सूफ़ीवाद का पर्दाफाश: रहस्यवाद के पीछे छुपा राजनीतिक एजेंडा

सूफ़ी रहस्यवाद कैसे हमारी आँखों में धूल झोंककर अपनी इस्लामी विचारधारा फैलाता है
  • सूफ़ीवाद का एक सोच-समझकर तैयार किया गया संस्करण समाज के सामने प्रस्तुत किया गया है, जिसमें इसकी इस्लामी कट्टर विचारधारा को छिपाया गया है।
  • सभी को प्यार का संदेश देने वाले सूफ़ियों की जो छवि बनाई गई है, उसके विपरीत, सूफ़ियों की गहरी पक्षपाती सोच और जिहाद में उनकी सक्रिय भागीदारी की सच्चाई उजागर होती है।
  • बॉलीवुड, जो आपराधिक और राजनीतिक प्रभावों के अधीन है, सूफ़ी तत्वों का आदर्शीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे सूफ़ी विचारधारा की व्यापक स्वीकृति को बढ़ावा मिलता है।
  • भारत में सूफ़ीवाद की ‘सॉफ़्ट पावर’ का रणनीतिक उपयोग रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को सुगम बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे जनसांख्यिकी और राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
  • हिंदू समाज में यह जागरूकता लाने की तत्काल आवश्यकता है कि सूफ़ी उद्योग की धोखाधड़ी को पहचाना जाए और भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित किया जाए।

“गलत और सही के विचारों से परे, एक मैदान है, मैं वहां मिलूंगा। जब आत्मा उस घास पर लेट जाती है, तो दुनिया इतनी भरी होती है कि बात करने के लिए कुछ बचता ही नहीं।”

रूमी का यह वाक्य बहुत प्रसिद्ध है। यह वाक्य तेहरवीं  सदी के सूफ़ी संत रूमी की बहुत सी सूक्तियों में से एक है जिन्हे गूढ़ और आध्यात्मिक सूक्तियां कहा जाता है, और मन को सांत्वना देने वाला कहा जाता है।[1] जब आप इस उद्धरण को पढ़ते और समझते हैं, तो दिल का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है, और आप इसे दूसरों के साथ साझा करते हैं, इस उम्मीद में कि यह उनकी भी मदद करेगा।

लेकिन सूफियों का यह खेल आपकी आँखों में धूल झोंकने और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा को छिपाने के लिए रचा गया है।

आज रूमी पश्चिम में सबसे अधिक उद्धृत किए जाने वाले भविष्यवक्ता बन गए हैं, और उनकी कविताएँ बेस्टसेलर सूची में जगह बनाती हैं। अशांत समय में, उन्हें शांति और सुलह के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। अगर आपको पता चले कि रूमी के विचार, जिन्हें आप पढ़ते हैं, इस्लामी कट्टरता से साफ कर दिए गए हैं? और वह सूफ़ीवाद, जिसकी आप प्रशंसा करते हैं, दरअसल एक कट्टरपंथी विचारधारा को छिपाने का साधन है?[2]

सूफ़ीवाद का असली मतलब ‘ऊन’ से है, जिसे इस्लामी साधक पहनते थे। वही ऊन आज आपकी आँखों के आगे पर्दा बन कर सूफ़ीवाद की वास्तविकता से अनभिज्ञ बना रहा है।

रूमी की व्यावसायिक प्रस्तुतीकरण (Mass Marketing)

रूमी की प्रसिद्ध सूक्ति को थोड़ा नजदीक से देखने पर और ही तस्वीर सामने आती है: “कुफ़्र (अधर्म) और ईमान (धर्म) से परे एक रेगिस्तानी मैदान है, उस मध्य स्थान पर हमारी इच्छाएं हावी रहती हैं / जब ज्ञानी वहाँ पहुँचता है, तो वह झुकता है, वहाँ न तो कुफ़्र है, न इस्लाम, और उस स्थान में कोई जगह नहीं बचती।”[3] अचानक यह वही सूक्ति अब उतनी अच्छी नहीं लगती क्योंकि असली सूक्ति में “सही” और “गलत” का कोई उल्लेख नहीं है, बल्कि इस्लामी उच्चता की विचारधारा से भरा हुआ है।

अब प्रश्न यह है कि यह धोखा कैसे हुआ और किसने किया? रूमी के वास्तविक विचारों के अनुवाद हमेशा उपलब्ध थे। लेकिन कौन समझदार व्यक्ति इस्लामिक महिमामंडन के इन छंदों पर लट्टू हो सकता था? परंतु फिर आता है कोलमैन बार्क्स – एक हताश कवि जिसे किसी ने भी घास नहीं डाला। तब उन्होंने रूमी के अनुवादों का सहारा लिया, और वो भी बिना फारसी, इस्लाम या सूफ़ीवाद का एक भी शब्द समझे। उन्होंने उपलब्ध अंग्रेजी अनुवादों को लिया, उनमें से सारी कट्टरता और इस्लामी संदर्भ हटा दिए, और एक सुंदर और आकर्षक रूप से रूमी को प्रस्तुत किया, जो पश्चिम में बढ़ते पॉप-फिलॉसफी के पाठकों को लुभा सके। जल्द ही यह नया परिष्कृत और सजा धजा रूमी इतना प्रसिद्ध हो गया कि फैशनेबल पार्टियों में चर्चा का विषय बन गया, और कोलमैन बार्क्स नए युग के एक महान कवि  कहलाने लगे। उन्होंने इस संस्करण से लाखों कमाए, खुद को एक सूफ़ी विद्वान के रूप में स्थापित किया, ढेर सारी नकली कविताओं की किताबें बेचीं, बहुत से भाषण दिए, और यहां तक कि तेहरान विश्वविद्यालय से एक मुफ़्त की डॉक्टरेट भी प्राप्त ली।

रूमी हिंदुओं को हमेशा बदसूरत, काले और अशुभ मानते थे, और उन्होंने बार-बार हिंदुओं की तुलना गंदे काले कुत्ते से की है। हिंदुओं के साथ-साथ, रूमी ने अश्वेतों और यहूदियों के प्रति भी वही घृणा दिखाई।

अब सोशल मीडिया के आगमन के बाद, कई फारसी विद्वान सामने आकर बार्क्स और उनके विचारों को चुनौती दे रहे हैं, और अनजाने में रूमी का असली चेहरा उजागर कर रहे हैं। आपको यह जान शायद हैरानी होगी कि वह रूमी जो विभिन्न धर्मों के महान समन्वयक और सार्वभौमिक भाईचारे के प्रचारक माने जाते हैं, वो हिंदुओं को हमेशा बदसूरत, काले और अशुभ मानते थे, और उन्होंने बार-बार हिंदुओं की तुलना गंदे काले कुत्ते से की है। हिंदुओं के साथ-साथ, रूमी ने अश्वेतों और यहूदियों के प्रति भी वही घृणा दिखाई। उन्होंने एक के बाद एक पंक्तियाँ लिखी हैं कि कैसे दर्पण उनकी कुरूपता को प्रतिबिंबित करेंगे, जबकि तुर्क अपनी सुंदरता को उस प्रतिबिंब में देखेंगे। असलियत यह भी है कि रूमी ने पूरे गैर-इस्लामी विश्व को एक अंधकारमय हिंदुस्तान माना, जिसे नष्ट किया जाना चाहिए। “हिंदू के रंग में, साबुन और काले क्षार के बीच क्या अंतर है?” रूमी का यह नस्लवाद, जिसे सार्वभौमिक प्रेम के रूप में छुपाया गया है, उनकी सूफ़ी कथाओं में स्पष्ट रूप से लिखा गया है। और एक और शेर में रूमी ने सूफ़ी-प्रेमी भारतीयों के लिए ये भी संदेश दिया: हिंदू सभी गधे हैं, क्योंकि वे कभी विदेश नहीं गए और खुद को सुधार नहीं पाए।[4]

लेकिन इससे पहले कि आप रूमी को खारिज करें और सारी गलती कोलमैन बार्क्स पर डालें, यह देखना जरूरी हो जाता है कि भारत में जन्मी सूफ़ीवाद की असलियत क्या है। ईस के लिए हमें कुछ बड़े सूफ़ी नामों और उनकी कार्यप्रणाली का अध्ययन करना होगा।

सूफ़ीवाद का धोखा

सुफ़ीवाद फारस में उत्पन्न हुआ और 11वीं सदी से भारत में फैलता गया। इस में चिश्तिया, नक़्शबंदिया, क़ादिरिया, और सुहरवर्दिया जैसे विभिन्न संप्रदाय भारत के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय थे।[5] मूल रूप से सूफीवाद और इस्लाम मे कभी कोई अंतर नहीं था, और न ही आज है। सच यही है कि सूफ़ी लोग इस्लामी कानून का कट्टरता से पालन करते हैं और विभिन्न इस्लामी न्यायशास्त्र और धर्मशास्त्र के विद्यालयों से जुड़े होते हैं। बस इसमे गाने और नाचने का थोड़ा स तड़का लगा दिया गया है।

सूफ़ीवाद इस्लाम की एक रहस्यवादी धार्मिक परमपरा के रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है 18वीं सदी के ओरिएंटलिस्ट विद्वानों को, जिन्होंने इसे इस्लाम की नीरसता से हटकर एक बौद्धिक सिद्धांत और साहित्यिक परंपरा के रूप में पेश किया। इन विद्वानों ने ऐसा क्यों किया, इसका उत्तर तो वही दे सकते हैं, पर सूफी विचारधारा का असली रूप कुछ प्रसिद्ध सूफियों की करतूतों के अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है।

“…सूफ़ी सैयद अली हमदानी ने कश्मीर में उतरते ही सबसे पहला काम हिंदू मंदिरों को गिराना किया, ताकि वह वहाँ एक खानकाह बना सकें, जहाँ वे नमाज़ अदा करते थे।”

सूफ़ी सैयद अल हमदानी: कश्मीर को अक्सर सूफ़ी प्रभाव का केंद्र बताया जाता है और इसे महान सूफ़ी सैयद अल हमदानी की भूमि के रूप में वर्णित किया जाता है। ये और बात है कि हमदानी एक फारसी थे और उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल कुछ बार कश्मीर का दौरा किया, वह भी मुश्किल से एक या दो वर्षों के लिए। इस महान सूफ़ी ने कश्मीर में उतरते ही उन्होंने सबसे पहले हिंदू मंदिरों को गिराकर वहाँ अपनी नमाज़ पढ़ने के लिए एक खानकाह बनवाई। हमदानी ने इस्लामी रूढ़िवादिता को लागू करने के लिए कड़ी मेहनत की, यहाँ तक कि आम लोगों और शासकों के पहनावे को बदलने की कोशिश की। परंतु  दुर्भाग्य से वह कभी अपनी कठोर विचारधारा को पूरी तरह लागू नहीं कर सके। हमदानी इस बात से बहुत निराश थे कि कश्मीर में मुस्लिम क़ाज़ी, धर्मशास्त्री, आम लोग और यहाँ तक कि शासक भी अपनी पारंपरिक हिंदू प्रथाओं का पालन कर रहे थे। अंत में हमदानी कश्मीर से निराश होकर भाग गए।[6]

“इस्लाम का सम्मान कुफ्र और काफ़िरों का अपमान करने में है। जो काफ़िरों का सम्मान करता है, वह मुसलमानों का अपमान करता है” – सूफ़ी अहमद सिरहिंदी

अहमद सिरहिंदी: प्रसिद्ध नक़्शबंदी सूफ़ी सिरहिंदी को भारत में इस्लाम के ‘पुनरुद्धारक’ के रूप में भी वर्णित किया जाता है, और जिनसे नक़्शबंदी सूफ़ियों के विभिन्न उपसंप्रदाय अपनी आध्यात्मिक परंपरा का संबंध जोड़ते हैं। वह मुगल सम्राट अकबर के युग के सबसे प्रभावशाली सूफ़ियों में से एक थे, और उनके पत्रों से हिंदुओं के प्रति उनकी कट्टर नफरत का पता चलता है, जिन्हें वे कुत्ता मानते थे। अपने एक पत्र में वे जोर देते हैं, “इस्लाम का सम्मान कुफ्र और काफ़िरों का अपमान करने में है। जो काफ़िरों का सम्मान करता है, वह मुसलमानों का अपमान करता है।” उनकी प्रसिद्ध नारा था: “शरीअत को तलवार के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है”। उन्होंने अकबर से हिंदुओं पर जिजिया कर फिर से लागू करने की अपील की, क्योंकि उनके अनुसार, जिजिया का असली उद्देश्य काफ़िरों को अपमानित करना और डराना था ताकि वे अच्छे कपड़े न पहनें या शानो-शौकत से न जी सकें। “उन्हें हमेशा डर और कांपते रहना चाहिए। इसका उद्देश्य उन्हें तिरस्कार में रखना और इस्लाम की प्रतिष्ठा और शक्ति को बनाए रखना है।” वह तब आगबबूला हो गए जब अन्य सहिष्णु संतों ने यह उपदेश दिया कि राम, अल्लाह और कृष्ण समान रूप से ईश्वर के नाम हैं, और जब उन्होंने आम मुसलमानों को हिंदू देवताओं की पूजा करते या दिवाली जैसे हिंदू त्योहार मनाते देखा, जिसे उन्होंने ‘कुफ्र और शिर्क’ कहा, तो उन्होंने क्रोध व्यक्त किया। जी हाँ, सूफ़ी सहिष्णुता और प्रेम की यही सच्चाई है। होना तो यह चाहिए था की सिरहिंदी को स्वतंत्र भारत में इतिहास की कब्र में दफना दिया जाता, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत में सत्ता पर काबिज छद्म-धर्मनिरपेक्ष वामपंथियों ने उन्हें एक महान हस्ती के रूप में महिमामंडित किया। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भी उनकी किताब “तज़किरा” प्रकाशित की, जिसमें सिरहिंदी को एक सूफ़ी नायक के रूप में दर्शाया गया।[7]

चिश्ती सूफी: यदि भारत की मानसिकता का सबसे ज्यादा नुकसान किसी ने किया है तो वो हैं चिश्तिया संप्रदाय के सूफी। चिश्तिया सूफ़ियों ने निज़ामुद्दीन औलिया के तहत इस्लामी सत्ता के आँख और कान के रूप में भी काम किया, जिन्होंने अपने कई अनुयायियों को हिंदुओं के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए विभिन्न दिशाओं में भेजा।

निज़ामुद्दीन औलिया अपने विभिन्न उपदेशों में नियमित रूप से हिंदुओं को नर्क की आग में जलने का श्राप देते थे, “मृत्यु के समय अविश्वासी को सज़ा का सामना करना पड़ेगा। उसने (अल्लाह) स्वर्ग और नर्क को आस्तिकों और अविश्वासियों (क्रमशः) के लिए बनाया है, ताकि दुष्टों को उनके कर्मों का बदला दिया जा सके।” औलिया ने केवल जिहाद के लिए अविश्वासियों से युद्ध करने की शिक्षा नहीं दी, बल्कि वे अपने अनुयायियों के साथ इसे वास्तविक रूप से करने के लिए भारत आए। जब काज़ी मुग़ीसुद्दीन ने दक्षिण भारत में मलिक काफूर के नेतृत्व में छेड़े गए जिहाद में विजय की संभावना के बारे में पूछा, तो औलिया ने आत्मविश्वास से जवाब दिया, “यह विजय क्या है? मैं और भी अधिक विजयों का इंतजार कर रहा हूँ।” औलिया जिहाद अभियानों में लूटी गई संपत्तियों से प्राप्त उपहारों को स्वीकार करने में भी हिचकिचाते नहीं थे, जो सुल्तान अलाउद्दीन ने भेजे थे, और उन्होंने गर्व से उन उपहारों को अपनी खानकाह (धर्मशाला) में प्रदर्शित किया। दुर्भाग्य की बात है कि आज इस कट्टरपंथी की दरगाह दिल्ली में एक प्रमुख पूजा स्थल के रूप में स्थित है, और उनके सम्मान में पास के रेलवे स्टेशन का नाम भी रखा गया है।

ख्वाजा (मुईनुद्दीन चिश्ती) के अनुयायी हर दिन एक गाय को एक प्रसिद्ध मंदिर के पास लाते थे, जहाँ राजा और हिंदू पूजा करते थे, उसे मारकर उसके मांस से कबाब बनाते थे – जाहिर तौर पर हिंदू धर्म के प्रति उनकी घृणा को दिखाने के लिए।

सूफ़ी इतिहास में अगले नंबर पर आता है ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का नाम, जो निज़ामुद्दीन औलिया के बाद भारत के दूसरे सबसे प्रमुख सूफ़ी संत थे, जिन्होंने हिंदू धर्म और उसकी प्रथाओं के प्रति गहरी घृणा दिखाई। अजमेर के अनासागर झील के पास पहुंचने पर, उन्होंने कई मूर्ति मंदिर देखे और अल्लाह और उनके पैगंबर की मदद से उन्हें नष्ट करने का संकल्प लिया। वहाँ बसने के बाद, ख्वाजा के अनुयायी हर दिन एक गाय को एक प्रसिद्ध मंदिर के पास लाते थे, जहाँ राजा और हिंदू पूजा करते थे, उसे मारते थे और उसके मांस से कबाब बनाते थे – जाहिर तौर पर हिंदू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए। चिश्ती भी अपने शिष्यों के साथ काफिरों के खिलाफ जिहाद लड़ने के लिए भारत आए थे और सुल्तान मोहम्मद गौरी के साथ युद्ध में भाग लिया, जिसमें हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान को अजमेर में हराया गया था। अपनी जिहादी जोश में, चिश्ती ने इस विजय का श्रेय खुद को दिया, कहते हुए, ‘‘हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जीवित पकड़ लिया और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया।”

चिश्तियों की कट्टरता के सभी सबूतों के बावजूद, उनका समूह आज भी हिंदुओं के खिलाफ जिहाद छेड़े हुए है, और हाल ही में अजमेर दरगाह की देखभाल करने वाले ख्वाजा परिवार के कुछ युवा चिश्तियों को सैकड़ों हिंदू लड़कियों को फंसाने, छेड़छाड़ करने और ब्लैकमेल करने के आरोप में पकड़ा गया।[8]

विडंबना यह है कि, यह सब सार्वजनिक जानकारी होने के बावजूद, अनगिनत हिंदू अभी भी चिश्ती की दरगाह पर जाने के लिए कतार में खड़े होते हैं, यह जाने बिना कि उनकी कब्र एक प्राचीन महादेव मंदिर पर खड़ी है। न सिर्फ कब्र, बल्कि दरअसल पूरा परिसर उन हिंदू और जैन मंदिरों के अवशेषों पर बनाया गया है, जिन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया था।

आमिर खुसरो: ये निज़ामुद्दीन औलिया के एक विशेष शिष्य थे, जिन्हें मध्यकालीन भारत के सबसे महान उदार सूफ़ी कवि के रूप में सराहा जाता है। खुसरो को कथित तौर पर भारत के सबसे बड़े कवि, भारतीय शास्त्रीय संगीत के संस्थापक, क़व्वाली (सूफ़ी भक्ति संगीत) के निर्माता और तबला (एक भारतीय ढोल) के आविष्कारक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है। खुसरो की वास्तविक विरासत उनकी संकीर्णता है, जिसमें वह मुसलमान योद्धाओं द्वारा हिंदू बंदियों के बर्बर कत्लेआम का वर्णन करते हुए अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।[9]

1303 में चित्तौड़ की विजय के दौरान खिज्र खान द्वारा 30,000 हिंदुओं के नरसंहार के आदेश का वर्णन करते हुए, वह खुशी से चिल्लाते हैं: “अल्लाह का शुक्र है! उन्होंने सभी हिंदू सरदारों का इस्लाम की सीमा से बाहर, अपने काफ़िरों को मारने वाली तलवारों से कत्ल करने का आदेश दिया… इस ख़लीफ़ा के नाम पर, कि इस देश में असमान्यता के लिए कोई अधिकार नहीं है।” दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर को मलिक काफ़ूर द्वारा नष्ट किए जाने और वहाँ के हिंदुओं और उनके पुजारियों के भयानक कत्लेआम का कवि आनंद के साथ वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा, “…ब्राह्मणों और मूर्तिपूजकों के सिर उनके गले से नाचते हुए उनके पैरों पर गिर गए, और खून की धाराएँ बह निकलीं।”[10] विडंबना है कि आज के दिन खुसरो की कट्टरपंथी नफरत को सार्वभौमिक प्रेम और भाईचारे की श्रद्धांजलि के रूप में अमर बना दिया गया है। उनकी हिंदुओं के धर्मांतरण पर आधारित रचना “चाप तिलक सब छीनी… मोसे नैना मिलाइके,” जो बॉलीवुड और अन्य संगीत कार्यक्रमों में धूमधाम से प्रस्तुत की जाती है।[11]

सूफ़ीवाद का बॉलीवुडीकरण

भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद सूफ़ीवाद के इस ढोंग का पर्दाफाश होना चाहिए था, और देश को अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में काम करना चाहिए था। दुर्भाग्य से, भारत के लिए यह वामपंथी-उदारवादी थे जिन्होंने पचास और साठ के दशक में मीडिया, शिक्षा और सांस्कृतिक केंद्रों पर नियंत्रण कर लिया, यह सुनिश्चित करते हुए कि हिंदू पहचान को कमजोर किया जाता रहे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद – जो एक कट्टरपंथी इस्लामी थे और मध्यम मार्गी होने का दिखावा करते थे, भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने, और भारत के वास्तविक इतिहास और सनातनी पहचान को मिटाने का कार्य पूरी तरह से शुरू हो गया, ताकि एक नया ‘गंगा-जमुनी’ धर्मनिरपेक्ष गणराज्य स्थापित किया जा सके, और इस प्रक्रिया में मुगलों, आक्रमणकारियों और सूफ़ियों के सभी काले कृत्यों को सफेद किया जा सके।[12]

इस निष्फल समन्वयवाद को बढ़ावा तब और तीव्र हुआ जब वामपंथ ने साठ के दशक में भारतीय फिल्म उद्योग पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार भारत और हिंदुओं के लिए एक नई पहचान स्थापित करने का दौर शुरू हुआ, जिसमें कट्टर हिंदुओं को खलनायक के रूप में और इस्लामी लोगों को उदार के रूप में दिखाया गया। फिल्मी संगीत में सूफ़ी गीत या सूफ़ी तत्वों वाली कविताएँ लगभग हर एल्बम में सर्वव्यापी हो गईं। उर्दू भाषा और उर्दू शेर-ओ-शायरी (कविता) बॉलीवुड संगीत की पहचान बन गई, जबकि शुद्ध हिंदी शब्दों और भाषा का उपयोग केवल हास्य गीतों या मजाकिया स्थितियों में किया गया।

अस्सी और नब्बे के दशक में, बॉलीवुड पाकिस्तान से संचालित दाऊद इब्राहिम गिरोह के चंगुल में था। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि ज्यादातर सांप्रदायिक पाकिस्तानी गीत लोकप्रिय हिंदी गानों में शामिल हो गए। नुसरत फ़तेह अली खान, अपनी सूफ़ी एल्बमों के साथ, हिंदी संगीत उद्योग में एक बड़ा नाम बन गए, जिनके गीतों में हिंदू-मुस्लिम प्रेम का समन्वय था, जैसे “तुम मुसलमान हो। काफ़िरों को अपने घरों में मत घुसने दो। वे तुम्हारा धर्म छीन लेंगे।”[13] धर्मांतरण की प्रशंसा करने वाले गीत, जैसे खुसरो का ‘चाप तिलक,’ नियमित रूप से टेलीविज़न चैनलों पर प्रसारित होते थे, जो सूफ़ीवाद के रूप में लव-जिहाद गतिविधियों को मुख्यधारा में लाने और उन्हें तर्कसंगत बनाने का प्रयास करते थे।

इस प्रष्ठभूमि के होते यह कोई आश्चर्य नहीं है कि केरल से आज भी ऐसे वायरल वीडियो आते हैं, जहाँ मुस्लिम लड़कियाँ हिंदू सहपाठियों की बिंदी हटाकर उन्हें हिजाब पहनाती हैं।[14]

आखिर सूफ़ीवाद को मुख्यधारा में क्यों लाया गया?

सवाल यह है: इस झूठ और सफेदी से किसको लाभ मिल रहा है? परंतु इसी के साथ यह भी प्रश्न आता है कि इस सुंदर सूफ़ी कविताओं का आनंद लेने में हर्ज ही क्या है?

इसका जवाब समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि सूफ़ी ‘सॉफ़्ट पावर’ दुनिया भर में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव की एक गंभीर सच्चाई को छुपाती है। अगर आप शरणार्थियों के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो पाएंगे कि इस्लामी देश दुनिया की आबादी का केवल 23% हिस्सा हैं, लेकिन वे दुनिया के शरणार्थियों का बहुत बड़ा हिस्सा उत्पन्न करते हैं।[15] इसे इन देशों में चल रहे संघर्ष और युद्ध का परिणाम कहा जा सकता है, लेकिन इन आंकड़ों का भारत जैसे देशों में उपयोग उनके आंतरिक विस्थापन के मुद्दों को ढकने के लिए किया जाता है। भारत पर म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों को स्वीकार करने का दबाव लगातार डाला जाता है, जबकि कश्मीर और अब पश्चिम बंगाल के स्थानीय शरणार्थी संकट को नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह तब है जब भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन या 1967 के शरणार्थी प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, जो उसे शरणार्थियों को मान्यता देने के लिए बाध्य करता हो।[16]

भारत में पहले से ही विभिन्न शरणार्थी समूह हैं, जैसे बांग्लादेश के चिटगांव से बौद्ध चकमा, नेपाल से भूटानी, म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमान, और सोमालिया, सूडान तथा अन्य अफ्रीकी देशों के छोटे समूह। फिर भी भारत पर और अधिक शरणार्थियों, खासकर रोहिंग्या को स्वीकार करने का दबाव है। क्यों? सरल शब्दों में, थोड़े से बदले हुए जनसांख्यिकी ने पश्चिम बंगाल में एक राजनीतिक दल, टीएमसी, को बड़ी चुनावी जीत दिलाई। इस्लामिक जनसांख्यिकी वामपंथ के लिए चुनावी राजनीति में सबसे सुरक्षित दांव बन गई है। यही कारण है कि सूफ़ी सिद्धांत के नाम पर सार्वभौमिक प्रेम और धर्मनिरपेक्षता का प्रचार किया जा रहा है, ताकि हिंदू विरोध को कमजोर किया जा सके। सूफ़ीवाद पर दशकों से हो रहा जोर इस्लामिक धर्मांतरण के कारोबार में सकारात्मक परिणाम दिखा रहा है।

इस लेख के समाप्त होने से पहले मौलाना कलीम सिद्दीकी का भी किस्सा सुन लीजिए। सिद्दीकी वो इंसान है जिसे हाल ही में उत्तर प्रदेश की एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) ने मुज़फ्फरनगर से सबसे बड़े धर्मांतरण सिंडिकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया। यह धोखेबाज़ हर दिन 15 हिंदुओं का धर्मांतरण करता है और अब तक लगभग पांच लाख हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित कर चुका है। वह गरीब और अनजान लोगों के लिए दो उपकरणों का उपयोग करता है – जन्नत का लालच और नर्क की आग का डर। लेकिन उसकी खासियत है ऊँची जाति की लड़कियों को फँसाना। और यह काम उसके लिए आसान है क्योंकि “हिंदू प्रेम के इतने भूखे हैं। सबसे कट्टर हिंदू भी आपका हो जाता है, अगर आप उन्हें ईद पर सेवइयां दे दें।” लेकिन वह इसे इतने बड़े पैमाने पर कैसे कर सकता है? यह केवल इसलिए संभव है क्योंकि वर्षों की सूफ़ी प्रोग्रामिंग के बाद “हिंदू यह मानते हैं कि राम और अल्लाह एक ही हैं।” सूफ़ी विचारधारा ने इस तरह से भारत के सामाजिक ताने-बाने को क्षति पहुंचाइ  है।[17]

यह सिर्फ मदरसों की बात नहीं है; सूफ़ी प्रभाव ने भारतीय माफिया और अंडरवर्ल्ड की गतिशीलता को भी बदल दिया है। अस्सी के दशक के अंत में, मुंबई में दाऊद इब्राहिम गिरोह और प्रतिद्वंद्वी पठान गिरोह, जिसका नेतृत्व डॉन करीम लाला कर रहे थे, के बीच अंडरवर्ल्ड हत्याओं की भरमार थी। यह तब शुरू हुआ जब करीम लाला के भतीजे समद खान ने दाऊद के बड़े भाई शब्बीर को मार डाला, और बदले की हत्याओं में दोनों परिवारों ने अपने 12 सदस्यों को खो दिया। कई समुदाय के बुजुर्गों ने दोनों परिवारों के बीच शांतिपूर्ण समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया, जब तक कि एक प्रमुख समुदाय के विद्वान, सैयद कुमेल अशरफ – जिन्हें आमतौर पर ‘पीर साहब’ कहा जाता था, तस्वीर में नहीं आए। उन्होंने दोनों विरोधी गुटों को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में इकट्ठा किया, उन्हें पवित्र भूमि पर बैठाकर एक लिखित शांति समझौते पर हस्ताक्षर करवाए – जो तब से लागू है।[18] हो सकता है कि उनका यह प्रयास सबको शांतिप्रिय लगे, लेकिन बजाय इसके कि सिर्फ समुदाय के भीतर की लड़ाइयों को रोकें, क्या उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करके दोनों डॉनों को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी? नहीं! सच में, यह वही संकीर्ण और घमंडी “सेवइयां-सूफ़ीवाद” है, जिससे दुनिया को बचना चाहिए।

भारत और हिंदुओं के लिए आगे का एकमात्र रास्ता यह है कि सूफ़ीवाद के इस उद्योग की राजनीतिक और धोखाधड़ी भरी प्रकृति को उजागर किया जाए और सनातन दर्शन के शाश्वत सिद्धांतों का फिर से अध्ययन किया जाए। दिलचस्प बात यह है कि इस समस्या का सबसे सटीक उत्तर मौलाना कलीम सिद्दीकी ने दिया: “10,000 हिंदुओं में से सिर्फ एक ने अपने जीवन में वेदों की किताब देखी है, और वेदों को समझने वाले तो 100 भी नहीं हैं।” समाधान साफ़ है—मूल बातों पर लौटकर भारतीय बच्चों को उस मूल्य प्रणाली की शिक्षा देना, जिसने उनकी सभ्यता को सदियों तक अब्राहमी आक्रमणों से बचाए रखा।

संदर्भ

[1] Ali, Rozina. 2017. “The Erasure of Islam from the Poetry of Rumi.” The New Yorker. https://www.newyorker.com/books/page-turner/the-erasure-of-islam-from-the-poetry-of-rumi.

[2] Esfandiari, Sahar, and Sami Rahman. 2020. “How Islam was erased from Rumi’s poetry.” The New Arab. https://www.newarab.com/features/how-islam-was-erased-rumis-poetry.

[3] Persian Poetry. 2020. “The Orientalizing of Moulana Rumi.” Persian Poetry in English on X: “Thread: The Orientalizing of Moulana Rumi Many of you may be familiar with the ‘Rumi quotes’ that circulate the internet. What if I told you the vast majority of them are fake and they are part of a project to secularize Rumi. https://twitter.com/persianpoetics/status/1261745279860080641.

[4] Othisaivu. 2020. “Sufi’ Jalaluddin Rumi – his bottomless hatred for anything Hindustan & Hindus; questioning as to why this islamic BIGOT is held out to be a virtuous & pious soul and an unifier of faiths, preaching universal brotherhood & all that.” Wikipedia. https://twitter.com/othisaivu/status/1238483404514983936.

[5] Girardet, Eugène. 2016. “Sufism.” Wikipedia. https://en.wikipedia.org/wiki/Sufism

[6] Sagas of Bharat. 2023. “Tale of Sufi Syed Al Hamdani- An invader in Kashmir.” Wikipedia. https://twitter.com/SagasofBharat/status/1730599361539879102.

[7] Mumukshu, Savitri. 2022. “Savitri Mumukshu – सावित्री मुमुक्षु on X: “1 “Cow-sacrifice in India is the noblest of Islamic practices. The kafirs may probably agree to pay jizya but they shall never concede to cow-sacrifice.” These are the words of foremost Naqshbandi Sufi “saint”, A.” X.com. https://twitter.com/MumukshuSavitri/status/1546282348194369536.

[8] Wikipedia. 2023. “Ajmer rape case.” Wikipedia. https://en.wikipedia.org/wiki/Ajmer_rape_case.

[9] Mumukshu, Savitri. 2023. “Savitri Mumukshu – सावित्री मुमुक्षु on X: “1 Any Hindu visiting Khwaja Moinuddin Chisti’s Dargah at Ajmer is actually celebrating the desecration & destruction of an ancient Mahadeva temple. Not just the tomb, but in fact the entire complex is built atop .” X.com. https://twitter.com/MumukshuSavitri/status/1624709606437187585.

[10] Khan, M A. 2009. “Islamic Jihad.” Wikipedia. https://www.google.co.in/books/edition/Islamic_Jihad/Mr_eYjoVjz8C?hl=en

[11] Singh, Eklavya. 2024. “Chaap Tilak Sab Cheeni…Moh Se Naina Milayke. #KnowTheFacts.” Eklavya Singh 🇮🇳 on X: “Chaap Tilak Sab Cheeni…Moh Se Naina Milayke. #KnowTheFacts https://t.co/9eEgTrvCdD”. https://twitter.com/eklavyajpr/status/1742139173597774068.

[12] Ahmed, Tufail. 2016. “Global Islamism, jihadism and Maulana Abul Kalam Azad, my defence lawyer-India News.” Firstpost. https://www.firstpost.com/india/global-islamism-jihadism-and-maulana-abul-kalam-azad-my-defence-lawyer-2981062.html.

[13] Pakistan Untold. 2024. “Nusrat Fateh Ali Khan.” Pakistan Untold on X: “”You are Musalman. Don’t let Kafirs in your homes. They will rob you of your faith” -Nusrat Fateh Ali Khan singing beautiful Sufi poetry of Hindu-love https://t.co/pQnhAelgEM”. https://twitter.com/pakistan_untold/status/1754516032025178254.

[14] Simha, Rakesh K. 2024. Rakesh Krishnan Simha on X: “There is a new trend in Kerala. Muslims girls removing the bindi of their Hindu classmates and making them wear the hijab. They are not only normalizing the erasing of Hindu identity, but also offering Islam as a ‘better … https://twitter.com/pakistan_untold/status/1754516032025178254

[15] World Population Review. 2024. “Refugees by Country 2024.” World Population Review. https://worldpopulationreview.com/country-rankings/refugees-by-country.

[16]  De Sarkar, Dipankar. 2015. “Why India won’t sign Refugee Treaty.” Mint. https://www.livemint.com/Opinion/bePZQScFIq1wEWv9Tqt4QO/Why-India-wont-sign-Refugee-Treaty.html.

[17] Sharma, Vashi. 2021. “Vashi Sharma (Team) on X: “In Kaleem’s own words “I have converted 4 Lakh non-Muslims to Islam. Daily 10-15 conversions to Islam are performed.” It is for agencies to probe ppl like him. Let it be known that every conversion to Islam is conversion through .” https://twitter.com/DharmaOfVedas/status/1440898254158372865.

[18] Parmar, Baljeet. 2013. “The peace pact between Dawood, his major rival.” DNA India. https://www.dnaindia.com/mumbai/report-the-peace-pact-between-dawood-his-major-rival-1174786.

Nitin Sawant
Nitin Sawant
Nitin Sawant usually works as a Bollywood film marketer, online publicist for a few playback singers, script writer and lyrics writer. He was a full-time marketing coordinator for 'Goopi Gawaiyya Bagha Bajaiyya' and works with new film Producers to package their content for the emerging online media space. In between, he creates content for various publications including 'Karadi Tales' and also has a bestseller novella to his name.
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