बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की लीपापोती : एलीट मीडिया और नैरेटिव भटकाने की कला

यह लेख बताता है कि किस तरह पश्चिमी और वाम-उदारवादी मीडिया बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को हल्का करके प्रस्तुत करता है—उसे क्षेत्रीय अस्थिरता के अस्पष्ट और व्यापक विमर्श में पिरोकर, और भारत में तथाकथित रूप से होने वाले अल्पसंख्यक उत्पीड़न के मनगढ़ंत दावों की ओर ध्यान मोड़कर।

 

  • वाम-उदारवादी तंत्र बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे उत्पीड़न की गंभीरता को कम करके पेश करता हैइसे दक्षिण एशिया में बढ़ती असहिष्णुताजैसे अस्पष्ट नैरेटिव में ढाल देता है, ताकि हिंदू-विरोधी हिंसा पर सीधी चर्चा से बचा जा सके।
  • इसके समानांतर भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का एक अलग नैरेटिव खड़ा किया जाता है, जिससे बांग्लादेशी हिंदुओं के दर्द को कमजोर किया जा सके, और हिंदू मुद्दों पर होने वाली सार्वजनिक पैरवी को अवैध ठहराया जा सके।
  • बांग्लादेश में कट्टर इस्लामिस्ट भीड़ द्वारा दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या को पश्चिमी मुख्यधारा मीडिया में बेहद सीमित कवरेज मिली। जहाँ इसका ज़िक्र हुआ भीखासकरद न्यूयॉर्क टाइम्समेंवहाँ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक ही नैतिक स्तर पर रखकर मामला प्रस्तुत किया गया।
  • ऐसी फ्रेमिंग एक झूठी समानता पैदा करती है और बांग्लादेश में जारी हिंदुओं के सुनियोजित और संरचनात्मक उत्पीड़न से ध्यान हटा देती है।
  • भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के दावे जनसांख्यिकीय रुझानों के आँकड़ों की कसौटी पर खरे नहीं उतरतेआज़ादी के बाद से हिंदुओं का अनुपात घटा है, जबकि अल्पसंख्यक आबादी, खासकर मुसलमानों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है।

औपनिवेशिक दौर में भारत के बारे में एक ऐसी वैचारिक भाषा गढ़ी गई, जिसमें नैतिकता को पीछे रखकर एक उलटा चलन शुरू किया गया। इसमें शोषण झेलने वाले समाज को ही शोषक के रूप में पेश किया गया। शब्दों के दिखावे और चालाक वैचारिक तर्कों के सहारे ऐसा नैरेटिव बनाया गया, जिसमें उत्पीड़क और उत्पीड़ित की भूमिकाएं आपस में बदल दी गईं। ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदू समाज ने लगातार आक्रमण, आर्थिक लूट, भुखमरी और शोषण का गंभीर दौर झेला। इसके बावजूद औपनिवेशिक विद्वानों, यूरोपीय मिशनरियों और साम्राज्यवादी व्यवस्था ने ऐसा साहित्य रचा, जिसमें हिंदू धर्म को ही दोषी ठहराया गया। देशज समाज को नैतिक रूप से बिगड़ा हुआ बताया गया, जिसे अपने ही हित के लिए ‘उद्धार’ की जरूरत है, जबकि सच यह था कि वही समाज सुनियोजित दमन का शिकार था।

आज हिंदुओं को निशाना बनाने वाला समकालीन विमर्श भी इसी पुराने ढर्रे पर चलता है। बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे इस्लामिक देशों में हिंदुओं पर हो रहे उत्पीड़न को या तो चुपचाप नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, या हिंदुओं और भारत के ख़िलाफ़ गढ़े गए शत्रुतापूर्ण विमर्श के ज़रिये उसे सही ठहराया जाता है। हिंदू पीड़ा की वास्तविकता को स्वीकारने के बजाय पूरा तंत्र लोगों का ध्यान भटकाने में लगा रहता है, जिससे कट्टर इस्लामिस्ट व्यवस्था किसी भी जवाबदेही से बच निकलती है।

पिछले एक दशक में वाम तंत्र का सबसे खतरनाक दावा यह रहा है कि भारत में हिंदू कट्टरता बढ़ रही है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। वैचारिक झुकाव से प्रेरित तथाकथित धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्टें, चुनिंदा सूचकांक और पक्षपाती पश्चिमी मीडिया कवरेज भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण को “हिंदू बहुसंख्यकवाद” के रूप में पेश करते हैं, ताकि हिंदू समाज को लगातार आत्मग्लानि में रखा जा सके।

बांग्लादेश में कथित ब्लास्फ़ेमी के आरोपों के बाद दीपू चंद्र दास की नृशंस हत्या ने एक बार फिर इसी पैटर्न को उजागर किया है। अब इससे भी अधिक खतरनाक रणनीति सामने आ रही है—भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को “दक्षिण एशियाई असहिष्णुता” के एक ही फ्रेम में रख देना। इस तरह की फ्रेमिंग न केवल हिंसा को धुंधला करती है, बल्कि परोक्ष रूप से उसे सही भी ठहराती है। इसके साथ ही हिंदुओं को संगठित होने, खुलकर बोलने या राजनीतिक रूप से अपनी बात रखने के अधिकार से भी वंचित किया जाता है। जैसे ही हिंदू अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं, उन्हें तुरंत अल्पसंख्यक-विरोधी करार दे दिया जाता है। इस तरह हिंदू एकता को लगातार निशाना बनाया जाता है, ताकि एक ओर विदेशों में हो रहे उत्पीड़न पर ध्यान न जाए और दूसरी ओर देश के भीतर उभरते सभ्यतागत आत्मविश्वास को भी कमजोर किया जा सके।

नैतिक समानता का मिथक गढ़ना: बांग्लादेश की हिंसा पर मीडिया कवरेज

StopHindudvesha ने बांग्लादेश संकट पर पश्चिमी मीडिया की पक्षपाती कवरेज को विस्तार से दर्ज किया है—यह संकट तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के इस्तीफे और भारत प्रस्थान के बाद पैदा हुआ। जब कट्टर इस्लामिस्ट भीड़ ने बांग्लादेश की सड़कों पर व्यापक पैमाने पर हिंसा को अंजाम दिया और ख़ासकर कि हिंदू अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा, तब कई प्रभावशाली पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने या तो इस हिंसा की रिपोर्टिंग ही नहीं की, या फिर उसकी गंभीरता को बेहद हल्का करके दिखाया। कई मामलों में इस अशांति को हिंदू-विरोधी सांप्रदायिक हिंसा मानने के बजाय भारत और बांग्लादेश के बीच का द्विपक्षीय राजनीतिक मुद्दा बताकर पेश किया गया। हिंदुओं पर हुए हमलों को भ्रामक तरीके से शेख़ हसीना की पार्टी के कथित समर्थकों पर किए गए अलग-थलग हमलों के रूप में दिखाया गया, जबकि परदे के पीछे एक और खतरनाक नैरेटिव गढ़ा जा रहा था—कि भारत की तथाकथित “हिंदू बहुसंख्यकवादी” सरकार अपने राजनीतिक हितों के लिए हिंदुओं के उत्पीड़न को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है।[1]

इसके बाद यह फ्रेमिंग और आक्रामक होती चली गई। कट्टर इस्लामिस्ट भीड़ द्वारा दीपू चंद्र दास की नृशंस लिंचिंग की रिपोर्टिंग में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस हत्या को “दक्षिण एशिया क्षेत्र में धार्मिक असहिष्णुता के व्यापक पैटर्न का ताज़ा उदाहरण” बताया। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामवादी प्रभाव वाले माहौल के साथ एक ही श्रेणी में रखकर, रिपोर्ट में यह दावा भी जोड़ दिया गया कि “हिंदू vigilantes मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं”—खासकर गोमांस से जुड़े आरोपों को लेकर।[2]

भारत को पाकिस्तान और बांग्लादेश के समान धार्मिक रूप से कट्टर बताता यह भ्रामक विमर्श एक काल्पनिक संतुलन गढ़ता है। बांग्लादेश में जिस प्रकार से हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है, जो पूरी तरह से इस्लामिक कट्टरता से प्रेरित है, और देश के तंत्र में रचा बसा है, उसकी वास्तविकता से ध्यान हटाकर यह रिपोर्टाज उसे एक सामान्य क्षेत्रीय कहानी के मिथक में समाहित कर देता है।

रिपोर्ट में लिंचिंग की घटनाओं का तथ्यात्मक विवरण काफी हद तक सही हो सकता है, लेकिन उसमें ज़बरदस्ती “भारत में हिंदू कट्टरता” का कोण जोड़ना न सिर्फ़ अस्वाभाविक है, बल्कि कई बातें साफ़ भी करता है। भारत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के आरोपों को पश्चिमी मीडिया आम तौर पर तीखी नैतिक निंदा और निर्णायक भाषा में पेश करता है, कई बार ठोस सबूतों के बिना भी। इसके विपरीत, बांग्लादेश में एक हिंदू व्यक्ति की लिंचिंग की रिपोर्टिंग बेहद संयत और अत्यधिक संतुलित भाषा में की गई। यह अंतर बताता है कि घटनाओं से ज़्यादा महत्व उस फ्रेम को दिया जाता है, जिसमें उन्हें पेश किया जा रहा है। जिस व्यक्ति की निर्ममता से हत्या कर उसकी लाश को सार्वजनिक रूप से पेड़ से बांधकर जला दिया गया, और तमाशबीनों ने इस भयावह दृश्य का वीडियो बनाया[3], उस जघन्य अपराध को लेकर न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में ज़रा भी नैतिक आक्रोश नहीं दिखाई देता, यह अपने आप में चौंकाने वाली बात है।

बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न के ऐतिहासिक संदर्भ पर रिपोर्ट में कोई गंभीर चर्चा नहीं है। दुर्गा पूजा और दीवाली जैसे त्योहारों के दौरान बार-बार होने वाली हिंसा, मंदिरों में तोड़फोड़ के अनेक मामले, और मूर्तियों के सुनियोजित खंडन जैसे मुद्दों को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। पूरी रिपोर्ट में नैतिक तात्कालिकता का भाव केवल तब दिखाई देता है, जब ध्यान एक बार फिर भारत और कथित गौ-रक्षा विजिलांटिज़्म की ओर मोड़ दिया जाता है।

नतीजतन, रिपोर्ट तत्काल अपराध का ज़िक्र करने के बावजूद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लक्षित उत्पीड़न की गंभीरता को अंततः कम करके दिखाती है। ऐतिहासिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ कर और हिंसा को “दक्षिण एशियाई असहिष्णुता” जैसे अस्पष्ट ढांचे में रखकर, वह एक लंबे समय से चले आ रहे सभ्यतागत संकट को मामूली बना देती है। द ऑर्गनाइज़र में प्रकाशित एक लेख ने इस दोहरे मापदंड को साफ़ शब्दों में सामने रखा है। लेख के अनुसार, द वॉशिंगटन पोस्ट, बीबीसी, सीएनएन और द गार्जियन जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने दीपू चंद्र दास की हत्या पर लगभग पूरी तरह चुप्पी साधे रखी। जहां कहीं सीमित कवरेज हुई भी, वहां अपराध की सच्चाई से ज़्यादा उन वैचारिक पूर्वाग्रहों को उजागर किया गया, जो आज के पश्चिमी पत्रकारिता विमर्श को आकार दे रहे हैं।[4]

दीपू दास की लिंचिंग के बाद ध्यान भटकाना और चुनिंदा चुप्पी

बांग्लादेश में कट्टर इस्लामिस्ट भीड़ द्वारा दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या से जुड़ी वीडियो फुटेज जैसे ही सोशल मीडिया पर फैलने लगी, भारत के वामपंथी टिप्पणीकारों, पत्रकारों और स्वयंभू बुद्धिजीवियों ने तुरंत इस मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने की मुहिम छेड़ दी। वाम-उदारवादी तंत्र ने आनन फ़ानन में एक ऐसा नैरेटिव गढ़ डाला जो भारत में अल्पसंखकों पर तथाकथित रूप से होने वाले अत्याचारों की ओर लोगों का ध्यान मोड़ने पर केंद्रित था।   बांग्लादेश में एक हिंदू अल्पसंख्यक की नृशंस हत्या के मुद्दे हो संबोधित करने के बजाय, वाम-उदारवादी तंत्र ने भारत के भीतर “बढ़ती असहिष्णुता” के दावों को उछालना शुरू कर दिया।

इस नैरेटिव को एक सुनियोजित साज़िश के तहत ऐसे समय उछाला गया, जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार अपने चरम पर थे। बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की बढ़ती रिपोर्टों के बीच, यही तंत्र वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों पर चुप्पी साधे रहा। इसके बजाय “गौ-रक्षा विजिलांटिज़्म”, “हिंदू बहुसंख्यकवाद”, “भगवा आतंक” और “हिंदुत्व कट्टरता” जैसे घिसे पिटे मिथकों के माध्यम से तेज़ी से हिंदू-विरोधी विमर्श गढ़ा जाने लगा। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर होने वाली हिंसा पर चर्चा को हाशिये पर धकेलकर उलटा भारत को ही अल्पसंख्यकों के शोषक के रूप में चित्रित किया जाने लगा।

कई वामपंथी एक्टिविस्ट्स, जो हिंदू-विरोधी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, ने दीपू दास की हत्या के मामले को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन उसी दौरान बांग्लादेश में एक अख़बार के दफ़्तर को जलाए जाने की खबरों को जमकर प्रचारित किया।[5] मीडिया दफ्तरों में तोड़फोड़ और पत्रकारों के उत्पीड़न की खबरें व्यापक रूप से साझा की गईं, जबकि एक हिंदू व्यक्ति की सार्वजनिक लिंचिंग—जिसे तमाशबीनों ने रिकॉर्ड कर वायरल किया, को लगभग अनदेखा कर दिया गया।

इसी दौरान, भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का एक समानांतर नैरेटिव गढ़ने के लिए सोशल मीडिया का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाने लगा। यह नैरेटिव पश्चिमी मीडिया के “दक्षिण एशिया में बढ़ती असहिष्णुता” वाले विमर्श से सीधा प्रेरित था। हिंदू-विरोधी टिप्पणीकार राणा अय्यूब ने द वॉशिंगटन पोस्ट में 2024 में प्रकाशित अपना ही एक लेख साझा करते हुए X पर लिखा:

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में होने वाली mob lynchings केवल समाज की विफलता नहीं हैं, बल्कि नेतृत्व की विफलता हैं। जब सत्ता में बैठे लोग धार्मिक कट्टरता को वैधता देते हैं, तो भीड़ जल्लाद बन जाती है।[6]

पत्रकार सबा नक़वी ने भी कुछ इसी तरह का रुख अपनाया। उन्होंने डेक्कन हेराल्ड में पहले प्रकाशित अपना एक कॉलम साझा किया और बांग्लादेश की अशांति को पूरे दक्षिण एशिया के एक व्यापक रुझान का हिस्सा बताकर पेश किया। उनकी फ्रेमिंग में भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को एक ही खांचे में रख दिया गया, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं को विशेष तौर पर निशाना बनाए जाने पर कोई सीधी बात नहीं की गई।[7]

अगस्त 2024 में प्रकाशित डेक्कन हेराल्ड का वह लेख भी इसी तयशुदा ढांचे पर चलता है। उसमें भारत में अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले “दुर्व्यवहार” पर चिंता जताई गई, लेकिन बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों को बार-बार निशाना बनाने वाले कट्टर इस्लामिस्ट तंत्र को लेकर पूरी तरह से चुप्पी साध ली गई। लेख इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ करता है कि भारत में अल्पसंख्यक सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचे हैं और उन्हें व्यापक कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

अपने कॉलम में नक़वी ने यह दावा किया कि भारतीय मुसलमानों को सांप्रदायिक हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ा है, साथ ही यह भी जोड़ा कि उनकी सुरक्षा इसलिए सुनिश्चित है क्योंकि भारत कानूनी रूप से हिंदू राष्ट्र नहीं है।[8]

चरम-वामपंथी अकादमिक अपूर्वानंद ने भी बांग्लादेश में जारी हिंदू-विरोधी हिंसा पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया, लेकिन भारत में कथित तौर पर बढ़ती “बांग्लादेश-विरोधी” भावना पर चिंता ज़रूर जताई। उन्होंने X पर लिखा:

हमें इस बात से चिंता ज़रूर होनी चाहिये, लेकिन क्या हमें बीडी में भारत-विरोधी भावनाओं पर हैरानी होनी चाहिए? क्या हमारे नेताओं और सत्तारूढ़ दल ने कम-से-कम एक दशक से भारतीय दिमागों में बीडी-विरोधी भावनाएँ नहीं भरी हैं?”[9]

गौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इस प्रोफेसर पर फरवरी 2020 की दिल्ली हिंसा के पीछे की साज़िश में शामिल होने का आरोप एक गवाह द्वारा पहले भी लगाया जा चुका है।[10] 2024 के उन प्रदर्शनों के बाद, जिनके चलते शेख़ हसीना को सत्ता से हटना पड़ा, अपूर्वानंद उन लोगों में शामिल रहे, जिन्होंने बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी हिंसा को कम करके दिखाया। अगस्त 2024 में फ्रंटलाइन में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने बांग्लादेश की घटनाओं को “धर्मनिरपेक्षता का सबक[11] बताया और हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐसा नैरेटिव पेश किया, जो हिंदुओं के ख़िलाफ़ होने वाली व्यापक हिंसा की रिपोर्टों से बिल्कुल उलट था।

छिटपुट घटनाओं से बहुसंख्यकवाद का नैरेटिव गढ़ना

भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग में वाम-उदारवादी मीडिया अक्सर चुनिंदा चीज़ों को शामिल करने और ज़रूरी संदर्भों को जानबूझकर छोड़ देने की रणनीति अपनाता है। मुसलमानों को कथित तौर पर निशाना बनाए जाने या मिशनरियों द्वारा विरोध झेले जाने की खबरों में प्रायः वह संदर्भ गायब रहता है, जिसमें कट्टर इस्लामिस्ट नेटवर्कों की मौजूदगी, संगठित “लव जिहाद” तंत्र, आदिवासी इलाकों में हिंदुओं के बड़े पैमाने पर होने वाले फर्जी और ज़बरन धर्मांतरण, और अब्राहमिक तंत्र के कुछ वर्गों द्वारा हिंदू धर्म व संस्कृति का लगातार उपहास और अपमान शामिल हैं।

इसके उलट, विदेशी फंडिंग से सिंचित धार्मिक लॉबीज़ जिस प्रकार से हिंदुओं पर लगातार निशाना साधते हुए उन की ब्रेनवाशिंग करती हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपना उन्हें डराती- धमकाती भी हैं, और उन पर धर्मांतरण के लिये लगातार मानसिक दबाव बनाती हैं, उसे लेकर मीडिया की कोई ख़ास दिलचस्पी दिखाई नहीं देती। इसके बजाय हिंदू संस्थाओं से जोड़ी गई तोड़फोड़ की इक्का-दुक्का घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, ताकि हिंदू बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक उत्पीड़न का बड़ा नैरेटिव खड़ा किया जा सके।

दीपू चंद्र दास की बांग्लादेश में हुई मॉब लिंचिंग के बाद भी यही पैटर्न देखने को मिला। वहाँ हिंदुओं को प्रताड़ित करने और उन्हें डराने-धमकाने को लेकर खबरें लगातार सामने आती रहीं, लेकिन वाम-उदारवादी तंत्र ने भारत में ईसाई समुदाय के लोगों को तथाकथित रूप से डराये-धमकाने जाने का ऐसा नैरेटिव गढ़ा कि मीडिया और नागरिक समाज का सारा ध्यान उसी पर केंद्रित हो गया। मीडिया रिपोर्टों में असम के एक स्कूल में क्रिसमस ईव पर की गयी सजावट में तोड़फोड़ के आरोप में एक हिंदू संगठन के सदस्यों की गिरफ्तारी को प्रमुखता से दिखाया गया।[12] इसी तरह छत्तीसगढ़ के रायपुर से आई खबरों में एक स्थानीय मॉल में क्रिसमस सजावट को नुकसान पहुँचाने के कथित मामलों को उछाला गया।[13] ये घटनाएँ बहुत जल्दी मीडिया सुर्ख़ियों में छा गयीं।

किसी भी समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा का प्रयोग करना या उससे जुड़े लोगों को डराना-धमकाना निंदनीय है और संवैधानिक लोकतंत्र में इस प्रकार के कृत्यों की कोई जगह नहीं हो सकती। लेकिन कुछ गिनी-चुनी घटनाओं के आधार पर हिंदू कट्टरता का एक व्यापक नैरेटिव गढ़ देना ऐसा करने वालों की मंशा पर कई सवाल खड़े करता है। जब अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों पर ज़बरन धर्मांतरण कराने या हिंदुओं को परेशान करने के आरोप लगते हैं, जिनमे कभी-कभी डराना-धमकाना या हिंसा भी शामिल होते हैं, तो मीडिया अक्सर उस घटना को “अल्पसंख्यक पीड़ितत्व” के लेंस से दिखाता है। उलटा ऐसे मामलों में शिकायत करने वालों की मंशा पर ही सवाल उठाए जाते हैं, या उन्हें “हिंदुत्व एजेंडा” आगे बढ़ाने वाला बताया जाता है, जबकि धर्मांतरण के विरोध को वैचारिक शत्रुता के रूप में पेश किया जाता है। सबसे अजीब बात तो यह है कि कथित अपराधी की पहचान के साथ ही घटना को प्रस्तुत करने का लेंस भी पूरी तरह से बदल जाता है, जिससे वाम-उदारवादी तंत्र का हिंदू-विरोधी रवैया और उसके दोहरे मानदंड स्पष्ट रूप से उजागर होते हैं।

2025 के दौरान मीडिया रिपोर्टों में देश के अलग-अलग हिस्सों में क्रिसमस सजावट में तोड़फोड़ की कुछ गिनी-चुनी घटनाओं को बार-बार उछाला गया और उन्हें ईसाइयों के व्यापक उत्पीड़न के सबूत के रूप में पेश किया गया। इस बेहद आक्रामक और अतिश्योक्तिपूर्ण एकतरफ़ा कवरेज से यह धारणा मजबूत होती चली गयी कि भारत में ईसाई अल्पसंख्यकों पर अत्याचार ढाये जाते हैं। दूसरी तरफ़ भारत भर में शांतिपूर्ण ढंग से मनाए गए क्रिसमस समारोहों की कवरेज में मीडिया की कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखी। देश के कई हिस्सों में क्रिसमस का त्योहार बिना किसी अराजक घटना के शांतिपूर्ण ढंग से मनाया गया—हिंदू परिवारों ने क्रिसमस ट्री सजाकर इस पर्व में खुलकर हिसा लिया, और बच्चों को बड़े चाव से  सांता क्लॉज़ की पोशाक पहनाई गई। लेकिन ऐसे दृश्य शायद ही मीडिया कवरेज का हिस्सा बने। इसके बजाय चुनिंदा घटनाओं को इस तरह सामने रखा गया कि सार्वजनिक हिंदू अभिव्यक्ति और हिंदू मुद्दों पर पैरवी को ही संदेह के दायरे में ला दिया गया।

इसी मीडिया परिदृश्य में, क्रिसमस से जुड़ी इन घटनाओं को ठीक उसी समय प्रमुखता दी गई, जब बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा अपने चरम पर थी। दीपू चंद्र दास की हत्या के कुछ ही दिनों बाद भारत का न्यूज़ और सोशल मीडिया चक्र भारत के भीतर होने वाले तथाकथित अल्पसंख्यक उत्पीड़न के विमर्श से भर गया। इसका सीधा नतीजा यह निकला कि बांग्लादेश में हुए हिंदू उत्पीड़न की घटनाएँ हाशिये पर चली गईं। यही नहीं, उन घटनाओं के संदर्भ में हिंदुओं की प्रतिक्रिया को नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाया जाने लगा। “हिंदुत्व उग्रवाद” के आरोप बार-बार दोहराए गए, ताकि यह धारणा बनायी जा सके कि हिंदुओं का किसी भी प्रकार से संगठित होना या किसी भी मुद्दे को लेकर विरोध प्रकट करना, उनके अल्पसंख्यक विरोधी होने का सबूत है।

यह नैरेटिव केवल धार्मिक घटनाओं तक सीमित नहीं रहा। एंजेल चकमा नामक 24 वर्षीय छात्र की मौत—जिस पर कथित नस्लीय गालियों का विरोध करने के बाद हमला हुआ था—को भी इसी नैरेटिव फ्रेम में खींच लिया गया। वामपंथी झुकाव वाले मीडिया के कुछ हिस्सों ने इस मामले को भी उभरते बहुसंख्यकवाद के एक और उदाहरण के तौर पर पेश किया, जो राष्ट्रीय पहचान को एक साझा सभ्यतागत कथानक में बाँधना चाहता है।[14]

इन सभी मामलों में एक साफ़ पैटर्न उभरता है: छिटपुट घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर व्यापक वैचारिक नैरेटिव बना दिया जाता है, जबकि हिंदुओं के ख़िलाफ़ संगठित रूप से और लगातार होने वाली हिंसा को या तो हल्का कर के पेश किया जाता है, या पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। घटनाओं के संदर्भ का इस्तेमाल भी चुनिंदा ढंग से किया जाता है, जिससे समान घटनाओं की व्याख्या और उनका नैरेटिव फोकस पूरी तरह से इस बात पर आश्रित हो जाता है कि उसमें शामिल पक्षों की पहचान क्या है।

अल्पसंख्यक दमन के नैरेटिव की पोल खोलना

जब पाकिस्तान ने हाल ही में भारत में ईसाइयों और मुसलमानों को निशाना बनाकर किए जा रहे कथित “विजिलांटे हमलों” पर चिंता जताई, तो मानो विडंबना अपने चरम पर पहुँच गयी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दावा किया कि भारत में अल्पसंख्यकों को हिंसा और तोड़फोड़ का सामना करना पड़ रहा है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इन “कमज़ोर समुदायों” की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।[15]

भारत ने इन टिप्पणियों को औपचारिक रूप से खारिज करते हुए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ किए जाने वाले बर्ताव की ओर इशारा किया। बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान में “विभिन्न धर्मों के अल्पसंख्यकों का भयावह और सुनियोजित उत्पीड़न एक स्थापित तथ्य है,” और साथ में  यह भी जोड़ा कि दूसरों पर उँगली उठाने से उस सच्चाई पर परदा नहीं डाला जा सकता।[16]

भारत में अल्पसंख्यक उत्पीड़न को लेकर पाकिस्तान द्वारा लगाये गये आरोप आँकड़ों की कसौटी पर भी खरे नहीं उतरते। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा किए गए एक अध्ययन में दक्षिण एशिया के दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय रुझानों को दर्ज किया गया है। अध्ययन के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच भारत की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 7.8 प्रतिशत घट गई। इसी अवधि में धार्मिक अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी बढ़ी। भारत में मुस्लिम आबादी 43.15 प्रतिशत बढ़ी, जबकि ईसाइयों की संख्या में 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई[17] [18]

यही अध्ययन पड़ोसी देशों में कहीं अधिक तीव्र जनसांख्यिकीय बदलावों को भी दिखाता है। बांग्लादेश में 1950 से 2015 के बीच हिंदू आबादी में 66 प्रतिशत की गिरावट आई। 1950 में जहाँ हिंदू आबादी लगभग 23 प्रतिशत थी, वहीं 2015 तक यह घटकर करीब 8 प्रतिशत रह गई। पाकिस्तान में यह गिरावट और भी ज़्यादा तेज़ रही। वहाँ हिंदू आबादी 1950 में लगभग 13 प्रतिशत से घटकर 2015 में करीब 2 प्रतिशत रह गई—यानी इसी अवधि में लगभग 80 प्रतिशत की गिरावट[19]

भारत सरकार लंबे समय से बांग्लादेश और पाकिस्तान से हो रही अवैध घुसपैठ को जनसांख्यिकीय और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का एक प्रमुख कारण बताती रही है।[20] हालांकि वाम-उदारवादी तंत्र के कुछ हिस्सों ने अवैध इमीग्रेशन के ख़िलाफ़ की जाने वाले सरकारी कार्यवाहियों को मुसलमानों को निशाना बनाने के रूप में पेश किया है।[21]

ये नैरेटिव तब भी बने हुए हैं, जब भारत में हिंदू आबादी का अनुपात लगातार घट रहा है और 2024 में शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं को लगातार सांप्रदायिक हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। बांग्लादेश में हिंदू घरों, कारोबारों और पूजा स्थलों पर हमलों की खबरें आती रही हैं, लेकिन इसके समानांतर भारत को ही अल्पसंख्यक उत्पीड़न का मुख्य केंद्र बताने का सिलसिला भी जारी है।

इस पृष्ठभूमि में भारत एक ऐसे सुरक्षा माहौल का सामना कर रहा है, जो सीमा-पार आतंकवाद, अवैध घुसपैठ और पड़ोसी देशों से आने वाले कट्टरपंथी तत्वों की आवाजाही से प्रभावित है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए गए प्रशासनिक कदमों को अक्सर वैचारिक चश्मे से देखा जाता है—उन्हें सीमा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सामान्य उपायों के बजाय अल्पसंख्यकों पर हमले के रूप में परिभाषित किया जाता है।

समापन

इस लेख में जिन घटनाक्रमों की चर्चा की गई है, उन्हें अगर एक साथ जोड़कर देखें तो एक साफ़ और लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न सामने आता है—बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे उत्पीड़न को या तो सीधे तौर पर स्वीकार ही नहीं किया जाता, या फिर उसे किसी और दिशा में मोड़ दिया जाता है। हिंदुओं के ख़िलाफ़ जारी हिंसा पर चर्चा उसके अपने संदर्भ में शायद ही कभी की जाती है। इसके बजाय हिंदू-विरोधी हिंसा और उत्पीड़न को अक्सर काल्पनिक क्षेत्रीय समीकरणों, झूठी नैतिक समानताओं, या भारत-केंद्रित समानांतर नैरेटिव्स के ज़रिये दोबारा फ्रेम कर दिया जाता है, जिससे बांग्लादेशी हिंदुओं की वास्तविक स्थिति से ध्यान हट जाता है। मीडिया कवरेज और एक्टिविस्ट टिप्पणियाँ एक तयशुदा नैरेटिव के अंतर्गत हिंदुओं के ख़िलाफ़ लगातार जारी हमलों से फोकस हटाती हैं, जबकि कहीं और घटी असंबंधित या छिटपुट घटनाओं को चुनिंदा ढंग से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

इसी संदर्भ में, बांग्लादेश में हिंदुओं के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के तत्काल हस्तक्षेप की वीएचपी की मांग[22] उन गिने-चुने प्रयासों में से एक है, जो सीधे जवाबदेही तय करने की कोशिश करती है। लेकिन इस अपील को भी या तो चुपचाप टाल दिया जाता है, या सिरे से खारिज कर दिया जाता है—जबकि हिंदू मुद्दों की पैरवी को नियमित रूप से बहुसंख्यकवाद या उग्रवाद के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि हिंदू-विरोधी हिंसा को लेकर किसी भी प्रकार की जवाबदेही की ज़िम्मेदारी धुंधली पड़ जाती है, अंतरराष्ट्रीय निगरानी कमजोर पड़ती है और हिंदू चिंताओं के वैध प्रतिनिधित्व की गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जाती है। जब तक यह नैरेटिव अदला-बदली चलती रहेगी, बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी हिंसा के भयावह पैमाने और उसकी निरंतरता को समुचित रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

सन्दर्भ सूची

[1] StopHinduDvesha; “Targeted persecuted: Bangladeshi Hindus, Violence, apathy”;  https://stophindudvesha.org/targeted-persecuted-ignored-hindus-in-bangladesh-face-violence-and-global-apathy/

[2] The New York Times; “Lynching of a Hindu in Bangladesh Fans Fears of Rising Intolerance”;  https://www.nytimes.com/2025/12/22/world/asia/bangladesh-hindu-muslim-lynching.html

[3] OpIndia; “Bangladesh: Hindu man Dipu Das lynched by a Muslim mob in Bhaluka, body tied up and set on fire over the claims of blasphemy”; https://www.opindia.com/news-updates/bangladesh-hindu-man-dipu-chandra-das-lynched-by-a-muslim-mob-in-bhaluka-body-tied-up-and-set-on-fire-over-the-claims-of-blasphemy/

[4]  Organiser; “How western media framing diluted brutal killing of Dipu Chandra Das in Bangladesh: The NYT Case”;   https://organiser.org/2025/12/24/331813/world/how-western-media-framing-diluted-brutal-killing-of-dipu-chandra-das-in-bangladesh-the-nyt-case/

[5] Arfa Khanum Sherwani on X; https://x.com/khanumarfa/status/2002018460331880450

[6] Rana Ayyub on X; https://x.com/RanaAyyub/status/2001999254479626341

[7] Saba Naqvi on X; https://x.com/_sabanaqvi/status/2002280673252684221

[8] Deccan Herald; “Five political lessons for South Asia from Bangladesh’s unrest”;  https://www.deccanherald.com/opinion/five-political-lessons-for-south-asia-from-bangladeshs-unrest-3146850

[9] Apoorvanand on X; https://x.com/Apoorvanand__/status/2002179011796181282

[10] OpIndia; “The charade of ‘secularism’: DU Professor accused of inciting Delhi anti-Hindu Riots   by a witness cries hoarse as Hindus legally want their temple back”; https://www.opindia.com/2023/12/du-professor-apoorvanand-delhi-riots-secularism-gyanvapi-title-suit-hypocrisy/

[11] Frontline; “How Bangladesh’s Revolution Defies Expectations”;   https://frontline.thehindu.com/world-affairs/bangladesh-student-protests-revolution-communal-sectarian-violence-secularism/article68520556.ece

[12] Telegraph India;  “Assam Christmas vandalism | Assam Christmas vandalism: Four VHP, Bajrang Dal members arrested after school attack”; https://www.telegraphindia.com/north-east/assam-christmas-vandalism-four-vhp-bajrang-dal-members-arrested-after-school-attack-prnt/cid/2139615

[13] The Indian Express; “7 Bajrang Dal men who barged into Raipur mall and vandalised Christmas decorations denied bail”; https://indianexpress.com/article/india/bajrang-dal-men-raipur-mall-christmas-decorations-bail-10445190/

[14] The Wire; “Whose Life Counts? Anjel Chakma’s Death and the Idea of India Today”;  https://thewire.in/rights/whose-life-counts-anjel-chakmas-death-and-the-idea-of-india-today

[15] Arab News; “Islamabad expresses concern over vigilante attacks targeting Christians, Muslims in India”;   https://www.arabnews.com/node/2627734/pakistan

[16] India News; “’Abysmal record’: India rejects Pakistan’s comment on persecution of minorities”;   https://www.hindustantimes.com/india-news/abysmal-record-india-rejects-pakistan-s-comment-on-persecution-of-minorities-101767023319038.html

[17] HinduPost; “Hindu population in Bharat declined by 7.8 percent, decline of Hindu population most shocking in Bangladesh and Pakistan where Hindus shrunk by 66 percent and 80 percent”;  https://hindupost.in/society-culture/hindu-population-in-bharat-declined-by-7-8-percent-decline-of-hindu-population-most-shocking-in-bangladesh-and-pakistan-where-hindus-shrunk-by-66-percent-and-80-percent-respectively-pms-eco/#

[18] Economic Advisory Council of the PM; “Share of Religious Minorities: A Cross-Country Analysis (1950-2015)”; https://eacpm.gov.in/wp-content/uploads/2024/05/Share-of-Religious-Minorities-EAC-PM-Working-Paper.pdf

[19] Ibid.

[20] OpIndia; “Amit Shah says rise in Muslim population due to infiltration, not fertility”;  https://www.opindia.com/news-updates/amit-shah-blames-illegal-infiltration-from-pakistan-and-bangladesh-for-demographic-changes-says-congress-failed-minorities-under-nehru-liaquat-pact/

[21] Human Rights Watch;  “India: Hundreds of Muslims Unlawfully Expelled to Bangladesh”; https://www.hrw.org/news/2025/07/23/india-hundreds-of-muslims-unlawfully-expelled-to-bangladesh

[22] ANI News; ““UN should intervene immediately”: VHP’s Vinod Bansal on violence against Hindu minorities in Bangladesh”;  https://www.aninews.in/news/national/general-news/un-should-intervene-immediately-vhps-vinod-bansal-on-violence-against-hindu-minorities-in-bangladesh20251226122204/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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