बॉलीवुड की राष्ट्रवादी लहर से उदारवादियों में हड़कंप
- बॉलीवुड में राष्ट्रवादी विषयों को उठाया जा रहा है। इसमें काफी तेजी आई है। इसने बॉक्स ऑफिस पर भी धमाल मचाया है।
- उदारवादी दर्शक और आलोचक इन फिल्मों पर ऐतिहासिक नैरेटिव को बदलने और हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं।
- “स्वतंत्र वीर सावरकर” बायोपिक विवाद का केंद्र बिंदु बन गई है, जिसने भारतीय इतिहास और राष्ट्रवाद के फिल्मांकन पर बहस छेड़ दी है।
- हमेशा की तरह, पश्चिमी मीडिया अपने हिंदू विरोधी नैरेटिव के लिए तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहा है।
- फिर भी, भारतीय दर्शकों के बीच राष्ट्रवादी फिल्मों की लोकप्रियता से पता चलता है कि देशभक्ति सिनेमा की मांग बढ़ रही है और पहले से प्रचलित उदारवादी नैरेटिव को चुनौती मिल रही है।
भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवाद का उदय एक ऐतिहासिक घटना के रूप में देखा जा रहा है, जहां फिल्म निर्माता अपनी कहानियों में राष्ट्रीय गौरव, हिंदू संस्कृति और ऐतिहासिक घटनाओं या व्यक्तित्वों को प्रमुखता से शामिल कर रहे हैं। पिछले दशक में इस प्रवृत्ति ने तेजी से रफ्तार पकड़ी है, खासकर ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक,’ ‘तानाजी,’ ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी,’ ‘द कश्मीर फाइल्स,’ और ‘केसरी’ जैसी फिल्मों के साथ यह ट्रेंड बेहद लोकप्रिय हुआ है।
वर्तमान में हिंदू धर्म के प्रति नफरत एक सामान्य बात बन चुकी है। भारत और पश्चिम दोनों में उदारवादी चिंतित हैं। वे, जो दयालु अब्दुल चाचा और बड़े दिल वाले ईसाई पादरी जैसे रूढ़िवादी किरदारों के आदी हो चुके हैं, जानते हैं कि ऐसे पात्र केवल बॉलीवुड की काल्पनिक दुनिया में ही पाए जाते हैं। इन नए रूझानों की सफलता को देखकर उदारवादी गुटों में खलबली मची हुई है। क्योंकि ये फिल्में पिछले 70 वर्षों से चले आ रहे नैरेटिव के विपरीत हैं, इसलिए ये गुट प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हैं। आजकल उनकी नज़र ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ पर बनी बायोपिक पर टिकी हुई है, जिसे वे अपने निशाने पर ले रहे हैं।
यह फिल्म महाराष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदरदास सावरकर के जीवन पर आधारित है। सावरकर को एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिन्होंने मोहनदास गांधी की तुलना में भारत को साम्राज्यवादी ब्रिटेन के चंगुल से मुक्त कराने में अधिक योगदान दिया। सावरकर को 50 साल जेल (दो आजीवन कारावास) की सजा सुनाई गई थी। 1911 से 1921 तक 10 वर्षों के लिए, उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की कुख्यात सेलुलर जेल में क्रूर और अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया था।[1] अंग्रेजों द्वारा जेल को बंद करने का फैसला करने के बाद, उन्हें अंततः 1924 में रिहा होने से पहले भारत की उच्च सुरक्षा वाली जेल में भेज दिया गया।[2]
इसके विपरीत, गांधी को हर बार गिरफ्तारी के बाद कुछ ही दिन या सप्ताह जेल में बिताने पड़े, और उन्हें न्यूनतम सुरक्षा वाली जेलों में रखा गया।[3] गांधी का सबसे लंबा कारावास 1942 से 1945 तक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के लिए रहा, जहाँ उन्हें आगा खान के महल में रखा गया, जो 19 एकड़ के हरे-भरे बाग से घिरा था।[4]
लेकिन सच्चाई बहुत देर तक छुपाई नहीं जा सकती। मार्च 2024 में, एसोसिएटेड प्रेस ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था “As India’s election nears, some Bollywood films promote Modi politics by embracing Hindu nationalism.” लेखक शेख सालिक हैं, जो एक कट्टर हिंदूफोबिया से ग्रस्त है। दिल्ली के इस लेखक की एजेंडा वाली पत्रकारिता और लेखन इस लेख से स्पष्ट है, जिसमें भारत या हिंदुओं के बारे में एक भी सकारात्मक स्टोरी नहीं है। इसके विपरीत, उनके लेख तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और भारत द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई को मुस्लिम अधिकारों पर हमले के रूप में दिखाते हैं।[5] दुर्भाग्य से, डीईआई (DEI – the principle of Diversity, Equality and Inclusion) ” के नाम पर, एपी (AP – Associate Press) उसे अपने हिंदू विरोधी विचारों को सार्वजनिक डोमेन में लाने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
सालिक का मुख्य विवाद यह है कि स्वतंत्र वीर सावरकर “ध्रुवीकरण मुद्दों पर आधारित बॉलीवुड में रिलीज़ होने वाली फिल्मों जैसा है, जो या तो मोदी और उनकी सरकार के राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देते हैं या उनके आलोचकों की आलोचना करते हैं।”
“मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार में, कई फिल्म निर्माताओं ने उनकी बहादुरी का बखान करते हुए भूतपूर्व हिंदू राजाओं पर फिल्में बनाई हैं। भारतीय सेना का गुणगान करने वाली उग्र और एक्शन से भरपूर फिल्में बॉक्स-ऑफिस पर सफल रही हैं। हिंदू राष्ट्रवादियों की प्रशंसा करने वाले राजनीतिक नाटक और बायोपिक आम बात हैं। इनमें से ज़्यादातर फिल्मों में, विलेन मध्ययुगीन मुस्लिम शासक, वामपंथी या विपक्षी नेता, स्वतंत्र विचारक या मानव अधिकार कार्यकर्ता समेत पड़ोसी पाकिस्तान होते है। सावरकर पर बायोपिक में सावरकर भारत के हिंदू राष्ट्र के रूप में भविष्य की वकालत करते हैं।”
तथ्यों के साथ खिलवाड़
पश्चिमी मीडिया अपने तथ्य-जांच संसाधनों और प्रक्रियाओं पर गर्व करता है। उनकी न्यूज़रूम में कई संपादक और तथ्य-जांचकर्ता होते हैं, जो कहानियों की पूरी तरह से जांच करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, यह समझ से परे है कि एपी ने सालीक को चुनिंदा तथ्यों और झूठ का सहारा लेने की इजाजत कैसे दी। उदाहरण के तौर पर वे बताते है कि आने वाली दो फ़िल्में 2002 में “पश्चिमी गुजरात में ट्रेन में आग लगाने” को ले कर एक “साजिश” का खुलासा करने का दावा करती हैं, जिसने भारत में मुस्लिम विरोधी दंगे को भड़काया था।
पहली बात तो ये कि इस लेखक ने इस तथ्य के साथ सरासर बेईमानी की है। उसने यह बताने का कष्ट नहीं किया कि “ट्रेन में आग लगाना” मुसलमानों द्वारा निर्दोष हिंदू तीर्थयात्रियों को जलाने की एक सुनियोजित साजिश थी। 27 फरवरी, 2002 को, साबरमती एक्सप्रेस का एक कोच अयोध्या में राम मंदिर स्थल से यात्रियों को लेकर लौट रहा था। गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के पास एक बड़ी मुस्लिम भीड़ ने इसमें आग लगा दी थी। ट्रेन हमले में 59 हिंदू श्रद्धालु जलकर मर गए, जिनमें से एक बच्चा भी था। उसकी उम्र सिर्फ़ 16 दिन थी। इस घटना ने पूरे गुजरात में धार्मिक दंगे भड़का दिए।[6]
मार्च 2011 में, एक ट्रायल कोर्ट ने 31 लोगों को दोषी ठहराया, जिनमें से 20 को आजीवन कारावास की सज़ा मिली और 11 को फांसी की सज़ा सुनाई गई। कुछ प्रतिवादियों ने दावा किया कि उनकी संलिप्तता सिर्फ़ पत्थरबाज़ी या पेट्रोल खरीदने तक सीमित थी। हालाँकि, राज्य ने इस साज़िश को गंभीर माना, क्योंकि आग लगाने से पहले ट्रेन के डिब्बे को बाहर से बंद कर दिया गया था, और किसी को भी भागने से रोकने के लिए पत्थर फेंके गए थे।[7]
यह ट्रेन में आग लगाना भर नहीं था, यह एक नरसंहार था। उदारवादी समूह गोधरा में आगजनी को गुजरात दंगों से अलग करने की कोशिश करते रहे हैं। सालिक कहते हैं, “दंगों में 1,000 से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे। यह मोदी के राजनीतिक करियर का एक बेहद विवादास्पद प्रकरण था, क्योंकि उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।” परंतु वह यह बताने का कष्ट नहीं करता कि मारे गए लोगों मे से 254 हिंदू भी थे।”[8]
यहां पर एपी का लेख अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह गंवा देता है, क्योंकि यह केवल एक पक्ष को खलनायक और दूसरे को पीड़ित के रूप में पेश करने पर केंद्रित है। एपी ने सालीक के प्रोपेगेंडा को समर्थन दिया और सामान्य तथ्य-जांच भी नहीं की, जिससे यह पता चलता है कि एजेंसी सच्चाई के बजाय हिंदुओं और भारत को बदनाम करने वाले नैरेटिव को बढ़ावा देना चाहती है।
सालीक न केवल एक संकीर्ण विचारधारा वाले व्यक्ति दिखते हैं, बल्कि एक औसत दर्जे के पत्रकार भी हैं। शायद उन्होंने अपने लेख की लंबाई बढ़ाने के लिए अनावश्यक शब्दों का इस्तेमाल किया है। इसे उन्होंने बस्तर, जो माओवादी विद्रोह पर आधारित है, पर निशाना साधकर हासिल करते हैं। उसने लिखा है, “विद्रोहियों के अलावा, इसके मुख्य खलनायक मानव अधिकार कार्यकर्ता और वामपंथी बुद्धिजीवी थे।“ एक आलोचक ने इसे “कम्युनिज्म के विरुद्ध दो घंटे की झड़ी” का खिताब दिया।
आखिर, असल समस्या क्या है? क्या साम्यवाद वही विचारधारा नहीं है, जिसे लगभग हर उस देश ने नकार दिया है, जिस पर भी इसे जबरन थोपा गया था? क्या हर स्वाभिमानी यूरोपीय राष्ट्र ने इसे खारिज नहीं किया? रूस, जहाँ से यह सब शुरू हुआ, ने 1991 में साम्यवाद पर प्रतिबंध लगा दिया।[9] लेकिन फिर भी सालिक जैसे लोग कुरान की अल तकिया अवधारणा के अनुरूप साम्यवादियों के साथ अस्थायी गठबंधन बनाने से परहेज नहीं करते हैं। अल तकिया वो रणनीति है जो, जब मुसलमान कमज़ोर होते हैं, तो उन्हें झूठ बोलने और गैर-मुसलमानों के साथ दोस्ती करने का दिखावा करने की अनुमति देता है। जैसे ही उनकी स्थिति मजबूत होती जाती है, वे ऐसी दोस्ती को खत्म कर सकते हैं।[10]
फिल्म समीक्षकों की बेइमानी
स्वतंत्र वीर सावरकर की तरह ही हाल में रिलीज़ एनिमल फिल्म ने भी उदारवादियों को परेशान कर दिया। फिल्म में मुख्य चरित्र की जो कंपनी हैं, उसका लोगो स्वस्तिक है। इसकी व्याख्या करते हुए बताया भी गया है कि उनका लोगो नाज़ियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला झुका हुआ स्वस्तिक (Hakenkreuz) नहीं है।, वियतनामी-अमेरिकी अभिनेता और फिल्म निर्माता फोंग ने द गार्जियन (The Guardian) के लिए एक समीक्षा में टिप्पणी करते हुए कहा: “आत्म-जागरूकता का यह दिखावा केवल दक्षिणपंथी प्रतीकात्मकता के साथ छेड़खानी है।”[11]
फाइटर नाम की एक फिल्म भी है। इसमें पाकिस्तान में इस्लामी आतंकवादियों से लड़ने वाले भारतीय वायु सेना के पायलटों की कहानी दिखाई गयी है। इस फिल्म से ब्रिटेन की कथित सबसे बड़ी फ़िल्मी पत्रिका एम्पायर (Empire) को न जाने क्या दिक्कत हो गयी। टिमोन सिंह, जो बॉलीवुड फिल्म समीक्षक हैं, कहते हैं कि “फिल्म वही प्रदान करती है जो आप एक भारतीय सैन्य ब्लॉकबस्टर से चाहते हैं – रोमांच, ऊर्जा, और ऐसा देशभक्ति का भाव जो तिरंगे से बार-बार चेहरे पर घूंसे खाने जैसा लगता है।”[12]
मुंबई स्थित डीएम टॉकीज, जो खुद को एक सामूहिक प्रयास के रूप में बताता है, फाइटर को “राष्ट्रवादी, बेवकूफ और उबाऊ” कहता है। इसके आलोचक, प्रमित चटर्जी ने मुझे एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर बेवजह ब्लॉक कर दिया है, कहते हैं: “कुल मिलाकर फाइटर एक बेहद घटिया, संकीर्ण सोच वाली और अतिराष्ट्रवादी फिल्म है। फिल्म निर्माण स्तरहीन है, कहानी और उसका प्रस्तुतीकरण बुरी तरह से किया गया है। अदाकारी भी कोई खास याद रखने लायक नहीं है। अगर आपको अतिराष्ट्रवाद की खुराक चाहिए, तो ट्रेलर देख लें, क्योंकि फिल्म के अंत में यही लाइन आती है। वैसे, अगर आप अतिराष्ट्रवाद के लिए उत्साहित हैं, तो थोड़ा ठंडे रहें। दुनिया को और गुस्से वाले लोग नहीं चाहिए।”[13]
फिल्म पत्रिकाओं को चटर्जी के लेख को एक उदाहरण के रूप में पढ़ाना चाहिए कि खराब समीक्षा कैसे होती है। बॉलीवुड के प्रति मेरी अरुचि के बावजूद, मैंने फाइटर देखी और यह कहना गलत नहीं होगा कि यह “उबाऊ” नहीं है। हालांकि इसकी स्क्रिप्ट टॉप गन की श्रेणी में नहीं आती, जो हमेशा से बॉलीवुड की कमजोरी रही है, और इसमें कई असहज क्षण हैं। फिर भी, फिल्म अंततः आपको अवास्तविकता के बावजूद मनोरंजन प्रदान करती है। चटर्जी ने यहां सचमुच गलत कदम उठाया है। अगर आप राष्ट्रवाद के खिलाफ इतने पूर्वाग्रही हैं कि ईमानदार समीक्षा नहीं कर सकते और झूठ का सहारा लेना पड़ता है, तो आप एक फिल्म समीक्षक नहीं, बल्कि एक झूठे प्रचारक हैं।
हारी हुई लड़ाई
उदारवादियों और उनके विदेशी सहयोगियों को यह एहसास होना चाहिए कि उनकी लड़ाई अब कमजोर पड़ रही है। दशकों तक धर्मनिरपेक्षता के नाम पर झूठ परोसे जाने के बाद, दर्शक अब कुछ नया और बेहतर चाहते हैं। भारतीय सिनेमा में राष्ट्रवादी कहानियों की लहर के पीछे कई कारण हैं:
- दर्शकों की मांग: फिल्म निर्माता अक्सर अपने दर्शकों की पसंद के अनुसार काम करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनमानस में राष्ट्रवाद की भावना तेजी से बढ़ी है, जो सामाजिक और राजनीतिक कारकों से प्रेरित है। ऐसी फिल्में जो इस भावना को छूती हैं, दर्शकों के बीच लोकप्रिय होती हैं और बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई करती हैं।
- राजनीतिक माहौल: भारत की राजनीतिक स्थिति में राष्ट्रवादी भावनाओं का विस्तार हुआ है, जिसमें सत्तारूढ़ सरकार ने देशभक्ति और राष्ट्रीय पहचान के मुद्दों को प्राथमिकता दी है। इसका प्रभाव भारतीय सिनेमा सहित अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों पर भी देखा जा सकता है।
- बाज़ार की ताकतें: बॉलीवुड एक व्यावसायिक उद्योग है, और फिल्म निर्माता इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि बाजार की ताकतें किस तरह सफलता को आकार देती हैं। राष्ट्रवादी फिल्मों की व्यावसायिक सफलता ने इसी प्रकार की और फिल्में बनाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।
संदर्भ
[1] The Story of My Transportation for Life.pdf (bjp.org); https://library.bjp.org/jspui/bitstream/123456789/292/1/The%20Story%20of%20My%20Transportation%20for%20Life.pdf
[2] Vinayak Damodar Savarkar: A man convicted for his patriotism – Firstpost; https://www.firstpost.com/opinion-news-expert-views-news-analysis-firstpost-viewpoint/vinayak-damodar-savarkar-a-man-convicted-for-his-patriotism-11661461.html
[3] Gandhi Timeline – Mahatma Gandhi Chronology – Gandhi Event Chronology (gandhiheritageportal.org); https://www.gandhiheritageportal.org/chronology/event-chronology-listing/MTE=
[4] Aga Khan Palace Foundation, Gandhiji’s prison and now an Oasis in Pune – Story at Every Corner; https://storyateverycorner.com/agakhan-palace-pune/
[5] SHEIKH SAALIQ | AP News; https://apnews.com/author/sheikh-saaliq
[6] 2002 Gujarat riots: 20 years on, wounds remain fresh | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/2002-gujarat-riots-20-years-on-wounds-remain-fresh-101645987291256.html
[7] Gujarat government to press for death to 11 Godhra train-burning convicts | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/will-seek-death-penalty-for-godhra-train-burning-convicts-gujarat-to-supreme-court-101676922124902.html
[8] 2002 Gujarat riots: 20 years on, wounds remain fresh | Latest News India – Hindustan Times; https://www.hindustantimes.com/india-news/2002-gujarat-riots-20-years-on-wounds-remain-fresh-101645987291256.html
[9] Yeltsin bans Communist Party – UPI Archives; https://www.upi.com/Archives/1991/11/06/Yeltsin-bans-Communist-Party/1265689403600/
[10] Taqiyya – Wikipedia; https://en.wikipedia.org/wiki/Taqiyya#:~:text=Generally%2C%20taqiyya%20is%20the%20action,between%20Sunni%20and%20Shia%20Muslims
[11] Animal review – Ranbir Kapoor plays one of the vilest protagonists in cinema history | Movies | The Guardian; https://www.theguardian.com/film/2023/dec/02/animal-review-ranbir-kapoor-plays-one-of-the-vilest-protagonists-in-cinema-history
[12] Fighter Review – ‘Exactly what you’d expect from an Indian military blockbuster’ (empireonline.com); https://www.empireonline.com/movies/reviews/fighter-2024/
[13] ‘Fighter’ Review: Siddharth Anand’s Ill-Intentioned ‘Top Gun’ Rip-Off Induces Sleep, Not Nationalism (dmtalkies.com); https://dmtalkies.com/fighter-review-2024-indian-film-siddharth-anand-hrithik-roshan/
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