राम मंदिर ध्वजारोहण से बौखलाया छद्म सेक्युलर तंत्र: खीझ का कारण क्या, घबराहट किससे?

अयोध्या के इस क्षण ने उन शक्तियों को विचलित कर दिया जो दशकों से हिंदू परंपरा को हाशिए पर रखने का अभियान चलाती रही हैं। उनकी घबराहट यह बताती है कि भारत का आत्मविश्वास लौट रहा है और उनका वैचारिक प्रभुत्व अब टूट रहा है।
  • अयोध्या ध्वजारोहण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति और आत्मविश्वास के पुनरुत्थान का सार्वजनिक घोषणा-क्षण था।
  • इस कार्यक्रम से वाम-उदारवादी और इस्लामवादी हलकों में तीखी प्रतिक्रिया इसलिए उपजी क्योंकि यह उनके वर्षों से गढ़े हिंदू-विरोधी नैरेटिव को चुनौती देता है।
  • विपक्ष ने ध्वजारोहण को असंवैधानिक ठहराने की कोशिश की, जबकि वास्तविक उद्देश्य हिंदू पहचान की बढ़ती स्वीकृति के प्रति उनकी असहजता छिपाना था।
  • पाकिस्तान ने भी “इस्लामोफोबिया” और “मुस्लिम विरासत मिटाने” जैसे आरोप लगाकर वही भाषा दोहराई जो भारतीय छद्म-सेक्युलर तंत्र वर्षों से इस्तेमाल करता रहा है।
  • वाम-उदारवादी मीडिया ने कार्यक्रम को बहुसंख्यकवाद के फ्रेम में दिखाने का प्रयास किया, पर जनता की प्रतिक्रिया ने स्पष्ट कर दिया कि एक पुनर्जागृत समाज की आवाज़ अब दबाई नहीं जा सकती।

जनवरी 2024 में सम्पन्न अयोध्या राम मंदिर का उद्घाटन भारत की सांस्कृतिक यात्रा में एक ऐतिहासिक मोड़ था। सदियों के संघर्ष, ऐतिहासिक विकृतियों और राजनीतिक दमन के बीच जन्मी पीड़ा को एक वैध और सार्वजनिक मान्यता मिली। भगवान राम के जन्मस्थान की पुनर्स्थापना सिर्फ एक धार्मिक आकांक्षा का परिणाम नहीं थी; यह भारतीय सभ्यता की आत्मा का पुनरागमन था। नवंबर 2025 का ध्वजारोहण इस यात्रा का स्वाभाविक अगला अध्याय बना। ‘धर्म ध्वज’ पर अंकित ‘ॐ’, सूर्य और कोविदार वृक्ष जैसे प्रतीक केवल धार्मिक नहीं थे; वे भारतीय संस्कृति की प्राचीन आध्यात्मिक धारा के सार्वजनिक उद्घोष थे। “जय श्री राम” की गर्जनाओं के बीच ध्वज का उठना उस समाज की घोषणा थी जिसने अपने इतिहास और पहचान को अब बिना संकोच स्वीकार करना शुरू कर दिया है।

ध्वजारोहण के बाद वाम-उदारवादी और इस्लामवादी हलकों में जो असहजता और प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई, वह लगभग पूर्वनिर्धारित थी। धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर वही विक्टिम मानसिकता दोबारा सामने आई जिसने दशकों तक भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर धुंध डाली थी। यह समूह किसी भी ऐसे भारत से असहज होता है जो अपनी जड़ों पर गर्व करे, इतिहास को स्वयं परिभाषित करे, और अपने अस्तित्व को दबी आवाज़ में नहीं बल्कि सम्मानपूर्ण स्वरों में व्यक्त करे।

इन प्रतिक्रियाओं में छिपा वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट दिखता है: भारत की उभरती सांस्कृतिक चेतना को कमजोर करना, और उस आत्मविश्वास को रोकना जो जनता के भीतर अपनी विरासत के प्रति सम्मान के रूप में उभर रहा है। एक ऐसा राष्ट्र जो अपने मूल्यों, परंपराओं और बौद्धिक विरासत के आधार पर अपनी कहानी खुद लिखने का साहस दिखाए, वह उन शक्तियों के लिए असुविधाजनक है जिन्होंने वर्षों तक भारत की कथा को वैचारिक कसौटियों से नियंत्रित किया।

इस लेख में हम देखेंगे कि देश की बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियों के साथ किस तरह एक जैसा हिन्दूद्वेषी उन्माद बार-बार उभरता है। ध्वजारोहण के बाद मीडिया, नागरिक समाज, राजनीति और बौद्धिक मंचों में फैलाए गए हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स का विश्लेषण अगले हिस्सों में प्रस्तुत है।

छद्म सेक्युलरवादी और कट्टर इस्लामी तंत्र की खीज

प्रधान मंत्री ने इस ध्वजारोहण को देश की दीर्घकालीन सांस्कृतिक चोटों को भरने वाला एक क्षण कह कर प्रस्तुत किया। यानी उन्होंने अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण समारोह की व्याख्या एक ऐसे क्षण के तौर पर की, जिसने हिंदू सभ्यता द्वारा झेले गये शताब्दियों के ज़ख्मों को भरने का प्रयत्न किया हो: “आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और शिखर की साक्षी है। आज पूरा भारत, पूरा विश्व राममय है। हर राम भक्त के हृदय में अद्भुत संतोष है, कृतज्ञता है, दिव्य आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं। सदियों का दर्द आज समाप्त हो रहा है। सदियों का संकल्प आज पूर्णता को प्राप्त कर रहा है।प्रधान मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि राम सिर्फ एक भगवान नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था जो धर्म के आदर्शों पर आधारित है, जो आदर्श 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने और भारतीय समाज की क्षमताओं को उन्नत करने के लिए अनिवार्य हैं।[1]

लेकिन यह दृष्टि उन समूहों को स्वीकार्य नहीं जो भारतीय पहचान को राम राज्य के आदर्शों से देखने के विरोधी हैं। जैसे ही आयोजन सम्पन्न हुआ, वही पुराने आरोप फिर उछाले गए—हिंदुत्व वर्चस्व, बहुसंख्यकवाद, राज्य का भगवाकरण, और असहिष्णुता। कई टिप्पणीकारों ने यह दावा किया कि प्रधानमंत्री की उपस्थिति भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है, जबकि तथ्य यह है कि मंदिर निर्माण और ध्वजारोहण दोनों देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय और संवैधानिक प्रक्रिया की पूर्णता के अंतर्गत हुए।

राना अय्यूब ने X पर लिखामोदी संविधान दिवस पर प्रवचन दे रहे हैं, ठीक 24 घंटे पहले राम मंदिर में उनका भगवा तमाशा हुआ, जिसे बाबरी मस्जिद गिराकर बनाया गया। बाबरी गिराने के बाद हुई हिंसा में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कृत्य करार दिया।[2]

इसी तरह, अति-वामपंथी एक्टिविस्ट अर्फ़ा खानम शेरवानी, जो अपनी हिन्दूफोबिक टिप्पणियों के लिए जानी जाती हैं, ने ध्वजारोहण समारोह की राष्ट्रवादी टीवी कवरेज का मज़ाक उड़ाते हुए पत्रकारिता पर ही ज्ञान देना शुरू कर दिया——“और देखते-ही-देखते हिंदी पत्रकारिता, ‘हिंदू पत्रकारितामें बदल गई। पत्रकार, क़लम के सिपाहियों से धर्म के सैनिक बन बैठे।” [3]

वामपंथी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी ने अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण समारोह का नाम सीधे तौर पर तो नहीं लिया, लेकिन हिंदू मुद्दों की बढ़ती सार्वजनिक मौजूदगी का मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्होंने X के माध्यम से ज़हरीला कटाक्ष किया। बिना किसी संदर्भ या पृष्ठभूमि के कुछ तस्वीरें साझा करते हुए — जिनमें पुलिस द्वारा कथित रूप से प्रदर्शनकारियों पर की जा रही कार्रवाई दिखाई गई — राठी ने सरकार पर दोगलेपन का आरोप लगाया। उनका पोस्ट थाएक फ्रॉड बाबा खुलेआम रैली कर रहा है, हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहा है। यह रिपब्लिक के ख़िलाफ़ है। संविधान के ख़िलाफ़। राष्ट्र के ख़िलाफ़। लेकिन क्या पुलिस उसके साथ भी इतनी ही बर्बरता करेगी? और क्या पुलिस बलात्कारियों, भ्रष्ट नेताओं, हत्यारों के साथ भी इतनी ही बर्बरता दिखाती है?” [4]

अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण समारोह के पश्चात सोशल मीडिया पर RSS के ख़िलाफ़ भी खूब दुष्प्रचार किया गया। हिंदू-विरोध के लिए कॉमेडियन कुणाल कामरा की एक पोस्ट — जिसमें एक कुत्ते की तस्वीर वाली टी-शर्ट और साथ में आरएसएस पर आपत्तिजनक टिप्पणी थी — वामपंथी और हिंदूफोबिक नेटवर्क्स में खूब वायरल हुई। कई भाजपा नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कॉमेडियन के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की चेतावनी दी।[5]

OpIndia की एक रिपोर्ट ने अयोध्या समारोह के बाद सोशल मीडिया पर फैली हिंदू-विरोधी पोस्टों की इस लहर का विस्तार से विवरण दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, कई भारतीय टीवी पत्रकार — जो कार्यक्रम की सकारात्मक और राष्ट्रवादी कवरेज कर रहे थे — उन्हें वामपंथी और कट्टर इस्लामिस्ट समूहों ने आक्रामक रूप से निशाना बनाया।

यदि उनकी सोशल मीडिया पोस्ट्स देखें, तो लगता है कि उनकी अपेक्षा यही थी कि पत्रकार हिंदू धर्म को नीचा दिखाएँ और मंदिर को भारत की पहचान पर लगे किसी धब्बे की तरह प्रस्तुत करें, न कि एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में स्वीकारें। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कैसे समारोह की प्रशंसा करने वाले सेलिब्रिटीज़ और बुद्धिजीवियों को ट्रोल किया गया और ध्वजारोहण को “तमाशा” करार दे उसका मज़ाक उड़ाया गया। चरम-वामपंथी टिप्पणीकारों ने हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी को और भी तेज करते हुए, आरोप लगाया कि भगवा ध्वज फहराना भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत और बहुलतावादी के संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है।[6]

विपक्षी आक्रोश और दोहरे मापदंड

Stop Hindudvesha पहले भी बता चुका है कि तुष्टिकरण की भारतीय राजनीति “धर्मनिरपेक्षता” का मुखौटा पहनकर कैसे हिंदू परंपरा और इस भूमि की पुरातन सांस्कृतिक पहचान को बदनाम करती रही है[7] भारत की राजनीतिक बयानबाज़ी एक लंबे समय से हिंदू-विरोधी विमर्श से ख़ासा प्रभावित रही है। राजनीतिक नेताओं द्वारा अपने वक्तव्यों में सनातन धर्म को नीचा दिखा इसका अपमानजनक चित्रण करना भारतीय राजनीति में अब एक आम बात हो चुकी है। यहाँ तक कि कई बार तो सनातन धर्म की तुलना डेंगू और मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारियों तक से कर दी जाती है। इससे यह पता चलता है की हिंदू धर्म के दानवीकरण का ट्रेंड भारतीय राजनीतिक परिपेक्ष्य पर किस कदर हावी हो चुका है।

ध्वजारोहण के बाद, विपक्षी नेताओं ने फिर से “सेक्युलरिज्म” का राग अलापना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का समारोह में शामिल होना संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप के अनुरूप नहीं। कई नेताओं ने इस आयोजन पर सवाल उठाए — और कई टिप्पणियाँ सीधे-सीधे हिंदू-विरोधी लहजा अपनाती नज़र आयीं।

कांग्रेस के नेता Rashid Alvi ने कहा कि भारत का कोई राज्य धर्म नहीं है। इसलिए, प्रधानमंत्री द्वारा किसी मंदिर पर भगवा झंडा फहराना संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा — “क्या वह मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च पर झंडा फहराएंगे? वे राजनीतिक लाभ के लिए राम मंदिर पर झंडा फहराना चाहते हैं, ताकि उत्तर प्रदेश चुनाव में फ़ायदा मिल सके, देश में धार्मिक भावनाएँ भड़का कर। सेक्युलरिज़्म क्या है, यह उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू से सीखना चाहिए”।  वहीं, उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष Ajay Rai ने सरकार पर धर्म को एक राजनीतिक तमाशे और मार्केटिंग के लिए की गयी नौटंकी में बदलने का आरोप लगाया[8]

इस कार्यक्रम का राजनीतिकरण सिर्फ मंदिर में भगवा ध्वज फहराने के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस पूरे प्रकरण में जातिवाद को भी घुसा दिया गया। अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद ने दावा किया कि उन्हें अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण समारोह का न्यौता इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वे दलित हैं।[9] यह बात ध्यान देने योग्य है कि जनवरी 2024 में संपन्न हुए अयोध्या राम मंदिर के “प्राण प्रतिष्ठा” समारोह के समय भी कुछ इसी तरह की राजनीति खेली गयी थी, और उस समय भी इसी प्रकार के आरोपों का दौर चला था। विपक्ष के कई नेताओं ने सरकारी निमंत्रण को ठुकराते हुए समारोह में सम्मिलित होने से यह कहकर साफ़ इनकार कर दिया था, की यह एक “राजनीतिक” समारोह है।

ऊपरी तौर पर देखें तो विपक्ष का यह शोर-शराबा भाजपा पर की जाने वाली सामान्य आलोचना जैसा ही प्रतीत होता है। लेकिन थोड़ी पड़ताल करें तो एक पैटर्न उभरता है, जो स्पष्ट बताता है कि भारत की हिंदू जड़ों के मजबूत होते प्रभाव से कुछ समूह लगातार विचलित रहते हैं।

जब राजनीतिक नेता सनातन धर्म का मज़ाक उड़ाते हैं, हिंदू देवी-देवताओं का ग़लत चित्रण कर उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं, हिंदू साधु-संतों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हैं, और यह दावा करते हैं कि हिंदू राष्ट्र की बात करना भी असंवैधानिक है,  तो यह महज़ राजनीति नहीं, बल्कि संस्थागत हिंदू विरोधी प्रवृत्ति को उजागर करता है।

यह पैटर्न तब और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाता है, जब वही नेता खुलेआम अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं, कट्टर इस्लामिक उग्रवाद को हल्का करके पेश करते हैं, और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के सिद्धांत को चुनिंदा तौर पर लागू करते हैं, यानी इसका इस्तेमाल इस तरह से करते हैं जिससे हिंदू समुदाय पर निशाना साधा जा सके।

पाकिस्तान “इस्लामोफ़ोबिया” का राग अलापता हुआ

और तो और, पाकिस्तान ने ध्वजारोहण पर कहा कि भारत “मुस्लिम विरासत मिटा रहा है, और भारत पर अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करने का भी आरोप लगाया।[10]

उसकी यह प्रतिक्रिया ऐसी प्रतीत हुई जैसे किसी विदूषक को अचानक किसी गंभीर नाटक में भारी-भरकम संवाद दिए गए हों। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने तो संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं से हस्तक्षेप की अपील भी की, मानो स्वयं उसका मानवाधिकार रिकॉर्ड निर्दोष हो। यदि पाकिस्तान जैसा देश, जो कि खुल्लम खुल्ला आतंकवाद का पोषण करता है, दूसरों को अल्पसंख्यक अधिकारों और बहुलतावाद पर ज्ञान दे, तो इससे अधिक हास्यास्पद भला और क्या हो सकता है। भारत सरकार ने पाकिस्तान के इस आडंबर पर तंज़ कसते हुए कहा की भारत में अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर पाकिस्तान की चिंता ठीक ऐसी मालूम पड़ती है, मानो Osama bin Laden विश्व शांति पर व्याख्यान दे रहा हो।[11]

पिछले महीनों में, पाकिस्तान ने अपनी रणनीति बदलकर “भगवा आतंकवाद” (saffron terrorism) के मनगढ़ंत विमर्श को हवा देने की कोशिश की — खुद को “पीड़ित” दिखाते हुए “हिंदुत्व आतंकवाद” और “हिंदू मेज़ॉरिटेरियनिज़्म” के नाम पर डर फैलाने का काम किया। ध्वजारोहण समारोह को लेकर पाकिस्तान की जो हिंदू-विरोधी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, वे इस पैटर्न में बिलकुल फ़िट बैठती हैं। यह पूरा घटनाक्रम इसी ओर इशारा करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद-संबंधी विमर्श को सिरे से उलटने की कोशिश कर रहा है। भगवा आतंकवाद या हिन्दुत्व टेरर का झूठा नैरेटिव गढ़ वह कट्टर इस्लामिक आतंकवाद को लेकर किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रहा है।  लेकिन जब हम देखते हैं कि पाकिस्तान में खुद अल्पसंख्यकों — ख़ासकर हिंदुओं — के अधिकार लगभग न के बराबर हैं, और वहां उनका लगातार उत्पीड़न हो रहा है,[12] [13] तो भारत के अल्पसंखकों को लेकर पाकिस्तान की तथाकथित “चिंताएँ” और भी अधिक फ़र्ज़ी और आडंबरपूर्ण लगने लगती हैं।

भारत के बढ़ते सांस्कृतिक पुनर्जीवन पर हमला करने वाली पाकिस्तान की यह बयानबाज़ी, हमारे यहाँ के वाम-उदारवादी समूहों की भाषा की पूरी नकल जैसी लगती है। यानी जिस प्रकार की हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी का प्रयोग पाकिस्तान करता है, ठीक उसी प्रकार की हिंदू-विरोधी जुमलेबाज़ी भारत के वाम-उदारवादी तंत्र द्वारा निर्मित विमर्श में देखने को मिलती है। ऐसे माहौल में, जहाँ हिंदुओं के मुद्दों, उनकी जायज़ चिंताओं और उन पर होने वाले अन्याय और अत्याचार संबंधी विमर्श को अक्सर दबा दिया जाता है, भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान को लेकर पाकिस्तान की ज़हरीली बयानबाज़ी हिंदूफोबिया को खुला निमंत्रण देने जैसा है। पाकिस्तान जिस प्रकार से भारत के सभ्यतागत पुनर्जागरण की सार्वजनिक तौर पर भर्त्सना कर रहा है, वह हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह, नफ़रत, और यहाँ तक कि हिंसा के सामान्यीकरण का खुला न्यौता है।

वाम-उदारवादी मीडिया का प्रोपेगैंडा

वैश्विक वाम-उदारवादी मीडिया, और साथ ही भारतीय प्रेस के एक हिस्से ने, अयोध्या राम मंदिर के मुद्दे को निरंतर हिंदुत्व और इस्लामोफ़ोबिया के चश्मे से देखा है। जनवरी 2024 में संपन्न हुए प्राण प्रतिष्ठा समारोह के महीनों पहले से ही BBC, अल जज़ीरा, डॉयच वेले, द गार्डियन और द इकॉनमिस्ट जैसे मंच लगातार पक्षपाती और चुनिंदा रिपोर्टिंग करते रहे। इनके अनुसार, मंदिर का निर्माण “हिंदू बहुसंख्यकवाद” की आक्रामक अभिव्यक्ति है, जो “अल्पसंख्यक अधिकारों” के लिए ख़तरा है, और अपनी कवरेज में वे मंदिर पुनर्निर्माण के कानूनी आधार बने पुख्ता पुरातात्विक साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लगभग नज़रअंदाज़ करते रहे[14]

प्राण प्रतिष्ठा समारोह की कवरेज हिंदू-विरोधी पूर्वागढ़ों से ग्रसित रही। कवरेज में प्रायः हिंदू आस्था की भद्दी तस्वीरें उकेरी गईं और राम मंदिर को “हिंदू बहुसंख्यकवाद” का दमनकारी प्रतीक बताया गया। द वॉशिंगटन पोस्ट ने समारोह को “मोदी के विवादित हिंदू मंदिर का उद्घाटन” कहकर प्रस्तुत किया।[15] वहीं द गार्डियन ने इस अवसर पर एक कटु लेख प्रकाशित किया, जिसमें “दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवाद” के उभार पर चिंता जताते हुए लिखा गया कि “मोदी समर्थक सेक्युलरिज़्म को एक विदेशी अवधारणा मानते हैं और उसे हिंदुओं के दमन को छुपाने का साधन बताते हैं।[16] डॉयच वेले ने भी वही लाइन पकड़ी और मंदिर को बीजेपी से जुड़ी “हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की।[17]

ज्यादातर पश्चिमी रिपोर्टें एक तयशुदा नैरेटिव पर टिकी रहीं। ज़ोर इस बात पर रहा कि यह वही स्थान है जहाँ बाबरी मस्जिद “ढहाई गई थी।” लेकिन इस बहाने उन्होंने उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और अदालत में पेश विस्तृत पुरातात्विक प्रमाणों को सुविधा से किनारे कर दिया, जो वहाँ पहले से मौजूद मंदिर की पुष्टि करते हैं।

कर सेवकों के बलिदान और राष्ट्रव्यापी आंदोलन को “राजनीतिक तमाशा” कहकर ख़ारिज करना उसी घिसी-पिटी हिंदू-विरोधी प्रवृत्ति का नमूना है, जिस पर वाम-उदारवादी मीडिया हमेशा लौटता है। अयोध्या राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की रिपोर्टिंग में हिंदुओं के सरोकारों को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि इस्लामोफ़ोबिया के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। इसका नतीजा यह निकला कि इस समारोह के गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का सारा मर्म धुंधला पड़ गया।

अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण समारोह की वाम-उदारवादी कवरेज ने फिर एक बार सेक्युलरिज़्म की वही पुरानी बहस छेड़ दी। डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित एक लेख की हेडलाइन कुछ इस प्रकार रही—“क्या मोदी बहुसंख्यकवादी नैरेटिव के ज़रिए भारत की संवैधानिक पहचान तय कर रहे हैं?” लेख में भारत के इस सांस्कृतिक उत्थान—अयोध्या मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और संसद में सेंगोल की स्थापना—को संवैधानिक सिद्धांतों पर हमले के रूप में पेश किया गया। साथ ही जाति समीकरण का तड़का लगाते हुए लिखा गया कि “ज़्यादातर वोटरों ने शायद इस मंदिर प्रोजेक्ट को सवर्ण-प्रधान एजेंडा माना।” इतना ही नहीं, लेखक ने प्रधानमंत्री द्वारा की गयी मैकालेवादी सोच और उपनिवेशवादी मानसिकता की आलोचना को भी “संविधान पर परोक्ष हमला” घोषित कर दिया।[18]

द वायर में प्रकाशित एक लेख ने तो यह आरोप तक लगा दिया कि प्रधानमंत्री ने अयोध्या राम मंदिर पर भगवा ध्वज फहराकर संविधान की मूल भावना का उल्लंघन किया।[19] साउथ एशिया जर्नल के एक लेख में भी इसी तरह के नैरेटिव दोहराए गए—भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान की निंदा करते हुए, मंदिर को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की “दमनकारी याद” के तौर पर प्रस्तुत किया गया और हिंदुत्व की एक बेहद वीभत्स छवि पेश की गयी।[20]

इन बार-बार उठाए जाने वाले “संवैधानिक मानकों के उल्लंघन” वाले आरोपों में दोगलापन साफ़ दिखाई देता है। पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्ष पोप से मिलें या नेता बाइबिल पर शपथ लें—इसे कभी सेक्युलरिज़्म के ख़िलाफ़ नहीं बताया जाता। लेकिन वही टिप्पणीकार जब गैर-पश्चिमी समाजों के बारे में बोलते या लिखते हैं, ख़ासकर एक ऐसी सभ्यता के बारे में जिसकी जड़ें अब्राहमिक न होकर पूरी तरह से स्वदेशी सांस्कृतिक परिवेश में निहित हों, तो अचानक उनके लिए धर्म और राष्ट्र के बीच का कोई भी संबंध “अक्षम्य पाप” बन जाता है।

भारतीय सभ्यता के उदय पर हमला

अयोध्या राम मंदिर ध्वजारोहण की आलोचना, जिसे कभी सेक्युलरिज़्म तो कभी अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के नाम पर पेश किया जाता है, असल में भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर एक सीधा वार है। यह उस पूरे तंत्र की खीझ को दर्शाता है, जो भारत की प्राचीन हिंदू विरासत के पुनरुदय से असहज हो रहा है।

राम जन्मभूमि आंदोलन को सालों तक “हिंदुत्व फासीवाद” और “अल्पसंख्यकों के दमन” के  कथानक में बाँधकर पेश किया जाता रहा—जबकि उसके मूल में एक घायल सभ्यता की अपनी पहचान वापस पाने की सच्ची लड़ाई रही है।

इतिहासकार मीनाक्षी जैन अपनी किताब The Battle for Ram: Case of the Temple at Ayodhya में इसी विकृति को उजागर करती हैं। विस्तृत ऐतिहासिक अभिलेखों और 2003 की ASI खुदाई रिपोर्टों के आधार पर वे दिखाती हैं कि कैसे रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आर. एस. शर्मा और बिपन चंद्र जैसे वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या मंदिर की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को धूमिल करने के लिए एक संगठित दुष्प्रचार अभियान चलाया।

किताब में बताया गया है कि इन इतिहासकारों ने बिना किसी ठोस प्रमाण के यह सिद्धांत गढ़े कि वाल्मीकि रामायण को भगवान राम के अस्तित्व का ऐतिहासिक स्रोत नहीं माना जा सकता… कि अयोध्या में राम की भक्ति मध्यकाल में ही उभरी और 18वीं सदी के बाद प्रमुख हुई… और इससे पहले यह क्षेत्र मुख्यतः बौद्ध और जैन प्रभाव वाला था। इन सभी दावों का उद्देश्य एक ही था: राम जन्मभूमि आंदोलन को ऐतिहासिक आधार से वंचित कर देना।

जैसा कि पुस्तक में उल्लेखित है: यह वाकई चौंकाने वाली बात है कि कुछ चुनिंदा वामपंथी इतिहासकार सदियों पुराने विश्वास को चुनौती देकर ज़ोर-शोर से यह दावा करते रहे कि बाबरी मस्जिद खाली ज़मीन पर बनी थी। बढ़ते प्रमाणों के बावजूद उन्होंने अपने रुख़ में कोई बदलाव नहीं किया। इनमें से कई इतिहासकार 1990-91 में वीएचपी, बीएमएसी और सरकार के बीच वार्ताओं के दौरान बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी (बीएमएसी) की ओर से विशेषज्ञ बनकर भी पेश हुएफिर भी वे ख़ुद को स्वतंत्र इतिहासकारकहलाने का नाटक करते रहे।[21]

समापन

अयोध्या में संपन्न हुआ ध्वजारोहण समारोह मात्र एक औपचारिक रस्म नहीं था। यह उस समाज का उद्गार था, जो सदियों की गलत व्याख्याओं, ऐतिहासिक अस्पष्टताओं और वैचारिक बाधाओं को पार कर अंततः अपनी गहन सांस्कृतिक जड़ों को फिर से देख पा रहा है। इस ऐतिहासिक पल के बाद जिस तीखे विरोध और शोर-शराबे का दौर चला, वह खुद इस बदलाव की विराटता को और ज़्यादा स्पष्ट कर देता है। हिंदूफ़ोबिया से भरी हर प्रतिक्रिया, हर वह कोशिश जिसमें इस धार्मिक आयोजन को संवैधानिक उल्लंघन या राजनीतिक खेल करार दिया गया, दरअसल उन लोगों की गहरी बेचैनी को उजागर करती है जिन्होंने अब तक भारत और उसके इतिहास की कथा पर अपना वर्चस्व क़ायम रखा था।

लेकिन जनता की प्रतिक्रिया साफ बताती है कि अयोध्या का ध्वज किसी विभाजन का संकेत नहीं है; वह करोड़ों लोगों को उनकी साझा परंपरा और लंबे समय से जीवित स्मृतियों की ओर लौटने का आह्वान है। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, अयोध्या राम मंदिर हमारी सांस्कृतिक दृढ़ता का प्रतीक बनकर मज़बूती से खड़ा है।

और सत्य तो यही है, प्रोपेगंडा की ताक़त का इस्तेमाल कर चाहे कितने भी झूठे विमर्श क्यों न गढ़े जायें, एक पुनर्जागृत सभ्यता की आवाज़ को फिर से दबाया नहीं जा सकता।

सन्दर्भ सूची

[1] Full Text: PM Modi’s Speech At Ram Mandir Dhwaja Rohana Ceremony   https://swarajyamag.com/commentary/full-text-pm-modis-speech-at-ram-mandir-dhwaja-rohana-ceremony

[2] Rana Ayyub on X;  https://x.com/RanaAyyub/status/1993906070595789213

[3] Arfa Khanum Sherwani on X; https://x.com/khanumarfa/status/1993895260628668654

[4] Dhruv Rathee on X;  https://x.com/dhruv_rathee/status/1993239263207477752

[5] BJP warns of action against comedian Kunal Kamra over t-shirt mocking RSS | India News;   https://www.hindustantimes.com/india-news/bjp-warns-of-police-action-against-comedian-kunal-kamra-over-t-shirt-mocking-rss-101764132341107.html

[6] Ram Mandir Dhwajarohan: How Pakistan, Islamists and India’s woke brigade united in hatred against Hindu civilisational revival;  https://www.opindia.com/2025/11/ram-mandir-dhwajarohan-how-pakistan-islamists-and-indias-woke-brigade-united-in-hatred-against-hindu-civilisational-revival/

[7] Hinduphobia: Politics of Anti-Hindu Rhetoric; https://stophindudvesha.org/hinduphobia-as-playbook-turning-anti-hindu-rhetoric-into-political-capital/

[8] Ayodhya Ram temple | ‘Will PM hoist a flag on mosque’: Congress questions Modi-Bhagwat’s  temple ceremony – Telegraph India;  https://www.telegraphindia.com/gallery/will-pm-hoist-a-flag-on-mosque-congress-questions-modi-bhagwats-temple-ceremony-photogallery/cid/2134731?slide=3

[9] He is a Dalit Congress MP Imran Masood lashes out at Awadhesh Prasad for not being invited to Ram Mandir Dhwajarohan – Ram Mandir Dhwajarohan: ‘दलित हैं वो इसलिए…’,    https://www.jansatta.com/rajya/he-is-a-dalit-congress-mp-imran-masood-lashes-out-at-awadhesh-prasad-for-not-being-invited-to-ram-mandir-dhwajarohan/4263903/

[10] No moral standing’: India slams Pak for remarks on Ram Temple flag-hoisting | India News;  https://www.hindustantimes.com/india-news/no-moral-standing-india-slams-pak-for-remarks-on-flag-hoisting-at-ram-temple-101764161133038.html

[11] No moral standing’: India rubbishes Pakistan’s objection to Dhwajarohan at Ayodhya Ram Temple;   https://www.wionews.com/india-news/-no-moral-standing-india-rubbishes-pakistan-s-objection-to-dhwajarohan-at-ayodhya-ram-temple-1764162465871

[12] Pakistan under fire for systematic persecution of Ahmadis, Hindus, and Christians;  https://www.aninews.in/news/world/asia/pakistan-under-fire-for-systematic-persecution-of-ahmadis-hindus-and-christians20251004141133/

[13] Persecution of Hindus in Pakistan: HRCP report exposes violence and injustice;   https://www.opindia.com/2025/03/minorities-in-danger-hindus-face-murder-assault-forced-conversion-in-pakistan-hrcp-report/

[14] Western media peddles propaganda against Ayodhya Ram Mandir ahead of inauguration;  https://hindupost.in/world/western-media-peddles-propaganda-against-ayodhya-ram-mandir-ahead-of-inauguration/

[15] In photos: The inauguration of Modi’s controversial Hindu temple – The Washington Post;    https://www.washingtonpost.com/world/interactive/2024/photos-inauguration-modis-controversial-hindu-temple/

[16] The Guardian view on Modi in Ayodhya: an alarming new era for India | Editorial | The Guardian;     https://www.theguardian.com/commentisfree/2024/jan/22/the-guardian-view-on-modi-in-ayodhya-an-alarming-new-era-for-hindu-nationalism

[17] India: Modi inaugurates controversial Ayodhya temple – DW – 01/22/2024; https://www.dw.com/en/india-modi-inaugurates-controversial-ayodhya-temple/a-68048499

[18] Modi redefining India’s constitutional identity through majoritarian narratives? ;  https://www.deccanherald.com/opinion/is-modi-redefining-indias-constitutional-identity-through-majoritarian-narratives-3812961

[19] A Flag Hoisting Shows it is Again Time to Head Ambedkar’s Warning – The Wire;    https://thewire.in/communalism/a-flag-hoisting-shows-it-is-again-time-to-heed-ambedkars-warning

[20] Ram Mandir Saffron Flag Unfurled; India’s Imagined   Independence from Foreign Domination | South Asia Journal; https://southasiajournal.net/post/category/60558/ram-mandir-saffron-flag-unfurled-indias-imagined-independence-from-foreign-domination

[21] Meenakshi Jain; The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya”; p.5.

Rati Agnihotri
Rati Agnihotri
Rati Agnihotri is an independent journalist and writer currently based in Dehradun (Uttarakhand). Rati has extensive experience in broadcast journalism, having worked as a Correspondent for Xinhua Media for 8 years. She has also worked across radio and digital media and was a Fellow with Radio Deutsche Welle in Bonn. Rati regularly contributes articles to various newspapers, journals and magazines. Her articles have been recently published in "Firstpost", "The Sunday Guardian", " Organizer", OpIndia", "Hindupost", "Garhwal Post", "Sanatan Prabhat", etc. Rati writes extensively on issues concerning politics, geopolitics, Hindu Dharma, culture, society, etc. The points of intersection between geopolitics and culture are of special interest to her. A lot of her work explores issues concerning Bharat's civilizational and cultural ethos from a global perspective. She obtained her master’s degree in International Journalism from the University of Leeds, UK and a BA (Hons) English Literature from Miranda House, Delhi University. Rati is also a bilingual poet (English and Hindi) with two collections of English poetry to her credit. Her first poetry collection "The Sunset Sonata" has been published by Sahitya Akademi, India's National Academy of Letters. Her second poetry book "I'd like a bit of the Moon" has been published by Red River.
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