जॉर्ज सोरोस और उदारवाद का मुखौटा: लोकतंत्र की आड़ में वैश्विक नियंत्रण का खेल

अरबपति परोपकारी की छवि के पीछे छिपा वह वैश्विक तंत्र — जिस पर सत्ता परिवर्तन, उग्र नेटवर्कों की फंडिंग और वैचारिक नियंत्रण की साजिशों के आरोप हैं; एक ऐसा जाल जो एक्टिविज्म, मनोवैज्ञानिक हेरफेर और भू-राजनीतिक नियंत्रण की सीमाएँ मिटा देता है।
  • जॉर्ज सोरोस अपने वैश्विक परोपकारी नेटवर्क के ज़रिए एक अतिवामपंथी एजेंडा आगे बढ़ाते हैं, जो राष्ट्रवाद, संप्रभुता और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करता है।
  • मुद्रा बाज़ारों में सट्टेबाज़ी, राजनीतिक हस्तक्षेप और विरोध प्रदर्शनों को फंड करने जैसे उनके कामों ने उन्हें उन ताकतों में शामिल कर दिया है, जो सत्ता परिवर्तन और वैचारिक अस्थिरता फैलाने के केंद्र में हैं।
  • सोरोस ने नरेंद्र मोदी और विक्टर ऑर्बान जैसे राष्ट्रवादी नेताओं को बार-बार निशाना बनाया है और ऐसे संगठनों को समर्थन दिया है, जिन पर अस्थिरता फैलाने और उग्र गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं।
  • उनकी Open Society Foundations का संबंध Equality Labs जैसे संगठनों से जोड़ा गया है, जो हिंदू-विरोधी विमर्श फैलाने में सक्रिय हैं। उनकी संस्थाओं के तार इस्लामिक और अतिवामपंथी विचारधारा वाले नेटवर्कों से भी जुड़े पाए गए हैं।
  • खुले समाज” की दिखावटी बातों के पीछे, सोरोस का प्रभाव एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय ताकत की तरह काम करता है, जो राजनीति, मीडिया और संस्कृति को इस तरह मोड़ती है कि राष्ट्रीय और सभ्यतागत नींव धीरे-धीरे कमजोर हो जाए।

 बीसवीं सदी में प्रोपेगंडा का मतलब था झूठ, छल और नैतिक गिरावट। लेकिन इक्कीसवीं सदी में इसका अर्थ पूरी तरह बदल गया है। अब यह एक जटिल और चालाक विचार तंत्र बन गया है, जो अपने को “प्रगतिशील”, “उदारवादी” और “मानवीय” कहता है। आज हम ऐसे समय में हैं जब दुष्प्रचार चमकदार रूप में आता है और विचार ही सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। इसी के ज़रिए तानाशाहों और कट्टर शासनों की छवि सुधारने की कोशिश की जाती है, जबकि अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा करने वाले देशों को “तानाशाह” बताकर बदनाम किया जाता है।

वैश्विक वाम-उदारवादी मीडिया और सूचना तंत्र लगातार सक्रिय है। यह “स्वतंत्रता” और “अभिव्यक्ति की आज़ादी” के नाम पर अपनी विचारधारा फैलाने और असहमत लोगों को दबाने का काम करता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अरबपति जॉर्ज सोरोस हैं, जो अपने को “खुले समाजों” का समर्थक बताते हैं। उन्होंने अपनी संस्था Open Society Foundations के ज़रिए अरबों डॉलर राजनीति, मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों पर खर्च किए हैं — वह भी “लोकतंत्र” और “मानवाधिकार” की रक्षा के नाम पर।

कई देशों में उनके नेटवर्क पर आरोप हैं कि उन्होंने विरोध प्रदर्शन भड़काए, चुनी हुई सरकारों को अस्थिर किया और राष्ट्रीय संस्थाओं को कमजोर किया। रूस, हंगरी और कज़ाखस्तान जैसे देशों में उनकी संस्थाओं पर रोक लगी हुई है या सख्त नियंत्रण हैं। फिर भी पश्चिमी मीडिया उन्हें “समाजसेवी” बताता है और उनके आलोचकों को “षड्यंत्र सिद्धांतकार” कहकर खारिज करता है।

बड़ी टेक कंपनियाँ भी इस खेल का हिस्सा हैं। वे सोरोस से जुड़े विवादों को छिपाकर उनके पक्ष में माहौल बनाती हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग ने भी सोरोस के नेटवर्क की राजनीतिक भूमिका की जाँच शुरू की थी, जिससे साफ है कि उनका असर सिर्फ दान या परोपकार तक सीमित नहीं है।

सोरोस की दिखावटी उदारता के पीछे एक विशाल वैचारिक जाल छिपा है, जहाँ “नैतिकता” और “मानवता” के नाम पर देशों को भीतर से कमजोर किया जाता है। यह लेख उसी तंत्र को सामने लाता है — जो सोच को भ्रमित करता है, लोकतंत्र को कमज़ोर करता है और “खुलेपन” के नाम पर दुनिया को एक खास विचारधारा की दिशा में मोड़ने की कोशिश करता है।

होलोकॉस्ट और सोरोस का पहला अध्याय

जॉर्ज सोरोस का जन्म हंगरी में एक संपन्न यहूदी परिवार में हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उनका परिवार अपनी यहूदी पहचान छिपाने के लिए मजबूर हुआ और बताया जाता है कि उन्होंने झूठे दस्तावेज़ बनवाकर खुद को ईसाई के रूप में पेश किया। 14 साल की उम्र में सोरोस को एक हंगरी के सरकारी अधिकारी के पास भेज दिया गया, जो उनके ईसाई गॉडफ़ादर बनकर रहे।[1]

यही वह समय था, जब उनके जीवन के पहले विवादास्पद अध्याय की शुरुआत हुई। जैसे-जैसे हज़ारों हंगेरियन यहूदियों को कंसन्ट्रेशन कैंपस यानी यातना शिविरों में भेजा जा रहा था, सोरोस अपने उस गॉडफादर के साथ उन आधिकारिक दौरों पर जाते थे, जिनमे यहूदियों की संपत्ति ज़ब्त की जा रही थी। इसी वजह से उन पर संपत्तियों की जब्ती में सहयोग करने के आरोप लगे, हालाँकि सोरोस ने इन आरोपों को हमेशा नकारा है। उनका कहना है कि इस पूरे प्रकरण में उनकी भूमिका महज़ एक दर्शक की थी, और वे उस समय उम्र के ऐसे पड़ाव पर थे कि मामले की गंभीरता को समझना उनके लिए संभव नहीं था।

1990 के दशक में दिए एक CBS इंटरव्यू में, जब उनसे इस दौर के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने साफ़ कहा कि उन्हें अपने उस समय की भूमिका को लेकर कोई अपराधबोध महसूस नहीं होता[2] यह बयान आज भी उनके आलोचकों के बीच विवाद का विषय है, क्योंकि इससे इतिहास के सबसे अंधकारमय दौरों के प्रति उनके रवैये और संवेदनशीलता पर सवाल उठते हैं।

जब सोरोस ने इंग्लैंड को हिला दिया

जॉर्ज सोरोस को मुद्राओं से खेलकर अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर करने में माहिर माना जाता है। अस्थिर मुद्राओं पर सट्टा लगाकर अरबों डॉलर कमाने का उनका लंबा इतिहास रहा है, और इसी दौरान वे कई देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर करने और शासन बदलने की कोशिशों से भी जुड़े रहे हैं।

सोरोस को दुनिया भर में The Man Who Broke the Bank of England यानी वह व्यक्ति जिसने इंग्लैंड के आर्थिक तंत्र को हिला कर रख दिया के नाम से जाना जाता है। 1992 में उन्होंने ब्रिटिश पाउंड के खिलाफ एक बड़ा दांव लगाया, और एक झटके से करीब दो अरब अमेरिकी डॉलर कमा लिए। इस सट्टेबाज़ी के दबाव में ब्रिटिश सरकार को पाउंड का अवमूल्यन करना पड़ा और यूरोपीय एक्सचेंज रेट मैकेनिज़्म (ERM) से बाहर निकलना पड़ा।[3]

सोरोस को 1990 के दशक के अंत में आये एशियाई वित्तीय संकट का सूत्रधार भी माना जाता है — वह संकट जिसने थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, और दक्षिण कोरिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं को हिला कर रख दिया था। संकट से पहले सोरोस ने मलेशिया और थाईलैंड की मुद्राओं के ख़िलाफ़ दांव लगाए थे। उस समय मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने सोरोस को इस आर्थिक तबाही के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया और कहा कि उन्होंने दशकों की आर्थिक प्रगति को नष्ट कर दिया।[4] महातिर एक राष्ट्रवादी नेता थे, जिनकी विचारधारा और नीतियों के सोरोस कड़े आलोचक थे। महातिर के आरोपों के जवाब में सोरोस ने कहा था कि महातिर अपने देश के लिए “एक खतरा” हैं, और बाद में उन्होंने महातिर को सत्ता से हटाने की भी मांग की थी।[5]

जॉर्ज सोरोस को पारंपरिक अर्थ में “वामपंथी” कहना उचित नहीं है। शुरुआती दौर में उनकी समाजसेवी गतिविधियाँ ने पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के पतन में अहम भूमिका निभाई – एक विचारधारा जो सोरोस के अनुसार उन्हें नाज़ी शासन और स्तालिनवादी दमन की याद दिलाती थी।[6] लेकिन अगर पिछले दो दशकों में उनकी राजनीतिक दिशा को देखें, तो वे चरम वामपंथी सोच का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं। वे अक्सर ऐसे विचारों के समर्थक के रूप में नज़र आते हैं, जो वाम-उदारवादी, वोक और कट्टर इस्लामिस्ट प्रभावों के मिले-जुले वैचारिक घेरे में आते हैं।

राष्ट्रवाद को सिरे से ख़ारिज करना सोरोस की राजनीतिक विचारधारा के केंद्र में है। उनकी “ओपन सोसायटी” की अवधारणा, जो “अधिकार, समानता और न्याय के लिए काम करने वाले स्वतंत्र समूहों” की भाषा में गढ़ी गई है,[7] वस्तुतः स्वतंत्रता की हितैषी कम और संप्रभु देशों के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को वैध ठहराने का एक माध्यम ज़्यादा प्रतीत होती है। यह विचार वैश्विक उदारवादी एलीट वर्ग के वर्चस्व को महिमामंडित करता है — वे लोग जो अपार शक्ति रखते हैं, लेकिन किसी भी प्रकार की जवाबदेही से लगभग मुक्त हैं। परिणामस्वरूप, उनकी नीतियाँ अर्थव्यवस्थाओं, समाजों और संस्कृतियों को अस्थिर करती हैं,  और कभी-कभी तो विभिन्न देशों में तख्तापलट को भी अंजाम देती हैं। अगर सीधे शब्दों में कहें तो सोरोस की यह विचारधारा राष्ट्रवाद के एकदम विरोध में खड़ी दिखाई देती है।

जॉर्ज सोरोस के कई व्याख्यान — जिनमें से अधिकतर एक दशक पहले रिकॉर्ड किए गए हैं — आज भी ऑनलाइन उपलब्ध हैं, और उनकी राजनीतिक सोच के बारे में बहुत कुछ बयान करते हैं। इन वक्तव्यों में सोरोस बार-बार कहते हैं कि “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” जैसी अवधारणाएँ मूलतः राष्ट्रवाद की विचारधारा के साथ मेल नहीं खातीं। इस तर्क के ज़रिए वे एक नैतिक आधार तैयार करते हैं — ताकि संप्रभु देशों के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को जायज़ ठहराया जा सके। यही रूपरेखा आज भी उनकी गतिविधियों में दिखाई देती है, जहाँ उनकी तथाकथित समाजसेवा और दान योजनाओं के ज़रिए नित नये विमर्श गढ़े जाते हैं, विरोध संगठित किए जाते हैं, और एक सुनियोजित एजेंडे के तहत राष्ट्रवादी सरकारों या नेताओं की साख गिराई जाती है।[8] [9]

“ओपन सोसायटी” पर दिए गए एक व्याख्यान में सोरोस ने 2004 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों का ज़िक्र करते हुए जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की पुनर्निर्वाचन जीत पर सवाल उठाया था। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अमेरिकी मतदाताओं का निर्णय गलत था।[10] अपनी निजी विचारधारा को एक सार्वभौमिक सत्य की तरह प्रस्तुत करना और उस के आधार पर किसी भी देश के मतदाताओं की प्रजातांत्रिक पसंद को ख़ारिज करना यूँ तो किसी भी वक्ता को शोभा नहीं देता। लेकिन इस तरह की टिप्पणी तब और भी ज़्यादा विवादास्पद बन जाती हैं जब वक्ता एक अकादमिक विमर्श का हिस्सा हो। इस तरह का वक्तव्य सोरोस के दृष्टिकोण की एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करता है — सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को नैतिक श्रेष्ठता की ढाल बनाकर इस्तेमाल करना, और उस बहाने राष्ट्रवादी सरकारों को कमजोर करने की कोशिश करना।

जॉर्ज सोरोस हमेशा से राष्ट्रवादी नेताओं के विरोध में मुखर रहे हैं — इनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन प्रमुख हैं। उन्होंने इन दोनों नेताओं को लेकर कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जिनमे लगभग खुले तौर पर इन्हें सत्ता से हटाने की चेतावनी दी गयी है। वर्ष 2020 में, सोरोस ने “राष्ट्रवाद के विस्तार से लड़ने” के नाम पर एक अरब डॉलर का फंड घोषित किया था, जिससे उनके वैश्विक एजेंडे की वैचारिक कट्टरता का साफ़ पता चलता है।[11]

हंगरी के राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन लंबे समय से सोरोस की आलोचनाओं के केंद्र में रहे हैं। सोरोस ने उन पर “माफिया राज्य” बनाने का आरोप लगाया, यानी एक ऐसा तंत्र जो मात्र दिखावे के लिए लोकतांत्रिक है, लेकिन जहाँ शासक वास्तविकता में अपनी सत्ता और संपत्ति बढ़ाने के लिए खुले तौर पर मीडिया और न्यायपालिका का इस्तेमाल करते हैं।[12] सोरोस और ऑर्बन के बीच सबसे बड़ा टकराव हंगरी की इमिग्रेशन नीति को लेकर रहा है — ऑर्बन की सख्त एंटी-इमिग्रेशन नीतियाँ सोरोस की वैश्विक उदारवादी सोच से ज़रा भी मेल नहीं खातीं। वहीं दूसरी तरफ़ ऑर्बन ने पलटवार करते हुए सोरोस और उनके नेटवर्क पर आरोप लगाया कि वे “हर उस सरकार को गिराने का प्रयास करते हैं, जो इमिग्रेशन का विरोध करती है।” अगस्त 2024 में ऑर्बन ने यहाँ तक कहा कि सोरोस की गतिविधियाँ “यूरोपीय सभ्यता को कमजोर करने और यूरोप में इस्लामी प्रभाव बढ़ाने” की बड़ी साज़िश का हिस्सा हैं।[13]

भारत के संदर्भ में भी, जॉर्ज सोरोस ने मोदी सरकार पर निशाना साधते कई बार ऐसे तीखे बयान दिए हैं, जो भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने का दिखावा कर वास्तव में एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार पर निशाना साध देश के लोकतंत्र को कमजोर करने का काम करते हैं। हिंडनबर्ग रिपोर्ट में भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी पर लगे आरोपों के बाद सोरोस ने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब इस मामले से जुड़े कई सवालों का जवाब देना होगा। उन्होंने यहाँ तक कहा कि इस विवाद से उत्पन्न शेयर बाज़ार की उथल-पुथल भारत में “लोकतांत्रिक पुनर्जागरण” ला सकती है। इन बयानों को व्यापक तौर पर भारत की लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमजोर करने की कोशिश और भारत के आंतरिक मामलों में बेवजह की दख़लअंदाज़ी के रूप में देखा गया।[14]

जनवरी 2023 में अमेरिका स्थित हिंडनबर्ग रिसर्च ने एक रिपोर्ट जारी कर गौतम अडानी और उनकी कंपनियों पर शेयर हेराफेरी और लेखांकन में गड़बड़ी के आरोप लगाए। हालाँकि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने जांच के बाद अडानी को क्लीन चिट दे दी[15] भारत की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने कई बार यह आरोप लगाया है कि सोरोस ही हिंडनबर्ग के प्रमुख निवेशक हैं[16] और विपक्षी दल सोरोस की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं — ताकि भारत को अस्थिर कर देश में अराजकता फैलाई जा सके।

इसके तुरंत बाद Organised Crime and Corruption Reporting Project (OCCRP) नामक संगठन की एक और रिपोर्ट आई, जिसमें अडानी समूह पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए। रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अड़ानी ग्रुप ने मॉरीशस-स्थित फंडों के ज़रिए सार्वजनिक शेयरों में निवेश का गोलमाल किया। यह वही OCCRP है, जिसे ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन (Open Society Foundation),  यानी जॉर्ज सोरोस की संस्था वित्तीय सहायता देती है।[17]

विरोध आंदोलनों की फंडिंग और विमर्श को आकार देना

जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन (Open Society Foundations) लंबे समय से आरोपों के घेरे में रही है। संगठन पर विभिन्न देशों में विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक अस्थिरता फैलाने वाले आंदोलनों को वित्तीय मदद देने और परोक्ष तौर पर योजनाबद्ध करने का आरोप है, ताकि सत्ता परिवर्तन को अंजाम दिया जा सके।

भारत में हुए किसान आंदोलन और सीएए-विरोधी प्रदर्शनों से लेकर हाल ही में अमेरिका में हुए नो किंग्स” (No Kings) आंदोलन तक, अरबपति समाजसेवी सोरोस पर बार बार ये आरोप लगे हैं कि वे वामपंथी और वोक विचारधारा से प्रेरित आंदोलनों को फंड कर वैश्विक राजनीति की दिशा को प्रभावित करने का लगातार प्रयास कर रहे हैं।

ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में “नो किंग्स” विरोध प्रदर्शनों की जांच की घोषणा की है — यह पता लगाने के लिए कि क्या जॉर्ज सोरोस और अन्य कट्टर वामपंथी समूह इन ट्रम्प-विरोधी आंदोलनों की फंडिंग में शामिल थे।[18] फ़ॉक्स न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार,[19] वर्ष 2023 में ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स ने इंडिविज़िबल (Indivisible) नामक संगठन को 3 मिलियन डॉलर की ग्रांट दी थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि Indivisible इन विरोध प्रदर्शनों के प्रतिभागियों के लिए डेटा और कम्यूनिकेशन्स के प्रबंधन का कार्य कर रहा था।

यह सर्वविदित है कि ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स दुनिया भर में सक्रिय वाम-उदारवादी कार्यकर्ता नेटवर्क्स और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को आर्थिक सहायता देती है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर सोरोस के गहरे प्रभाव के चलते अक्सर उनके और इस प्रकार के वामपंथी-वोक आंदोलनों के बीच सीधा संबंध साबित करना कठिन हो जाता है, लेकिन कई रिपोर्ट्स इस ओर संकेत करती हैं कि उनके फाउंडेशन के ज़रिए अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषित NGOs और एक्टिविस्ट समूहों का जाल दुनिया के कई हिस्सों में वाम-उदारवादी और वोक आंदोलनों को संगठित और प्रबल करने में लगा हुआ है।

हालाँकि ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है जो जॉर्ज सोरोस को भारत के किसान आंदोलन से सीधे जोड़ता हो, लेकिन कई रिपोर्टों में उनके भारतीय कांग्रेस पार्टी से संभावित संबंधों का ज़िक्र किया गया है। उदाहरण के तौर पर, सलील शेट्टी, जो सितंबर 2021 से अगस्त 2023 तक ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स में ग्लोबल प्रोग्राम्स के वाइस प्रेसिडेंट रहे, उन्होंने 31 अक्टूबर 2022 को राहुल गांधी की “भारत जोड़ो यात्रा” में कर्नाटक में हिस्सा लिया था।[20]

इसके अलावा, सोरोस से जुड़े फंड्स से सहायता पाने वाले कई संगठनों पर ऐसे कामों में शामिल होने के भी आरोप लगे हैं, जो भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ़ माने गए। अप्रैल 2025 में आई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सोरस इकॉनमिक डेवलपमेंट फंड (SEDF) ने भारत के कई एनजीओएस को दान के नाम पर गुप्त राजनीतिक फंड देने की कोशिश की,[21] जिससे यह संदेह और भी ज़्यादा गहरा गया कि जॉर्ज सोरोस की संस्थाओं के ज़रिये समाजसेवा के नाम पर राजनीतिक हस्तक्षेप किया जा रहा था।

कई रिपोर्टें यह भी दिखाती हैं कि सोरोस की समाजसेवी और परोपकारी गतिविधियाँ अप्रत्यक्ष रूप से आतंकी नेटवर्क या उनके समर्थक समूहों तक भी पहुँची हैं। पॉलिटिको की एक जाँच में बताया गया कि सोरोस उन दानदाताओं में शामिल थे जो इस्राइल–गाज़ा संघर्ष के दौरान अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हुए प्रो फ़िलिस्तीन प्रदर्शनों के पीछे काम करने वाले समूहों को समर्थन दे रहे थे।[22]

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सोरस की फाउंडेशन टू प्रमोट ओपन सोसायटी ने वर्ष 2022 में एजुकेशन फॉर जस्ट पीस इन द मिडल ईस्ट नाम के एनजीओ को 250,000 डॉलर दिए थे। ग़ौरतलब है कि यह एनजीओ BDS (Boycott, Divestment and Sanctions) नामक फिलिस्तीनी संगठन से जुड़ा है। यह समूह कई बार इज़राइल-विरोधी प्रोपेगंडा फैलाने के आरोपों के घेरे में रहा है, और 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास आतंकी हमलों के बाद इस पर हमास के समर्थन में रैलियाँ आयोजित करने का भी आरोप लगा। इन खुलासों ने यह चिंता और भी ज़्यादा गहरी कर दी है कि सोरोस का वैश्विक नेटवर्क, जिसे अक्सर न्याय और लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में पेश किया जाता है, दरअसल कई बार ऐसे संगठनों को मदद पहुँचाता है जो कट्टरपंथी हिंसा और चरमपंथ को बढ़ावा देते हैं।[23]

कैपिटल रिसर्च सेंटर की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स ने 2016 से लेकर अब तक, 80 मिलियन डॉलर से ज़्यादा की फंडिंग ऐसी संस्थाओं को दी है जिनके आतंकवाद या उग्रवादी हिंसा से संबंध रहे हैं। रिपोर्ट में कुछ अमेरिकी संगठनों के नाम भी शामिल हैं — जैसे सेंटर फॉर थर्ड वर्ल्ड ऑर्गनाइजिंगरकस सोसाइटी, और सनराइज़ मूवमेंट, जिस पर एंटीफा (Antifa) से जुड़े एक अभियान को समर्थन देने का आरोप है। इस अभियान के तहत कई आंदोलनकारियों पर 40 से ज़्यादा घरेलू आतंकवाद और 60 रैकेटियरिंग मामलों में मुकदमे चल रहे हैं।[24]

हिंदू-विरोधी नेटवर्कों का संरक्षक

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग गतिविधियों का एक ऐसा पहलू भी है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वह है उनका हिंदू-विरोधी तंत्र को दिया गया व्यापक समर्थन। ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स द्वारा समर्थित कई प्रोजेक्ट्स या तो सीधे-सीधे कट्टर इस्लामिस्ट एजेंडा को बढ़ावा देते हैं, या फिर चरम-वामपंथी–इस्लामिस्ट गठजोड़ को मज़बूत करते हैं, जिससे हिंदू-विरोधी विमर्श को पनपने का मौका मिलता है।

मानवाधिकार, खुला समाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सरीखे जिन मानवीय मूल्यों को सहेज के रखने का सोरोस हर समय राग अलापते रहते हैं, वे अक्सर उसी कट्टर वामपंथी तंत्र के विमर्श से मेल खाते हैं, जो गहराई तक हिंदू-विरोधी भावना से ग्रस्त है। इस तरह, सोरोस अप्रत्यक्ष रूप से उन तमाम हिंदू-विरोधी संगठनों और व्यक्तियों के संरक्षक बन जाते हैं जो भारत या हिंदू समुदाय के खिलाफ़ काम करते हैं।

कई प्रमाण बताते हैं कि ओपन सोसायटी फ़ाउंडेशन्स ने इक्वालिटी लैब्स (Equality Labs) नामक संगठन को ख़ासा फंडिंग दी है, एक ऐसा संगठन जो जाति व्यवस्था के मुद्दे को हथियार बनाकर हिंदू डायस्पोरा यानी प्रवासी हिंदू समुदाय को निशाना बनाता है। डिसइंफोलैब की एक रिपोर्ट के अनुसार, इक्वालिटी लैब्स 2018 से ही सोरोस की फाउंडेशन से ग्रांट्स प्राप्त कर रहा है।[25] उसी रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि इस संगठन का कट्टर इस्लामिस्ट नेटवर्क्स से जुड़े ऐसे व्यक्तियों से भी संपर्क हैं, जो भारत पर निशाना साधते हैं। रिपोर्ट आगे इस तरफ़ भी इशारा करती है कि इक्वालिटी लैब्स को आगे बढ़ाने में अमेरिका में सक्रिय और पाकिस्तान समर्थित जमात-ए-इस्लामी नेटवर्क की संभावित भूमिका रही है।[26]

इसके अलावा, जॉर्ज सोरोस ने कई बार भारत के प्रधानमंत्री पर यह आरोप लगाया है कि वे देश को एक “हिंदू राष्ट्रवादी राज्य” में बदल रहे हैं। यह बयानबाज़ी वामपंथी मीडिया के कुछ तबकों, बुद्धिजीवी संस्थानों, और अकादमिक जगत में फैले उस हिंदू-विरोधी विमर्श से मेल खाती है, जो भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। जनवरी 2020 में, वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम (दावोस) में भाषण देते हुए सोरोस ने भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर चिंता जताते हुए कहा –

“लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नरेंद्र मोदी एक हिंदू राष्ट्रवादी राज्य बना रहे हैं, कश्मीर पर दंडात्मक कदम उठा रहे हैं, और करोड़ों मुसलमानों की नागरिकता छीनने की धमकी दे रहे हैं।[27]

यह बयान न सिर्फ़ सोरोस के वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वे भारत की आंतरिक नीतियों को एकतरफ़ा और पक्षपाती दृष्टिकोण से पेश करते हैं।

वैश्विक मीडिया पर सोरोस की पकड़

जॉर्ज सोरोस, सीधे निवेश के ज़रिए या फिर नैरेटिव गढ़ने के अपने प्रभाव के माध्यम से, दुनिया के कई प्रमुख मीडिया नेटवर्क्स पर असाधारण पकड़ रखते हैं। वे मानवाधिकार, लोकतंत्र, खुला समाज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर जो भी विमर्श रचते हैं, या फिर अपने ही विवादित व्यक्तित्व को लेकर जो छवि बनाते हैं — उस पर वैश्विक एलीट मीडिया का बड़ा असर देखा जा सकता है।

कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि Soros Fund Management अब अमेरिका के रेडियो उद्योग में भी तेज़ी से सक्रिय हो रहा है। फरवरी 2024 में, यह कंपनी अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी रेडियो कंपनी Audacy की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर बन गई, जिसके अन्तर्गत 230 से अधिक रेडियो स्टेशन आते हैं।[28]

द न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनावों से ठीक पहले Audacy के इतने बड़े हिस्से की खरीद को लेकर अमेरिकी सांसदों ने जांच शुरू की थी।[29]

हालांकि जॉर्ज सोरोस किसी भी प्रमुख मीडिया हाउस के सीधे तौर पर मालिक नहीं हैं, लेकिन वे ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशंस और अपनी अन्य संस्थाओं के ज़रिये मीडिया संस्थानों को ग्रांट्स, एड्स, व अन्य प्रकार की वित्तीय सहायता मुहैया करा, उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से फंड करते हैं। इसी वजह से तथ्यात्मक तौर पर यह साबित करना मुश्किल होता है कि उन्होंने किन-किन मीडिया संगठनों को सीधे-सीधे फंड किया।

फिर भी, अमेरिका स्थित मीडिया रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट[30] दुनियाभर के एलीट वाम-उदारवादी मीडिया नेटवर्क्स पर सोरोस की मज़बूत पकड़ के बारे में विस्तार से बताती है। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि कैसे यह अरबपति परोपकारी इन मीडिया नेटवर्क्स पर अपनी पकड़ के माध्यम से वैश्विक समाचार एजेंडे को भी नियंत्रित करता है।

पश्चिमी एलीट मीडिया अक्सर सोरोस को दक्षिणपंथी राजनीति के “शिकार” के रूप में पेश करता है, और उनके खिलाफ़ लगने वाले ज़्यादातर आरोपों को षड्यंत्र सिद्धांत कहकर खारिज कर देता है। मुख्यधारा के अधिकांश पश्चिमी मीडिया में सोरोस पर छपी ख़बरें एकतरफ़ा और अत्यधिक पक्षपाती लगती हैं, जहाँ उनके आलोचकों का पक्ष लगभग हमेशा नदारद होता है।

सोरोस के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रतिरोध

अमेरिका से लेकर हंगरी और भारत तक, दुनिया की कई राष्ट्रवादी सरकारें अब जॉर्ज सोरोस के वैश्विक प्रभुत्व के खेल का डटकर मुकाबला कर रही हैं।

अमेरिका में उनके नेटवर्क और गतिविधियों की जांच शुरू की जा रही है। अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालयों के शीर्ष अभियोजकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे Open Society Foundations से जुड़ी जांच के लिए तैयार रहें। रिपोर्टों के अनुसार, अभियोजक सोरोस के ख़िलाफ़ कई संभावित आरोपों पर विचार कर रहे हैं — जिनमें आतंकवाद को आर्थिक सहायता, वायर फ्रॉड, रैकेटियरिंग (अवैध गतिविधियों का संगठित नेटवर्क चलाना) और आगजनी से जुड़ी साजिशें शामिल हैं।[31]

हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान ने यूरोप को सोरोस के प्रभाव से बचाने का प्रण लिया है।  उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वे यूरोप को सोरोस-प्रेरित एनजीओ नेटवर्क्स की साज़िशों का मैदान नहीं बनने देंगे। उनका ये बयान उस समय आया जब ट्रम्प प्रशासन ने भी USAID द्वारा वित्तपोषित कार्यक्रमों पर सख़्ती करनी शुरू कर दी, जिन्हें ऑर्बान ने “वैश्विक राजनीतिक हस्तक्षेप के उसी तंत्र” का हिस्सा बताया था।[32]

भारत के आंतरिक मामलों में लगातार दख़लअंदाज़ी के मद्देनज़र भारत सरकार ने भी सोरोस की गतिविधियों और वक्तव्यों को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सरकार ने उन पर आरोप लगाया है कि वे समाजसेवा और परोपकार की आड़ में भारत की राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने और सत्ता परिवर्तन की कोशिशें करने में लगे हैं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने भी सोरोस की आलोचना करते हुए कहा कि वैश्विक व्यवस्था का रवैया बेहद दोगुला है। उन्होंने उदाहरण दिया कि एलन मस्क को सिर्फ इसलिएविवादास्पद व्यक्ति कहा जाता है क्योंकि उनके विचार दक्षिणपंथ के करीब हैं, जबकि जॉर्ज सोरोस, जो बार-बार दूसरे देशों की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करते हैं, उन्हें लगभग कोई जवाबदेही नहीं झेलनी पड़ती – क्योंकि उनकी विचारधारा उस वाम-उदारवादी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से मेल खाती है, जो आज वैश्विक मीडिया, अकादमिक संस्थानों और नीति-निर्माण के क्षेत्रों पर हावी है।

समापन

वैश्वीकरण और खुले समाज की ऊँची-ऊँची बातें दरअसल अपने भीतर एक अंधेरे सच को छिपाये रहती हैं — एक ऐसा सच जो कट्टरता, अस्थिरता, और बढ़ते मानवाधिकार हनन की एक बेहद ददनाक कहानी बयान करता है।

विडंबना यह है कि जिन मानवाधिकारों की रक्षा का दावा ये वैश्विक ताकतें करती हैं, वही आज उन वाम-उदारवादी, वोक और उग्र इस्लामिस्ट ताक़तों के उस गठजोड़ के कारण खतरे में हैं, जिन्हें वे खुद बढ़ावा देती हैं। जैसा कि हिंदूफोबिया की बढ़ती प्रवृत्ति से साफ़ झलकता है, जो समुदाय इस वैश्विक विचारधारा की तयशुदा सीमाओं से बाहर हैं, वे आज भी घृणा, पूर्वाग्रह और भेदभाव के निशाने पर हैं।

और इस पूरे जटिल तंत्र के केंद्र में हैं — जॉर्ज सोरोस, जो खुद को “खुले समाजों का रक्षक” बताते हैं, पर विडंबना यह है कि वही इन समाजों के विघटन के निर्माता भी बन गए हैं।

सन्दर्भ सूची

[1] George Soros: The Not-So-Good Samaritan from Hell; https://stophindudvesha.org/george-soros-the-not-so-good-samaritan-from-hell/

[2] George Soros interviewed by CBS 60 Minutes in the 1990th – YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=SjWLkvEuE1c

[3] How Did George Soros Break the Bank of England? https://www.investopedia.com/ask/answers/08/george-soros-bank-of-england.asp

[4] George Soros, Mahathir and the legacy of 1997 | The Business Standard;  https://www.tbsnews.net/features/panorama/george-soros-mahathir-and-legacy-1997-449394

[5] BBC News | Asia-Pacific | Soros slams Mahathir; http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/227861.stm

[6] Opening Former Communist Societies;  https://www.philanthropyroundtable.org/almanac/opening-former-communist-societies/

[7] Who We Are – Open Society Foundations;  https://www.opensocietyfoundations.org/who-we-are

[8] (George Soros – The Bubble of American Supremacy – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=Nnf62Uhl3ac

[9] (George Soros – The Bubble of American Supremacy – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=Nnf62Uhl3ac

[10] Ibid.

[11] Billionaire George Soros Pledges  $ 1 Billion University Fund To Fight ‘Would-be Dictators’; https://www.forbes.com/sites/daviddawkins/2020/01/24/billionaire-george-soros-pledges-1-billion-university-fund-to-fight-would-be-dictators/

[12] George Soros attacks Hungarian prime minister for building a ‘mafia state’ | Hungary | The Guardian;  https://www.theguardian.com/world/2017/jun/01/george-soros-attacks-hungarian-president-building-mafia-state

[13] Hungary PM Orban unmasks George Soros’ plot of civilisational end and Islamification of Europe;  https://organiser.org/2024/08/27/253570/world/hungary-pm-orban-unmasks-george-soros-plot-of-civilisational-end-and-islamification-of-europe/

[14] George Soros On PM Modi, Adani: “Attack on India”: BJP Smriti Irani On PM Remarks;   https://www.ndtv.com/india-news/minister-smriti-irani-slams-billionaire-george-soros-over-pm-narendra-modi-remarks-attacking-indias-democratic-process-3790441

[15] SEBI clean chit: Gautam Adani writes letter to shareholders on Hindenburg; calls report a direct challenge to the audacity of Indian enterprises – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/sebi-clean-chit-gautam-adani-writes-letter-to-shareholders-on-hindenburg-calls-report-a-direct-challenge-to-the-audacity-of-indian-enterprises/articleshow/124085924.cms

[16] ‘George Soros is main investor of Hindenburg’, alleges BJP | Latest News India;  https://www.hindustantimes.com/india-news/george-soros-is-main-investor-of-hindenburg-bjp-mp-ravi-shankar-prasad-101723455319486.html#google_vignette

[17] Who is George Soros, and what is his link to Adani Group’s troubles? – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/adani-group-occrp-report-hindenburg-what-is-the-george-soros-link-2429071-2023-08-31

[18] Trump admin to investigate “No Kings” protests – Newsweek;  https://www.newsweek.com/trump-admin-investigate-no-kings-protests-soros-10903951

[19] Soros money fuels ‘No Kings’ protest joined by Schumer, millions more | Fox News;  https://www.foxnews.com/politics/soros-foundation-helping-fund-anti-trump-no-kings-protests-nationwide

[20] Vice-president of George Soros-founded Open Society Foundation was part of Bharat Jodo Yatra, anti-CAA protests and farmer protests: Read details; https://www.indianarrative.com/opinion/vice-president-of-george-soros-founded-open-society-foundation-was-part-of-bharat-jodo-yatra-anti-caa-protests-and-farmer-protests-read-details/

[21] Enforcement Directorate uncovers George Soros-backed funding routes to Indian NGOs -India Today;   https://www.indiatoday.in/india/story/enforcement-directorate-uncovers-george-soros-backed-funding-routes-indian-ngos-2702906-2025-04-02

[22] Pro-Palestinian protesters are backed by a surprising source: Biden’s biggest donors – POLITICO;   https://www.politico.com/news/2024/05/05/pro-palestinian-protests-columbia-university-funding-donors-00156135

[23] ‘Soros-backed charity sent $250K to US group with Hamas ties’ – Times of India;   https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/soros-backed-charity-sent-250k-to-us-group-with-hamas-ties/articleshow/105562462.cms

[24] Exclusive: Soros’ Open Society gave $80 million to pro-terror groups – Capital Research Center;  https://capitalresearch.org/article/exclusive-soros-open-society-gave-80-million-to-pro-terror-groups/

[25] Cost of Caste: Equality Labs – Caste Binary & BLM – DisinfoLab;  https://thedisinfolab.org/cost-of-caste-equality-labs-caste-binary-blm/#rb-The-Omidyar-Network-and-Equality-Labs

[26] Ibid.

[27] Narendra Modi: George Soros says Modi creating a Hindu nationalist state – The Economic Times;  https://economictimes.indiatimes.com/markets/stocks/news/george-soros-says-modi-creating-a-hindu-nationalist-state/articleshow/73589314.cms?from=mdr

[28] Soros funding is building an audio empire | Semafor;   https://www.semafor.com/article/04/07/2024/soros-fund-is-building-an-audio-empire

[29] Lawmakers investigate Soros ‘shortcut’ to buying radio stations before election;    https://nypost.com/2024/09/30/us-news/lawmakers-investigate-soros-shortcut-to-buying-radio-stations-before-election/

[30] George Soros: Media Mogul | Media research Center; https://www.mrc.org/george-soros-media-mogul

[31] DOJ officially directs prosecutors to prepare probes of George Soros’ foundation – ABC News;    https://abcnews.go.com/US/doj-official-directs-prosecutors-prepare-probes-george-soros/story?id=125941089

[32] Soros Network Fleeing To Europe After Trump’s USAID Crackdown? Hungary PM Says ‘Won’t Let Them…’ | World News – News 18; https://www.news18.com/world/soros-network-fleeing-to-europe-after-trumps-usaid-crackdown-hungarys-pm-says-wont-let-them-9232253.html

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
See All Contributions

Donate to HINDUDVESHA

Our Mission is to explore and expose Hindudvesha through research analysis, education and response.

SUPPORT US