भारत: उपनिवेशवाद से वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता कदम

इतिहास भारत को एक बार फिर अवसर दे रहा है। अगर भारत अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूती से निभाता रहे और तकनीकी व आर्थिक आत्मनिर्भरता को और भी मजबूत करे, तो 21वीं सदी न केवल भारत पूरी मानवता के नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है।
  • उपनिवेशवाद और आक्रमणों ने भारत की आर्थिक रीढ़ तोड़ी, लेकिन उसकी सभ्यतागत आत्मा और मूल मूल्य कभी नष्ट नहीं हुए।
  • आज भारत अपनी युवा आबादी, तकनीकी नवाचार और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सहारे फिर से वैश्विक मंच पर उभर रहा है।
  • पश्चिमी शक्तियों के कमजोर पड़ने और आंतरिक संकटों के कारण दुनिया का शक्ति संतुलन तेज़ी से पूर्व की ओर खिसक रहा है।
  • भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना, बल्कि नैतिक मार्गदर्शक और सभ्यतागत नेतृत्व की भूमिका भी निभानी है।
  • अगर भारत सही दिशा और मूल्यों पर डटा रहा, तो 21वीं सदी न सिर्फ़ भारत की हो सकती है, बल्कि पूरी मानवता के लिए भारत-नेतृत्व की सदी बन सकती है।

आज हम उस दौर में खड़े हैं जहाँ कभी अजेय मानी जाने वाली पश्चिमी शक्तियाँ लगातार कमजोर हो रही हैं। यूरोप के बड़े देश—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली, जो कभी दुनिया की दिशा तय करते थे, अब पीछे हट रहे हैं।[1]  अमेरिका, जिसे कभी वैश्विक नेतृत्व का चेहरा माना जाता था, अब अपने आंतरिक झगड़ों, राजनीतिक विभाजन और आर्थिक संकटों में उलझा है।[2] नतीजा यह है कि लंबे समय तक जिन संस्थाओं और मूल्यों को “फ्री वर्ल्ड” की पहचान माना जाता था, वहाँ अब एक खालीपन नज़र आने लगा है।

इस पृष्ठभूमि में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, भारत, सिर्फ़ दर्शक बनकर खड़ा नहीं रह सकता। बल्कि, वह इन संस्थाओं और विरासतों को सँभालने और आगे बढ़ाने के लिए तैयार दिख रहा है। अगर भारत विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को तोड़ने की बजाय और मज़बूत करता है, अगर वह नई तकनीकों को आगे बढ़ाता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखता है, तो वह दुनिया को एक स्वतंत्र और खुला अंतरराष्ट्रीय ढाँचा दे सकता है। साथ ही, भारत अपनी वही ताक़त भी वापस पा सकता है जो उपनिवेशवाद से पहले उसके पास थी। यह मौका केवल एक अवसर नहीं, बल्कि इतिहास का आह्वान है। क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था का केंद्र अब तेज़ी से पूर्व की ओर खिसक रहा है।

भारत की खोई हुई आर्थिक प्रभुता

हज़ारों सालों तक भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन रहा। यहाँ की संपन्नता और नवाचार पूरी दुनिया को आकर्षित करते थे। 1983 में बेल्जियम के अर्थशास्त्री पॉल बेरो ने एक शोध प्रकाशित किया जिसने पश्चिमी विद्वानों को हिला दिया। अपनी किताब Economics and World History: Myths and Paradoxes में उन्होंने लिखा कि 1750 में चीन का वैश्विक GDP में हिस्सा 33% और भारत का 24.5% था। यह आँकड़े पश्चिम से कहीं आगे थे।[3]

इन तथ्यों ने आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) को मजबूर किया कि वह और गहराई से अध्ययन करे। नीदरलैंड्स की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंगस मैडिसन की अगुवाई में इस पर शोध हुआ। नतीजे ने वही सच सामने रखा जिसे भारत का हर बच्चा जानता था, लेकिन पश्चिम मानने को तैयार नहीं था, कि भारत सदियों तक दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक रहा, जब तक अंग्रेज़ों ने आकर इसे पूरी तरह बरबाद नहीं किया।

मैडिसन के आँकड़ों से पता चला कि पिछले 2000 सालों में से 1700 साल तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा।[4] पहली सहस्राब्दी यानी सन 1 से 1000 ईस्वी तक भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा 32% था। दूसरी सहस्राब्दी में इस्लामी आक्रमणों ने भारत की अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुँचाया और चीन पहले स्थान पर पहुँच गया। फिर भी, 1000 से 1700 ईस्वी तक भारत का हिस्सा 28-24% के बीच बना रहा। लेकिन 1700 के बाद यूरोपीय उपनिवेशवाद ने भारत की रीढ़ तोड़ दी और 1947 तक आते-आते भारत ग़रीबी में डूब गया।

विश्व का बदलता शक्ति संतुलन

जब से बेरो और मैडिसन ने दुनिया की आर्थिक सच्चाई उजागर की, तब से हालात लगातार बदल रहे हैं। चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत जापान को पीछे छोड़कर चौथे नंबर पर पहुँच चुका है।[5] सबसे हैरानी की बात यह है कि भारत की विकास दर 7.8% है, जबकि G7 देशों की वृद्धि 1% से भी कम है। ब्रिटेन की GDP तो सिर्फ 0.6% बढ़ी।[6]

कई लोग मानते हैं कि पश्चिम की गिरावट का कारण इराक, अफगानिस्तान या यूक्रेन जैसे युद्ध हैं। लेकिन असली वजह यह है कि पूर्व, यानी एशिया, बेहतर नीतियों और व्यवस्थाओं के कारण लगातार समृद्ध हो रहा है। मौजूदा आर्थिक संकट ने इस सोच को और मज़बूत कर दिया है कि पश्चिम अपनी वैश्विक पकड़ खो रहा है। यह केवल गिरावट नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का बड़ा बदलाव है—जहाँ दुनिया का झुकाव पूर्व की ओर होता जा रहा है।

यूक्रेन युद्ध ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया। भारत ने रूस से अधिक तेल खरीदने का फ़ैसला किया ताकि अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी कर सके।[7] चीन ने उभरते बाज़ारों के साथ इतना व्यापार बढ़ा लिया है कि अब पश्चिम की कमजोरी उसका नुकसान नहीं कर पाती। रूस साइबेरिया से चीन और जापान तक हज़ारों किलोमीटर लंबी पाइपलाइनें बना रहा है, ताकि उसका तेल और गैस सीधे एशिया-प्रशांत क्षेत्र तक पहुँच सके।[8]

जब पश्चिम मंदी से जूझ रहा है, भारत और चीन दुनिया के खनिज और संसाधन हासिल करने की होड़ में लगे हैं। भारत की कंपनियाँ अफ्रीका में खेती में निवेश कर रही हैं ताकि अपनी आबादी को पर्याप्त भोजन मिल सके, जबकि चीन बड़े पैमाने पर खनन में निवेश कर रहा है।[9]

पश्चिमी देशों के संगठन, जैसे G7, अब लगभग बेअसर हो चुके हैं। रूस पर यूक्रेन युद्ध की वजह से कड़े प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन रूसी अर्थव्यवस्था ढही नहीं। बल्कि वह पश्चिम की तुलना में तेज़ी से बढ़ रही है। कभी पश्चिमी देशों को जोड़कर रखने वाले संगठन NATO की पकड़ भी कमजोर होती जा रही है।[10]

पश्चिमी व्यवस्था का घटता प्रभाव

पश्चिम की आर्थिक ताक़त का कमजोर होना सब को साफ़ नज़र आ रहा है, लेकिन असली चोट उसकी विचारधारा पर लगी है। अमेरिका और यूरोप के भीतर बढ़ती राजनीतिक खींचतान, संस्थाओं का गिरना और अतिवादी दक्षिणपंथ का उभार, इन सबने पश्चिमी समाज को भीतर से खोखला कर दिया है। अमेरिकी विचारक पैट्रिक बुकानन का कहना है कि अमेरिका अब अपने सबसे बुनियादी काम भी सही ढंग से नहीं कर पा रहा—सीमाओं की रक्षा, बजट संतुलित करना और युद्ध जीतना।

बुकानन की किताब Suicide of a Superpower (एक महाशक्ति की आत्महत्या) पर आलोचकों ने नस्लवाद और होमोफोबिया के आरोप लगाए हैं, लेकिन इसमें कही गई कई बातें हकीकत से मेल खाती हैं। वह लिखते हैं: “अमेरिका बिखर रहा है। जो ताक़त हमें जोड़ती थी, वह कमजोर होती जा रही है। यह सिर्फ अमेरिका की नहीं, बल्कि पूरी पश्चिमी सभ्यता की हालत है। सरकार अब अपनी सबसे ज़रूरी जिम्मेदारियाँ भी पूरी नहीं कर पा रही।” [11]

यही तस्वीर आने वाले समय की उस दुनिया की झलक है जिसमें पश्चिम अब नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं होगा।

विश्व व्यवस्था में बदलता संतुलन

“World Without the West” यानी “पश्चिम रहित दुनिया” की अवधारणा अमेरिकी विद्वानों स्टीवन वेबर, नाज़नीन बर्मा और एली रैटनर ने पेश की थी। उनका कहना था कि नई वैश्विक व्यवस्था में उभरते देश पश्चिम से सीधा टकराव या अधीनता चुनने की बजाय अपने स्वतंत्र रास्ते बना रहे हैं।[12]

लंबे समय तक बहस इस पर रही कि चीन, भारत, रूस और ब्राज़ील जैसे देश पश्चिम की बनाई व्यवस्था में शामिल होंगे या उसे चुनौती देंगे। लेकिन वेबर और उनके साथी मानते हैं कि ये देश कोई एक रास्ता नहीं चुन रहे। वे आपसी रिश्तों को मज़बूत करके एक समानांतर व्यवस्था बना रहे हैं—जहाँ पश्चिम न तो उनका बॉस है और न ही सीधा दुश्मन।

यह दो तरीकों से हो रहा है। पहला, ये देश आपस में व्यापार, रक्षा और संस्कृति के रिश्ते गहरे कर रहे हैं और पश्चिम पर अपनी निर्भरता घटा रहे हैं। दूसरा, वे पश्चिम के नियमों को मानने के बजाय अपनी व्यवस्था बना रहे हैं। यानी, वे न तो पश्चिम से भिड़ते हैं और न ही उसके जैसे अधीनस्थ गठबंधनों में फँसते हैं, जैसा जापान और दक्षिण कोरिया के साथ हुआ।

सबसे अहम बात यह है कि अब विकासशील दुनिया सिर्फ पश्चिमी ताक़त को ही नहीं, बल्कि पश्चिम की सोच और उसकी कहानियों को भी दरकिनार कर रही है। यही कारण है कि पश्चिमी विचार और नैरेटिव अब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में आसानी से असर नहीं डाल पा रहे।

यूक्रेन युद्ध, जो 2014 में शुरू हुआ, रूस और चीन के लिए पश्चिम से हटकर नए रास्ते बनाने का बड़ा कारण बना। 2022 में रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका और यूरोप ने उस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में रूस ने नए उत्पाद आपूर्ति और भुगतान तंत्र विकसित किए। धीरे-धीरे ये तंत्र स्थायी और औपचारिक हो गए।

रूस ने 600 से ज़्यादा जहाज़ों का “शैडो फ्लीट” तैयार किया है, जो बिना झंडे के समुद्र में चलते हैं और रूसी तेल को दूसरे झंडाधारी जहाज़ों में स्थानांतरित करते हैं।[13] कुछ ही घंटों में लाखों टन प्रतिबंधित तेल वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाता है। भारत ने भी अपनी तेज़ी से बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस व्यवस्था में हिस्सा लिया है।

रूसी तेल का यह स्वतंत्र प्रवाह सिर्फ़ एक उदाहरण है। दुनिया अलग-अलग तरीकों से पश्चिम को दरकिनार कर रही है, और धीरे-धीरे पश्चिम अंतरराष्ट्रीय व्यापार से बाहर हो रहा है।

आर्थिक शक्ति से नैतिक नेतृत्व की ओर

सिडनी की यूनिवर्सल बिज़नेस स्कूल के अध्ययन के अनुसार, 2060 तक भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका से दोगुनी और चीन की GDP के 95% तक पहुँच जाएगी। 2080 तक भारत चीन से लगभग 48% आगे होगा और 2100 तक भारत की GDP चीन से 51% और अमेरिका से तीन गुना बड़ी हो जाएगी।[14] ये भविष्यवाणियाँ केवल कल्पना नहीं हैं, बल्कि ठोस आँकड़ों और ट्रेंड्स पर आधारित हैं। उदाहरण के लिए:

  • 2039 तक भारत की GDP $30 ट्रिलियन पहुँचकर अमेरिका से आगे निकल जाएगी।
  • 2044 तक भारत का श्रमबल 74.8 करोड़ हो जाएगा, जो चीन से भी अधिक होगा।
  • 2076 तक भारत की GDP $125 ट्रिलियन तक पहुँच जाएगी।
  • 2100 तक भारत की GDP $287 ट्रिलियन होगी—चीन से 51% और अमेरिका से तीन गुना बड़ी।

ये आँकड़े बताते हैं कि भारत अपनी पुरानी वैश्विक स्थिति फिर से हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। इसकी ताक़त युवा और कुशल जनसंख्या, डिजिटल नवाचार और “मेक इन इंडिया” जैसी नीतियाँ हैं। लेकिन केवल आर्थिक ताक़त ही काफ़ी नहीं होगी। आज की बंटी हुई दुनिया में भारत को स्थायी नेतृत्व के लिए पश्चिम की संस्थागत और नैतिक पूँजी को भी आगे बढ़ाना होगा। लोकतंत्र, कानून का शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलता जैसे मूल्य भारत की असली ताक़त हैं। इन्हें मजबूत करके ही भारत आर्थिक शक्ति के साथ-साथ नैतिक नेतृत्व भी हासिल कर पाएगा।

दोहरी ज़िम्मेदारी

भारत की स्थिति इस समय बिल्कुल अनोखी है। वह एक ओर पूर्व की बड़ी शक्ति है, जिसकी जड़ें गहरी सभ्यतागत परंपराओं और सांस्कृतिक रिश्तों में हैं। दूसरी ओर, भारत में पश्चिमी उदार मूल्यों की भी झलक दिखाई देती है—जैसे संवैधानिक लोकतंत्र, क़ानून का शासन, प्रेस की स्वतंत्रता और बहुलतावाद। भारत के उभरती ताक़तों से गहरे सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते हैं, और साथ ही उसका संस्थागत ढाँचा पश्चिमी व्यवस्था से भी मेल खाता है। यही दोहरी पहचान भारत को एक विशेष ज़िम्मेदारी और बड़ा अवसर देती है। यह अवसर है पश्चिम की बेहतरीन विरासत—संस्थाएँ, तकनीक और उदार मूल्य—को आगे बढ़ाने का, और साथ ही एक नई वैश्विक व्यवस्था का नेतृत्व करने का, जिसमें आर्थिक न्याय, सांस्कृतिक सम्मान और राजनीतिक संप्रभुता की रक्षा हो।

भारत को क्या करना होगा

भारत को वैश्विक अग्रणी बनने के लिए कठिन जिम्मेदारियाँ सँभालनी होंगी और सोच-समझकर नीतिगत फैसले लेने होंगे। सबसे पहले, भारत को बेवजह के भू-राजनीतिक संघर्षों से बचना  और एक परिपक्व बड़े भाई की तरह व्यवहार करना होगा। महत्वाकांक्षा और संयम का संतुलन बनाते हुए भारत को उन मूल्यों और संस्थाओं को आगे बढ़ाना होगा जो पूरी दुनिया की स्थिरता का आधार हैं।

  • संस्थागत निरंतरता का नेतृत्व करें: भारत को खुद को पश्चिमी संस्थाओं का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बनाना होगा। चाहे संयुक्त राष्ट्र हो, विश्व व्यापार संगठन हो या ब्रेटन वुड्स की आर्थिक व्यवस्था—भारत को इनमें बड़ा रोल निभाना चाहिए। इसका उद्देश्य इन्हें गिराना नहीं बल्कि सुधारना और संतुलित करना होना चाहिए।
  • घर में उदार मूल्यों को मज़बूत करें: भारत को अपने उत्थान के साथ-साथ तानाशाही प्रवृत्तियों से दूर रहना होगा। दुनिया भारत को तभी स्वीकार करेगी जब वह देश के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूती से निभाए—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की आज़ादी और अल्पसंख्यकों के अधिकार। यह केवल पश्चिमी सोच नहीं बल्कि सार्वभौमिक सिद्धांत हैं, जिन्हें भारत 75 सालों से निभाता आ रहा है।
  • ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करें: भारत को अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से रिश्ते और गहरे करने होंगे। चीन की तरह प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और सहभागी साझेदारी के तौर पर। आसियान और अफ्रीका के साथ भारत का व्यापार पहले ही बढ़ रहा है, इसे और मज़बूत करने के लिए ढाँचागत विकास, शिक्षा और हरित ऊर्जा में निवेश करना होगा।
  • तकनीकी आत्मनिर्भरता बनाएं: केवल सेवा प्रदाता बने रहना काफी नहीं है। भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बायोटेक, एयरोस्पेस और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में खुद निवेश करना होगा। पब्लिक-प्राइवेट साझेदारी से ऐसे इकोसिस्टम बनाने होंगे जो आसानी से वैश्विक नेटवर्क से जुड़ सकें। इसरो और डिजिटल इंडिया जैसी पहल इसकी मजबूत नींव रख चुकी हैं।
  • लोकतंत्र का मॉडल निर्यात करें: जब पश्चिम का सॉफ्ट पावर कमज़ोर हो रहा है, भारत अपनी मिसाल से दुनिया को आकर्षित कर सकता है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास हासिल करना उन देशों के लिए बड़ा उदाहरण होगा जो पश्चिमी उदारवाद और चीनी अधिनायकवाद के बीच झूल रहे हैं।

भारत केवल एक और आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत राष्ट्र है, जिसकी दार्शनिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक परंपराएँ हज़ारों साल पुरानी हैं। इसलिए भारत को न तो पश्चिम का अहंकार अपनाना चाहिए और न ही चीन जैसी गोपनीयता। उसे तीसरा रास्ता दिखाना होगा—जहाँ भौतिक समृद्धि आध्यात्मिक गहराई के साथ जुड़ी हो, तकनीक नैतिकता के साथ हो और विकास स्थिरता के साथ हो। यह केवल पुरानी बातों का मोह नहीं, बल्कि वर्तमान की मांग है। अगर दुनिया के पास कोई मार्गदर्शक केंद्र नहीं होगा, तो वह बिखराव, संघर्ष और सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाएगी। पश्चिम अब आर्थिक और नैतिक पूँजी से वंचित हो चुका है, लेकिन भारत के पास यह क्षमता मौजूद है, बशर्ते कि वह इसे अपनाने का संकल्प ले।

निष्कर्ष

1700 सालों तक भारत अर्थव्यवस्था, संस्कृति और नवाचार में दुनिया का नेता रहा। आक्रमणों और उपनिवेशवाद ने उस यात्रा को रोक दिया। लेकिन अब समय का पहिया फिर से घूम रहा है—न बदले की भावना से, बल्कि इतिहास की स्वाभाविक गति से।

जैसे-जैसे पश्चिम पीछे हट रहा है, भारत को आगे आना होगा। यह नेतृत्व वर्चस्व के लिए नहीं बल्कि मार्गदर्शन के लिए होगा। भारत को पश्चिम के अच्छे मूल्यों को अपनाना होगा, उसकी बुरी प्रवृत्तियों को छोड़ना होगा और दुनिया के लिए एक नया रास्ता दिखाना होगा—जो स्वतंत्रता, गरिमा और साझा समृद्धि पर आधारित हो।

21वीं सदी न तो पश्चिम की होगी और न चीन की। अगर भारत सही दिशा में कदम बढ़ाए, तो यह सदी पूरी मानवता की होगी—और उस मानवता का नेतृत्व भारत करेगा।

सन्दर्भ सूची

[1] BRICS Expansion, the G20, and the Future of World Order (Carnegie Endowment for International Peace, 2024); https://carnegieendowment.org/research/2024/10/brics-summit-emerging-middle-powers-g7-g20?lang=en

[2] The Americans Prepping for a Second Civil War (New Yorker, 2024);  https://www.newyorker.com/magazine/2024/11/11/among-the-civil-war-preppers

[3] Ancient Indian Economy; https://www.cdeep.iitb.ac.in/slides/S17/MNG652/MNG652-L5.pdf

[4] From 1 AD To Today: A 2000-Year Story Of India’s Economic Rise (Swarjya Magazine, 2024); https://swarajyamag.com/newsletters/from-1-ad-to-today-a-2000-year-story-of-indias-economic-rise

[5] India overtakes Japan to become world’s 4th largest economy: NITI Aayog CEO (Door Darshan News, 2025); https://ddnews.gov.in/en/india-overtakes-japan-to-become-worlds-4th-largest-economy-niti-aayog-ceo/

[6] OECD GDP growth slows abruptly to 0.1% in the first quarter of 2025 (OECD, 2025); https://www.oecd.org/en/data/insights/statistical-releases/2025/05/gdp-growth-first-quarter-2025-oecd.html

[7] ONGC group refiners will buy every available drop of Russian oil as long as economical, says chairman AK Singh (The Indian Express, 2025); https://indianexpress.com/article/business/ongc-group-refiners-will-buy-every-available-drop-russian-oil-economical-chairman-ak-singh-10219327/

[8] The global Implications of a Russian Gas Pivot to Asia (Nature Communications, 2025);  https://www.nature.com/articles/s41467-024-55697-7

[9] India-Africa partnership for agricultural development and food security (The Indian Express, 2025); https://indianexpress.com/article/upsc-current-affairs/upsc-essentials/india-africa-partnership-for-agricultural-development-and-food-security-10092618/

[10] How NATO Lost Its Way (Compact Magazine); https://www.compactmag.com/article/how-nato-lost-its-way/

[11] Suicide of a Superpower: Will America Survive to 2025? (Catholicity, 2025); https://www.catholicity.com/mccloskey/suicide.html

[12] A World Without the West (The National Interest, 2007); https://www.jstor.org/stable/42896050

[13] UPDATED: Illuminating Russia’s Shadow Fleet (Windward, 2025); https://windward.ai/knowledge-base/illuminating-russias-shadow-fleet/

[14] The world’s largest economies in 2100 – India No. 1 (The Universal Business School, Sidney); https://www.ubss.edu.au/articles/2022/september/the-world-s-largest-economies-in-2100-india-no-1/

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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