सोची-समझी साज़िश: Rutgers की रिपोर्ट ने हिंदू समुदाय को निशाने पर लिया
- Rutgers University की “Hindutva in America” एक पक्षपाती और मनगढ़ंत रिपोर्ट है, जिसने हिंदू संगठनों को “खतरा” बताकर हिंदूफ़ोबिया को वैधता देने की कोशिश की।
- रिपोर्ट वही पुरानी औपनिवेशिक प्रवृत्ति पर आधारित है, जिसमें हिंदू संगठनों के सकारात्मक कार्यों को अनदेखा कर आतंकवाद की आलोचना को “इस्लामोफोबिया” कहा गया।
- खालिस्तानी आतंकवाद को “पीड़ित आंदोलन” की तरह पेश करने और हिंदू समुदाय को संदेह के घेरे में डालने के लिए रिपोर्ट की व्यापक निंदा हो रही है।
- हिंदू छात्रों को पहले से हो रहे भेदभाव और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच ऐसी रिपोर्टें शत्रुता और हिंसा को और बढ़ा सकती हैं।
27 अक्टूबर को Rutgers University अपनी रिपोर्ट “Hindutva in America: A Great Threat to Equality and Religious Pluralism” पर एक पैनल चर्चा आयोजित करने जा रही है।[1] यह कार्यक्रम और रिपोर्ट, जिन्हें एक शैक्षणिक पहल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, अमेरिका भर में हिंदू समुदायों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और अंतरधार्मिक नेताओं से कड़ी आलोचना का सामना कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह रिपोर्ट कुछ वामपंथी कार्यकर्ताओं के छोटे लेकिन ऊँची आवाज़ वाले समूह द्वारा तैयार की गई है, जिसका मकसद हिंदुओं को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताना है। इससे न केवल अमेरिका के सबसे कानून का पालन करने वाले प्रवासी समुदायों में से एक की छवि को नुकसान पहुँचता है, बल्कि उस धार्मिक सह-अस्तित्व और विविधता की भावना को भी तोड़ा जाता है, जिसकी रक्षा का दावा यह रिपोर्ट खुद करती है।
Rutgers’ Center for Security, Race and Rights (CSRR) द्वारा तैयार यह रिपोर्ट बिना ठोस सबूतों और एक तरफ़े स्रोतों के सहारे बनाई गई है, और इसमें इस्तेमाल की गई भड़काऊ भाषा एक गंभीर खतरा पैदा करती है। इससे धार्मिक हिंसा भड़कने का डर है, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हिंदू छात्रों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है, और “शैक्षणिक स्वतंत्रता” के नाम पर हिंदू-विरोधी माहौल को वैधता मिल सकती है।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) ने इस पर टिप्पणी करते हुए एक्स (X) पर लिखा कि जब फ्लोरिडा में एक सिटी काउंसिल सदस्य सभी भारतीयों को देश से निकालने की बात कर रहा है, टेक्सास में एक सीनेट उम्मीदवार हनुमान जी की मूर्ति हटाने की मांग कर रहा है, और इंटरनेट पर हिंदू-विरोधी नफरत आम हो चुकी है, तब उम्मीद थी कि Rutgers हिंदुओं के साथ खड़ा होगा। “लेकिन इसके बजाय… हिंदुओं को निशाना बनाने वाली और नफरत फैलाने वाली बातें की जा रही हैं, जो हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच और विभाजन बढ़ाएँगी।” [2]
झूठे आरोप और विकृत तर्कों की नींव
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी हिंदू संगठन भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के “प्रतिनिधि” के रूप में काम करते हैं और इस्लामोफोबिया, जातिवाद और अल्पसंख्यक-विरोधी विचारों के ज़रिए अमेरिकी मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि “अमेरिकी हिंदू राष्ट्रवादी” दक्षिण एशियाई मूल के मुसलमानों, सिखों, दलितों और ईसाइयों पर हमला करते हैं और उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया है कि हिंदू राष्ट्रवादी हिंसा और धमकियों जैसे तरीकों से अपने विचार स्कूलों और विश्वविद्यालयों में थोपने की कोशिश करते हैं।
लेकिन ये सारे आरोप बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए हैं और इनमें गहरा पक्षपात झलकता है। रिपोर्ट में कहीं यह नहीं बताया गया कि किन घटनाओं या प्रमाणों के आधार पर ऐसे गंभीर दावे किए गए हैं।
रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसे बनाते समय किसी भी प्रमुख हिंदू-अमेरिकी संगठन से बात नहीं की गई। न तो उनसे कोई जानकारी माँगी गई, न ही उनके दृष्टिकोण को शामिल किया गया। यह बात अपने आप में शैक्षणिक ईमानदारी और निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में बार-बार “फासिस्ट,” “सुप्रेमेसिस्ट,” और “एक्सट्रीमिस्ट” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। ये शब्द किसी विश्लेषण या शोध के लिए नहीं, बल्कि हिंदू संगठनों को बदनाम करने के लिए प्रयोग किए गए हैं।
हिंदू संगठनों के कुछ पारंपरिक कार्यक्रमों में शामिल होने या पाकिस्तान से जुड़े आतंकवाद की आलोचना को “इस्लामोफोबिया” कहा गया है। यह तर्क बेहद कमजोर है, क्योंकि किसी आतंकी संगठन की आलोचना को धर्म-विरोध नहीं कहा जा सकता। ऐसे आरोप न केवल गलतफहमी फैलाते हैं, बल्कि असली आतंकवाद के शिकार लोगों के प्रति असंवेदनशीलता भी दिखाते हैं।
रिपोर्ट में हिंदू संगठनों के सकारात्मक कार्यों — जैसे आपदा राहत में सहायता, शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में योगदान, अंतरधार्मिक संवाद, और सामाजिक समानता के लिए नीतियों — का कोई उल्लेख नहीं है। इससे साफ है कि रिपोर्ट एकतरफा सोच से प्रेरित है, जिसका मकसद संतुलित अध्ययन नहीं, बल्कि एक खास एजेंडा को आगे बढ़ाना है।
मनगढ़ंत इस्लामोफोबिया और खालिस्तानी एजेंडे का पुनर्लेखन
रिपोर्ट का एक और प्रमुख दावा है कि हिंदुत्व से जुड़े समूहों ने अमेरिका में इस्लामोफोबिया फैलाया। कहा गया है कि 9/11 के बाद हिंदू संगठनों ने “इस्लाम-विरोध” की भावना का फायदा उठाकर अमेरिकी राजनीति में अपनी जगह बनाई। लेकिन यह आरोप भी तथ्यों पर नहीं टिकता। अमेरिकी हिंदू संगठन, जैसे कोई भी प्रवासी समुदाय, धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद को लेकर वाजिब चिंताएँ रखते हैं। पाकिस्तान से प्रेरित आतंकवाद या पहलगाम हत्याकांड जैसी घटनाओं पर बोलना इस्लामोफोबिया नहीं, बल्कि सच्चाई बताना है।
इससे भी चिंताजनक बात यह है कि रिपोर्ट ने खालिस्तानी आतंकवाद को “पीड़ित आंदोलन” के रूप में दिखाने की कोशिश की है। हरीप सिंह निज्जर जैसे घोषित खालिस्तानी आतंकवादी को “ट्रांसनेशनल रिप्रेशन” का शिकार बताया गया, जबकि उसके हिंसक अतीत और सबूतों की कमी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यह नैतिक और शैक्षणिक दोनों स्तरों पर ग़लत और ख़तरनाक है।[3]
Rutgers का उद्देश्य — हिंदुओं को मुख्यधारा से बाहर करना
रिपोर्ट का असली मकसद हिंदुओं की सामाजिक स्थिति और आवाज़ को कमजोर करना है। हिंदुओं को असहिष्णु और खतरनाक बताने के बाद Rutgers ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए पाँच ऐसे सुझाव दिए हैं, जो लागू होने पर हिंदू अमेरिकियों को अपने ही देश में संदिग्ध बना देंगे। ये सुझाव जर्मनी के 1935 के नूर्नबर्ग कानूनों की तरह हैं, जिनसे यहूदियों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया था:
- कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ, राजनेता और नागरिक संगठन हिंदू समूहों से अपने संबंध तोड़ें।
- भारत में कथित अल्पसंख्यक हिंसा का समर्थन करने वालों पर वीज़ा प्रतिबंध लगाए जाएँ।
- अमेरिकी हिंदू चैरिटी संगठनों को अपने विदेशी फंडिंग स्रोतों और संबंधों का पूरा विवरण सार्वजनिक करना होगा।
- जो संगठन भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) या उससे जुड़े समूहों के “प्रतिनिधि” माने जाते हैं, उन्हें Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत पंजीकृत किया जाए।
- विश्वविद्यालयों को “हिंदुत्व से प्रेरित भेदभाव” के ख़तरों पर शिक्षित किया जाए और प्रोफेसरों व छात्रों को इनसे “सुरक्षित” रखा जाए।
इन सुझावों से साफ झलकता है कि यह रिपोर्ट किसी शैक्षणिक अध्ययन का परिणाम नहीं है, बल्कि एक वैचारिक हथियार है, जिसका लक्ष्य हिंदू समुदाय को विभाजित करना और उनके सामाजिक व धार्मिक अस्तित्व को संदिग्ध बनाना है। ऐसी रिपोर्टें न केवल सच्चाई को तोड़ती हैं बल्कि आपसी विश्वास और सामाजिक सौहार्द को भी कमजोर करती हैं — और यही इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी त्रासदी है।
असुरक्षा और अन्याय से जूझता हिंदू मुदाय
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब हिंदूफ़ोबिया अब केवल चर्चा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक तेजी से बढ़ती वास्तविकता बन गया है। अमेरिका और यूरोप में हिंदू-विरोधी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF), कोअलिशन ऑफ हिंदूज़ ऑफ नॉर्थ अमेरिका (CoHNA) और कई अन्य संगठनों ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे सैकड़ों मामलों को दर्ज किया है, जिनमें मंदिरों की तोड़फोड़, सोशल मीडिया पर नफ़रत फैलाना, धार्मिक प्रतीकों का मज़ाक उड़ाना, और विश्वविद्यालयों में हिंदू छात्रों के साथ भेदभाव जैसी घटनाएँ शामिल हैं।[4]
सिर्फ़ 2023 में ही न्यूयॉर्क, कैलिफ़ोर्निया और ओंटारियो में कई हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़ की गई और दीवारों पर “खालिस्तान ज़िंदाबाद” जैसे नारे लिखे गए। इन घटनाओं ने न सिर्फ़ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, बल्कि हिंदू समुदाय के लिए भय और असुरक्षा का वातावरण भी बनाया। कई विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले हिंदू छात्रों ने बताया कि उनके साथ उनके धर्म की वजह से भेदभाव किया जाता है, कक्षाओं में अपमानजनक टिप्पणियाँ सुननी पड़ती हैं, और कुछ से तो यह तक कहा गया कि अगर उन्हें किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना है, तो उन्हें पहले “हिंदुत्व से दूरी” बनानी होगी।[5]
यह रिपोर्ट अधिकारों की रक्षा का दिखावा करती है, लेकिन हकीकत में पूरे समुदाय के खिलाफ भेदभाव बढ़ाएगी।
हिंदू छात्रों को निशाना बनाना
इस रिपोर्ट की भाषा और झूठे आरोपों ने हर उस हिंदू अमेरिकी पर वार किया है जो अपने धर्म, संस्कृति या अधिकारों की बात करता है। विश्वविद्यालयों में जहाँ विचारों की स्वतंत्रता और पहचान की सुरक्षा की बात की जाती है, वहाँ अब हिंदू छात्रों को उनके धर्म और मूल पहचान के आधार पर शक की नज़रों से देखा जा रहा है।
यह सिर्फ़ कल्पना नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हिंदू छात्रों ने दर्जनों बार धमकियों, अपमान और भेदभाव की शिकायतें दर्ज कराई हैं। ‘Hindu on Campus’ नामक छात्र संगठन ने एक वेबसाइट बनाई है, जिसमें ऐसे सौ से अधिक मामलों का रिकॉर्ड रखा गया है। इस वेबसाइट का उद्देश्य इन घटनाओं का डेटा इकट्ठा करना और जनता में जागरूकता फैलाना है, ताकि लोगों को समझ आए कि हिंदू छात्रों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।[6]
अप्रैल 2024 में अमेरिकी कांग्रेस सदस्य श्री थानेदार ने प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें “हिंदूफ़ोबिया, हिंदू-विरोधी घृणा और असहिष्णुता” की निंदा की गई। इस प्रस्ताव में कहा गया कि हिंदू अमेरिकियों को गलत छवियों, भ्रामक जानकारी, स्कूलों में बुलीइंग और घृणा-प्रेरित अपराधों का सामना करना पड़ रहा है। यह प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि हिंदू समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।[7]
कई छात्रों ने बताया है कि उनके धार्मिक अभ्यासों, प्रतीकों और सांस्कृतिक पहचान का मज़ाक उड़ाया जाता है। मंदिर जाने, तिलक लगाने या पारंपरिक वस्त्र पहनने जैसी साधारण बातों पर उन्हें “कट्टर” या “राष्ट्रवादी” कहा जाता है। जाति या देवताओं पर अपमानजनक चुटकुले बनाना, त्योहारों को “राजनीतिक” कहना, या हिंदू प्रतीकों को गलत रूप में प्रस्तुत करना आम हो गया है।
कई बार जब हिंदू छात्र संगठन अपने विश्वविद्यालयों में सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं, तो उनका विरोध किया जाता है। यहाँ तक कि जब छात्रों ने हिंदू हेरिटेज मंथ (Hindu Heritage Month) मनाने का प्रस्ताव रखा, तो कुछ अन्य समूहों ने इसे “राजनीतिक प्रचार” बता कर रोकने की कोशिश की। इससे यह साफ़ होता है कि अमेरिका जैसे खुले समाज में भी हिंदू पहचान को स्वीकार करना मुश्किल बना दिया गया है।[8]
एक और बड़ी समस्या यह है कि जब हिंदू छात्र ऐसे भेदभाव की शिकायत प्रशासन के पास ले जाते हैं, तो अधिकांश मामलों में विश्वविद्यालय प्रशासन या तो उदासीन रहता है या जाँच को टाल देता है। कई बार हिंदू प्रतीकों, जैसे तिलक, ओम, या धार्मिक आहार प्रथाओं की सही समझ न होने के कारण भी गलतफहमियाँ पैदा होती हैं। कुछ छात्रों का कहना है कि “विविधता, समानता और समावेश” (DEI) पर होने वाली चर्चाओं में भी हिंदुओं की चिंताओं को शायद ही कभी जगह दी जाती है।
ऐसे माहौल में Rutgers का खुले तौर पर हिंदू-विरोधी कार्यकर्ताओं को मंच देना नफरत और वैमनस्य को और बढ़ा सकता है।
असली उग्रवादी कौन हैं?
Rutgers के इस पैनल की सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसमें ऑड्री ट्रशके (Audrey Truschke) जैसी विवादास्पद प्रोफेसर शामिल हैं। ट्रशके को हिंदू धर्म और उसके देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने भगवान राम को “महिलाओं से घृणा करने वाला सूअर” कहा, भगवद्गीता को “जनसंहार को बढ़ावा देने वाला ग्रंथ” बताया, और महाभारत को “बलात्कार संस्कृति” का प्रतीक कहा।[9]
कल्पना कीजिए, अगर ऐसा कोई बयान किसी अन्य धर्म के पैगंबर या पवित्र ग्रंथ के बारे में दिया गया होता, तो कितनी कड़ी प्रतिक्रिया होती। लेकिन जब हिंदू धर्म पर हमला होता है, तो उसे “शैक्षणिक आलोचना” कहकर टाल दिया जाता है — जबकि यह लाखों हिंदुओं की आस्था और भावनाओं का अपमान है।
इस पैनल की दूसरी सदस्य सहार अज़ीज़ (Sahar Aziz) हैं, जो Rutgers लॉ स्कूल में प्रोफेसर हैं और अपने यहूदी-विरोधी विचारों तथा आतंकवादी समूहों के बचाव के लिए जानी जाती हैं। 30 अक्टूबर 2023 को उन्होंने एक्स (X) पर लिखा, “दुनिया हमारी लाशों से सहानुभूति रखती है, लेकिन हमारे प्रतिरोध का सम्मान नहीं करती।” यह 7 अक्टूबर के उस हमास हमले का बचाव था जिसमें 1,200 निर्दोष इसराइली नागरिक मारे गए थे। उन्होंने इस पोस्ट में हमास के बंदूकधारी आतंकवादियों की तस्वीरें भी साझा की थीं। इससे पहले, मई 2021 में, उन्होंने “फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध के अधिकार” का समर्थन करते हुए एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे — यानी हमास के रॉकेट हमलों को अप्रत्यक्ष रूप से उचित ठहराया था।[10]
और जिस CSRR संस्था ने यह रिपोर्ट तैयार की है, वह पहले से ही अमेरिकी सीनेट की न्यायपालिका समिति के जांच के दायरे में है, क्योंकि उस पर यहूदी-विरोधी विचारों और चरमपंथी संगठनों को मंच देने के आरोप लगे हैं।[11] अमेरिकी सांसद जोश गॉथहाइमर (Josh Gotthheimer) ने भी इस केंद्र की आलोचना करते हुए कहा था कि यह संस्था अल-कायदा जैसे आतंकी नेटवर्क से जुड़े लोगों को बोलने का मौका देती है। और इसकी एक प्रायोजक लॉ फर्म का नाम 2024 में ह्यूस्टन में गिरफ्तार हुए एक बाल-यौन अपराधी से जुड़ा हुआ पाया गया।
इस सबके बीच सवाल उठता है — क्या किसी विश्वविद्यालय, विशेषकर न्यू जर्सी जैसे राज्य में, जहाँ हिंदू-अमेरिकी आबादी बहुत बड़ी है, को नफ़रत और भेदभाव के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहिए? क्या यह उसकी ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह नफ़रत फैलाने वालों को मंच देने के बजाय अपने छात्रों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करे?
झूठे प्रचार के खिलाफ़ हिंदू समुदाय की सशक्त प्रतिक्रिया
StopHindudvesha.Org ने भी इस रिपोर्ट को तथ्यात्मक और नैतिक स्तर पर पूरी तरह ध्वस्त किया है। 50 से अधिक प्रमाणिक स्रोतों, कानूनी दस्तावेज़ों और शैक्षणिक शोधों का हवाला देते हुए तैयार की गई 30 पृष्ठों की इस प्रतिवादी रिपोर्ट ने दिखाया कि Rutgers का मूल दस्तावेज़ नागरिक अधिकारों की भाषा का दुरुपयोग करता है — ताकि हिंदू पहचान को कलंकित किया जा सके, हिंदू संस्थानों की वैधता पर प्रश्न उठाए जा सकें, और “अकादमिक स्वतंत्रता” के नाम पर हिंदू-विरोध को वैध रूप दिया जा सके।[12]
VHPA के शिक्षा उपाध्यक्ष डॉ. जय बंसल ने कहा, “यह कोई रिसर्च नहीं, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक मुहिम है। इसका असली लक्ष्य है — हिंदू पहचान के सार्वजनिक प्रदर्शन को अपराध ठहराना, हिंदू संस्कृति को बदनाम करना, और उन संगठनों को ‘खतरनाक’ बताना जो शिक्षा, सेवा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।”
उनके अनुसार, यह रिपोर्ट “नैरेटिव वॉरफेयर” यानी कथानक-युद्ध का हिस्सा है। “इसका उद्देश्य संवाद या समझ नहीं, बल्कि दबाव और डर पैदा करना है। हिंदू अमेरिकियों के लिए इसका संदेश साफ है — चुप रहो, अदृश्य रहो, नहीं तो तुम्हें कट्टर और खतरनाक कह दिया जाएगा। यदि तुम अपनी परंपरा और पहचान मनाओगे, तो तुम्हारी संस्थाओं को निशाना बनाया जाएगा, तुम्हारी चैरिटीज़ पर सवाल उठेंगे, और तुम्हारी संस्कृति को एक अपराध की तरह पेश किया जाएगा।”
इसी तरह, अमेरिकी हिंदुओं के एक समूह, American Hindus Against Defamation (AHAD) — जो Hindu Policy Research and Advocacy Collective (HinduPACT) का एक भाग है — ने भी Rutgers विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के जवाब में एक विस्तृत दस्तावेज़ जारी किया है जिसका शीर्षक है “Hindutva and the American Dream: A Case for Inclusion and Representation”। इस रिपोर्ट ने Rutgers के झूठे दावों का तथ्यात्मक और नैतिक आधार पर जवाब दिया है।[13]
AHAD के अध्ययन से यह साफ़ हुआ कि Rutgers की रिपोर्ट ने साधारण हिंदू सामुदायिक गतिविधियों, मंदिरों की पूजा, युवाओं के शिविरों, और धार्मिक चैरिटी को संदेह के घेरे में डाल दिया है। जो काम किसी भी दूसरे धार्मिक समुदाय के लिए सामान्य माने जाते हैं, उन्हें हिंदुओं के मामले में “खतरनाक साजिश” की तरह पेश किया गया है। HinduPACT की अध्यक्ष दीप्ति महाजन ने कहा, “यह रिपोर्ट दिखाती है कि औपनिवेशिक मानसिकता आज भी कुछ लोगों की सोच पर हावी है। यह हिंदू पहचान को सार्वजनिक जीवन से मिटाने के लिए कैंसल कल्चर की तकनीक अपनाती है। यह कोई शोध नहीं, बल्कि एक वैचारिक हमला है।”
महाजन और उनकी टीम ने इस रिपोर्ट के पक्षपातपूर्ण रवैये, तथ्यात्मक गलतियों और विचारधारात्मक विकृतियों को उजागर करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लिया। AHAD की जवाबी रिपोर्ट में Tattwa.AI के “HinduHate Detector” और “Counter-Narrative Generator” का इस्तेमाल किया गया, जो 150 से अधिक पुस्तकों, शोध पत्रों, जांच रिपोर्टों और वैश्विक मीडिया स्रोतों पर आधारित है। यह तकनीक भावना, पक्षपात, तथ्य omission और स्रोत-भेदभाव का विश्लेषण कर यह दिखाती है कि Rutgers रिपोर्ट ने कैसे एक व्यवस्थित नैरेटिव गढ़ा है।
इस विश्लेषण से कुछ मुख्य तथ्य सामने आए:
- “Hindutva” शब्द को बार-बार नकारात्मक रूप में इस्तेमाल किया गया, और कई जगह यह “Hindu identity” का पर्याय बना दिया गया।
- साधारण धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया गया।
- विदेशी प्रभाव और उग्रवाद से जुड़े आरोपों के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं दिए गए।
- रिपोर्ट का “Hinduphobia Risk Score” अधिकतम स्तर पर था — यानी यह रिपोर्ट नफरत भड़काने की क्षमता रखती है।
HinduPACT के संस्थापक अजय शाह ने कहा, “हमने ऐसा AI विकसित किया है जो केवल नकारात्मक शब्दों का पता नहीं लगाता, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे एक पूरी कहानी को झूठे ढंग से गढ़ा गया है। यह किसी विचारधारा की रक्षा नहीं, बल्कि सत्य और निष्पक्षता की रक्षा का मामला है। जब शैक्षणिक संस्थान भेदभाव के औजार बन जाते हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराना ज़रूरी है।”
स्थिति सुधारने के लिए क्या करना होगा
Rutgers विश्वविद्यालय द्वारा इस रिपोर्ट को मंच देने के फैसले ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। CoHNA (Coalition of Hindus of North America) ने एक्स (X) पर लिखा: “क्या Rutgers एक शैक्षणिक संस्था है या झूठ और नफरत फैलाने वाले कार्यकर्ताओं का मंच? क्या यह अपने हिंदू छात्रों की सुरक्षा की परवाह करता है? क्या माता-पिता अब भी अपने बच्चों को ऐसे विश्वविद्यालय भेजने में सुरक्षित महसूस करेंगे जो उनके धर्म और संस्कृति को बदनाम करने वालों को सम्मान देता है? और क्या करदाताओं का पैसा नफरत फैलाने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए?” [14]
AHAD और HinduPACT ने इस मामले में संघीय जांच की मांग की है। उनके सुझावों में शामिल हैं:
- शैक्षणिक लेखन और फंडिंग में पूरी पारदर्शिता।
- पाठ्यक्रम निर्माण में हिंदू विद्वानों की भागीदारी।
- न्याय विभाग (DOJ) द्वारा विश्वविद्यालयों में हिंदू-विरोधी पक्षपात की जांच।
- चरमपंथी संगठनों से जुड़े समूहों पर प्रतिबंध।
- सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करना।
Rutgers की यह रिपोर्ट न केवल शैक्षणिक ईमानदारी में, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी में भी असफल रही है। जब हिंदू अमेरिकियों के खिलाफ घृणा अपराध, ऑनलाइन नफरत और संस्थागत भेदभाव बढ़ रहे हैं, तब एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय का इस तरह की एकतरफा और भड़काऊ रिपोर्ट को मंच देना पूरी तरह गैर-जिम्मेदाराना है।
हिंदू अमेरिकी डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, छात्र और सामुदायिक कार्यकर्ता हैं। वे अमेरिकी समाज के एक समर्पित और योगदानशील हिस्से हैं।[15] उन्हें वही सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए जो किसी अन्य समुदाय को मिलती है। अगर अकादमिक जगत सच में विविधता और समानता को महत्व देता है, तो उसे हिंदुओं को अपवाद की तरह नहीं, बल्कि बराबरी के साथ देखना होगा।
धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं हो सकती। “अकादमिक स्वतंत्रता” का बहाना लेकर भी पक्षपात को सही नहीं ठहराया जा सकता। नफरत चाहे यहूदियों के खिलाफ हो, मुसलमानों के खिलाफ या हिंदुओं के खिलाफ — हर रूप में उसे चुनौती दी जानी चाहिए। जैसा कि CoHNA ने कहा, “Rutgers को अपने कर्मों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना ही चाहिए।” [16]
सन्दर्भ सूची
[1] Hindutva in America: A Threat to Equality and Religious Pluralism (Rutgers Law School – Center for Security, Race and Rights, 2025); https://csrr.rutgers.edu/newsroom/reports/
[2] Timing is everything. At the very moment that a city council member in Florida calls for deportation of all Indians, a Texas senate candidate wants a Hanuman murti pulled down & online anti-Hindu hate is ubiquitous. (Hindu American Foundation on X, October 2025); https://x.com/HinduAmerican/status/1974055377122832548
[3] ‘Nijjar ran terrorist training camps, visited Pakistan, and had contact with Khalistani terrorists’: Globe and Mail report shows how Canada protected a designated terrorist (OpIndia, June 2024); https://www.opindia.com/2024/06/nijjar-ran-terrorist-training-camps-visited-pakistan-contact-khalistani-terrorists-how-canada-protected-a-designated-terrorist/
[4] Caught in the Crossfire: How America’s Political Battlefield is Impacting Hindu Americans (Stop Hindudvesha.Org, February 2025); https://stophindudvesha.org/caught-in-the-crossfire-how-americas-political-battlefield-is-impacting-hindu-americans/
[5] Khalistani Movement Archives – Hindu Dvesha (StopHindudvesha.Org , a library of several articles on Khalistani movement); https://stophindudvesha.org/category/khalistani-movement/
[6] Website to track Hinduphobia launched on colege campuses across US, UK, Canada and Australia (The Times of India, May 2025); https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/website-to-track-hinduphobia-launched-on-college-campuses-across-us-uk-canada-and-australia/articleshow/118699798.cms?utm_source=chatgpt.com
[7] ‘From facing stereotypes to bullying in schools and colleges’: Resolution in US Congress condemns Hinduphobia (Firstpost, April 2024); https://www.firstpost.com/world/from-facing-stereotypes-to-bullying-in-schools-and-colleges-resolution-in-us-congress-condemns-hinduphobia-13758848.html?utm_source=chatgpt.com
[8] Hindu students in US University face hostility for supporting Hindu Heritage Month proclamation; labelled “Hindu nationalists” (Hinduphobia Tracker); https://www.hinduphobiatracker.org/app/case/ea34b7b?utm_source=chatgpt.com
[9] The Scholar Whom Audrey Truschke Cites Finds Her Tweet ‘Shocking’ (Swarajya, April 2018); https://swarajyamag.com/culture/the-scholar-whom-audrey-truschke-cites-finds-her-tweet-shocking
[10] Sahar Aziz Profile (Protect Our Campuses); https://protect-our-campus.com/profiles/sahar-aziz/?s=03
[11] Senate Judiciary Committee Republicans Probe Rutgers University Center that Promotes Terrorist Sympathizers and Anti-Semitism (US Senate Committee on Judicary, February 2024); https://www.judiciary.senate.gov/press/rep/releases/senate-judiciary-committee-republicans-probe-rutgers-university-center-that-promotes-terrorist-sympathizers-and-anti-semitism
[12] A Hindu American Rebuttal to the Genocidal Subtext of Rutgers ‘Hindutva in America’ Report (StopHindudvesha.Org, June 2025); https://stophindudvesha.org/a-hindu-american-rebuttal-to-the-genocidal-subtext-of-rutgers-hindutva-in-america-report/
[13] HinduPACT AHAD Exposes Rutgers Report on Hindutva as Hinduphobic; Launches Sharp Rebuttal with “Hindutva in America: A Case for Inclusion and Representation” (Morningstar, August 2025); https://www.morningstar.com/news/pr-newswire/20250812ph49936/hindupact-ahad-exposes-rutgers-report-on-hindutva-as-hinduphobic-launches-sharp-rebuttal-with-hindutva-in-america-a-case-for-inclusion-and-representation
[14] So one must ask – Is @RutgersU an academic institution or a platform to spew lies and hatred by agenda driven activists? (CoHNA on X, October 2025); https://x.com/CoHNAOfficial/status/1974621989105975445
[15] Social Realities of Indian Americans: Results From the 2020 Indian American Attitudes Survey (Carnegie Endowment for International Peace, June 2021); https://carnegieendowment.org/research/2021/06/social-realities-of-indian-americans-results-from-the-2020-indian-american-attitudes-survey?lang=en
[16] So one must ask – Is @RutgersU an academic institution or a platform to spew lies and hatred by agenda driven activists? (CoHNA on X, October 2025); https://x.com/CoHNAOfficial/status/1974621989105975445
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