दिवाली से होली तक: मीडिया द्वारा हिंदू त्योहारों का नकारात्मक और विकृत चित्रण
- पश्चिमी मीडिया तंत्र हिंदू त्योहारों को तर्कहीन रूप से जबरन प्रदूषण, पर्यावरण का विनाश, महिला सुरक्षा आदि मुद्दों से जोड़ कर प्रस्तुत करता है।
- पश्चिमी मीडिया विशेषकर हिंदुओं के त्योहार दिवाली पर सबसे ज़्यादा निशाना साधता है, पश्चिमी मीडिया तंत्र हर साल दिवाली के समय पटाखे फोड़ने की परंपरा को वायु प्रदूषण से जोड़ते हुए अति सक्रिय हो जाता है।
- मीडिया तंत्र होली को एक ऐसे त्योहार के रूप में पेश करता है जो महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों को “प्रोत्साहित” करता है।
- अधिकांश हिंदू त्योहारों को पितृसत्तात्मक और प्रतिगामी करार दिया जाता है; पश्चिमी मीडिया और बौद्धिक संस्थान तंत्र विभिन्न हिंदू त्योहारों की उत्पत्ति की कहानियों का एक विकृत संस्करण प्रस्तुत करता है और इनकी व्याख्या सरलीकृत यूरोसेंट्रिक और अब्राहमिक ढांचे का उपयोग करके करता है।
भारत की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के उस निर्देश पर रोक लगा दी, जिसमें गणेश चतुर्थी उत्सव के दौरान ‘ढोल-ताशा’ समूहों (हिंदू देवता भगवान गणेश का ड्रम सरीखे वाद्य यंत्रों के माध्यम से आह्वान करने वाले उत्सव समूह, जिन वाद्य यंत्रों को ढोल के नाम से जाना जाता है) में भाग लेने वालों की संख्या 30 तक सीमित कर दी गई थी। त्योहार के दौरान सामूहिक प्रदर्शन पर एनजीटी के प्रतिबंध को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे गणपति प्रतिमा विसर्जन अनुष्ठान से पहले उत्सव की रस्में जारी रखने की अनुमति मिल गई।
एनजीटी ने कथित तौर पर ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रतिभागियों की संख्या पर सीमा लगाते हुए एक निर्देश पारित किया था। हालांकि, एनजीटी के निर्देश के खिलाफ एक अपील दायर की गई थी, और इस प्रकार अदालत ने अपील पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। गणेश चतुर्थी हिंदू कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, और ढोल-ताशा समूह पारंपरिक उत्सवों का एक अभिन्न अंग रहे हैं। भारत का महाराष्ट्र राज्य देश में गणेश चतुर्थी उत्सव का केंद्र बिंदु है और इस प्रकार, उत्सवों को प्रतिबंधित करने वाले एनजीटी के निर्देश, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है, मुख्य रूप से पुणे शहर पर केंद्रित हैं जो गणेश चतुर्थी से जुड़े पारंपरिक उत्सवों का मुख्य स्थल है।
यह अजीबोग़रीब घटनाक्रम भारत में हिंदू त्योहारों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर कार्यान्वित किए जाने वाले लक्षित प्रोपोगैंडा की कहानी बयान करता है। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, यातायात व्यवधान, लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान, शहरों के हरे आवरण के विनाश, महिलाओं की सुरक्षा, आदि के अतिरंजित दावों के आधार पर हिंदू त्योहारों को दुर्भावनापूर्ण रूप से लक्षित करना एक आम बात है। यानि हिंदू त्योहारों को लेकर इस प्रकार के अतार्किक दावे किया अजाना आम बात है कि इन्हें मनाने से फ़लाँ फ़लाँ समस्या उत्पन्न होती है। हिंदू त्योहार दिवाली में 2 महीने से भी कम समय बचा है, बस अब कुछ ही दिनों में दिवाली पर निशाना साधती मीडिया रिपोर्ट्स की बाढ़ लग जायेगी। पश्चिमी मीडिया और वामपंथी भारतीय प्रेस दोनों दिवाली के तथाकथित अवगुणों पर वाक्पटुता से बात करेंगे – वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, उपभोक्तावाद में वृद्धि, प्लास्टिक कचरे का खतरा (लोगों द्वारा एक-दूसरे को उपहार देने के कारण), जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ (भारतीय मिठाइयों के सेवन के कारण), आदि।
तार्किक रूप से कहें तो यह सब हास्यास्पद रूप से अतिशयोक्तिपूर्ण और एजेंडा संचालित लगता है। परंतु दुर्भाग्यवश, पश्चिमी मीडिया तंत्र हिंदू त्योहारों के बारे में इसी तरह के वृत्तचित्र पेश करता है:
- दिवाली के पटाखे वायु प्रदूषण का कारण बनते हैं।
- होली के कारण पानी की बर्बादी होती है।
- होली के रंग त्वचा के लिए विषाक्त होते हैं।
- दिवाली की मिठाइयों से मधुमेह जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ हो सकती हैं।
- दिवाली पर एक-दूसरे को उपहार देने की प्रथा से कागज़ की बर्बादी होती है और प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न होता है।
- दुर्गा पूजा और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों के दौरान मूर्ति विसर्जन की प्रक्रिया पर्यावरण को प्रदूषित करती है।
- हिंदू आमतौर पर नदियों, तालाब आदि की पूजा करके इन जल निकायों को प्रदूषित करते हैं।
- हिंदू त्योहार पितृसत्तात्मक होते हैं।
- करवाचौथ जैसा त्योहार महिलाओं को भूखा रहने के लिए मजबूर करके उन्हें प्रताड़ित करता है।
- रक्षाबंधन पितृसत्तात्मक है क्योंकि इसमें भाइयों यानि पुरुषों को महिलाओं के रक्षक के रूप में देखा जाता है।
ये पश्चिमी मीडिया तंत्र द्वारा हिंदू त्योहारों के बारे में नियमित रूप से फैलाए जाने वाले कुछ सनसनीख़ेज़ और शातिर दावे हैं। यह तंत्र हिंदू संस्कृति और परंपराओं को बेहद वीभत्स और नकारात्मक रूप से चित्रित करता है और इसके अति-आलोचनात्मक विश्लेषण को प्रोत्साहित करता है। हालाँकि, जब ईद और क्रिसमस जैसे अब्राहमिक त्योहारों की बात आती है तो यह इस तरह का आलोचनात्मक रवैया नहीं अपनाता। इन त्योहारों का कवरेज बिना किसी बकवास के उत्सव के दृष्टिकोण से किया जाता है, जो सांस्कृतिक संवेदनशीलता की अत्यधिक भावना को प्रदर्शित करता है। हालाँकि, जब हिंदू धर्म की बात आती है, तो सभी परंपराओं को अमानवीय करार दे दिया दिया जाता है और यूरोसेंट्रिक मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से जांचा और परखा जाता है। हिंदू त्योहारों के साथ प्रयोगशाला के जानवरों की भाँति व्यवहार किया जाता है, उन्हें किसी भी स्वायत्तता से वंचित किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू त्योहारों का पश्चिमी मीडिया कवरेज जानबूझकर ऐसे लोगों के दृष्टिकोण को अनदेखा करता है, जो इन त्योहारों से जुड़ी परंपराओं के बारे में नज़दीकी से जानते हों।
इस लेख में, हम पश्चिमी मीडिया तंत्र द्वारा हिंदू त्योहारों का विकृत रूपांतरण किए जाने के मुद्दे का विश्लेषण करेंगे, जिसमें मीडिया द्वारा उन्हें चित्रित किए जाने वाले विभिन्न पूर्वाग्रही फ़्रेम्स को उजागर किया जाएगा।
सस्टेनेबिलिटी का प्रतिमान
पश्चिमी मीडिया अक्सर हिंदू त्योहारों का विश्लेषण करने और उन्हें बदनाम करने के लिए एक घिसे पिटे कथानक का इस्तेमाल करता है जिसके अंतर्गत उन पर विभिन्न प्रकार के प्रदूषण फैलाने का आरोप लगाया जाता है।
सस्टेनेबिलिटी (सर्वांगीण विकास) संबंधी बयानबाज़ी का इस्तेमाल अक्सर हिंदू संस्कृति और परंपराओं को नकारात्मक रूप में पेश करने के लिए किया जाता है, हिंदू रीति-रिवाजों को पर्यावरण के लिए हानिकारक और सर्वांगीण विकास के खिलाफ़ बताया जाता है। हालाँकि, ऐसे लेख इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई तथ्यात्मक सबूत नहीं देते हैं कि हिंदू त्योहार “प्रदूषणकारी राक्षस” हैं। अतः इस प्रकार के लेख वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग के बजाय षड्यंत्र के सिद्धांतों से प्रभावित ज़्यादा लगते हैं।
आइए पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी मीडिया तंत्र द्वारा हिंदू त्योहारों पर की गई रिपोर्ट्स की कुछ विषाक्त सुर्खियों पर नज़र डालें:
- भारत में हिंदू त्योहार ज़हरीले झाग की नदी और जानलेवा धुंध की चादर से खराब हो गया (सीबीएस न्यूज़, नवंबर 2019)
- हिंदू त्योहार ने फूलों और मूर्तियों के मलबे से भारतीय जलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया (द गार्जियन, 2017)
- भारतीय त्योहार दिवाली से पहले ज़हरीली हवा को लेकर दिल्ली में दहशत (बीबीसी, नवंबर 2018)
- हिंदू त्योहार के दौरान आतिशबाजी के इस्तेमाल से नई दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति और खराब हो गई (द आयरिश टाइम्स, नवंबर 2021)
- भारत का हिंदू त्योहार जहरीली हवा के बादल के बीच शुरू हुआ (गैल्सबर्ग, जनवरी 2019)
- भारतीय न्यायालय ने त्योहार के लिए आतिशबाजी के बजाय स्वच्छ हवा को चुना (द न्यूयॉर्क टाइम्स, अक्टूबर 2017)
- दिल्ली की ज़हरीली नदी पर, धुंध के बीच चमकने के लिए संघर्ष कर रहे सूर्य से प्रार्थना (न्यूयॉर्क टाइम्स, नवंबर 2021)
- भारत: हिंदू संतों का कहना है कि गंगा पाप के लिए बहुत गंदी है (न्यूयॉर्क टाइम्स, 2007)
- हिंदू पुजारियों ने ‘प्रदूषण’ को रोकने के लिए प्रार्थना अनुष्ठान में सैकड़ों आम के पेड़ जलाए (द वाशिंगटन पोस्ट, मार्च 2018)
- भारत में हिंदुओं के लिए पवित्र नदी ज़हरीले सफेद झाग में लिपटी हुई है (द वाशिंगटन पोस्ट, नवंबर 2021)
- आतिशबाजी प्रतिबंध के बावजूद दिवाली पर दिल्ली में ‘गंभीर वायु प्रदूषण’ हो सकता है (द वाशिंगटन पोस्ट, नवंबर 2021)
इन सभी शीर्षकों में कुछ समान विषय देखे जा सकते हैं:
- वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता वाले कई कारकों के कारण होने वाले बढ़ते वायु प्रदूषण को अक्सर दिवाली के दौरान होने वाली आतिशबाजी से जोड़कर देखा जाता है। दिवाली पर पटाखे जलाने की परंपरा को वायु प्रदूषण के लिये अतिरंजित और तर्कहीन रूप से दोषी ठहराया जाता है। यह इस प्रकार का दावा करने के बराबर है कि कुछ दिनों के लिए आतिशबाज़ी करने वाले लोग पूरे भारत में साल भर के प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।
- भारतीय नदियों में जल प्रदूषण तर्कहीन रूप से हिंदू अनुष्ठानों और परंपराओं से जुड़ा हुआ दिखाया जाता है। इस प्रकार के भड़काऊ और अक्सर अपमानजनक शीर्षकों का तात्पर्य है कि हिंदू उन नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिनके पवित्र होने का वे “दावा” करते हैं, इस धारणा के साथ कि हिंदू प्रथाएँ भारत के जल निकायों के प्रदूषण के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।
- कई शीर्षक हिंदूफोबिया या हिन्दूद्वेष के शिकार प्रतीत होते हैं, जो स्पष्ट रूप से सुझाव देते हैं कि हिंदुओं को अपने त्योहारों और परंपराओं को मनाने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वे कथित तौर पर “गंदे” और “प्रदूषणकारी” हैं। सूक्ष्म निहितार्थ यह है कि हिंदू उत्सवों को कम से कम मनाया जाना चाहिए या पूरी तरह से प्रतिबंधित ही कर दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, “दिवाली आतिशबाजी प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली में ‘गंभीर वायु प्रदूषण’ ला सकती है” (द वाशिंगटन पोस्ट, नवंबर 2021) जैसी हेडलाइन सूक्ष्म रूप से सुझाव देती है कि शायद हमें दिवाली जैसे त्योहार को पूरी तरह से त्यागने पर विचार करना चाहिए।
हिंदू त्योहारों के बारे में पश्चिमी मीडिया की कवरेज अक्सर अनुष्ठानों की उत्पत्ति और महत्व को लेकर उनकी घोर अज्ञानता को दर्शाती है, जो इन त्योहारों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को समझे बिना, एक विशेष कथा में फिट होने के लिए उनके अर्थ को विकृत करती है। उदाहरण के लिए, वाशिंगटन पोस्ट की 2018 की रिपोर्ट जिसका शीर्षक है “हिंदू पुजारियों ने ‘प्रदूषण’ को रोकने के लिए प्रार्थना अनुष्ठान में सैकड़ों आम के पेड़ जलाए” का मुख्य उद्देश्य हिंदू प्रथाओं का उपहास करना प्रतीत होता है, जबकि लेखक को इस अनुष्ठान प्रक्रिया के बारे में शायद बहुत कम या बिल्कुल भी जानकारी नहीं है। पानी और फूलों की पंखुड़ियों से भरे बर्तनों में बैठकर हवन करते हुए हिंदू पुजारियों के दृश्य केवल कथानक को अति नाटकीय और सनसनीखेज बनाने के लिए शामिल किए गए प्रतीत होते हैं।
“इस सप्ताह भारत में 350 से अधिक हिंदू पुजारी एक बहुदिवसीय धार्मिक समारोह के लिए एकत्र हुए हैं ताकि वे प्रार्थना कर सकें कि भगवान उन्हें आधुनिक समय के संकट – वायु प्रदूषण से मुक्ति दिलाएँ। लेकिन इस समारोह में उत्तरी भारत के मेरठ शहर में आयोजन स्थल पर बनाए गए बड़े अग्निकुंडों में सैकड़ों आम के पेड़ – लगभग 110,000 पाउंड लकड़ी – जलाना शामिल है”, लेख की शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है।
लेखक ने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया है कि लेख का एकमात्र उद्देश्य इस हिंदू उत्सव अनुष्ठान को बदनाम करना और उसका मज़ाक उड़ाना है तथा इसे वनों की कटाई के लिए जिम्मेदार के रूप में प्रस्तुत करना है, अनुष्ठानों की बारीकियों को ध्यान में रखे बिना या प्रतिभागियों को अपनी बात समझाने का मौक़ा दिए बिना। इस प्रकार, प्रतिभागियों का इस्तेमाल महज़ एक साधन या हथियार के रूप में किया जा रहा है, जो पश्चिमी मीडिया कवरेज के लिए आम बात है। यह औपनिवेशिक “नृवंशविज्ञान” अभ्यास के समान है जहां “मूल निवासी” केवल विश्लेषण और व्याख्या किए जाने वाले विषय हैं, मानो उनकी अपनी कोई आत्म चेतना न हो।
केवल पश्चिमी मीडिया ही हिंदू त्योहारों को बदनाम नहीं करता है; भारतीय मीडिया और व्यापक तंत्र भी हिंदूफोबिक प्रतीकों, चिन्हों और कथानक को अपनाता हुआ दिखाई देता है, जो उन्हीं नकारात्मक रूढ़ियों को कायम रखते हैं।
भारत के प्रतिष्ठित पर्यावरण बौद्धिक संस्थान, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की डाउन टू अर्थ पत्रिका ने बढ़ते प्रदूषण के स्तर को हिंदू धर्म से जोड़ते हुए कई ऐसे लेख प्रकाशित किए हैं। ऐसे लेख भारत में पर्यावरण के मुद्दों के अन्यथा सावधानीपूर्वक और वैज्ञानिक रूप से किए जाने वाले ठोस कवरेज के सिद्धांत को गहरा नुकसान पहुँचाते हैं। डाउन टू अर्थ द्वारा प्रकाशित एक लेख का शीर्षक है, “हिंदू धर्म का प्रदूषण”। इस लेख के प्रकाशन की तिथि और वर्ष साइट पर निर्दिष्ट नहीं किया गया है, लेकिन शीर्षक अपने आप में मूल्य-युक्त और हिंदू-विरोधी है। लेख में दावा किया गया है कि हिंदू धर्म के मामले में सिद्धांत और व्यवहार के बीच बहुत बड़ा अंतर है और हिंदू धर्म के वर्तमान अनुयायियों को खुद को हिंदू कहने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वे मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। लेख में तर्क दिया गया है कि हिंदुओं ने होली और दिवाली जैसे त्योहारों को घृणित प्रदूषणकारी तमाशे में बदल दिया है।
लेखक लेख को तटस्थ और निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करने का एक सुनियोजित प्रयास करते हैं, लेकिन यह स्पष्ट रूप से ऐसा नहीं है। धार्मिक प्रथाओं को वायु प्रदूषण से जोड़ना बेतुका है। क्या डाउन टू अर्थ ने क्रिसमस या ईद जैसे त्यौहारों के बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण या अन्य समस्याग्रस्त पहलुओं की आलोचना करते हुए इसी तरह के लेख प्रकाशित किए हैं? शायद नहीं। तो, हिंदूफोबिया के लेंस के माध्यम से वायु प्रदूषण पर चर्चा करने का आख़िर क्या औचित्य है?
नवंबर 2023 में द ऑर्गनाइज़र द्वारा प्रकाशित एक लेख हिंदू त्योहारों के संबंध में वामपंथी मीडिया और बौद्धिक संस्थान तंत्र द्वारा अक्सर तैयार किए जाने वाले तथाकथित अत्याचार साहित्य का कड़ा खंडन करता है। यह हिंदू त्योहारों की तीखी आलोचना करते हुए कुछ त्योहारों के दौरान लाखों जानवरों के वध पर चुप रहने के पाखंड को उजागर करता है। लेख उन मशहूर हस्तियों और बुद्धिजीवियों के दोहरे मानदंडों को भी चुनौती देता है जो केवल दिवाली के आसपास “वायु प्रदूषण” के बारे में चिंता जताते हैं। यह सवाल करता है कि क्या इन व्यक्तियों ने कभी साल भर के प्रदूषण के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं या वाहनों, औद्योगिक या निर्माण से संबंधित प्रदूषण के मुद्दों को संबोधित किया है। यह वाकई एक विडंबना है कि पश्चिमी मीडिया दिवाली पर पटाखे जलाने के प्रथा को लेकर इतना बवाल मचाता है, लेकिन हर साल क्रिसमस और नए साल के जश्न के दौरान पटाखों के प्रदर्शन के बारे में चुप रहता है। दिवाली मुख्य रूप से भारत में बड़े पैमाने पर मनाई जाती है, जबकि क्रिसमस और नए साल के दौरान आतिशबाजी दुनिया भर में होती है। फिर भी, पश्चिमी मीडिया “दिवाली वायु प्रदूषण” के बारे में असंगत रूप से चिंतित है, जबकि अन्य अवसरों पर आतिशबाजी के पर्यावरणीय प्रभाव पर आंखें मूंद लेता है।
महिलाओं की सुरक्षा प्रतिमान
यह जानकर कई लोगों को आश्चर्य हो सकता है कि हिंदू त्योहारों का इस हद तक नकारात्मक और विकृत प्रस्तुतीकरण किया गया है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों का दोष भी अब खुलेआम हिंदुओं के सर मढ़ दिया जा रहा है, कि महिलाओं के साथ इस प्रकार की घटनाएँ इसलिए होती हैं क्योंकि हिंदुओं को अपने त्योहार मनाने की स्वतंत्रता है।
धार्मिक त्योहारों पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने का आरोप लगाना धूर्तता और छल कपट की पराकाष्ठा को दर्शाता है, और हिंदू त्योहार होली के साथ ठीक यही हो रहा है। पश्चिमी मीडिया ने एक ऐसा कथानक गढ़ा है जिसमें कहा गया है कि चूँकि होली के उत्सव में सामाजिक बंधनों को तोड़ना और एक-दूसरे को रंग लगाना शामिल है, इसलिए इसमें शामिल शारीरिक स्पर्श महिलाओं के लिए इस त्योहार को असुरक्षित बनाता है। यह देखना चिंताजनक है कि बड़ी संख्या में हेडलाइन्स में होली को महिलाओं के लिए खतरनाक बताया गया है, जिसका अर्थ है कि महिला उत्पीड़न इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा है।
हालाँकि यह सच है कि होली के उत्सव के दौरान महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ होती हैं, लेकिन इन घटनाओं का त्योहार से कोई लेना-देना नहीं है। कई देशों में कार्निवल मनाया जाता है, जो अक्सर हफ्तों तक चलता है, जहाँ इससे भी कहीं बदतर घटनाएँ हो सकती हैं। फिर भी, हम कितनी बार पश्चिमी मीडिया को कार्निवल जैसे पारंपरिक उत्सवों को स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी बताते हुए देखते हैं, क्योंकि उत्पीड़न की कुछ घटनाएं हुई हैं? दुर्भाग्य से, महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध एक वैश्विक मुद्दा है जो कहीं भी, कभी भी, स्थान या सांस्कृतिक संदर्भ की परवाह किए बिना हो सकता है। हालाँकि, पश्चिमी मीडिया हिंदू त्योहारों को महिलाओं के लिए विशेष रूप से असुरक्षित के रूप में चित्रित करने पर अड़ा हुआ है।
आइए होली की पश्चिमी मीडिया कवरेज की कुछ विषाक्त सुर्खियों की जाँच करें। हालाँकि इनमें से अधिकांश उदाहरण पश्चिमी प्रकाशनों से हैं, हमने गैर-पश्चिमी आउटलेट्स से कुछ सुर्खियाँ भी शामिल की हैं। भारतीय त्योहारों का वीभत्स और विकृत चित्रण अब केवल पश्चिमी मीडिया तक ही सीमित नहीं है – वामपंथी भारतीय मीडिया और अन्य गैर-पश्चिमी अंतर्राष्ट्रीय आउटलेट्स नियमित रूप से हिंदू संस्कृति और परंपराओं का विकृत चित्रण करने में लगे हुए हैं:
- भारतीय त्योहार होली महिलाओं के लिए खतरनाक क्यों है? (विश्व धार्मिक समाचार, मार्च 2018)
- भारत में कुछ महिलाएं मासूम मौज-मस्ती के पीछे छिपी हिंसा के डर से होली नहीं मनाती हैं (द स्ट्रेट्स टाइम्स, मार्च 2023)
- होली मनाने के दौरान अक्सर उत्पीड़न होता है। ये महिलाएं बदलाव के लिए लड़ रही हैं। (द वाशिंगटन पोस्ट, मार्च 2021)
- होली भारत में कैसे बन गया है हमले का त्यौहार (पेपरमैग, मार्च 2019)
- ‘उत्सव की आड़ में उत्पीड़न का डर’: महिलाओं का कहना है कि वे बाहर निकलने से डरती हैं (द टाइम्स ऑफ इंडिया, मार्च 2023)
- भारतीय छात्राएं ‘होली उत्पीड़न’ का सामना करती हैं (बीबीसी, मार्च 2018)
- दिल्ली के होली उत्सव में भारतीय महिलाओं का यौन उत्पीड़न (एबीसी न्यूज, मार्च 2018)
- भारत का हिंदू बलात्कार उत्सव – होली की उत्पत्ति की व्याख्या (डिफेंस पाकिस्तान, मार्च 2023)
- होली उत्सव: यौन उत्पीड़न के डर से दिल्ली की महिलाओं को लॉकडाउन में रहना पड़ा (द गार्जियन, मार्च 2017)
- क्या सार्वजनिक त्यौहार और उत्सव हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं? (फेमिनिज्म इंडिया, मार्च 2023)
- होली: रंगों का त्यौहार या अपराधों का? (यूथ की आवाज़, मार्च 2012)
ये सभी शीर्षक स्पष्ट रूप से हिंदू विरोधी हैं, जो होली और भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के बीच सीधा और निराधार संबंध दर्शाते हैं। इन शीर्षकों में निहित घोर द्वेष भारत में एक सामान्य हिंदू परिवार को पूरी तरह से झकझोरने के लिए पर्याप्त है, यहाँ तक कि पूरा लेख पढ़ने से पहले भी। एक संस्कृति और उसकी परंपराओं को इस तरह से लगातार और सोच-समझकर निशाना बनाना आकस्मिक नहीं है। यह कट्टरपंथी वामपंथी और इस्लामवादी हितधारकों के समर्थन से पश्चिमी मीडिया द्वारा संचालित है।
इनमें से अधिकांश लेख होली को हिंदू पुरुषों के साथ विषाक्त मर्दानगी की छवि को जोड़ने के बहाने के रूप में उपयोग करते हैं, जिसका अर्थ है कि हिंदू पुरुष किसी तरह से यौन हिंसा करने के लिए स्वाभाविक रूप से अधिक प्रवण हैं। फिर इस स्टीरियोटाइप को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और होली के उत्सव से जोड़ा जाता है, जैसे कि त्योहार ही इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करता है। ये लेख अक्सर होली के दौरान प्रतिकूल अनुभवों से गुज़री महिलाओं के व्यक्तिगत अनुभव को चुनकर पूरे त्योहार को बदनाम करने के लिए उनका सामान्यीकरण करते हैं। ईद, क्रिसमस या अन्य धर्मों के त्यौहारों के दौरान महिलाओं के साथ उत्पीड़न या छेड़छाड़ के बारे में आप कितनी बार इसी तरह के लेख देखते हैं? लगभग कभी नहीं।
हालांकि, जब हिंदू त्योहारों की बात आती है, तो मीडिया ऐसे लेखों से भरा होता है जो होली या अन्य भारतीय उत्सवों के दौरान होने वाली हर एक अलग-थलग घटना को लेकर अतिशयोक्ति करते हैं, उन्हें व्यापक सामाजिक मुद्दों से जोड़ते हैं। हिंदू धर्म से अपरिचित बाहरी लोग इन लेखों को पढ़कर पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं, यह मानते हुए कि हिंदू धर्म में कुछ स्वाभाविक रूप से नकारात्मक है जो इसके त्योहारों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा, वायु प्रदूषण और अन्य समस्याओं के लिए प्रवण बनाता है। बेशक, यह उस तंत्र का सटीक इरादा है जो इन आख्यानों का निर्माण करता है – हिंदू संस्कृति की विकृत और नकारात्मक धारणा बनाना।
मार्च 2020 में ऑपइंडिया द्वारा प्रकाशित एक लेख कम्युनिस्ट-इस्लामवादी तंत्र की कार्य प्रणाली का उत्कृष्ट विश्लेषण करता है जो हर साल होली के करीब आते ही वृहत स्तर पर हिंदू विरोधी प्रोपोगैंडा फैलाने लगता है। लेख होली के इर्द-गिर्द बुने गए लोकप्रिय आख्यानों में से एक को उजागर करता है कि हिंदू पुरुष मुस्लिम पुरुषों से ईर्ष्या करते हैं क्योंकि कुछ हिंदू महिलाएं मुस्लिम पुरुषों से शादी करती हैं और इसलिए ये हिंदू पुरुष मुस्लिम महिलाओं के साथ यौन हिंसा/छेड़छाड़ करना चाहते हैं। फिर, होली के संदर्भ में इसे आगे बढ़ाते हुए यह तर्क दिया जाता है कि होली “छेड़छाड़” का पर्याय है।
“इस्लामवादी और उनके वैचारिक साथी, हिंदू त्योहारों को बदनाम करने और अन्य धर्मों के त्योहारों के बारे में असहज सच्चाइयों को अनदेखा करने का संदिग्ध गौरव रखते हैं। होली के खिलाफ सबसे विचित्र हमला ‘बौद्धकारो’ नामक एक अति-वामपंथी समूह से हुआ है, जो डॉ अंबेडकर की शिक्षाओं का अनुयायी होने का दावा करता है। “त्योहार – होली विरोधी गीत” नामक गीत में दो वामपंथी कट्टरपंथी, जिनमें से एक विवादास्पद वामपंथी विश्वविद्यालय जेएनयू का पीएचडी छात्र है, भड़काऊ टिप्पणी करते हुए दावा करता है कि होली एक जातिवादी त्योहार है जिसके परिणामस्वरूप उच्च जाति के हिंदू निचली जातियों की महिलाओं को परेशान करते हैं”, ऑपइंडिया के लेख में कहा गया है।
उपरोक्त सभी ज़हरीली सुर्खियों में से, पाकिस्तान डिफेंस की एक खबर जिसका शीर्षक है “भारत का हिंदू बलात्कार उत्सव और इसकी उत्पत्ति – होली की व्याख्या”, सबसे चौंकाने वाली है, हालांकि पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं है। यह घिनौना हिंदू विरोधी प्रचार लेख कहता है कि श्री कृष्ण की “गोपियों” के साथ “रास लीला” महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न को वैध बनाती है। यह एक विकृत लेख है जो हिंदू धर्म का अपमान करता है और होली के त्योहार का मज़ाक़ उड़ाता है। मुद्दा यह है कि होली के बारे में हिंदू विरोधी पश्चिमी मीडिया कवरेज का अधिकांश हिस्सा उसी हिंदू विरोधी घृणा के कथानक पर आधारित है, भले ही वह इस अति विषैले लेख की तुलना में हल्का लग सकता है।
हिंदू त्योहारों को पितृसत्तात्मक के रूप में चित्रित करना
पश्चिमी मीडिया की एक और आम रणनीति सभी हिंदू त्योहारों को पितृसत्तात्मक और प्रतिगामी के रूप में लेबल करना है। हिंदूद्वेष के एक पुराने लेख में पश्चिमी मीडिया तंत्र द्वारा करवाचौथ और रक्षाबंधन जैसे हिंदू त्योहारों के विकृत प्रस्तुतीकरण का विस्तृत विश्लेषण किया गया था। इसमें चर्चा की गई थी कि कैसे रक्षाबंधन और करवाचौथ जैसे हिंदी त्योहार, जिनमें महिलाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, पश्चिमी मीडिया द्वारा “पितृसत्ता में प्रदर्शनकारी केस स्टडीज़” में बदल दिए गए हैं।
पश्चिमी मीडिया लगातार हिंदू त्योहारों की उत्पत्ति को विकृत करता है और उनके पीछे की कहानियों को पितृसत्तात्मक और स्त्री-द्वेषी के रूप में चित्रित करता है। यह देखते हुए कि अधिकांश आधुनिक हिंदुओं को अपनी परंपराओं की उत्पत्ति के बारे में सीमित जानकारी है, वे अक्सर व्याख्या के लिए पश्चिमी आख्यानों पर भरोसा करते हैं। यह बदले में, उन्हें अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत की पक्षपाती और विकृत समझ प्रदान करता है। परिणामस्वरूप, कई अंग्रेज़ी बोलने वाले हिंदू अब दावा करते हैं कि होली स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी है, इस दृष्टिकोण के आधार के रूप में होलिका, एक महिला को जलाने का हवाला देते हुए। होलिका दहन और प्रह्लाद की कहानी को विभिन्न हित समूहों – कट्टरपंथी नारीवादियों, अंबेडकरवादियों और अन्य लोगों द्वारा बुरी तरह से विकृत कर दिया गया है – इसे एक ऐसी कथा में बदल दिया गया है जो उनके एजेंडे के अनुकूल है।
हिंदू देवी-देवताओं को “शोषक उत्पीड़कों” के रूप में फिर से पेश किया जा रहा है, जिन्हें तथाकथित “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” के प्रवर्तक के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्होंने कथित तौर पर राक्षसों और अन्य निचली जाति के प्राणियों पर अत्याचार किया। लेकिन हिंदू त्योहारों और उनकी उत्पत्ति की ये बेतुकी पुनर्व्याख्याएँ कहाँ से आ रही हैं? यह पश्चिमी मीडिया और बौद्धिक संस्थान तंत्र ही है जो इन कथाओं का निर्माण करता है, जिन्हें फिर भारतीय समाज द्वारा आत्मसात किया जाता है और इनका वृहत स्तर पर प्रचार प्रसार किया जाता है।
इस बात पर जितना भी ज़ोर दिया जाए कम है कि हिंदू धर्म को लगातार और क्रूरता के साथ निशाना बनाया जाता है, उसका विश्लेषण किया जाता है और उसे शैतानी बताया जाता है, लेकिन जब दूसरे धर्मों की बात आती है तो ऐसी “आलोचनात्मक विद्वत्ता” नहीं दिखाई जाती। यह पाखंड इस बात से स्पष्ट होता है कि कैसे दिवाली की पारंपरिक मिठाइयों की आलोचना अस्वास्थ्यकर (बहुत ज़्यादा मीठा, तला हुआ, आदि) के रूप में की जाती है, जबकि चॉकलेट और क्रिसमस केक जैसी मिठाइयों का शानदार तरीके से गुणगान किया जाता है। यह हिंदू त्योहारों के सूक्ष्म लेकिन स्थिर “धर्मनिरपेक्षीकरण” से जुड़ा है- उदाहरण के लिए, दिवाली के विज्ञापनों में भारतीय महिलाओं को बिंदी के बिना दिखाया जाता है, जो उन्हें पारंपरिक हिंदू प्रतीकों से दूर करता है।
हिंदू त्योहारों का विकृत प्रस्तुतीकरण इस मुद्दे का सिर्फ़ एक हिस्सा है। उतना ही परेशान करने वाला पहलू हिंदू त्योहारों का जबरन “धर्मनिरपेक्षीकरण” है। ये दोनों घटनाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं। लोगों के दिमाग में बार-बार यह बात डालकर कि उनके त्योहार स्वाभाविक रूप से बुरे हैं- प्रदूषण फैलाने वाले, पितृसत्तात्मक, स्त्री-द्वेषी- पश्चिमी मीडिया तंत्र हिंदुओं में एक डर मनोविकृति पैदा करता है। वैश्विक पूंजीवादी तंत्र इस भय का लाभ उठाते हुए हिंदुओं को अपने त्योहारों की पारंपरिक हिंदू जड़ों से अलग होने के लिए प्रोत्साहित करता है, तथा उन्हें महज़ “धर्मनिरपेक्ष तमाशे” में बदल देता है।
आगे का रास्ता
हम पश्चिमी मीडिया को हिंदुओं के बारे में नकारात्मक कहानियाँ फैलाने से नहीं रोक सकते, लेकिन हम इस मुद्दे के बारे में हिंदुओं के बीच जागरूकता बढ़ा सकते हैं। कई मीडिया आउटलेट्स आम हिंदुओं का साक्षात्कार लेते हैं, जो अक्सर अपनी धार्मिक प्रथाओं और त्योहारों के बारे में जानकारी साझा करने में प्रसन्न होते हैं। हालाँकि, वे इस बात से अनजान हैं कि उनके शब्दों को संदर्भ से बाहर लिया जा सकता है या पक्षपातपूर्ण कथा में फिट करने के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा सकता है
दूसरा, हमें “भूरे सिपाहियों” – भारतीय नाम वाले पत्रकारों – को बेनकाब करना चाहिए और उनकी आलोचना करनी चाहिए जो इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण लेख लिखते हैं। हिंदू त्योहारों की आलोचना करने वाले कई लेख इन व्यक्तियों द्वारा लिखे गए हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। हिंदू संस्कृति को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के लिए उनकी सार्वजनिक तौर पर निंदा की जानी चाहिए।
आखिर में, भारत को हिंदू त्योहारों को लेकर अपने ख़ुद के आख्यान पर के प्रचार प्रसार को बढ़ावा देना चाहिये। सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और भारतीय विचारकों को हिंदू संस्कृति के सटीक और सकारात्मक चित्रण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। नकारात्मक चित्रण से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका भारत के भीतर की वास्तविक कहानियों को साझा करना है।
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