अपने हाथों से बोया ज़हर: कैसे भारतीय अरबपतियों से पोषित विदेशी विश्वविद्यालय भारत की छवि बिगाड़ने में जुटे हैं

प्रमुख विदेशी विश्वविद्यालयों को टाटा, महिंद्रा और मित्तल जैसे भारत के समृद्ध औद्योगिक घरानों द्वारा दिए गए दान, अनजाने में भारत के हितों को क्षति पहुँचा रहे हैं और ऐसे एजेंडों को बढ़ावा दे रहे हैं जो देश के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं।
  • भारतीय अरबपति अपने धन से ऐसे प्रतिष्ठित पश्चिमी विश्वविद्यालयों को सहयोग दे रहे हैं, जो अक्सर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचारों को शैक्षणिक सम्मान के साथ बढ़ावा देते हैं।
  • रंजनी श्रीनिवासन जैसी कार्यकर्ता, अकादमिक मंचों का उपयोग कर कट्टर विचारधाराओं को विद्वत्ता की शक्ल में पेश करती हैं, जिससे उन्हें वैधता मिलती है।
  • विदेशी फंड से पोषित शोध कई बार भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर दिखाते हैं, जहाँ औपनिवेशिक शोषण के दोष को जाति आधारित भेदभाव में बदल दिया जाता है।
  • हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय भारतीय दाताओं से बड़ी राशि तो स्वीकार करते हैं, लेकिन न तो जवाबदेही निभाते हैं और न ही भारत के हितों का कोई सम्मान करते हैं।
  • यह पूरी प्रवृत्ति भारत के अभिजात वर्ग में गहरे पहचान संकट को उजागर करती है, जहाँ राष्ट्र के प्रति निष्ठा से अधिक पश्चिमी मान्यता को महत्व दिया जाता है।

औपचारिक रूप से देखें तो रंजनी श्रीनिवासन का शैक्षणिक प्रोफ़ाइल काफ़ी प्रभावशाली लगता है। बेंगलुरु में जन्मी यह “विदुषी” 37 वर्ष की उम्र में भी छात्रा ही बनी हुई हैं — जो एक तरह से विडंबनापूर्ण है, क्योंकि जहाँ इस उम्र में ज़्यादातर लोग अपने करियर के शीर्ष पर होते हैं, वहीं वह अब भी विश्वविद्यालयों के गलियारों में भटकती नज़र आती हैं। हार्वर्ड से फ़ुलब्राइट स्कॉलरशिप और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से अर्बन प्लानिंग में पीएचडी—यह सब सुनने में एक सफल अकादमिक यात्रा जैसा प्रतीत होता है। लेकिन जब इस चमक-धमक के पीछे झाँक कर देखें, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है—ऐसी जो रंजनी को एक समर्पित शोधकर्ता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता और उग्र विचारधारा की प्रवक्ता के रूप में प्रस्तुत करती है।[1]

परंतु हर नाटक का एक अंत होता है। श्रीनिवासन 2016 से अमेरिका में रह रही थीं, और हाल के वर्षों में उन्होंने अपना अधिकतर समय ‘अध्ययन’ की आड़ में हमास जैसे संगठनों के पक्ष में प्रचार करते हुए बिताया—एक ऐसा समूह जिसे अमेरिका और कई अन्य देशों ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है, और जो अनेक निर्दोष लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार माना जाता है। जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने आतंकवाद और उसके समर्थकों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया, तो श्रीनिवासन ने अपने विचारों का बचाव करने की बजाय पलायन को चुना। उन्होंने आव्रजन अधिकारियों से बचने की कोशिश की, छात्रावास में खुद को बंद कर लिया और अंततः कनाडा भाग गईं—मानो अंतिम रास्ते की तलाश में एक कोने में घिरा व्यक्ति हो।[2]

श्रीनिवासन पर आरोप केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। वह उन ‘वोक’ कार्यकर्ताओं में से हैं जो हिंदू समुदाय को टारगेट करती हैं, और यह मानती हैं कि अमेरिका में यहूदी समुदाय के साथ भी वही नैरेटिव लागू किया जा सकता है। परंतु यह रणनीति बुरी तरह असफल हुई।

हालाँकि अमेरिकी प्रशासन ने उनके खिलाफ फिलिस्तीनी कार्यकर्ता महमूद खलील[3] जितनी आक्रामकता नहीं दिखाई, पर कई विश्लेषकों का मानना है कि श्रीनिवासन पर आतंकवाद से जुड़ा मामला दर्ज किया जाना चाहिए था। उनका पलायन इसी कानूनी प्रक्रिया से बचने का प्रयास था। अब जब वह कनाडा में बस चुकी हैं—एक ऐसा देश जिसे चरमपंथी तत्वों की सुरक्षित शरणस्थली माना जाता रहा है—तो यह आशंका जताई जा रही है कि वह वहीं से अपना अराजक एजेंडा आगे बढ़ा सकती हैं।[4]

कोलंबिया विश्वविद्यालय ने भी दूरी बना ली। जब राष्ट्रपति ट्रंप ने संस्थान का 400 मिलियन डॉलर का वार्षिक अनुदान रोक दिया, तो विश्वविद्यालय ने हमास-समर्थक कार्यकर्ताओं को मंच देना बंद किया और अंततः रंजनी श्रीनिवासन को पीएचडी कार्यक्रम से निष्कासित कर दिया।

अजेन्ड-चालित अकादमिक दुनिया

रंजनी श्रीनिवासन की गतिविधियाँ उस प्रकार की विचारधारा से मेल खाती हैं जो अक्सर एंटीफा या शहरी नक्सल जैसे समूहों से जुड़ी होती हैं—ऐसे तत्व जो सामाजिक ढाँचे को तोड़ने और अस्थिर करने के उद्देश्य से काम करते हैं। उनका शोध-पत्रिका, जिसका शीर्षक है गोल्ड एंड सायनाइड: परिवार, जाति और कोलार गोल्ड फील्ड्स का उत्तर-खनन परिदृश्य,” एक सतही और संदिग्ध अकादमिक रुझान का उदाहरण है—ऐसा विश्वविद्यालयी शोध जो न गहराई रखता है, न तथ्यात्मक मजबूती, और न ही किसी वास्तविक सामाजिक समाधान से जुड़ता है।[5] यह शोध हार्वर्ड विश्वविद्यालय के लक्ष्मी मित्तल साउथ एशिया इंस्टिट्यूट द्वारा वित्तपोषित था और इसका उद्देश्य भारत में खनन से जुड़े सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन बताना था। लेकिन इसका असली मक़सद कहीं और था—एक खास वैचारिक एजेंडा को बढ़ावा देना, जिसमें हिंदू समाज को जातिवादी उत्पीड़क के रूप में पेश किया जाए। इस शोध का मुख्य दावा है कि कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) के उच्च जाति के मालिकों ने निम्न जातियों के श्रमिकों का शोषण किया।

लेकिन श्रीनिवासन यहाँ ऐतिहासिक तथ्यों से आँख मूंद लेती हैं। KGF पर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों का नियंत्रण था, न कि किसी भारतीय उच्च जाति के समुदाय का। गोरे अफ़सरों के लिए विशाल बंगलों से लेकर, ब्राह्मणों के लिए माध्यम स्तर के क्वार्टर, और श्रमिकों के लिए किनारे की झुग्गियाँ—यह पूरा वर्गीय और नस्लीय भेदभाव ब्रिटिश शासन की देन था। यहाँ तक कि सायनाइड कचरे को श्रमिक बस्तियों के पास फेंकने जैसी अमानवीय नीति भी अंग्रेज़ों द्वारा ही लागू की गई थी। परंतु श्रीनिवासन ने इस पूरे औपनिवेशिक शोषण को जातिगत उत्पीड़न का नाम देकर अपने एक्टिविस्ट ब्रांड को और मज़बूती दी—और इसके साथ ही किसी नामी विश्वविद्यालय में शैक्षणिक पद की ओर भी कदम बढ़ाया।

इस पूरी घटना को दो तरीकों से देखा जा सकता है: पहला, जब इस तरह के एजेंडा-प्रेरित, खोखले शोध को छात्रवृत्तियाँ और वैश्विक मंच मिलते हैं, तो यह संदेह पैदा होता है कि कहीं अमेरिकी विश्वविद्यालय बौद्धिक चोगे में राजनीतिक उपकरण तो नहीं गढ़ रहे हैं—ऐसे लोग जो भविष्य में किसी ‘डीप स्टेट’ के उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाएँ। यदि डोनाल्ड ट्रंप 2024 का चुनाव हार गए होते, तो यह संभव था कि रंजनी श्रीनिवासन भी किसी वैश्विक खुफिया तंत्र की कड़ी बन जातीं—और एक और “विदुषी” की आड़ में भारत-विरोधी विमर्श को मजबूती मिलती।[6] [7] [8]

दूसरा दृष्टिकोण यह है कि शायद यह एक शुद्ध अकादमिक अक्षमता का मामला है। संभव है कि लक्ष्मी मित्तल एंड फैमिली साउथ एशिया इंस्टिट्यूट के भारतीय निदेशक और कर्मचारी शोध की गुणवत्ता या तथ्यपरकता को लेकर गंभीर ही न हों। जब तक किसी शोधकर्ता की सोच हार्वर्ड की हिंदू-विरोधी प्रवृत्तियों से मेल खाती है, तब तक सतही और पक्षपाती सामग्री भी सहज रूप से स्वीकार कर ली जाती है।

लेकिन इस संदर्भ में एक सवाल उठता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: आख़िर क्यों एक रंजनी श्रीनिवासन जैसी आत्मघोषित अराजकतावादी—जो भारत के प्रति खुली दुश्मनी रखती हैं—को उस संस्थान से समर्थन मिल रहा है जिसे लक्ष्मी एन. मित्तल जैसे दानदाता ने 25 मिलियन डॉलर से खड़ा किया है? [9]

यह कहना उचित नहीं होगा कि मित्तल का भारत से कोई संबंध या उत्तरदायित्व नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि शायद भारत के समर्थन के बिना वे कभी विश्व के सबसे बड़े स्टील निर्माता बन ही नहीं पाते। वर्ष 2006 में जब मित्तल ने यूरोप की सबसे बड़ी स्टील कंपनी Arcelor को खरीदने के लिए 22 बिलियन डॉलर की बोली लगाई थी, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा—खासतौर पर फ्रांस की राजनीतिक और कॉरपोरेट लॉबी द्वारा, जो उनके भारतीय मूल को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थी। इस विरोध के बीच, भारत सरकार के कूटनीतिक हस्तक्षेप ने निर्णायक भूमिका निभाई। भारत के मजबूत समर्थन के बाद ही फ्रांस ने अपना रवैया बदला और यह ऐतिहासिक अधिग्रहण संभव हो सका।[10]

यह पूरा परिदृश्य एक असहज लेकिन जरूरी प्रश्न को जन्म देता है: क्या मित्तल परिवार सचमुच भारत के प्रति किसी भावनात्मक निष्ठा से जुड़ा है? या फिर वे भी महज़ एक मुनाफ़ा-केंद्रित कारोबारी मानसिकता के प्रतिनिधि हैं, जिनके लिए लाभ ही सर्वोच्च ध्येय है, और राष्ट्रीय भावना केवल एक अवसर?

इन सवालों का उत्तर आसान नहीं है, लेकिन इन्हें टालना भी नहीं चाहिए। इनका समाधान तभी संभव है जब हम यह गहराई से समझें कि भारतीय कॉरपोरेट घराने जब विदेशी विश्वविद्यालयों को दान देते हैं, तो वह केवल आर्थिक लेन-देन नहीं होता—बल्कि यह एक वैचारिक निवेश भी बन जाता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हम इस पूरी दान प्रणाली का विश्लेषण करें—
इसके संरचनात्मक तत्वों, नियंत्रण के अभाव, और सामाजिक-राजनीतिक असर को समझें। केवल तभी हम तय कर सकेंगे कि क्या ये दान भारत की आवाज़ को मजबूत करते हैं,
या फिर उसे पराया और विकृत रूप देने वाले मंचों को और ताकतवर बनाते हैं।

भारतीय उद्योगपति और विदेशी गठजोड़

पिछले दो दशकों में, भारत के शीर्ष अरबपतियों ने अपनी तेजी से बढ़ती संपत्ति के साथ तालमेल बिठाते हुए विश्व के प्रमुख विदेशी विश्वविद्यालयों को भारी आर्थिक सहायता प्रदान की है। इन दानदाताओं में नंदन निलेकणी, रतन टाटा, आनंद महिंद्रा, लक्ष्मी मित्तल और अजय पीरामल जैसे नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।[11]

इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन निलेकणी, विदेशी विश्वविद्यालयों को दान देने वाले प्रारंभिक उद्योगपतियों में अग्रणी रहे। उनके 5 मिलियन डॉलर के योगदान से येल विश्वविद्यालय में ‘Yale India Initiative’ की शुरुआत हुई।[12]

लेकिन इसका परिणाम क्या रहा?

2021 में, येल विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने विवादास्पद ‘Dismantling Global Hindutva’ सम्मेलन में भाग लिया, जहाँ जोसेफ गोएबल्स (नाजी प्रचार मंत्री) की शैली में तैयार किया गया ‘Hindutva Harassment Field Manual’ प्रस्तुत किया गया। इस दस्तावेज़ का उद्देश्य था ऐसे “संसाधन” मुहैया कराना जिनकी सहायता से “हिंदुओं द्वारा प्रताड़ित” लोगों की रक्षा की जा सके और शैक्षणिक परिसरों व कार्यस्थलों पर अन्य लोगों को “शिक्षित” किया जा सके। इसमें मुस्लिम, नारीवादी, LGBTQ+ और अन्य छात्रों को यह चेतावनी दी गई कि वे हिंदू छात्रों से खतरे में हो सकते हैं, क्योंकि वे “श्रेष्ठतावादी हिंदू विचारधारा” के वाहक हो सकते हैं।[13]

इसी संदर्भ में, येल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अहमद मुश्फ़िक मोबारीक ने भी विवाद को जन्म दिया, जब उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में भारत के प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा को इस्लामी संगठन ‘Hefazat-e-Islam’ द्वारा हिंदुओं पर की गई हिंसा के औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया।[14] इस घोर आपत्तिजनक और पक्षपातपूर्ण बयान के बावजूद, येल विश्वविद्यालय ने उस प्रोफेसर के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वहाँ हिंदू-विरोध एक सामान्यीकृत और संस्थागत स्वीकृति प्राप्त विचारधारा बन चुका है।

सितंबर 2010 में, उस समय अनुदान के द्वार खुलने लगे जब महिंद्रा एंड महिंद्रा के प्रबंध निदेशक आनंद महिंद्रा ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ह्यूमैनिटीज़ सेंटर को 1 करोड़ डॉलर (लगभग 85 करोड़ रुपये) का दान दिया। इसके पश्चात् इस केंद्र का नाम बदलकर ‘महिंद्रा ह्यूमैनिटीज़ सेंटर एट हार्वर्ड’ कर दिया गया।[15]

यहाँ एक दिलचस्प पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है। प्रसिद्ध लेखक और ‘इन्फ़िनिटी फ़ाउंडेशन’ के संस्थापक राजीव मल्होत्रा को जब यह ज्ञात हुआ कि आनंद महिंद्रा हार्वर्ड को इतनी बड़ी राशि दान देने जा रहे हैं, तो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से महिंद्रा से भेंट की और उन्हें हार्वर्ड में व्याप्त हिंदू-विरोधी प्रवृत्तियों के प्रति सचेत किया। महिंद्रा ने मल्होत्रा की चिंता को सहानुभूतिपूर्वक सुना और आश्वस्त किया कि वे केवल $20,000 की राशि भारतीय छात्रों को शोधवृत्ति के रूप में देने का विचार कर रहे हैं। किन्तु इसके बावजूद, यह विशाल अनुदान—जो हार्वर्ड में मानविकी अध्ययन के क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा दान माना जाता है—आख़िरकार संपन्न हो गया।[16]

टाटा का छक्का

महिंद्रा के दान की घोषणा के केवल एक महीने बाद, टाटा समूह ने यह घोषणा की कि वे हार्वर्ड को $50 मिलियन की राशि देंगे।[17] निःसंदेह, यह टाटा समूह के लिए एक उल्लेखनीय पहल थी, लेकिन भारत में इस पर तीखी बहस छिड़ गई। आलोचकों ने यह सवाल उठाया कि क्या इतनी विशाल धनराशि भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आधारभूत ढांचे जैसी ज़रूरी जरूरतों से हटाकर एक ऐसे विदेशी विश्वविद्यालय को दी जानी चाहिए, जो पहले से ही विश्व के सबसे धनी संस्थानों में शामिल है? इस दान के परिणामस्वरूप ‘Tata Hall’ की स्थापना हुई। इससे टाटा परिवार की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा तो निस्संदेह बढ़ी, लेकिन भारत को दीर्घकालिक रूप से इसका कोई स्पष्ट लाभ नहीं दिखा।

भारत सरकार की एक उप-समिति ने इस विषय की समीक्षा के बाद टिप्पणी की कि: “टाटा हॉल का निर्माण न तो परोपकार की श्रेणी में आता है और न ही उस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय कल्याणकारी गतिविधियों में जिसकी भारत को आवश्यकता है।” इसके विपरीत, यह “कुछ विशिष्ट ट्रस्टियों के निजी हितों की पूर्ति हेतु किया गया प्रतीत होता है।” [18]

इस संदिग्ध दान में एक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल के तत्कालीन डीन नितिन नोहरिया ने। सितंबर 2013 में—टाटा हॉल के निर्माण के केवल तीन महीने पहले—नोहरिया को टाटा संस (रतन टाटा की कंपनियों की होल्डिंग कंपनी) के बोर्ड में ग़ैर-कार्यकारी निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया।

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पूर्व एडजंक्ट प्रोफेसर एलन बियर्ड ने तीखे शब्दों में प्रश्न उठाया: “कैसे अमेरिका की एक प्रतिष्ठित संस्था—जो विशेष रूप से उच्च वर्ग की सेवा करती है—सबसे वंचितों से चांदी की चम्मच छीन सकती है? और कैसे एक सम्मानित बिज़नेस स्कूल ऐसा दान स्वीकार कर सकता है, जो सुशासन के प्रत्येक सिद्धांत का उल्लंघन करता है?”

परंतु हार्वर्ड ने इस धनराशि को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई, और टाटा समूह ने भी इस पर कोई स्पष्टीकरण देना आवश्यक नहीं समझा।

सांपों का पोषण

कुछ लोगों का कहना है कि जब भारत एक निर्धन देश था, तब अमेरिका की संस्थाओं—जैसे USAID—ने IIT कानपुर जैसे संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति और शैक्षणिक विकास के लिए मदद की थी। तो फिर अगर आज महिंद्रा, टाटा जैसे भारतीय उद्योगपति अपने पुराने विदेशी विश्वविद्यालयों को कुछ लौटाना चाहें, तो उसमें क्या गलत है?

लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जब भारतीय संस्थानों ने अमेरिका से सहायता ली थी, तब उन्होंने कभी अमेरिका के खिलाफ कोई वैचारिक या राजनीतिक एजेंडा नहीं चलाया था। उन्होंने अमेरिका की नस्लीय या धार्मिक समस्याओं को भड़काने की कोई कोशिश भी नहीं की थी।

इसके ठीक उलट, आज जिन विदेशी विश्वविद्यालयों को भारतीय अरबपति दान दे रहे हैं, वहीं संस्थान भारत के खिलाफ, हिंदू धर्म के खिलाफ और समाज को बाँटने वाली विचारधाराओं को बढ़ावा दे रहे हैं। इतना ही नहीं, इन दानों की संरचना भी समस्या का हिस्सा है। अधिकतर भारतीय दान लंबी रणनीतिक सोच की जगह तुरंत दिखने वाले असर और छवि निर्माण पर आधारित होते हैं। इनमें न तो कोई मज़बूत निगरानी व्यवस्था होती है, और न ही कोई ऐसी जवाबदेही जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की कहानी वैश्विक मंच पर ईमानदारी, संतुलन और सच्चाई के साथ पेश की जाए।

हालाँकि इन पहलों को अकादमिक उत्कृष्टता यानी पढ़ाई और शोध के बड़े केंद्रों के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन असल में ये संस्थान अक्सर भारत की एक गलत, पक्षपाती और कई बार नकारात्मक छवि पेश करते हैं। इन दानों की मदद से चलने वाली कई शोध परियोजनाएँ भारत के इतिहास, शासन और सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे की सिर्फ आलोचना करने में लगी रहती हैं। ये आलोचनाएँ आमतौर पर ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर की जाती हैं, लेकिन इनमें ना तो संतुलन होता है और ना ही भारत की ज़मीनी सच्चाइयों की समझ दिखाई देती है। नतीजतन, ये विचार और शोध दुनिया में भारत की छवि को बिगाड़ने और उसके संविधान के मूल सिद्धांतों पर शक पैदा करने की ताकत रखते हैं।

उदाहरण के तौर पर, इन संस्थानों से जुड़े कई विद्वानों ने ऐसे शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं जो भारत के संविधान, शासन व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय भूमिका की कड़ी आलोचना करते हैं। भले ही इन लेखों को ‘गंभीर शोध’ या ‘क्रिटिकल स्कॉलरशिप’ का हिस्सा कहा जाए, लेकिन जब इनके एकतरफा नजरिए और पक्षपातपूर्ण भाषा पर ध्यान दिया जाता है, तो यह साफ दिखता है कि इनका मकसद भारत को दुनिया के मंच पर नकारात्मक रूप में दिखाना है।

ब्राउन साहब मानसिकता

राजीव मल्होत्रा इस प्रवृत्ति की जड़ ‘ब्राउन साहब मानसिकता’ में देखते हैं। उनके अनुसार, भारतीय उद्योगपति अक्सर बिना समुचित पड़ताल के केवल इसीलिए दान कर बैठते हैं क्योंकि वे पश्चिमी प्रतिष्ठानों में स्वीकार्यता प्राप्त करना चाहते हैं।

मल्होत्रा लिखते हैं, “भारतीय कॉरपोरेट तब खुद को सफल मानता है जब उसे पश्चिम से स्वीकृति मिले। पहले ब्रिटिशों ने भारतीय संस्कृति का गहराई से अध्ययन किया और फिर उसी ज्ञान का उपयोग भारत पर शासन करने के लिए किया। आज वही रणनीति अमेरिकी संस्थानों के ज़रिए दोहराई जा रही है—राजाओं के वारिसों को कैम्ब्रिज भेजना, उनके साथ पोलो खेलना, और उन्हें ‘मानद गोरों’ के रूप में दिखाना।” आज भी यह मानसिकता बनी हुई है, बस फर्क इतना है कि इस खेल में अब अंग्रेजों की जगह अमेरिकियों ने ले ली है। और यही कारण है कि हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय वैश्विक विमर्श में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।[19]

हार्वर्ड जैसे संस्थान भारतीय दानदाताओं से बड़ी राशि प्राप्त करते हैं और उस धन का इस्तेमाल उन परियोजनाओं में करते हैं जो भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक छवि को विकृत करती हैं। विडंबना यह है कि इन परियोजनाओं का नेतृत्व कई बार उन्हीं भारतीय मूल के विद्वानों द्वारा किया जाता है जिन्हें ‘ब्रांड एम्बेसडर’ बनाकर भारत से और फंड लाने के लिए प्रचारित किया जाता है।

एक उदाहरण हैं प्रोफेसर सुगत बोस, जिन्हें हार्वर्ड ने भारत में फंड जुटाने के लिए नियुक्त किया था। उनके लेखन में पूर्व-मुग़ल भारत को पिछड़ा बताया गया है, जबकि उनकी आलोचना मुख्यतः ब्रिटिश उपनिवेशवाद तक सीमित रहती है। इस्लामी आक्रमणकारियों की भूमिका पर वे चुप्पी साधते हैं और ‘डि-कोलोनाइज़ेशन’ को दक्षिण एशिया की एक अर्ध-इस्लामी सभ्यता की ओर लौटने की प्रक्रिया के रूप में दर्शाते हैं। उनकी सह-लेखिका और जीवनसंगिनी, पाकिस्तानी विद्वान आयशा जलाल, ने इस विचारधारा को अमेरिका के विश्वविद्यालयों में South Asian Studies के पाठ्यक्रमों में सफलतापूर्वक शामिल करवा दिया है। नतीजा यह है कि भारतीय कॉरपोरेट द्वारा पोषित शिक्षा और शोध अब उन उदारवादी या कट्टरपंथी प्रवक्ताओं के हाथ में है जो दुनिया भर में भारत-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं।

दान का असली कारण

अगर इस पूरी प्रवृत्ति को एक शब्द में समझाया जाए, तो वह होगा—स्वार्थ।

भारतीय उद्योगपति जो भारी-भरकम दान विदेशी विश्वविद्यालयों को देते हैं, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण इन संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा है। हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसे अमेरिकी विश्वविद्यालय शिक्षा और शोध की गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं और इन्हें दुनिया में लीडरशिप और इनोवेशन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इन संस्थानों को दान देकर भारतीय उद्योगपति सिर्फ अपनी छवि निखारते ही नहीं, बल्कि वे पश्चिमी ताकतवर सर्किलों में घुसने का रास्ता भी बना लेते हैं—even अगर इसके लिए उन्हें भारत के हितों की अनदेखी क्यों न करनी पड़े।

इन दानों के पीछे एक और बड़ी वजह होती है—नेटवर्किंग। इन विश्वविद्यालयों के पूर्व छात्रों का नेटवर्क बेहद असरदार होता है, जो बिज़नेस, राजनीति, टेक्नोलॉजी और फाइनेंस जैसी दुनियाभर की इंडस्ट्रीज़ में फैला है। जब कोई भारतीय उद्योगपति ऐसे संस्थानों को करोड़ों डॉलर दान करता है, तो बदले में उन्हें उन खास सर्कलों तक पहुँच मिलती है जहाँ आम लोग कभी नहीं पहुँच पाते। वहाँ उन्हें नए बिज़नेस पार्टनर मिलते हैं, बड़ी पहचान मिलती है और कई ग्लोबल मंचों पर बैठने का मौका भी। इस तरह की नेटवर्किंग दरवाज़े खोलती है—जिन तक पहुँचना सामान्य कंपनियों या लोगों के लिए नामुमकिन होता है। इससे न केवल व्यापार का विस्तार होता है, बल्कि समाज और संस्कृति के स्तर पर भी उनका कद बढ़ जाता है।

प्रतिष्ठा (status) अपने-आप में एक बहुत बड़ा आकर्षण है। उदाहरण के लिए, पीरामल समूह—जो आकार में टाटा, अंबानी या अडानी जितना बड़ा नहीं है—जब हार्वर्ड जैसे संस्थान को करोड़ों का दान देता है, तो उसे आइवी लीग जैसे खास और प्रभावशाली सर्कलों में जगह मिल जाती है। इतना ही नहीं, कई बार ऐसे दानदाता अप्रत्यक्ष रूप से विश्वविद्यालय की प्रवेश नीति, पाठ्यक्रम तय करने या अकादमिक रणनीति बनाने जैसी अहम प्रक्रियाओं में भी शामिल होने लगते हैं। भारत के उभरते कारोबारी परिवारों के लिए यह एक तरह का पावर एक्सपीरियंस होता है—जिसमें पैसे के ज़रिए वे संस्कृति और ज्ञान की दुनिया में अपनी जगह बनाते हैं।

चीन का मॉडल: एक रणनीतिक दृष्टिकोण

भारत के मुक़ाबले चीन ने अपने राष्ट्रीय हितों को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और शोध की दुनिया में बचाने और मज़बूत करने के लिए कहीं ज़्यादा संगठित और रणनीतिक तरीका अपनाया है।

चीनी सरकार और निजी दानदाता यह सुनिश्चित करते हैं कि पश्चिमी विश्वविद्यालयों में चलने वाले चाइना स्टडीज़ कार्यक्रम बीजिंग की आधिकारिक नीतियों के अनुरूप ही हों। चीनी फाउंडेशन और सरकारी एजेंसियाँ इन कोर्सों में भारी निवेश करती हैं, शोध-पत्रों की समीक्षा करती हैं, और तय करती हैं कि किस तरह की बातें और नैरेटिव आगे बढ़ाए जाएँगे। इसी का असर है कि चीन पर होने वाला ज़्यादातर शोध या विमर्श पश्चिमी दुनिया में आलोचनात्मक नहीं बल्कि सहानुभूति से भरा होता है।

इसके उलट, भारत का रवैया बेहद बिखरा हुआ और असंगठित है। भारत से भी विदेशी विश्वविद्यालयों में अरबों रुपये का निवेश होता है, लेकिन इस पर न तो कोई स्पष्ट नीति है, न निगरानी, और न ही यह देखा जाता है कि इससे भारत की छवि कैसी बन रही है। भारत से जुड़े मुद्दों पर शोध करने वाले विद्वानों की सोच भारत के हितों के अनुकूल है या नहीं—इसकी किसी स्तर पर परवाह नहीं की जाती।

NEP और भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का प्रवेश

भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारत में प्रवेश करना पहले से कहीं आसान बना दिया है। इस नीति के तहत अमेरिकी और अन्य विदेशी संस्थान अब भारत में ट्रस्ट बना सकते हैं, जिन्हें कर-मुक्त (tax-exempt) दर्जा प्राप्त होता है। इससे भारतीय दानदाताओं को टैक्स में छूट मिलती है और विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है।

इसी वजह से अब हार्वर्ड, येल जैसे संस्थान भारत में अपने कैंपस, फैलोशिप प्रोग्राम और शोध केंद्र शुरू करने को लेकर सक्रिय हो गए हैं। जब इन संस्थानों को भारत से केवल आर्थिक मदद ही नहीं, बल्कि नीतिगत समर्थन भी मिलने लगे, तो यह चिंता स्वाभाविक है कि वे भारत की शिक्षा और विचारधारा पर असर डाल सकते हैं।[20]

विदेशी संस्थानों के बढ़ते दखल का सीधा असर भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों पर पड़ सकता है। भारतीय विश्वविद्यालयों की पाठ्यक्रम तय करने, शोध की दिशा चुनने और वैचारिक स्वतंत्रता बनाए रखने की क्षमता सीमित हो सकती है। इसका मतलब यह है कि भारत के इतिहास, संस्कृति और राजनीति को समझने का नजरिया अब धीरे-धीरे ‘बाहरी चश्मे’ से तय हो सकता है—और वह भी भारतीय पैसे और नीति सहयोग से।

निष्कर्ष: किसकी कथा, किसकी कलम?

विदेशी विश्वविद्यालयों को दिया गया दान भारतीय अरबपतियों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा पाने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन यही परोपकार तब आत्मघाती रूप ले लेता है, जब उसका इस्तेमाल भारत के ही खिलाफ वैचारिक युद्ध में किया जाने लगे।

भारत आज एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि देश के दानदाता, नीति-निर्माता और बुद्धिजीवी यह सुनिश्चित करें कि भारत को लेकर दुनिया में जो बातें कही जाएँ, वे संतुलित, तथ्य आधारित और भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप हों। यह तभी मुमकिन है जब भारतीय दाता सोच-समझकर यह तय करें कि उनकी मेहनत की कमाई किस संस्था को, किस मकसद से और किन शर्तों पर दी जा रही है।

अगर भारत की कहानी भारत खुद नहीं लिखेगा, तो बाकी दुनिया उसे अपने हिसाब से तोड़े-मरोड़ेगी—और शायद हमेशा के लिए।

संदर्भ सूची 

[1] The News Minute Cherry-Picks Facts In Columbia University ‘Scholar’ Ranjani Srinivasan Visa Revocation Case, Whitewashes Her Pro-Hamas Activities (The Commune Mag);   https://thecommunemag.com/the-news-minute-cherry-picks-facts-in-columbia-univ-scholar-ranjani-srinivasan-visa-revocation-case/

[2] When you advocate for violence and terrorism that privilege should be revoked and you should not be in this country (X); https://x.com/Sec_Noem/status/1900562928849326488

[3] Palestinian activist Mahmoud Khalil describes his arrest in new court filing (ABC News); https://abcnews.go.com/US/columbia-activist-mahmoud-khalil-recounts-arrest/story?id=119891169

[4] Is Canada Safe Haven for Terrorists? (PBS); https://www.pbs.org/wgbh/pages/frontline/shows/trail/etc/canada.html

[5] Prasad Grant Report 2016-2017 (The Laxmi Mittal South Asia Institute, Harvard University); https://issuu.com/sainit/docs/prasad_grant_report_no_crops

[6] How Spy Agencies Use American Universities to Secretly Recruit Students (Daniel Golden, Town and Country Magazine 2017); https://www.townandcountrymag.com/society/tradition/a12814064/spy-school-daniel-golden-fbi-cia-recruit-at-american-colleges/

[7] The CIA’s Campus Spies (Counterpunch 2005); https://www.counterpunch.org/2005/03/12/the-cia-s-campus-spies/

[8] Exclusive: Peace Corps, Fulbright Scholar Asked to ‘Spy’ on Cubans, Venezuelans (ABC News); https://abcnews.go.com/Blotter/story?id=4262036&page=1

[9] Steel Tycoon Lakshmi Mittal Donates $25 Million To Harvard University (NDTV); https://www.ndtv.com/indians-abroad/steel-tycoon-lakshmi-mittal-donates-25-million-to-harvard-university-1763988

[10] Mittal ‘sad’ about ‘racists’ (News24, 2006); https://www.news24.com/fin24/mittal-sad-about-racists-20060219

[11] Global Indians who have donated who have donated millions of dollars to U.S. universities, (TheTimes of India, 2023); https://timesofindia.indiatimes.com/india/global-indians-who-have-donated-millions-of-dollars-to-us-universities/articleshow/101487950.cms

[12] Initiative to Transform Yale University’s Engagement with India (Yale News, 2008);  https://news.yale.edu/2008/11/17/initiative-transform-yale-university-s-engagement-india

[13] US Hindu group files complaint against university over ‘anti-Hindu’ conference (Rediff, 2021); https://www.rediff.com/news/report/us-hindu-group-files-complaint-against-university-over-anti-hindu-conference/20211007.htm

[14] Yale professor blames Islamist attacks against Hindu temples in Bangladesh on Narendra Modi, backtracks after outrage (OpINdia, 2021); https://www.opindia.com/2021/04/yale-professor-sparks-outrage-ahmed-mushfiq-mobarak-islamist-attacks-against-hindu-temples-on-narendra-modi/#google_vignette

[15] Mahindra gifts 10 million to alma mater harvard (The Times of India, 2010); https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/mahindra-gifts-10m-to-alma-mater-harvard/articleshow/6680992.cms

[16] Harvard and the Indian Billionaires (The Medha Journal, 2010); https://www.medhajournal.com/harvard-and-the-indian-billionaires/

[17] $50 million gift from Tata Trusts to Harvard Business School under scrutiny (Financial Express); https://www.financialexpress.com/business/industry-50-million-gift-from-tata-trusts-to-harvard-business-school-under-scrutiny-1181574/

[18] UPDATED: Harvard Business School’s Gift from Tata Trusts (Daily Caller, 2018); https://dailycaller.com/2018/05/21/harvard-business-school-tata/

[19] Harvard and the Indian Billionaires (The Medha Journal, 2010); https://www.medhajournal.com/harvard-and-the-indian-billionaires/

[20] Crackling News: India allows Foreign Higher Educational Institutions to set up in-country campus (Lexology; 2023); https://www.lexology.com/library/detail.aspx?g=c744c9a8-c7a1-4a3d-aa79-c563da53f7d5

Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha
Rakesh Krishnan Simha is a globally cited defense analyst. His work has been published by leading think tanks, and quoted extensively in books on diplomacy, counter terrorism, warfare and economic development. His work has been published by the Hindustan Times, New Delhi; Financial Express, New Delhi; US Air Force Center for Unconventional Weapons Studies, Alabama; the Centre for Land Warfare Studies, New Delhi; and Russia Beyond, Moscow; among others. He has been cited by leading organisations, including the US Army War College, Pennsylvania; US Naval PG School, California; Johns Hopkins SAIS, Washington DC; Centre for Air Power Studies, New Delhi; Carnegie Endowment for International Peace, Washington DC; and Rutgers University, New Jersey.
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