गोवा का हिंदू पुनर्जागरण: सदियों के औपनिवेशिक शासन के नीचे दबी एक सभ्यता की घर वापसी
- गोवा का हिंदू पुनर्जागरण केवल धार्मिक गतिविधियों की वापसी नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दमन और स्वतंत्रता के बाद की उदासीनता से उपजी सांस्कृतिक विस्मृति से बाहर निकलने की प्रक्रिया है।
- मंदिरों, उत्सवों और सार्वजनिक परंपराओं की पुनर्स्थापना के माध्यम से हिंदू समाज ने अपनी ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक उपस्थिति को दोबारा सशक्त किया है।
- यह बदलाव राज्य नीतियों, स्थानीय सहभागिता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के संयुक्त प्रभाव से संभव हुआ, न कि केवल व्यक्तिगत आस्था के स्तर पर।
- गोवा का अनुभव दिखाता है कि परंपरा तब जीवंत रहती है जब वह सामाजिक जीवन, संस्थाओं और सामूहिक स्मृति में सक्रिय रूप से जुड़ी होती है।
- यह पुनर्जागरण एक स्थानीय घटना भर नहीं, बल्कि भारत में व्यापक सांस्कृतिक पुनर्संयोजन और सभ्यतागत पुनर्स्थापन की बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है।
जब कोई समाज स्वतंत्रता के दशकों बाद भी अपनी पहचान पूर्व औपनिवेशिक शासकों की सांस्कृतिक खुरचन के आधार पर परिभाषित करता रहे, तो यह सभ्यतागत निरंतरता का नहीं बल्कि सांस्कृतिक ह्रास का संकेत होता है। समय के साथ यह ह्रास एक तरह की सभ्यतागत विस्मृति में बदल जाता है—जहाँ आक्रांताओं द्वारा थोपी गई पहचान को लोग अपनी असली विरासत समझने लगते हैं, और उसी के अनुसार जीने और सोचने लगते हैं। इस मनोवृत्ति का सबसे भयावह स्वरूप सांस्कृतिक स्टॉकहोम सिंड्रोम के रूप में सामने आता है। यानी पीड़ित समुदाय उत्पीड़कों द्वारा थोपी गई सांस्कृतिक पहचान को इस हद तक आत्मसात कर लेता है कि वह अपनी ख़ुद की सभ्यता और धार्मिक पहचान को घृणा के भाव से देखने लगता है।
गोवा इस प्रवृत्ति का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
दुनिया के सामने गोवा को भारत के “प्लेज़ग्राउंड” के तौर पर पैकेज किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसकी एक ऐसी मनमोहक और ग्लैमरस छवि पेश की जाती है, जिसका भारतीयता से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। लेकिन विडंबना तो देखिए, भारतीयता से यह अलगाव ही गोवा को एक विश्व विख्यात टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाता है। बीच, रेव पार्टियाँ, ड्रग्स, शराब और एक सुनियोजित पश्चिमी सौन्दर्यशास्त्र – जब बात गोवा की आती है, तो प्रत्येक व्यक्ति के मन में कुछ ऐसी ही छवि उभरती है। इसे भारत के भीतर स्थित एक अपवाद की तरह पेश किया जाता है, जो अपनी सभ्यतागत जड़ों से पूरी तरह से कटा हुआ है, और इस अलगाव को लेकर बेहद गौरवान्वित महसूस करता है। लेकिन गोवा के इर्द गिर्द बुनी गयी यह कहानी एक बुनियादी सच को मिटा देती है—गोवा का इतिहास पुर्तगालियों के आगमन से शुरू नहीं होता। औपनिवेशिक शासन से बहुत पहले यहाँ एक समृद्ध हिंदू सभ्यतागत जीवन था, जो समय के साथ स्वाभाविक रूप से नहीं बदला, बल्कि इसे सुनियोजित ढंग से उखाड़ फेंका गया ।
जिस पुर्तगाली दौर को आज चर्चों और स्थापत्य-स्मृतियों के माध्यम से महिमामंडित किया जाता है, वह असल में अत्याचार और क्रूरता से भरा था। गोवा इंक्विज़िशन ने भारतीयों पर अमानवीय कानून थोपे, स्थानीय धार्मिक परंपराओं के पालन को अपराधिक कृत्य घोषित कर दिया, और हिंदुओं को लंबे समय तक उत्पीड़न झेलने पर मजबूर किया।[1] यह किसी भी अर्थ में सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं था। यह सीधा-सीधा सांस्कृतिक विनाश था। फिर भी दशकों तक गोवा की वैश्विक अपील एक साफ-सुथरी औपनिवेशिक स्मृति पर टिकी रही—जहाँ हिंसा को “विरासत” और विनाश को एक सुखद परिवर्तन के रूप में पेश किया गया।
अब यह मिथक धीरे-धीरे टूट रहा है।
पिछले एक दशक में गोवा अपनी औपनिवेशिक परछाईं से बाहर निकलने लगा है। शायद आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि राज्य की दबी हुई हिंदू पहचान को सार्वजनिक स्तर पर स्वीकार किया जा रहा है। मंदिर पर्यटन को बढ़ावा देने और तीर्थ सर्किट विकसित करने की सरकारी पहलें यह दिखाती हैं कि गोवा अपने बारे में सोचने के तरीके को दोबारा परिभाषित कर रहा है। जो पार्टी-और-ड्रग कल्चर कभी गोवा की पहचान माना जाता था, वह अब धीरे-धीरे कर अपना आकर्षण खो रहा है। गोवा के अति सरलीकृत पश्चिमी स्वरूप की जगह अब एक ऐसा गोवा उभर कर सामने आ रहा है जो अपनी प्राचीन जड़ों से जुड़ा हुआ है, और सनातन के शाश्वत सार को ख़ुद में समेटे हुए है।
यह बदलाव सिर्फ़ क्षेत्रीय नहीं है। यह पूरे भारत में चल रहे एक व्यापक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा है—जहाँ अब तक हाशिये पर पड़ी ऐतिहासिक स्मृतियाँ पुनः जागृत हो रही हैं, और सांस्कृतिक आत्मविश्वास वापस लौट रहा है। गोवा का यह परिवर्तन खुलेपन या आधुनिकता का बहिष्कार नहीं है। यह एक ऐसा सुधार है, जो लंबे समय तक भुला दी गई इस धरती को उसका इतिहास, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक क्रम वापस देता है।
गोवा की हिंदू विरासत पर रोशनी
नवंबर 2025 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण गोवा के श्री संस्थान गोकर्ण जीवोत्तम मठ में भगवान राम की 77 फ़ुट ऊँची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया, तो यह दृश्य उन लोगों के लिए चौंकाने वाला था, जो गोवा को सिर्फ़ नाइटलाइफ़ और बीच टूरिज़्म से जोड़कर देखते आए हैं। दुनिया की सबसे ऊँची भगवान राम की प्रतिमाओं में सम्मिलित इस प्रतिमा का निर्माण प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार ने किया है, जिन्हें गुजरात के स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण के लिए जाना जाता है।
देश के सबसे पुराने मठों में गिने जाने वाले इस मठ का गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय में विशेष स्थान है, और यह लंबे समय से एक महत्वपूर्ण वैष्णव आध्यात्मिक केंद्र रहा है। मठ परिसर की स्थापना लगभग 370 वर्ष पहले हुई थी, जिससे इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व और भी गहरा हो जाता है। भगवान राम की प्रतिमा का अनावरण मठ परंपरा की 550वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया गया।[2] [3] [4]
प्रतिमा के अनावरण के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने मठ परिसर में विकसित किए गए रामायण थीम पार्क गार्डन का भी उद्घाटन किया। इसके अलावा इस अवसर को चिह्नित करने के लिए एक विशेष स्मारक डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया गया।[5]
गोवा में भगवान राम की प्रतिमा का अनावरण उस पृष्ठभूमि में बेहद प्रतीकात्मक है, जहाँ राज्य की हिंदू विरासत को लगभग पूरी तरह से मिटा दिया गया था। पुर्तगाली आक्रमण की हिंसा और आज़ादी के बाद की सरकारों द्वारा गोवा के हिंदू अतीत के प्रति दिखाई गई सभ्यतागत उदासीनता—इन दोनों ने मिलकर यहाँ की सनातनी जड़ों को योजनाबद्ध रूप से नष्ट किया, और हाशिये पर धकेल दिया।
पुर्तगाली शासन के अन्तर्गत गोवा का ईसाईकरण भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। इस दौर में बड़े पैमाने पर मंदिरों को खंडित कर उन्हें तोड़ा गया, जबरन धर्मांतरण के लिए धड़ल्ले से हिंसा का इस्तेमाल किया गया, और हिंदू रीति-रिवाज़ों व परंपराओं के सार्वजनिक पालन पर बेहद कठोर प्रतिबंध लगाए गए।[6] 16वीं शताब्दी में शुरू हुए गोवा इंक्विज़िशन के अन्तर्गत हज़ारों भारतीयों को ईसाई धर्म के ख़िलाफ़ कथित निंदा, मूर्ति-पूजा, जादू-टोना और तंत्र-क्रिया जैसे आरोपों के तहत असंख्य यातनाएँ दी गईं और मौत के घाट उतार दिया गया। उत्पीड़न की यह मशीनरी 17वीं और 18वीं सदी तक बेरोकटोक चलती रही।[7]
चर्चों, कैथेड्रलों और पुर्तगाली दमन के अन्य प्रतीकों से भरे इस परिदृश्य में—जिन्हें आधुनिक दौर में गोवा की “सांस्कृतिक विरासत” के रूप में मार्केट किया जाता है—राज्य की हिंदू जड़ें लंबे समय तक हाशिये पर रहीं। लेकिन भारत में चल रहा सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण अब इस विमर्श को बदलने लगा है और गोवा की वैदिक जड़ों को फिर से सामने ला रहा है।
गोवा की मुख्यधारा की संस्कृति से बाहर रखी गई कई कथाएँ अब भारतवासियों के बीच पुनः अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन्हीं में से एक कथा है भगवान परशुराम की, जो भारत की धार्मिक परंपरा में एक अति पूजनीय स्थान रखते हैं। उन्हें प्रायः “गोवा का जनक” कहा जाता है। मान्यता है कि कोंकण क्षेत्र—जिसमें आज का गोवा भी सम्मिलित है—के निर्माण में भगवान परशुराम की केंद्रीय भूमिका रही। परंपरा के अनुसार, उन्होंने सह्याद्रि पर्वतमाला की रचना की और फिर पश्चिमी समुद्र की ओर बाण चलाया, जिससे समुद्र पीछे हटा और वह भूमि प्रकट हुई जिसे आगे चलकर गोवा कहा गया।[8] [9]
प्राचीन ग्रंथों में गोवा को कई नामों से सम्बोधित किया गया है—जैसे गोकपत्तन, गोमंचल, गोकपुरी, गोवेम, गोवपुरी और गोमंतक। धार्मिक परंपरा के अनुसार, भूमि के निर्माण के बाद भगवान परशुराम ने ब्राह्मण समुदायों को यहाँ बसने और वैदिक कर्मकांड करने के लिए आमंत्रित किया। समय के साथ ये ब्राह्मण सारस्वत ब्राह्मण कहलाए, और उन्होंने गोवा की सांस्कृतिक व सभ्यतागत संरचना को गहराई से आकार दिया।[10]
जून 2023 में गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने पणजी में ‘गोमंतभूमि जनक परशुराम’ की प्रतिमा का अनावरण किया। इसके माध्यम से गोवा के सभ्यतागत इतिहास में भगवान परशुराम की केंद्रीय भूमिका को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया, और उन्हें सम्मान दिया गया।[11]
गोवा में भगवान परशुराम को समर्पित कई मंदिर भी हैं, जिनमें पैंगुइनिम स्थित परशुराम मंदिर प्रमुख है। न्याय, अनुशासन और धर्म के प्रति अडिग प्रतिबद्धता के प्रतीक माने जाने वाले भगवान परशुराम का गोवा की धरती से जुड़ाव, यहाँ के धार्मिक इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।[12]
गोवा की हिंदू विरासत की एक और महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है शिगमोोत्सव—एक रंग-बिरंगा वसंत उत्सव, जो अपनी भव्य झांकियों और लोक-परंपराओं के लिए जाना जाता है। राज्य के हिंदू अतीत से गहराई से जुड़ा यह त्योहार गोवा की प्राचीन कृषि परंपराओं और सांस्कृतिक लय को दर्शाता है। हाल के वर्षों में शिगमोोत्सव को नई ऊर्जा मिली है, जिसमें समुद्र-तट आधारित पर्यटन से आगे बढ़कर सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने के लिए सरकार के लगातार प्रयासों की बड़ी भूमिका रही है।
15 मार्च से 29 मार्च 2025 तक चले समारोहों में नृत्य, संगीत, मंदिर अनुष्ठान और तरह-तरह की सड़क प्रस्तुतियों का सुंदर संगम देखने को मिला, जिसने गोवा की पारंपरिक जड़ों की झलक पेश की। मूल रूप से यह एक कृषि उत्सव है, जो खेती के मौसम के अंत का संकेत देता है। इस दौरान समुदाय अपने स्थानीय देवताओं का सम्मान करते हैं, और लोक संगीत, नृत्य व सामूहिक उत्सव के ज़रिये उल्लास मनाते हैं।[13]
शिगमोोत्सव में महाभारत और रामायण के प्रसंगों को भी लोकनृत्यों, सजी-धजी झांकियों और लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत किया जाता है। यह त्योहार दो अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। ढाकतो शिगमो, जो आमतौर पर गोवा के गांवों में मनाया जाता है, त्योहार की हिंदू जड़ों को सहेजने पर केंद्रित रहता है। इसमें पारंपरिक मंदिर अनुष्ठानों को उनके मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है, और लोक प्रस्तुतियाँ अपनी मूल शैली और ताल-लय के साथ होती हैं। इसकी पहचान एक आत्मीय, समुदाय-केंद्रित माहौल है, जहाँ मंदिर परंपराओं की विशिष्टता का खास महत्व होता है।
इसके विपरीत व्हाडलो शिगमो इस उत्सव का भव्य रूप है, जिसे मापुसा, पणजी, मडगांव और वास्को जैसे शहरों में मनाया जाता है। यहाँ मुख्य रूप से समारोह की भव्यता और उसके विराट स्वरूप को रेखांकित किया जाता है—भव्य जुलूस, रंगीन झांकियाँ और कार्निवल जैसा माहौल—ताकि बड़ी संख्या में लोग जुड़ सकें, लेकिन साथ ही त्योहार की सांस्कृतिक शुद्धता बनी रहे।[14]
मंदिर पर्यटन को मिल रहा नया प्रोत्साहन
जहाँ पूरे भारत में मंदिर पर्यटन अभूतपूर्व तेज़ी से बढ़ रहा है, वहीं गोवा की सार्वजनिक छवि आज भी चर्च, बीचेज़, शैक्स और नाइटलाइफ़ जैसे घिसे पिटे मानकों के आधार पर ही परिभाषित हो रही रही है। गोवा की राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय छवि पर उसकी पश्चिमी पहचान इस कदर हावी हो चुकी है कि राज्य में मंदिर जाकर पूजा करने वाले पर्यटकों की कल्पना तक करना अजीब जान पड़ता है। गोवा की जो अतिपश्चिमीकृत छवि लंबे समय तक मुख्यधारा की सोच पर हावी रही है, उसे बदल पाना कोई आसान काम नहीं है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक मूलभूत बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। गोवा एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है, जहां उसकी पर्यटन छवि को एक नये सिरे से ब्रांड किया जा रहा है। गोवा की धार्मिक और सनातन विरासत को केंद्र में रखकर टूरिज़्म की एक नई छवि गढ़ी जा रही है। राज्य सरकार ने मंदिर पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं, जो इस बात का संकेत है कि गोवा को देश और दुनिया के सामने एक नए संतुलित रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है।
जून 2023 में गोवा सरकार ने टेम्पल कनेक्ट नामक संस्था के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। यह संस्था मंदिर तंत्र के विकास और पुनरुद्धार पर काम करती है। राज्य के पर्यटन मंत्री रोहन खौंटे के अनुसार, इस साझेदारी का उद्देश्य गोवा की धार्मिक विरासत को एक ग्लोबल सर्किट से जोड़कर उसके पर्यटन सामर्थ्य को बढ़ाना है। इस सहयोग के अन्तर्गत ऐसे मंदिरों की पहचान की जाएगी जिन्हें तत्काल संरक्षण और जीर्णोद्धार की आवश्यकता है, और उनके दीर्घकालिक रखरखाव, विकास और सुगम पहुँच के लिए लक्षित पहलें की जाएँगी।[15]
MoU के प्रावधानों के अन्तर्गत सरकार मंदिरों के आसपास के बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने पर ध्यान दे रही है। इसमें पहुँच मार्ग, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएँ, साइनबोर्ड और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। समझौते में मंदिरों से जुड़े पुजारियों और अन्य हितधारकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं की रूपरेखा भी तय की गई है। इन कार्यक्रमों का फोकस संवाद कौशल, विरासत संरक्षण, और आतिथ्य पर रहेगा, ताकि मंदिर पर्यटन को अधिक सुदृढ़ और पेशेवर बनाया जा सके।[16]
जून 2025 में गोवा टूरिज़्म ने “एकादश तीर्थ यात्रा” की शुरुआत की—यह 11 प्रमुख मंदिरों का एक तीर्थ सर्किट है, जो राज्य की समृद्ध धार्मिक और सभ्यतागत विरासत को दर्शाता है। इस यात्रा के अन्तर्गत पर्यटकों को प्रतिदिन लगभग चार मंदिरों के दर्शन कराने की योजना है, जिससे पूरा सर्किट दो से तीन दिनों में पूरा किया जा सके। इस सर्किट में कई ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण मंदिर शामिल हैं, जैसे उत्तर गोवा के मारदोल में स्थित श्री महालसा नारायणी मंदिर, मंगेशी का श्री मंगेश मंदिर, दक्षिण गोवा के फातोरपा में स्थित श्री शांतादुर्गा मंदिर और तांबडी सुरला का महादेव मंदिर।[17] [18]
गोमंतक टाइम्स डिजिटल से बातचीत में गोवा पर्यटन विभाग के निदेशक केदार नाइक ने ज़ोर देकर कहा कि मंदिर पर्यटन की यह पहल मंदिरों के धार्मिक स्वरूप में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी और न ही उनकी पूजा-पद्धतियों व परंपराओं की पवित्रता को कमज़ोर करेगी। उनके अनुसार प्रशिक्षित गाइडों, सूचना बोर्डों और चुनी हुई सामग्री के ज़रिये पर्यटकों को स्थानीय रीति-रिवाज़ों, उचित व्यवहार, और पहनावे की जानकारी दी जाएगी।
नाइक ने यह भी बताया कि इस पहल का उद्देश्य आध्यात्मिक पर्यटन मेलों में भागीदारी, स्पिरिचुअल ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स पर मौजूदगी बढ़ाने, और ट्रैवल इन्फ्लुएंसर्स के साथ कंटेंट साझेदारी के ज़रिये देशी और विदेशी—दोनों तरह के पर्यटकों को आकर्षित करना है। इसी क्रम में हाल ही में उज्बेकिस्तान से आए इन्फ्लुएंसर्स के एक समूह ने पोंडा के मंगेशी स्थित श्री मंगेश मंदिर का दौरा किया।
एकादश तीर्थ यात्रा के अन्तर्गत गोवा की लोक कलाओं और स्थानीय संस्कृति को सामने लाने वाली कई गतिविधियों को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। इनमें विरासत से जुड़े कथावाचन सत्र, और स्थानीय कारीगरों के लिए विशेष स्थान शामिल हैं, जहाँ वे पारंपरिक शिल्प का प्रदर्शन और प्रचार कर सकेंगे। इन सभी पहलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सांस्कृतिक जुड़ाव सिर्फ़ मंदिर दर्शन तक सीमित न रहे।[19]
गोवा को मंदिर पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित करना इस बात का संकेत है कि राज्य अब अपनी कहानी खुद गढ़ना चाहता है। दशकों तक राज्य की पहचान मुख्य रूप से चर्चों से जुड़ी रही है—ऐसे चर्च, जो मिशनरी इतिहास के कुछ सबसे क्रूर चेहरों को महिमामंडित करते हैं, जिनमें सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर जैसे व्यक्ति शामिल हैं, जिन्होंने यातना और हिंसा के ज़रिये जबरन धर्मांतरण कराने और गोवा इंक्विज़िशन की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई।[20] इसके बावजूद इन चर्चों को आज भी गोवा की “ऐतिहासिक विरासत” के रूप में महिमामंडित किया जाता है, और पुर्तगाली मिशनरियों के अन्याय व अत्याचारपूर्ण काल को चाँदी के वर्क में लपेट कर पेश किया जाता है, जबकि स्थानीय हिंदू आबादी पर हुई व्यापक हिंसा को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, या हल्के में लिया जाता है।[21]
इस पृष्ठभूमि में धार्मिक और मंदिर पर्यटन को बढ़ावा देने की यह पहल सोच के एक नए रुख का संकेत देती है। यह बदलाव भले ही पुर्तगाली विरासत को सीधे चुनौती न दे, लेकिन यह कहीं अधिक गहराई से गोवा की पहचान को बदलने का काम करता है। मंदिरों, तीर्थ यात्राओं और जीवित परंपराओं को केंद्र में रखकर राज्य धीरे-धीरे अपनी पहचान को उस सभ्यतागत इतिहास से दोबारा जोड़ रहा है, जो औपनिवेशिक हस्तक्षेप से बहुत पहले का है, और जो विध्वंस की असंख्य कोशिशों के बावजूद जीवित रहा।
मई 2025 में गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने गोवा की सभ्यतागत पृष्ठभूमि को केंद्र में रखते हुए एक महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया। उन्होने कहा कि गोवा कोई “भोग भूमि” नहीं, बल्कि “योग भूमि” है। सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव में 14,000 से अधिक लोगों की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि गोवा केवल रेत, धूप और बीचेस की भूमि नहीं है, बल्कि यहां देश के सबसे सुंदर और स्वच्छ मंदिर भी हैं। उन्होंने मंदिरों के संरक्षण और संचालन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर भी ज़ोर दिया और बताया कि गोवा में मंदिरों का प्रबंधन स्थानीय समितियों और गांवों द्वारा किया जाता है, तथा पारंपरिक रूप से हर गांव अपने स्थानीय देवी-देवताओं की उपासना करता है।[22]
गोवा की हिंदू विरासत का विनाश — एक सुविधाजनक ढंग से छिपाया गया सच
भारत में चल रहे व्यापक सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के बावजूद, गोवा की हिंदू विरासत को मिटाए जाने का मुद्दा अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है। जब प्राचीन धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार की बात होती है, तो सार्वजनिक कल्पना में गोवा शायद ही जगह बना पाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि दशकों तक गोवा की संस्कृति को लगभग पूरी तरह पुर्तगाली औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया, जिससे मुख्यधारा के मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में उसके दबे हुए हिंदू अतीत के लिए बहुत कम जगह बची।
जबकि वास्तविकता तो यह है कि गोवा की हिंदू विरासत की जड़ें उस पुरातन काल में निहित हैं, जो आम धारणा से परे है। गोवा की हिंदू सभ्यता का इतिहास प्रागैतिहासिक काल तक जाता है। पुरातात्विक खोजों के माध्यम से पश्चिमी घाट में निम्न पुरापाषाण काल (Lower Paleolithic) के दौरान अश्यूलियन संस्कृति की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं, जो इस क्षेत्र में मानव बसावट की प्राचीनता को दर्शाते हैं। गोवा के कई हिस्सों में पुरापाषाण काल के अवशेष पाए गए हैं—जैसे लेटराइट प्लेटफॉर्म्स और ग्रेनाइट शिलाओं पर बनी शैल-चित्रकारी, कुल्हाड़ियाँ, चॉपर जैसे पत्थर के औज़ार और पेट्रोग्लिफ़—जो लगभग 10,000 वर्ष पुराने माने जाते हैं।[23]
इतिहास और पुरातत्व दोनों के प्रमाण बताते हैं कि गोवा कई प्रमुख हिंदू शासकों का केंद्र भी रहा है। लिखित इतिहास तीसरी सदी ईसा पूर्व तक जाता है, जब गोवा चंद्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य का हिस्सा था। इसके बाद यह क्षेत्र सातवाहन वंश, फिर भोज, चालुक्य, शिलाहार और कदंब शासकों के शासन में रहा। कदंब काल में गोवा व्यापार और वाणिज्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना, और इस दौर में हिंदू धर्म के साथ-साथ जैन धर्म भी खूब फला-फूला।[24]
लगभग 1000 से 1400 ईस्वी तक चला कदंब शासन गोवा की स्थानीय हिंदू संस्कृति के पुनरुत्थान का काल था। इस समय पूरे गोवा क्षेत्र में बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ। पुराणों में स्कंदपुराण गोवा के हिंदू अतीत का सबसे विस्तृत विवरण देता है, जिसमें विशेष रूप से उत्तर-पूर्व भारत से सारस्वत ब्राह्मणों के गोवा आगमन का उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ में उन देवी-देवताओं का भी उल्लेख है जिनकी पूजा गौड़ सारस्वत ब्राह्मण करते थे—जैसे शांतादुर्गा, महालक्ष्मी, मंगेश, सप्तकोटीश्वर और नागेश। ये सभी देवी-देवता आज भी गोवा के मंदिरों में पूजे जाते हैं।[25]
पुर्तगाली शासन के दौरान गोवा की हिंदू विरासत का योजनाबद्ध तरीके से विध्वंस किया गया। बड़े पैमाने पर हिंदू मंदिरों, मूर्तियों और देवस्थलों को नष्ट किया गया। और उनकी जगह जानबूझकर ईसाई स्मारक और प्रतीक खड़े किए गए।[26] विस्तृत अभिलेखों की कमी और मूल स्रोतों के नष्ट हो जाने के कारण यह तय करना मुश्किल है कि कितने मंदिर तोड़े गए, या चर्चों में बदल दिए गए। फिर भी अलग-अलग स्रोतों से टुकड़ों में मिली जानकारी को जोड़ने पर गोवा में पुर्तगाली शासन के दौर में हुए भयावह हिंदू विध्वंस का एक स्पष्ट चित्र उभरता है:
“ओल्ड गोवा में स्थित सेंट काजेतन चर्च (जिसका निर्माण 1661 में पूरा हुआ और जो आज यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट है) में मौजूद एक गहरा कुआँ वहाँ पहले हिंदू मंदिर होने की ओर इशारा करता है। माना जाता है कि आर्चबिशप अलेक्सियो दि मेनेज़ेस ने होली ट्रिनिटी चर्च का निर्माण एक शिव मंदिर के अवशेषों पर करवाया था। उसके आसपास एक पुष्कर भी मौजूद है, जो उस लुप्त मंदिर की जल-आवश्यकताओं को पूरा करता था। 1107 ईस्वी के त्रिभुवनमल्ल के ताम्रपत्र लेख के अनुसार, वर्तमान ओल्ड गोवा के बाहरी इलाके में ब्राह्मणों की एक ब्रह्मपुरी बस्ती थी, जहाँ शिव की पूजा गोवेश्वर के रूप में की जाती थी, और ब्राह्मण परिवार देवी सरस्वती के मंदिर के पास रहते थे”।
(स्रोत: सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज़, इंडस यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित लेख)[27]
पुर्तगाली आक्रमण के दौरान नष्ट किए गए मंदिरों का पुनरुद्धार
मार्च 2022 में गोवा सरकार ने अपने बजट में ₹200 करोड़ का प्रावधान उन मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार और पुनर्निर्माण के लिए किया, जिन्हें पुर्तगाली आक्रमण के दौरान नष्ट कर दिया गया था।[28] गोवा में पुर्तगाली शासन की हिंसा व क्रूरता को छिपाने हेतु दशकों से की जा रही लीपापोती की प्रवृत्ति के संदर्भ में इस पहल का गहरा प्रतीकात्मक महत्व है। यह कदम स्पष्ट तौर पर विमर्श में बदलाव का संकेत देता है—जहाँ राज्य सरकार तथाकथित पुर्तगाली विरासत से जुड़े ऐतिहासिक आघात को औपचारिक तौर पर स्वीकार कर रही है, और लंबे समय से चली आ रही औपनिवेशिक विकृति को सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठा रही है।
2023 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया, जिसका काम पुर्तगाली शासन के दौरान नष्ट किए गए मंदिरों के पुनर्निर्माण या पुनर्स्थापना से जुड़ी माँगों की जाँच करना था। समिति की रिपोर्ट, जो ऑनलाइन उपलब्ध है, में विचार के लिए प्रस्तुत किए गए 20 से अधिक धार्मिक स्थलों का मूल्यांकन किया गया है। यह आकलन उन स्थानों पर मौजूद संरचनात्मक अवशेषों, कलाकृतियों और स्थापत्य संकेतों के आधार पर किया गया, जो वहाँ कभी मंदिर होने की संभावना की ओर इशारा करते हैं। विस्तृत जाँच के बाद समिति ने हर स्थल के लिए अलग-अलग सिफ़ारिशें दीं—या तो उन्हें गोवा सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्थल घोषित करने की, या फिर उनकी पुरातात्विक संभावनाओं की आगे और जाँच करने की।[29]
रिपोर्ट में कहा गया है कि पुर्तगाली आक्रमण और गोवा इंक्विज़िशन के दौरान 1,000 से अधिक हिंदू मंदिर नष्ट किए गए। इसके साथ ही रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें भी रखी गई हैं:
- उन देवी-देवताओं की पुनः स्थापना के लिएस्मारक-देवालय(मंदिर स्मारक) का निर्माण, जिनके मूल स्थल औपनिवेशिक काल में छीन लिए गए थे।
- गोवा की प्राचीन मंदिर विरासत को सामने लाने के लिए एक मंदिर संग्रहालय की स्थापना।
- पुर्तगाली शासन के दौरान मंदिरों के विनाश पर गहन शोध को आसान बनाने के लिए चुनिंदा पुर्तगाली अभिलेखों का अंग्रेज़ी में अनुवाद।
- प्रमुख और लघु शोध परियोजनाओं को सहयोग देने के लिए योजनाएँ तैयार करना, ताकि विद्वान और शोधकर्ता गोवा की मंदिर विरासत का अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण कर सकें।[30]
समापन
गोवा की हिंदू विरासत के मौजूदा पुनर्जागरण के विरोध में एक चिर-परिचित विमर्श सामने आ रहा है।[31] [32] [33] वही पुराना तंत्र फिर सक्रिय हो गया है—गोवा की संस्कृति पर कथित दक्षिणपंथी कब्ज़े के आरोप और राज्य की तथाकथित “पुर्तगाली विरासत” पर “हिंदुत्व राजनीति” के हस्तक्षेप के दावे एक बार फिर उछाले जा रहे हैं।
यदि व्यापक रूप से देखा जाये तो भारत के सभ्यतागत और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को वाम-उदारवादी तंत्र ने लगातार इसी तरह के विमर्शीय फ्रेम में बांधकर प्रस्तुत किया है। लेकिन गोवा इस मामले में एक कहीं ज़्यादा जटिल चुनौती पेश करता है। एक ओर जहाँ उसकी धार्मिक विरासत को पुनः जागृत करने के प्रयास चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर “पुर्तगाली विरासत” का औपनिवेशिक नैरेटिव आज भी मुख्यधारा की सोच पर हावी है। गोवा इंक्विज़िशन—जो हिंदू उत्पीड़न के सबसे भयावह अध्यायों में से एक है—पर गंभीर सार्वजनिक चर्चा का लगभग नदारद होने का अर्थ है कि गोवा अब भी अपने अतीत से जुड़े एक बुनियादी सवाल से पूरी तरह नहीं जूझ पाया है।
सन्दर्भ सूची
[1] Francis Xavier – the homicidal maniac who pioneered pogroms against Hindus; StopHinduDvesha. https://stophindudvesha.org/francis-xavier-the-homicidal-maniac-who-pioneered-pogroms-against-hindus/
[2] 77-Foot Lord Ram Statue, Tallest In The World, Unveiled By PM Modi In Goa; https://www.ndtv.com/india-news/pm-modi-unveils-77-foot-lord-ram-statue-in-goa-tallest-in-the-world-9715687
[3] Lord Ram statue, Goa: Why Lord Ram’s tallest statue has come up in party-paradise Goa – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/goa-party-paradise-worlds-tallest-lord-ram-statue-why-history-partagali-math-unveiling-pm-modi-explained-2828059-2025-11-30
[4] At 77 feet, PM Modi unveils world’s tallest statue of Lord Ram in Goa; https://www.newindianexpress.com/nation/2025/Nov/28/at-77-feet-pm-modi-unveils-worlds-tallest-statue-of-lord-ram-in-goa
[5] PM inaugurates Ramayana Theme Park in Goa; participates in 550th | DD News; https://ddnews.gov.in/en/pm-inaugurates-ramayana-theme-park-in-goa-participates-in-550th-year-celebrations-of-math/
[6] Conversions And Citizenry: Goa under Portugal 1510-1610 by Delio de Mendonca; https://www.google.co.in/books/edition/Conversions_and_Citizenry/Mh3kKf0VSfQC?hl=en&gbpv=1
[7] Goa Inquisition – The Epitome of Christian Missionary Violence; https://www.goainquisition.info/2020/05/the-portuguese-and-goan-inquisition.html
[8] Legacy of Lord Parshuram in Goa and Goa’s Hindu Heritage; https://advocatetanmoy.com/legacy-of-lord-parshuram-in-goa-and-goas-hindu-heritage/#google_vignette
[9] Culture & Heritage | North Goa District, Government of Goa | India; https://northgoa.gov.in/culture-heritage/
[10] Legacy of Lord Parshuram in Goa and Goa’s Hindu Heritage; https://advocatetanmoy.com/legacy-of-lord-parshuram-in-goa-and-goas-hindu-heritage/#google_vignette
[11] CM unveiled the Gomantbhumi Janak Parashuram statue – Goa News Hub; https://goanewshub.com/cm-unveiled-the-gomantbhumi-janak-parashuram-statue/
[12] Legacy of Lord Parshuram in Goa and Goa’s Hindu Heritage; https://advocatetanmoy.com/legacy-of-lord-parshuram-in-goa-and-goas-hindu-heritage/#google_vignette
[13] Shimgotsav: Goa’s grand cultural extravaganza beyond beaches and parties; https://organiser.org/2025/03/24/284119/bharat/shigmotsav-goas-grand-cultural-extravaganza-beyond-beaches-and-parties/
[14] Ibid.
[15] Goa Government Set To Revive Temple Heritage Of Goa; https://www.outlooktraveller.com/News/goa-government-set-to-revive-temple-heritage-of-goa
[16] Ibid.
[17] Goa launches ‘Ekadasha Teertha Yatra’ To Promote Temple Tourism; https://news.abplive.com/cities/goa-launches-ekadasha-teertha-yatra-to-promote-temple-tourism-1780606
[18] Beyond beaches: Goa to promote temple visits under spiritual tourism drive | India News – Business Standard; https://www.business-standard.com/india-news/beyond-beaches-goa-to-promote-temple-visits-under-spiritual-tourism-drive-125061700277_1.html
[19] Goa’s temple tourism to honour tradition: Kedar Naik | Gomantak Times; https://www.gomantaktimes.com/my-goa/art-culture/goas-temple-tourism-to-honour-tradition-kedar-naik
[20] Goa Inquisition – The Epitome of Christian Missionary Violence; https://www.goainquisition.info/2020/05/the-portuguese-and-goan-inquisition.html
[21] Goan Churches | Information on all Churches in Goa; https://goanchurches.info/saint/st-francis-xavier/
[22] Not just for sun & sea, people now come to Goa for temples, culture: CM | Goa News – The Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/goa/not-just-for-sun-sea-people-now-come-to-goa-for-temples-culture-cm/articleshow/121241438.cms
[23] Goa’s glorious Hindu history and brutal Inquisition: A long forgotten and rarely discussed saga – Firstpost; https://www.firstpost.com/opinion-news-expert-views-news-analysis-firstpost-viewpoint/goas-glorious-hindu-history-and-brutal-inquisition-a-long-forgotten-and-rarely-discussed-saga-11276681.html
[24] Ibid.
[25] Ibid.
[26] Destruction of Hindu temples in Goa by Christian fanatics | #ReclaimTemples; https://reclaimtemples.com/destruction-of-hindu-temples-in-goa-by-christian-fanatics/
[27] Centre for Indic Studies; https://cisindus.org/indic-varta-internal.php?vartaid=415
[28] ‘Rs 20cr to rebuild temples destroyed by Portuguese’ | Goa News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/city/goa/rs-20cr-to-rebuild-temples-destroyed-by-portuguese/articleshow/90552253.cms
[29] Report of the Committee of Experts 2023; https://static.goavidhansabha.gov.in/goalpub/docs/question_docs/file_cb551d26-5029-414b-9c9a-13620d01167c.pdf
[30] Ibid.
[31] Goa Govt Plans Memorial for Portuguese-Era Destroyed Temples, Critics See Vote-Bank Politics – UCA News; https://www.ucanews.com/news/indias-goa-state-plans-memorial-for-portuguese-destroyed-temples/110285
[32] The undoing of India’s former Portuguese colony nears completion – UCA News; https://www.ucanews.com/news/the-undoing-of-indias-former-portuguese-colony/110537
[33] Goa: BJP buries Parrikar model, whips up hardline Hindutva; https://www.deccanherald.com/opinion/goa-bjp-buries-parrikar-model-whips-up-hardline-hindutva-1106641.html
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