शाकाहार का राजनीतिकरण – हिंदू पहचान और संस्कृति पर सीधा प्रहार
- शाकाहार को जाति के नजरिये से देखा जा रहा है ताकि शाकाहारियों को शर्मिंदा और बदनाम किया जा सके।
- पश्चिमी आलोचनात्मक नस्ल सिद्धांत (Critical Race Theory) को जाति आधारित आलोचनात्मक सिद्धांत (Critical Caste Theory) के रूप में ढाला जा रहा है और इसे जबरन शाकाहार की परंपरा पर थोपा जा रहा है।
- शाकाहारियों को ट्रोल और परेशान करने की घटनाएं बढ़ रही हैं, खासकर नवरात्रि जैसे हिंदू त्योहारों के दौरान।
- शाकाहारियों को खाने के चुनाव की स्वतंत्रता से वंचित किया जा रहा है और उन्हें शाकाहार के पक्ष में बोलने से रोका जा रहा है।
- शाकाहार विरोधी विमर्श अंततः हिंदू प्रथाओं और विश्वासों को निशाना बना रहा है।
- शाकाहारी समुदायों को हाशिए पर रखा जा रहा है और उनके लिए विशेष सेवाओं का बढ़ता विरोध हो रहा है।
तिरुपति के तिरुमाला मंदिर में प्रसाद तैयार करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घी में पशु वसा के कथित उपयोग के बारे में हाल ही में हुए विवाद को पश्चिमी मीडिया में दूर दूर तक कोई कवरेज नहीं मिला[1], केवल BBC को छोड़कर जिसने अपनी न्यूज़ रिपोर्ट में इस मुद्दे का संक्षिप्त उल्लेख किया। तिरूपति लड्डू प्रसादम मुद्दे को लेकर पश्चिमी मीडिया का जो उदासीन रवैया हमें देखने को मिला, इसका एक मुख्य कारण व्यापक हिंदूफोबिक या हिंदू विरोधी फ़्रेमिंग भी है जो भारत और हिंदुओं से संबंधित मुद्दों की पश्चिमी मीडिया कवरेज को सूचित करती है। हिंदूफोबिक फ्रेमिंग का सीधा अर्थ यह है कि हिंदुओं से जुड़े मुद्दों को या तो पश्चिमी मीडिया नज़रअंदाज़ कर देता है या इन्हें यदि कवर भी करता है तो कुछ इस प्रकार से करता है कि यह कवरेज हिंदू विरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रसित होती है।
हालाँकि, तिरूपति लड्डू मामले के परिपेक्ष्य में पश्चिमी मीडिया की उपेक्षा के पीछे एक एक गहरा कारण भी है। हिंदुओं के लिए, देवता को चढ़ाए जाने वाले भोजन में पशुओं की चर्बी की उपस्थिति, जिसे बाद में भक्तों द्वारा खाया जाता है, एक गंभीर उल्लंघन है, जो “ईशनिंदा” (बेहतर शब्द की कमी के कारण) के बराबर है। फिर भी, अब्राहमिक विश्वदृष्टि के भीतर, जो पश्चिमी और अब गैर-पश्चिमी मीडिया को भी प्रभावित करती है, इस भावना का बहुत कम महत्व है। “शुद्ध शाकाहार” या यहाँ तक कि एक सिद्धांत के रूप में शाकाहार के विचार को पूरी तरह से समझा या महत्व नहीं दिया जाता है, जिससे इस मुद्दे पर हिंदुओं की चिंताएँ पश्चिमी नज़रिए में तुच्छ या अप्रासंगिक लगती हैं।
यही कारण है कि तिरुपति प्रसादम लड्डू में पशु वसा की मिलावट के मुद्दे ने उस प्रकार की नाराजगी नहीं पैदा की, जैसी कि होनी चाहिए थी। पश्चिमी नज़रिए से, जिसे दुर्भाग्य से कई हिंदुओं ने आत्मसात कर लिया है, इस घटना पर हिंदुओं की प्रतिक्रिया को तिल का ताड़ बनाने के रूप में देखा जाता है। भारतीय लेखक चेतन भगत ने भी हिंदुओं को उपदेश देने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया, और तर्क दिया कि उन्हें प्रसादम की शुद्धता के बजाय सड़क पर बढ़ते गड्ढों की समस्या, वायु प्रदूषण और शैक्षिक घोटालों जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।[2] भगत जैसे लोग, जो “भूरे सिपाही” मानसिकता के प्रतीक हैं, उन्होंने पश्चिमी दृष्टिकोण को इस हद तक आत्मसात कर लिया है कि वे हिंदू चिंताओं को कम आंकने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, और अक्सर सुर्खियों में बने रहने की अपनी उत्सुकता में सबसे ज़बरदस्त नस्लवादियों से भी कई कदम आगे निकल जाते हैं।
इस विवाद से यह व्यापक निष्कर्ष निकलता है कि हिंदू मूल्यों से गहराई से जुड़े होने के कारण शाकाहार वैश्विक वोक तंत्र के निशाने पर है। नवरात्रि के दौरान – देवी दुर्गा के नौ रूपों को मनाने के लिए समर्पित नौ दिवसीय हिंदू त्योहार, जिसके दौरान कई हिंदू उपवास करते हैं – शाकाहारियों का मज़ाक उड़ाना इतना सामान्य हो गया है कि इस पर शायद ही कोई आपत्ति दर्ज कराता हो। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसे चुटकुले अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपवास करने वालों पर बनाए जाते; तो उन्हें क्या कभी भी स्वीकार्य माना जाता। लेकिन जब बात हिंदू परंपराओं की हो, तो सब कुछ चलता है। नतीजतन, हिंदू धर्म के प्रतिनिधि माने जाने वाले शाकाहारियों को मात्र शाकाहारी होने के लिए शर्मिंदा किया जाता है और उनकी बेहद नकारात्मक और विकृत छवि पेश की जाती है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे शाकाहारी हैं।
यदि आप “militant vegetarianism” (उग्र शाकाहार) शब्द इंटरनेट पर सर्च करते हैं, तो ऐसे लेखों की विशाल संख्या देख आपका सिर चकरा जाएगा, जिनमें से कई शाकाहार की कठोर आलोचना करते हैं और शाकाहारियों को चरमपंथी करार देते हैं। वास्तव में, जैसे ही आप Google में “उग्र शाकाहार” शब्द दर्ज करते हैं, AI तुरंत एक अवलोकन प्रदान करता है, जो इस नकारात्मक कथा को पुष्ट करता है:
“उग्र शाकाहार एक सामाजिक विचारधारा है जो भोजन की खपत में पारंपरिक पदानुक्रम और अलगाव को बनाए रखने का प्रयास करती है और हिंसा का कारण बन सकती है।”
Google AI का अवलोकन यहीं नहीं रुकता। इसमें शाकाहारी इलाकों का निर्माण, गोमांस प्रतिबंध, शाकाहारियों द्वारा पशुओं के प्रति करुणा की बात किए जाना (जो भी इसका मतलब है), शाकाहारी होने के कारण के रूप में पर्यावरण संबंधी चिंताओं का हवाला देना, किसी को उसकी शाकाहारी स्थिति के आधार पर कार्यालय स्थान देने से इनकार करना आदि सहित “उग्र शाकाहार” के विभिन्न उदाहरण भी सूचीबद्ध हैं।[3]
“उग्र शाकाहार” को परिभाषित करने वाला Google AI अवलोकन अपने आप में लगभग उग्रवादी है, जो शाकाहारी समुदायों को उनके मूल अधिकारों से वंचित करता है और उन्हें सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा कर डराता है। क्या Google “उग्रवादी हलाल प्रथाओं” या “उग्रवादी मांसाहार” जैसे शब्दों के लिए एक समान AI अवलोकन बनाने की हिम्मत करेगा? इसकी संभावना बहुत कम लगती है।
तो, शाकाहारियों और शाकाहार के बारे में ऐसा क्या है जो वोक, वामपंथी तंत्र से ऐसी प्रतिक्रिया को उकसाता है? शाकाहारियों का इतने बड़े पैमाने पर इस प्रकार का विकृत चित्रण क्यों किया जा रहा है, और अहिंसा और जानवरों की हत्या न करने की वकालत करने वाले समुदायों के अस्तित्व मात्र को खतरे के रूप में क्यों चित्रित किया जा रहा है?
सवाल यह है कि इस शत्रुता को क्या प्रेरित करता है और शाकाहारियों के प्रति इस तरह के वैमनस्य भाव का क्या औचित्य है? आइए अंतर्निहित कारणों को उजागर करने के लिए इस मुद्दे पर गहराई से विचार करें।
जाति के चश्मे से शाकाहार को परिभाषित करना
अपनी प्रभावशाली पुस्तक स्नेक्स इन द गंगा: ब्रेकिंग इंडिया 2.0 में राजीव मल्होत्रा और विजया विश्वनाथन ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि कैसे पश्चिमी शिक्षाविद भारत के लिए एक समान क्रिटिकल कास्ट थ्योरी का निर्माण करने के लिए क्रिटिकल रेस थ्योरी का उपयोग एक टेम्पलेट के रूप में कर रहे हैं। वे एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति को उजागर करते हैं, जहाँ भारतीय जाति व्यवस्था को नस्लवाद सहित सभी प्रकार की वैश्विक असमानताओं और भेदभाव के मूल कारण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि तथाकथित उच्च जाति के हिंदुओं को “परम उत्पीड़क” के रूप में चित्रित किया जा रहा है, इस वास्तविकता को पूरी तरह से अनदेखा करके कि सभी जातियों के हिंदुओं को ऐतिहासिक रूप से इस्लामी और यूरोपीय उपनिवेशवादियों द्वारा अधीन किया गया है।[4]
यह रणनीति वैश्विक स्तर पर हिंदुओं और हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए जाति को हथियार बनाती है। इस प्रक्रिया में, शाकाहार को भी इस पूरे प्रकरण में जबरन घसीटा गया है। भारत में कट्टरपंथी कम्युनिस्ट तंत्र ने इस विषैले आख्यान को अपनाया है, और हिंदू भोजन विकल्पों को गहन जांच और आलोचना का विषय बनाकर इसे और आगे बढ़ाया है। शाकाहारियों को उनकी आहार संबंधी प्राथमिकताओं के लिए सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जा रहा है, और शाकाहारियों के अनुकूल नीतियों को लागू करने वाले संस्थानों को वामपंथी संगठनों द्वारा धमकाया जा रहा है और उन पर इन नीतियों को रद्द करने हेतु दबाव बनाया जा रहा है। नतीजतन, शाकाहारियों को निशाना बनाना हिंदू प्रथाओं और पहचान को कमज़ोर करने का एक और साधन बन गया है।
जुलाई 2023 में, IIT बॉम्बे एक विवाद का केंद्र बन गया, जब मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि संस्थान ने शाकाहारियों के लिए अलग से खाने की जगह निर्धारित की है और मांसाहारी लोगों को उस क्षेत्र में भोजन करने की अनुमति नहीं है। IIT परिसर में एक छात्र निकाय अंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्कल (APPC) ने कथित तौर पर सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाया। APPC ने आरोप लगाया कि भले ही IIT बॉम्बे के पास शाकाहारियों के लिए अलग से क्षेत्र निर्धारित करने की कोई आधिकारिक नीति नहीं है, लेकिन कुछ लोग अपनी मर्जी से ये बदलाव कर रहे हैं और इस तरह मांसाहारी छात्र भयभीत, अपमानित और भेदभाव महसूस कर रहे हैं।[5]
यह एक बड़े विवाद में बदल गया और कई मीडिया रिपोर्टों ने IIT बॉम्बे पर “जातिवादी प्रवृत्ति” प्रदर्शित करने का आरोप लगाया। सितंबर 2023 में, संगठन ने आधिकारिक तौर पर अपने छात्रावास कैंटीन में शाकाहारियों के लिए अलग टेबल निर्धारित की।[6] हालाँकि, विवाद जारी रहा क्योंकि प्रेरित समूह आईआईटी बॉम्बे पर उच्च जातियों का गढ़ होने का आरोप लगाते रहे।
अक्टूबर 2023 में IIT हैदराबाद में भी इसी तरह का विवाद हुआ था, जब संस्थान ने अपने भोजन क्षेत्र में शाकाहारियों के लिए एक अलग खंड बनाया था। यह निर्णय एक छात्र सर्वेक्षण के बाद लिया गया जिसमें पूछा गया था कि क्या छात्र भोजन के लिए “केवल शाकाहारी” स्थान पसंद करते हैं। छात्रों की आहार संबंधी प्राथमिकताओं को समायोजित करने के उद्देश्य से लिये गये एक प्रशासनिक निर्णय को मीडिया ने इस कदर सनसनीखेज बना डाला, जिसमें संस्थान पर जातिगत विशेषाधिकार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया।[7]
जुलाई 2023 में, सुधा मूर्ति – एक शिक्षिका, लेखिका, परोपकारी और राज्यसभा सदस्य – एक साक्षात्कार में यह उल्लेख करने के बाद विवादों में घिर गईं कि वे विदेश यात्रा के दौरान अपना भोजन और खाना पकाने की चीज़ें साथ ले जाना पसंद करती हैं। उसका कारण? वह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों व्यंजनों के लिए एक ही बर्तन का उपयोग किए जाने की संभावना से चिंतित थीं। इस सरल, व्यक्तिगत पसंद को वोक मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने सनसनीखेज बना दिया, जिन्होंने उन्हें “निष्क्रिय-आक्रामक जातिवादी” करार दे दिया।[8] सुधा मूर्ति का तथाकथित “अपराध” मात्र यह था कि उन्होंने खुद को “शुद्ध शाकाहारी” के रूप में पहचाना और विदेशी रेस्तराओं में शाकाहारी भोजन के मांसाहारी व्यंजनों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तनों या कुकवेयर से दूषित होने की संभावना के बारे में खुले तौर पर अपनी चिंता व्यक्त की।
सुधा मूर्ति की हानिरहित पसंद के खिलाफ उपजा यह आक्रोश एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह केवल उनके शब्दों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने या गलत व्याख्या करने के बारे में नहीं है, बल्कि शाकाहारियों के खिलाफ अति-सतर्कता के माहौल को दर्शाता है, जहां किसी के भोजन को चुनने के बुनियादी अधिकार पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं और उस पर हमला किया जा रहा है। यह शत्रुता न केवल हास्यास्पद है; यह खतरनाक भी है, क्योंकि यह शाकाहारियों और उनकी व्यक्तिगत पसंद को कलंकित करती है, उनके आहार की सीमाओं का सम्मान करने के बजाय शाकाहारियों को उत्पीड़न के प्रतीक के रूप में पेश करती है।
शाकाहारियों को जिस तरह से बदनाम किया जा रहा है और सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जा रहा है, वह जनमत के लोकप्रिय “spiral of silence” सिद्धांत की याद दिलाता है। संक्षेप में, इस सिद्धांत का अर्थ है कि जनमत की सामान्य लहर के बारे में किसी व्यक्ति की धारणा उनके अपने विचार व्यक्त करने की इच्छा को बहुत प्रभावित करती है। यानी, अगर व्यक्ति को लगता है कि उसकी राय कुल मिलाकर अलोकप्रिय है, तो वह सचेत हो जाएगा और चुप रहना ही बेहतर समझेगा। वोक तंत्र शाकाहारी के रूप में अपनी पहचान की सार्वजनिक अभिव्यक्ति के विचार को इतना अलोकप्रिय और अवांछित बनाने पर तुला हुआ है कि शाकाहारी भी अंततः अपने निजी क्षेत्र में सिमट कर रह जाएंगे और अपनी पसंद की स्वतंत्रता का प्रयोग करने से डरने लगेंगे, यह सोचकर कि कहने कोई नाराज़ न हो जाये।
हालांकि यह सिर्फ़ शाकाहारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को चुप कराने का मामला नहीं है। शाकाहारी होने के विकल्प पर हर तरफ से ज़ोरदार हमला किया जा रहा है, जिससे वह दिन दूर नहीं है जब शाकाहारियों को अपने खानपान की परंपराओं को त्यागने और जबरन मांस खाने के लिए मजबूर किया जाएगा।
अक्टूबर 2023 में, आईआईटी बॉम्बे में समाजशास्त्र के प्रोफेसर सूर्यकांत वाघमोर ने संस्थान में शाकाहारियों के लिए अलग से भोजन स्थान आवंटित करने के बारे में बहस के संदर्भ में शाकाहारियों और उग्रवादियों (आतंकवादियों) के बीच तुलना की। वाघमोर ने कथित तौर पर द इंडियन एक्सप्रेस के लिए एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने हिंदू समुदाय, विशेष रूप से “उच्च जाति” को “उग्र शाकाहार” के लिए जिम्मेदार ठहराया था, और यह दावा किया था कि शाकाहार को जातिगत विशेषाधिकार के रूप में खाद्य प्रथाओं में पदानुक्रम और अलगाव के पारंपरिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।[9]
इस प्रकार, जाति के चश्मे से शाकाहार को समझने वाले हिंदू समुदाय को लक्षित करते हैं, जिनमें से कई “शुद्ध शाकाहारी” हैं। इस संदर्भ में “शुद्ध शाकाहारी” शब्द का अर्थ केवल शाकाहारी भोजन खाने की प्रथा से है जो मांसाहारी खाद्य पदार्थों के संपर्क में नहीं लाया गया है। लेकिन वोक लॉबी शाकाहार की परंपरा पर जबरन जातिगत विमर्श थोप इस शब्द को विकृत कर रही है।
शाकाहारियों को छोड़कर सभी को अपनी पसंद की आज़ादी
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब अपनी पसंद से जीवन जीने की आज़ादी को सर्वाधिक ज़रूरी माना जाता है (जैसा कि होना भी चाहिए)। लेकिन ज़्यादातर चीज़ों की तरह, अपनी पसंद के मुताबिक़ जीवन जीने की यह आज़ादी भी एक चेतावनी के साथ आती है। इस प्रकार की बड़ी बड़ी बातें सुनने में तो बहुत अच्छी लगती हैं लेकिन जब इन्हें वास्तविक धरातल पर क्रियान्वित करने की बात आती है तो इन मामलों में निहित पाखंड और दोगुलापन उजागर हो जाता है। क्योंकि ऐसी श्रेणियों की चुनिंदा व्याख्या की जाती है ताकि कुछ हित समूहों को अधिक से अधिक शामिल किया जा सके और दूसरों को बाहर रखा जा सके।
यह विचित्र है कि वही लॉबी जो पसंद की आज़ादी की अवधारणा को चरम स्तर पर ले जाती है जब किसी की अपनी पसंद की चीज़ खाने (हलाल मीट) या अपनी पसंद की पोशाक पहनने (हिजाब) की आज़ादी का बचाव करती है, शाकाहार को व्यक्तिगत पसंद की आज़ादी का मामला नहीं मानती। जब शाकाहार की बात आती है, तो पूरा तर्क उलट जाता है और शाकाहारी होना दूसरे के मांसाहारी भोजन खाने के अधिकार का उल्लंघन बन जाता है।
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि ज़्यादातर शाकाहारी जो सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और हमलों का सामना करते हैं, वे मांसाहारी भोजन या इसे खाने वालों के बारे में कोई नकारात्मक बयान नहीं देते हैं। वे शायद सिर्फ़ शाकाहार की सकारात्मक छवि प्रस्तुत कर रहे होते हैं (और ऐसा करना किसी भी मानक से अपराध नहीं है), इसके स्वास्थ्य लाभों को साझा कर रहे होते हैं, या इसे चुनने के अपने व्यक्तिगत कारणों की व्याख्या कर रहे होते हैं। फिर भी, अगर हम पहले बताए गए “उग्र शाकाहार” के Google AI अवलोकन पर जाएं, तो अपने आहार विकल्पों के बारे में सकारात्मक बात करने वाले शाकाहारियों को भी भेदभावपूर्ण और दमनकारी के रूप में चित्रित किया जाता है। यही कारण है कि शाकाहारियों के लिए विशेष सेवाओं पर आक्रामक हमले आम होते जा रहे हैं।
इसका एक प्रमुख उदाहरण मार्च 2024 में शुरू की गई फ़ूड डिलीवरी ऐप Zomato की पूरी तरह से शाकाहारी सेवा के खिलाफ़ प्रतिक्रिया है। यह सेवा विशेष रूप से शुद्ध शाकाहारी ग्राहकों के लिए थी, जिसमें ऐसे रेस्तराँ का चयन किया गया था जो विशेष रूप से शाकाहारी भोजन परोसते हैं, जिससे साझा बर्तनों, पैन या बर्तनों के माध्यम से मांसाहारी संदूषण का कोई जोखिम नहीं होता। इस सेवा को अलग पहचान देने के लिए, Zomato ने अपनी शाकाहारी डिलीवरी टीम के लिए हरे रंग की वर्दी निर्धारित की, जो उसके डिलीवरी कर्मियों द्वारा पहनी जाने वाली सामान्य लाल वर्दी की जगह लेती है। फिर भी, केवल आहार संबंधी प्राथमिकताओं का सम्मान करने का एक प्रयास तीव्र आलोचना का लक्ष्य बन गया, जिस पर विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया।[10]
ग्राहकों की प्रतिक्रिया के आधार पर ज़ोमैटो द्वारा लिए गए एक सीधे-सादे व्यावसायिक निर्णय को सोशल मीडिया पर तिल का ताड़ बना दिया गया। वोक नेटिज़ेंस ने कंपनी पर जातिवादी, अपमानजनक और विभाजनकारी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, मात्र इसलिए क्योंकि ज़ोमैटो ने शाकाहारियों की पसंद को ध्यान में रखकर एक अलग डिलीवरी टीम स्थापित की। वामपंथी मीडिया आउटलेट्स भी इस विवाद का फायदा उठाते हुए अपने हिंदू विरोधी, शाकाहार विरोधी बयानों को हवा देने लगे।
आखिरकार, ज़ोमैटो ने अपने शाकाहारी बेड़े के लिए “हरी वर्दी” सुविधा वापस ले ली। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस अवसर का बेसब्री से फायदा उठाया और इसे शाकाहार की “दमनकारी और उग्रवादी” प्रकृति के खिलाफ़ एक कथित जीत के रूप में पेश किया। बीबीसी ने “ज़ोमैटो: इंडिया फ़ूड डिलीवरी ऐप ने हरी वर्दी योजना वापस ली” शीर्षक से एक स्टोरी चलाई, जो उग्रवादी शाकाहार की रूढ़ियों को पुष्ट करती है। लेख में कहा गया, “भारत में, मांस खाना देश की कठोर जाति प्रथाओं से जुड़ा हुआ है। जो लोग खुद को ‘शुद्ध शाकाहारी’ बताते हैं, वे अक्सर खाना पकाने और खाने के लिए अलग बर्तन रखते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह किसी भी तरह के मांस के साथ न मिले,” शाकाहार के संदर्भ में गलत धारणाओं को बढ़ावा देते हुए और इस कथन को आगे बढ़ाते हुए कि शाकाहार स्वाभाविक रूप से जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ा हुआ है।[11]
जबकि शाकाहारियों को अपने भोजन विकल्पों पर खुलकर चर्चा करने की बुनियादी स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है, वहीं वोक मांसाहारी लोग सोशल मीडिया पर इस प्रथा को खुलेआम ट्रोल करते हैं और शाकाहारियों का मजाक उड़ाते हैं। इसका एक स्पष्ट उदाहरण जून 2024 में देखने को मिला, जब बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने खुद को जबरन वोक पुलिस की भूमिका में फ़िट बैठाते हुए एक फूड ब्लॉगर को उसके “शाकाहारी होने पर गर्व है” पोस्ट के लिए निशाना बनाया। पोस्ट में टैग न किए जाने के बावजूद, भास्कर ने ब्लॉगर को उसकी शाकाहारी जीवनशैली की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करने के लिए सार्वजनिक तौर पर शर्मिंदा किया, जिससे गर्व की हानिरहित अभिव्यक्ति सार्वजनिक उपहास का अवसर बन गई।
“मुझे शाकाहारी होने पर गर्व है। मेरी थाली आंसुओं, क्रूरता और अपराधबोध से मुक्त है”, ब्लॉगर ने लिखा था।
जवाब में, भास्कर लिखती है, “ईमानदारी से…मैं शाकाहारियों की इस आत्म-धार्मिकता को नहीं समझती। आपका पूरा आहार बछड़े को उसकी माँ का दूध न देने से बना है… गायों को जबरन गर्भवती करना और फिर उन्हें उनके बच्चों से अलग करना और उनका दूध चुराना। आप जड़ वाली सब्जियाँ खाते हैं? इससे पूरा पौधा मर जाता है! कृपया सिर्फ़ बकरीद होने की वजह से पुण्य का प्रदर्शन करने से बचें”।
सोशल मीडिया शाकाहारियों को निशाना बनाने वाली घिनौनी नफ़रत और रूढ़ियों से भरा पड़ा है। शाकाहारी भोजन में प्रोटीन की कमी जैसी गलत धारणाएँ व्यापक हैं और शाकाहारी भोजन का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता है। दाल, चावल, रोटी, सब्जियाँ और दही जैसे मुख्य शाकाहारी खाद्य पदार्थों को जबरन ग़रीबी से जोड़ा जाता है, जैसे कि मांस न खाना वित्तीय अक्षमता का संकेत हो। ऑनलाइन स्पेस ऐसी शाकाहार विरोधी रूढ़ियाँ से पटा पड़ा है। हालाँकि यह हर उदाहरण पर चर्चा करना संभव नहीं हैं, लेकिन मुख्य बात यह है कि शाकाहारियों को अक्सर उनके भोजन विकल्पों पर हमला करने वाली गलत सूचनाओं और शाकाहार-विरोधी प्रोपोगैंडा का विरोध करने के अधिकार से वंचित किया जाता है। अगर वे अपने बचाव में कुछ बोलते हैं, तो उन्हें तुरंत “उग्र शाकाहारी” करार दे दिया जाता है, जिससे खुद का बचाव करने का उनका कोई भी प्रयास विफल हो जाता है।[12]
शाकाहार विरोधी लॉबी का मुख्य निशाना है हिंदू धर्म
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हिंदू धर्म शाकाहार-विरोधी लॉबी का अंतिम लक्ष्य है। जाति-विशेषाधिकार की स्थिति से शाकाहार को जानबूझकर पेश करने के इस षड्यंत्र से हिंदू विरोधी प्रचार की बू आती है। यह इस जटिल वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करता है कि 21वीं सदी में शाकाहारी होने का हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह तेज़ी से एक जीवनशैली विकल्प बनता जा रहा है। कई हिंदू मांसाहारी हैं, जबकि कई गैर-हिंदू शाकाहार का पालन करते हैं। लेकिन वोक लॉबी तथाकथित “उग्र शाकाहार” पर नज़र रखने की आड़ में हिंदुओं को निशाना बनाना चाहती है। वोक तंत्र हिंदू जीवन शैली – त्योहारों, संस्कृति, परंपराओं आदि पर व्यवस्थित रूप से हमला कर रहा है और खान-पान की आदतों पर हमला उसी पैटर्न का एक हिस्सा है।
हिंदू धर्म अहिंसा या अहिंसा के सिद्धांतों पर ज़ोर देता है। जैसा कि प्रसिद्ध वैदिक विद्वान और लेखक डॉ. डेविड फ्रॉली ने एक लेख में कहा है कि अहिंसा और शाकाहारी भोजन लंबे समय से भारत की आध्यात्मिक परंपराओं का अभिन्न अंग रहे हैं, चाहे वह वैदिक हो, बौद्ध हो या जैन। उन्होंने आगे ज़ोर दिया कि भले ही हिंदू धर्म शाकाहार को “योगिक और आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए एक महत्वपूर्ण सहायता के रूप में” प्रोत्साहित करता है और हिंदू आश्रम और मंदिर नियमित रूप से केवल शाकाहारी भोजन परोसते हैं, हिंदू धर्म सभी स्तरों के लोगों को गले लगाता है और किसी पर शाकाहार नहीं थोपता है।
फ्रॉली आगे बताते हैं कि कैसे वामपंथी विद्वानों ने जानबूझकर हिंदू प्रथाओं के मांसाहार पक्ष पर अधिक ज़ोर दिया है, उन प्रथाओं के संदर्भ की सूक्ष्म समझ के बिना, शायद राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से। डेविड फ्रॉली ने आगे बताया कि ऋग्वेद, जो कि सबसे पुराना वैदिक ग्रंथ है, में मुख्य प्रसाद में घी, शहद, दूध, दही, अनाज आदि जैसे विभिन्न पौधे और डेरी उत्पाद शामिल हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि पौधे और डेरी उत्पादों पर ज़ोर देने के विपरीत, ऋग्वेद में वास्तविक पशु बलि के संदर्भ केवल मुट्ठी भर हैं और वे भी अत्यधिक प्रतीकात्मक हैं।[13]
सबसे महत्वपूर्ण बात, डेविड फ्रॉली ने हिंदू धर्म के अकादमिक विकृतीकरण को उजागर किया है, जिसमें वामपंथी विद्वान वैदिक ग्रंथों में मांस खाने के कुछ संभावित उदाहरणों को यादृच्छिक रूप से उठाते हैं और फिर इन उदाहरणों को बड़े पैमाने पर हिंदू विरोधी गलत सूचना और शाकाहार विरोधी प्रचार फैलाने के लिए बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं:
“ऐसी विकृतियों से निपटने के लिए, हिंदुओं को अपने धर्म को बेहतर तरीके से जानना चाहिए। उन्हें ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से हिंदू समूहों और प्रथाओं की विविधता के बारे में पता होना चाहिए। हिंदू धर्म कुल मिलाकर पवित्रता की मान्यता को बढ़ावा देता है। इसमें व्यक्तियों, संस्कृतियों, पौधों, जानवरों और प्रकृति की पूरी दुनिया के संदर्भ में जीवन की विविधता का सम्मान करना शामिल है। हिंदू शाकाहार उस मान्यता से उत्पन्न हुआ और इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।”[14]
जाने-माने लेखक स्टीफन नैप, जो खास तौर पर वैदिक संस्कृति पर अपने लेखन के लिए जाने जाते हैं, लिखते हैं कि वैदिक शास्त्रों में शाकाहार की प्रशंसा की गई है। उनका कहना है कि वैदिक ग्रंथों के गहन शोध से कई संदर्भ सामने आते हैं “जो मांसाहार और अनावश्यक पशु वध के कर्म संबंधी खतरों को स्पष्ट शब्दों में बताते हैं”। नैप इस बात पर जोर देते हैं कि वेदों में सुझाव दिया गया है कि “आध्यात्मिक और यहां तक कि भौतिक प्रगति” के लिए मांसाहार को छोड़ देना चाहिए। इस विषय पर स्टीफन नैप का विस्तृत लेखन उन लोगों के लिए एक मूल्यवान संसाधन प्रदान करता है जो इस विषय के बारे में अधिक जानना चाहते हैं। उन्होंने वैदिक शास्त्रों से बड़े पैमाने पर उद्धरण दिए हैं ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वेदों ने शाकाहारी जीवन शैली का प्रचार कैसे किया।[15]
ये उदाहरण स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि हिंदू शास्त्र शाकाहारी जीवन शैली को बढ़ावा देते हैं, यही कारण है कि शाकाहार विरोधी लॉबी इसे समस्याग्रस्त मानती है। हिंदू धर्म और उसके सिद्धांतों के साथ इसके घनिष्ठ संबंध के कारण शाकाहार को नकारात्मक माना जाता है, जिससे यह अब्राहमिक तंत्र द्वारा सिंचित जागृत विश्वदृष्टिकोण का लक्ष्य बन जाता है। विडंबना यह है कि veganism – शाकाहार का एक और भी सख्त रूप जिसमें डेरी उत्पादों को शामिल नहीं किया जाता है – उसी स्तर की आलोचना के अधीन नहीं है। वास्तव में, “vegan” होने को अक्सर “वोक” और “प्रगतिशील” के रूप में मनाया जाता है, जबकि शाकाहारी होने को “जातिवादी” और “प्रतिगामी” करार दिया जाता है। यह स्पष्ट दोहरा मापदंड इस बात पर प्रकाश डालता है कि शाकाहार को व्यवस्थित रूप से शैतानी रूप देने का उद्देश्य अंततः हिंदू धर्म और उससे जुड़ी प्रथाओं को बदनाम करना है।
निष्कर्ष
बहुत से शाकाहारी इन चिंताओं को महत्व नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अब भी अपनी मर्जी का खाना खा सकते हैं और मीडिया की बातें उनके जीवन पर असर नहीं करतीं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। शाकाहार का दानवीकरण अब नकारात्मक धारणाओं और बयानबाजी तक सीमित नहीं है – यह सक्रिय व्यवधान में बदल गया है।
जैसा कि ज़ोमैटो की शाकाहारी डिलीवरी टीम के खिलाफ़ प्रतिक्रिया और आईआईटी में शाकाहारियों के लिए अलग खाने की जगहों पर हंगामे में देखा गया है, कट्टर वामपंथी शाकाहारी समुदायों का समर्थन करने वाले बुनियादी ढाँचे को आक्रामक रूप से लक्षित कर रहे हैं। शाकाहारियों के लिए स्थापित विशेष सेवाओं पर हमला हो रहा है, और यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो यह अंततः रेस्तरां और सार्वजनिक स्थानों में शाकाहारी विकल्पों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। यह अभियान केवल शब्दों के खेल से आगे बढ़ गया है और अब शाकाहारी समुदायों की सहायता प्रणालियों को खत्म करने पर केंद्रित है, जो सीधे उनकी पसंद और जीवन शैली को प्रभावित करता है।
जुलाई 2024 में, उत्तर प्रदेश सरकार के एक निर्देश को लेकर हिंदू त्योहार कांवड़ यात्रा के दौरान एक विवाद छिड़ गया, जिसमें सभी दुकानों और भोजनालयों को अपने मालिकों और कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने की आवश्यकता थी। यह निर्णय हिंदू तीर्थयात्रियों की चिंताओं को संबोधित करने हेतु लिया गया था कि मुस्लिम स्वामित्व वाले रेस्तरां जो कि मांसाहारी व्यंजन भी परोसते हैं, वे हिंदू नामों का उपयोग करते हैं। यह देखते हुए कि कांवड़ यात्रा के तीर्थयात्री पूरी तरह से शुद्ध शाकाहारी भोजन का सेवन करने के नियमों का पालन करते हैं, इस निर्देश का उद्देश्य भक्तों के लिए पारदर्शिता सुनिश्चित करना था। लेकिन, वामपंथी-उदारवादी मीडिया ने इस मुद्दे को जल्दी ही एक बड़े विवाद में बदल दिया, और हिंदू तीर्थयात्रियों की आहार संबंधी भावनाओं का सम्मान करने के लिए लिए गए एक साधारण प्रशासनिक निर्णय को “अल्पसंख्यक उत्पीड़न”, “उच्च-जाति के विशेषाधिकार” और भी न जाने किन किन सनसनीखेज रूपों में प्रस्तुत किया गया।[16]
यदि किसी अन्य धार्मिक समुदाय के लिए ऐसा प्रशासनिक निर्णय लिया गया होता, तो संभवतः इसे उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने के उपाय के रूप में देखा जाता, और मामला बिना किसी विवाद के वहीं समाप्त हो जाता। लेकिन कांवड़ यात्रा के मामले में, नाम प्रदर्शित करने की आवश्यकता वाले निर्देश ने एक प्रतिक्रिया को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश पर रोक लगा दी।
यह स्थिति हिंदू शाकाहारियों की अनिश्चित स्थिति को उजागर करती है। अब समय आ गया है कि हिंदू यह पहचानें कि शाकाहार पर हमला सिर्फ़ खाने के विकल्पों को लेकर नहीं है – यह हिंदू धर्म, उसकी संस्कृति और उसकी परंपराओं पर व्यापक हमला है। हिंदुओं को इस तथ्य को समझना चाहिए कि शाकाहार का बचाव सिर्फ़ खान-पान की प्राथमिकताओं के बारे में नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने के बारे में है।
संदर्भ
[1] Tirupati: The famed holy sweet in an unsavoury row in India; https://www.bbc.com/news/articles/cglkenxgd5xo
[2] Chetan Bhagat’s points out sugar & animal bones amid Tirupati prasad controversy; https://www.indiatimes.com/trending/social-relevance/chetan-bhagats-points-out-sugar-animal-bones-amid-tirupati-prasad-controversy-642377.html
[3] Google AI overview; https://www.google.com/search?q=militant+vegetarianism&client=safari&sca_esv=5e54f03f1edc9c8a&sxsrf=ADLYWIKkfb7TS8K74GmJuZS8FyprcMG2Gg%3A1728282643463&source=hp&ei=E4ADZ82jGsPb1sQPwtWIsAI&iflsig=AL9hbdgAAAAAZwOOIwbliP5-8Dy667f4d61jq7tl8mt5&oq=militant%C2%A0&gs_lp=Egdnd3Mtd2l6IgptaWxpdGFudMKgKgIIADIEECMYJzIFEAAYgAQyCBAAGIAEGLEDMgoQABiABBgUGIcCMgUQABiABDIFEAAYgAQyBRAAGIAEMgUQABiABDIFEAAYgAQyBRAAGIAESJwWUABY6QtwAHgAkAEBmAGmAqABxwyqAQUwLjcuMrgBAcgBAPgBAZgCCKAC-grCAgoQIxiABBgnGIoFwgIKEC4YgAQYJxiKBcICCxAuGIAEGJECGIoFwgIKEAAYgAQYQxiKBcICERAuGIAEGLEDGNEDGIMBGMcBwgILEAAYgAQYsQMYgwHCAgsQABiABBiRAhiKBcICGRAuGIAEGEMYxwEYmAUYmQUYigUYngUYrwHCAg0QLhiABBixAxhDGIoFwgIOEC4YgAQYkQIY1AIYigXCAg4QLhiABBiRAhixAxiKBcICDRAAGIAEGLEDGEMYigXCAgsQLhiABBjHARivAZgDAJIHBzAuNi4xLjGgB6Rj&sclient=gws-wiz
[4] Snakes in the Ganga: Breaking India 2.0 by Rajiv Malhotra and Vijaya Viswanathan
[5] IIT Bombay Food Discrimination Complaint: ‘Vegetarians in IIT-Bombay blocking space in mess for themselves’ | India News – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/india/vegetarians-in-iit-bombay-blocking-space-in-mess-for-themselves/articleshow/102258907.cms
[6] Months after row, IIT-B designates six tables for vegetarians in its hostel canteen | Mumbai News – The Indian Express; https://indianexpress.com/article/cities/mumbai/months-after-row-iit-b-designates-six-tables-for-vegetarians-in-its-hostel-canteen-8959244/
[7] After Bombay, ‘ Pure Veg’ section and mess in IIT-Hyderabad; https://www.thenewsminute.com/telangana/after-bombay-pure-veg-section-and-mess-in-iit-hyderabad
[8] Sudha Murty gets trolled for carrying food during foreign visits; Here’s why | Today News; https://www.livemint.com/news/india/sudha-murty-gets-trolled-for-carrying-food-during-foreign-visits-heres-why-11690344795765.html
[9] IIT Bombay: Professor draws parallel between vegetarianism and militancy, attributes food choices to caste influences; https://organiser.org/2023/10/13/201357/bharat/iit-bombay-professor-draws-parallel-between-vegetarianism-and-militancy-attributes-food-choices-to-caste-influences/
[10] Attacking vegetarianism the latest frontier of wokeism?; https://hindupost.in/featured/attacking-vegetarianism-the-latest-frontier-of-wokeism/#
[11] Zomato: India food delivery app rolls back green uniform plan; https://www.bbc.com/news/world-asia-india-68573282
[12] ‘It appears your wisdom…’ Swara Bhasker slammed over her ‘vegetarian’ tweet – India TV; https://www.indiatvnews.com/entertainment/news/it-appears-your-wisdom-swara-bhasker-slammed-over-her-vegetarian-tweet-2024-06-17-937331
[13] Eating of Meat and Beef in the Hindu Tradition-Hindu Perspective; https://hinduperspective.com/2013/06/16/eating-of-meat-and-beef-in-the-hindu-tradition-by-david-frawley/
[14] Ibid.
[15] Vegetarianism Recommended in Vedic Scripture; https://www.stephen-knapp.com/vegetarianism_recommended_in_Vedic_scripture.htm#:~:text=By%20Stephen%20Knapp,shastras%20do%20not%20condemn%20it.
[16] Uttar Pradesh: Kanwar Yatra: Why is there a controversy over UP police’s name display rule? – The Economic Times; https://economictimes.indiatimes.com/news/india/kanwar-yatra-who-has-problems-with-up-polices-name-display-rule-and-why/articleshow/111880655.cms?from=mdr
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