ब्रेन ड्रेन का अंत, ब्रेन गेन की शुरुआत: HIRE ऐक्ट भारत में टेक क्रांति का रास्ता खोल सकता है

अमेरिका में पेश किया गया यह नया टैक्स पहली नज़र में भारत की 254 अरब डॉलर की आईटी इंडस्ट्री के लिए चुनौती लग सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भारत के लिए फायदेमंद भी है। अब जब इंजीनियर अमेरिका जाने से पहले दोबारा सोचेंगे, तो भारत को ऐसे टैलेंटेड लोग मिलेंगे जो यहीं रहकर अगली पीढ़ी के टेक स्टार्टअप और इनोवेशन की नींव रखेंगे।
  • HIRE ऐक्ट 25% आउटसोर्सिंग टैक्स लगाने की बात करता है, जिससे भारतीय आईटी कंपनियों के साथ अमेरिकी कॉन्ट्रैक्ट काफी महंगे हो जाएंगे और इन पर टैक्स छूट भी नहीं मिलेगी।
  • भारतीय आईटी, जिसकी 60% से ज़्यादा कमाई अमेरिकी क्लाइंट्स से होती है, अब प्राइसिंग प्रेशर, पुराने कॉन्ट्रैक्ट फिर से तय होने और काम को मैक्सिको या कनाडा जैसी जगहों पर शिफ्ट किए जाने के खतरे का सामना कर रही है।
  • भारत के इंजीनियर, जिनकी सैलरी सालों से लगभग रुकी हुई है और रुपया भी गिरा है, उन पर और दबाव आ सकता है क्योंकि क्लाइंट्स अब ज़्यादा काम अमेरिका में करवाने और खर्च कम करने की मांग करेंगे।
  • यह बिल अमेरिका में बढ़ते आर्थिक राष्ट्रवाद को दिखाता है, लेकिन कई लोग मानते हैं कि बड़ी कंपनियों के दबाव और आपसी आर्थिक निर्भरता की वजह से इसे कमज़ोर या हल्का कर दिया जाएगा।
  • यह झटका भारत की आईटी इंडस्ट्री को सिर्फ सस्ती मज़दूरी पर टिके रहने की बजाय नए इनोवेशन, एआई और स्टार्टअप्स की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे “रिवर्स ब्रेन ड्रेन” यानी टैलेंट का वापस आना और तेज़ हो सकता है।

सितंबर की शुरुआत थी। हल्की बारिश हो रही थी और 32 साल के राजेश पटेल (नाम बदला हुआ) बेंगलुरु के बाहरी इलाके में बने एक बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस की काँच की ऊँची इमारत में लैपटॉप पर झुके काम कर रहे थे। उनकी ज़िंदगी किसी भी आईटी इंजीनियर के सपने जैसी लगती थी। आईआईटी बॉम्बे से पढ़ाई की थी और सिलिकॉन वैली की दौड़-भाग छोड़कर उन्होंने न्यूयॉर्क की एक नामी बैंक में क्लाउड माइग्रेशन प्रोजेक्ट्स पर स्थिर नौकरी चुन ली थी। उनके दिन-रात डिबगिंग में बीतते, कॉफी पर कॉफी चलती और मन में डॉलर के भारी बोनस की उम्मीद रहती। ज़िंदगी थकाऊ ज़रूर थी, लेकिन सुरक्षित भी।

परन्तु 5 सितंबर 2025 की शाम को, जब बाहर बिजली कड़क रही थी, पटेल के लैपटॉप पर खबर चमकी: HIRE ऐक्ट — आउटसोर्सिंग पर 25% टैक्स।[1] खबर पढ़ते ही उनके होश उड़ गए। यह तो पूरी इंडस्ट्री पर गहरा वार था। जिसने लाखों भारतीयों को नई ज़िंदगी दी, वही अब असुरक्षित थी। 254 अरब डॉलर का आईटी सेक्टर अब या तो बदलने को मजबूर होगा, या पीछे रह जाएगा।

वॉशिंगटन में हलचल

अमेरिकी सीनेट के बड़े हाल में उस दिन हलचल मची हुई थी। ओहायो के रिपब्लिकन नेता मोरेनो, जिनका करियर ऑटो पार्ट्स के बिज़नेस से शुरू हुआ था, यूनियन नेताओं और बेरोज़गार मज़दूरों के बीच खड़े होकर जोर से बोल रहे थे। उन्होंने Halting International Relocation of Employment (HIRE) Act of 2025 नाम का बिल पेश किया। छोटा-सा बिल था, लेकिन सीधा वार आईटी इंडस्ट्री पर था।

मोरेनो ने कहा: अमेरिकी कंपनियाँ नौकरियाँ बाहर भेजकर हमारे इलाकों को खोखला कर रही हैं और सिर्फ़ बड़े अफसरों की जेबें भर रही हैं। अमेरिका के कॉलेज पास नौजवान नौकरी ढूँढ रहे हैं और इधर हमारी नौकरियाँ भारत जैसे देशों में भेज दी जाती हैं, जहाँ सस्ता मज़दूर मिलता है। अब ये सब बंद होगा। अब हमें अमेरिकी मज़दूरों के लिए खड़ा होना होगा, ताकि वे इज़्ज़त और सुरक्षा के साथ काम कर सकें और रिटायर हो सकें। अगर कोई कंपनी अमेरिकियों की बजाय विदेशियों को रखेगी, तो मेरा बिल उन्हें उनकी जेब पर चोट करेगा। [2]

फिर उन्होंने समझाया कि HIRE ऐक्ट क्या करेगा: अगर आप अमेरिकी नौकरियाँ विदेश भेजेंगे, तो उस कॉन्ट्रैक्ट की 25% रकम टैक्स के रूप में देनी होगी। और हम वो पैसा इस्तेमाल करेंगे ट्रेड स्कूल खोलने में, ताकि हमारे लोग नए हुनर सीख सकें और बेहतर नौकरियों तक पहुँच सकें। [3]

ये कानून ऊपर से साधारण लगता है, पर असर बहुत गहरा है। अगर कोई अमेरिकी कंपनी भारतीय आईटी फर्म जैसे TCS (सॉफ़्टवेयर मेंटेनेंस) या Wipro (डेटा एनालिटिक्स) को पैसे देगी, तो उस पर सीधे 25% टैक्स लगेगा। और यह खर्च उनकी टैक्स से काटा भी नहीं जा सकेगा। इसका मतलब यह है कि कॉर्पोरेट टैक्स जोड़कर कंपनियों की कुल लागत लगभग 46% तक बढ़ सकती है।

इस बिल के समर्थक इसे आर्थिक देशभक्ति” कह रहे हैं। यह बाइडेन की Buy American नीति[4] और ट्रम्प के H-1B वीज़ा पर की गई सख़्ती जैसी बातें याद दिलाता है।[5] लेकिन भारत के लिए, जिसकी आईटी सेवाओं का 60% अमेरिका जाता है, यह ख़बर सुनते ही दहशत फैल गई।

भारतीय आईटी के लिए झटका

समझने के लिए उदाहरण के तौर पर: JPMorgan सालाना TCS को 10 मिलियन डॉलर देता है ताकि वे सॉफ़्टवेयर और ग्राहक समर्थन संभालें। पहले यह राशि पूरी तरह TCS के पास रहती थी और भारत-अमेरिका के वेतनफर्क से उन्हें बढ़त मिलती थी — एक वरिष्ठ इंजीनियर भारत में करीब $20,000 सालाना कमाता है; उसी भूमिका के लिए अमेरिका में औसत लगभग $120,000 है। लेकिन अब HIRE ऐक्ट लागू होते ही JPMorgan को 2.5 मिलियन डॉलर टैक्स देना पड़ेगा। और क्योंकि यह खर्च टैक्स से घटाया नहीं जा सकता, उनकी कुल टैक्स योग्य आय बढ़ जाएगी। इस तरह सौदे की असली लागत लगभग 14.6 मिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगी।

तो कंपनी क्या करेगी? उनके पास तीन विकल्प होंगे:

  • TCS से कॉन्ट्रैक्ट रेट घटाने की माँग करना,
  • मैक्सिको या कनाडा जैसी जगहों पर काम शिफ्ट करना,
  • या फिर TCS को मजबूर करना कि वह अमेरिका में ही ज़्यादा लोग भर्ती करे।

बेंगलुरु में बैठे पटेल की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। सितंबर के बीच में उन्हें बैंक के CIO की ओर से एक ईमेल मिला: “HIRE ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। Q1 तक 40% काम अमेरिका में शिफ्ट कर सकते हो? वरना हमें टैक्स देना पड़ेगा और उसका असर तुम्हें भी भुगतना होगा।”

पटेल ने तुरंत सोचा कि काम नज़दीकी देशों में शिफ्ट कर दिया जाए। पर हर तरफ़ से आंकड़े उलझ रहे थे। भारत की सबसे बड़ी ताकत — 70% तक सस्ते कर्मचारी — अब नए टैक्स कानून के बोझ में दबकर बेअसर हो गए थे।

भारतीय इंजीनियरों के लिए यह सिर्फ़ आर्थिक मसला नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत भी है। Sensibull प्लेटफ़ॉर्म के CEO अबिद हसन ने सोशल मीडिया पर लिखा: “2011 में आईटी फ्रेशर 3 लाख रुपये (6,800 डॉलर) पाता था। 2025 में यह 4 लाख रुपये (4,500 डॉलर) है। यानी रुपये की वजह से असल कमाई 33% घट गई। आईटी इंडस्ट्री आज सस्ती लेबर का नया खेल बन गई है। [6]

अगर बिल पास हुआ, तो अमेरिकी ग्राहक, जिन पर भारत की आईटी कंपनियाँ 60% कमाई के लिए निर्भर हैं, बजट कम कर सकते हैं। Singhania & Co. के रोहित जैन कहते हैं: “HIRE ऐक्ट भारत की सबसे बड़ी ताकत — कम दाम पर काम — छीन लेगा। नए सौदे धीमे होंगे, मुनाफ़ा कम होगा और कंपनियों को अमेरिकी मार्केट से हटकर दूसरी जगहें देखनी पड़ेंगी।”

जैन का कहना है कि कई अमेरिकी ग्राहक बड़े सौदे फिलहाल टाल सकते हैं, पुराने कॉन्ट्रैक्ट बदल सकते हैं और कुछ काम अमेरिका के करीब शिफ्ट कर सकते हैं। कुछ कंपनियाँ भारतीय आईटी से काम कराएँगी, लेकिन पहले से ज़्यादा दबाव डालेंगी।[7]

अब कंपनियों पर कीमतें घटाने का दबाव ज़्यादा होगा, विशेषकर साधारण कामों में, जैसे ऐप्लिकेशन बनाना और उसका मेंटेनेंस करना। जबकि डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और एआई से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स शायद सुरक्षित रहेंगे।

परन्तु क्या खतरा सच में इतना बड़ा है?

कई लोग मान रहे हैं कि HIRE ऐक्ट को लेकर जितना डर फैलाया जा रहा है, हकीकत शायद उतनी गंभीर नहीं है। यह कानून असल में अमेरिकी राजनीति में चल रही उस नई सोच का हिस्सा है जिसमें “आर्थिक राष्ट्रवाद” यानी आर्थिक मामलों में देश को प्राथमिकता देने का नारा ज़ोर पकड़ रहा है। अमेरिका में अब यह विचार और मज़बूत हो रहा है कि नौकरियाँ देश के भीतर रहनी चाहिए, व्यापारिक नियम सख़्त होने चाहिए और विदेशी मज़दूरों पर ज़्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए। यह रुख़ सबसे साफ़ रिपब्लिकन पार्टी के उस हिस्से में दिखता है जो ट्रम्प का साथ देता है। वहाँ ग्लोबलाइज़ेशन को हमेशा संदेह से देखा गया। उनका मानना है कि इसने अमेरिकी मज़दूरों को कमज़ोर किया और नौकरी के मौके विदेश पहुँचा दिए।

इसी माहौल में ट्रम्प के पुराने सलाहकार पीटर नवारो जैसे लोगों की वापसी ने आग में घी डाल दिया है।[8] नवारो ने हाल में एक अपील का समर्थन किया, जिसमें कहा गया कि अब सिर्फ़ सामान नहीं बल्कि सेवाओं पर भी टैक्स लगे। यह सीधा भारत जैसे देशों पर वार है, जो पहले ही भारी अमेरिकी टैरिफ़ झेल रहे हैं। भारत के कुछ उत्पादों पर तो 50% तक टैक्स है। यह दिखाता है कि अमेरिका अब अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ज़्यादा अपनी घरेलू राजनीति को साधने पर तुला है।

ज़्यादातर इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालात उतने गंभीर नहीं हैं। बेंगलुरु चैम्बर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स का कहना है कि इस बिल का मौजूदा रूप पास होने की संभावना कम है। शायद टैक्स 25% से घटाकर 10-15% हो, कुछ सेक्टर बाहर रखे जाएँ या इसे धीरे-धीरे लागू किया जाए। साथ ही, अमेरिकी टेक कंपनियाँ भी इसका विरोध कर रही हैं, क्योंकि उन्हें भारतीय आईटी से सस्ता और कारगर काम मिलता है। अगर लागत इतनी बढ़ी तो उनका बिज़नेस मॉडल गड़बड़ा जाएगा। यही वजह है कि HIRE का मौजूदा रूप क़ानून बनना मुश्किल है।[9]

भारत की तैयारी

सितंबर के अंत तक भारत की तरफ से भी कदम उठाए गए। सरकार ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर सेक्टर में तुरंत प्रोत्साहन बढ़ा दिए, ताकि टैलेंट देश में ही बना रहे। वहीं इंजीनियर पटेल जैसे लोग Coursera जैसी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर नई स्किल सीखने में लग गए। Python से PyTorch तक, और पुराने लेगेसी कोड से नई GenAI मॉडल तक — इंजीनियर खुद को नए दौर के लिए तैयार कर रहे हैं।

पटेल ने कहा, “HIRE हमारे लिए एक चेतावनी है, लेकिन साथ ही मौका भी। हमने पहले भी Y2K और डॉट-कॉम जैसी बड़ी चुनौतियाँ झेली हैं। हम अब सिर्फ़ मेनटेनेंस करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि असली ट्रांसफॉर्मेशन यानी बदलाव लाने वाले लोग बन रहे हैं।” लोगों का कहना है कि HIRE ऐक्ट अपने मौजूदा रूप में नहीं टिक पाएगा। वजह यह है कि इसे पूरी ताक़त से लागू करने पर असर भारत तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी टेक दिग्गजों का बिज़नेस मॉडल भी टूटेगा और अंतरराष्ट्रीय इनोवेशन सिस्टम पर भी असर पड़ेगा।[10] साथ ही, हाल ही में H-1B वीज़ा की फीस में 100,000 डॉलर तक का इज़ाफ़ा किया गया है। HIRE और यह नया नियम मिलकर भारतीय आईटी कंपनियों पर तुरंत असर अवश्य डालेंगे। लेकिन लंबे समय में इसका नुकसान खुद अमेरिका की टेक और बिज़नेस सर्विस इंडस्ट्री को भी हो सकता है।

NASSCOM का हवाला देते हुए एक BBC रिपोर्ट ने कहा कि वीज़ा की लागत बढ़ने से अमेरिका में कुछ ऑनशोर प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं। अगर बाहर से लोगों को लाना महँगा हो गया, तो अमेरिकी क्लाइंट्स प्रोजेक्ट की कीमतें बदलेंगे, काम की शुरुआत देर से करेंगे या आउटसोर्सिंग की पूरी योजना पर फिर से सोचेंगे।

भारतीय कंपनियों ने भी पहले से तैयारी कर ली है। उन्होंने अमेरिका में लोकल टीमों को मजबूत किया है और ऑफशोर काम का दायरा बढ़ाया है। इससे वे नए हालातों में जल्दी एडजस्ट कर पाएँगी।आदित्य नारायण मिश्रा (CEO, CIEL HR) के मुताबिक भारतीय आईटी कंपनियाँ वीज़ा पर बढ़े खर्च का बोझ सीधे अमेरिकी क्लाइंट्स पर डाल देंगी।[11] IPR वकील नवरोप सिंह कहते हैं कि HIRE ऐक्ट भारत और अमेरिका की गहरी आर्थिक निर्भरता को नहीं हिला पाएगा, क्योंकि अमेरिकी टेक कंपनियों का वॉशिंगटन में बहुत असर है।[12] अधिकांश विशेषज्ञ इसे चुनावी नाटक मानते हैं, कोई असली सुधार नहीं।

संभावना यही है कि अमेरिका यूरोप जैसा मॉडल अपनाएगा, जहाँ कुछ डिजिटल टैक्स और हल्के ऑनशोरिंग उपाय होते हैं। SaaS, क्लाउड, इंजीनियरिंग और एडवांस सेवाओं की ज़रूरत भारत से पूरी होती रहेगी। इसलिए अभी भारतीय आईटी इंडस्ट्री को किसी बड़े संकट से डरने की ज़रूरत नहीं।

पुरानी कोशिशें और उनका हाल

यह पहली बार नहीं है कि अमेरिका में आउटसोर्सिंग को लेकर इतना शोर मच रहा हो।

  • 2004: राज्य-स्तरीय रोक की कोशिशें: 2000 के शुरुआती वर्षों में आईटी नौकरियाँ भारत जैसे देशों को मिलने लगीं, तो कुछ अमेरिकी राज्यों ने सोचा कि सरकारी कॉन्ट्रैक्ट विदेश न जाएँ। इस पर मीडिया में काफी चर्चा हुई, लेकिन असर मामूली रहा। ज़्यादातर बिल या तो पास नहीं हुए या फिर बाद में इंडस्ट्री के दबाव से ढीले कर दिए गए।[13]
  • 2009-2012: ओबामा दौर की बातें: 2008 की मंदी के बाद ओबामा ने आउटसोर्सिंग के खिलाफ़ कदम उठाने की कोशिश की और Bring Jobs Home Act पेश किया। इसमें अमेरिका में काम रखने पर टैक्स राहत और विदेश भेजने पर पेनल्टी का प्रस्ताव था। लेकिन बिल पास नहीं हो सका और आउटसोर्सिंग वैसे ही चलती रही।[14]
  • 2017: ट्रम्प प्रशासन का आदेश: ट्रम्प ने टैक्स लगाने के बजाय Buy American, Hire American आदेश लागू किया। इसकी वजह से H-1B वीज़ा पाना मुश्किल हो गया। Infosys, TCS और Wipro जैसी भारतीय कंपनियों पर इसका असर पड़ा।[15] खर्च बढ़ा, वीज़ा मिलने में देर हुई, लेकिन कंपनियों ने नए तरीके ढूँढे। लोकल हायरिंग बढ़ी और कुछ काम पास के देशों में चला गया। इंडस्ट्री पर इसका ज़्यादा असर नहीं हुआ और वह बढ़ती रही।
खतरे से अवसर तक

सवाल उठता है कि HIRE ऐक्ट पास हो या न हो, नतीजा क्या निकलेगा? हकीकत यह है कि इस बिल और H-1B की बढ़ी फीस से कई भारतीय प्रोफेशनल्स, खासकर जो अमेरिका के सपने देख रहे थे, अब अपना फैसला बदल सकते हैं। नए ग्रैजुएट्स और आईआईटी पास आउट युवाओं का ध्यान अब भारत की ओर होगा।

भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम पहले से तेज़ी से बढ़ रहा है। यहाँ पूँजी, जानकारी और बड़ा घरेलू बाज़ार मौजूद है। बहुत से युवा अब भारत में ही स्टार्टअप बना रहे हैं, हाई-टेक कंपनियों से जुड़ रहे हैं और एआई, फिनटेक, SaaS और बायोटेक जैसे क्षेत्रों में नए प्रयोग कर रहे हैं।[16]

यह दृश्य बिल्कुल वैसा ही है जैसा शुरुआती 2000 के चीन में हुआ था। तब बड़ी संख्या में चीनी छात्र अमेरिका से पढ़ाई कर लौटे। वे अपने ज्ञान और उत्साह के साथ लौटे और चीन को टेक और मैन्युफैक्चरिंग का गढ़ बनाने में जुट गए।

अमेरिका की कड़ी वीज़ा पॉलिसियों की वजह से भारत में “रिवर्स ब्रेन ड्रेन” बढ़ सकता है, यानी जो टैलेंट बाहर जाता था, अब वापस आ सकता है। यह भारत के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। अगर यही टैलेंट यहीं रहकर इनोवेशन करेगा, तो भारत तेज़ी से हाई-टेक ताकत बन जाएगा।[17]

एक नई शुरुआत

19 सितंबर की शाम, पटेल बेंगलुरु की हरियाली के बीच डूबते सूरज को निहार रहे थे। भीतर कहीं उम्मीद की एक लौ जल रही थी। बिल अभी भी कमेटी में अटका हुआ था और कई समूह उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हवा का रुख़ साफ था — आउटसोर्सिंग का सुनहरा दौर अब ढलान पर है।

भारत के आईटी सेक्टर के लिए HIRE कोई प्रलय नहीं, बल्कि चेतावनी है। अब समय आ गया है कि सिर्फ़ सस्ते कोडिंग मॉडल पर निर्भर रहने से आगे बढ़ा जाए। असली भविष्य इनोवेशन, नई तकनीक और बड़े बदलावों में है।

पटेल ने धीरे से लैपटॉप बंद किया और मन ही मन तय किया कि अगला काम उनकी खुद की पहल होगी — भारत से जन्मा एक एआई स्टार्टअप, जो दुनिया में अपनी पहचान बनाए।

असल में, HIRE और H-1B के इस दोहरे दबाव का सबसे सकारात्मक असर यही हो सकता है कि भारत के बेहतरीन इंजीनियर डॉलर की दौड़ छोड़कर अपने ही देश में रहकर उसे नई ऊँचाइयों तक ले जाएँ।

सन्दर्भ सूची

[1] What is the US Hire Act Bill? Understand Easily Here (Jagran Josh, 2025); https://www.jagranjosh.com/general-knowledge/us-hire-act-bill-plan-1820002393-1

[2] New Moreno Bill Would Crack Down on Outsourcing, Fund American Workers (United States Senate, 2025); https://www.moreno.senate.gov/press-releases/new-moreno-bill-would-crack-down-on-outsourcing-fund-american-workers/

[3] Democrat Senator Objects to Senator Moreno’s HIRE Act (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=F8GOtTwuIjY

[4] President Biden signs “Buy American” Executive Order (Norton Rose Fulbright, 2021); https://www.nortonrosefulbright.com/de-de/wissen/publications/068c9ab4/president-biden-signs-buy-american-executive-order

[5] US H1B Visa Restriction: What Are The Exemptions? (News 18, 2025); https://www.news18.com/videos/us-h1b-visa-restriction-what-are-the-exemptions-us-visa-row-h1b-visa-explained-plainspeak-9592001.html

[6] Indian IT companies increased USD billing rates. But the IT worker pay dropped. And no R&D spend. It’s like feudalism became IT labour arbitrage (Abid Hassan, X); https://x.com/abidsensibull/status/1965262268972892514?referrer=grok-com

[7] Microdrama opens new doors for actors and writers amid streaming slowdown (LiveMint, 2025); https://www.livemint.com/industry/media/microdramas-rewrite-the-script-for-india-s-entertainment-workforce-11758609532661.html

[8] “India’s Keyboard Minions”: Trump Aide After Tariff Claim Fact-Checked On X (NDTV World, 2025); https://www.ndtv.com/world-news/us-tariff-news-donald-trump-aide-peter-navarro-after-tariff-claim-fact-checked-on-x-indias-keyboard-minions-9249236

[9] HIRE Act or H-1b visa shock: Time for Indian IT industry to look within for reforms (The Indian Express, 2025); https://www.newindianexpress.com/business/2025/Sep/22/hire-act-or-h-1b-visa-shock-time-for-indian-it-industry-to-look-within-for-reforms

[10] ibid

[11] How Trump’s $100,000 H-1B Visa Fee Could Impact US Economy More Than India (NDTV, 2025); https://www.ndtv.com/world-news/how-trumps-100-000-h-1b-visa-fee-could-impact-us-economy-more-than-india-9327489

[12] The HIRE Act 2025: Impact of the Proposed Bill on Outsourcing Tax on US-India Tech Dynamics (Navroop Singh, X); https://x.com/TheNavroopSingh/status/1964613925875691558?referrer=grok-com

[13] 25% Outsourcing Tax? Could this new US Bill destroy India’s outsourcing industry? (The Finance Story, 2025); https://thefinancestory.com/new-us-bill-could-destroy-indias-outsourcing-industry

[14] Senate advances bill to end tax breaks for outsourcing (The Hill, 2014); https://thehill.com/blogs/floor-action/senate/213093-senate-bill-to-end-tax-breaks-for-outsourcing-stalls/

[15] President Biden Revokes ‘Buy American and Hire American’ Executive Order (Ogletree Deacons, 2021); https://ogletree.com/insights-resources/blog-posts/president-biden-revokes-buy-american-and-hire-american-executive-order/

[16] Indian leaving big tech to launch startups back home (Business Insider, 2024); https://www.businessinsider.com/indians-leaving-big-tech-to-launch-startups-back-home-2024-9

[17] The Business of Startups: How India Plans to Lead Globally | Peak XV & BCG | India For The World (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=OIPqP9rOoUM

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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