लोकतंत्र संकट के दौर में: कट्टर इस्लाम से जूझता यूरोप

दशकों तक नरमी और समझौते की नीति अपनाने के बाद यूरोप अब एक कठिन हक़ीक़त का सामना कर रहा है। कट्टर इस्लामिस्ट लामबंदी के कारण जनता का असंतोष बढ़ा है, नीतियाँ बदल रही हैं और राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराया है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि शुरुआती दौर में मुख्यधारा की संस्थाएँ इस अलोकतांत्रिक सोच को चुनौती देने में विफल रहीं।
  •  सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों से लेकर संसदों में बन रहे क़ानूनों तक, यूरोप कट्टर इस्लाम के फैलाव के बीच अपने लंबे समय से चले आ रहे बहुसंस्कृतिवाद के मॉडल पर अब गंभीर पुनर्विचार कर रहा है।
  • पिछले दशक में यूरोप में चरम-दक्षिणपंथ का उभार, इस्लामिस्ट कट्टरपंथ को लेकर आम जनता की बढ़ती चिंता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
  • कट्टर इस्लाम से जुड़ी आशंकाओं को प्रभावशाली मीडिया, अकादमिक जगत और नीति-निर्माण संस्थान अक्सर “इस्लामोफोबिया” कहकर खारिज कर देते हैं, जिससे सार्थक बहस और ठोस नीतिगत सुधार दोनों ही सीमित रह जाते हैं।
  • अमेरिका भी अब ऐसी ही चुनौतियों से जूझ रहा है—अलग-थलग बसते समुदाय, शरिया जैसे सामाजिक नियमों का अनौपचारिक प्रयोग, और विश्वविद्यालय परिसरों में इस्लामिस्ट उग्रवाद के प्रति बढ़ता समर्थन।

इस्लाम-विरोधी रैलियों से लेकर कट्टरपंथ पर लगाम कसने के लिए बनाए जा रहे क़ानूनों तक, यूरोप में जनभावना और सरकारी नीतियों—दोनों में एक स्पष्ट बदलाव की लहर दिखाई दे रही है। यूरोप के कई देशों में अब उस बहुसंस्कृतिवाद के मॉडल पर खुलकर सवाल उठने लगे हैं, जो पिछले कुछ दशकों से उस की राजनीति और सांस्कृतिक जीवन को परिभाषित करता आया है। इन देशों में सरकारों से लेकर नागरिक समाज के आंदोलनों तक, यूरोप में लंबे समय से प्रचलित बहुसंस्कृतिवाद के घिसे-पिटे मॉडल की अब आलोचनात्मक समीक्षा होने लगी है। जो ढांचा कभी एक निर्विवाद नैतिक सत्य के रूप में स्वीकार किया जाता था, उसे आज सुरक्षा, सामाजिक संतुलन तथा एकता और समन्वय से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों के संदर्भ में फिर से परखा जा रहा है।

यह पुनर्मूल्यांकन यूँ ही नहीं हो रहा। यूरोप में पिछले कुछ दशकों में कट्टर इस्लामीकरण की जिस लहर ने ज़ोर पकड़ा है, उसके दुष्परिणामों को नज़रअंदाज़ करना अब मुश्किल होता जा रहा है। सार्वजनिक सड़कों पर प्रदर्शन, अलग धार्मिक संरचनाएँ और वैचारिक रूप से सीमित शहरी बस्तियाँ—इन रूपों में सामने आ रही कट्टर इस्लामी लामबंदी को अनदेखा करना अब संभव नहीं रहा। जो माँगें और व्यवहार कभी उदार लोकतंत्रों में अकल्पनीय लगते थे, वे अब सार्वजनिक जगहों और राजनीतिक बहसों का हिस्सा बन चुके हैं। इससे यह सवाल गहराता जा रहा है कि कुछ वैचारिक आंदोलन लोकतांत्रिक मूल्यों, लैंगिक समानता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ भला कितने संगत हैं। यदि यूरोपीय समाज समय रहते सचेत हो जाता तो इस कट्टरवादी ज़हर को समाज में फैलने से रोका जा सकता था। लेकिन यूरोपीय समाज व राजनीति मल्टीकल्चरालिज़्म का राग अलापते रहे और इन इस्लामिक कट्टरपंथी ताक़तों के विस्तार को नज़रअंदाज़ करते रहे। इसका परिणाम यह निकला कि इस्लामिस्ट कट्टरपंथ ने समाज में अपने गहरी जड़ें जमा लीं, और सांस्कृतिक समरसता के नाम पर यूरोप के सभ्यतागत अस्तित्व की पूरी नींव ही हिला कर रख दी।

आज जब यूरोप अपनी लापरवाही के दुष्परिणामों से जूझ रहा है, तब अमेरिका भी कुछ इसी प्रकार के रास्ते पर बढ़ता दिख रहा है। जिन शुरुआती चेतावनियों को यूरोप में बरसों पहले देखा गया था, वे अब अमेरिकी शहरों, विश्वविद्यालय परिसरों और राजनीतिक विमर्श में उभरने लगी हैं। यूरोप का अनुभव किसी भी राष्ट्र और समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है: जब वैचारिक कट्टरता को सहिष्णुता के नाम पर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, तो किसी भी समाज को उसकी बहुत भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के प्रचार-प्रसार पर आँख मूँद लेने से मात्र सामाजिक सौहार्द ही ख़तरे में नहीं पड़ता, बल्कि पूरे समाज की ही नींव हिल जाती है। इससे धार्मिक ध्रुवीकरण का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है और संस्थागत ढाँचे चरमरा जाते हैं।

इस्लामोफोबिया बना जाँच से बचने की ढाल

यूरोप भर में “इस्लामोफोबिया” का आरोप अब मात्र भेदभाव से बचाव का औज़ार भर नहीं रहा, बल्कि यह कट्टर इस्लामिस्ट विचारधारा की जांच-पड़ताल से बचने की एक भाषाई ढाल बनता जा रहा है। उग्रवाद, समानांतर क़ानूनी व्यवस्थाओं, और वैचारिक ज़ोर-ज़बरदस्ती को लेकर उठने वाली चिंताओं को अक्सर मुस्लिम-विरोधी भावना के रूप में चित्रित किया जाता है। इससे एक तरफ़ आम मुसलमानों की सुरक्षा और दूसरी तरफ़ अलोकतांत्रिक राजनीतिक आंदोलनों की समीक्षा—इन दोनों के बीच का फर्क धुंधला पड़ जाता है। इस तरह की पूर्वाग्रह-ग्रसित लेबलिंग ने सार्वजनिक बहस की गुंजाइश को सीमित कर दिया है और नीति-निर्माताओं, पत्रकारों व शिक्षाविदों को गंभीर संवाद से दूर रखा है।

नतीजतन, मीडिया, विश्वविद्यालयों और थिंक टैंकों में राजनीतिक इस्लाम की आलोचना को अक्सर अपने-आप ही संदिग्ध मान लिया जाता है। इसके उलट, जो आंदोलन खुले तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देते हैं, वे भी प्रायः कठोर जाँच से बच निकलते हैं। कट्टर इस्लामीकरण पर किसी भी प्रकार की असहमति को अक्सर “दक्षिणपंथी” या “इस्लामोफोबिक” कहकर खारिज कर दिया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि ठोस और तथ्यपरक आलोचना के लिए लगभग कोई जगह नहीं बचती, और कट्टर तत्व सार्वजनिक जवाबदेही से बाहर रह जाते हैं। कट्टरपंथ से टकराने के लिए आवश्यक सकारात्मक और ईमानदार बहस को आगे बढ़ाने के बजाय, यह विमर्श अक्सर उसे ढकने और निष्क्रिय करने का काम करता है।

इसके राजनीतिक नतीजे बेहद गंभीर रहे हैं। संस्थागत हिचक और चुप्पी के कारण जनता का असंतोष बढ़ता गया, और इसी खालीपन में वे प्रतिक्रियावादी ताक़तें मज़बूत होती चली गईं जो मुख्यधारा की बहस से बाहर रखे गए मुद्दों को अपना आधार बनाकर जनसमर्थन जुटाती हैं। सामाजिक एकता को मज़बूत करने के बजाय, “इस्लामोफोबिया” के नाम पर खेले गए इस विक्टिम कार्ड ने पूरे यूरोप में ध्रुवीकरण को तेज़ किया, नीतिगत जड़ता को बढ़ाया, और जनता व लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच विश्वास की कड़ी को कमजोर किया।

इस्लामिक कट्टरपंथ और यूरोप की बदलती राजनीतिक ज़मीन

पिछले एक दशक में यूरोप में दक्षिणपंथी ताक़तों के तेज़ उभार को अगर गहराई से देखा जाए, तो हम पायेंगे कि उसके सीधे तार कट्टर इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से जुड़ते दिखाई देते हैं।

यूरोप में राजनीतिक इस्लाम का फैलाव अब लगातार चर्चा का विषय बन चुका है, खासकर उसके उन रूपों के कारण जो लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ सहज नहीं बैठते और कई बार टकराव या आक्रामक रवैया अपनाते हैं। इसी वजह से बहुलतावाद, सामाजिक एकीकरण, सुरक्षा और बहुसंस्कृतिवाद को लेकर सवाल उठने लगे हैं। बीते वर्षों में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं जिन्होंने इन चिंताओं को और गहरा किया है। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठित नेटवर्कों की बढ़ती मौजूदगी, जिन्हें अक्सर शिक्षित प्रवासी समुदायों का समर्थन मिलता है, इसका एक उदाहरण है। इसके साथ ही, कुछ यूरोपीय मुसलमानों के अल-क़ायदा और ISIS जैसे अंतरराष्ट्रीय जिहादी संगठनों से जुड़ने के प्रमाण भी सामने आए हैं। इन सब कारणों से कट्टर इस्लाम के राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले असर को लेकर आम लोगों की बेचैनी बढ़ी है।

राजनीतिक इस्लाम की बढ़ती मौजूदगी ने पहचान, सामाजिक एकजुटता, कट्टरपंथ और बाहरी वैचारिक प्रभाव से जुड़े कई ऐसे सवालों को भी उजागर किया है, जिनका समाधान अब तक नहीं हो पाया है। जब मुख्यधारा की राजनीति इन मुद्दों पर साफ़ और असरदार जवाब देने में नाकाम रही, तो लोगों का असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिक्रिया में बदलने लगा। इसी माहौल में चरम-दक्षिणपंथी दलों ने खुद को उन कुछ गिनी-चुनी आवाज़ों के रूप में पेश किया, जो अप्रवासन, सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता जैसे मुद्दों पर खुलकर बात करने को तैयार हैं। नतीजतन, राष्ट्रवादी और अप्रवासन-विरोधी मंचों को समर्थन मिलने लगा—इसलिए नहीं कि लोग चरमपंथ की ओर झुकना चाहते थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगने लगा था कि मौजूदा नीतियाँ और ढाँचे इन चुनौतियों से निपटने में असफल रहे हैं[1]

यहाँ ग़ौर करने लायक़ बात यह है कि मीडिया संस्थानों, अकादमिक हलकों और नीति-थिंक टैंकों द्वारा तैयार किए गए शोध और विमर्श का एक बड़ा हिस्सा यूरोप में “दक्षिणपंथ” के उभार पर तो खूब चिंता जताता है,[2] [3] लेकिन पिछले एक दशक में पूरे यूरोप में कट्टर इस्लामिक उग्रवाद और आतंकवाद में जो चौंकाने वाली बढ़ोतरी देखने को मिली है, उसे लेकर  चुप्पी साधे रहता है। इसी तरह, जिस प्रकार से कई यूरोपीय सरकारें कट्टर इस्लामीकरण के इस दौर में भी खुल्लम खुल्ला इस्लामिक तुष्टिकरण की नीति अपनाती दिखाई दे रही हैं और इस समस्या का सीधे-सीधे सामना करने से कतराती हैं, उसे लेकर भी कोई चर्चा नहीं होती। इसके बजाय, यह सारा विमर्श बस कट्टर इस्लामीकरण की आलोचना करने वाली किसी भी आवाज़ पर निशाना साधने पर केंद्रित है। राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखने वाली अलग-अलग आवाज़ों—यहाँ तक कि इस्लामवाद के मुख्यधारा के आलोचकों—को भी  “चरम-दक्षिणपंथी” की उसी घिसी पिटी श्रेणी में समेट दिया जाता है। यही नहीं, इस्लामवाद के आलोचकों के सरोकारों को सीधे-सीधे इस्लामोफोबिया लेबल कर खारिज कर दिया जाता है।

यूरोप की मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीति में अप्रवासन-विरोधी आंदोलन एक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, और उनका ध्यान मुख्य रूप से मुस्लिम अप्रवासन पर केंद्रित रहता है। यह रुख़—चाहे पूरी तरह तथ्यात्मक हो या कहीं-कहीं बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया—इस धारणा से पैदा होता है कि कुछ प्रवासी समुदायों और कट्टर इस्लामिस्ट विचारधाराओं या नेटवर्कों के बीच संबंध हैं। “इस्लामीकरण” कहे जाने वाले इस चलन के ख़िलाफ़ सार्वजनिक विरोध लगभग एक दशक से दिखाई दे रहा है। मसलन, फ़रवरी 2016 में कई यूरोपीय शहरों में एक ही बैनर तले आयोजित इस्लाम-विरोधी रैलियों के तहत हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे थे[4] इनमें जर्मनी का पेगिडा आंदोलन सबसे प्रमुख आयोजकों में शामिल था, जिसने ड्रेसडेन में भारी भीड़ जुटाई और एम्स्टर्डम, डबलिन तथा प्राग जैसे शहरों में भी इसी तरह के प्रदर्शनों को प्रेरित किया।

यूरोप भर में फैलते इस्लाम-विरोधी प्रदर्शन

सितंबर 2025 में लंदन में बड़े पैमाने पर हुए अप्रवासन-विरोधी प्रदर्शनों ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। ‘यूनाइट द किंगडम’ रैली—जिसका आयोजन यूके के दक्षिणपंथी कार्यकर्ता और इस्लाम-विरोधी अभियानकर्ता टॉमी रॉबिन्सन ने किया था—में अनुमानतः लाखों के आसपास भीड़ उमड़ी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह संख्या क़रीब 1.1 लाख से 1.5 लाख के बीच बताई गई। प्रदर्शन के दौरान पुलिस से झड़पें भी हुईं, जिनमें कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट, लात-घूंसे और बोतलें फेंके जाने की घटनाएँ सामने आईं। रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने खुले तौर पर इस्लाम-विरोधी नारे भी लगाए[5]

इन प्रदर्शनों के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए, जिनमें ब्रिटिश झंडे थामे कुछ प्रदर्शनकारी इस्लाम और “अल्लाह” को लेकर अपमानजनक नारे लगाते दिखे[6] द जेरूसलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रदर्शनकारियों के हाथों में इज़रायली और अमेरिकी झंडे भी थे, और कई लोग MAGA टोपी पहने हुए थे। बताया गया कि इन प्रदर्शनों के दौरान अमेरिकी कन्सेर्वटिव एक्टिविस्ट चार्ली किर्क की हत्या पर शोक भी व्यक्त किया गया[7]

2025 के दौरान आयरलैंड में भी इस्लाम-विरोधी और अप्रवासन-विरोधी प्रदर्शनों की एक शृंखला देखने को मिली, जो अप्रवासन, अपराध और सांस्कृतिक एकीकरण को लेकर बढ़ते तनाव को दर्शाती है। जुलाई में, लगभग 100 प्रदर्शनकारी सेंट्रल डबलिन स्थित जनरल पोस्ट ऑफिस के बाहर एकत्रित हुए। उनके हाथों में आयरिश झंडे थे और वे एक मुहर्रम जुलूस के विरोध में नारेबाज़ी कर रहे थे[8]

जून में हालात और भी अधिक गंभीर हो गए, जब उत्तरी आयरलैंड के बैलीमीना शहर में उस समय प्रदर्शन भड़क उठे, जब एक 14 वर्षीय लड़के को एक किशोरी के यौन उत्पीड़न के प्रयास के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। रिपोर्टों में इस मामले को एक प्रवासी समुदाय से जोड़ा गया। शुरुआती विरोध जल्द ही हिंसक अशांति में बदल गया। लगातार तीन रातों तक नक़ाबपोश समूहों ने गाड़ियों और घरों को आग के हवाले कर दिया, जिसके बाद बड़े पैमाने पर पुलिस कार्रवाई करनी पड़ी। मीडिया कवरेज में इन घटनाओं को ज़्यादातर “दंगे” बताया गया, जबकि वरिष्ठ क़ानून-व्यवस्था अधिकारियों ने इस हिंसा की निंदा करते हुए इसे आपराधिक और नस्लीय रूप से प्रेरित बताया। इन तमाम घटनाओं ने आयरलैंड में अप्रवासन, सामाजिक एकजुटता, और सार्वजनिक भरोसे से जुड़े मुद्दों की विस्फोटक संवेदनशीलता को उजागर किया[9]

इसी तरह के प्रदर्शन अगस्त 2024 में उत्तरी आयरलैंड में भी हुए थे। उस समय मीडिया रिपोर्टों में “इस्लाम-विरोधी” झुकाव और भी ज़्यादा स्पष्ट बताया गया, जब हिंसक प्रदर्शनकारियों ने मुस्लिम स्वामित्व वाली दुकानों में तोड़फोड़ की और यहाँ तक कि एक मस्जिद को भी निशाना बनाया[10]

आयरलैंड में इस्लाम-विरोधी भावनाओं में आई तेज़ी को केवल स्थानीय प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे कट्टर इस्लाम के बढ़ते प्रभाव के व्यापक संदर्भ में समझना ज़रूरी है—ख़ास तौर पर राज्य-समर्थित फ़िलिस्तीन समर्थक एक्टिविज़्म और इज़राइल-विरोधी बयानबाज़ी के संदर्भ में, जो कई बार यहूदी-विरोध (एंटीसेमिटिज़्म) की सरहद छूती नज़र आती है। द जेरूसलम पोस्ट में हाल ही में प्रकाशित एक लेख आयरलैंड के राजनीतिक नेतृत्व में तथाकथित रूप से मौजूद यहूदी-विरोधी झुकाव की आलोचना करता है। लेख में आयरलैंड के प्रधानमंत्री माइकल मार्टिन द्वारा इज़राइल की बार-बार निंदा किए जाने का ज़िक्र है, और इस बात की ओर भी इशारा किया गया है कि जब उन इज़राइली नागरिकों की सामूहिक हत्याओं की आलोचना की बात आती है जिन्हें यहूदी होने के कारण निशाना बनाया गया, तो प्रधानमंत्री चुप्पी साध लेते हैं। आगे यह तर्क दिया गया है कि आयरिश राजनीति, मीडिया और अकादमिक जगत के कुछ हिस्सों ने कट्टर इस्लामिस्ट उग्रवाद को हल्का दिखाकर या उसे परोक्ष रूप से उचित ठहरा कर, एंटीसमिटाइज़म यानी घोर यहूदी-विरोध को जायज़ ठहराने के लिए ठोस ज़मीन तैयार की है। लेख का दावा है कि हमास को अक्सर गंभीर जांच के दायरे से बाहर रखा जाता है, और उसे मुख्यतः एक राजनीतिक “प्रतिरोध आंदोलन” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे उसके आतंकवाद के रिकॉर्ड पर पर्दा पड़ जाता है। लेख आगे कहता है कि यह रुझान व्यापक स्तर पर, कट्टर इस्लामिक विचारधारा का सीधे सामना करने से बचने की मानसिकता को दर्शाता है[11]

पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में क़ुरान जलाने से जुड़े प्रदर्शन और रैलियाँ तेज़ी से बढ़े हैं[12]—यहाँ तक कि डेनमार्क ने इन्हें प्रतिबंधित करने के लिए क़ानून तक बना डाला[13] [14] [15] [16] इसके बावजूद, यूरोप आज भी इस दुविधा से जूझ रहा है कि क्या ब्लास्फ़ेमी क़ानून को पुनः लागू किया जाए, या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जाए। जुलाई 2023 में संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद ने क़ुरान जलाने की निंदा करते हुए इसे धार्मिक घृणा का कृत्य बताया था। लेकिन ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों सहित कुल बारह देशों ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया। उनका तर्क था कि ऐसे प्रस्ताव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित अंकुश लगा सकते हैं[17]

यूरोप भर में इस्लाम-विरोधी प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या के पीछे मुख्य वजह कट्टर इस्लाम के तेज़ी से फैलते प्रभाव को लेकर जनता की गहरी चिंता है—और उससे जुड़े अपराधों तथा सामाजिक अव्यवस्थाओं को लेकर भी। ये प्रदर्शन किसी एक घटना के परिणामस्वरूप आई प्रतिक्रिया नहीं हैं, बल्कि ये उन घटनाक्रमों की एक लंबी शृंखला के फलस्वरूप उपजे उस असंतोष को दर्शाते हैं, जो आम नागरिक के मन-मस्तिष्क में घर कर चुका है। यूरोपीय देशों के आम नागरिकों का मानना है कि राजनीतिक और संस्थागत सत्ता ने इन घटनाक्रमों को या तो ठीक से समझा नहीं, या समय रहते इन्हें गंभीरता से संबोधित नहीं किया। आम जनता के इस बढ़ते असंतोष के पीछे कुछ प्रमुख कारण साफ़ तौर पर दिखते हैं:

  • इस्लामिस्ट विचारधारा के नाम पर किए गए संगठित आतंकी हमले और अकेले हमलावरों (लोन-वुल्फ) द्वारा किए गए टेरर अटैक्स, जिनका निशाना अक्सर आम नागरिक और सार्वजनिक स्थान रहे हैं।
  • महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराध—जिनमें यूके के कुख्यात पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग कांड जैसे हाई प्रोफाइल मामले शामिल हैं—जिसने क़ानून-व्यवस्था और बाल-सुरक्षा तंत्र की गंभीर विफलताओं को उजागर किया।
  • इस्लामिक राजनीतिक पहचान के आक्रामक सार्वजनिक प्रदर्शन का बढ़ता ट्रेंड—जिसमें यूरोप के कुछ हिस्सों में ख़िलाफ़त की खुली माँग और शरिया क़ानून लागू करने की बातें तक शामिल हैं।
  • यूरोपीय राजनीति और नागरिक समाज में राजनीतिक इस्लाम की बढ़ती मौजूदगी—जहाँ राजनीतिक, अकादमिक और एक्टिविस्ट मंचों पर हमास-समर्थक गतिविधियाँ आम होती जा रही हैं, और यहूदी-विरोधी तथा इज़राइल-विरोधी भाषा को धीरे-धीरे सामान्य मान लिया गया है।

इन सभी कारणों ने मिलकर जनता के भीतर के ग़ुस्से और भय को हवा दी है। ऐसे में इस्लाम-विरोधी प्रदर्शन खुद को कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ प्रतिरोध, संस्थागत जड़ता के विरोध और लोकतांत्रिक व सामाजिक मूल्यों के क्षरण के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में सामने ला रहे हैं।

कट्टर इस्लामिक उग्रवाद पर सख़्ती

जनता के बढ़ते असंतोष ने यूरोपीय सरकारों को अब या तो ठोस और निर्णायक कदम उठाने के लिए मजबूर किया है, या कम से कम यह दिखाने के लिए कि वे आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपना रही हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अप्रवासन, सुरक्षा और सांस्कृतिक समन्वय को लेकर यूरोप का समग्र दृष्टिकोण अब धीरे-धीरे बदल रहा है।

अप्रैल 2024 में जर्मन सरकार ने हैम्बर्ग में हुई एक इस्लामिस्ट रैली के बाद असामान्य रूप से सख़्ती दिखाई। इस रैली में ख़िलाफ़त की स्थापना और शरिया क़ानून लागू करने की माँग की गई थी। उस समय के चांसलर ओलाफ़ शोल्त्स ने स्पष्ट किया कि इस्लामिस्ट गतिविधियों से निपटने के लिए संवैधानिक राज्य की पूरी शक्ति का इस्तेमाल किया जाएगा, और कट्टरपंथी विचारधारा की पैरवी के क़ानूनी नतीजों पर ज़ोर दिया[18] पिछले कुछ वर्षों में जर्मनी ने कई इस्लामिक संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाया है—जिन पर ईरान से कथित संबंध रखने, महिला-विरोधी कट्टर रुख़ अपनाने, ख़िलाफ़त की माँग करने, और इज़राइल-विरोधी घृणा फैलाने के आरोप लगे हैं[19] [20]

जुलाई 2021 में ऑस्ट्रिया ने आतंकवाद से निबटने के लिए एक कड़ा क़ानून लागू किया, जिसके अन्तर्गत ISIS और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे उग्रवादी संगठनों पर राज्य की निगरानी बढ़ा दी गई। इस प्रकार से ऑस्ट्रिया औपचारिक रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बना। इसके साथ ही कट्टरपंथ पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाए गए—जिनमें धार्मिक सेवाएँ कराने वाले इमामों के लिए अनिवार्य सरकारी पंजीकरण जैसी शर्तें भी शामिल हैं[21]

यूके सरकार ने हाल ही में मुस्लिम ब्रदरहुड को कड़ी निगरानी के दायरे में रखा है, और मौजूदा आतंक-रोधी क़ानूनों के अन्तर्गत उस पर प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है। द नेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार “इस्लामोफोबिया” की आधिकारिक परिभाषा अपनाने के सवाल पर भी जानबूझकर अस्पष्ट रुख़ बनाए रखने के मूड में है। इसके पीछे यह चिंता बताई जा रही है कि ऐसी परिभाषा व्यवहार में ब्लास्फ़ेमी क़ानून को लागू करने का रास्ता खोल सकती है[22]

इसी बीच, यूरोप के कई देश यहूदी-विरोध (एंटीसेमिटिज़्म) को लेकर बढ़ती आशंकाओं के चलते फ़िलिस्तीन-समर्थक एक्टिविज़्म पर कड़ी पाबंदियाँ लगा रहे हैं। अप्रैल 2024 में जर्मन पुलिस ने ‘पैलेस्टाइन कांग्रेस’ को बंद कर दिया, क्योंकि आयोजकों पर आरोप था कि उन्होंने इज़राइल पर 7 अक्टूबर को हुए हमास के हमलों से खुद को स्पष्ट रूप से अलग नहीं किया। हालाँकि बाद में एक अदालत ने इस कार्रवाई को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया[23] फ़्रांस में 2023 के दौरान सरकार ने फ़िलिस्तीन-समर्थक प्रदर्शनों पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया था कि उनसे हिंसा और यहूदी-विरोधी उकसावे का ख़तरा है[24] आगे चलकर 2025 में फ्रांसीसी सरकार ने 2023 में गठित ‘अर्जांस पैलेस्टीन’ नामक संगठन को भंग करने का आदेश दिया। सरकार का कहना था कि यह समूह हिंसा भड़काने, सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देने, और यहूदी-विरोध को हवा देने में अहम भूमिका निभा रहा था[25]

कट्टर इस्लामिक सांस्कृतिक प्रभाव को नियंत्रित करता यूरोप

हिजाब, बुर्क़ा और नक़ाब जैसे इस्लामिक प्रतीकों पर सार्वजनिक स्थानों में प्रतिबंध लगाने का मुद्दा यूरोप की सबसे विवादास्पद नीतिगत बहसों में शामिल है। ऐसी पाबंदियाँ लगाने की सरकारी कोशिशों पर अक्सर इस्लामोफोबिया और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। फ़्रांस उन शुरुआती यूरोपीय देशों में रहा है, जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर नक़ाब और बुर्के के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया। हालाँकि फ़्रांस का यह प्रतिबंध सर्वव्यापी नहीं है, लेकिन यह कई सार्वजनिक संस्थानों पर लागू होता है—जिनमें सरकारी स्कूल भी शामिल हैं, जहाँ कथित तौर पर 2023 से हिजाब और अबाया के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाए गया है। जब अप्रैल 2025 में खेल प्रतियोगिताओं में महिला खिलाड़ियों के सिर ढकने पर रोक लगाने वाला एक प्रस्तावित क़ानून ज़बरदस्त विवाद का कारण बना, तो यह मुद्दा एक बार फिर सुर्ख़ियों में आया। हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार फ़्रांस के प्रधानमंत्री ने खुद को इस प्रस्ताव से अलग रखा[26]

अक्टूबर 2025 में इटली की सत्तारूढ़ पार्टी ने सार्वजनिक स्थानों पर नक़ाब और बुर्के के प्रयोग पर व्यापक प्रतिबंध लगाने के लिए एक विधेयक पेश किया। ‘ब्रदर्स ऑफ़ इटली’ पार्टी ने इसे इस्लाम से जुड़े, तथाकथित “सांस्कृतिक अलगाववाद” से निपटने की एक बड़ी कोशिश के तौर पर प्रस्तुत किया। प्रस्तावित क़ानून का उल्लंघन करने पर €300 से €3,000 तक के जुर्माने का प्रावधान है। साथ ही इसमें मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर कुछ कड़े प्रावधान भी शामिल किए गए हैं—जैसे कौमार्य परीक्षण पर दंड, जबरन विवाह के लिए सख़्त सज़ा, और धार्मिक दबाव को prosecution यानी अभियोजन का स्पष्ट आधार माना जाना।

सिर्फ़ पहनावे तक सीमित न रहते हुए, यह विधेयक कट्टरपंथ और संभावित आतंकी संबंधों पर भी निशाना साधता है। इसमें उन धार्मिक संगठनों के लिए सख़्त वित्तीय पारदर्शिता की शर्तें रखी गई हैं, जिनका इटालियन राज्य के साथ कोई औपचारिक समझौता नहीं है। इसके अलावा, ऐसे इस्लामिक समूहों पर भारी जुर्माने का प्रावधान भी प्रस्तावित है जो ऐसी संस्थाओं से चंदा लेते पाए जाएँ, जिन्हें बुनियादी स्वतंत्रताओं या राज्य की सुरक्षा के ख़िलाफ़ सिद्धांतों को बढ़ावा देने वाला माना जाता है[27]

बहुसंस्कृतिवादी राजनीति की जड़ता

विरोध की बढ़ती लहर के बावजूद, बहुसंस्कृतिवाद और इस्लामोफोबिया पर अत्यधिक ज़ोर अब भी कट्टर इस्लामिस्ट विचारधाराओं की गंभीर जांच में बाधा बना हुआ है। पश्चिमी देशों में जैसे-जैसे मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ा है, वैसे-वैसे इस्लामिस्ट मुद्दे मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश करते गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि कट्टर तत्वों को “इस्लामोफोबिया-विरोधी” विमर्श की सुरक्षा-ढाल के भीतर रहकर यूरोपीय राजनीति को निरंतर प्रभावित करने का अवसर मिला।

ब्रिटिश लेखक और टिप्पणीकार डगलस मरे अपनी पुस्तक The Strange Death of Europe: Immigration, Identity, and Islam में 1990 के दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों तक यूरोप में कट्टर इस्लाम के प्रति चली आ रही राजनीतिक तुष्टिकरण की प्रवृत्ति का विस्तार से विश्लेषण करते हैं। वे राजनीतिक इस्लाम के उभार को दर्ज करते हुए यह भी दिखाते हैं कि बड़े पैमाने पर मुस्लिम अप्रवासन के सांस्कृतिक और सुरक्षा-संबंधी परिणामों को लेकर यूरोपीय सरकारें किस तरह से दुविधा और टालमटोल का रवैया अपनाती रहीं। बड़े आतंकी हमलों और गंभीर अपराधों के उदाहरणों के ज़रिये मरे उस मीडिया–राजनीतिक माहौल की आलोचना करते हैं, जिसने अक्सर इस्लामिस्ट ख़तरों को कम करके दिखाया, और उलटा इन ख़तरों के प्रति सरकार व समाज को सचेत करने वाली आवाज़ों को ही हाशिए पर धकेल दिया। वे लिखते हैं:

मुख्यधारा के राजनेताओं और मीडिया के बड़े हिस्से ने—2000 के दशक तक और उसके दौरानअसल में यह माहौल बना दिया कि यूरोप में जो लोग आग लगी हैचिल्ला रहे थे, वही असली आगज़नी करने वाले हैं। जो लोग सवाल उठाते थे, उन्हें चुप कराने की कोशिशेंचाहे हिंसा के ज़रिये, डराने-धमकाने से या अदालतों के माध्यम सेइस कदर सफल रहीं कि रुश्दी प्रकरण के तीन दशक बाद यूरोप में शायद ही कोई ऐसा बचा था, जो ऐसा उपन्यास लिखने, संगीत रचने या यहाँ तक कि कोई ऐसा चित्र बनाने का भी साहस करता जिससे मुस्लिम नाराज़गी का माहौल बने। उलटा, लोग बिलकुल विपरीत दिशा में भागने लगे। राजनेता और लगभग हर कोई यह दिखाने में लगा रहा कि वे इस्लाम की कितनी अधिक प्रशंसा करते हैं।[28]

डेनमार्क द्वारा क़ुरान जलाने पर सज़ा देने के लिए ब्लास्फ़ेमी क़ानून को दोबारा लागू करना,[29] दरअसल उसी कट्टरपंथी भयावह समाज के दुःस्वप्न की ओर इशारा करता है, जिसके बारे में डगलस मरे चेतावनी देते आए हैं।

अमेरिका के लिए सबक

आज अमेरिका उसी मोड़ पर खड़ा दिखता है, जहाँ यूरोप एक दशक या उससे भी पहले पहुँच चुका था। देश भर में अलग-थलग बसे मुस्लिम इलाकों की संख्या बढ़ने के साथ यह चिंता गहराने लगी है कि अगर समय रहते ठोस क़दम नहीं उठाए गए, तो कट्टर बस्तियों का ख़तरा वास्तविक बन सकता है—जहाँ समानांतर सामाजिक और क़ानूनी ढाँचे जड़ जमा लें।

इसका एक प्रमुख उदाहरण टेक्सास में प्रस्तावित वह परियोजना है, जो ईस्ट प्लानो इस्लामिक सेंटर से जुड़ी बताई जाती है। पहले यह ‘एपिक सिटी प्रोजेक्ट’ के नाम से जानी जाती थी। हालाँकि बाद में इसका नाम बदलकर “द मीडो हिल” रख दिया गया। यह योजना राज्य सरकार की कड़ी निगरानी के दायरे में रही और इस को लेकर कई स्तरों पर जाँच शुरू हुई—यहाँ तक कि धार्मिक भेदभाव के आरोपों के बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने इस प्रोजेक्ट की आपराधिक जाँच भी की। स्थानीय समुदायों और राजनीतिक नेतृत्व ने इस परियोजना का ज़ोरदार विरोध किया। आलोचकों ने इसे एक प्रस्तावित “मुस्लिम शहर” बताया, और यह आशंका जताई कि इसमें गैर-मुसलमानों को बाहर रखा जा सकता है, साथ ही शरिया मानकों को अनौपचारिक रूप से लागू किया जा सकता है। सितंबर 2025 में टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबट ने इस प्रस्तावित टाउनशिप को रोकने के लिए क़ानून पर हस्ताक्षर किए। उनका तर्क साफ़ था—टेक्सास संविधान के अन्तर्गत धार्मिक स्वतंत्रता को अलगाववाद का ज़रिया नहीं बनने दिया जा सकता[30] [31] [32]

सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणीकार अमेरिका में शरिया मानकों और कट्टर इस्लामिस्ट विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को लेकर खुलकर चिंता जता रहे हैं। मीडिया और थिंक टैंकों की रिपोर्टों में यह आशंका भी सामने आई है कि देश के कुछ हिस्सों—ख़ासकर नॉर्थ टेक्सास में—अनौपचारिक शरिया अदालतों के सक्रिय होने की संभावना है। आलोचकों का मानना है कि मिशिगन के डियरबॉर्न सरीखे इलाक़ों में, जहाँ मुस्लिम आबादी का बहुमत है, गैर-मुसलमान धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। कट्टर इस्लाम के आलोचक इस प्रवृत्ति को कुछ विवादास्पद फ़ैसलों से जोड़कर देखते हैं—जैसे सड़कों के नाम ऐसे लोगों के नाम पर रखे जाना, जिनका संबंध उग्रवादी मुद्दों से जोड़ा जाता है।

सार्वजनिक तौर पर इन बदलावों को “समावेशन” और “धार्मिक समायोजन” की भाषा में पेश किया जाता है, लेकिन आलोचकों की नज़र में यह समानांतर क़ानूनी और सांस्कृतिक मानकों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया है। 2023 में मिनियापोलिस अमेरिका का पहला बड़ा शहर बना, जहाँ दिन-रात किसी भी समय सार्वजनिक रूप से इस्लामिक कॉल टू प्रेयर प्रसारित करने की अनुमति दी गई। इसके बाद 2025 की शुरुआत में इलिनॉय ने सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में शरिया-अनुरूप भोजन अनिवार्य करने की नीति अपनाई, जिससे धर्मनिरपेक्ष शासन और नागरिक तटस्थता को लेकर बहस और तेज़ हो गई।[33]

ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ते यहूदी-विरोध से जुड़े हमास-समर्थक नेटवर्कों और प्रदर्शनों पर लगाम कसने की दिशा में बहुत से ठोस कदम उठाये हैं। लेकिन इसके बावजूद कट्टर इस्लाम से जुड़े व्यापक ख़तरे को अब भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है। राजनीतिक वामपंथ और दक्षिणपंथ—दोनों के प्रभावशाली हलकों में मौजूद कुछ हितधारकों और इस्लामिस्ट तत्वों के बीच बनता गठजोड़ इस्लामिस्ट कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ चल रहे इस संघर्ष में हासिल की गयी बढ़त को अक्सर काफ़ी हद निष्प्रभावी कर देता है।

समापन

कट्टर इस्लाम को लेकर यूरोप में चल रही यह आत्ममंथन की प्रक्रिया उदार लोकतंत्रों के सामने खड़ी एक बड़ी सभ्यतागत चुनौती की ओर इशारा करती है। इस्लामिक कट्टरपंथ को संबोधित करने को लेकर इन देशों की सरकारें और नागरिक समाज बरसों तक संकोच और अपराध भाव से ग्रस्त रहे। बरसों की इस अकर्मण्यता के पीछे कई कारण रहे – कहीं एक समुदाय विशेष को नाराज़ करने का डर, तो कहीं वैचारिक निष्क्रियता। इसका परिणाम यह निकला कि अलोकतांत्रिक आंदोलनों को लोकतांत्रिक समाजों के भीतर जड़ें जमाने का भरपूर अवसर प्राप्त हो गया। आज जो प्रतिक्रिया सार्वजनिक प्रदर्शनों और नीतिगत बदलावों के रूप में दिख रही है, वह असहिष्णुता की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि बरसों की संस्थागत विफलताओं का एकाएक विस्फोट है।

यूरोप का अनुभव अमेरिका के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है: सहिष्णुता के नाम पर किसी भी संवेदनशील मुद्दे की गंभीर जाँच को टालने की प्रवृत्ति आने वाले समय में घातक साबित हो सकती है। इस लापरवाही के ऐसे भयावह दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, जिन्हें शायद किसी भी क़ीमत पर पलटा न जा सके। धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का अर्थ यह कदापि नहीं है कि लोकतांत्रिक मानकों को ताक पर रख दिया जाये, या क़ानून के सामने समानता के सिद्धांत से समझौता कर लिया जाए। बहुलतावादी समाजों की टिकाऊ मजबूती अंततः इसी पर निर्भर करती है कि वे आस्था और विचारधारा, समायोजन और आत्मसमर्पण, समावेशन और ज़ोर-ज़बरदस्ती—इनके बीच स्पष्ट और मज़बूत सीमा रेखाएँ खींचने का साहस रखते हैं या नहीं।

सन्दर्भ सूची

[1] Political Islam in Europe: Challenges and Implications | ISPI;  https://www.ispionline.it/en/publication/political-islam-in-europe-challenges-and-implications-203300

[2] Contemporary manifestations of violent right-wing extremism in the EU: An overview of P/CVE practices;     https://home-affairs.ec.europa.eu/system/files/2021-04/ran_adhoc_cont_manif_vrwe_eu_overv_pcve_pract_2021_en.pdf

[3] The Rise of Far-Right Violence in Europe by the European Liberal Forum Publications;    https://liberalforum.eu/wp-content/uploads/2023/01/WEBSITE-2022-The-Rise-of-Far-Right-Violence-in-Europe.pdf

[4] Thousands march across Europe in anti-Islam rallies | The Times of Israel;   https://www.timesofisrael.com/thousands-march-across-europe-in-anti-islam-rallies/

[5] ‘Unite the Kingdom’: Massive anti-immigration protests rock London; cops ‘assaulted with kicks, punches’ – All you need to know – The Times of India;  https://timesofindia.indiatimes.com/world/uk/unite-the-kingdom-massive-anti-immigration-protests-rock-london-cops-assaulted-with-kicks-punches-all-you-need-to-know/articleshow/123877599.cms

[6] ‘Who The F*ck Is Allah?’ VIDEO Shows British Patriots Chanting Anti-Islamic Slogans at Tommy Robinson’s London Rally;  https://www.freepressjournal.in/world/who-the-fck-is-allah-video-shows-british-patriots-chanting-anti-islamic-slogans-at-tommy-robinsons-london-rally

[7] Over 100,000 protest against immigration, Islam in London | The Jerusalem Post; https://www.jpost.com/international/article-867320

[8] Protest against annual Islamic procession disrupts traffic in Dublin city centre – The Irish Times;  https://www.irishtimes.com/ireland/dublin/2025/07/04/protest-against-annual-islamic-procession-disrupts-traffic-in-dublin-city-centre/

[9] How a Northern Irish town descended into 3 days of anti-immigrant violence | CBC News;   https://www.cbc.ca/news/world/north-ireland-riots-1.7558861

[10] N. Ireland violence shocks Muslims and stokes fears over sectarian divides; https://www.france24.com/en/live-news/20240811-n-ireland-violence-shocks-muslims-and-stokes-fears-over-sectarian-divides

[11] Ireland extended arm to terrorism, granted Hamas legitimacy | The Jerusalem Post;   https://www.jpost.com/opinion/article-873029

[12] Two protesters burn Quran outside Iraqi embassy in Denmark | Islamophobia News | Al Jazeera; https://www.aljazeera.com/news/2023/7/24/two-protesters-burn-quran-outside-iraqi-embassy-in-denmark

[13] Denmark passes law to ban Quran burnings; https://www.bbc.com/news/world-europe-67651580

[14] Man who burned Quran ‘shot dead in Sweden’; https://www.bbc.com/news/articles/cpdx2wqpg7zo

[15] Quran-burning provocateur Salwan Momika deported from Norway, handed over to Sweden;  https://www.aa.com.tr/en/europe/quran-burning-provocateur-salwan-momika-deported-from-norway-handed-over-to-sweden/3190219

[16] Quran burnt, thrown from moving vehicle outside mosque in Germany | Daily Sabah;   https://www.dailysabah.com/world/europe/quran-burnt-thrown-from-moving-vehicle-outside-mosque-in-germany

[17] European states vote against Quran burning UN resolution | Euronews;   https://www.euronews.com/2023/07/12/european-states-vote-against-quran-burning-un-resolution

[18] German Chancellor Scholz says Islamist rally will be met with ‘consequences’ | Euronews;  https://www.euronews.com/my-europe/2024/04/30/german-chancellor-scholz-says-islamist-rally-will-be-met-with-consequences

[19] Germany bans Muslim group citing ‘extremism’, ties to Iran and Hezbollah | Hezbollah News | Al Jazeera; https://www.aljazeera.com/news/2024/7/24/germany-bans-muslim-group-citing-extremism-ties-to-iran-and-hezbollah

[20] Germany bans Muslim group accused of advocating caliphate – Europe – The Jakarta Post;   https://www.thejakartapost.com/world/2025/11/05/germany-bans-muslim-group-accused-of-advocating-caliphate.html

[21] Austria bans Muslim Brotherhood and sets new standard in the fight against Islamist extremism –  EU Policies; https://eu-policies.com/news/austria-bans-muslim-brotherhood-sets-new-standard-fight-islamist-extremism/

[22] Muslim Brotherhood under ‘close review’ for UK ban | The National;    https://www.thenationalnews.com/news/uk/2025/12/05/muslim-brotherhood-under-close-review-for-uk-ban/

[23] Berlin shutdown of pro-Palestine conference was unlawful, court rules | Israel-Palestine conflict News | Al Jazeera;  https://www.aljazeera.com/news/2025/11/26/germanys-shutdown-of-pro-palestine-conference-to-be-challenged-in-court

[24] France bans all pro-Palestinian protests | CNN; https://edition.cnn.com/2023/10/12/europe/france-ban-pro-palestinian-intl

[25] French pro-Palestinian group contests government decision to shut it down | Reuters;   https://www.reuters.com/world/europe/french-pro-palestinian-group-contests-government-decision-shut-it-down-2025-05-09/

[26] France moves closer to a total ban on hijabs – Hyphen; https://hyphenonline.com/2025/04/15/france-hijab-muslim-headscarves-total-ban-sport/

[27] Why Italy wants to ban Islamic face coverings, religious funding – Firstpost;   https://www.firstpost.com/explainers/italy-islamic-face-coverings-religious-funding-burqa-ban-bill-13940727.html

[28] The Strange Death of Europe: immigration, identity and Islam by Douglas Murray, Chapter 9 – Early Warning Sirens

[29] Denmark passes law to ban Quran burnings; https://www.bbc.com/news/world-europe-67651580

[30] North Texas Mosque’s EPIC City project gets a new name | KERA News;  https://www.keranews.org/business-economy/2025-11-10/east-plano-islamic-center-epic-city-meadow

[31] Planners scramble to rebrand  1,000-home ‘Muslim city’ project | US | News | Express.co.uk; https://www.express.co.uk/news/us/2142030/epic-muslim-city-project-sparks-uproar-the-meadow

[32] Abbott signs bill aimed at blocking Epic City Project in Collin County – NBC 5 Dallas-Fort Worth;  https://www.nbcdfw.com/news/local/abbott-signs-bill-aimed-at-blocking-epic-city-project-in-collin-county/3917877/

[33] Policy Brief: The Threat of Radical Islam and Sharia Law | The Center for Renewing America;    https://americarenewing.com/issues/policy-brief-the-threat-of-radical-islam-and-sharia-law/

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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