बालेन शाह का राजनीतिक उदय : नेपाल में हिंदू सभ्यतागत पुनर्जागरण की प्रतिध्वनि

शाह का एजेंडा औपनिवेशिक विरासत और वामपंथी वैचारिक प्रभुत्व दोनों को चुनौती देता है, और संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से अलग कर उन्हें राष्ट्रीय पहचान, जवाबदेही और व्यावहारिक शासन के नए मानकों की ओर ले जाने की कोशिश दिखती है।
 सारांश

नेपाल के हालिया चुनाव एक अहम मोड़ की ओर संकेत करते हैं। बालेन शाह का उभार न केवल पुराने राजनीतिक ढाँचों को चुनौती देता है, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श में बदलाव का संकेत भी देता है। उनका नेतृत्व प्रशासनिक सुधारों को सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के साथ जोड़ता है। यह शैली उनके नीतिगत फैसलों, प्रतीकात्मक कदमों और सार्वजनिक संदेशों में साफ दिखती है। लोकप्रिय संस्कृति के उपयोग से लेकर शिक्षा और संस्थागत सुधारों तक, उनका दृष्टिकोण लंबे समय से प्रभावी वामपंथी ढाँचों को चुनौती देता है। नेपाल की धार्मिक विरासत और उसके हिंदू राज्य के इतिहास के संदर्भ में, यह बदलाव सांस्कृतिक पहचान और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर बहस को फिर से सामने ला रहा है। इसका दूरगामी परिणाम अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह दौर नेपाल की सभ्यतागत दिशा और राजनीतिक भविष्य पर गहरे मंथन का संकेत देता है।

नेपाल के हालिया चुनाव देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुए हैं। पिछले कई दशकों में बहुत कम घटनाएँ ऐसी रही हैं, जिन्होंने पुराने राजनीतिक समीकरणों को इस तरह हिलाया हो। प्रधानमंत्री बालेन शाह के उभरने और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की मजबूत जीत ने राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदल दी है। लंबे समय से प्रभावशाली रही ताकतों का दबदबा इस जीत से कमजोर पड़ा है। यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि बदलाव के लिए साफ जनादेश है।

शाह सरकार के शुरुआती फैसले बताते हैं कि उनका फोकस संस्थागत सुधारों के साथ-साथ राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने पर है। शाह अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और स्पष्ट राजनीतिक संदेशों के लिए जाने जाते हैं। उनकी नेतृत्व शैली यह दिखाती है कि वे शासन को समाज के बड़े मूल्यों से जोड़ना चाहते हैं।

साथ ही, नेपाल की राजनीति और संस्थानों में लंबे समय से मौजूद वामपंथी प्रभाव से दूरी बनाने के संकेत भी दिख रहे हैं। इसके बजाय, सरकार ऐसे मॉडल की ओर बढ़ती दिखती है, जो नैतिक और सभ्यतागत आधार पर टिका हो।

2006 में धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनने के बावजूद, नेपाल आज भी हिंदू सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वर्षों की राजनीतिक अस्थिरता के बाद, यह चुनाव एक अधिक स्थिर दौर की शुरुआत का संकेत दे सकता है, जिसका असर नेपाल से बाहर भी महसूस होगा।

यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक नहीं है। यह उन पुराने वैचारिक ढाँचों को भी सीधी चुनौती है, जिन्होंने लंबे समय तक नेपाल की राजनीति और संस्थानों को प्रभावित किया है।

बालेन शाह: नई पीढ़ी का राजनीतिक चेहरा

नेपाल की राजनीति में बालेन शाह का उदय अपने असामान्य स्वरूप और गहरे सांस्कृतिक प्रभाव के कारण अलग ही दिखाई देता है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि बालेन शाह पारंपरिक राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं आते। वे पेशे से स्ट्रक्चरल इंजीनियर रहे हैं और एक रैपर के रूप में भी आम लोगों के बीच अपनी पहचान बना चुके हैं। शाह ने पहली बार काठमांडू के मेयर का चुनाव एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीतकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। औपचारिक राजनीति में आने से बहुत पहले ही वे नेपाल के हिप-हॉप के माध्यम से लोकप्रिय हो चुके थे, जहाँ उनके गीत भ्रष्टाचार, असमानता और व्यवस्था की कमियों जैसे मुद्दों को उठाते थे[1] उन्होंने संगीत से राजनीति में कदम रखा। इससे उनकी यात्रा खास बनी, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने लोकप्रिय संस्कृति की भाषा और ऊर्जा को सीधे राजनीति तक पहुंचाया।

यह समन्वय विशेष रूप से मार्च 2026 में रिलीज़ हुए उनके गीत “जय महाकाली” के संदर्भ में स्पष्ट दिखाई देता है।[2] इस गीत में देवी महाकाली को ‘शक्ति’ और ‘संरक्षण’ के स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। गीत की छवियाँ और बोल राष्ट्रीय आकांक्षाओं को सभ्यतागत प्रतीकों से जोड़ते हैं और नेपाल की चुनौतियों व उम्मीदों को एक धार्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं। यह केवल भक्ति गीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक वक्तव्य बनकर सामने आया, जो राष्ट्रीय पुनर्जागरण को परंपराओं से जोड़ता है। नेपाल के आम जन मानस पर इसका प्रभाव तुरंत दिखा; शाह के चुनाव अभियान और नेपाल के रोज़मर्रा जीवन के दृश्यों से सजा यह वीडियो जारी होते ही व्यापक चर्चा का विषय बन गया[3]

सांस्कृतिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति का यही अनूठा रूप उनके शपथ ग्रहण समारोह में भी देखने को मिला, जहाँ हिंदू और बौद्ध परंपराओं का सुंदर समन्वय दिखा। युवा ब्राह्मण पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चारण किया, बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पवित्र स्तोत्रों का पाठ किया गया, और शंखनाद जैसी परम्परायें भी शपथ-ग्रहण समारोह का हिस्सा बनीं। विशेष बात यह रही कि ये सभी अनुष्ठान एक साथ संपन्न हुए, जिसने नेपाल की उस सभ्यतागत संरचना को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ हिंदू और बौद्ध परंपराएँ एक साझा निरंतरता के सूत्र में बँधी हुई हैं[4]

नेपाल के कुछ बौद्धिक वर्गों ने इस आयोजन की आलोचना करते हुए इसे अत्यधिक धार्मिक बताया[5] यह केवल वैचारिक विरोध नहीं है, बल्कि उस बेचैनी का संकेत है जो लंबे समय से विमर्श को नियंत्रित करने वाले एक स्थापित वर्ग के भीतर दिख रही है। वर्षों तक इन समूहों ने शासन से जुड़े विमर्श को एक सीमित धर्मनिरपेक्षता के दायरे में रखा। ऐसे में धार्मिक प्रतीकों की खुली वापसी उनके इस प्रभाव को चुनौती देती दिखाई देती है, और सार्वजनिक क्षेत्र में उनकी पकड़ के धीरे-धीरे कमजोर होने का संकेत देती है। दूसरी ओर, कई लोगों के लिए यह आयोजन विभाजन का नहीं, बल्कि समन्वय का प्रतीक बना, जो बहुलतावादी ढाँचे के भीतर नेपाल की सभ्यतागत पहचान को फिर से सामने लाता है[6]

राम नवमी जैसे शुभ अवसर पर शपथ लेने का शाह का निर्णय भी इसी सभ्यतागत जुड़ाव को मज़बूत करता है। अपने चुनाव अभियान में रामायण का लगातार उल्लेख करना भी यह इशारा करता है कि वे राजनीतिक संदेशों को साझा सांस्कृतिक कथाओं से जोड़ने का एक सोचा-समझा प्रयास कर रहे हैं।[7]

इस दृष्टि से बालेन शाह की राजनीतिक शैली सिर्फ उनकी व्यक्तिगत छवि नहीं है। यह एक नए नेतृत्व के मॉडल को दिखाती है, जहाँ लोकप्रिय संस्कृति, सभ्यतागत पहचान और शासन एक साथ जुड़े होते हैं। उनकी यह अलग शैली न केवल राजनीतिक अभिव्यक्ति के मानकों को बदलती है, बल्कि उस वैचारिक ढाँचे को भी चुनौती देती है, जिसने लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श पर पकड़ बनाए रखी है।

औपनिवेशिक मानसिकता और वामपंथियों को सीधी चुनौती

बालेन शाह का शुरुआती कार्यकाल एक महत्वाकांक्षी सुधार एजेंडा के लिए पहचाना जा रहा है, जिसका लक्ष्य शासन, प्रशासन और शिक्षा के प्रमुख क्षेत्रों को नए सिरे से ढालना है। उनकी 100-बिंदु योजना यह दिखाती है कि वे सिर्फ छोटे बदलाव नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन करना चाहते हैं। इस योजना का एक प्रमुख और चर्चित हिस्सा वह निर्देश है, जिसमें विदेशी नाम वाले शैक्षणिक संस्थानों को स्थानीय और स्वदेशी पहचान अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।[8] कई लोगों ने इसे सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के शेष प्रभाव को कम करने और युवाओं में मजबूत राष्ट्रीय पहचान विकसित करने की कोशिश के रूप में देखा है।

ये सुधार एक ऐसे व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं जिसका उद्देश्य उन लंबे समय से सक्रिय प्रभावशाली नेटवर्कों को चुनौती देना है, जो कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े रहे हैं और जिन्होंने नेपाल की शिक्षा व्यवस्था तथा सार्वजनिक संस्थानों को आकार दिया है। दशकों से वामपंथी राजनीति पर आधारित वैचारिक ढाँचे शासन से आगे बढ़कर अकादमिक और सामाजिक क्षेत्रों तक पर हावी रहे हैं, जिससे संस्थागत कार्य और राजनीतिक एक्टिविज़्म के बीच की रेखा धुंधली होती चली गई।

आलोचकों और समर्थकों, दोनों का ही यह मानना है कि स्थानीय स्कूलों का नाम पश्चिमी संस्थानों के नाम पर रखने की प्रवृत्ति लंबे समय से प्रतिष्ठा और गुणवत्ता की धारणा से जुड़ी रही है। द राइजिंग नेपाल में लिखते हुए टिप्पणीकार एल.बी. थापा ने इसे मानसिक उपनिवेशवाद का एक रूप बताया है, जहाँ विदेशी संबद्धता को श्रेष्ठता के रूप में देखा जाता है[9]

इस दिशा में एक प्रमुख और विवादास्पद कदम शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी दफ्तरों में राजनीतिक गतिविधियों पर रोक है। इसके तहत छात्र संगठनों की जगह छात्र परिषदें बनाई जाएंगी, और शिक्षकों व कर्मचारियों को खुली पार्टी संबद्धता से दूर रखा जाएगा। लंबे समय से ये संस्थान, खासकर वामपंथी समूहों के प्रभाव में, वैचारिक सक्रियता के केंद्र बने रहे हैं, जहाँ शिक्षा और राजनीति की सीमाएँ धुंधली होती गईं। इस नीति को इन संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने और टकराव व गुटबाज़ी कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है[10] [11]

इन सुधारों को नेपाल के राजनीतिक इतिहास की पृष्ठभूमि में समझना भी आवश्यक है, जहाँ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (UML) और माओवादी सेंटर जैसे वामपंथी दलों का लंबे समय तक वर्चस्व रहा है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (RSP) की चुनावी सफलता इसी विचारधारा को एक बड़ी चुनौती है। बालेन शाह का ज़ोर वैचारिक आग्रहों के बजाय शासन सुधारों पर है, जो उन्हें पारंपरिक राजनीतिक नेताओं से अलग करता है।

संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल कर RSP की जीत का स्तर भी बदलाव की जन-इच्छा को दर्शाता है। कई स्थापित राजनीतिक नेताओं की हार इस बात का संकेत है कि राजनीति अब पहचान-आधारित विमर्श से हट कर परिणाम-आधारित अपेक्षाओं की ओर बढ़ रही है[12]

इसके साथ ही, शाह की विदेश नीति में तटस्थता और राष्ट्रीय हित पर जोर नेपाल के बाहरी संबंधों को नए सिरे से संतुलित करने का संकेत देता है। कुछ विश्लेषक इसे पारंपरिक प्रभावों, खासकर चीन की भूमिका, से दूरी बनाने की कोशिश मानते हैं। हालांकि, भू-राजनीतिक जटिलताओं को देखते हुए, ऐसा संतुलन धीरे-धीरे और सावधानी से ही आगे बढ़ेगा।

नेपाल का धार्मिक इतिहास

नेपाल की सभ्यतागत पहचान एक गहरी और दीर्घकालिक धार्मिक विरासत में निहित है, जहाँ हिंदू और बौद्ध परंपराएँ संवाद और सह-अस्तित्व के साथ विकसित हुई हैं। यह समन्वय केवल दार्शनिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुष्ठानों, परंपराओं, स्मृतियों और पवित्र भूगोल के माध्यम से जीवन्त रूप में दिखाई देता है। यह भूमि स्वयं धार्मिक जगत के अनेक पूज्य व्यक्तित्वों से जुड़ी रही है, जिसने नेपाल को एक व्यापक सभ्यतागत निरंतरता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।

इस विरासत का एक प्रमुख केंद्र है लुंबिनी, जो दक्षिणी नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित है और जिसे छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध का जन्मस्थान माना जाता है[13] एक विश्व की प्रमुख आध्यात्मिक परंपराओं की जन्मभूमि होने के कारण लुंबिनी सदियों से तीर्थयात्रियों और साधकों को आकर्षित करता रहा है, और जिससे नेपाल एक आध्यात्मिक चिंतन और साधना की भूमि के रूप में स्थापित होता है।

नेपाल की धार्मिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण केंद्र है जनकपुर, जिसे पारंपरिक रूप से रामायण की प्रमुख पात्र माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। प्राचीन मिथिला राज्य के राजा जनक के नाम पर बसे जनकपुर में यह विरासत आज भी जीवंत है। हर वर्ष यहाँ सीता-राम विवाह पंचमी का भव्य उत्सव मनाया जाता है, जिसमें माता सीता और भगवान राम के दिव्य विवाह का पुनर्स्मरण किया जाता है। इस उत्सव में भक्त जानकी मंदिर में एकत्र होते हैं, शोभायात्राएँ निकलती हैं, भजन-कीर्तन होते हैं और पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इस उत्सव की विशेषता अयोध्या से जनकपुर तक आने वाली प्रतीकात्मक बारात है, जो भारत और नेपाल के बीच के गहरे सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करती है और साझा धार्मिक विमर्श को सशक्त बनाती है[14] [15] [16]

नेपाल को पारंपरिक ग्रंथों में हिमवत खंड के रूप में वर्णित किया गया है। यह विचार नेपाल को हिमालय की उस पवित्र भूमि से जोड़ता है, जिसे तप, ज्ञान और दिव्य उपस्थिति का केंद्र माना गया है। पुराणों और बृहत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इस क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व का उल्लेख मिलता है। 18वीं शताब्दी में राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को “वास्तविक हिंदुस्तान” कहा था, जो उस समय के राजनीतिक बदलावों के बीच इसे हिंदू सांस्कृतिक परंपरा के एक सुरक्षित केंद्र के रूप में देखने का संकेत देता है[17] [18]

नेपाल स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित सबसे प्रतिष्ठित तीर्थों में से एक है। बागमती नदी के तट पर स्थित यह मंदिर सदियों से तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र रहा है और धार्मिक परंपराओं में इसका गहरा महत्व रहा है। ग्रंथों में हिमालय को शिव का निवास और ऋषियों की तपस्थली बताया गया है, जिससे नेपाल की आध्यात्मिक महत्ता और सुदृढ़ होती है[19]

महाभारत, रामायण और विभिन्न पुराणों जैसे अनेक प्राचीन ग्रंथों में नेपाल या हिमालय क्षेत्र का उल्लेख भी इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र का धार्मिक इतिहास में लंबे समय से विशेष स्थान रहा है। कई बार भले ही नेपाल का नाम सीधे न आए, लेकिन हिमालय का उल्लेख स्वयं इस क्षेत्र की आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित करता है।[20]

नेपाल के धार्मिक इतिहास का सबसे विशिष्ट पहलू हिंदू और बौद्ध परंपराओं का सहज सह-अस्तित्व है। भैरव, गणेश, सरस्वती और वज्रयोगिनी जैसे देवी-देवताओं की पूजा विभिन्न समुदायों द्वारा समान रूप से की जाती है, जबकि अनेक पर्व और अनुष्ठान धार्मिक सीमाओं से परे जाकर सामूहिक रूप से मनाए जाते हैं। यह समन्वय नेपाल की सभ्यतागत पहचान की सबसे गहरी और स्थायी विशेषताओं में से एक है[21]

नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के रूप में

नेपाल की हिंदू राष्ट्र के रूप में पहचान सदियों में विकसित हुई, जिसे राजकीय संरक्षण, सांस्कृतिक निरंतरता और राजनीतिक स्वायत्तता ने आकार दिया। लिच्छवि और मल्ल जैसी राज्यवंशों ने हिंदू परंपराओं को मजबूत करते हुए स्थानीय और बौद्ध तत्वों को भी समाहित किया। 1769 में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा काठमांडू घाटी के एकीकरण के साथ नेपाल एक संगठित हिंदू राज्य के रूप में उभरा। उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों के विपरीत, नेपाल ने अपनी संप्रभुता काफी हद तक बनाए रखी, जिससे एक समन्वित धार्मिक परंपरा को संरक्षित और विकसित करने का अवसर मिला[22] [23]

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद नेपाल में राणा शासन के ख़िलाफ़ असंतोष बढ़ने लगा। नेपाली कांग्रेस ने नेपाल के राजा त्रिभुवन के साथ मिलकर एक आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः राणा शासन का प्रभाव  कमजोर पड़ने लगा। 1959 के पहले आम चुनावों के साथ ही इस परिवर्तन ने एक नए दौर में प्रवेश किया, जिससे संसदीय शासन की शुरुआत हुई। परन्तु जल्द ही निर्वाचित सरकार और नेपाल के राजा महेंद्र के बीच तनाव उभरने लगे। अंततः राजा महेंद्र ने सरकार भंग कर एक केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था लागू कर दी।

1962 के संविधान ने नेपाल को औपचारिक रूप से एक हिंदू राज्य घोषित किया और राजशाही के अन्तर्गत एकता पर ज़ोर दिया। लेकिन समय के साथ राजशाही में शक्ति के केंद्रीकरण को लेकर आलोचना बढ़ने लगी। 20वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में राजनीतिक दबावों ने संवैधानिक सुधारों को जन्म दिया। 1990 का संविधान नेपाल की हिंदू पहचान को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ाने और राजशाही की शक्तियों को सीमित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

इन सुधारों के बावजूद, राजशाही के बढ़ते प्रभाव और उसे बनाए रखने के लिए धार्मिक पहचान के इस्तेमाल की धारणा से जन असंतोष फैल गया। इसका परिणाम जन आंदोलन के रूप में सामने आया जिसने नेपाल की राजनीतिक संरचना को सिरे से बदल कर रख दिया। अंततः 2006 में राजशाही को समाप्त कर अंतरिम संविधान अपनाया गया, जिसने नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में परिभाषित किया[24] [25]

नेपाल का हिंदू राज्य से धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनने तक का यह सफ़र एक गहन ऐतिहासिक परिवर्तन का द्योतक बना, लेकिन यह परिवर्तन नेपाल की सदियों से सिंचित सभ्यतागत जड़ों को उखाड़ फेंकने में सफल नहीं हो पाया। हिंदू राष्ट्र के रूप में नेपाल की अवधारणा आज भी सांस्कृतिक स्मृति और सार्वजनिक विमर्श में मौजूद है, जो राजनीतिक ढाँचों और सभ्यतागत पहचान के बीच के स्थायी संबंध को दर्शाती है।

इस अर्थ में, हिंदू राष्ट्र पर चल रही बहस महज़ एक संवैधानिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सभ्यतागत पहचान, ऐतिहासिक निरंतरता और नेपाल की राजनीतिक व सांस्कृतिक दिशा को लेकर चल रहे एक गंभीर विमर्श को भी प्रतिबिंबित करती है।

क्या नेपाल फिर से हिंदू राष्ट्र बन सकता है?

नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रश्न लंबे समय से उसके राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा रहा है। हाल के वर्षों में यह विवाद फिर से तेज़ हुआ है, जहाँ संविधान में हिंदू राष्ट्र की मान्यता की मांग समाज के विभिन्न वर्गों से उठती दिखाई दे रही है। यह मांग सिर्फ राजशाही समर्थकों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक जन भावना को दर्शाती है, जो नेपाल को हिंदू परंपराओं की सभ्यतागत मातृभूमि मानती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, 1990 के दशक में हिंदू राजशाही के कमजोर होने से मिशनरी गतिविधियों, इस्लामिक कट्टरपंथ और चीन के बढ़ते प्रभाव के लिए जगह बनी। इससे पैदा हुई अस्थिरता ने राजशाही की वापसी की मांग को फिर तेज किया। मार्च 2025 में काठमांडू में RPP के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई में एक प्रदर्शनकारी की मौत के साथ ये मांगें हिंसक रूप भी लेती दिखीं[26]

यह आंदोलन किसी एक नेता तक सीमित नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक और वैचारिक समूहों से मिल कर बना है।हाल के वर्षों में हस्ताक्षर अभियान और सार्वजनिक प्रदर्शन भी हुए हैं, जिनमें हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना की मांग उठी है[27]

युवा पीढ़ी भी इस अभियान में जुड़ती दिखाई दे रही है। हालाँकि हालिया विरोध आंदोलनों को वैचारिक रूप से एक जैसा नहीं कहा जा सकता, फिर भी उनकी मांगों में सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान का मुद्दा लगातार उभरता रहा है। यह दिखाता है कि यह चर्चा पारंपरिक राजनीति से आगे बढ़कर समाज के व्यापक स्तर तक पहुंच रही है[28]

नेपाल अंततः संवैधानिक रूप से खुद को हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनः परिभाषित करेगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन एक ऐसी उभरती हुई नेतृत्व शैली के चलते, जो खुले तौर पर सांस्कृतिक जड़ों को स्वीकार करती है और शासन सुधारों पर ज़ोर देती है, सार्वजनिक विमर्श का स्वर पहले ही बदल चुका है। इस बदलाव की प्रतिध्वनि नेपाल के बाहर भी गूंजती है, और पहचान, परंपरा तथा आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को लेकर चल रही वैश्विक चर्चाओं से जुड़ती है।

इस अर्थ में, हिंदू राष्ट्र को लेकर चल रही बहस मात्र संवैधानिक मान्यता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ी है कि तेज़ी से बदलते वैश्विक परिवेश में कोई समाज अपनी सभ्यतागत विरासत को कैसे समझता है, उसके संरक्षण हेतु क्या कदम उठाता है, और उसे किस रूप में आगे बढ़ाता है।

सन्दर्भ सूची

[1] Balen Shah: From rapper and engineer to Nepal’s rising political star | World News – India TV;  https://www.indiatvnews.com/news/world/balen-shah-from-rapper-and-engineer-to-nepal-rising-political-star-election-results-2026-2026-03-06-1032809

[2] Balen – Jay Mahakali (Swapnil, Chronic Beatz, Foeseal) – YouTube;   https://www.youtube.com/watch?v=Yse0H0mXEuQ

[3] Nepal PM Balendra Shah Balen releases new video song Jai Mahakali ahead of swearing-in Viral;  https://ndtv.in/world-news/nepal-pm-balendra-shah-balen-releases-new-video-song-jai-mahakali-ahead-of-swearing-in-viral-views-record-11272567

[4] 7 brahmans, 108 batuks, 107 monks: Balen Shah’s Hindu-Buddhist ritual-filled oath slammed over secular concerns – The Statesman; https://www.thestatesman.com/world/7-brahmans-108-batuks-107-monks-balen-shah-hindu-buddhist-ritual-filled-oath-slammed-over-secular-concerns-1503574778.html

[5] Ibid.

[6] New Mayor Balen Shah Introduces Vedic Rituals During Oath Ceremony | Ratopati | No. 1  Nepali News Portal; https://english.ratopati.com/story/55806/balen-uses-new-method-in-cold-storage

[7] Balendra Shah oath as Nepal Prime Minister on Ram Navami; https://organiser.org/2026/03/26/345788/world/balendra-shah-to-take-oath-as-nepal-prime-minister-on-ram-navami-hindu-rituals-to-resonate-during-the-ceremony/

[8] Balen Shah Nepal prime minister bans student politics reforms education system arrests rivals – India Today;  https://www.indiatoday.in/world/story/balen-shah-nepal-prime-minister-bans-student-politics-reforms-education-arrests-rivals-2888977-2026-03-30

[9] Education System Demands Radical Reforms; https://risingnepaldaily.com/news/78464

[10] Balen Shah Nepal prime minister bans student politics reforms education system arrests rivals – India Today; https://www.indiatoday.in/world/story/balen-shah-nepal-prime-minister-bans-student-politics-reforms-education-arrests-rivals-2888977-2026-03-30

[11] Nepal’s ‘Gen-Z’  PM Balen Shah announces bold 100-point plan; no student politics, may even impact US due to…;https://news24online.com/world/nepals-gen-z-pm-balen-shah-announces-bold-100-point-plan-no-student-politics-may-even-impact-us-due-to/787290/

[12] A New Generation Takes Power in Nepal | Carnegie Endowment for International Peace; https://carnegieendowment.org/russia-eurasia/research/2026/03/balen-shah-nepal-election-RSP-gen-z

[13] Lumbini, the Birthplace of the Lord Buddha – UNESCO World Heritage Centre;  https://whc.unesco.org/en/list/666/

[14] Nepal’s ancient city of Janakpur immerse in ‘Bibah Panchami’ celebrations of Bhagwan Ram and Sita mata;  https://organiser.org/2024/12/07/268393/world/nepals-ancient-city-of-janakpur-immerse-in-bibah-panchami-celebrationsof-bhagwan-ram-and-sita-mata/

[15] (46) Ayodhya से Janakpur के लिए निकली श्री Ram Barat की बारात, बारातियों में भारी उत्साह | Aaj Tak-YouTube;  https://www.youtube.com/watch?v=5o43Fslg-rU

[16] 46) अयोध्या से बारात पहुँची जनकपुर पहुँचे 20 लाख बराती | Vivah panchami Ram barat |Sita vivah vlog-5 – YouTube; https://www.youtube.com/watch?v=vRcaHkZaTMM&t=123s

[17] Vedic Hindu Civilization : Hindu Kingdom Nepal and its Cultural Traditions – Review Nepal News; https://reviewnepal.com/articles/vedic-hindu-civilization-hindu-kingdom-nepal-and-its-cultural-traditions.html

[18] Nepal and India the original land of Civilization – By Dirgha Raj Prasai – Hindu Janajagruti Samiti; https://www.hindujagruti.org/news/27721.html

[19] Sacred Nexus of Nepal in Hindu Mythology: Representation and Significance in Sanskrit Scriptures” by Ramesh Prasad Adhikary;  https://www.nepjol.info/index.php/academia/article/view/73355/56134

[20] Ibid.

[21] Nepali Culture and Society: A Historical Perspective” by Prayag Raj Sharma;   https://sources.mandala.library.virginia.edu/sites/mandala-sources.lib.virginia.edu/files/pdf-files/4308_0.pdf

[22] Nepal – Himalayas, Monarchy, Unification | Britannica; https://www.britannica.com/place/Nepal/History

[23] Nepal: The Other Hindus; https://swarajyamag.com/politics/nepal-the-other-hindus

[24] Nepal – Himalayas, Monarchy, Unification | Britannica;  https://www.britannica.com/place/Nepal/History

[25] Nepal: The Other Hindus;  https://swarajyamag.com/politics/nepal-the-other-hindus

[26] Why Nepal wants return of “Hindu Rashtra’: ‘King’ only hope of people fed up with corruption and instability over last 17 years;  https://www.opindia.com/2025/04/nepal-hindu-rashtra-monarchy-pakistan-china-missionaries/

[27] Parties And Politicians Seek ‘Return To Hindu Rashtra’ – StratNews Global;  https://stratnewsglobal.com/nepal/nepal-parties-and-politicians-seek-return-to-hindu-rashtra/

[28] Nepal Protest: सेना के हाथ में नेपाल, Gen-Z का प्रस्ताव – हिंदू राष्ट्र और सुशीला कार्की को पीएम से कम कुछ नहीं – Nepal Unrest Army Takes Control After Gen Z Protests Over Corruption; https://www.jagran.com/world/other-nepal-unrest-army-takes-control-after-gen-z-protests-over-corruption-24042791.html

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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