राजनीतिक द्वंद्व की चपेट में: हिंदू अमेरिकी समुदाय की चुनौतियाँ

जैसे-जैसे वामपंथ और दक्षिणपंथ के मध्य वैचारिक टकराव तेज होता जा रहा है, हिंदू अमेरिकी समुदाय स्वयं को अलगाव और असमंजस की स्थिति में पा रहा है।
  • प्रगतिशील विचारधारा वाले समूह हिंदू धर्म की आलोचना कर उसमें सुधार की मांग कर रहे हैं, जबकि रूढ़िवादी समूह प्रवासन (इमिग्रेशन) के मुद्दे पर हिंदू अमेरिकियों को निशाना बना रहे हैं। इन परिस्थितियों में हिंदू अमेरिकी दुविधा में हैं – या तो वे इस संघर्ष से दूर रहें अथवा अपनी स्थिति स्पष्ट करें।
  • परंपरागत रूप से हिंदू अमेरिकी समुदाय डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति झुकाव रखता रहा है। किंतु 2024 में कई हिंदू अमेरिकियों ने डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया, क्योंकि उन्होंने भारत के प्रति मैत्रीपूर्ण और समर्थनकारी रुख अपनाया था। हालांकि, बाद में उन्हें निराशा हुई जब “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” (MAGA) आंदोलन का प्रवासी-विरोधी (एंटी-इमिग्रेंट) रुख और अधिक कठोर हो गया।
  • एच-1बी वीज़ा पर कड़ी कार्रवाई और जन्मसिद्ध नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) में किए गए संशोधनों ने हिंदू अमेरिकी समुदाय पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है, जिससे उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
  • वामपंथी समूह हिंदू धर्म को जाति-आधारित भेदभाव और हिंदुत्व विचारधारा से जोड़ते हैं, जबकि दक्षिणपंथी समूह या तो उन्हें अनदेखा करते हैं अथवा उन्हें बाहरी (आउटसाइडर) मानते हैं। इस स्थिति के कारण हिंदू अमेरिकी राजनीतिक दृष्टि से असहाय महसूस कर रहे हैं।
  • वर्तमान परिस्थितियों में हिंदू अमेरिकी समुदाय को साझा मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। उन्हें राजनीतिक भागीदारी में सूझ-बूझ दिखानी होगी, विभिन्न समुदायों के साथ गठबंधन बनाना होगा और अपने लिए बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वकालत करनी होगी, ताकि वे अपने हितों की रक्षा कर सकें।

 

“मेरी सलाह है कि किसी भी राज्य या देश को भारतीय परजीवियों (parasites) को अपने क्षेत्र में पैर जमाने न दें।” – ‘वोक’ सीईओ मेलिंडा बायर्ले[1]

“सभी अच्छे आरक्षित (अफर्मेटिव एक्शन) नौकरियों पर भारतीय काबिज हो रहे हैं।” – श्वेत चरमपंथी लेखिका एन कौल्टर[2]

अमेरिका आज आंतरिक रूप से बंट चुका है। वामपंथी समूह ‘प्रगतिशील परिवर्तन’ और सामाजिक न्याय की मांग कर रहे हैं, जबकि दक्षिणपंथी, विशेष रूप से MAGA समर्थक, राष्ट्रवाद, कठोर प्रवासन कानूनों और पारंपरिक अमेरिकी मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए कटिबद्ध हैं।[3] यह राजनीतिक और सांस्कृतिक विभाजन पहले से कहीं अधिक गहरा हो चुका है।

इस वैचारिक संघर्ष के बीच हिंदू अमेरिकी समुदाय की स्थिति अत्यंत संवेदनशील हो गई है। डेमोक्रेटिक पार्टी और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को वामपंथ के प्रति झुका हुआ माना जा रहा है, जबकि पुलिस और रिपब्लिकन दल दक्षिणपंथ का समर्थन कर रहे हैं[4]। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में पुन: आगमन के बाद उनकी आक्रामक शासन शैली MAGA समर्थकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हो गई है। इसके विपरीत, वामपंथी शक्तियां इसका कड़ा जवाब देने की तैयारी कर रही हैं। इस प्रकार के ध्रुवीकृत राजनीतिक वातावरण में हिंदू अमेरिकी समुदाय यह प्रश्न करने को विवश हो गया है कि अमेरिका में उनकी वास्तविक स्थिति क्या है और उनके भविष्य की सुरक्षा कौन करेगा।

दो विचारधाराओं के बीच फंसे हिंदू अमेरिकी

इतिहास में हिंदू अमेरिकी समुदाय प्रायः वामपंथी विचारधारा के करीब रहा है। उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी की आव्रजन, नागरिक अधिकारों और सामाजिक कल्याण से जुड़ी समावेशी नीतियों ने आकर्षित किया। लेकिन 2024 में एक अप्रत्याशित परिवर्तन देखने को मिला, जब अनेक भारतीय-अमेरिकियों ने डोनाल्ड ट्रंप और उनके “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” (MAGA) आंदोलन का समर्थन किया।[5]

ट्रंप, जो स्वयं को भारत का बड़ा प्रशंसक बताते थे, शुरू में भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ मजबूत संबंध बनाने का प्रयास करते दिखे। उनके यह दावे कि वे ‘हिंदुओं के बड़े प्रशंसक’ हैं[6] और ‘हिंदू अमेरिकियों को वामपंथ के धर्म-विरोधी एजेंडे से बचाएंगे[7]‘, समुदाय के भीतर उत्साह और समर्थन का कारण बने।

किन्तु परिस्थितियाँ धीरे-धीरे बदलने लगीं। ट्रंप के समर्थकों में प्रवासी-विरोधी (नैटिविस्ट) विचारधारा तीव्र होने लगी। MAGA आंदोलन के अंतर्गत भारतीय टेक्नोलॉजी कर्मियों, विशेष रूप से एच-1बी वीज़ा धारकों के प्रति नाराजगी गहराने लगी। ट्रंप की भारत-समर्थक छवि और उनकी नीतियों में विरोधाभास साफ़ होने लगा। परिणामस्वरूप, जो हिंदू अमेरिकी समुदाय कभी आशान्वित था, वह अब विषाक्त राजनीतिक माहौल में खुद को असुरक्षित पाता है।

 एच-1बी वीज़ा: घृणा का केंद्र बिंदु

इस राजनीतिक संघर्ष का सबसे संवेदनशील मुद्दा एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत विशेषकर भारतीय नागरिक अमेरिकी टेक उद्योग में कुशल नौकरियों के लिए आते हैं। भारतीय नागरिक इस कार्यक्रम में सबसे बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

हालांकि, कई रूढ़िवादी विश्लेषक और राजनेता इसे अमेरिकी कर्मियों के लिए खतरा मानते हैं। एन कौल्टर जैसी हस्तियों ने भारतीय प्रवासियों पर “अमेरिकी नौकरियां छीनने” का आरोप लगाया है। इसी प्रकार कुछ राजनेताओं ने एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम पर सख्ती की मांग की है।[8]

हिंदू अमेरिकी समुदाय के कई सदस्य, जिन्होंने तकनीकी क्षेत्र में सफल करियर बनाए हैं, इस नकारात्मकता का सामना कर रहे हैं। ‘अवैध प्रवास’ के खिलाफ MAGA आंदोलन के बावजूद, कानूनी रूप से बसे भारतीय प्रवासी भी इस विरोध की चपेट में आ रहे हैं। एच-1बी वीज़ा धारकों के प्रति बढ़ती नाराजगी ने इस समुदाय में असुरक्षा और चिंता को और गहरा कर दिया है।

जन्मसिद्ध नागरिकता पर विवाद

संविधान के 14वें संशोधन के तहत, अमेरिकी धरती पर जन्म लेने वाले सभी लोगों को नागरिकता का अधिकार दिया गया है। यह संशोधन 1868 में लागू किया गया था, ताकि गुलामी से मुक्त हुए लोगों को नागरिकता प्राप्त हो सके।

हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के 2025 में राष्ट्रपति बनने के बाद एक नई समस्या सामने आई। अवैध प्रवासन को रोकने के उद्देश्य से उन्होंने एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिसके अनुसार 19 फरवरी 2025 के बाद जन्म लेने वाले उन बच्चों को नागरिकता देने से मना कर दिया गया, जिनके माता-पिता अवैध प्रवासी हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी एजेंसियों को ऐसे बच्चों के लिए नागरिकता से जुड़े कोई भी दस्तावेज जारी करने अथवा मान्यता देने पर रोक लगा दी गई।[9]

नई नीति के अंतर्गत जिन बच्चों के माता-पिता अस्थायी वीज़ा (जैसे एच-1बी, एच-4 या स्टूडेंट वीज़ा) पर हैं, उन्हें अब स्वचालित रूप से अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी। यह भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए एक और बड़ा झटका है। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवाओं (USCIS) के अनुसार, 2023 में जारी किए गए एच-1बी वीज़ाओं में से 72 प्रतिशत भारतीय नागरिकों को दिए गए थे।

कई भारतीय परिवार, जिन्होंने दशकों तक अमेरिकी इमिग्रेशन प्रणाली की जटिलताओं का सामना किया है, अब अपने बच्चों के भविष्य को अनिश्चितता में देख रहे हैं। इन बच्चों को अब स्वचालित रूप से इन-स्टेट ट्यूशन, संघीय वित्तीय सहायता या अन्य नागरिकता-संबंधी लाभ नहीं मिलेंगे।

इस नीति के प्रभावों से जूझते हुए, भारतीय-अमेरिकी परिवारों के लिए “अमेरिकन ड्रीम” अब पहले जैसा आसान और सुलभ नहीं रह गया है।

किस पर भरोसा करें?

हिंदू अमेरिकी समुदाय वर्तमान में दो चरमपंथी विचारधाराओं के बीच फंसा हुआ है। वामपंथी प्रगतिशील कार्यकर्ता हिंदू धर्म को एक पिछड़ी और दमनकारी व्यवस्था के रूप में देखते हैं[10], जबकि दक्षिणपंथी (विशेष रूप से MAGA समर्थक और कुछ ईसाई समूह) हिंदुओं की उपस्थिति को अमेरिकी मूल्यों और परंपराओं के लिए खतरा मानते हैं। यह स्थिति समुदाय को एक राजनीतिक “नो मैन्स लैंड” में ला खड़ा करती है, जहां उन्हें ऐसे दो विरोधी पक्षों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिनकी प्राथमिकता आपसी वैचारिक संघर्ष है, न कि प्रवासी समुदायों की वास्तविक समस्याओं और आकांक्षाओं को समझना।

वॉशिंगटन डीसी के सार्वजनिक मामलों के विशेषज्ञ अनंग मित्तल इस स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, “हालांकि अधिकांश अमेरिकी भारतीय प्रवासियों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं, लेकिन राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसा नहीं करते। वे हमें एक ऐसा समुदाय मानते हैं जो शिक्षा, करियर और परिवार पर केंद्रित रहता है, लेकिन अमेरिकी राजनीतिक मतभेदों से अनभिज्ञ है। हम प्रायः राजनीतिक बहसों से दूरी बनाए रखते हैं। न तो हम ‘वोक’ कार्यकर्ताओं के एजेंडे में शामिल होते हैं, न ही ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ आंदोलनों का हिस्सा बनते हैं। यही कारण है कि हम निशाने पर हैं।”[11]

मित्तल की यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदू अमेरिकी समुदाय परंपरागत रूप से अमेरिका के सांस्कृतिक युद्धों से दूर रहा है। वे अपने परिवार, करियर और धार्मिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करते आए हैं। किंतु आज के गहराते वैचारिक विभाजन के दौर में तटस्थ रहना अब सरल नहीं रह गया है।

राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष की रेखाएं स्पष्ट हो चुकी हैं, और हिंदू अमेरिकी समुदाय खुद को एक ऐसी लड़ाई के बीच पाता है, जिसमें उसने कभी भाग लेने की सहमति नहीं दी थी। अब समुदाय को यह तय करना होगा कि वह इस संघर्ष का सामना कैसे करेगा और अपनी सुरक्षा व पहचान को किस प्रकार संरक्षित रखेगा।

 हिन्दू अमेरिकियों पर दो तरफा हमले

हिंदू समुदाय के प्रति बढ़ती शत्रुता का सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिकी कॉलेज परिसरों में देखा जा सकता है, जो लंबे समय से वैचारिक संघर्षों के केंद्र बने हुए हैं। “हिंदुत्व के खिलाफ होली”[12] जैसे कार्यक्रम इसका एक स्पष्ट उदाहरण हैं। इन आयोजनों में हिंदू छात्रों पर दबाव डाला जाता है कि वे उन राजनीतिक आंदोलनों में शामिल हों, जिन्हें वे समर्थन नहीं करते।

ऐसे कार्यक्रम अक्सर सामाजिक न्याय और उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों के नाम पर आयोजित किए जाते हैं। इनमें हिंदू धर्म को दक्षिणपंथी “हिंदुत्व” विचारधारा से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि अधिकांश हिंदू धर्मावलंबी इस विचारधारा से सहमति नहीं रखते। इससे हिंदू छात्रों पर यह दबाव बनता है कि वे ऐसी राजनीतिक बहसों में भाग लें, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत हैं। यह एक झूठी समानता उत्पन्न करता है, जिसके माध्यम से हिंदू धर्म को एक स्वाभाविक रूप से दमनकारी और पदानुक्रमित धर्म के रूप में चित्रित किया जाता है।

कुछ अकादमिक विशेषज्ञ भी हिंदू विरोधी विचारों को बढ़ावा देते हैं। ये विचार अक्सर नस्लीय और सांस्कृतिक धारणाओं पर आधारित राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास होते हैं। उदाहरण के लिए, पेंसिलवेनिया लॉ स्कूल की प्रोफेसर एमी वैक्स ने टकर कार्लसन के फॉक्स न्यूज कार्यक्रम में कहा कि गंदे भारत से कम प्रवासियों को अमेरिका आने देना चाहिए।[13] उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय प्रवासी अमेरिकी समृद्धि और संस्थानों से ईर्ष्या करते हैं।

उन्होंने “ब्राह्मण महिलाओं” पर यह दावा भी किया कि उन्हें श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता है। यह बयान न केवल निराधार और लैंगिक भेदभावपूर्ण है, बल्कि हिंदू-विरोधी माहौल को भी बढ़ावा देता है। इस प्रकार के आरोप समुदाय के प्रति नकारात्मक धारणाओं को और गहरा करते हैं।

आजकल “ब्राह्मण” शब्द को हिंदू धर्म में एक धार्मिक अभिजात्य वर्ग (रिलिजियस एलीटिज़्म) के प्रतीक के रूप में उपयोग करना प्रचलित हो गया है। इस प्रवृत्ति के कारण हिंदू धर्म को एक स्वाभाविक रूप से पदानुक्रमित और दमनकारी व्यवस्था के रूप में चित्रित किया जाता है, जबकि यह उसकी विविधता, विश्वासों और सुधारवादी प्रयासों को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। हिंदू समाज के भीतर जाति-आधारित भेदभाव को चुनौती देने और सामाजिक न्याय व समानता को बढ़ावा देने के प्रयासों को भी दरकिनार कर दिया जाता है।

यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि ये हमले दोनों विचारधाराओं – वामपंथी और दक्षिणपंथी – के लोगों द्वारा किए जा रहे हैं। एक ओर, प्रोफेसर एमी वैक्स, जो स्वयं प्रवासी माता-पिता की संतान हैं, हिंदू प्रवासियों को निशाना बनाती हैं। दूसरी ओर, दक्षिणपंथी पत्रकार, जो भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन करते हैं और ईसाई-प्रधान राष्ट्रवाद की वकालत करते हैं, इन विचारों को और बढ़ावा देते हैं।

इस संदर्भ में वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक लेख, जिसका शीर्षक था “स्टूडेंट डेब्ट माफ करना ‘ब्राह्मण बेलआउट’ होगा”, भी इसी मानसिकता को दर्शाता है।[14] इस लेख में “ब्राह्मण” शब्द का उपयोग विशेषाधिकार प्राप्त अभिजात्य वर्ग के लिए अपमानजनक रूप में किया गया। यह लेख एक मुस्लिम लेखक द्वारा लिखा गया था, जिन्होंने सरकारी लाभों से disproportionately लाभ उठाने वाले लोगों के लिए इस शब्द का प्रयोग किया।

दुर्भाग्य से, भारतीय और हिंदू प्रवासी समुदाय इस नकारात्मक छवि का सामूहिक रूप से विरोध करने में विफल रहा है, क्योंकि समुदाय के भीतर भी गहरे वैचारिक और सामाजिक विभाजन मौजूद हैं।

इस विभाजन को कुछ लोग और गहरा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, द अटलांटिक में विद्या कृष्णन नामक एक भारतीय लेखक ने एक लेख में दावा किया कि जाति-आधारित भेदभाव ने अमेरिकी कार्यस्थलों, कॉलेजों और समुदायों में “पैठ” बना ली है।

इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि उन्होंने हिंदू और व्यापक हिंदू प्रवासी समुदाय को “दीमक” कहकर संबोधित किया, जो उन्हें एक संक्रमण (इंफेस्टेशन) के रूप में चित्रित करता है।[15] इस प्रकार की विषाक्त टिप्पणियां यह दिखाती हैं कि भारतीय अमेरिकी समुदाय के कुछ वर्गों में आत्म-घृणा और वैचारिक विभाजन कितना गहरा हो चुका है।

राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर लोग एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, जिससे समुदाय की एकता कमजोर हो रही है और सामूहिक हितों की रक्षा करने में कठिनाई उत्पन्न हो रही है।

 विभाजित अमेरिका में मार्ग की तलाश

प्रश्न यह है कि हिंदू अमेरिकी वर्तमान विभाजित अमेरिका में कहाँ खड़े होते हैं? वामपंथ उनके धर्म की आलोचना कर उसमें बदलाव करना चाहता है, जबकि दक्षिणपंथ उनकी उपस्थिति को पूरी तरह अनदेखा कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। दोनों पक्ष हिंदू अमेरिकियों को बाहरी (आउटसाइडर) के रूप में देखते हैं, जबकि वे कई दशकों से अमेरिकी समाज का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।

शिक्षाविद रमेश राव इस हताशा को व्यक्त करते हुए कहते हैं, “अमेरिकी राजनीति की वर्तमान अव्यवस्थित स्थिति और वाम-दक्षिण के बीच बढ़ते विभाजन के कारण, मैं, जो हमेशा डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट देता रहा हूं, अब अपने राजनीतिक भविष्य और सामाजिक स्थिति को लेकर चिंतित हूँ।”

राव आगे जोड़ते हैं, “हमारा ‘रंगीन’ (colored) दर्जा हमें डेमोक्रेटिक राजनीति में वह प्रभाव नहीं देता जो अन्य ‘प्रिविलेज्ड कलर्ड’ समूहों को प्राप्त है। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी में, जो डोनाल्ड ट्रंप और श्वेत, यूरोपीय, ईसाई पुनरुत्थान के सपनों में खोई हुई है, हिंदू समुदाय को केवल अस्थायी और असुरक्षित आश्रय ही मिलता है।”

जैसे-जैसे अमेरिका में राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष गहराता जा रहा है, हिंदू अमेरिकी समुदाय को एक नई वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है। कभी राजनीति से दूर रहने वाला यह समुदाय अब इस सच्चाई से जूझ रहा है कि न तो वामपंथी और न ही दक्षिणपंथी ताकतें उनके हितों की परवाह करती हैं। वामपंथ उनके धर्म को कटघरे में खड़ा कर रहा है, जबकि दक्षिणपंथ उनकी आव्रजन स्थिति के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपनाए हुए है।

इस ध्रुवीकृत वातावरण में अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हिंदू अमेरिकी समुदाय को मूल्यों पर आधारित राजनीतिक भागीदारी, सूचना-साक्षरता और साझेदारी निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

  • साझा मूल्यों को महत्व दें: हिंदू अमेरिकी लंबे समय से धार्मिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते रहे हैं। यह उन्हें ऐसी नीतियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण बनाता है जो धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करती हैं, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित हों। पूजा की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता जैसे मुद्दे वाम और दक्षिण दोनों पक्षों के साथ सहयोग का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
  • नीतियों में सक्रिय भागीदारी करें: आव्रजन सुधार, शिक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता, और भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे विषयों पर हिंदू अमेरिकी समुदाय विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ साझा आधार बना सकता है। इन क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए नीति निर्माण में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
  • सूचित रहें और आलोचनात्मक सोच अपनाएं: चरम राजनीतिक ध्रुवीकरण के इस युग में, आलोचनात्मक सोच और नागरिक जागरूकता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हिंदू समुदाय को राजनीतिक गुटों में बंटने के बजाय अपनी प्राथमिकताओं और मूल्यों के अनुसार नीतियों और उम्मीदवारों का समर्थन करना चाहिए।
  • इस प्रकार, समुदाय वैचारिक खेमेबाजी से बचते हुए अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र और संतुलित राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है।
  • सभी राजनैतिक दलों से जुड़ाव: हिंदू अमेरिकी समुदाय की विविधता और बहुसांस्कृतिक संरचना को देखते हुए, अन्य अल्पसंख्यक समूहों और धार्मिक समुदायों के साथ गठजोड़ करना एक प्रभावी रणनीति हो सकती है। अफ्रीकी अमेरिकियों, यहूदियों, सिखों और अन्य समुदायों के साथ मिलकर काम करने से व्यापक राजनीतिक और सामाजिक गठबंधन बनाए जा सकते हैं। यह गठबंधन विभाजनकारी राजनीति में फंसने के बजाय ऐसी नीतियों की वकालत करेगा, जो सभी हाशिए पर खड़े समुदायों के हित में हों।
  • हितों की रक्षा के लिए राजनैतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत: बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण रणनीति है। हिंदू अमेरिकी समुदाय को स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर अधिक हिंदू प्रतिनिधियों और नेताओं को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। राजनीतिक भागीदारी बढ़ाकर और निर्वाचित पदों के लिए चुनाव लड़कर, हिंदू अमेरिकी अपनी आवाज़ को प्रभावशाली बना सकते हैं।
  • अंदरूनी विभाजन से बचें: हिंदू अमेरिकी समुदाय को सतर्क रहना चाहिए कि वे “संस्कृति युद्ध” (कल्चर वॉर) में एक मोहरा न बन जाएं, जहां पहचान की राजनीति (आइडेंटिटी पॉलिटिक्स) केंद्र में आ जाती है। अपने समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की वकालत करना आवश्यक है, लेकिन broader राजनीतिक कथा के प्रभाव में आकर आंतरिक विभाजन से बचना भी उतना ही जरूरी है।
  • वैश्विक दृष्टिकोण बनाए रखें: हिंदू अमेरिकी समुदाय का भारत के साथ मजबूत संबंध उन्हें एक विशिष्ट स्थिति में रखता है। अमेरिका और भारत के बीच भू-राजनीतिक संबंध (जियोपॉलिटिकल रिलेशनशिप) अमेरिकी घरेलू राजनीति, विशेषकर विदेश नीति को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ हिंदू अमेरिकी राजनीतिक दलों के इस दृष्टिकोण को लेकर चिंतित हो सकते हैं कि भारत वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और रक्षा में क्या भूमिका निभाता है। इस वैश्विक दृष्टिकोण के माध्यम से हिंदू अमेरिकी समुदाय विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी कर सकता है, जो उनके व्यापक हितों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
समापन

आने वाले वर्ष यह निर्धारित करेंगे कि हिंदू अमेरिकी इस विभाजित समाज में कहाँ खड़े होंगे। क्या वे वाम या दक्षिणपंथ में से किसी एक के साथ तालमेल बैठा पाएंगे, या फिर वे बीच में फंसे रहेंगे?

एक बात स्पष्ट है: हिंदू अमेरिकी समुदाय के लिए राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई अभी आरंभ हुई है। साझा मूल्यों पर आधारित सहयोग, गठबंधन निर्माण और जागरूक राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से वे अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं।

संदर्भ 

[1] Fiddlehead founder Melinda Byerley goes from calling Indians ‘parasites’ to ‘underprivileged’ in apology that came late (OpIndia); https://www.opindia.com/2021/11/fiddlehead-founder-melinda-byerley-calls-indians-in-silicon-valley-parasites-issues-apology/

[2] Curious: How many of these businesses did Indians create, as opposed to slide in as a non-white (YAY!) CEO? (X);  https://x.com/AnnCoulter/status/1560678012953436160

[3] Is MAGA heading towards civil war? Immigration stance pits Nikki Haley and Laura Loomer against Musk and Ramaswamy (The Economic Times); https://economictimes.indiatimes.com/news/international/global-trends/is-maga-heading-towards-civil-war-immigration-stance-pits-nikki-haley-and-laura-loomer-against-musk-and-ramaswamy-over-sriram-krishnan-nomination/articleshow/116706509.cms?from=mdr

[4] 6 Documented Cases of Systematic Pro-Democrat FBI Corruption (US Congressional Report);  https://www.congress.gov/118/meeting/house/116122/documents/HHRG-118-JU00-20230621-SD010.pdf

[5] Many Indian Americans Turning Republican Supporters Feels Srilekha Palle of American Hindu Coalition (Times of india);  https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/many-indian-americans-turning-republican-supporters-feels-srilekha-palle-of-american-hindu-coalition/articleshow/114961380.cms

[6] Donald Trump’s Speech Saying ‘I Am A Big Fan Of Hindus And India’ Goes Viral | US Election 2024 (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=mrqD9rJPMEM

[7] Donald Trump vows to protect Hindu Americans from radical Left’s anti-religion agenda, condemns anti-Hindu violence in Bangladesh (OpIndia); https://www.opindia.com/2024/11/donald-trump-vows-to-protect-hindu-americans-condemns-anti-hindu-violence-in-bangladesh/

[8] Hinduphobia amid H1B Crisis: Unpacking America’s Racial Bias Against Indian Americans (StopHinduDvesha.Org); https://stophindudvesha.org/hinduphobia-amid-h1b-crisis-unpacking-americas-racial-bias-against-indian-americans/

[9] Birthright Citizenship Ban is Doubly Unlawful – Harvard Law Professor (Times of India); ,https://timesofindia.indiatimes.com/education/news/birthright-citizenship-ban-is-doubly-unlawful-harvard-law-professor/articleshow/117579638.cms

[10] History of Anti-Hindu Bias and Hinduphobia in the United States (Hindu American Foundation); https://www.hinduamerican.org/hinduphobia-history

[11] Hated, despised and abhorred: How Hindu-Americans are being targeted Left and Right (Firstpost); https://www.firstpost.com/opinion-news-expert-views-news-analysis-firstpost-viewpoint/hated-despised-and-abhorred-how-hindu-americans-are-being-targeted-left-and-right-11260191.html

[12] Hinduphobia: The Cunning Ploy Behind “Holi Against Hindutva” Workshops – CoHNA Protests! (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=Y3Vo8D-co0A

[13] Amy Wax Tucker Carlson – Race baiting against Hindu Americans (YouTube); https://www.youtube.com/watch?v=VFP4uG7PsEM

[14] Canceling Student Debt Would Be a ‘Brahmin Bailout’ (Wall Street Journal); https://www.wsj.com/articles/canceling-student-debt-would-be-a-brahmin-bailout-11606687827

[15] The Atlantic, Caravan Magazine columnist goes hysterical, calls Indian diaspora ‘termites’ over ‘Hindu homeland’ rant (OpIndia); https://www.opindia.com/2021/12/vidya-krishnan-termite-caravan-magazine-indian-diaspora-hate-speech/

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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