अब मकबरों से नहीं, मंदिर पर्यटन से होगी भारत की सांस्कृतिक पहचान

मंदिर पर्यटन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करके, भारत अब आक्रमणकारियों की विरासत को पीछे छोड़ते हुए, अपनी स्वदेशी सांस्कृतिक विरासत को अपनाने और अपनी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक जड़ों से दोबारा जुड़ने की दिशा में एक नई शुरुआत कर रहा है।
  • 1947 में भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान पुनः स्थापित करने का अवसर मिला, लेकिन इस्लामी संस्कृति के महिमामंडन और वैदिक विरासत के हाशिए पर चले जाने के कारण यह दिशा प्रभावित हुई।
  • अयोध्या, काशी, और मथुरा जैसे स्थलों के पुनरुद्धार और धार्मिक पर्यटन के बढ़ते आकर्षण ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • सोशल मीडिया और धार्मिक इंफ्लुएंसर्स ने मंदिरों और धार्मिक स्थलों को नई पीढ़ी के लिए आकर्षक बनाया, हालांकि इसने पवित्रता और प्रचार के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौतियां भी प्रस्तुत कीं।
  • काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, चार धाम परियोजना, और विष्णुपद मंदिर जैसी योजनाओं ने धार्मिक स्थलों का आधुनिकीकरण करते हुए स्थानीय रोजगार और बुनियादी ढांचे में सुधार किया।
  • सामुदायिक कार्यक्रमों, मंदिरों को वैदिक शिक्षा केंद्र बनाने, और धार्मिक जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रस्तावित बहुआयामी दृष्टिकोण, भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

जब 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, तो उसके पास अपनी सांस्कृतिक पहचान को पुनः परिभाषित करने और विश्व मंच पर अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति और मूल्यों की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित करने का एक अनूठा अवसर था। यह समय था जब भारत अपने औपनिवेशिक अतीत से मुक्त होकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पुनर्जीवित कर सकता था। लेकिन इसके विपरीत, भारत ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जो अपनी उपनिवेशवादी और आक्रमणकारी शक्तियों की तथाकथित सांस्कृतिक विरासत का महिमामंडन करता था। इस निर्णय ने एक प्रकार के “स्टॉकहोम सिंड्रोम” को बढ़ावा दिया, जिसमें न केवल विदेशी आक्रमणों के दौरान हुए अत्याचारों को भुला दिया गया, बल्कि इन आक्रमणकारियों की सांस्कृतिक पहचान को भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में अपनाया गया।

स्वतंत्रता के बाद की सांस्कृतिक कूटनीति में इस्लामी संस्कृति को भारत की सांस्कृतिक पहचान के मुख्य स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया। दशकों तक भारत की वास्तुशिल्पीय धरोहर को ताजमहल, हुमायूं का मकबरा और कुतुब मीनार जैसे स्मारकों का पर्याय माना गया। विशेष रूप से ताजमहल – एक इस्लामी शासक द्वारा निर्मित स्मारक – भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का केंद्रीय प्रतीक बना रहा। विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की भारत यात्रा के दौरान ताजमहल को उनकी यात्रा का अभिन्न हिस्सा बनाया गया, और इसे भारतीय संस्कृति का प्रतीक माना गया।

यह विडंबना ही है कि एक ऐसा देश, जिसने आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के तहत शताब्दियों तक अत्याचार झेले, उसी देश ने आक्रमणकारियों द्वारा निर्मित स्मारक को अपनी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना लिया। वामपंथी इतिहासकारों द्वारा मुगल शासन का व्यवस्थित महिमामंडन और उनकी क्रूरता को छिपाने के प्रयासों ने इस तथ्य को धुँधला कर दिया कि मुगल शासक अंततः आक्रमणकारी थे, जिन्होंने भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को अत्यधिक क्षति पहुँचाई।

हालाँकि, हाल के वर्षों में धार्मिक पर्यटन और मंदिर पर्यटन में हुई वृद्धि ने इन पुरानी कथाओं को चुनौती देना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अयोध्या का राम मंदिर 2024 में ताजमहल को पीछे छोड़ते हुए उत्तर प्रदेश का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया।[1] इस दौरान अयोध्या में लगभग 14 करोड़ भारतीय पर्यटक आए, जबकि आगरा में 13 करोड़ पर्यटकों ने ताजमहल का दौरा किया। राम मंदिर के उद्घाटन के बाद अयोध्या में धार्मिक पर्यटन में 70 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।[2]

सरकार द्वारा प्रमुख मंदिरों और हिंदू तीर्थ स्थलों के बुनियादी ढांचे का पुनरुद्धार इस सांस्कृतिक बदलाव को और बल दे रहा है। यह पहल भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान की संभावनाओं को दर्शाती है। भारतीय नागरिकों की धार्मिक पर्यटन में बढ़ती रुचि ताजमहल की केंद्रीयता को चुनौती दे रही है, जिससे भारत के सांस्कृतिक विमर्श में एक बड़ा बदलाव संभव हो सकता है।

कैसे अयोध्या भारत की आध्यात्मिक पहचाना को एक नया आकार दे रहा है

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और उसका उद्घाटन भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ है।

राम मंदिर के उद्घाटन के बाद के दो महीनों में अयोध्या की स्थानीय अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।[3] खुदरा विक्रेताओं, आतिथ्य उद्योग, शिल्पकारों और फूल विक्रेताओं जैसे विभिन्न व्यवसायों में, जो संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों से जुड़े हैं, तीन से चार गुना तक मुनाफा बढ़ा। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि राम मंदिर का प्रभाव केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्थानीय समुदाय की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती प्रदान की है।

राम मंदिर के उद्घाटन ने न केवल अयोध्या, बल्कि पूरे भारत में धार्मिक पर्यटन में एक नई ऊर्जा का संचार किया है। 2024 में अयोध्या में तो पर्यटकों का तांता लगा ही है, इसके साथ  प्रयागराज और मथुरा जैसे अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों ने भी क्रमशः 4.5 करोड़ और 3 करोड़ पर्यटकों को आकर्षित किया।[4] मीडिया रिपोर्ट्स आध्यात्मिक पर्यटन में बढ़ती रुचि को उजागर करती हैं, जिसमें “भारत में आध्यात्मिक स्थलों” की खोजों में उल्लेखनीय वृद्धि और पवित्र स्थलों पर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों आगंतुकों की संख्या में वृद्धि शामिल है, जिसे राम मंदिर के उद्घाटन ने और बढ़ा दिया है।[5]

ऑनलाइन ट्रैवल प्लैटफ़ॉर्म मेकमाईट्रिप ने 2021 से 2023 तक भारत में आध्यात्मिक स्थलों की खोज में 97% की वृद्धि दर्ज की है, जिसमें अयोध्या में 22 जनवरी, 2024 को होने वाले उद्घाटन समारोह से पहले अभूतपूर्व 585% की वृद्धि देखी गई। अन्य हिंदू आध्यात्मिक स्थलों की खोज में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जिनमें उज्जैन (359%), बद्रीनाथ (343%), अमरनाथ (329%), केदारनाथ (322%), मथुरा (223%), द्वारकाधीश (193%), शिरडी (181%), हरिद्वार (117%), और बोधगया (114%) शामिल हैं।[6]

2024 में नए साल के  उत्सव में एक उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला, जिसमें बड़ी संख्या में भारतीय नया साल मनाने के लिए मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों पर जाना पसंद कर रहे हैं। 1जनवरी, 2025 को देशभर में मंदिर पर्यटन में ख़ासा वृद्धि देखने को मिली,  जिसमें अयोध्या राम मंदिर, दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर और पुरी में जगन्नाथ मंदिर जैसे प्रमुख स्थलों पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। नव वर्ष के अवसर पर अकेले अयोध्या राम मंदिर में ही 200,000 से अधिक भक्तों का ताँता लग गया, जिनमें से कई साल की पहली आरती में भाग लेने के लिए लंबी कतारों में खड़े थे।[7] [8]

जबकि रेस्तरां, मॉल और मनोरंजन स्थलों पर नववर्ष मनाने का पारंपरिक ट्रेंड  हमेशा की तरह जारी रहा, भारत में प्रमुख मंदिरों में दर्शन के साथ वर्ष की शुरुआत करने का एक नया चलन सामने आया है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के साथ-साथ ओडिशा, तेलंगाना, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी प्रसिद्ध मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी, जो एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक बदलाव को दर्शाता है।[9]

ग्रेगोरियन नव वर्ष का परंपरागत रूप से भारत के धार्मिक तंत्र में कुछ ख़ास महत्व नहीं रहा। भारत में धार्मिक मान्यताओं के अनुसरा वैदिक चंद्र कैलेंडर के आधार पर कई नए साल मनाये जाते हैं। हालाँकि, वैश्वीकरण ने एक समरूप, उपभोक्ता-संचालित संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिससे नए साल जैसे अवसर मात्र प्रदर्शनकारी तमाशे बन कर रह गए हैं। जबकि भारत में पश्चिमी नव वर्ष पार्टियों, ख़रीदारी, आरामदायक यात्राओं और भोग विलासिता से परिपूर्ण अन्य प्रचलनों का पर्याय रहा है,  मंदिर के दर्शन के साथ इसे मनाने का बढ़ता चलन एक सार्थक बदलाव का संकेत देता है। यह पश्चिम के सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रति गैर-पश्चिमी दुनिया के सक्रिय प्रतिरोध को दर्शाता है, जिसमें भारत अपनी सभ्यतागत पहचान पर ज़ोर देता है। नए साल की पूर्व संध्या के दौरान धार्मिक पर्यटन में उछाल भारत के सांस्कृतिक कथानक को एक नये सिरे से परिभाषित करने के ज़मीनी स्तर के प्रयास को उजागर करता है।

अयोध्या राम मंदिर के निर्माण ने भारत में हिंदू मंदिरों के संदर्भ में एक सकारात्मक कथानक को बढ़ावा दिया है, जो प्रायः वाम-उदारवादी दृष्टिकोणों द्वारा पोषित गलत धारणाओं को चुनौती देता है। वाम-उदारवादी तंत्र अक्सर हिंदू मंदिरों का बेहद सनसनीख़ेज़ और अपमानजनक चित्रण करता आया है। अतः इस बदलाव में हिंदू मंदिरों और हिंदू धर्म के बारे में अधिक सम्मानजनक, संवेदनशील और प्रामाणिक समझ को प्रोत्साहित करते हुए एक भारत के सांस्कृतिक कथानक को एक नई दिशा प्रदान करने की क्षमता है।

सोशल मीडिया की भूमिका

 भारत में अपनी व्यापक पहुंच और प्रभाव के कारण सोशल मीडिया हिंदू धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने में सहायक रहा है। खास तौर पर जेन ज़ेड  रील्स, मीम्स और वीडियो के माध्यम से मंदिरों और तीर्थ स्थलों को रचनात्मक रूप से प्रदर्शित करके एक नये धार्मिक कथानक को आकार दे रहा है।

भारत के सभ्यतागत और सांस्कृतिक आख्यान से जुड़े लोकप्रिय हैशटैग जैसे #अयोध्या (53 लाख पोस्ट), #अयोध्याराममंदिर (14 लाख पोस्ट), #हिंदूमंदिर (32 लाख पोस्ट), #काशी (30 लाख पोस्ट), #काशीविश्वनाथ (10 लाख पोस्ट), #मथुरा (36 लाख पोस्ट), #वृंदावन (90 लाख पोस्ट) और #जगन्नाथ (14 लाख पोस्ट) इंस्टाग्राम पर भारत की धार्मिक विरासत में व्यापक रुचि को उजागर करते हैं।

भारत की सांस्कृतिक विरासत के पुनरुत्थान में धार्मिक सोशल मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स की सक्रिय भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये युवा क्रिएटर्ज़ आकर्षक कैप्शन, संगीत और दृश्य कथावाचन को मिलाकर हिंदू तीर्थ स्थलों को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल भारत के युवाओं के अपनी धार्मिक जड़ों से नए सिरे से जुड़ाव को दर्शाती है, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने और संरक्षित करने में अग्रणी के रूप में भी स्थापित करती है।

भारत सरकार ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है; हिंदू संस्कृति और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने वाले जाने-माने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को सरकार ने सम्मानित किया गया है। 2024 में, कई धार्मिक इन्फ्लुएंसर्स ने राष्ट्रीय क्रिएटर पुरस्कार जीता, जो राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार की एक पहल है। अरिदमन (इंस्टाग्राम / @vedic_siddhanta) ने पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ माइक्रो क्रिएटर का खिताब जीता। इसी तरह, कीर्तिका गोविंदसामी, जो अपने बेहद लोकप्रिय YouTube चैनल के माध्यम से वैदिक संस्कृति और सभ्यता से जुड़े विषयों को उठाती हैं, ने सर्वश्रेष्ठ कहानीकार का पुरस्कार जीता।[10]

भारत की धार्मिक विरासत को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग वैश्विक स्तर पर ‘Generation Z’ को प्रभावी रूप से आकर्षित करता है, लेकिन इसके लाभ और नुकसान दोनों हैं। जहां एक ओर, यह हिंदू धर्म को एक समकालीन रूप में प्रस्तुत करता है जिससे विभिन्न प्रकार के लोग असहज हुए बिना इसके मूल को समझ सकें, तो वहीं  दूसरी ओर, यह सार्थक प्रचार और सतही नौटंकी के बीच की महीन रेखा को पार करने का जोखिम उठाता है। प्रभावशाली लोगों द्वारा पूजा अनुष्ठानों में बाधा डालने, आगंतुकों को असुविधा पहुँचाने या वीडियो सामग्री के लिए मंदिर स्थलों की पवित्रता को भंग करने के अनेकों उदाहरणों ने सोशल मीडिया प्रचारकों संबंधी ये चिंताएँ बढ़ा दी हैं। इस मुद्दे के समाधान हेतु, उत्तराखंड सरकार ने इन धार्मिक स्थलों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए चार धामों के 50 मीटर के दायरे में वीडियोग्राफी और सोशल मीडिया रील्स के बनाये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है।[11]

जुलाई 2023 में बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने एक पत्र जारी कर मंदिर परिसर के अंदर सोशल मीडिया प्रचारकों द्वारा रील बनाने के बढ़ते चलन पर आपत्ति जताई थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के बराबर है। मंदिर समिति की टिप्पणी एक वायरल सोशल मीडिया रील से प्रेरित थी जिसमें एक महिला मंदिर परिसर में अपने प्रेमी को प्रपोज करती हुई दिखाई दे रही थी।[12]

हिंदू मंदिरों को सोशल मीडिया इंफ्ल्युएंसर्स के संदर्भ में, उचित प्रोटोकॉल को लागू करना चाहिए, परंतु साथ ही यह ध्यान रखते हुए कि अति-परंपरावादी उपायों से बचा जाए, जिनको जबरन लागू करने से हिंदू परंपरा और सभ्यता से युवाओं के सदा के लिए विमुख होने का ख़तरा उत्पन्न होता है। एक संतुलित दृष्टिकोण के लिए मंदिर अधिकारियों और जेन ज़ेड के प्रभावशाली लोगों के बीच परंपरा और आधुनिक जुड़ाव में सामंजस्य स्थापित करने के लिए रचनात्मक संवाद की आवश्यकता है।

एक समय था जब सोशल मीडिया कंटेंट के लिहाज़ से हिंदू मंदिरों को ख़ासा उपयुक्त नहीं माना जाता था, जबकि दरगाह, कव्वाली और सूफी परंपराओं जैसे इस्लामी सांस्कृतिक तत्वों ने लोकप्रिय पुनर्व्याख्याओं के माध्यम से गति प्राप्त की, जिसने उन्हें “धर्मनिरपेक्ष” अपील दी। भारत की धार्मिक विरासत पर बढ़ते सकारात्मक मीडिया फोकस में अब सांस्कृतिक आख्यानों को महत्वपूर्ण रूप से बदलने की क्षमता है।

धार्मिक विरासत को पुनर्जीवित करने में भारत सरकार की भूमिका

पिछले कुछ सालों से भारत सरकार मंदिर तंत्र के आधुनिकीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है। प्रसिद्ध मंदिरों के पुनरुद्धार और बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

सरकार की महत्वाकांक्षी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना पर 2019 में काम शुरू हुआ था, जब पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 400 इमारतों और घरों का अधिग्रहण किया गया था। 2021 में उद्घाटित यह कॉरिडोर काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा नदी के किनारे के घाटों को जोड़ता है। 5.5 एकड़ क्षेत्र में फैले इस कॉरिडोर में घाट, संग्रहालय और चार लेन वाली सड़क सहित कई सुविधाएँ शामिल हैं। इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देना और वाराणसी की समग्र आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना है।[13]

भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई अन्य मंदिर जीर्णोद्धार परियोजनाएं भी शुरू की हैं, जिनमें सोमनाथ मंदिर (गुजरात) जीर्णोद्धार परियोजना, 2013 के उत्तराखंड बाढ़ के बाद केदारनाथ मंदिर जीर्णोद्धार परियोजना, जिसने मंदिर परिसर को तबाह कर दिया था, गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के चार तीर्थ स्थलों को जोड़ने के लिए चार धाम परियोजना और 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद हिंदू मंदिरों के पुनरुद्धार के लिए जम्मू और कश्मीर में विभिन्न परियोजनाएं शामिल हैं।[14]

2022 की ऑपइंडिया रिपोर्ट में प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि को उजागर किया गया है, जो सरकारी मंदिर पुनरुद्धार परियोजनाओं के कारण संभव हुआ है। अकेले वाराणसी में पर्यटकों की संख्या गोवा की तुलना में आठ गुना अधिक देखी गई, जबकि अयोध्या, मथुरा और प्रयागराज ने भी गोवा के पर्यटकों के आँकड़ों को पार कर लिया, जिससे धार्मिक पर्यटन में पर्याप्त वृद्धि हुई।[15]

2024 के केंद्रीय बजट में, भारतीय वित्त मंत्री ने बिहार में विष्णुपद मंदिर कॉरिडोर और महाबोधि मंदिर कॉरिडोर के विकास के लिए धन आवंटित किया। भगवान विष्णु को समर्पित विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के किनारे स्थित है, जबकि बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।[16]

हालांकि, मोदी सरकार की मंदिर पुनरुद्धार परियोजनाओं को वामपंथी उदारवादी और धार्मिक, दोनों ही हलकों से आलोचना का सामना करना पड़ा है। वामपंथी उदारवादी भारत के सभ्यतागत लोकाचार को पुनः प्राप्त करने के इन प्रयासों को विभाजनकारी मानते हैं, जबकि धार्मिक समुदाय के कुछ लोग, विशेष रूप से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बारे में, तर्क देते हैं कि इसने छोटे मंदिरों को ध्वस्त करके मूल स्थानों की पवित्रता को भंग कर दिया। इसके अतिरिक्त, रिपोर्टें बताती हैं कि परियोजना के शुरुआती चरण में मंदिर के पास आवासीय और व्यावसायिक संरचनाओं को ध्वस्त करके परिवारों को विस्थापित किया गया।[17] प्राचीन संरचनाओं को पुनर्स्थापित करना जटिल है। यह मुद्दा नैतिक दुविधाओं और विवादास्पद मुद्दों से भरा हुआ है। एक संतुलित दृष्टिकोण के लिए व्यापक हिंदू समुदाय और धार्मिक नेताओं को विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करने के लिए शामिल करने की आवश्यकता है।

दशकों से, वामपंथी-उदारवादी तंत्र ने भारत की हिंदू विरासत को कमज़ोर करने की कोशिश की है, जबकि इस्लामी आक्रमणकारियों की सांस्कृतिक विरासत को भारत की सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक के रूप में पेश किया है। इस्लामी संस्कृति को भारत की धर्मनिरपेक्ष विरासत के रूप में पेश करना, जिसे अक्सर गंगा-जमुनी तहज़ीब कहा जाता है, भारत की वैदिक विरासत को पीछे छोड़ देता है, जिससे भारत का सांस्कृतिक विमर्श मुगल और सूफी प्रभावों तक सीमित हो कर रह जाता है।

दिल्ली के सांस्कृतिक स्थलों पर इसकी तथाकथित इस्लामी विरासत का उत्सव मनाने वाले आख्यानों का बोलबाला रहा है, जिससे इसका इतिहास इस्लामी विरासत के महिमामंडन तक सीमित हो गया है। इस विकृति के कारण एक ऐसी युवा संस्कृति उपजी है जिसके अन्तर्गत भारत के युवा वर्ग का एक बड़ा तबका लोधी गार्डन, हुमायूं के मकबरे और दिल्ली की अनेकों दरगाहों जैसी जगहों से भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ा हुआ है, न कि अपनी सनातनी जड़ों से। शायरी, ग़ज़ल और सूफ़ी संगीत जैसी सांस्कृतिक विधाओं का ज़बर्दस्त प्रचार-प्रसार, और उसके साथ ही इस्लामी वास्तुकला का महिमा मंडन कर उसका अति आकर्षक प्रस्तुतीकरण और पैकेजिंग करने वाली हेरिटेज वॉकस का बढ़ता चलन, इन सभी ट्रेडों ने मिल-जुलकर एक बेहद सुनियोजित ढंग से भारत की हिंदू विरासत को पीछे छोड़ दिया है। यह प्रवृत्ति, जो पूरे देश में दिखाई देती है, भारत के सांस्कृतिक आख्यानों पर वाम-उदारवादी प्रभुत्व का परिणाम है, जो आक्रमणकारियों की विरासतों का महिमामंडन करते हुए उनके शोषणकारी प्रभाव को अनदेखा करता है।

धार्मिक पर्यटन पर भारत ने जो नए सिरे से फ़ोकस करना शुरू किया है, उसमे घरेलू और वैश्विक स्तर पर भारत संबंधी सांस्कृतिक आख्यानों को नया आकार देने की महत्वपूर्ण क्षमता है। काशी और अयोध्या के विकास के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार अब आध्यात्मिक पर्यटन को और बढ़ावा देने के लिए मथुरा को प्राथमिकता दे रही है। बेहतर बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी के साथ, काशी-मथुरा-अयोध्या कॉरिडोर में एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनने की क्षमता है, जो संभवतः दिल्ली-आगरा-जयपुर कॉरिडोर की लोकप्रियता को पार कर जाएगा।

निष्कर्ष

मंदिर पर्यटन को बढ़ावा देना भारत के सांस्कृतिक कथानक को पुनः स्थापित करने के लिए एक प्रभावी प्रारंभिक बिंदु है, लेकिन भारतीय नागरिकों के बीच धार्मिक चेतना को फिर से जगाने के लिए एक गहन, बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

इस प्रयास में वृहद और सूक्ष्म-स्तरीय रणनीतियों को शामिल किया जाना चाहिए। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना एक मजबूत वृहद-स्तरीय पहल है, लेकिन छोटे शहरों और गांवों में ज़मीनी स्तर पर सामुदायिक कार्यक्रमों का आयोजन युवाओं को उनकी वैदिक विरासत से फिर से जोड़ने के लिए आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ धर्मांतरण, लव जिहाद और भूमि जिहाद जैसी चुनौतियों को देखते हुए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

अतः विशेष रूप से युवाओं के बीच धार्मिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए समुदाय द्वारा संचालित प्रयास महत्वपूर्ण हैं। लेखक और शोधकर्ता स्टीफन नैप द्वारा “भारत में आध्यात्मिक क्रांति लाने” के लिए प्रस्तावित नवीन विचारों को लागू करना[18], इस प्रयास को एक मूल्यवान दिशा प्रदान कर सकता है:

  • स्वामियों और आचार्यों द्वारा भारत के विभिन्न गाँवों में लगातार पदयात्राएँ।
  • हर गाँव में छोटे-छोटे मंदिर बनाना।
  • ग्रामीणों को संगठित करना और उन्हें अपनी संस्कृति की रक्षा करना सिखाना।
  • परंपराओं और संस्कृति को साझा करने की ओपन डोर पालिसी स्थापित करना।
  • धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए मंदिर की गतिविधियों में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाएँ।
  • मंदिरों को वैदिक शिक्षा के केंद्र बनना चाहिए; मंदिरों में वैदिक संस्कृति और दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर नियमित कक्षाएँ आयोजित की जानी चाहिए।
  • गरीबों की शैक्षिक और चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न धार्मिक हितधारकों को आगे आना चाहिए।
संदर्भ 

[1] Ayodhya overtakes Taj Mahal, becomes UP’s top tourist destination in 2024 | India News – Business Standard; https://www.business-standard.com/india-news/uttar-pradesh-tourism-ayodhya-record-visit-spiritual-tourism-2024-124122000418_1.html

[2] Ayodhya Ram Mandir becomes UP’s most visited attraction of 2024; outshines the Taj Mahal | – Times of India; https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/travel/ayodhyas-ram-mandir-becomes-ups-most-visited-attraction-of-2024-outshines-the-taj-mahal/articleshow/116851743.cms

[3] Ayodhya’s economy gets huge boost 2 months after  Ram Mandir opening – India Today;  https://www.indiatoday.in/india/story/ayodhya-economy-ram-temple-inauguration-pran-pratishtha-boost-property-rates-2518775-2024-03-24

[4] Ayodhya Leads Tourist Surge in Uttar Pradesh, Surpasses Varanasi With 11 Crore Visitors in First Six Months of 2024; https://swarajyamag.com/news-brief/ayodhya-leads-tourist-surge-in-uttar-pradesh-surpasses-varanasi-with-11-crore-visitors-in-first-six-months-of-2024

[5]  Ayodhya Ram Mandir, Varanasi, Tirupati: India Witnesses Rise Of Spiritual Tourism;  https://www.india.com/travel/articles/ayodhya-ram-mandir-varanasi-tirupati-india-witnesses-rise-of-spiritual-tourism-6683172/

[6] MakeMyTrip sees 97% surge in spiritual tourism, Ayodhya in limelight ahead of Ram Mandir inauguration – India Today; https://www.indiatoday.in/business/story/makemytrip-spiritual-tourism-rise-ram-mandir-consecration-ceremony-ayodhya-pm-modi-2488029-2024-01-12

[7]  Ayodhya Devotees throng Ram Janmabhoomi temple on first day of New Year 2025 Video latest updates – India TV;  https://www.indiatvnews.com/uttar-pradesh/ayodhya-devotees-throng-to-ram-janmabhoomi-temple-on-first-day-of-new-year-2025-video-prayers-wishes-greetings-images-latest-updates-2025-01-01-968934

[8] Ayodhya: Over 2 lakh devotees visit Ram Temple on first day of 2025 | Today News; https://www.livemint.com/news/india/ayodhya-ram-temple-witness-huge-rush-of-devotees-on-first-day-of-2025-11735738367124.html

[9]   Religious places most visited by people on New Year’s Day – CNBC TV18;   https://www.cnbctv18.com/travel/culture/religious-places-most-visited-by-people-on-new-years-day-19533237.htm

[10] National Creators Award 2024: Discover the Winning Creators List;   https://www.deccanherald.com/india/national-creators-award-2024-check-out-the-winners-2928177#20

[11]   Uttarakhand bans use of mobiles phones to shoot reels near Char Dham temples – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/uttarakhand-bans-use-of-mobile-phones-near-chardham-temples-yamunotri-gangotri-kedarnath-badrinath-2540857-2024-05-18

[12] Kedarnath temple committee objects to influencers using the premises for creating Insta Reels and YouTube shorts;  https://www.opindia.com/2023/07/kedarnath-temple-committee-proposal-video-insta-reels-influencers-phone-ban-devotees/

[13]  Shri Kashi Vishwanath Corridor Project | Kashi Official Web Portal;   https://kashi.gov.in/project-details/shri-kashi-vishwanath-corridor

[14] From Kashi to Kashmir: How PM Modi has focused on temple renovation – India Today; https://www.indiatoday.in/india/story/from-kashi-to-kashmir-how-pm-modi-has-focused-on-temple-renovation-1887210-2021-12-13

[15] Varanasi’s tourist footfall was 8 times that of Goa in 2022;   https://www.opindia.com/2023/07/varanasis-tourist-footfall-was-8-times-that-of-goa-in-2022/#google_vignette

[16] Budget boost for temple tourism as Sitharaman announces world-class corridors; these temples will see revamp; https://www.moneycontrol.com/news/business/budget-boost-for-temple-tourism-as-sitharaman-announces-world-class-corridors-these-temples-will-see-revamp-12775898.html

[17]  Varanasi locals unhappy with demolitions taking place in temple town due to ongoing Corridor project – Firstpost; https://www.firstpost.com/india/varanasi-locals-unhappy-with-demolitions-taking-place-in-temple-town-due-to-ongoing-corridor-project-6657781.html

[18]  Creating a Spiritual Revolution in India;  https://www.stephen-knapp.com/creating_a_spiritual_revolution_in_india.htm

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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