हिंदू आस्थाओं का अपमान, वोट बैंक साधने की नई राजनीति

अब हिंदू परंपराओं और आस्थाओं का मज़ाक उड़ाना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय राजनीति का एक सुनियोजित पैटर्न बन चुका है। इस तरह की बयानबाज़ी हिंदू अस्मिता को नीचा दिखाती है और हिंदुओं के भीतर अपने सांस्कृतिक हक़ जताने का साहस कम करती है, क्योंकि जैसे ही वे अपने अधिकारों को लेकर आवाज़ उठाना शुरू करते हैं, उन्हें सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है।
  •  हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों का अपमान करना अब भारतीय राजनीति में एक सामान्य चलन बन चुका है। कई नेताओं के लिए तो, हिंदू धर्म को गाली देना उनके सेक्युलर वोट बैंकतक पहुँचने का सबसे तेज़ रास्ता है।
  • आज की विपक्षी राजनीति का एजेंडा मोदी सरकार के “हिंदू बहुसंख्यवाद” को रोकने के नाम पर चलता है, लेकिन यह एजेंडा अक्सर हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं के अपमान तक पहुँच जाता है।
  • हिंदू धर्म को राजनीतिक रूप से बदनाम करने का यह सिलसिला अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का हिस्सा है, जहाँ जानबूझकर अल्पसंख्यक पहचान को हिंदू संस्कृति के खिलाफ खड़ा किया जाता है, और समाज में अनावश्यक दुश्मनी बोई जाती है।
  • हिंदुओं की सहिष्णुता उन्हें हिंदूफोबिया की इस राजनीति में बलि का बकराबना देती है।
  • तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन का सनातन धर्म को खतम करने का आह्वान, दक्षिण भारतीय राजनीति की उस वृहद हिंदू-विरोधी प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिस पर द्रविड़ राजनीति की विचारधारा का गहरा असर है।

अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन हाल ही में विवादों के घेरे में आ गए। राज्यसभा सांसद का पद संभालने के कुछ ही दिन बाद उन्होंने सनातन धर्म पर कटाक्ष कर डाला। चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान हासन ने दावा किया कि शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है, जो तानाशाही और सनातन धर्म की जंजीरों को तोड़ सकती है।[1]

यह बयान आते ही बड़ा विवाद खड़ा हो गया और बीजेपी से लेकर आम हिंदुओं तक हर ओर से विरोध होने लगा। कमल हासन पर हिंदू-विरोधी भावनाएँ भड़काने और हिंदू धर्म को बदनाम करने का आरोप लगा। यह उनकी पहली आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं थी, लेकिन संसद में प्रवेश के तुरंत बाद ऐसा कहना दिखाता है कि भारतीय राजनीति में सनातन धर्म की निंदा करना अब इतना आम हो गया है कि लोग कई बार इस पर सवाल उठाना भी ज़रूरी नहीं समझते।

दरअसल, बहुत से नेताओं के लिए हिंदू आस्थाओं पर चोट करना तथाकथित सेक्युलर वोटरों को लुभाने का एक शॉर्टकट बन गया है। फॉर्मूला बेहद आसान है—सनातन धर्म पर कटाक्ष कर सुर्ख़ियों में आओ, और फिर बीजेपी की तथाकथित “हिन्दुत्ववादी” छवि के ठीक उलट एक “सेक्युलर” छवि गढ़ लो। इस सियासी खेल में हिंदू धर्म एक बेजान सा मोहरा बनकर रह गया है। कभी इसकी तुलना डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों से की जाती है, तो कभी हिंदू धर्म और संस्कृति पर तमाम तरह के अभद्र व गाली-गलौज भरे कटाक्ष किए जाते हैं। और इस प्रक्रिया में सिर्फ़ एक धर्म और उससे जुड़ी आस्था ही आहत नहीं होते, बल्कि एक पूरी सभ्यता और उसकी अस्मिता की आत्मा को क्षति पहुँचती है।

ऐसे हिंदू-विरोधी बयानों पर सत्ताधारी दल, हिंदू संगठन और सोशल मीडिया पर लोग विरोध तो करते हैं, लेकिन यह गुस्सा जल्दी ठंडा पड़ जाता है। यही ढिलाई नेताओं को बार-बार ऐसी टिप्पणियाँ करने का हौसला देती है। वे इस प्रकार की हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी दोबारा करने से पहले एक बार भी नहीं सोचते क्योंकि उन्हें हिंदू समुदाय की तरफ़ से किसी संभावित प्रतिक्रिया का डर नहीं सताता। वो जानते हैं कि विवाद कुछ दिनों की सुर्ख़ियों में सिमटकर रह जाएगा और हिंदू अपनी परंपराओं के अपमान की कड़वी घूँट को चुपचाप पी जाएंगे।

2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से इस प्रवृत्ति ने और भी ज़्यादा तेज़ी पकड़ ली है। विपक्षी दलों ने हिंदू धर्म को तानाशाही से जोड़ने की रणनीति अपना ली है, और खुद को सेक्युलरिज़्म यानी धर्म-निरपेक्षता का ध्वजवाहक दिखाने का अभियान चलाया है। इस के चलते हिंदुओं को प्रगतिशीलता के नाम पर अपनी ही संस्कृति व  परंपराओं से अलग-थलग होने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, और हिंदू धर्म के प्रति घृणा का सामान्यीकरण किया जा रहा है

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिंदू आस्था पर प्रहार

आज भारत की विपक्षी राजनीति का बड़ा हिस्सा मौजूदा सत्ताधारी दल की तथाकथित “हिंदू बहुलतावादी” सोच का विरोध करने पर आधारित है। यह धारणा व्यापक है कि सत्तारूढ़ दल का मुख्य वोट बैंक हिंदू मुद्दों पर टिका हुआ है, इसलिए विपक्ष ने धर्म और उससे जुड़े प्रतीकों का विरोध ही अपनी चुनावी रणनीति बना लिया है। समय के साथ यह रणनीति केवल आलोचना तक सीमित नहीं रही, बल्कि हिंदू धर्म को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने और उसकी छवि को धूमिल करने का प्रयास बन गई है। इस प्रक्रिया में विपक्ष अपने लिए एक वैकल्पिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करता दिख रहा है।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण अयोध्या के राम मंदिर को लेकर देखने को मिला। जनवरी 2024 में आयोजित राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह, जो विश्वभर के करोड़ों हिंदुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र था, उसमें भाग लेने के लिए विपक्षी नेताओं को आमंत्रित किया गया। लेकिन कई प्रमुख नेताओं ने न्योता ठुकरा दिया। उनका तर्क था कि राम मंदिर वास्तव में बीजेपी का राजनीतिक प्रोजेक्ट है।[2] भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने कहा कि वे आस्था का सम्मान करते हैं, लेकिन धर्म और राजनीति को जोड़ना स्वीकार्य नहीं।[3] कांग्रेस ने भी इसी तरह का रुख अपनाया और दावा किया कि सत्ताधारी दल ने जन-आस्था को राजनीतिक प्रोजेक्ट में बदल दिया है।[4] हालाँकि, पार्टी के कुछ नेताओं ने निजी स्तर पर इस समारोह में भाग लिया, जिससे भीतर ही भीतर विचारों में असहमति भी झलकती है।

ऐसा ही रवैया महाकुंभ 2025 को लेकर भी दिखा। एक कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के सांसद अफ़ज़ल अंसारी ने तंज कसते हुए कहा कि अगर कुंभ स्नान से सच में पाप धुलते हैं और बैकुंठ के द्वार खुलते हैं, तो “नरक तो खाली हो जाएगा।” उनके इस व्यंग्य ने धार्मिक भावनाओं को आहत किया। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी महाकुंभ को लेकर बेहद विवादित बयान दिया। उन्होंने न केवल सनातन धर्म की मान्यताओं पर कटाक्ष किया बल्कि यह तक कह दिया कि “महाकुंभ जैसी कोई चीज़ है ही नहीं।” उनके अनुसार, यह शब्द केवल जनता को भ्रमित करने और सार्वजनिक धन की बर्बादी के लिए गढ़ा गया है।[5]

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी महाकुंभ पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सत्ताधारी दल के नेता कैमरों के सामने दिखावे के लिए डुबकियाँ लगा रहे हैं, और कहा कि क्या इस तरह डुबकी लगाने से देश की गरीबी मिट जाएगी?[6]

ये टिप्पणियाँ कोई इक्का-दुक्का घटनाएँ नहीं, बल्कि एक बड़े चलन का हिस्सा हैं जहाँ राजनीतिक बहसों में हिंदू परंपराओं को नीचा दिखाना आम हो गया है। भक्तों में आक्रोश तो उठता है, लेकिन क्योंकि हिंदू समाज इसे ठोस सामाजिक आंदोलन में नहीं बदल पाता और नेताओं पर लंबा दबाव नहीं बना पाता, इसलिए हिंदूफोबिया बिना रोक-टोक फैलता रहता है।[7]

चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि कई बार हिंदू स्वयं ही इस परिदृश्य में या तो मूक दर्शक बने रहते हैं, या फिर अपनी ही संस्कृति और धर्म का मज़ाक उड़ाए जाने पर ताली बजाकर वाहवाही करने वालों में शामिल हो जाते हैं। इस स्थिति की जड़ तथाकथित “सेक्युलर वोट बैंक” की राजनीति में छिपी है। विपक्षी दल अक्सर हिंदू समाज के उस वर्ग को साधते हैं जो अपनी हिंदू पहचान को लेकर असहज रहता है। इस वर्ग को लगातार यह समझाया और ब्रेनवॉश किया जाता है कि हिंदू पहचान पर गर्व करना संकीर्णता या “फासीवाद” का समर्थन है, जबकि तुष्टिकरण की राजनीति को “प्रगतिशीलता” का प्रतीक बताकर प्रचारित किया जाता है। नतीजतन, ऐसे लोग अपनी ही जड़ों से कटने लगते हैं और हिंदू धर्म को लेकर शर्मिंदगी महसूस करने लगते हैं।

StopHinduDvesha ने पहले भी इस प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है कि अकादमिक जगत इस हिंदू-विरोधी विमर्श का मूल स्रोत बन चुका है। विश्वविद्यालयों और बौद्धिक केंद्रों से निकलकर तैयार किया गया यह नैरेटिव परंपरागत मीडिया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, मनोरंजन उद्योग और विभिन्न संगठित नेटवर्क्स के माध्यम से समाज तक पहुँचाया जाता है। इस तरह एक योजनाबद्ध ढाँचे के तहत हिंदू-विरोधी विचारों को वैध और तर्कसंगत साबित किया जाता है, जिससे वे धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श में सामान्य और स्वाभाविक लगने लगते हैं।[8]

भारतीय राजनीति में हिंदू-विरोधी बयानबाजी आज एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा बन चुकी है। मोदी सरकार को चुनौती देने के लिए विपक्ष यदि हिंदू मुद्दों को रचनात्मक ढंग से उठाता, तो हिंदू विमर्श और भी विस्तृत और सार्थक हो सकता था। लेकिन अधिकांश विपक्षी दलों ने ऐसा करने के बजाय हिंदू द्वेष को ही अपनी रणनीति का केंद्र बना लिया। उनकी चुनावी राजनीति इस धारणा पर टिकी है कि सनातन धर्म का विरोध कर वे अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत बना सकते हैं। इस रणनीति का मकसद हिंदू धर्म को बदनाम करना और उससे जुड़े मुद्दों को अविश्वसनीय ठहराना है।

यह मानना गलत होगा कि हिंदू विषय केवल बीजेपी या संघ परिवार तक सीमित रहे हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन में अनेक दलों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग सक्रिय रूप से शामिल थे।[9] [10] इसी तरह, हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना या नेशनल सनातन बोर्ड जैसी मांगें कई संतों, आध्यात्मिक नेताओं और हिंदू संगठनों ने आगे बढ़ाई हैं। मौजूदा सत्तारूढ़ दल इन सभी मुद्दों से हमेशा सहमत हो, यह भी आवश्यक नहीं है।

इसके अलावा, कुछ विषयों पर सरकार और हिंदू समाज की सोच में स्पष्ट मतभेद भी दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने का सवाल लंबे समय से हिंदू समाज की प्रमुख मांग रहा है। इस प्रकार के विषयों पर विपक्ष के पास पर्याप्त अवसर था कि वह रचनात्मक बहस छेड़कर हिंदू समाज का भरोसा जीत सके। लेकिन इसके विपरीत, उसने बार-बार हिंदू-विरोधी विमर्श को ही हवा दी है।

उसका मुख्य उद्देश्य है अल्पसंख्यक वोट बैंक का तुष्टिकरण और इस प्रक्रिया में वह हिंदू धर्म का इस्तेमाल एक मोहरे की तरह करता है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की इस राजनीतिक प्रवृत्ति पर हम अगले भाग में विस्तार से चर्चा करेंगे।

अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति

भारत की राजनीति में लंबे समय से एक प्रवृत्ति देखी जाती है कि हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं को निशाना बनाया जाता है। यह प्रवृत्ति मुख्य रूप से अल्पसंख्यक तुष्टिकरण से जुड़ी हुई है। ऐसी राजनीति में अल्पसंख्यकों की पहचान को हिंदू संस्कृति और परंपराओं के विरोध में खड़ा किया जाता है। नतीजा यह होता है कि हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के बीच अविश्वास और वैमनस्य बढ़ता है।

राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू रीति-रिवाजों और मान्यताओं को अक्सर इस तरह दिखाया जाता है मानो वे अल्पसंख्यकों के लिए ख़तरा हों। इससे यह धारणा बनाई जाती है कि हिंदू धर्म का विरोध करना अल्पसंख्यकों के अस्तित्व की रक्षा के लिए ज़रूरी है। इस प्रकार की सोच ने समाज में विभाजन को और गहरा कर दिया है।

विडंबना यह है कि इस तुष्टिकरण की राजनीति से सबसे ज़्यादा नुकसान अल्पसंख्यक समुदायों को ही हुआ है। द न्यू इंडियन में छपे एक लेख में लेखिका अर्शिया मलिक लिखती हैं कि स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम नेतृत्व समुदाय को मुख्यधारा में शामिल करने और उसके विकास में असफल रहा। उनका कहना है कि कांग्रेस जैसी पार्टियों से जुड़े मुस्लिम नेताओं ने अपने समाज को सिर्फ वोट बैंक समझा। मलिक के अनुसार, इन नेताओं ने असली मुद्दों—शिक्षा, रोजगार, और स्वास्थ्य—पर ध्यान देने की बजाय तुष्टिकरण को ही हथियार बना लिया। उन्होंने मुस्लिम समाज को आगे बढ़ाने के बजाय अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए झूठे वादों और प्रतीकात्मक संतुष्टि में उलझाए रखा। परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम समुदाय रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में पिछड़ गया, जबकि उनके नाम पर राजनीति करने वाले नेता मज़बूत होते चले गए।[11]

अल्पसंख्यक तुष्टिकरण ने भारत की सभ्यतागत अस्मिता से जुड़े मुद्दों—अयोध्या राम मंदिर, कृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी विवाद आदि—को मुस्लिम समाज के लिए “अहम की लड़ाई” बना दिया। इसका कारण यह है कि भारतीय मुस्लिम समुदाय अब भी एक प्रकार के सभ्यतागत स्टॉकहोम सिंड्रोम से जकड़ा हुआ है। अपनी सांस्कृतिक पहचान को भारत की प्राचीन परंपरा से जोड़ने के बजाय वह इस्लामिक आक्रांताओं की तथाकथित विरासत में तलाशता है।

इस स्थिति ने मुस्लिम समाज को तुष्टिकरण की राजनीति का अत्यधिक आश्रित बना दिया है। उन्हें एक ऐसे सभ्यतागत नैरेटिव की आवश्यकता है, जो उनकी पहचान को भारत की पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर से जोड़ सके। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ है।

परिणामस्वरूप, मुस्लिम समाज “मुगल विरासत” को पकड़कर बैठा है, जिससे हिंदू-मुस्लिम संबंध और तनावपूर्ण बनते हैं। जहाँ हिंदू समुदाय अपनी सभ्यता की जड़ों को पुनः खोज रहा है, वहीं मुसलमान अभी भी उस अतीत से जुड़ाव महसूस करते हैं, जिसने भारत को लंबे समय तक आक्रांत किया। अर्शिया मलिक लिखती हैं कि यही मानसिकता दोनों समुदायों को बराबरी के संवाद की बजाय लगातार टकराव की स्थिति में खड़ा कर देती है:

राजनीतिक हिंदुत्व का उभार आंशिक रूप से उस खालीपन से जुड़ा है, जो मुस्लिम नेताओं की समावेशी और प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाने में विफलता से पैदा हुआ। वे मुगल काल के मोह को छोड़ नहीं पाए। आज भले ही देर हो चुकी है, लेकिन भारतीय मुसलमानों की चुनौतियाँ एक नए नेतृत्व की माँग करती हैं, एक ऐसा नेतृत्व, जो पहचान की राजनीति छोड़कर सामाजिक-आर्थिक विकास और मुख्यधारा में सहभागिता को प्राथमिकता दे।[12]

भारत में मुसलमान और ईसाई समुदाय अक्सर एकजुट होकर वोट देते हैं, लेकिन हिंदू समाज में ऐसी कोई राजनीतिक एकता नहीं है। यही कारण है कि हिंदू संगठित वोट बैंक के रूप में सामने नहीं आते। इस राजनीतिक कमजोरी का सीधा लाभ अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति को मिलता है। लगभग हर बड़ा दल अल्पसंख्यक वोटों की ताक़त के आगे झुकता दिखाई देता है।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण 2022 का नूपुर शर्मा विवाद है। काशी ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग मिलने को लेकर एक टीवी डिबेट में, जब कुछ पैनलिस्ट्स ने जाँच पर व्यंग्य किया और उसका मज़ाक उड़ाया, तो नूपुर शर्मा की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं। उसी दौरान उन्होंने इस्लाम पर कुछ विवादित टिप्पणी कर दी। मामला तब और बढ़ गया जब Alt News के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर ने उनकी टिप्पणी का एक हिस्सा काट-छाँटकर सोशल मीडिया पर डाल दिया।[13] यह क्लिप पूरी बहस के संदर्भ से अलग थी। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल होते ही इसने मुस्लिम समाज में ग़ुस्से की तीव्र लहर पैदा कर दी। विरोध-प्रदर्शन और धमकियों का ऐसा माहौल बना, जिसने तुष्टिकरण की राजनीति की वास्तविक ताक़त को सबके सामने ला दिया।

नूपुर शर्मा विवाद ने वैश्विक स्तर पर भारी हलचल मचा दी। इस मामले को “इस्लामोफोबिया” से जोड़कर पूरी दुनिया में प्रचारित किया गया। नूपुर शर्मा को लगातार जान से मारने की धमकियाँ मिलती रहीं, जिससे वे आज भी सार्वजनिक जीवन से लगभग ग़ायब हैं और डर के साए में जी रही हैं। दुख की बात यह रही कि उनकी सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मज़बूती से बचाव करने के बजाय सरकार ने तुष्टिकरण को प्राथमिकता दी। धमकी देने वालों पर सख़्त कार्रवाई की जगह नूपुर को ही हाशिये पर धकेल दिया गया।

हिंदू मुद्दों को लेकर कोई देशव्यापी आंदोलन आख़िर क्यों नहीं छिड़ पाता?

भारत में अधिकांश बड़े आंदोलन अक्सर “अल्पसंख्यक अधिकारों” के चश्मे से देखे और दिखाए जाते हैं। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन (दिसंबर 2019 – मार्च 2020), जहाँ नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का विरोध हुआ। बुज़ुर्ग मुस्लिम महिलाओं की ठंड में धरना देती तस्वीरें वामपंथी और उदारवादी मीडिया के लिए आंदोलन का प्रतीक बना दी गईं। लेकिन इस दौरान एक अहम तथ्य छिपा दिया गया—CAA भारत के मुसलमानों के खिलाफ नहीं, बल्कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए प्रताड़ित हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों को शरण देने के लिए बनाया गया था।

यही पैटर्न आगे किसान आंदोलन (2020–2021) में भी दिखा। यह आंदोलन मूल रूप से कृषि क़ानूनों से जुड़ा था, लेकिन मीडिया नैरेटिव ने इसे शाहीन बाग से जोड़ दिया, मानो यह भी “हिंदू राष्ट्रवाद” के खिलाफ लड़ाई हो। आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को विशेष रूप से उभारा गया और इसे शाहीन बाग की महिलाओं से प्रेरित बताकर एक प्रतीकात्मक कड़ी बना दी गई।

इस तरह वास्तविक मुद्दों—चाहे नागरिकता हो या कृषि सुधार—पर गंभीर बहस के बजाय, आंदोलनों को हिंदू पहचान और बहुसंख्यक समाज के विरोध के प्रतीक में बदल दिया गया। इससे विमर्श का फोकस मूल समस्याओं से हटकर राजनीतिक एजेंडे पर केंद्रित हो गया।[14]

भारत में अल्पसंख्यक समुदाय अपने मुद्दों को उठाने के लिए अक्सर बड़े आंदोलनों का सहारा लेते हैं, चाहे उन मुद्दों की वैधता संदिग्ध ही क्यों न हो। इसके विपरीत, हिंदू समाज ने बहुत कम ही अपने धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा किया है। कई बार तो “वोक” कहे जाने वाले हिंदू भी वामपंथी या इस्लामिस्ट एजेंडा वाले आंदोलनों में “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर शामिल हो जाते हैं और अनजाने में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को और बल देते हैं। तटस्थ रहना या चुप रहना, जिसे कई लोग सद्गुण मानते हैं, दरअसल हिंदुओं को सबसे आसान निशाना बना देता है।

इस स्थिति को और गहरा करता है हिंदू समाज का क्षमाशील स्वभाव। जब कोई नेता या सार्वजनिक व्यक्ति हिंदू धर्म पर चोट करता है और बाद में आधे-अधूरे शब्दों में माफी माँग लेता है, तो हिंदू समाज तुरंत शांत हो जाता है। यही प्रवृत्ति एक ऐसे दुष्चक्र को जन्म देती है, जहाँ बार-बार अपमान और तिरस्कार को बिना ठोस प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया जाता है। नेता और एक्टिविस्ट्स जानते हैं कि हिंदू आस्था का अपमान करने पर उन्हें गंभीर विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। यही कारण है कि वे बेझिझक हिंदू धर्म, उसकी परंपराओं और अनुयायियों का निरंतर अपमान करते रहते हैं।

अप्रैल में फ़िल्मकार अनुराग कश्यप ने ब्राह्मण समाज पर बेहद अश्लील टिप्पणी कर विवाद खड़ा कर दिया। “फुले” फ़िल्म पर ऑनलाइन बहस के दौरान कश्यप ने कहा कि वह “ब्राह्मणों पर पेशाब करेंगे”। इस आपत्तिजनक टिप्पणी ने हिंदू समाज में ग़ुस्सा भड़का दिया और जगह-जगह निंदा हुई। कश्यप की यह टिप्पणी न केवल अपमानजनक थी, बल्कि इसने एक बार फिर यह दिखाया कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के अपमान पर समाज किस तरह प्रतिक्रिया करता है।[15] लेकिन जैसे ही अनुराग कश्यप ने माफ़ी माँगी, मामला शांत हो गया। न कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ, न ही उनकी फ़िल्मों के बहिष्कार की कोई संगठित माँग उठी—सिर्फ कुछ दिनों की नाराज़गी और फिर सब ठंडा।

हिंदू समाज का यह ढीला रवैया नेताओं, बुद्धिजीवियों और कलाकारों का हौसला बढ़ाता है। उन्हें मालूम है कि हिंदू-विरोधी टिप्पणी करना लगभग “जोखिम-रहित” है। नतीजा यह निकलता है कि हिंदूफोबिया अब एक संगठित प्रवृत्ति बन चुका है, जिसके कर्ता-धर्ताओं को अपने किए का ख़ामियाज़ा भुगतने का कोई डर ही नहीं है।

तमिलनाडु की हिंदू विरोधी राजनीति

हिंदू धर्म पर होने वाले सबसे घृणित हमले अक्सर और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनेताओं द्वारा किए जाते हैं। और यह कोई संयोग नहीं है। हिंदू  आस्था और परंपराओं को गाली देना एक लंबे समय से इन क्षेत्रों के राजनीतिक चरित्र का हिस्सा रहा है। दक्षिण भारत के कुछ राजनीतिक दलों के लिए हिंदू धर्म का अपमान करना एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति है। द्रविड़ राजनीति, जिसे मिशनरी कन्वर्ज़न तंत्र और वाम-उदारवादी प्रतिष्ठान से बल मिलता है, तथाकथित जातिगत विभाजन से जुड़ी समस्याओं को संबोधित करने और आर्य-द्रविड़ सिद्धांत का राग अलापने की आड़ में हिंदू पहचान को कमजोर करने पर टिकी हुई है।

सितंबर 2023 में तमिलनाडु के नेता उदयनिधि स्टालिन ने खुलेआम सनातन धर्म के उन्मूलन की माँग कर डाली। उन्होंने डेंगू,” “मलेरियाऔर कोरोना जैसी बीमारियों से सनातन धर्म की तुलना करते हुए उसे पूरी तरह से नष्ट कर देने तक की माँग कर डाली।[16] यह तथ्य कि एक वरिष्ठ मंत्री बहुसंख्यक धर्म के ख़िलाफ़ इतना अपमानजनक बयान दे और फिर भी बिना किसी राजनीतिक नुक़सान के कुर्सी पर बना रहे, इस बात का सबूत है कि तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति में हिंदू धर्म का अपमान करना एक सामान्य प्रचलन है। तमिलनाडु में जिस तरह की राजनीति का बोलबाला है, उसके चलते तो हिंदू धर्म की आलोचना की प्रशंसा की जाती है; बल्कि हिंदु धर्म को गाली देना प्रगतिशील राजनीति का द्योतक माना जाता है।

स्वराज्य पत्रिका में छपे एक लेख ने इस प्रवृत्ति की ऐतिहासिक जड़ों को उजागर किया। उसमें बताया गया कि उदयनिधि के इस बयान पर किसी को भी हैरानी नहीं होनी चाहिये, चूँकि DMK (तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी) के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरै ने 1943 में ही एक वक्तव्य के दौरान सनातनमको खत्म करने की बात कही थी। लेख का तर्क है कि यह हिंदू एकता का भय ही है, जिसने तमिलनाडु में हिंदू धर्म पर निरंतर होने वाले हमलों की राजनीति को और भी ज़्यादा तीखा बना दिया है।[17]

अपने लेखन के माध्यम से डेविड फ्रॉले (David Frawley) ने भी दक्षिण भारत में बढ़ती हिंदू-विरोधी राजनीति की ओर इशारा किया है। वे इस चलन को एक गहरा सांस्कृतिक विरोधाभास बताते हैं— जहां एक ओर तो यह इलाक़ा वैदिक विरासत से समृद्ध है, तो वहीं दूसरी ओर यहाँ के मतदाता अक्सर ऐसी पार्टियों को सत्ता में लाते हैं जो खुले तौर पर हिंदू-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं—जैसे तमिलनाडु में DMK और केरल में कम्युनिस्ट। फ्रॉले मानते हैं कि इसकी असली वजह यह है कि दक्षिण भारतीय हिंदू अपनी सांस्कृतिक पहचान या सामाजिक-अधिकारों की रक्षा के लिए शायद ही कभी एकजुट होकर मतदान करते हैं। इसका नतीजा यह निकलता है कि उनकी संस्कृति और परंपराएँ राजनीतिक दांव पेंचों के प्रति अति संवेदनशील हो जाती हैं।[18]

समापन

भारत का हिंदू समुदाय अक्सर राजनीतिक छींटाकशी के निशाने पर रहते हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वह एक संगठित वोट बैंक के तौर पर सक्रिय नहीं है।

हिंदुओं में एकजुटता की इस कमी के चलते वे राजनीतिक क्षेत्र में हिंदू मुद्दों को सामूहिक रूप से उठाने में असमर्थ रहते हैं। इसका नतीजा यह निकलता है कि भारत का हिंदू समुदाय सीधे सीधे हिंदूफोबिया या हिंदू-विरोधी मानसिकता के निशाने पर आ जाता है। इसलिए कभी “धर्मनिरपेक्षता” तो कभी “प्रगतिशीलता” के नाम पर हिंदू धर्म का अपमान किया जाता है।

आज जब भारत एक व्यापक सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है, तब सनातन धर्म से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक एकता की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जातिगत तुष्टिकरण से ऊपर उठकर, मूल हिंदू चिंताओं के इर्द-गिर्द निर्मित एक एकीकृत हिंदू पहचान ही भारतीय राजनीति में सनातन धर्म के व्यवस्थित दानवीकरण (demonization) का सबसे प्रभावी उत्तर बन सकती है।

सन्दर्भ सूची

[1] Education alone can break  ‘chain of  Sanatan’, says Kamal Haasan; https://www.newindianexpress.com/nation/2025/Aug/04/education-alone-can-break-chain-of-sanatan-says-kamal-haasan-2

[2] Ram Mandir opening ceremony: Here’s a list of people who declined the invitation; https://timesofindia.indiatimes.com/india/ram-mandir-ayodhya-consecration-ceremony-invitation-declined-congress-cpi-sharad-pawar/photostory/106978279.cms?picid=106979932

[3] Indian leaders divided over attending Ram Temple event | Latest News India – Hindustan Times;  https://www.hindustantimes.com/india-news/india-leaders-divided-over-attending-ram-temple-event-101703618945495.html

[4] Ayodhya boycott move splits Congress leaders | Ayodhya boycott move splits Congress leaders;  https://www.deccanchronicle.com/nation/current-affairs/110124/congress-a-divided-house-over-attending-the-ram-temple-consecration-ce.html

[5] No Such Thing Like Maha Kumbh’: Akhilesh Yadav Says Govt Wasting Money; BJP calls it ‘Cheap Politics’ | Politics News – News18;  https://www.news18.com/politics/no-such-thing-like-maha-kumbh-akhilesh-yadav-echoes-lalus-remark-bjp-calls-it-cheap-politics-9230597.html

[6] Kharge insulted the sentiments of Hindus with remarks on Maha Kumbh: BJP | Politics News – Business Standard; https://www.business-standard.com/politics/kharge-insulted-sentiments-of-hindus-with-remarks-on-maha-kumbh-bjp-125012800430_1.html

[7] Samajwadi Party MP Afzal Ansari booked for insulting Maha Kumbh;    https://www.opindia.com/2025/02/samajwadi-party-mp-afzal-ansari-booked-for-insulting-maha-kumbh/

[8] Hindudvesha and UN’s Double Standard; https://stophindudvesha.org/hindudvesha-and-uns-double-standard/

[9] Explained | Congress’s Catch 22 dilemma with Ram Janmabhoomi dispute; https://www.deccanherald.com/india/explained-congress-catch-22-dilemma-with-ram-janmbhoomi-dispute-2858009#google_vignette

[10] Unsung Heroes of Sri Ram Janmabhoomi Movement;  https://organiser.org/2024/08/05/217413/bharat/unsung-heroes-of-sri-ram-janmabhoomi-movement/

[11] Detrimental legacy of Indian Muslim leadership THE NEW INDIAN – detrimental legacy of Indian muslim leadership – New Indian; https://www.newindian.in/detrimental-legacy-of-indian-muslim-leadership/

[12] Ibid.

[13] From death threats to bounties, Islamists descend on BJP leader Nupur Sharma for countering abuse of Hindu deities; https://hindupost.in/news/from-death-threats-to-bounties-islamists-descend-on-bjp-leader-nupur-sharma-for-countering-abuse-of-hindu-deities/#

[14] How farmers’ agitation is similar to Shaheen Bagh protests | India News – Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/india/how-farmers-agitation-is-similar-to-shaheen-bagh-protests/articleshow/79610710.cms

[15] Phule Controversy: Anurag Kashyap apologises for remarks against Brahmin community – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/entertainment/phule-controversy-anurag-kashyap-apologises-for-remarks-against-brahmin-community/articleshow/120512487.cms?from=mdr

[16] Supreme Court Issues Notice To Udhayanidhi Stalin For ‘Eradicate Sanatana Dharma’ Remarks;   https://swarajyamag.com/tamil-nadu/supreme-court-issues-notice-to-udhayanidhi-stalin-for-eradicate-sanatana-dharma-remarks

[17] Tamil Nadu Politics Has Always Been A Breeding Ground For Anti-Hindu  Forces;  https://swarajyamag.com/politics/tamil-nadu-politics-has-always-been-a-breeding-ground-for-anti-hindu-forces

[18] Hindus in South India must unite for their collective past and shared future – Sanatan Prabhat;   https://sanatanprabhat.org/english/147602.html

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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