इतिहासकारों और भाषाविदों द्वारा शाही दरबारों के दस्तावेज़ों और यात्रियों के विवरणों पर किए गए अध्ययन में यह पाया गया है कि पूर्व-औपनिवेशिक भारत के लिखित रिकॉर्ड में ‘जाति’ का ज़िक्र या तो बहुत कम है या बिल्कुल नहीं। उस समय सामाजिक पहचानें स्थिर नहीं थीं — वे लगातार बदलती रहती थीं। कई बार ‘दास’, ‘नौकर’ या ‘व्यापारी’ राजा बन जाते थे; किसान सैनिक बन जाते थे और सैनिक किसान बन जाते थे। एक व्यक्ति की सामाजिक पहचान गाँव बदलते ही बदल सकती थी। साथ ही, व्यवस्थित और व्यापक जातिगत उत्पीड़न या उसके चलते बड़े पैमाने पर इस्लाम कबूलने के प्रमाण भी बहुत कम मिलते हैं।[7]
हिन्दू-धर्मशास्त्रों में ‘जाति’ नहीं, ‘जात’ की महत्ता
सनातन हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथ माने जाने वाले चारों वेदों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — में कहीं भी ‘जाति’ (जैसे आज समझी जाती है) का उल्लेख नहीं मिलता। लेकिन अथर्ववेद और अन्य कुछ ग्रंथों में ‘जात’ शब्द का ज़िक्र ज़रूर है। ‘जात’ का मतलब है जातकर्म — जो शास्त्रों में वर्णित 16 वैदिक संस्कारों में से एक है।[8] इस संस्कार में नवजात शिशु की गर्भनाल काटी जाती है, पिता उसे कुल और गोत्र प्रदान करता है, और मां उसे स्वर्ण-युक्त औषधि के साथ पहला स्तनपान कराती है। ‘जात’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — उत्पन्न हुआ या जन्मा हुआ।
जातकर्म का उद्देश्य दो स्तरों पर होता था: व्यक्तिगत स्तर पर शिशु की कुल, गोत्र और परिवार से पहचान जोड़ना, और सामूहिक स्तर पर समाज को यह जिम्मेदारी देना कि वह शिशु के लिए उसकी पारंपरिक आजीविका के अनुरूप अवसर और प्रशिक्षण सुनिश्चित करे। यानी, जिस समाज में बच्चा जन्मा है, वहां की पारंपरिक आजीविका (व्यवसाय) भविष्य में उसके लिए सहज हो और समाज उसे उसी दिशा में मार्गदर्शन दे — यही जातकर्म का भाव था।
इसलिए उस समय ‘जात’ का अर्थ था व्यवसाय या पेशे से जुड़े समुदाय — जैसे नोनिया (नमक बनाने वाले), तेलिया (तेल निकालने वाले), हलवाई (मिठाई बनाने वाले), लोहार (लोहा कारीगर), चर्मकार (चमड़े का काम), कुम्हार (मिट्टी के बर्तन), धोबी (कपड़े धोने वाले), स्वर्णकार (सुनार) आदि। अगर पश्चिमी भाषा में कहें तो ये ‘जात’ असल में ‘उत्पादक समूह’ या मैन्युफैक्चरिंग कम्युनिटीज़ थे। इसी तरह, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भी जातियाँ बनती गईं — जैसे बंगाली, पंजाबी, मराठा, बिहारी आदि।
जाति का रुपान्तरण और ‘कास्ट’ का चलन
किन्तु आज की जो ‘जाति’ प्रचलन में है, वह न तो सनातन हिन्दू परंपरा की ‘जात’ से मेल खाती है, न ही कर्म-आधारित जातियों की मूल अवधारणा से। भले ही ‘जाति’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘ज्ञाति’ शब्द से हुई है — जिसका अर्थ वेदों में “एक ही कुल या गोत्र से उत्पन्न व्यक्ति” होता था — लेकिन आज का उपयोग इससे बिल्कुल अलग दिशा में चला गया है। वर्तमान समय में ‘जाति’ शब्द का अर्थ सीधा ‘कास्ट’ (Caste) हो गया है, जो असल में पुर्तगाली भाषा के ‘कास्टा’ शब्द से आया है। ‘कास्टा’ का मतलब होता है — ‘ब्रीड’ या नस्ल। आज भारत में सरकारी दस्तावेजों, फॉर्मों और राजनीतिक विमर्श में ‘जाति’ का इस्तेमाल इसी यूरोपीय ‘कास्ट’ के अर्थ में हो रहा है, जो नस्लीय भेद पर आधारित है।
मानवविज्ञानी सुज़ैन बेली के अनुसार, “ब्रिटिश शासन से पहले भारत के ज़्यादातर हिस्सों में जाति के सख्त भेदों का कोई खास महत्व नहीं था — यहाँ तक कि तथाकथित ‘हिंदू हृदय क्षेत्र’ में भी नहीं। जो संस्थाएँ और धारणाएँ आज पारंपरिक जाति व्यवस्था के रूप में मानी जाती हैं, वे वास्तव में 18वीं शताब्दी की शुरुआत में ही आकार लेने लगी थीं।” [9]
अब सवाल उठता है — आख़िर वेदों में वर्णित ‘जात’ और ‘ज्ञाति’ जैसी लचीली अवधारणाएँ, कैसे बदलकर आज की विखंडनकारी ‘कास्ट-जाति’ बन गई, जिसने समाज को बाँट दिया और राजनीति को भी अपनी पकड़ में ले लिया? इस बदलाव को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि उस दौर में पश्चिम के कुछ भाषाशास्त्रियों और विद्वानों को संस्कृत का ज्ञान हो गया था। इस ज्ञान के आधार पर जब उन्होंने भारत और हिंदू परंपरा की गहराई को जाना, तो वे ईर्ष्या और मानसिक असुरक्षा से भर उठे। उन्होंने खुद अपनी नस्ल और चमड़ी की श्रेष्ठता को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए — और यहीं से शुरू हुआ वह बौद्धिक द्वेष, जिसने ‘जाति’ की नई परिभाषा गढ़ी।
वेद-वर्णित आर्य-श्रेष्ठता के ज्ञान से उपजा नस्ल-विज्ञान और षड्यंत्रकारी आख्यानों का अभियान
जब यूरोप के अंग्रेज, जर्मन और फ्रेंच भाषाविदों का संपर्क सनातन धर्म के मूल ग्रंथ वेदों से हुआ, और उन्होंने वेदों में प्रयुक्त ‘आर्य’ शब्द और उसके श्रेष्ठता-सूचक अर्थ को समझा, तो वे खुद को ही आर्य साबित करने की होड़ में लग गए। इसी सोच के तहत 19वीं शताब्दी के मध्य में एक फ्रेंच लेखक जोसेफ आर्थर कॉम्ट डी गोबिनो ने एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी — ‘Essay on the Inequality of Human Races’ (मानव जातियों की असमानता पर निबंध)। इस किताब में उसने यह दावा किया कि “श्वेत जाति (White Race) सभी मानव जातियों से श्रेष्ठ है, और आर्य जाति श्वेत लोगों में सबसे ऊँचे स्थान पर है।” इस विचार ने यूरोप में नस्लीय श्रेष्ठता (racial superiority) और उपनिवेशवादी सोच को वैचारिक आधार दिया, और आगे चलकर इसी से जाति, नस्ल और धर्म के नाम पर दुनिया भर में भेदभाव और दमन को नैतिक जामा पहनाया गया।[10]
इसके बाद पश्चिमी जगत में ‘वैज्ञानिक नस्लवाद’ (Scientific Racism) के नाम से एक पूरा बौद्धिक आंदोलन शुरू हो गया, जिसमें भारत से जुड़े तरह-तरह के झूठे आख्यान (narratives) गढ़े जाने लगे। इस अभियान को गोबिनो की उसी किताब से भरपूर सामग्री मिल गई। उस पुस्तक में गोबिनो ने बेहद चालाकी से यह तर्क गढ़ा कि, “आर्य, जो श्वेत नस्ल की सर्वोच्च क्षमता का प्रतिनिधित्व करते थे, उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण किया और वहाँ के मूल निवासियों के साथ घुलना-मिलना शुरू कर दिया। लेकिन जब उन्हें यह एहसास हुआ कि इस मेलजोल से नस्लीय शुद्धता खतरे में पड़ सकती है, तो उन्होंने आत्म-संरक्षण के उपाय के रूप में वर्ण-व्यवस्था का निर्माण किया।” इस तरह, उन्होंने भारत की वर्ण व्यवस्था को नस्लीय भेदभाव की एक रणनीति के रूप में पेश किया — जबकि वास्तविकता में यह व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित थी, न कि रक्त या नस्ल पर। इस झूठे विमर्श ने आगे चलकर भारत में जाति व्यवस्था को नस्लीय शोषण का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया और भारत की परंपराओं को बदनाम करने का आधार बना।।”[11]
ऑर्थर डे गोबिनो की उसी स्थापना को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में लगे एक प्रसिद्ध भाषाविद् फ्रेडरिक मैक्समूलर[12] ने और आगे बढ़ाया। उसने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को वैध ठहराने, उसे मजबूत करने और ईसाई धर्म के प्रचार को आसान बनाने के लिए एक पूरी तरह काल्पनिक और गढ़ा हुआ आख्यान प्रस्तुत किया। उसका कथन था कि “गौतम बुद्ध के समय से पहले पूरी मानवता एशिया के स्टेपी क्षेत्र में रहती थी। समय के साथ उस समाज के कुछ समूह अलग-अलग दिशाओं में गए — एक पश्चिम की ओर जाकर यूरोप में बस गया, दूसरा ईरान पहुंचा, और तीसरा पूरब की ओर बढ़ते हुए भारत आया। भारत में पहुँचकर उन्होंने पहले से बसे हुए लोगों, यानी मूल निवासियों, को दक्षिण की ओर खदेड़ दिया।”
मैक्समूलर के अनुसार, वे जो खदेड़े गए लोग थे, वे द्रविड़ कहलाए, और जो उनके स्थान पर बस गए, वे आर्य कहलाए। इस तरह का काल्पनिक सिद्धांत आगे चलकर न सिर्फ भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आधार बना, बल्कि आर्य-द्रविड़ विभाजन को भी एक गहरी सांस्कृतिक और राजनीतिक खाई में बदलने का औजार बना दिया गया।“[13] बाद में इसी आधार पर वर्ष 1881 में ब्रिटिश प्रशासकों ने ‘इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया’ नाम से भारत का पहला गजेटियर प्रकाशित किया। इस दस्तावेज़ में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — इन तीन वर्णों को ‘आर्य’ के रूप में दर्ज किया गया, जबकि शूद्रों को ‘मूल निवासी’, यानी ‘द्रविड़’ घोषित कर दिया गया।
यह पहला ऐसा सरकारी दस्तावेज़ था जिसमें अंग्रेजों ने भारत को लूटने, उसके पारंपरिक उद्योग-धंधों को नष्ट करने और सामाजिक संरचना को तोड़ने के बाद, अब उसकी जनसंख्या रचना (डेमोग्राफी) के साथ भी छेड़छाड़ की — और उसे अपने हिसाब से परिभाषित करने की एक सोची-समझी कोशिश की गई।[14]
षड्यंत्र के सूत्रधार- मैक्समूलर का व्याभिचार
ब्रिटिश हुक्मरानों से प्रति पृष्ठ चार पौंड की दर से मेहनताना लेकर ऋग्वेद का अनुवाद करने वाले मैक्समूलर ने केवल आर्य आगमन और आर्य-द्रविड़ नस्लीय विभाजन की कहानी नहीं गढ़ी, बल्कि उसने इन दोनों के बीच नस्ली भेद स्थापित करने के लिए भी अपने वेदानुवाद में जानबूझकर तोड़-मरोड़ कर एक नया सिद्धांत खड़ा किया।
उसने वेदों में वर्णित वर्णों के बीच शारीरिक अंतर या नस्लीय भेद खोजने की भरपूर कोशिश की, लेकिन कोई ठोस आधार नहीं मिला, क्योंकि वर्ण-व्यवस्था शारीरिक विशेषताओं या नस्ल पर आधारित थी ही नहीं। अंततः निराश होकर उसने ऋग्वेद में प्रयुक्त एक शब्द ‘अनास’ (जिसका वास्तविक अर्थ नासिका से नहीं जुड़ा है) को पकड़कर यह व्याख्या गढ़ दी कि “वेदों में विभिन्न वर्णों की नाक की बनावट का वर्णन है।” [15]
यहीं से मैक्समूलर की यह बौद्धिक धूर्तता जाति और नस्ल निर्धारण के लिए एक प्रभावशाली औजार बन गई, जिसने आगे चलकर भारत की सामाजिक संरचना को नस्लीय दृष्टि से देखने की एक पश्चिमी विकृति को जन्म दिया।
‘नाक-निर्मित’ औजार से रिस्ले ने गढा जातियों का प्रकार
मैक्समूलर के उस बौद्धिक व्याभिचार को लंदन स्थित रॉयल एन्थ्रोपोलॉजिकल इंस्टिट्यूट के एक प्रभावशाली ब्रिटिश अधिकारी हर्बर्ट होप रिस्ले ने तुरंत पकड़ लिया। उसने मैक्समूलर की अधूरी और पक्षपातपूर्ण वेद-व्याख्या को अपनी सुविधा के अनुसार खींच-तानकर एक पूरी ‘नाक-तालिका’ (nasal index chart) तैयार कर दी।
इस नासिका-तालिका को रिस्ले ने एक धारदार औजार की तरह इस्तेमाल किया, जिससे उसने हिन्दू समाज को जातियों में काटने और विखंडित करने की कोशिश की। उसने नाक की लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई के आधार पर यह तय करना शुरू किया कि कौन व्यक्ति किस नस्ल, वर्ण या जाति का है।
उससे पहले भारत में वर्ण-व्यवस्था का नस्ल, अनुवांशिकता या जातीयता से कोई सम्बन्ध नहीं था। वह व्यवस्था व्यक्ति की पारंपरिक जीविका, सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित थी। वहीं ‘जात’ यानी जाति, एक स्थानीय और जमीनी सामाजिक ढाँचा था, जो आमतौर पर क्षैतिज रूप से संगठित रहता था — यानी एक-दूसरे के साथ समानांतर, न कि एक के ऊपर एक पिरामिड की तरह।
यही क्षैतिज, जीविकाधारित और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाली जाति व्यवस्था वह विशिष्टता थी जिसने महात्मा गांधी को ग्राम-स्वराज की कल्पना के लिए प्रेरित किया। हिन्दू समाज में यह जातीय ढांचा रिलीजियस आक्रांताओं और मिशनरी विस्तारवाद के लिए एक बड़ा अवरोध था।
शायद यही कारण था कि जाति-नस्ल भेद की यह पश्चिमी संरचना गढ़ने वाले मैक्समूलर ने स्वयं यह कहा था: “जाति, जो अब तक हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन में बाधा रही है, भविष्य में यही धर्म परिवर्तन के लिए सबसे शक्तिशाली इंजन बन सकती है; न केवल व्यक्तियों के लिए, बल्कि पूरे हिन्दू समाज के वर्गों के लिए।”[16]
किन्तु रिलीजियस विस्तारवाद की औपनिवेशिक साजिश रचने वालों ने हिन्दू समाज की इस पारंपरिक सुरक्षा-व्यवस्था को ही तोड़ने का काम किया। वर्ष 1901 में जब हर्बर्ट होप रिस्ले को भारतीय जनगणना आयोग का आयुक्त बनाया गया और बाद में 1910 में वह इसका अध्यक्ष बना, तब उसने अपनी वही ‘नाक-तालिका’ आधार बनाकर जनगणना करवाई। इस जनगणना में उसने पूरे भारतीय समाज को 2378 जातियों और जनजातियों, 43 नस्लीय समूहों, और आर्य-द्रविड़ नामक दो मुख्य नस्लों में बाँट दिया। यही नहीं, उसने यह दावा भी किया कि “हर भारतीय की असली पहचान को समझने के लिए ‘वर्ण, कबीला और नस्ल’ ही सबसे विश्वसनीय आधार हैं।” इस तरह एक मनगढ़ंत नस्ल-आधारित ढाँचे को सरकारी दस्तावेज़ों और जनगणना प्रणाली में जगह देकर हिन्दू समाज की आत्म-संरक्षण प्रणाली को ही विभाजन और शोषण का औजार बना दिया गया।”[17]
इससे पहले हर्बर्ट रिस्ले ने ‘वर्ण’ शब्द को अंग्रेज़ी के ‘कास्ट’ शब्द से बदल दिया। उसने ‘कास्ट’ शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई सिद्धांत प्रस्तुत किए और भारत की सामाजिक व्यवस्था को समझाने के लिए मनुस्मृति का हवाला दिया। उसने लिखा कि “जाति की उत्पत्ति के विषय में साहित्य में कई तरह के सिद्धांत मिलते हैं। इसका उल्लेख मनुस्मृति के दसवें अध्याय में है, जो धर्म, कानून, परंपरा और अध्यात्म का एक मिश्रण है, और जिसे ‘इन्स्टीट्यूट ऑफ मनु’ कहा जाता है।” इस तरह रिस्ले ने भारतीय ग्रंथों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, ताकि ‘कास्ट’ जैसी यूरोपीय नस्ल-आधारित अवधारणाओं को भारत की सामाजिक संरचना पर थोपा जा सके और उसे एक कठोर, जन्म आधारित श्रेणी में बदल कर औपनिवेशिक सत्ता और रिलीजियस प्रचार के अनुकूल बनाया जा सके।[18]
फिर उन जातियों-नस्लों का निर्धारण उसने कैसे किया-कराया उसकी भी कुछ बानगी देखिए-
ब्रिटिश शासकों की जबरिया नीति एवं रिस्ले की मनमानी से जातियां बनीं
रिस्ले ने ब्रिटिश शासन की जरूरतों के अनुसार भारत की सामाजिक संरचना को मनमाने ढंग से वर्गीकृत किया और एक कृत्रिम ऊँच-नीच का क्रम तय किया। उसने तीन प्रमुख आर्य या सवर्ण समूह — ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — और उनके समान स्तर के तीन अतिरिक्त समूह बना दिए, जिन्हें उसने “ब्राह्मण के समकक्ष”, “क्षत्रिय के समकक्ष” और “वैश्य के समकक्ष” (Castes Allied to Brahmins/Kshatriyas/Vaishyas) कहा। इस तरह कुल मिलाकर छह जाति-समूह तैयार किए गए। लेकिन शूद्रों को — जो वर्ण-व्यवस्था के चौथे स्तंभ माने जाते थे — उसने बड़ी चालाकी से इस पूरी सूची से बाहर कर दिया। इसके लिए उसने ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ का सहारा लेते हुए यह तर्क गढ़ा कि आर्यों ने जब भारत पर आक्रमण किया तो उन्होंने यहाँ की स्थानीय महिलाओं से संबंध बनाए, और उनसे जो संताने उत्पन्न हुईं, वे ही शूद्र कहलाए। इस प्रकार शूद्रों को ‘मूल निवासियों’ की मिश्रित जाति बताते हुए उन्हें चौथे वर्ग में डाला गया।
इतना ही नहीं, उसने शूद्र शब्द और वर्ण को पूरी सामाजिक सूची से हटा दिया और एक नया, पांचवां समूह गढ़ डाला, जिसे उसने ‘म्लेच्छ’ या ‘दस्यु’ कहा। इस पूरी रचना का उद्देश्य था हिन्दू समाज को नस्ल, रक्त और सामाजिक पदानुक्रम के आधार पर इस तरह बांटना कि उसकी आंतरिक एकता समाप्त हो जाए और वह आसानी से औपनिवेशिक सत्ता व रिलीजियस विस्तार के अधीन आ सके।[19] इसके बाद रिस्ले ने एक और नई पद्धति अपनाई। उसने यह मानदंड बनाया कि ब्राह्मण जिन समुदायों के साथ खाते-पीते हैं या सामाजिक व्यवहार करते हैं, उन्हें एक अलग जाति-समूह माना जाए। इस आधार पर उसने छह और जाति-समूह बना दिए, यानी पहले के छह समूहों के साथ मिलाकर कुल बारह जाति-समूह (Groups) तैयार कर दिए। इन नए समूहों में कुछ जातियाँ वे थीं जो ब्राह्मणों के लिए भोजन बनाती थीं, जैसे तम्बोली (पान बनाने वाले), भड़भुजा (भुने हुए अनाज बेचने वाले) आदि। कुछ समूह ऐसे समुदायों के थे जिनके घरों में ब्राह्मण भोजन कर सकते हैं या नहीं कर सकते — इस सामाजिक दूरी के आधार पर उन्हें क्रम में रखा गया। इस तरह सामाजिक संपर्क और खानपान की शुद्धता को आधार बनाकर रिस्ले ने जाति व्यवस्था को और अधिक जटिल, कठोर और खंडित रूप में ढाल दिया, जिससे हिन्दू समाज की पारंपरिक लचीलापन और सामाजिक गतिशीलता पर गहरा आघात पहुँचा।[20] 1911 के जनगणना आयुक्त ई.ए. गेट ने सभी जनगणना अधिकारियों को निर्देशित किया हुआ था कि कोई भी जाति ब्राह्मण वर्ग से कितनी-कितनी नीची है, इस हिसाब से ही उनका पदानुक्रम निर्धारित किया जाए । अर्थात ‘रेफरेंस’ लाईन का आधार ब्राह्मणों को ही माना गया ।
निशाने पर ब्राह्मण- दलीत-अछूत का कृत्रिम वर्गीकरण
जाति-निर्धारण की पूरी प्रक्रिया में रिस्ले के निशाने पर ब्राह्मण ही रहे, क्योंकि चर्च मिशनरियों के अनुसार हिन्दुओं के ईसाइकरण में ब्राह्मण ही सबसे बडे अवरोधक थे।[21] इस कारण वह ब्राह्मणों को हिन्दू समाज के भीतर विभिन्न जातियों के शत्रु सिद्ध करना चाहते थे। इस आधार पर अछूत, अस्पृश्य और दलित जाति-समूह का निर्धारण भी बड़े हास्यास्पद तर्कों से किया गया, जिसके लिए अनेक अटकलें गढ़ी गई थीं; जैसे यह कि: जो ब्राह्मणों का वर्चस्व नहीं स्वीकारते, जो ब्राह्मणों या हिन्दू गुरुओं से मंत्र नहीं लेते, जो वेदों को प्रमाण नहीं मानते, जो प्रमुख हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करते, जो ब्राह्मणों को पुरोहित नहीं बनाते, जिनका पौरोहित्य अच्छे ब्राह्मण नहीं करते, जो अपने परिजनों के शव जलाने के बजाय गाड़ते हैं, आदि-आदि।[22]
जाहिर है कि इन बेतुके बनावटी आधारों पर अनेक समुदायों को ‘अछूत-अस्पृश्य-दलीत’ बताया-बनाया गया ।
षड्यंत्र की सफलता; समाज बंटा, हिन्दू घटा
नस्लवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए रिस्ले ने ‘नाक’ और ‘कपाल’ की माप के आधार पर एक नियम बनाया, जिसे उसने ‘unfailing law of caste’ कहा। इस नियम के अनुसार, उसने ‘नेजल बेस इंडेक्स’ (नाक की चौड़ाई और लंबाई का अनुपात) के आधार पर सुतवा नाक (पतली और ऊँची नाक) वाले लोगों को ऊँची सामाजिक हैसियत दे दी, जबकि चौड़ी नाक वाले लोगों को निम्न सामाजिक श्रेणी में रख दिया।
फलस्वरूप अनेक समुदायों में असंतोष और परस्पर वैमनस्य फैल गया। कई जगहों पर इस आधार पर विवाद हुए और मुकदमे भी दर्ज हुए। लेकिन एक बार ब्रिटिश प्रशासन ने किसी जाति को जिस रूप में दर्ज कर दिया, वह आज भी सरकारी अभिलेखों में वैसा ही बना हुआ है। अंग्रेजी प्रशासन को उस वर्गीकरण के नैतिक या तार्किक पक्ष से कोई सरोकार नहीं था। उनकी असली दिलचस्पी हिन्दू समाज के आंतरिक विभाजन में थी।
रिस्ले ने स्वयं कहा था कि वह अपने वैज्ञानिक अनुसंधान (नस्ल विज्ञान) के माध्यम से हिन्दू समाज की एक बड़ी आबादी को ‘अनार्य’ घोषित कर उससे अलग करना चाहता था।[23] जबकि सच्चाई यह है कि भारत में कोई अनार्य था ही नहीं। फिर भी अंग्रेजी प्रशासकों ने उस तथाकथित नस्लविज्ञानी की साजिशपूर्ण अनुशंसा को लागू करते हुए हिन्दू समाज के एक बड़े हिस्से को जबरन ‘अछूत’, ‘अस्पृश्य’, ‘दलित’, ‘मूल निवासी’ जैसे नाम देकर ‘अनार्य-द्रविड़’ घोषित कर दिया।
इसका नतीजा यह हुआ कि आज भी देश में समय-समय पर जातीय टकराव और सामाजिक संघर्ष होते रहते हैं। कुल मिलाकर, यह पूरा रिलीजियस विस्तारवादी षड्यंत्र आज भी नये-नये रूपों में फल-फूल रहा है, जबकि हिन्दू समाज सैकड़ों जातियों में बँटकर न केवल अंदर से कमजोर हुआ है, बल्कि आकार में भी सिमट गया है।
वर्तमान परिदृश्य
भारत की जो वर्तमान जनगणना-पद्धति है, वह दरअसल रिस्ले द्वारा गढ़ी गई व्यवस्था पर ही आधारित है, जो वर्ष 1901 से लागू है। रिस्ले के विशेष आग्रह पर ब्रिटिश सरकार ने पूरे भारत में जातियों और नस्लों की जानकारी एकत्र करने के लिए एक अलग सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की थी, जो उसी के अधीन कार्य करता था।
इस विभाग ने सिर, नाक जैसे शारीरिक अंगों के आधार पर नस्ल निर्धारण की यूरोपीय पद्धति को भारत में लागू किया। इसका उद्देश्य यह तय करना था कि प्रत्येक भारतीय, विशेषकर हिन्दू में, कितना “आर्य” और कितना “अनार्य” अंश है। इसी आधार पर एक विशाल ग्रंथ-श्रृंखला तैयार की गई, जिसमें क्षेत्रवार ‘कास्ट्स एंड ट्राइब्स’ की सूचियाँ बनाई गईं।
यही सूचियाँ आज भी भारत के विश्वविद्यालयों में जाति और समाज पर होने वाले शोध की प्रमुख संदर्भ सामग्री के रूप में प्रयुक्त हो रही हैं।[24] जब यह प्रक्रिया शुरू हुई, तब जातियों और जनजातियों की संख्या लगभग 2378 थी। लेकिन हर दस साल में होने वाली जनगणना के साथ यह संख्या बढ़ती चली गई, और अब अनुमानतः यह संख्या 5000 से भी अधिक हो चुकी है।
इस बीच कई नई जाति-समूहों का निर्माण भी हो चुका है — जिनका अस्तित्व या तो पहले था ही नहीं या फिर उन्हें नए रूप में परिभाषित कर दिया गया। कोविड महामारी के कारण 2021 में जो जनगणना नहीं हो सकी थी, वह अब वर्ष 2027 में जातीय आधार पर आयोजित होने की संभावना है।
दुखद बात यह है कि ये वही जातियाँ हैं, जिन्हें अंग्रेजी औपनिवेशिक षड्यंत्र के तहत रिस्ले ने मनमाने, कृत्रिम और भ्रामक आधारों पर नामित और पदानुक्रमित किया था — और आज भी वही प्रणाली आधिकारिक रूप से मान्य है।
निष्कर्ष
‘आर्य’ अन्यत्र कहीं से भारत नहीं आये, अपितु भारत ही आर्यों की माट्रुभूमि रही है और द्रविड कोई पृथक नस्ल समुदाय नहीं हैं ; यह तथ्य अनेक अद्यतन पुरातात्विक अनुसंधानों से सिद्ध हो चुका है । भीम राव आम्बेडकर ने तो उसी दौर में कडा प्रतिकार करते हुए रिस्ले के इस नस्ल-सिद्धांत को झूठी बुनियाद पर आधारित सिद्ध करते हुए कहा था- नासिकाओं की नाप यह स्थापित करते हैं कि ब्राह्मण और अछूत एक ही नस्ल के हैं । इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि अगर ब्रह्मण आर्य हैं तो अछूत भी आर्य हैं।[25] बावजूद इसके, भारत के वर्तमान राजनीतिक नेताओं, नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर इतिहास और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के मन-मस्तिष्क में आज भी वही औपनिवेशिक दुराग्रह गहराई से बैठा हुआ है — कि आर्य विदेशी आक्रमणकारी थे, काली चमड़ी वाले ही इस देश के मूल निवासी हैं, और ब्राह्मणों ने हिन्दू समाज को जातियों में बाँट कर उसका शोषण किया।
ऐसे हालात में अब समय आ गया है कि इन झूठे, षड्यंत्रकारी और विघटनकारी आख्यानों को संगठित प्रयासों से पूरी तरह खंडित किया जाए। इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि भारत सरकार एक ठोस क़ानूनी पहल करे और हर्बर्ट होप रिस्ले तथा फ्रेडरिक मैक्समूलर द्वारा प्रतिपादित उन सभी आधारहीन स्थापनाओं और मान्यताओं को देश की समस्त शिक्षण-संस्थाओं, अभिलेखागारों, पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग और जनगणना आयोग से औपचारिक रूप से हटाया जाए।
तभी राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक संरचना को औपनिवेशिक विकृतियों से मुक्त किया जा सकेगा।
सन्दर्भ सूची
[1] Devendra Swarup (Panchjanya); भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध ब्रिटिश षडयंत्र; https://panchjanya.com/2006/09/07/196398/archive/rfad9f804/
[2] Nicholas Dirks: Castes of Mind: Colonialism and the Making of Modern India, https://archive.org/details/castesofmindcolo0000dirk
[3] Alexander Dow (Wikipedia); https://en.wikipedia.org/wiki/Alexander_Dow
[4] Wilkerson’s ‘Caste: The Origins of Our Discontents’ (Wikipedia); https://en.wikipedia.org/wiki/Caste:_The_Origins_of_Our_Discontents
[5] Dr. Tribhuvan Singh, शुद्र कौन थे; https://ia904600.us.archive.org/0/items/shudra-kaun-the-awalokan-samiksha-tribhuvan-singh-ocr/Shudra_Kaun_The_Awalokan_Samiksha_TribhuvanSingh_ocr.pdf
[6] BBC: Viewpoint: How the British reshaped India’s caste system; https://www.bbc.com/news/world-asia-india-48619734
[7] ibid
[8] Dr. Savita Gautam (International Journal of Sanskrit Research), वेदों में संस्कारों का महत्व; https://www.anantaajournal.com/archives/2017/vol3issue4/PartE/7-6-53-861.pdf
[9] BBC: Viewpoint: How the British reshaped India’s caste system; https://www.bbc.com/news/world-asia-india-48619734
[10] Alvin K. Benson (EBSCO, 2024), Aryan Race; https://www.ebsco.com/research-starters/ethnic-and-cultural-studies/aryan-race
[11] राजीव मल्होत्रा, ब्रेकिंग इण्डिया (भारत विखण्डन); पृष्ठ-49
[12] Max Müller (Wikipedia); https://en.wikipedia.org/wiki/Max_M%C3%BCller
[13] India Old Days, आर्यों का भारत आगमन; https://www.indiaolddays.com/aaryon-ka-bhaarat-aagaman/
[14] Dr. Tribhuvan Singh, शुद्र कौन थे; https://ia904600.us.archive.org/0/items/shudra-kaun-the-awalokan-samiksha-tribhuvan-singh-ocr/Shudra_Kaun_The_Awalokan_Samiksha_TribhuvanSingh_ocr.pdf
[15] राजीव मल्होत्रा, ब्रेकिंग इण्डिया (भारत विखण्डन); पृष्ठ- 72-73
[16] Ibid, p.72
[17] Ibid, p.76
[18] H.H. Risley, People of India, P.248; https://archive.org/details/cu31924024114773
[19] Dr. Tribhuvan Singh, शुद्र कौन थे; https://ia904600.us.archive.org/0/items/shudra-kaun-the-awalokan-samiksha-tribhuvan-singh-ocr/Shudra_Kaun_The_Awalokan_Samiksha_TribhuvanSingh_ocr.pdf
[20] ibid, p. 217
[21] Center for Indic Research, चर्च-मिशनरियों का ब्राह्मण-विरोध; https://cisindus.org/indic-varta-internal.php?vartaid=540
[22] Sanjiv Khudshah (Forward Press), सबसे पहले ऐसे तैयार हुई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची; https://www.forwardpress.in/2024/12/news-analysis-story-of-sc-and-st-list/
[23] राजीव मल्होत्रा, ब्रेकिंग इण्डिया (भारत विखण्डन); p.74
[24] Devendra Swarup (Panchjanya), भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध ब्रिटिश षडंयत्र; https://panchjanya.com/2006/09/07/196398/archive/rfad9f804/
[25] राजीव मल्होत्रा, ब्रेकिंग इण्डिया (भारत विखण्डन); p.80
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